जीवनसाथी-76

जीवनसाथी –76



      
        राजा के लिए महल में परेशानियां समाप्त नही हुई थीं। हर मोड़ पर उसे नई चुनौती का सामना करना पड़ रहा था।
     अलग अलग राजनैतिक पार्टियां अपने मतलब के लिए लोगों को प्रलोभन दे देकर अपनी तरफ घुमाने के प्रयास में थी।।
   भोली भाली जनता कहीं किसी प्रकरण में अपनी ज़मीन गंवा रही थी तो कहीं किसी प्रकरण में अपने हिस्से के कुंए बावड़ी।
    जब बड़े व्यापारी उन राजनेताओं के साथ हाथ मिलाकर जनता को ठग अपना उल्लू सीधा कर निकल लेते तब कुछ एक फ़र्ज़ी कागजों दस्तावेजों के साथ जनता राजा के दरबार में खड़ी अपना रोना रोती।
  राजा के लाख बार समझाने पर भी ये सब चलता चला आ रहा था ।
    महल के बाहर का राजपाट सम्भालना मुश्किल हो रहा था उस सबके साथ उनके परिवार के फैले हुए कारोबार को भी युवराज भैया के साथ अब उसे ही देखना था।
   इन सब के बीच महल में चल रही उठापटक भी उसे विचलित कर जाती थी। विराज किसी के संभाले नही संभल रहा था।
    विराज की एक पर एक बढ़ती बदतमीज़ियां देख कर ही उसके विवाह का निर्णय लिया था माँ साहेब ने। लेकिन ना तो इस विवाह के बाद विराज को गद्दी मिली और ना ही उसके स्वभाव में कोई सुधार आया था।
    माँ साहेब को यही लगा था कि दोनों तरफ की जिम्मेदारियां शायद उसके स्वभाव को बदल दे पर गद्दी का छीनना उसे एक अलग ही कड़वाहट से भर गया था।
   विवाह के कुछ समय बाद तक यही लगा था कि उसमें कुछ सुधार आ गया है जिस तरह से वो राजा के आगे पीछे घूमने लगा था उसके बताए कामो में रुचि दिखाने लगा था उसमें एक आस जगी थी लेकिन किरण आगे चल उजाला करती उसके पहले ही विराज वापस अपने रंग में वापस आ गया था।
    शुरू में रेखा के साथ भी उसका बर्ताव सही था लेकिन धीरे धीरे उनके कमरे की चीख पुकार बाहर तक पहुंचने लगी थी।
   विराज जैसे अड़ियल बैलों के गुस्से से गरियाते समय रास्ते से हट जाना ही श्रेयस्कर होता है लेकिन रेखा भी कम न थी। विराज एक सुनाता तो वो दो सुनाती और इसी धमकी चमकी में बात इतनी आगे बढ़ जाती की बहुत बार दोनो के बीच मार पीट तक कि नौबत आने लगी थी।
     राजा को रूपा ने फ़ोन कर के बुलवा लिया था हालांकि राजा के पहुंचने तक में रेखा को आकर डॉक्टर देख गया था।
   कुछ ज़रूरी दवाओं के अलावा ऐसी कोई गहरी चोट ना थी जिसके लिए अस्पताल ले जाने की ज़रूरत पड़ती।
  रेखा की नाराजगी इस बात पर अधिक थी कि उसी दिन उसकी गोद भराई की रस्म होनी थी और विराज अपने दोस्तों के साथ एक लंबी यात्रा पर निकलने की तैयारी में था।
   रेखा को विराज का अब भी अपने दोस्तों के साथ मनमाना घूमना रास नही आता था, वो खुद इतनी जल्दी मातृत्व भार वहन करने को तैयार ना थी, लेकिन अपने गैरजिम्मेदाराना स्वभाव के कारण उसका भी डेढ़ दो महीने तक ध्यान ही नही गया और जब पता चला उसने सबसे पहले महल की सबसे मुखर सदस्या को ही गलती से बता दिया।
   वो चाहती थी बच्चा न रखने में रूपा उसकी कुछ मदद कर दे लेक़िन खुद में खोई रूपा ने पूरी बात सुने बिना ही हवा की गति से महल को रेखा की खुशखबरी से परिचित करवा दिया, और एक तरह से रेखा इस सबमें फंस कर रह गयी।
       विराज भी रेखा के पक्ष में था लेकिन जब बात दोनों के हाथ से निकल गयी तो विराज तो अपने रास रंग दोस्तों महफिलों में डूबता चला गया और रेखा मन मसोस कर रह गयी।
    धीरे धीरे बढ़ता वजन, अपनी बेडौल होती आकृति उसे मन ही मन एक चिढ़ गुस्से से भरने लगी उस पर पति का साथ ना मिलना उसे अंदर तक सुलगा कर रख देता लेक़िन उसके आस पास कोई न था जिनसे वो सहानुभूति की आस रख सकती थी।
    महल की औरतों के अनुसार रेखा के लिए ये गर्व का क्षण होना चाहिए था कि वो माँ बनने जा रही थी। उसकी सखियां सहेलियां वैसे भी बहुत अधिक नही थीं और ना ही ऐसी भरोसेमंद थी कि वो अपनी पीड़ा उनसे बांट सकती , आखिर अपनी बेवजह की परेशानियों से तंग आकर उसने एक दिन उसे मेसेज कर ही दिया।
   उसके बाद छिटपुट ही सही लेकिन रोहित से रेखा की बातचीत वापस शुरू हो गयी।
   रेखा के दस मेसेज के जवाब पर रोहित एक मैसेज भेजता लेकिन उसके एक मैसेज से ही रेखा के चेहरे पर मुस्कान चली आती।
    रेखा बार बार उससे अपने किये की माफी मांगती, उसे इस बात का यकीन दिलाने की कोशिश में लगी रहती कि उसने रोहित से शादी से इनकार कर बहुत बड़ी गलती कर दी लेकिन रोहित अब इन बातों पर कोई खास तवज्जो नही देता।
   वो उसे एक सामान्य दोस्त से अधिक कुछ नही मानता।
   धीरे-धीरे रेखा ने अपने ऊपर होने वाले अत्यचारों को भी उसे बताना शुरू कर दिया हालांकि इस सब के बाद भी रोहित के संदेशों में कोई परिवर्तन नही हुआ लेकिन उसके मन में ज़रूर इस बात ने हलचल मचानी शुरू कर दी..


********


      और दिनों की तरह ही बाँसुरी लीना शेखर और रिदान बैठे लिख पढ़ रहे थे।
  शेखर और लोगों से ज़रा ज्यादा तेज था। उसे क्लास में सर की एक बार पढ़ाई बात तुरंत याद हो जाया करती थी, और उसके बाद जब वो दुबारा उस चीज़ में डूबा उसे पढ़ रहा होता तब उसके पास कोई ढोल भी बजा दे उसे कोई फर्क नही पड़ता था।
   तीसरी बार में तो वो क्लास और किताब के उस पढ़े हिस्से को हूबहू सुना दिया करता था।
    अपनी इसी आदत के कारण वो बाकी लोगों से जल्दी सब कुछ कर लिया करता था। अपना काम पूरा करने के बाद वो अक्सर लीना के नोट्स लिख दिया करता था….
        आज भी अपना काम निपटा कर वो लीना के नोट्स लिखने में लगा हुआ था कि कहीं पर अटकने पर उसने वहीं रखी बाँसुरी की नोटबुक उठा कर खोल ली….

  “अरे गज़ब ! ये इत्ती सुंदर हैंडराइटिंग किसकी है भई?”

   ” मेरी है शेखर जी!”

   ” बहुत सुंदर ! बिल्कुल आपकी तरह!”

   शेखर के मुहँ से अनजाने ही निकल गया और लीना रिदान दोनों अपनी भौंह चढ़ाये उसे घूरने लगे

  ” अरे मेरा कहने का मतलब है जैसे ये अपना हर काम सलीके से करती हैं ना वैसे ही इनकी राइटिंग भी है।”

  ” हम समझ गए हैं गब्बर! तू सफाई क्यों दे रहा है।”

  बाँसुरी का मोबाइल बजने लगा , वो बात करती हुई वहाँ से ज़रा आगे निकल गयी

   ” अबे जैकलीना तू दिमाग ज्यादा मत लगा !”

  ” दिमाग है तभी तो लगा रही हूँ। और सुन ले तेरे लिए वो बसंती ही रह जाएगी , याद रख लियो मेरी बात।”

  ” क्यों ?ऐसा क्यों?”

” क्योंकि किसी जन्म में भी शोले बन जाये गब्बर को बसंती मिलने से रही। वैसे भी वो मेरी उम्र की लड़कियों से कुछ अलग है, खुद में खोई रहती है। जब देखो तब कुछ सोचती रहती है और अचानक कुछ पूछ लो तो घबरा जाती है। मुझे तो पक्का यकीन है लड़की सौ प्रतिशत प्यार में है।”

  ” हम्म! जे बात ! लेकिन तसनीमा ये भी तो हो सकता है बंदी ज़रा सीरियस किस्म की हो। हर कोई तेरे जैसी बड़बोली हो ज़रूरी तो नही।”

” पकड़ा गया बेटा! मतलब तू सीरियस है उसके बारे में।”

   लीना की बात पर रिदान ज़ोर से हँसने लगा

  ” ये लफ़ंडर आज तक किसी के लिए सीरियस हुआ है। पिछली बार एक स्कूल टीचर से इश्क हो गया था इसे। मेरे भैया की बेटी को स्कूल से लाने गए थे साहब एक दिन और बस अपना दिल नर्सरी स्कूल की टीचर के पास छोड़ आये। उसके बाद तो भैया के मना करने पर भी जिया को स्कूल से लाने का बिना वेतन का काम अपने सर ले लिया था इसने । इसके चक्कर में मैं भी फंस गया।”

  ” फिर क्या हुआ?” लीना ने हंस के शेखर की तरफ देखा

   ” फिर क्या एक हफ्ते की जद्दोजहद के बाद मैडम ने स्माइल दे दी। उसी शाम मॉल में हम दोनों फटीचर बने घूम रहे थे तो मैडम जी टकरा गई हमसे । उनकी खूंखार लाल लिपस्टिक देख शेखर बाबू ऐसा डरे की अब भैया फोन कर कर के परेशान हैं लेकिन ये अब उस किंडरगार्टन की तरफ देखना भी नही चाहते।”

  रिदान की बात खत्म होने से पहले ही लीना हँसने लगी…

” ये बुद्धू बस लिपस्टिक से डर गया।
    मुझे भी इसके ऐसे कई फ़िज़ूल किस्से पता हैं। एक बार तो साहब मेरे साथ ही किताबें खरीदने गए थे, वहाँ पास बैठी लड़की को भरपूर लाइन मारते रहे, वो भी पहले पहल तो एन्जॉय करती रही बाद में जाने लगी तो अपना कार्ड थमा गयी। पता है कौन थी वहां की ए सी पी।
  कार्ड देख के इस अफ़लातून का मुहँ खुला का खुला रह गया और मेरा तो जो हँस हँस के बुरा हाल हुआ क्या बताऊँ? ”

   ” जलते बहुत हो यार तुम दोनों मेरी पर्सनालिटी से। ये दोनों जो किस्से तुमने सुनाए उसमें मैं नही ये लड़कियां ही फिदा थी मुझ पर समझे। अब कहाँ जाकर अपना हुस्न छुपाऊँ ? भगवान ने इतना हैंडसम जो पैदा कर दिया उस पर अनाप शनाप दिमाग और दे दिया , सोने पर सुहागा वाली बात है और तुम कम अक्ल लोग बात बात पे जलते फिरते हो हुँह।”

  ” यारों ऐसा नही लग रहा बहुत ज्यादा पढ़ाई हो गयी, मैं तो सोच रही आज रात हॉरर मूवी देखूंगी,मज़ा आ जायेगा!

   ” आईना देख लेना वैसे ही डर जायेगी। ” लीना की बात काट कर शेखर फिर हँसने लगा तभी हड़बड़ाती हुई बाँसुरी चली आयी…

” गाइज़ मेरे रूम पर कुछ लोग आए हैं। मुझे अभी जाना पडेगा।”

” कौन आया है?” बाँसुरी की बात पूरी होने से पहले ही शेखर बोल पड़ा

” बस फोन आया था कि आप जल्दी घर आ जाइये , आपके घर के बाहर इंतेज़ार कर रहें हैं..

  ” ओके! लीना तू भी साथ चली जा! पता नही कौन लोग हैं? किसलिए आये हैं?”

  ” क्या बात है चम्पक! आज मेरा नाम सही ले लिया तूने। और मैं क्या कोई चंद्रमुखी चौटाला हूँ जो मुझे देख कर वो लोग डर जाएंगे, तुम लोग भी चलो साथ में
  पता नही कौन हैं आखिर?”

   वो तीनो बाँसुरी के साथ उसके फ्लैट पर पहुंच गए। सामने एक वैन में कुछ सामान पड़ा था और दो लोग घर के बाहर खड़े बांसुरी का इंतज़ार कर रहे थे

” जी कहिये मैं ही बाँसुरी हूँ!

  “मैडम ये ऑनलाइन ऑर्डर किया गया था आपके लिए , वही सामान डिलीवर करने आये हैं।”

  ” क्या है ये सब?”

” मैंम ए सी है , फ्रीज़ है और माइक्रोवेव है , एक और भी चीज़ है मैंम कॉफी बनाने की मशीन भी है।”

   कॉफी बनाने की मशीन सुन कर एक पल को बाँसुरी का दिल धक से रह गया। कहीं राजा ने तो ये सारा सामान नही भेजा

” किसने भेजा है ये सब? कहते हुए उसके हाथ का पर्चा बाँसुरी ने छीन लिया।

  भेजने वाले के नाम पर अपने पिता का नाम देख वो अचरज में पड़ गयी।

  ”  नही मुझे इस सारे सामान की ज़रूरत नही है, आप वापस ले जाइए।

” लेकिन सब का रुपया पेड है मैंम। हम वापस नही ले जा सकते।”

” हद है, मुझे चाहिए ही नही ये सब! ”

  बांसुरी ने अपने पापा को फ़ोन लगाया उनका फोन बंद आ रहा था, आखिर परेशान हो कर बाँसुरी ने उन लोगों को सारा सामान कमरे में पहुंचाने कह दिया और खुद एक तरफ को खड़ी हो गयी।
   वो लोग सामान कमरे में एक तरफ रख जाने लगे तब वो पर्स खोले उन्हें रुपये देने लगी

  ” हमारा गाड़ी भाड़ा भी पहले ही दिया जा चुका है मैडम ! ” बिना रुपये लिए ही वो लोग निकल गए

  ” अच्छा!”  बाँसुरी ने उनके जाते ही लीना की तरफ देखा उसका इशारा कुछ और समझ लीना ने शेखर और रिदान को सामान सही ढंग से व्यवस्थित कर जमाने के लिए कमरे में बुला लिया। एकाएक बाँसुरी मना नही कर पाई और सब को लिए कमरे में चली आयी।

    कमरे में बिछा मोटा कश्मीरी कालीन, एक ओर पडा महंगा काउच उसके सामने की दीवार पर लगी टीवी के साथ ही खुले दरवाज़े से भीतर बेडरूम में दिखता पलंग देख शेखर रिदान सभी सकते में थे। इस सारे करेले पर नीम और चढ़ गया फ्रिज और ए सी से।
  शेखर और रिदान ने फ्रीज़ को खींच खांच कर रसोई तक पहुंचाया और ए सी को एक किनारे कर दिया।

   बाँसुरी अपनी बड़बड़ाहट में गुम थी” पापा को भी एक महीने बाद ये सब भेजने की क्या सूझी”

   इधर उसके रात भर खिड़की पर खड़े रहने से राजा को ये अंदेशा हो गया था कि दिल्ली की गर्मी की वजह से बाँसुरी सो नही पा रही और खिड़की पर खड़ी है। बस इसलिए अपने ससुर जी के नाम का बिल फाड़ कर उसने सारा सामान उसे भिजवा दिया साथ ही इस बारे में सब कुछ अपने ससुर जी को बता भी दिया जिससे बाँसुरी का फ़ोन आने पर वो संभाल ले।

    बाँसुरी उन सब को बैठा कर चाय बनाने अंदर चली गयी…

  “मरजीना तेरी फ्रेंड तो यार प्रिंसेस निकली ! एक इतनी रईस लड़की ऐसी दुखी सी क्यों रहती है यार? “

  लीना ने शेखर को घूर कर देखा वो उसे चिढ़ाते हुए गाना गाने लगा…

      दूर रहती है तू, मेरे पास आती नहीं
      होठों पे तेरे, कभी प्यास आती नही
ऐसा लगे, जैसे के तू, हँस के ज़हर कोई पीये जाए
        ये शाम मस्तानी मदहोश किये जाए
      मुझे डोर कोई खींचे, तेरी ओर लिए जाए…


    बाँसुरी चाय के साथ कुकीज़ भी ले आयी…
शेखर को बस चाय उठाते देख लीना ने उसे टोक दिया

” कुकीज़ क्यों नही ले रहा? खा ले ये बटर कुकीज़ हैं कुत्तों को घी भले न पचे बटर पच जाता है।”

  ” नामुराद नामाकूल हसीना! आज मैं कुछ नही खाता तुझे याद नही क्या आज मंडे है और आज हम महाकाल का व्रत करते हैं।”

  ” अरे सॉरी सॉरी भूल गयी थी। तू अच्छी लड़की मिल जाये इसलिए सोलह सोमवार का व्रत कर रहा है ना।”

  ” हाँ बिल्कुल! भई लड़की भी तो ऐसी होनी चाहिए जो मुझे डिज़र्व कर सके।”

  शेखर की बात पर चौथी कुकीज़ चट करते रिदान ने अपना दिमाग घुसा दिया

   ” तो भाई व्रत तो फिर लड़की को करने दे ना। तू क्यों कर रहा।” रिदान की बात पूरी होते ही लीना झपक पड़ी

   ” बांसुरी तुम भी कोरी चाय पी रही हो। तुमने क्यों नही ली बिस्किट्स? “

  “मेरा भी सोमवार का व्रत होता है ना! ” बाँसुरी की बात पूरी होते ही रिदान खांसते हुए शेखर की तरफ देखने लगा

  “वैसे शेखर जी अगर आप रात में खाना खा लेते हैं तो मैं बनाने ही जा रहीं हूँ आपके लिए भी दो पराठे बना देती हूँ।”

लीना और रिदान एक साथ शेखर को देखने लगे, शेखर ज़रा झेंप गया उसे  एकदम से क्या बोलूं ये सुझा ही नही की तभी बाँसुरी ने ही आगे बात बढ़ा दी

  ” अरे बल्कि लीना तुम तीनो यहीं खा लो, अगर किसी को प्रॉब्लम ना हो तो?

  ” ओके ! ” कहती लीना उठ कर बाँसुरी के साथ उसकी मदद करवाने चली गयी। तब तक पढ़े पॉइंट्स को दोहराते शेखर और और रिदान उन दोनों का भी रिवीजन करवाते रहे।

   जितनी देर में बांसुरी और लीना ने आलू के पराठे बनाये उतनी देर में शेखर ने उन लोगों का एक पूरा टॉपिक रिवाइज करवा दिया।
   अलग अलग प्लेट्स में बाँसुरी को परोसते देखा शेखर ने उसे टोक दिया

  ” अरे इतने बर्तन क्यों खराब कर रही हो। हम एक ही प्लेट से खा लेते हैं , बर्तन धोने में भी तो वक्त खराब होगा?”

  ”  बर्तन वाली आती है मेरे यहाँ। आप परेशान न हो आराम से खा लीजिये।”

   ” ऐश हैं भई । बाँसुरी जी बुरा मत मानियेगा लेकिन एक बात कहना चाहता था, इतनी लक्ज़री में पढ़ाई में मन कैसे लगता है आपका? मेरा मतलब टीवी रखा है आपने तब तो समय समय पर आने वाले ” मैं बिंदी तेरे माथे की” टाइप्स सीरियल आपको अपनी तरफ खींचते ही होंगे। बाकी की कसर वीकेंड पर आने वाले रियल्टी शो जो कि दुनिया के सबसे ज्यादा अनरियल होते हैं वो पूरी कर देते होंगे।
   बाकी बचे समय में कोल्ड्रिंक पी कर ए सी की हवा में सोने का लुत्फ उठाती होंगी तब पढ़ती कब हैं आप?”

   शेखर की बात सुन बाँसुरी मुस्कुराने लगी

  ” यही तो तपस्या है शेखर जी! जब आपके पास हर चीज़ है फिर भी आपका मन किसी चीज़ में नही लगता और तब आपका मन ऐसी चीज़ में लग जाये जो आपको दुनिया से काट सके तभी आप मन से उस काम से जुड़ पाते हैं! ”
  

  ” जाने दे बाँसुरी ऐसी दिमाग वाली बातें इस घनचक्कर के पल्ले नही पड़ती, तू आ बैठ खाना खा ले।”
   
    बाँसुरी की बात सुनता शेखर खिड़की से बाहर देखता कुछ देर को कुछ सोचने लगा

   ” बात तो सही कही है आपने।अगर किसी के पास लक्ज़री है ही नही तो वो मन मार के पढ़ेगा लेकिन उस सारी लक्ज़री के बीच अपने मन को साध कर रखना बड़ी बात है। आप ये एक्ज़ाम ज़रूर क्रैक करेंगी मुझे पूरा यकीन है।”

    बाँसुरी मुस्कुरा उठी

  ” और मुझे आप पर यकीन है कि आप ज़रूर क्रैक करेंगे।”

  ” अरे मैं तो टॉप करूँगा।” शरमा कर शेखर नीचे देखने लगा

  ” अबे ओये खुद अपने मुहँ मियां मिट्ठू बन ले तू। बेटा टॉप टेन से बाहर रहा न तो बेल्ट ही बेल्ट पड़ेगी हरि सर से तुझे। चलो अब घर चलें , रात यहीं गुज़ारने का इरादा है क्या?”

  लीना की बात पर सभी अपना सामान समेटने लगे

  ” सबरीना तू भी यहीं क्यों नही शिफ्ट हो जाती? तेरे वो मछली बाजार से ये जगह बेटर नही है पढ़ाई के लिए।”

   चाहती तो लीना भी यही थी लेकिन आज तक उसकी बाँसुरी से कहने की हिम्मत ही नही हुई थी, शेखर की बात पर उसने बाँसुरी को देखा, बाँसुरी ने झट मुस्कुरा कर हाँ कह दी

  ” मैं तो खुद कब से यही कहना चाहती थी पर मुझे लगा तुम अपनी सहेलियों के साथ रहना चाहती हो इसी से मैंने पूछा नही।”

  लीना की रज़ामन्दी मिलते ही फिर उस रात बाँसुरी ने लीना को अपने साथ ही रोक लिया।

    रात दोनो बैठ कर पढ़ती रही उसी बीच बांसुरी के पिता का फोन आया और उन्होंने गर्मी से उसे बचाने ही इतना सामान भेजा ये कैफियत अपनी बेटी को दे डाली। हालांकि उनका ये शाही व्यवहार कहीं ना कहीं बाँसुरी को शंकित भी किये जा रहा था लेकिन अपने पिता से खुल कर कुछ पूछने का साहस भी उसमें नही था।

  ********

   अपने सास ससुर के आने से अदिति ने दो दिन की छुट्टी ले रखी थी।
    भास्कर के साथ ही उसने भी सिंगापुर का ऑफिस जॉइन कर लिया था। दोनों ने अपनी गृहस्थी सजाने के बाद अपने घर वालों को भी बुला लिया था। पहली बार में भास्कर के घर वाले आये हुए थे।
   उनके आने के पहले ही भास्कर अदिति को माँ के साथ कैसे रहना है क्या पहनना है क्या नही करना है कि लंबी चौड़ी लिस्ट थमा चुका था।
   अदिति उसके इस तरह के ड्रामे से ज़रा परेशान भी थी लेकिन उसने आखिर उपाय निकाल ही लिया।
    दो दिन से घर पर रहती अदिति अपने सास ससुर की सेवा में जी जान से जुटी थी। पहला दिन तो घर देखने खाने पीने में निकल गया। अगले दिन भास्कर के ऑफिस निकलते ही ससुर जी को नाश्ता करवा कर अदिति सासु माँ को साथ लिए मॉल निकल गयी।
   शाम में भास्कर घर आया तो सास बहू को देख आश्चर्य में डूब गया।
    अदिति तो अपने हमेशा के परिधान जीन्स में थी जो फिलहाल दो दिन से सासु माँ के आने से उसने छोड़ रखा था पर साथ ही उसकी माँ ने भी ढीला ढाला सा लोवर और टी शर्ट पहना हुआ था।

” ये क्या माँ? ये क्या पहन रखा है तुमने?”

  ” क्यों ? क्या बुराई है इन कपड़ों में?”

  ” नही बुराई नही लेकिन कभी देखा नही ना इसलिए थोड़ा अजीब लग रहा है।”

  ” तो अब आदत डाल लें देखने की। भई जैसा देस वैसा भेस। अदिति आज ले गयी मॉल और दिलवा दिया ये सब। पहले पहल हमें भी लगा कैसे पहने लेकिन आरामदायक कपड़े हैं और कहीं से कुछ दिखने का या पिन लगाने का झंझट भी नही तो हमे तो हमारा ये नया परिधान बड़ा पसंद आ गया। ज़रूरी है क्या हम ही बहु को अपने हिसाब से चलाए? उसके हिसाब से हम भी तो ढल सकते हैं और जो बदलाव किसी को नुकसान ना पहुंचाए उस बदलाव में ढलने में कोई बुराई नही है।

  हंसते हुए भास्कर आगे बढ़ अपनी माँ के गले में झूल गया ” लव यू अम्मा! बाऊजी ने टोका नही”

  ” नही!!  तुम्हारे बाऊजी तुमसे ज्यादा मॉडर्न है समझे।”

   अदिति तब तक रसोई से भगोने हाथ में लिए बाहर चली आयी। भास्कर को फ्रेश होने जाने का इशारा कर वो खाना परोसने में लग गयी और उसे देख मुस्कराता भास्कर ऊपर अपने कमरे में चला गया।

  ********

    युवराज और रूपा ने समर के माता पिता को भी समर और केसर के रिश्ते की बात के लिए मना लिया था।
   समर के पिता को कुछ खास ऐतराज़ नही था और उसकी माँ को कुछ खास प्रसन्नता ना थी, उन्हें अपना लड़का हज़ारों नहीं बल्कि करोड़ों में एक लगता था, उसकी शादी ऐसे उसके खुद के किसी लड़की को पसंद करने से हो जाये ये बात उन्हें पसंद नही आ रही थी लेकिन युवराज की बात काटना भी उनके लिए नामुमकिन था।
     समर का कमरा वैसे भी राजा के कमरे के पास पड़ता था जिसके कारण उसका फिलहाल अपने माता पिता से मिलना भी कम हो पा रहा था।
     महल के दीवानखाने में रेखा की गोदभराई की रस्म की तैयारियां की जा रहीं थी। पहले इस रस्म को माँ साहेब के आने के बाद ही किया जाना था लेकिन वहाँ महाराज की तबियत में सुधार ना आता देख माँ साहेब का वापस आना टल गया था और उन्हीं के कहने पर रस्म करने का दायित्व रूपा पर आ गया था।
   रूपा काकी साहेब बुआ सा और जया के साथ तैयारियों में लगी थी।
   महल की औरतें रेखा को सजा संवार कर वहाँ महल के भीतर बने बड़े से हॉल में ले आयीं।  गोद भराई की रस्म में औरतों का ही काम था इसी से वहाँ महल के पुरुष मौजूद नही थे, एक विराज की दरकार ज़रूर थी लेकिन वो भी अपनी आदत से मजबूर कहीं भटक रहा था। उसे पकड़ कर लाने की ज़िम्मेदारी प्रेम पर थी।
प्रेम जा रहा था कि समर भी उसके साथ हो गया। समर ने कुछ दिनों पहले ही प्रेम को केसर के घर और उसके ऑफिस के आसपास की जानकारी इकट्ठा करने भी भेजा था..  उस बारे में भी दोनो की बातचीत चल रही थी।

   विराट अपने किसी काम से कुछ दिनों के लिए बाहर गया हुआ था, उसकी भी वापसी होनी थी।
   प्रेम और समर अपना काम निपटाते विराट को साथ लिए विराज को भी उठा लाये….

   विराज को दीवानखाने तक छोड़ने आये समर प्रेम विराट को भी रूपा ने अंदर बुला लिया।
रस्में वैसे भी पूरी हो चुकी थी, अब खाना पीना ही शुरू होना था। ऐसे में रूपा सामने चली आयी…

” अब जैसा कि आप सभी जानते हैं हमारे महल की अगली होने वाली शादी है समर सा की और वो भी केसर बाई सा से। तो आज इस खुशी के मौके पर समर सा भी अपनी होने वाली दुल्हन के साथ ज़रा ठुमके लगा दे तो रंग ही जम जाएगा।”

   केसर को वैसे भी इस तामझाम में कोई मज़ा नही आ रहा था, वो कुछ देर पहले ही वहाँ आयी थी और रूपा ने उसे उसके होने वाले सास ससुर को धोक दिलाने के बाद उन्हीं के पास बैठा दिया था।
    केसर के ऑफ शोल्डर ब्लाउज़ पर तीखी निगाह डालती समर की माँ अब समर को घूर रही थी।
   समर की नज़र एकदम से केसर पर नही पड़ी और वो मुस्कुरा कर अपनी माँ के पास चला आया। उसी वक्त रूपा की उद्घोषणा हुई और विराट भी समर के साथ केसर तक चला आया…

” बधाई हो केसर बाई सा! वैसे आप तो शुरू से हमें हमारे महल के लिए पसंद थी। पहले जब हम छोटे थे तब लगता था आप की शादी हुकुम से होनी चाहिए लेकिन उन्होंने बाँसुरी बाई सा को पसंद कर लिया। पर मानने लायक बात है कि आपकी हमसे दोस्ती नही टूटी।
   समर भाई सा भी किसी एंगल से आपसे कम नही हैं।”

   केसर मुस्कुरा कर रह गयी

  ” हमसे ज्यादा ही हैं आपके समर भाई सा।”

विराट मन का साफ था , उससे दोस्ती केसर ने किसलिए बनाये रखी थी और कैसे वो उससे महल के अंदर की बातें निकलवा लिया करती थी उसका ध्यान आज तक इन बातों पर नही गया था। लेकिन समर का ध्यान तुरंत इस बात पर चला गया कि विराट से केसर की बातचीत हुआ करती थी।

  ” आपका काम कैसा रहा विराट? ”

” जी भाई सा ! बहुत अच्छा रहा , हमारी फोटोज़ में भी हमें केसर सा से बहुत मदद…


” अरे बस बस अब कितनी तारीफ करेंगे हमारी विराट! आप ने कुछ ज्यादा ही चने के झाड़ पर चढ़ा दिया है हमें …
   केसर की बात बीच में ही काटता समर उसकी तरफ ज़रा झुक कर उसके पास सरक आया

  ” कोई बात नही, उस झाड़ से तुम्हें नीचे धक्का देने के लिए मैं हूँ ना!”

   केसर उसे देख कुछ कह पाती इसके पहले ही समर वापस उसकी ओर मुड़ गया

  ” वैसे बहुत ज्यादा पहुंच है आपकी महल के अंदर!अभी तो जाने क्या क्या पता चलने वाला है मुझे! आपके सारे राज़ खोद खोद के बाहर निकालूंगा और फिर उस गड्ढे में आपको धक्का देकर ऊपर से मिट्टी डाल दूंगा।”

  ” हमसे इतनी नफरत मत कीजिये समर सा क्योंकि नफरत की इंतिहा मुहब्बत होती है। कहीं आपको हमसे मुहब्बत ना हो जाये , जबकि आप खुद जानते हैं हमारी मुहब्बत कोई और है!”

     केसर की नज़रें राजा पर जा कर अटक गयी

   ” पहली बात तो ये नाज़ो अंदाज से भरी लड़कियों वाली बातें आप मुझ से न किया कीजिये क्योंकि आपका ये ज़बरदस्ती का ओढ़ा हुआ लड़कीपन मुझे और गुस्सा दिला देता है दूसरी बात ये कोई फ़िल्म नही है कि हीरो को नफरत के बाद वैम्प से मुहब्बत हो जाये। और तीसरी बात आप जिन्हें  आंखों ही आंखों में पीती बैठी हैं मैं अच्छे से जानता हूँ आपकी मुहब्बत वो नही उनकी राजगद्दी है जो आपको कभी हासिल नही होने वाली। मर जाऊंगा लेक़िन उस तक आपको पहुंचने नही दूंगा या यों कह लीजिए कि मेरे जिंदा रहने तक आप वहाँ नही पहुंच सकती।”

  केसर ने घूर कर समर को देखा

  ” तो मर जाओ! मुझे कौन सा फर्क पड़ेगा?”

  ” किस बात पर हमारी नवेली जोड़ी एक दूसरे में सर घुसाए बैठी है?”  रूपा मिठाई की प्लेट संभाले उन दोनों तक चली आयी और एक लड्डू उठा कर समर को आधा खिला कर केसर के सामने कर दिया

  “सॉरी भाभी सा हम मीठा नही खाते।”

  समर ने रूपा के हाथ से लड्डू लेकर पूरा का पूरा केसर के मुहँ में ठूंस दिया

  ” मीठा खाया कीजिये शायद इसी से आपकी ज़बान मीठी हो जाये।”

   केसर ने एक बार फिर समर को घूर कर देखा

  ” बहुत शौक हो रहा है अपना जूठा खिलाने का।”

  ” आपको बहुत शौक हो रहा था आधी रात में मेरे कमरे में आने का, अब भुगतिये।

   समर वहाँ से उठ कर जाने लगा तो कुछ दूर बैठी उसकी माँ ने उसका हाथ पकड़ उसे रोक लिया और कुछ बात करने लगी। केसर की नज़र माँ बेटे पर ही थी उसे समझ आ गया था कि बेटे के साथ साथ माँ को भी वो फूटी आंख नही सुहा रही थी।
   विराट अपनी प्लेट थामे उस तक चला आया और अपने मोबाइल पर उसे अपने काम से सम्बंधित तस्वीरें दिखाने लगा। केसर की भी समर की जहर बुझी बातों से जला दिल विराट की मीठी बातों की फुहार से सिक्त होने लगा।

   ******

  क्रमशः


  aparna…




 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s