जीवनसाथी-77



जीवनसाथी — 77

   
      रात और दिन अपनी गति से ही चलते हैं, हर दिन के बाद रात होती है तो रात के बाद सुबह भी।
   प्रेम की चिरप्रतीक्षित रात भी बीत गयी, और एक सुहानी उजली सुबह प्रेम और निरमा के जीवन में प्यार का एक अनोखा रंग भर गई।
      दोनो के समर्पण की रात, अपने रिश्ते को अटूट बंधन में बांधने की रात, एक प्यार भरे सपने के साकार होने की रात आखिर एक अलसायी सी सुबह में बदल कर छोड़ गई अपने पीछे ढेर सारे स्नेह सुमन।
        जितनी ही सुंदर रात थी उतनी ही सुंदर सुबह खिली। खिड़की से पड़ने वाली किरणों से प्रेम की आंखें मुस्कुरा उठी, उसने आंखे खोली सामने निरमा थी उसकी बाहों में और दरवाज़े के बाहर मामी दरवाज़े पर खड़ी निरमा को आवाज़ दे रहीं थीं।
   मम्मी पापा भले सोते रह जाएं पर मीठी तो अपने समय में जाग ही गयी थी।
    झटके से बिस्तर से कूद कर प्रेम ने दरवाज़ा खोला और मीठी को गोद में लिए भीतर चला आया, मामी मुस्कुरा कर नीचे चाय बनाने चली गईं।
    अपने पापा की पहचानी सी गोद मे आते ही मीठी किलकारी मारती खेलने लगी,और उसे गोद में संभाले प्रेम बाहर छत पर चला आया कि निरमा कुछ देर और सो सके।
     निरमा ने मुस्कुरा कर करवट ली और उठ कर नहाने चली गयी।

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    प्रीलिम्स होकर लगभग दो महीने बीत चुके थे, रिजल्ट्स आ चुके थे और हरी सर की क्लास में बहार आयी हुई थी….

  ” बच्चों मेरे प्यारे बच्चों…
    सर की बात आधे में ही काटता कोई बालक पीछे से एक फुलझड़ी छोड़ गया

  ” इनमें से कुछ एक आपसे सिर्फ दो तीन साल ही छोटे होंगे सर जी”

  ” अब भई पढ़ाता हूं तो इस लिहाज़ से तुम्हारा गुरु हुआ और इस अंदाज से तुम मेरे बच्चे हुए। हाँ तो बच्चों जैसा कि आप सभी देख चुके हैं प्रीलिम्स का शानदार रिज़ल्ट हमारे सामने है।
   मेरे राइडर्स इस बार भी बाज़ी मार गए हैं। इस बार लगभग दस ग्यारह लाख विद्यार्थियों ने प्रीलिम्स दिया था और उनमें से लगभग दस ग्यारह हजार सेलेक्ट हुए हैं और उनमें हमारे इंस्टिट्यूट से लगभग डेढ़ दो हज़ार बच्चे चयनित हुए हैं। ऐसा लग रहा है खुशी से मर जाऊँ, लेकिन जियूँगा क्योंकि अभी तुम लोगों को कलेक्टर कमिश्नर बनाने के बाद तुम्हारे बच्चों और उनके बच्चों को भी मुझे पढ़ाना है।
   आप सभी की तैयारी चल रही है, जैसा कि अनुमान है दीवाली के अगले हफ्ते तक मेंस हो जाएगा और बस उसके डेढ़ से दो महीने में रिज़ल्ट के बाद आने वाले तीन महीनों में इंटरव्यू शिड्यूल हो जाएंगे।
    सिलेबस तो हमारा लगभग पूरा हो चुका है, ऐसे राइटिंग पर सभी थोड़ा और फोकस करें। कल से पॉलिटी की क्लास शुरू हो जाएगी।
   आप लोग अपने चयन किये विषयों की क्लास का शेड्यूल बाहर लगे साइनबोर्ड पर देख लीजियेगा।
    शेखर क्लास में जिस बंदे को कुछ कमी लगे उसकी मदद कर देना और ऑफिस में आकर मटीरियल ले जाओ, सबके लिए सेट तैयार करवा दिए है मैंने।”

   सबको और भी ज़रूरी बातें बता कर हरी सर वहाँ से निकल गए।
   
   रिजल्ट्स के बाद पढ़ने वालों की संख्या कम हो गयी थी। अब तक तो सभी तैयारी में जुटे थे लेकिन अब सिर्फ जिनका चयन हुआ था वही वहाँ बचे थे।
   क्लास के बाद बाँसुरी लीना के साथ बाहर चली आयी, दोनो बरगद की छांव में बैठे कुछ नोट्स तैयार कर रहे थे कि कूदते फांदते शेखर भी चला आया…

” ले नाज़नीना तेरे नोट्स! बधाई हो पहला पड़ाव तूने भी अटक पटक के ही सहीं पार कर ही लिया।”

   लीना ने एक नज़र उसे देखा और वापस वो अपनी कॉपी में झुक गयी

  ” तेरा एहसान है जो तूने दिमाग कम खाया , अगर तेरी वजह से लुढ़कती ना तो खून कर देती तेरा।”

” बस दूसरों का दिमाग खा खा के ही तो मैंने इतना सारा दिमाग जमा कर लिया है । किलर हूँ ना किलर!

  शेखर ने बाँसुरी के नोट्स उसके सामने रख दिए

  ” आपको भी बधाईयां जी बाँसुरी जी! ”

  ” जी आपको भी ! ” शेखर मुस्कुरा कर अपने बालों  पर हाथ फिराने लगा

  ” ओ टॉम क्रूज स्टाइल मारना बंद कर और ये बता की मेंस में नौ के नौ पेपर एक साथ ही हो जातें हैं ना कुछ गैप नही रहता इनमें।

” हाँ गैप मिलेगा ना तुझे! एक पेपर के बाद आराम कर फिर एक हफ्ते बाद अगला पेपर दे ले। अबे कोई ग्रेजुएशन का एग्जाम हो रहा है क्या जो पूरे तीन महीने में खत्म हो। नौ पेपर नौ दिन बस खल्लास! समझी बुझलीना!”

  ” हम्म ! यार उंगली की तो बैंड बज जाती होगी लिख लिख के।”

  “पूरी निचुड़ जाती है सूख जाती है मर जाती है उँगली। बस हर पेपर के बाद घर आओ और थोड़ी देर गर्म पानी में डूबा कर बैठ जाओ!”

   शेखर की बात सुन रिदान बीच में कूद पड़ा..

“भाई सही है! बिना पेपर दिए इतनी नॉलेज कैसे है तुझे।”

  ” इसे रेकी करना कहते हैं, जिस दिन सिविल सर्विस का ख्वाब आंखों में सजाया ना उसी दिन उसे अपनी मेहबूबा मान लिया, फिर सिर्फ उसके ही घर के चक्कर नही लगाए उसके चाचा ताऊ किसी को नही  छोड़ा। तो बेटा पढ़ाई और सिलेबस के साथ साथ सेलेक्टेड बंदों से भी पूछताछ कर रखी है कि क्या पढना और कैसे पढना है।”

  ” देखा रिदान इसे कहतें है चाक चौबंद तैयारी। और एक हम है बस इसी के कंधे पर लटक लिए हैं कि हमें भी नदिया पार करा दे। ”

  ” भंगर सीमेंट से भी ज्यादा मजबूत कंधे जो हैं इस भंगार के।” रिदान अपना तड़का लगाए हँसने लगा

” शेखर जी ! ” बाँसुरी की खनकती आवाज़ से शेखर जी सुन शेखर का दिल उछल कर मुहँ को आ गया बिना कुछ कहे वो उसकी तरफ देखने लगा

   ” सारे पेपर्स 200 मार्क्स के ही होंगे ना?”

  “जी हाँ , शुरू के दो निबंध के रहेंगे। आज सर ने जो नोट्स दिए हैं वो पूरे हैं। अब हमारे पास सारा मटीरियल मौजूद है अब हमें बस टाईम टेबल के अनुसार पढ़ते जाना है। गाइज़ एक बात और, हो सके तो जवाब लिख लिख कर तैयार करना शुरू करो । मोबाइल पर टाइमर ऑन कर के लिखो तो ज्यादा एक्यूरेसी आएगी।”

  ” जी ! आप अपना टाईम टेबल भी शेयर कर दीजिएगा और मैं भूगोल ले रहीं हूँ तो उसके तो दो पेपर देने होंगे ना?”

  ” अरे वाह! मैंने भी भूगोल ही लिया है वैसे। मैं मेरे नोट्स भी आपको फोटोस्टेट करवा कर दे दूंगा।”

   एक तरफ की भौंह चढ़ाये लीना और रिदान शेखर को ही देख रहे थे

” मैंने हिस्ट्री लिया है। कुछ मदद कर पाएंगे आप ?”

  लीना की भेद भरी दृष्टि को हवा में उड़ाता शेखर हँसने लगा

  ” आप तो निकली भी मोहनजोदड़ो की खुदाई में हैं बीना जी, आप खुद एक हिस्ट्री हैं।”

  ” एक दूंगी ना कान के नीचे तो अभी तेरा इतिहास भूगोल सब सुधर जाएगा”

   लीना की बात पर रिदान ने जवाब दिया

  ” लीना तेरा बॉयफ्रेंड तो यार बड़ा डरता होगा न तुझसे। जाने कब तू ज़बान  के साथ साथ हाथ पैर चलाने लगे।”

  ” ये बॉयफ्रेंड नाम की जाति से दूर ही रहती हूँ मैं।”

  लीना की बात पर फिर शेखर बोल पड़ा

  ” सही करती है। लड़कों को भी जीने खाने का हक है आखिर!
    वैसे भी भविष्य में जो तेरा पति बनेगा उसका तो अल्ला मालिक है।”

” अच्छा ! और जो तेरी बीवी बनेगी उसका क्या?”

  ” वो तो मेरी मालकिन होगी, पलकों पर सजा कर रखूंगा, दिल में बिठा कर रखूंगा। इतने प्यार से रखूंगा की मुझे छोड़ कर मायके भी ना जाना चाहेगी।”

  ” ओहो मजनू की औलाद! पहले ढूंढ तो ले। लड़की भी तो मिलनी चाहिए तुझे।”

” यार वो तो सीट पकते ही मिल जाएगी। शेखर तो अपना शादी डॉट कॉम में बड़े महंगे पैकेज पर बिकेगा । बोली लगेगी भाई की तो।” रिदान की बात पर लीना ज़ोर से हँसने लगी और उसे हंसते देख शेखर गंभीर हो गया

   ” नही यार ! दहेज़ तो कभी नही लूंगा , किसी दम नही। बस लड़की अपनी पसंद की हो।”

  “और अपनी पसंद की नही मिली तो?” लीना के सवाल पर अब तक मुस्कुराता बैठा शेखर गहरी नज़र से बाँसुरी को देखता बोल बैठा

  ” शादी ही नही करूँगा। कभी नही।”

  इन सब की बातों को सुनती बैठी बाँसुरी जैसे वहाँ होकर भी नही थी।
    उसे आज से ठीक एक साल पहले का समय याद आ रहा था , इसी मौसम में तो उसकी राजा से पहली मुलाकात हुई थी।
   वो सोच रही थी,आज उसके रिज़ल्ट से राजा खुश होता या नही। चाहता तो था कि वो पढ़े लेकिंन आज जब वो पढ़ाई का अपना पहला पड़ाव भी पार कर चुकी है तब क्या उसे राजा को फ़ोन कर बता नही देना चाहिये।
   अब तो वो लौट ही सकती है। आगे की पढ़ाई महल से भी तो की जा सकती है।
   पर तभी उसे जैसे कुछ ध्यान सा आ गया, महल की चकाचौंध में महल की ढेर सारी औरतों के बीच क्या वो इसी तन्मयता से पढ़ पाएगी।
   आज शेखर लीना रिदान जैसे पढ़ाकू लोगों की संगत का असर है कि वो सिर्फ एक महीने की तैयारी में प्रीलिम्स निकाल पायी है। क्या महल में आये दिन होने वाले जलसों और उत्सवों को दरकिनार कर वो ऐसी ही लगन से पढ़ पाएगी।
    नही !! कभी नही। वहाँ शाम की चाय पर महल की हर औरत का पीछे वाले बगीचे में पहुंचना ज़रूरी है। महल की सुबह शाम की आरती हो या नाश्ते खाने की मेज़ हर जगह मिलिट्री से कायदे में बंधे महलवासी क्या और कब अपनी मर्ज़ी से कर पातें हैं।

   तो क्या इन्हीं सब कारणों से राजा चाहता था कि वो महल से बाहर रह कर पढ़े। हाँ शायद !
  अब ये तो बाँसुरी के मन ने तय कर लिया था कि महल में रह कर पढना मुश्किल होगा लेकिन बिना राजा के रहना भी तो मुश्किल होता जा रहा था,वो तो अच्छा था जल्दी जल्दी उसे ढेर सारा काम खत्म करना था पढ़ाई का वरना तो वो सिर्फ उसे याद कर कर के ही पागल हो जाती।
   अपने फ़ोन ओर उसका नंबर मिलाती फिर डिलीट करती बैठी बाँसुरी की उंगलियों को बड़े ध्यान से देखते शेखर ने आखिर उससे पूछ ही लिया…

  ” किसी को रिजल्ट्स बताना चाहतीं हैं क्या बाँसुरी जी?”

   बाँसुरी चौन्क कर उसे देखने लगी

” जी वो नही… उसे अचानक समझ ही नही आया कि क्या बोले क्या नही की लीना ने कुछ और समझ लिया

  ” बाँसुरी अभी से फ्रेंडबुक पर अपडेट मत कर देना! यार लोग नज़र बड़ी जल्दी लगा देते हैं।”

” लीना मैं तो हूँ ही नही फ्रेंडबुक पर।” बाँसुरी का जवाब सुन शेखर बिना कुछ सोचे समझे तुरंत बोल पड़ा

  ” हाँ तभी तुम नही मिलीं। मैंने तो बहुत ढूंढा तुम्हें!”

  ” अबे ओये फकीरचंद ! तू पढ़ कब लेता है बे! फ्रेंडबुक भी देखता है, ममी और टाइटेनिक भी देखता है..”

  रिदान के सवाल पर शेखर मुस्कुराने लगा

  ” साले मैं खुद फ्रेंडबुक पर नही हूँ। वो बस एक दिन ऐसे ही तेरे प्रोफ़ाइल में तूने कुछ बुक्स के नाम डाले थे ना तो वही देखते हुए सोचा दीना और बाँसुरी जी का हाल भी ले लिया जाए, अब हमारी दीना जी तो बिना मतलब का बकवास ज्ञान पेलती हुई दिख गयी पर मैडम नही दिखी।”

  ” साले मेरे प्रोफ़ाइल पे तफ़री मार रहा है तू! हैकर कहीं के।”

” अबे तेरा एकाउंट हैक करने लायक कुछ है नही उसमें चिन्दी चोर। चलो अब तुम लोग पढ़ो मैं चला कुछ ज़रूरी काम है मुझे।”

  शेखर उठ कर जाने लगा तो वापस लीना ने उसे टोक दिया

   ”  हर शाम आखिर क्या मांगने जाता है अपने महाकाल से मंदिर में ? ”

  “किसी के चेहरे की खोई हुई मुस्कान चाहिए वापस! बस वही जल्दी से वापस कर दे भोलेनाथ! उसके बाद जीवन में कभी कुछ नही मांगूगा।”

   शेखर दोनो हाथ ऊपर कर हाथ जोड़े वहाँ से निकल गया, मुस्कुरा कर लीना भी समान समेटने लगी

   ” पागल! एकदम झल्ला है ये लड़का।”

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    समय का पहिया धूल उड़ाता अपनी गति से भागता चलता है हर किसी को उसके कदम से ताल मिलानी पड़ती है।
    महाराज की तबियत में बहुत सुधार ना होने से उनका वापस लौटना नही हो पाया।
   इधर केसर के पिता की तबियत भी बनती बिगड़ती चल रही थी। उनकी नासाज़ तबियत देख रानी माँ ने केसर को भी अपने पिता के साथ अपने पास बुला लिया। मन मार के ही सही केसर को भी महल से दूर कुछ समय के लिए जाना पड़ा।
      
     समर को अपने काम के साथ साथ राजमहल के व्यापार के आयव्यय का लेखा जोखा भी देखना होता था ऐसे में केसरके जाने से उसे भी राहत ही थी।
  बाँसुरी के प्रीलिम्स के रिज़ल्ट का पता राजा को भी था, वो इसी बात से सुखी था कि जैसे भी हो आखिर वो बाँसुरी के लिए जो चाहता था वो कर पा रही थी।
    
    केसर के पिता के ट्रीटमेंट सेशन शुरू होने के साथ ही उनके साथ कुछ समय रुकने के बाद केसर लगभग महीने भर बाद वापस लौट रही थी। उसका खुद का सारा काम सारा व्यापार बिखरा पड़ा था, उसके लिए उसके जीवन में सबसे महत्वपूर्ण उसका सारा रुपया ही तो था। अपनी इतनी ढेर सारी मिल्कियत वो ऐसे नही छोड़ सकती थी।

   अपने कुछ काम से समर भी शहर गया हुआ था कि रानी माँ के फ़ोन से उसे केसर की वापसी का पता चला। रानी माँ की बात काटना उसके लिए मुश्किल था इसलिए मन मार कर उसे केसर को लेने एयरपोर्ट जाना ही पड़ा ।
    एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही सामने खड़े समर को देख केसर का भी मूड बिगड़ गया उसे लगा उसे लेने के लिए रानी माँ ने ज़रूर राजा से कहा होगा लेकिन यहाँ राजा नही समर था…

  “अच्छा तो आप आएं हैं हमें लेने? हमें लगा था हमे लेने हुकुम ही आएंगे।”

” हुकुम के पास फालतू कामो के लिए वक्त कहाँ हैं? “

  ” घर के नौकरों तक के लिए वक्त होता है उनके पास, एक हमारे लिए ही नही है।”

  ” कहा ना ! फालतू कामो के लिए वक्त नही है बाकी हर काम के व्यक्ति के लिए उनके दिल में भी बहुत जगह है और घड़ी में ढेर समय।”

  ” आप क्या हमेशा इतना कड़वा बोलते हैं समर सा?”

” नही! ये कुछ आपका असर लगता है, आपको देखते ही अंदर से ऐसी नफरत उबलती है कि ज़बान खुद ब खुद कड़वी हो जाती है क्या करें?”

  ” कुछ मत कीजिये! आप हैं भी नही किसी लायक!”

  ” अब ये आप क्या जानेंगी की मैं किस लायक हूँ और किस लायक नही। खैर आपकी इतनी तेज किस्मत भी नही है। मुझ से शादी वाली बात को बहुत सीरियसली मत ले लीजियेगा।”

   एक तरफ की भौंह चढ़ाये केसर जाकर गाड़ी में सामने ड्राइवर की बगल की सीट पर बैठ गयी, समर ने आकर गाड़ी आगे बढा दी।

  केसर की किसी सहेली का फ़ोन आ गया और वो आराम से तेज़ आवाज़ में उससे बात करने लगी…

  “हाँ बस अभी अभी पहुंचे हैं इंडिया, और आते ही मनहूस शक्लों से सामना हो गया क्या करें, किस्मत ही खराब है। सौ खूंसट मरते हैं तब कहीं जाकर कोई एक ऐसी मिसाल पैदा होती है ना। शक्ल में हमेशा बारह बजे रहतें हों ज़बान पर हमेशा नीम घुली हो बस और क्या चाहिए ….

   अभी केसर और कुछ बोलती की समर ने रेडियो पर गाने चला दिए और खुद भी सुर से सुर मिलाता शुरू हो गया….

           देख लो, हमको करीब से
          आज हम मिले हैं नसीब से
    ये पल फिर कहाँ और ये मंजिल फिर कहाँ
  ग़ज़ब का है दिन सोचो ज़रा, ये दीवानापन देखो ज़रा
  तुम भी अकेले हम भी अकेले…

गाने की तेज आवाज से बात करने में पड़ते व्यवधान से चिढ़ कर उसने फ़ोन बंद कर दिया। उसके फ़ोन बंद करते ही समर ने भी रेडियो पर चल रहे गाने बंद कर दिए

   ” ये क्या बदतमीज़ी है? मैंने फ़ोन रखा तो आपने गाने क्यों बंद कर दिए?”

  “जिससे आप इन गानों को ज्यादा सीरियसली ना ले लें।”

  ” गानों को भी सीरियसली लिया जाता है क्या?”

  ” बिल्कुल तभी तो आपने मुझे सुनने के लिए अपना फ़ोन बंद कर दिया आखिर! जानता हूँ मुझमें वो बात तो है कि लड़कियां खींची चली आती हैं।”

  “ओहहो मिस्टर समर सिंह! गलतफहमी ना ही पालें तो अच्छा होगा। आपकी तरफ मैं तो किसी जन्म नही खिंचने वाली।”

  “मालूम है। मैंने वैसे भी लड़कियां कहा। आप उस परिधि से बाहर है । ”

  केसर ने नाराजगी से मुहँ दूसरी ओर फेर लिया। फिर जाने क्या सोच कर उसने वापस रेडियो ट्यून कर दिया, लेकिन गाने के बोल सुनते ही उसका पारा वापस उबलने लगा..

       अपने पास क्या, अरमां के सिवा
          यूँ तो मैं तुम्हें और क्या दूंगी
        जो भी हैं मेरा, मैं और मेरा प्यार
          तुमपे एक बार, सब लूटा दूंगी
             चाहोगे तो मैं, देखूंगी तुम्हें
         कह दोगे तो फिर, सर झूका लूंगी
             हाय दिलदार क्या हुआ
            दिल का करार क्या हुआ…

   उसने तुरंत रेडियो बंद किया और खिड़की से बाहर देखने लगी। समर को हंसी आने लगी लेकिन अपनी हंसी संभाले वो गाड़ी चुपचाप चलाता रहा।


दीवाली का समय पास आ रहा था,वो खुद राजा से मिलने को आतुर थी, उसके हाथ कुछ तो ऐसा लग गया था जिससे उसे पूरा यकीन था कि इस बार राजा अपनी बाँसुरी को भूल उसके रंग में रंग ही जायेगा।
    कुछ ही देर में समर की गाड़ी महल के मुख्य द्वार से अंदर की तरफ थी।
    महल से भीतर प्रवेश करते ही केसर का सामना रूपा भाभी से ही हुआ, उन्होंने आगे बढ़ उसका स्वागत किया और उसे प्यार से भीतर ले गयी। खाने की मेज पर महल के सभी रहने वाले थे पर जिसे देखने की चाह लिए रास्ते भर वो पुलकित थी वो ही कहीं नही था।


  ********


   दीवाली को लगभग हफ्ता भर बाकी था, अगले दिन प्रताप की पुण्यतिथि थी। सुबह से निरमा का मन उखड़ा उखड़ा सा था, वो समझ नही पा रही थी कि किन शब्दों में प्रेम से अगले दिन घर पर पूजा रखने की बात करे। प्रेम रोज़ की तरह ही सुबह उठ कर बाहर आंगन में मीठी के साथ खेल रहा था, मीठी भी अब लगभग छै सात महीने की हो गयी थी।
    उसके साथ खेलने में व्यस्त प्रेम मीठी के जैसी ही बोली में उससे बात कर कर के खुश हो रहा था, उसके चेहरे की खुशी देख लग ही नही रह था कि उसे प्रताप की पुण्यतिथि याद भी है।
   पसोपेश में फंसी निरमा नहा कर आने के बाद नाश्ता बनाने में लग गयी।
     प्रेम को नाश्ता देकर वो मीठी को मालिश के लिए लेकर धूप में चली गयी।
    कुछ देर बाद ही प्रेम तैयार होकर महल के लिए निकलने लगा, पिछले ही साल दशहरे के एक दिन पहले ही महल ने घर की राजकुमारी को खोया था इसी से इस साल भी दशहरे पर होने वाला जलसा रद्द कर दिया गया था।
   पर दीवाली साल भर का त्योहार था उसे टाला नही जा सकता था। दीवाली पर ही राजमाता और महाराज भी वापस लौटने वाले थे।
    महल में और भी तैयारियां की जा रही थीं। दीवाली के पहले ही राजा का जनदर्शन कार्यक्रम  आज ही होना था, इसी से प्रेम कुछ हड़बड़ी में ही था।
    सुबह से निरमा उसके आगे पीछे घूम रही थी लेकिन अपने मन की बोल नही पा रही थी, एक बार को प्रेम ने पूछा भी ” कुछ कहना चाहती हो?” पर निरमा ने ना में सर हिला दिया।

    मीठी को नहला धुला कर अम्मा के हाथों में देकर निरमा प्रेम को रुमाल और उसका फ़ोन देने बाहर चली आयी।
   गाड़ी बाहर निकालने के बाद प्रेम वापस चला आया, निरमा तक आकर वो ठिठक कर खड़ा रह गया..

” एक बात कहनी थी निरमा!”

  ” हाँ कहिये ना!”

” कल …. वो कुछ देर को शांत हो गया, थोड़ा अटक अटक कर उसने अपनी बात जारी रखी

  ” कल वो….”

   निरमा समझ तो गयी थी कि वो कहना क्या चाहता है लेकिन खुद हो कर क्या बोले यही नही समझ पा रही थी, फिर भी खुद को संभाल कर उसने ही बात आगे बढ़ाई

  ” जी मैं ये चाहती थी कि कल घर पर पूजा रख कर कुछ पंडितों को जिमा लेते। अगर आप कहेंगे तो मैं और अम्मा मिल कर सारी तैयारी कर लेंगे ।”

  प्रेम के मन से जैसे मन भर का पत्थर किसी ने हटा दिया, उसने आंखों ही आंखों में निरमा को आभार व्यक्त किया और बाहर निकल गया

  ” अरे सुनिए तो! ” पीछे से आवाज़ देती निरमा उसके पीछे भागी चली आयी

  ” ये लिस्ट रख लीजिये , सारा सामान ले आईयेगा। भोजन के बाद कुछ दान भी करना चाहिए ना।”

  ” ठीक है ! और कुछ?”

  ” आप उस समय कुछ  कहना चाहते थे?”

  प्रेम मुस्कुरा कर रह गया

  ” मेरे बिना कहे ही सब कुछ समझ जाती हो, क्या कहूँ। तुम तो मुझसे ज्यादा मुझे जानने लगी हो।”

   निरमा के माथे को चूम कर प्रेम बाहर निकल गया। निरमा के भी मन में जमी बर्फ पिघल गयी थी। पिछले तीन चार दिन से प्रताप की बरसी कैसे करेगी , प्रेम से क्या कहेगी सोच सोच कर उसने जो सरदर्द पाल लिया था , आज खुद ब खुद ठीक हो गया था।
    प्रेम के गहरे व्यक्तित्व का परिचय तो वो पहली मुलाकात में ही पा चुकी थी लेकिन अब साथ रहते रहते उसने उसके समंदर से भी गहरे हृदय की थाह भी पा ली थी।
    भगवान ऐसे लोगों को भी रचते हैं अपने संसार में संतुलन बनाये रखने के लिए।
   आज से एक साल पहले उसे ऐसा लग रहा था कि उससे बड़ी दुर्भाग्यशाली लड़की शायद ही कोई होगी और आज जब तीन चार दिनों के बाद उसकी पहली विवाह वर्षगांठ आने वाली है उसे अपनी ही किस्मत पर इठलाने का जी करता है।
   प्रताप को खोकर उसने खुद को पूरी तरह  खो दिया था लेकिन प्रेम ने उसके जीवन को अपनी कस्तूरी से ऐसे महकाया की वो वापस जी उठी।
    प्रेम में जैसे उसने खुद को वापस पा लिया था।

   ” खड़े खड़े काय कर रही बहुरिया? गुड़िया सो गई है, उसे सुलाय आएं हैं, अब जरा का का बनाना है बता दो।”

  ” अम्मा पहले ज़रा कल की तैयारी देख लेते हैं। कल इनके छोटे भाई की….

   आंखों में छलक आई बूँदों को समेटती निरमा अम्मा के साथ रसोई में अगले दिन क्या बनाना है कि तैयारियों में लग गयी।

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     दिवाली की रात भी चली आयी। महल में लक्ष्मी पूजा की तैयारियां चल रहीं थी। सभी अपने अपने कक्ष में पूजन में सम्मिलित होने तैयार हो रहे थे एक वो ही अकेला बैठा बांसुरी की याद में खोया था।

    धनतेरस की रात जब सारा महल बाहर आतिशबाजी में व्यस्त था, वो कुछ देर तक युवराज भैया और जय के बच्चों के साथ बिताने के बाद अपने कमरे में लौट आया था। कमरे में आते ही उसने केसर को वहीं उसका इंतेज़ार करता पाया था। केसर कुछ तस्वीरें सामने फैलाये बैठी थी, तस्वीरें बाँसुरी की थी। वो बाँसुरी की तस्वीरें केसर के पास देख आश्चर्य में था कि केसर ही अपनी बात रखने लगी

  “हुकुम आप अपने काम में कुछ अधिक ही व्यस्त रहतें हैं।”

  इस तरह से अपने कमरे में केसर को देख कर राजा को वैसे भी अच्छा नही लगा था, लेकिन पलट कर किसी को कड़े शब्दों में जवाब देना ना तो उसे पसंद था और ना ही उसकी आदत

“ये तस्वीरें आपके पास कैसे?

“ये पूछिये ये तस्वीरें किसके पास नही हैं?”

” मतलब कहना क्या चाहती हैं आप?”

” हम ये कहना चाहतें हैं कि आप अपने राजकाज में इतने व्यस्त हो गए कि आपको ये तक ध्यान नही रह की आपकी पीठ पीछे क्या हो रहा है?”

  ” ज़रा साफ साफ बताएंगी तो मेहरबानी होगी।”

  ” अब हमारे मेहरबानी करने से क्या होगा हुकुम आपकी पत्नी तो आपका नाम मिट्टी में मिला गयी। ये देखिए ये तस्वीरें… आप जानते हैं ये कौन सी तस्वीरें हैं। ये तस्वीरें आपके छोटे भाई विराट ने खींची है वो भी आपकी रानी साहिब की।
   क्या एक देवर भाभी को ये शोभा देता है। हम नही रोकते तो आपके महल की इज्जत  एक वर्ल्ड मैगज़ीन का हिस्सा बन जाती और रानी साहेब की तस्वीरें हर एक घर के सेंटर टेबल की शोभा बढ़ा रही होती।
    क्या विराट सा ने आपसे पूछ कर ये तस्वीरें निकाली थीं?  अच्छा वो छोड़िए वो तो राजकुमार ठहरे पर क्या रानी साहेब ने आपसे इजाज़त लेकर ये तस्वीरें खिंचवाई थी?
 
    अपना फेंका ज़हर बुझा तीर सही निशाने लगा है देख मुस्कुराती केसर अपने अगले वार के लिए प्रस्तुत थी…

   “हुकुम ! हम जानतें है आपको बुरा लग रहा होगा लेकिन विवाह सम्बन्ध बराबर वालों में ही अच्छे लगते हैं। अगर कोई राजपूतानी शहज़ादी होती तो क्या ऐसे अपनी तस्वीरें खिंचवा लेती।”

  ” तस्वीरों में तो ऐसी कोई बुराई नज़र नही आ रही केसर जी ।”

  राजा तस्वीरों को देखता जाने क्या सोचता बैठा था कि केसर वापस शुरू हो गयी।

  ” बुरा मत मानियेगा लेकिन आपका ब्याह तो किसी आप जैसी ऊंची खानदानी लड़की से होनी चाहिए थी जो आपके साथ साथ आपके महल और गद्दी को भी संभाल सके, लेकिन यहाँ तो कुछ और ही हो गया। कोई भी साधारण घर की लड़की महल का बोझ उठा भी नही सकती, अच्छा ही हुआ बाँसुरी चली गयी। हम जानतें है वो अब कभी आएंगी भी नही, लेकिन आप कब तक उन्हें याद कर आंसू बहाते रहेंगे । इतिहास उठा कर देख लीजिए राजे महाराजों की तो दो तीन रानियां होना कोई बड़ी बात न होती थी, फिर आप क्यों उस बाँसुरी की याद में खुद को मिटा रहें हैं। छोड़िए उन्हें और किसी और से ब्याह कर लीजिए।” कनखियों से केसर ने राजा को देखा वो अब भी नीचे सर किये किसी सोच में मगन था , वो वापस शुरू हो गयी

  ” आपकी ये हालत देख कर हमारा रोने का दिल करता है, सच कह रहे हैं आपकी ऐसी हालत हमसे देखी नही जाती, पर समझ में भी नही आता कि आपके लिए क्या करें कैसे करें।
   हम समझतें हैं आपकी भी कुछ ज़रूरतें होंगी लेकिन अगर आपकी रानी साहेब का ही आपकी तरफ ध्यान नही है तो क्या आपके लिए एक दोस्त के नाते हमारा कोई फ़र्ज़ नही बनता। हुकुम हम अपने फ़र्ज़ को निभाने हर हद तक जाने को तैयार हैं अगर आप चाहें….

   केसर अपनी बात पूरी कर पाती उसके पहले ही राजा जो इतनी देर से पूरे ध्यान से उसकी बात सुन रहा था एकदम से सर उठाये उसकी तरफ देखने लगा। अनजाने ही वो केसर की बात आधे में ही काट गया

   ” केसर जी आपके और बाँसुरी के बोलने का तरीका बिल्कुल अलग है।!”

   केसर चौन्क कर राजा का चेहरा देखने लगी, आखिर इतनी देर से वो जो राग अलाप रही थी उसमें का कोई हिस्सा तो इस सनकी राजकुमार ने सुना हो

  ” हुकुम आपने सुना हमने क्या कहा?”

  ” हाँ सुना ना ! बड़े ध्यान से सुन रहा था आपको और तभी एक बात स्पष्ट हो गयी।”

  ” क्या स्पष्ट हुआ?”

   “कुछ नही , आपके काम की बात नही है।” और मुस्कुरा कर अपने ही कमरे से वो बाहर निकल गया था। केसर का अपने लटके झटके दिखा कर राजा को रिझाने का सपना चकनाचूर कर वो बाहर चला गया था।

    दीवाली की रात अपने कमरे में बैठा राजा मोबाइल पर बाँसुरी के उन्हीं संदेशों को वापस पढ़ रहा था। उस समय के बाद से उसने दिल दुखाने वाले उन संदेशों को पढ़ना ही छोड़ दिया था लेकिन धनतेरस की रात जब केसर लगातार बोल रही थी तब उसके ध्यान में अचानक ये बात आई थी कि इस संदेश में लिखी बोली तो बाँसुरी की थी ही नही।

   खैर !! उन तस्वीरों ने उसे ज़रूर जरा विचलित किया था लेकिन उसे इस बारे में विराट से कुछ पूछना सही नही लगा था और उसने इन तस्वीरों के बारे में बिना किसी से कुछ कहे उन्हें उठा कर भीतर रख दिया था।
  खींची किसी ने भी हो तस्वीरें थी तो उसकी बाँसुरी की ही। कैसे इन तस्वीरों को फेंक सकता था।
   और दूसरी बात केसर की बातों पर भरोसा भी उसे कम ही था, लेकिन अब चूंकि समर और केसर का ब्याह होना था ऐसे में समर से भी कुछ कहना सही नही था।
   एकदम से राजा का ध्यान इस बात पर गया कि इतनी देर से केसर उससे कह क्या रही थी आखिर? किसी ने सही कहा है आपकी सारी ज्ञानेन्द्रियाँ भले ही कितनी भी कर्मठ हों लेकिन अगर मन की अवस्था सही नही है तो आप कान होते हुए भी बहरे हैं, आंखें होते हुए भी अँधे हैं।
  वही उसके साथ हुआ था केसर की बातों को उसने सुना ही नही था मन में तो बाँसुरी की लय चल रही थी।

     *****

   दिवाली के एक सप्ताह बाद प्रस्तावित मेंस की परीक्षा भी सम्पन्न हो गयी। हरि सर के बच्चों ने अपने आप को सौ प्रतिशत झोंक दिया था। कहीं कोई कमी नही रही थी।
    लगभग एक डेढ़ महीने में ही परिणाम भी आ गया और जैसा कि ऐसे इम्तिहानों में होता ही है काबिल बच्चों के बारे में अधिकांश शिक्षकों को पहले से मालूम ही होता है। कोई समस्या नही आये तो क्लास के ऐसे टॉपर बच्चे अच्छा परिणाम ही देतें हैं।
    मेंस के चयनित अभ्यर्थियों की सूची में शेखर लीना रिदान के साथ साथ बाँसुरी ने भी अपनी जगह बना ली थी।
       सभी के इंटरव्यू शेड्यूल होकर लिस्ट आ चुकी थी। शुरुवाती सौ अभ्यर्थियों का आईएएस के लिए इंटरव्यू होना था, उसके बाद के सौ का आईपीएस आईएफएस इसी तरह से आगे की सारी लिस्ट आ चुकी थी।
    शेखर सहित लीना रिदान बाँसुरी भी पहली लिस्ट में स्थान बना चुके थे।

   उन सभी की तपस्या का सुफल मिलना ही था। जो रात और दिन भूल कर पढने में लगे थे जो खाना पीना हंसना बोलना सोना जागना तक अपनी पढ़ाई में भूल चुके थे आखिर उनके रास्ते का पत्थर बनने की किसकी मजाल थी।

इंटरव्यू चयनकर्ताओं ने उन सभी को चुन लिया था। सभी चयनित विद्यर्थियों के चेहरे पर एक अलग ही मुस्कान थी।

   सभी शुरुवाती लगभग 100 उम्मीदवारों को ट्रेनिंग के लिए लाल बहादुर शास्त्री नेशनल अकेडमी ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन (LBSNAA) मसूरी में बुला लिया गया था।
   प्राथमिक लगभग ढाई महीने की ट्रेनिंग के बाद चयनित उम्मीदवारों को सिलसिलेवार भारत भ्रमण कार्यक्रम, फील्ड डेपुटेशन , संसद भवन ट्रेनिंग आदि दी जानी थी।
   शुरुवाती उम्मीदवारों के बाद चयनित उम्मीदवारों की ट्रेनिंग अहमदाबाद में होनी थी। पर संयोग और सुयोग से इन चारों शेखर लीना बाँसुरी और रिदान की ट्रेनिंग लब्सना में ही होनी थी।

    अपने अपने घर परिवार से मिल कर सभी का एक साथ हरिद्वार पहुंचना तय था। हरिद्वार से अगली सुबह चारों ही एक साथ मसूरी के लिए निकलने वाले थे।
सभी खुश थे बहुत खुश थे, चहक रहे थे। शेखर ने अपने मन मुताबिक शुरुआती दस उम्मीदवारों में जगह बना ली थी। लीना और रिदान भी अच्छी रैंकिंग के साथ थे। चारों में सबसे पीछे बाँसुरी ही थी।
   लेकिन कई सारे इम्तिहान ऐसे होतें हैं जहाँ आपका जगह बना लेना ही बहुत होता है, शुरुवाती सौ मतलब सौ फीसदी जिलाधीश से संबंधित पद और इस गरिमामय पद पर आप किस स्थान से पहुंचते हैं ये कैडर्स के लिए जितना महत्वपूर्ण होता है आम जनता के लिए उतना ही महत्वहीन!
   आप कलेक्टर हैं बस यही बात मायने रखती है।

   हरिद्वार में अपने अपने समय पर चारों पहुंच चुके थे। गंगा जी की आरती देखने को सबसे ज्यादा उत्सुक लीना थी, सबको मना मुनु के वो सभी को हर की पौड़ी पर खींच लाई थी…

  ” बस यार अब तो हरि भजन का ही समय है। अब तक हरि सर का नाम जप रहे थे, अब लब्सना में भी वही करना है।”

  शेखर की बात पर रिदान के माथे पर प्रश्नचिह्न खिंच गया….

  ” अबे ऐसे क्या देख रहे हो बे। तुझे पता नही है क्या वहाँ एकेडमी में ड्रिंक्स स्मोकिंग कुछ अलाउ नही है। हरिद्वार के पास एकेडमी खोलने को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया है इन लोगो ने।”

” क्या बात कर रहा है बे?  मैंने तो सोचा था एक साल से जो व्रत कर रहा था सीधे ट्रेनिंग एकेडमी में जाकर ही तोडूंगा। अब ? क्या होगा मेरा?”

” तो बेटा जैसे सूखे सूखे पढ़ाई की ना वैसे ही ट्रेनिंग भी कर लो। अब सीधा भारत भ्रमण के समय पर ही मिलेगा जो मिलेगा।”

  शेखर रिदान की बातों के बीच लीना को जैसे कुछ याद आ गया

  ” तुम लोगों ने शेड्यूल देखा क्या? सुनने में आ रहा है इस बार के सेलेक्टेड कैंडिडेट्स के वेलकम के लिए कहीं के कोई राजा साहब आने वाले हैं।”

  ” पर एकेडमी तो बाहर वालों के लिए क्लोज़ होती है ना!”

” हाँ लेकिंन कुछ  स्पेशल गेस्ट होते हैं, जिन्हें वो लोग खुद बुलाते हैं, ये राजा साहब भी उनके कुछ खास होंगे।”

  सभी घाट पर बैठे आपसी बातों में लगे थे, डूबते सूरज की किरणें घाट के पानी को सिंदूरी कर रहीं थीं कि तभी भीड़ को चीरते काले कपड़ों में सिक्योरिटी के आदमी जगह बनाते अपने बीच किसी को लिए घाट की सीढ़ियां उतरते चले गए। राइफल्स पकड़े कुछ दो चार सीढ़ियों पर खड़े थे और लगभग उनसे दुगुने आदमी यूनिफार्म के साथ ही पानी में उतर कर खड़े हो गए।
   कहीं दूर से लोगो की बातचीत वहाँ एक किनारे बैठे शेखर लीना बाँसुरी के कानों में भी पड़ी

   ” अरे कहीं के राजा साहब आये हैं, गंगा स्नान के बाद आज गंगा जी की आरती में सम्मिलित होने वाले हैं।”

    धड़कते दिल को मजबूती से थामे बाँसुरी एक बार फिर उस काले कपड़े वाले समूह की ओर मुड़ गयी। उन लोगों ने ऐसे घेर रखा था कि अंदर का कोई व्यक्ति बाहर बैठे किसी को नज़र नही आ रहा था।
  आखिर झुंझला कर बाँसुरी धीरे से खड़ी हो गयी और उसी वक्त जलमग्न राजा नमस्कार की मुद्रा में पानी से बाहर निकल आया, अस्तांचलगामी सूर्य को अर्ध्य देने के बाद वो एक बार फिर पानी में डुबकी लगा गया और उसे देखते ही बाँसुरी का दिल धक से रह गया।
     लगभग साल भर बाद वो उसे देख रही थी।
राजा के गोरे कंधो पर पानी की बूंदे टिमटिमा रही थी और उन बूँदों में उलझी बाँसुरी की सांसे जैसे रुकने को थीं।
     राजा के  मनमोहक अवयव बाँसुरी को भी गंगा जी में डुबोने को तैयार खड़े थे।
    वो जैसे खुद को भूल चुकी थी।

   कहतें हैं जंगल में इंसान अपने सामने खड़े वनराज को देख ऐसा मोहित हो जाता है कि कुछ पलों के लिए खुद को भी भूल जाता है वही हाल बाँसुरी का था , अपनी आईएएस की रैंक, अपने संगी साथी, अपना गुस्सा सब भूल कर वो अपलक नेत्रों से बस उसे देख रही थी।
    और उसी समय राजा की आंखें खुली , उसके ठीक सामने उसे देखती बाँसुरी खड़ी थी….

    क्रमशः

aparna…

 


   
 





 

  

   




  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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