जीवनसाथी-78


जीवनसाथी  78




     गंगा जी की लहरों के बीच खड़े राजा की आंखे खुली उसके ठीक सामने उसे देखती बाँसुरी खड़ी थी।
  बाँसुरी की झलक सी मालूम हुई ही थी कि सिक्योरिटी ने राजा को चारों ओर स घेर लिया और उसे पूजा स्थल की ओर ले चले। शाम का धुँधलका भी फैलने लगा था।
    राजा के समूह के पीछे ही पंडितों और लोगों का हुजूम सा बहता चला गया।
    
    भारत आस्थाओं का देश है। भले ही गंगा जी की आरती हर शाम होती थी फिर भी हर की पौड़ी हो या बनारस के दशाश्वमेध घाट कहीं भी भीड़ कम नही होती।
     हर की पौड़ी में भी एक रेला से उठा हो जैसे। सब तरफ भीड़ भाड़ का आलम था।
   बाँसुरी तो कुछ समय के लिए खुद को भूल चुकी थी, जब तक वो अपने होश संभाल पाती राजा वहाँ से जा चुका था।
   कुछ पलों के लिए वो सोचती रह गयी की कहीं ऐसा तो नही की उसे ही राजा की इतनी याद आ रही कि हर जगह उसे राजा दिखाई दे रहा है। या सच ही वहाँ राजा था?
   पर पूछती किससे? उसके साथियों में से कोई राजा से परिचित नही था।

   लीना उसका हाथ पकड़े आरती देखने उसे आगे तक खिंचती ले गयी, शेखर और रिदान वहीं पीछे खड़े आरती देखते रहे।
    घाट पर तरह तरह का सामान बेचने वाले भी अपनी छूट पुट टोकरियां उठाये घूम रहे थे।ज्यादातर सामान बच्चों से सम्बंधित ही था लेकिन लीना हर एक को रोक रोक कर बड़े उत्साह से एक एक सामान को उलट पलट कर देखती खुश हो रही थी।
      लेकिन बाँसुरी अब जैसे वहाँ होते हुए भी वहाँ नही थी।
   उसके बाद राजा को साथ  लिए उसका सुरक्षा घेरा जाने घाट के किस किनारे जा लगा।
  घाट ऐसा था कि आप कहीं भी खड़े हों आपको गंगा जी की आरती दिखेगी ही। इधर उधर लोग एक दूसरे को आगे पीछे करते गंगा जी के ध्यान में मग्न हो रहे थे, उधर वो किसी और के खयालों में गुम उसे ही ढूंढने में व्यस्त थी….

  “बाँसुरी जी मौका मिला है आपको इस पावन पुण्य सलिला की आरती का हिस्सा बनने का, साक्षात अपनी आंखों से देखने का तो आप इधर उधर देख कर इस पुण्य पावन काल को खत्म क्यों कर रहीं हैं?

   आरती के बाद भी आप घाट देख सकती हैं।”

   बाँसुरी की इधर उधर घूमती नज़रों को देख शेखर ने उसे टोक ही दिया। अपनी गलती समझ कर बाँसुरी भी फिर आरती देखने लगी, वो आरती होती भी ऐसी है कि एक बार जिसकी नज़र उस पर पड़ी फिर वो सब कुछ भूल आरती में खो जाता है।

   आरती के बाद शेखर को अपने एक चाचा जी जो कि शांति कुंज में रहा करते थे से मिलने जाना था, सो वो वहाँ के लिए निकलने लगा , लीना और रिदान को भी साथ जाते देख बाँसुरी भी उनके संग हो ली।
    क्योंकि एक झलक दिखने के बाद उस पूरे घाट में फिर उसे राजा कहीं नजर नही आया था। आखिरकार उसकी झलक को अपनी नज़रों का धोखा मान वो उन लोगो के साथ ही निकल गयी।

    शांतिकुंज हरिद्वार में गंगा तट पर स्थित गायत्री परिवार का मुख्यालय महर्षि विश्वामित्र की तपस्थली में स्थित पावन कुंज है।
    व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण, समाज निर्माण के स्तंभों पर टिका ये युगतीर्थ बरसों से निःस्वार्थ सेवाभावियों की तपोभूमि रहा है।
    आश्रम में प्रगतिशील विचारों के साथ ही प्राचीन गुरुकुलों सी नियमावली का ही परिपालन आज भी किया जाता है। समय समय से गायत्री परिवार की दैनन्दिनी का पालन करना हर एक व्यक्ति के लिए उतना ही आवश्यक है जितना जीवन के लिए सांस लेना।
   चाहे कोई कितने भी प्रतिष्ठित पद पर आसीन व्यक्ति हो लेकिन तीर्थभूमि के नियम सभी के लिए समान है, गुरुदेव और माताजी की प्रखर प्रज्ञा से तपोभूमि का कण कण ऐसा दैदीप्यमान है , ऐसी ऊर्जा से परिपूर्ण है कि यहॉं आकर यहाँ से निकला व्यक्ति यहाँ के चमत्कार से कोरा नही रह पाता।

   यही हाल उन चारों का था। सारा समय इधर उधर की बतकही में निकालने वाले ये युवा यहाँ आकर जैसे उस अदृश्य दिव्य शक्ति के आगे नतमस्तक हो एक अलग ही ऊर्जा से भर चुके थे।

   तपोभूमि के नियमों में बंधे वो सभी अगले दिन सुबह वहाँ से मसूरी के लिए निकल गए।

  हरिद्वार से मसूरी लगभग ढाई तीन घंटे का सफर तय कर वो सारे अपने सपने को पूरा करने की पहली सीढ़ी
चढ़ ही गए।

    लब्सना के मुख्य द्वार पर अपना एडमिट कार्ड के साथ ही अन्य दस्तावेजों को दिखाने के बाद अंदर प्रवेश करते ही चारों की नज़र ऊंची पहाड़ी पर स्थित इस मनभावन ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट पर ही अटकी रह गयी। किसे देखे ,क्या क्या देखे सोचते चारों ओर देख रहे थे, की तभी कोई भागता उनकी तरफ चला आया ।
    
   ” उस तरफ चलिए, जल्दी ही इंस्टिट्यूट का प्लेज शुरू होने वाला है।”

  वो सारे उसके पीछे चलते चले गए।

   शुरुआती सारी औपचारिकता पूरी करने के बाद किसी बड़े से हॉल में बैठे वो सारे एक दूसरे का परिचय पाते अगले आदेश के लिए तैयार बैठे थे।

    ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के अधिकारियों के आने के साथ ही वहाँ का सिलसिला शुरू हो गया।
   एक के पीछे एक अधिकारियों के उर्जावान उद्बोधन शुरू होते ही वहाँ बैठे सभी रंगरूटों के चेहरे खिल उठे। अब तक भी वो खुद पर गर्व कर रहे थे लेकिन वहाँ पहुंचने के बाद माहौल ही अलग सा था। देशभक्ति का जज्बा , देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज़्बा जैसे अब कूट कूट कर उनमें भरा जा रहा था।
   दो तीन उद्बोधन होते ही वहाँ एक बार फिर एक सरगर्मी सी उठी, कुछ हल्की सी आवाज़ें सुनाई पड़ने लगी, ” चीफ गेस्ट आ गए हैं।” आदि इत्यादि।
     उसी वक्त अपने कुछ दो सिक्योरिटी गार्ड्स और समर के साथ राजा भी उसी हॉल में चला आया।
   उसके वहाँ पहुंच के मंच पर विराजते तक में सभी एक साथ खड़े हो गए और बैठते ही बैठ भी गए। राजा के साथ ही समर भी था।

      हालांकि राजा जी के लिए एकेडमी के नियम नही थे लेकिन फिर भी उन नियमों से ख़ुद बंधा राजा फॉर्मल थ्री पीस सूट में यूं लग रहा था कि उन सजीले कपड़ों को पहन कर उसने उन कपड़ों पर चार चांद लगा दिए थे। उसे देखते ही सारे रंगरूटों में उसी की चर्चा छिड़ गई थी।
   एकेडमी ने अपने नियमों से इतर आखिर कहां के राजा जी को आमंत्रित कर रखा है? हालांकि बाहरी लोगों के लिए भले ही वहाँ के दरवाज़े बंद हों पर उनके खुद के आमंत्रित माननीयों के लिए तो एकेडमी के द्वार सदा ही खुले थे फिर चाहे वो हमारे देश के प्रधानमंत्री हों, कोई चर्चित धनाढ़्य व्यापारी हों या कहीं किसी रियासत के राजा।
      आज मुख्य अतिथि के तौर पर ही राजा अजातशत्रु आमंत्रित किये गए थे।

   विभिन्न वक्ताओं , मुख्य वक्ता आदि के उद्बोधनो के बीच राजा की नज़र भी बाँसुरी पर पड़ ही गयी।
    सामने की पंक्ति से ठीक पीछे की पंक्ति में स्टेज से कुछ दाहिनी तरफ बैठी बाँसुरी पर एक बार नज़र पड़ने के बाद राजा की नज़र फिर किसी और तरफ नही गयी।
    एकेडमी के नियमों के अनुसार सभी को वहाँ के ड्रेस कोड का पालन करना था, इसी से बाँसुरी ने भी प्योर सिल्क की आसमानी साड़ी पहनी हुई थी। उसके आसपास ही उसकी मंडली भी विराजमान थी।
     सभी शांति से वहाँ के उद्बोधन सुनने में व्यस्त थे लेकिन बाँसुरी के ठीक पीछे बैठे शेखर की आंखें राजा पर ही थी।
   उसे राजा का यूँ बाँसुरी को घूरना फूटी आंख नही भा रहा था।

   दोपहर के सेशन की समाप्ति के बाद भोजन अवकाश में राजा के लिए अलग व्यवस्था को नकारते हुए राजा साहब ने सभी के साथ ही खाने का निर्णय लिया था।
    बाँसुरी लीना के साथ एक कोने की टेबल पकड़े बैठी ही थी कि समर उस तक चला आया। समर के आते ही बाँसुरी अपनी जगह से उठ उस तक चली आयी।
   लीना से कुछ दूर हट कर ही फिर दोनो किन्ही बातचीत में लग गए। बातें करते चलते चलते  दोनो जैसे ही वहाँ से ज़रा दूर निकले कि शेखर अपनी टेबल से कूद फांद कर लीना तक पहुंच गया

  ” ये बंदा कौन था लीना?” इतने दिनों में शेखर के मुहँ से अपना सही नाम सुन लीना सकते में थी , मुहँ बाए उसे देखती लीना कुछ कहती कि वो वापस एक सवाल दाग गया

” मुझे तो ये राजा मंत्री की जोड़ी सही नही लग रही, और तुझे?”

  छोटा सा हम्म बोल लीना फिर खाने में लग गई

  ” अबे भुक्कड़ वहाँ तेरी सहेली फंसने वाली है और यहाँ तुझे खाने की पड़ी हैं।

  ” अरे तो ?   मैं क्या करूँ? और तुझे कैसे पता कि वो फंसने वाली है?”

  ” क्यों तूने देखा नही , सारा टाइम वो राजा बाबू वहाँ सामने बैठे बैठे बस तेरी दोस्त को घूर रहा था, और वो भी बहुत बुरी नज़रों से।”

  ” तो? घूर ही तो रहा था?

  ” अरे पागल लड़की तुझे थोड़ी बुद्धि वुद्धि है कि नही ? पहले तो राजा जी पूरा वक्त उसे घूरते रहे और अब अपने मंत्री को भेज दिया सेटिंग करने। छि ये कोई बात होती है भला? राजा भला ऐसे होतें हैं क्या?”

  लीना ने आंखें फाड़ कर शेखर को देखा

   ” और कैसे होतें हैं? राजा तो ऐसे ही होतें हैं , एक महारानी एक पटरानी और बाकी की छप्पन ये रानी वो रानी, आचार्य चतुरसेन की ‘ गोली’ नही पढ़ी क्या तूने।”

  ” अबे यार मैं क्या बोल रहा तू क्या सुन रही समझ रही। अब अगर तू उठ कर वहाँ तक नही गयी तो मैं ही चला जाऊंगा।”

  ” ऐसे कैसे चली जाऊँ  , अगर उन लोगों को प्राइवेसी नही चाहिए होती तो मेरे सामने ही बात कर लेते ना, वहाँ जाने की क्या ज़रूरत थी? मैं नही जाऊंगी, तुझे जाना है तो जा।”

   शेखर के दिल की बेचैनी बढ़ती जा रही थी, उसकी नज़र बाँसुरी और समर से हट नही रही थी, उसके दिल में अजीब सी घबराहट और मायूसी छा रही थी, उसकी समझ से परे था कि उसे राजा जी का बाँसुरी को निर्निमेष पलकों से घूरना ज्यादा खल रहा था या अभी बाँसुरी का आधे घंटे से समर के साथ बातें करना।
    ये क्या बात होती है भला, राजा जी का पी ए है हैंडसम है तो क्या अपनी डिग्निटी भूल जानी चाहिए वैसे बाँसुरी ऐसी तो नही थी।
   इतनी सारी बातें तो साल भर में उससे कभी नही की उसने और आज देखो ऐसे शरमा रही है मुस्कुरा रही है जैसे बंदा सीधे राजा जी का मैरिज प्रोपोजल ही ले आया है।
   अरे इन राजाओं का कोई भरोसा भी होता है, साले ठरकी राजा!

    मन ही मन राजा को कोसता शेखर बाँसुरी पर ही नज़रे गाड़े था कि लंच की समाप्ति के साथ ही राजा की राजसी ब्युक आकर बाँसुरी के पास खड़ी हो गयी।।

   ******


   बाँसुरी के चयन का पता निरमा को भी चल गया था। बाँसुरी के पिता से ही निरमा उस का हालचाल लेती रहा करती थी।
   आज उसकी भी खुशी का ठिकाना नही था, उसकी प्राणप्रिय सखी अपने लक्ष्य को पा ही गयी थी। उसके पीछे का बाँसुरी का संघर्ष हो या राजा का अकेलापन कुछ भी उससे छिपा नही था।
   आज उसने खुशी में खीर बनाई थी, उसे पता था प्रेम को खीर बहुत पसंद है।
  उसकी मनपसंद खीर बना कर वो बाकी कामों में लगी थी कि प्रेम आज खाने के समय से कुछ पहले ही आ गया था।
   उसे ऐसे परेशान हाल देख वो तुरंत रसोई से पानी का ग्लास लिए चली आयी

” क्या हुआ ? कुछ परेशान लग रहे ?”

  ” हाँ एक बुरी खबर है।”

  बुरी खबर सुनते ही निरमा का दिल जोरों से धड़कने लगा…
  बहुत डरते डरते ही उसने पूछा

  ” क्या हुआ?”

  ” रेखा बाई सा के बच्चे छोटे कुंवर की तबियत फिर बिगड़ गयी है। इस बार तो तबियत कुछ ज्यादा ही खराब लग रही है। महल में रोना धोना से मचा है, रेखा बाई सा का रो रोकर बुरा हाल है और इधर विराज का कोई अता पता नही है। हुकुम और समर भी यहाँ नही है, मैं बस विराज को ढूंढने जा रहा हूँ, हो सके तो तुम महल चली जाना।”

  ” हाँ ठीक है। तो बस दो मिनट दीजिये मैं ज़रा कपड़े बदल लूँ फिर मुझे महल उतार कर आप निकल जाइयेगा और तब तक में ज़रा सी खीर खा लीजिये।”

  ” अभी ऐसे वक्त में तुम्हें खीर की सूझ रही ?”

  “अरे नही खीर की नही सूझ रही। ऐसे में खीर क्या कुछ खाने का मन कैसे हो। मेरा तो बस ये कहना था कि मेरे कोड़े बदलते तक खाली बैठे गलत बातें सोचने से अच्छा है आप ज़रा सी खीर खा लेंगे तो मुझे भी तसल्ली रहेगी कि आप एकदम खाली पेट नही है।”

  प्रेम ने निरमा को देखा उसकी आँखों में याचना से भाव देख आखिर प्रेम इतने कठिन समय में भी मुस्कुराए बिना नही रह सका..

  ” बिना खिलाये मानोगी नही ! है ना?”

  ना में सर हिलाती निरमा खीर की कटोरी टेबल पर रख फटाफट सीढियां चढ़ गई।
  
   मीठी को अम्मा के पास छोड़ वो दोनो घर से निकल गए। महल के सामने निरमा को उतार प्रेम विराज के दोस्तों के नम्बर मिलाता उसे एक जगह से दूसरी जगह ढूंढता फिरता रहा।
   आखिर उसकी तलाश एक जगह जाकर थम गई। विराज के वैसे तो बहुत से अड्डे थे लेकिन एक दोस्त से हुई बात से जहाँ का पता मिला वो एक पॉश कॉलोनी के अपार्टमेंट था।
  पार्किंग में गाड़ी डाल प्रेम मिले हुए पते पर पहुंच गया, घर की डोरबेल बजा कर वहीं बाहर खड़े खड़े प्रेम ने विराज को फ़ोन भी लगा लिया। पहली बार में ना तो विराज किसी का फ़ोन उठाता था और न आज उठाए। दूसरी रिंग जाने के बाद उसने मुश्किल से फ़ोन उठाया कि प्रेम उससे पूछ बैठा

  ” विराज सा!इस वक्त कहाँ हैं आप?”

  ” क्यों?” लड़खड़ाती आवाज़ में जवाब देता विराज घमंड से अकड़ उठा

  ” महल में आपकी ज़रूरत है रेखा बाई सा को।”

  ” हमें खुद पता है हमें किस वक्त कहाँ रहना है? अभी इतने बुरे दिन नही आये की नौकरों से हमें ज्ञान लेना पड़े। समझे! रियासत के राजा अगर तुमसे हंस बोल लेता है इसका ये मतलब नही की तुम हमारे सर पर सवार हो जाओ। समझे! ”

  ” हुकुम मैं बस ये कहना चाहता था कि आप हमेशा ही अपने मन की करतें आएं हैं आज वाकई आपके बेटे और पत्नी को आपकी ज़रूरत है तब उनके साथ होना चाहिए आपको।”

  “हम इस वक्त बहुत ज़रूरी मीटिंग में उलझे पड़े हैं अब ऐसे में तुम हमें ज्ञान ना दो तो अच्छा होगा।”

   ठीक उसी वक्त एक लड़की ने उस फ्लैट का दरवाजा खोल दिया। सामने हॉल के एक ओर ही बैडरूम था जिसका खुला दरवाज़ा बाहर मुख्य द्वार क नज़र आ रहा था। बिस्तर पर पड़े विराज पर प्रेम कीत नज़र पड़ते ही वो धड़धड़ाते हुए भीतर चला गया।
  फ्लैट छोटा ही था लेकिन ज़रूरत के हर सामान से लैस था। बैडरूम में लेटा हुआ विराज प्रेम को अंदर आते देख बैठने की कोशिश में और लुढ़क गया।
   वहाँ का माहौल देखते ही प्रेम को विराज पर ज़ोर का गुस्सा आने लगा, उस पर बार बार उसका हाथ पकड़ कर उसे कमरे से बाहर खींचती लड़की उसके गुस्से की आग में घी का काम करती रही

   ” आप दूर रहिए मुझसे। मुझे पता है इनके साथ क्या करना है।”

  प्रेम के गहरी आंखें और उससे भी गहरी आवाज़ में ढ़ी गयी चेतावनी से वो लड़की अपने कपड़े ठीक करती दीवार से लगी एक ओर खड़ी रह गयी।
   उतनी देर में विराज का भी थोड़ा नशा उत्तर चुका था वो वापस प्रेम पर झपट्टा मारने को तैयार था

  ” हम जो चाहेंगे वो करेंगे, जहाँ चाहेंगे वहाँ रहेंगे। तुम कौन होते हो हमें रोकने वाले?”

   प्रेम बिना कोई जवाब दिए विराज को उठाने की कोशिश में लग गया।
   प्रेम के हाथ को झटक कर विराज वापस मनमानी पर उतर आया

  ” तुम होते कौन हो हमें ऐसे उठा कर ले जाने वाले। अरे तुम्हें इतनी आग क्यों लग रही है , हम कौन सा तुम्हारी बीवी के साथ ….

   विराज का वाक्य पूरा होता उसके पहले ही एक ज़ोरदार तमाचा उसके चेहरे का भूगोल बिगाड़ गया।
नशे के जोश में होश खोया बैठा विराज तिलमिला कर रह गया , वो जिस किसी तरह अपनी हिम्मत जोड़ प्रेम को मारने आगे बढ़ा ही था कि दूसरे गाल पर ऐसा ज़ोरदार तमाचा पड़ा कि विराज फिर उठने लायक ही नही रहा।
   उसे उठा कर अपने कंधों पर डाल प्रेम अवधूत शिव सा वहाँ से निकल गया। वहाँ खड़ी लड़की आंखें फाड़े उसे जाते देखती रही और जब उसे कुछ समझ नही आया तो रोती बिलखती वहीं दीवार से लगी बैठ गयी।

    महल में विराज को जिस हालत में प्रेम लेकर पहुंचा उससे किसी ने कोई सवाल नही किया। बच्चे की सुबह से खराब  तबियत में भी कुछ सुधार आ गया था इसी से महल वासियों की चिंता का कारण अब बेटा ना होकर बाप हो गया था।
     राजा की अनुपस्थिति में युवराज ही सर्वेसर्वा था इसी से उसने प्रेम को विराज को लाने की ज़िम्मेदारी के साथ ही बाकी सारे अधिकार भी दे रखे थे वरना प्रेम जैसा कर्तव्यनिष्ठ कभी विराज पर हाथ नही उठाता हालांकि वहाँ एक बात और थी कि विराज का निर्लज्ज आचरण बातों को निरमा तक खींच ले गया था।

   महल में सुबह से मचता हाहाकार शाम तक शांत हो चुका था और विराज के घर वापसी से काफी हद तक मामला सुलझा सा लगने लगा था, ये और बात थी कि अगले दिन सूर्योदय के साथ ही शुरू होने वाले हंगामे से सभी उस वक्त अपरिचित थे।

  *******

   एकेडमी में प्रथम दिवस होने से लंच के बाद का सेशन खाली था। प्रशिक्षुओं के लिए वहीं कैम्पस में सोवेनियर शॉप होने के बावजूद पहला दिन होने से कुछ ज़रूरी काम होने से बाहर निकलने देने की सुविधा भी थी।

   दोपहर के भोजन के समाप्त होते होते बाँसुरी और समर के पास राजा की राजसी ब्युक आकर खड़ी हो गयी।
   बड़े अदब से बाँसुरी की तरफ का दरवाजा खोले समर एक तरफ को खड़ा हो गया, बाँसुरी चुपचाप गाड़ी में जा बैठी और समर ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
    दरवाज़ा लगते ही गाड़ी आगे बढ़ गयी और उस गाड़ी के आगे बढ़ते ही अगली गाड़ी में समर भी सवार हो उस गाड़ी के पीछे निकल गया।
   ये सब एक के बाद एक तुरंत होता चला गया। शेखर और लीना की समझ से परे था कि ये गुमसुम सी रहने वाली लड़की जो अचानक हो क्या गया जो ये बिना जान पहचान एक रईस के कहने पर ऐसे उसके साथ चली गयी। इतने दिनों के साथ के बाद लीना बाँसुरी के चरित्र पर कोई लांछन लगाने में असमर्थ थी। इतनी शांत सौम्य सुशील सी लड़की को आज अचानक हो क्या गया था।
   क्या राजा साहब के भारी व्यक्तित्व से डर गई थी बेचारी?
   या फिर राजा जी के किलर लुक्स ही कत्ल कर गए थे उसे?

  लीना मुहँ फाड़े जाती हुई गाड़ियों के काफिले को देखती खड़ी थी कि शेखर भागता हुआ रिदान को खींचता बाहर की ओर भागा।
   मुख्य द्वार पर गार्ड के टोक देने पर झिझक कर कुछ पल को खड़ा हुआ कि तुरंत उसका दिमाग काम करने लगा….

” वो राजा साहब का कुछ सामान रह गया है वही देने जा रहे।”

  ” मुझे दे दीजिए, मैं एकेडमी में जमा करवा दूंगा वहाँ से उन तक पहुंचवा दिया जाएगा।”

  गार्ड के रूखे जवाब पर शेखर ने अपना उतावलापन छिपाते हुए एक बार फिर अर्जी लगा दी

  ” भाई समझ ना बात ! हम साधारण आम लोगों को कहाँ मौका मिलता है राजे रजवाड़ो के दर्शन का, अब मौका मिल ही रहा तो बहती गंगा में क्यों न हाथ धो लिया जाए।”

  गार्ड ने एक नज़र शेखर को देखा और मुस्कुराने लगा।

  ” आप खुद डेढ़ दो साल में जिलाधीश होंगे , आप कैसे आम आदमी हुए।”

  “भाई स्मार्ट हो तुम तो।”

  ” तभी तो लब्सना में हैं।”

   “ये भी सहीं कही गुरु। हो कहाँ से? मुझे तो मेरी तरफ के लग रहे हो”

  “भारत का रहने वाला हूँ सर ! यहाँ आप लोगों को भी यही सिखाया जाएगा कि आप बिहारी पंजाबी उड़िया मराठी नही सिर्फ हिंदुस्तानी हैं भारतीय हैं।

  ” चरण कहाँ हैं यार तुम्हारे! तुम तो मतलब वाकई गुरु निकले यार। अब जरा कृपा करो बता दो राजा जी गए किधर हैं क्योंकि कल से तो फिर बस एकेडमी और हम। फिर तो सीधे भारत दर्शन में ही निकलना होगा।

  आखिर इतनी बहस का ये फायदा हुआ कि गार्ड ने उन दोनों को राजा के ठिकाने का अता पता भी बता दिया।

  जान हथेली पर रख भागते हुए शेखर ने तुरंत कैब ली और “द सवाई” की ओर अपनी गाड़ी बढ़वा ली।

  होटल में भीतर पहुंच कर वो राजा और बांसुरी को इधर उधर ढूंढ ही रह था कि लिफ्ट में साथ साथ ऊपर जाते उन दोनों पर उसकी नज़र चली गयी , वो तुरंत रिदान को साथ लिए उनका पीछे ही भाग चला।

   लिफ्ट से बाहर निकलते ही राजा बाँसुरी और समर आगे एक तरफ बढ़ते चले गए, शेखर भी भागता सा उन्हीं के पीछे हो लिया।
  रॉयल सुइट में तीनों के दाखिल होते ही शेखर भी वहाँ पहुंच गया।
    अभी वो दरवाज़े पर खड़ा सोच ही रहा था कि दरवाज़े पर खटखटा कर रुके ये वहाँ से नीचे जाकर ही पूछताछ कर ले तभी कमरे का दरवाजा खोले समर बाहर चला आया।
    आते ही उसकी नज़र सामने ही खड़े शेखर पर चली गयी, रिदान तो समर को देखते ही दूसरे कमरे से दूसरी ओर जाने लगा, पर समर को एकाएक सामने देख शेखर हड़बड़ा गया।
   समर को लगा शेखर होटल स्टाफ का व्यक्ति है और सब सही है या नही यही जानने आया है। यही सोच समर शेखर की तरफ ही घूम गया

   ” राजा साहब ने कहा है, अब उन्हें कोई डिस्टर्ब ना करे। अगर उन्हें किसी चीज़  की ज़रूरत हुई तो वो खुद आपसे कह देंगे।आप समझ गए ना। ”

   और इसके साथ ही समर ने कमरे से अपने साथ लाया ‘डू नॉट डिस्टर्ब ‘ का टैग वहाँ उस दरवाज़े पर टाँग दिया।
     एक बार फिर शेखर को पूरी नज़र देखने के बाद समर वहाँ से एक तरफ को चलता चला गया।
   उसके जाते ही शेखर की नज़र वहाँ टंगे छोटे से साइन टैग पर चली गयी। उसे ऐसा लगा जैसे ये डू नॉट डिस्टर्ब का साइन उसे मुहँ चिढ़ा रहा हो।

  इस डू नॉट डिस्टर्ब ने ही आज दिन भर में उसे सबसे ज्यादा डिस्टर्ब कर दिया था।

   लीना सच ही कह रही थी। राजा महाराजा होते ही लंपट है। जहाँ कोई चिकना चेहरा देखा झट फिसले।
कैसा चरित्रहीन राजा था और बांसुरी?
   उस कमरे के भीतर बिना ना नुकुर चले जाने में क्या अकेला वो राजा ही दोषी था? क्या बाँसुरी का कोई दोष ना था?

  जाने क्यों अपनी नज़रों के सामने घंटे भर समर से बात करने वाली, राजा के साथ बिना किसी ना नुकुर के होटल के कमरे में चली जाने वाली बाँसुरी के लिए उसके दिल से कोई गलत बात नही निकल पा रही थी। रह रह के उसे सिर्फ राजा पर ही गुस्सा आ रहा था।
  जब क्रोध अपने चरम पर पहुंचने लगा तो भारी कदमों से वो नीचे बने रेस्तरां में चला आया। रिदान के साथ वहाँ बैठा शेखर मन में उलझी पड़ी गुत्थियों को सुलझाने के चक्कर में और उलझाता चला जा रहा था।


  क्रमशः

aparna..


      

   

  





लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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