जीवनसाथी-79

जीवनसाथी –79


         सुहाना हर दर्द है।
        जो तू मेरा हमदर्द है….

        नीचे कैफे में चलते गाने के बोलो के साथ शेखर नीचे कैफे में बैठा अब तक पांच कॉफी पी चुका था, रिदान उसका चेहरा देखता बैठा था। उसे और लीना को शेखर की अवस्था का कुछ ज़रा सा भान तो था लेकिन वो बाँसुरी को लेकर इतना गंभीर हो सकता है ये किसी ने नही सोचा था…

” अब चलें वापस? वहाँ एकेडमी का गेट बंद हो जाएगा, पहले ही दिन वहाँ के रूल्स नही तोड़ सकते यार । चल अब ।”

” अबे दो घड़ी फुरसत की सांस ले लें?जब से आये हैं बस चले चले कि रट लगा रखी है।”

  रिदान इस आँख मिचौली से परेशान हो चुका था आखिर थोड़ी हिम्मत संजो कर उसने शेखर से कह ही दिया__

  ” अबे यहॉं कॉफी पर कॉफी ढ़कोलते रहने से कुछ नही होना जाना है। या तो हिम्मत करके कमरे का दरवाजा खटका दो या फिर चलो एकेडमी वापस।”

   शेखर एक सेकंड को रिदान का चेहरा देखता रह गया, उसे क्या कहे क्या नही ये ही नही सूझ रहा था। बांसुरी के लिए अपने दिल के जज़्बात आज तक उसने किसी से नही कहे थे यहाँ तक कि खुद से भी नही। वो खुद अभी तक इसी मुगालते में था कि बाँसुरी उसकी खास दोस्त है लेकिन आज राजा की निर्लज्ज दृष्टि उसे अंदर तक जला कर राख कर चुकी थी बावजूद उसकी दरवाज़े को खटकाने की हिम्मत नही थी।

    होगा अपनी रियासत का राजा लेकिन आखिर उसे किसने हक दे दिया था कि किसी लड़की को लगातार घूरते रहो फिर अपने बाशिंदे को भेज उसे कमरे में बुला कर बेशर्मी से दरवाज़े पर डू नॉट डिस्टर्ब चिपका दो। हद होती है!!!

   हद तो होती ही है। हर बात की!!
लेकिन राजा का प्यार बाँसुरी के लिए बिना किसी हद के था।
   रिजल्ट्स की घोषणा के साथ ही चयनित अभ्यर्थियों की सूची समर ने उसके सामने रख दी थी।
बाँसुरी का नाम देखते ही उसकी आंखें चमक गयी थी, इसी परिणाम की उसे अपेक्षा भी थी। बधाई देने वो उसे फ़ोन करना चाहता था मिलना चाहता था लेकिन फ़ोन उसने लगा लिया लब्सना को।
    नए चयनित रंगरूटों का प्रशिक्षण एकेडमी सुचारू रूप से कर ही रही थी, ऐसे में किसी राजा से मिलने वाली बधाई पुरस्कार समान ही थी। लब्सना ने उसी समय चयनित प्रशिक्षुओं को सम्मानित करने राजा साहब को आमंत्रित कर लिया।
   सूची में बाँसुरी का नाम देख कर ये जानना मुश्किल था कि उसकी ट्रेनिंग कहाँ होगी। हालांकि ये सारी बातें भी बाद में पता चल ही जानी थी इसी से एक बार लब्सना को निपटा कर फिर बाँसुरी का प्रशिक्षण स्थल भी ढूंढ लिया जाएगा यही सोच वो मसूरी के लिए निकल गया था।
   उसे भी कहाँ पता था कि उसकी भेंट बाँसुरी से वही होने वाली है।
   हरिद्वार के गंगा घाट पर स्नान के बाद जब उसकी आँखें खुली और सामने बाँसुरी दिखी तो उसे भी पल भर को लगा कि शायद उसे गलतफहमी हो गयी है । बाँसुरी किसी लड़के के साथ गंगा घाट पर क्या कर रही होगी।
    बाँसुरी से पहले उसके ठीक पीछे खड़े शेखर पर ही राजा की नज़र पड़ी थी। हालांकि जब तक वो घाट की सीढ़ियां चढ़ बाँसुरी तक पहुंचता उसके सुरक्षा कर्मी उसे अपने घेरे में लिए आगे बढ़ गए थे। उसने कितनी बार जाने पलट कर बाँसुरी को ढूंढने की कोशिश भी की लेकिन गंगा घाट की भीड़ में वो फिर जाने कहाँ अदृश्य हो गयी।
   इसी सब में उसे भी एकबारगी यही लगा कि बाँसुरी नही शायद उसके मन का भरम ही था जो उसे घाट पर बाँसुरी के रूप में दिख गया था।

  अगले दिन सुबह ही उसे लब्सना के कार्यक्रम में शिरकत करना था इसी से वो समर और अपने काफिले के साथ रात ही में देहरादून निकल गया था। देहरादून में उनका पुराना पुश्तैनी महल भी था इसके साथ ही ठाकुर साहब जिनकी पुत्री का रिश्ता कभी राजा के लिए आया था के साथ भी इस वक्त राजा की कुछ कारोबारी बातें चल रही थी । उनसे भी उसे मिलना ही था यही सब सोच कर राजा अपनी टोली के साथ अपने महल में ही रुक गया था। महल में अधिकतर लोगों को छोड़ वो समर और एक दो सुरक्षाकर्मियों के साथ ही ठाकुर साहब से मिलने चला गया था।
   विदेशों से चल रहे अपने व्यापार के अलावा और भी बहुत सारी बातें ठाकुर साहब करते रहे, सारी लीगल परिचर्चाओं का जवाब समर पूरी कुशलता से देता रहा एक तरह से ये बहुआयामी चर्चा दोनो पक्षों के लिए लाभ का सौदा ही थी लेकिन इस सारे सब में वहाँ बैठा राजा वहाँ होकर भी जैसे वहाँ नही था। उसकी नज़र जैसे बार बार घाट पर खड़ी बाँसुरी पर ही अटक कर रह जा रही थी।

दून से मसूरी की दूरी वैसे भी ज्यादा नही थी, एक डेढ़ घंटे का सफर सुबह तय कर वो लोग मसूरी के सवाई पहुंच चुके थे।
      लब्सना के मुख्य द्वार पर ही ढेरों स्वागत सत्कार के बाद राजा और समर भीतर आकर उनके सेमिनार कक्ष में चले आये। मंच पर आसपास बैठे दोनों लोग शांति और पूरे धैर्य से वहाँ चलते आख्यान सुन ही रहे थे कि राजा की नज़र सामने अभ्यर्थियों में बैठी बाँसुरी पर पड़ गयी।
    बाँसुरी पर नज़र पड़ते ही फिर उसकी आंखें किसी पर नही टिकी। ना चाहते हुए भी वो बाँसुरी को ही देखता रहा। इसी बात का तो उसे डर था कि एक बार वो बाँसुरी से मिल लिया फिर उसे खुद से दूर रखना या उससे दूर रहना उसके लिए मुश्किल हो जाएगा और इसीलिए आज तक वो सीधे तौर पर उसके सामने नही आया था। ये बात और थी कि उस रात बाँसुरी के साथ समर को भेजना हो या बाँसुरी के पिता से बात कर उसका दिल्ली के इंस्टिट्यूट में दाखिला करवाना हो हर जगह हर एक काम के पीछे राजा ही था।
   बांसुरी के पिता से मिन्नतें कर बाँसुरी के एकाउंट में रुपये डालने से लेकर बाँसुरी की हर सुख सुविधा का ख्याल रखने के पीछे राजा ही था। ना जाने कितनी बार उसकी बंद खिड़की के नीचे अपनी कार में ही पूरी पूरी रात जागती आंखों से गुज़ार बस उसे एक झलक देख कर वापस लौट जाने वाला राजा आज सामने से उसे देखने का लोभ छोड़ नही पा रहा था।
   अकेले उसका ये हाल हो ऐसा भी नही था बाँसुरी भी आखिर उसी रोग से ग्रस्त थी जिससे राजा।
   एक दूसरे पर नज़र पड़ते ही फिर वो दोनो उस हॉल में होते हुए भी नही थे। एक दूसरे को देखने भर में ही जन्मों के ताने उलाहने भी निपटा लिए गए था।
  बाँसुरी तो एक दिन पहले ही राजा को देख अपना सारा गुस्सा सारा अभिमान गंगा जी में बहा आयी थी।
   चयनित अभ्यर्थियों के समक्ष जब राजा जी को दो शब्द कहने बुलाया गया तब भी अपनी दुनिया में खोए राजा को समर ने ही हल्के से हिला कर उसके पुकारे जाने वाले नाम की ओर उसका ध्यान दिलाया तब कहीं जाकर राजा जी पोडियम की ओर बढ़ चले थे।
    वैसे तो बोलने में राजा को महारथ हासिल थी , कोई विषय हो उसके लिए अबूझ नही था। हर विषय की बारीकी को समझ कर उसका विश्लेषण कर वो घण्टो उस पर बोल सकता था बिना किसी पर्चे को पढ़े लेकिन वहाँ बाँसुरी की झलक देखने के बाद ना ही उसका कुछ और बोलने का मन ही किया और ना उसने वहाँ कुछ और बोला।
   वाकई दो शब्द उत्साह और बधाई के बोलने के बाद उसने अपना स्थान वापस ग्रहण कर लिया था। उसे तो बस उस सेशन की समाप्ति का ही इंतज़ार था। उसके ठीक पास बैठा समर भी उन दोनों के हाल से परिचित था। इसी से भोजन अवकाश होते ही जब अधिकारियों ने राजा को घेर लिया और वो खुद बाँसुरी से मिलने नही जा पाया तब समर ही बाँसुरी को ढूंढता उसके पास पहुंच गया था

  ” प्रणाम करता हूँ हुकुम !! कैसी हैं आप?”

  इतने दिनों बाद खुद के लिए राजसी संबोधन सुन बाँसुरी सकुचा उठी थी। उसने एक नज़र पलट कर अपनी मित्र मंडली को देखा , लीना खाने में मस्त थी शेखर और रिदान भी बातें करते खा पी रहे थे । वो खुद समर को देख उन लोगों से दूर चली आयी थी।  उसने खुद ने जानबूझ कर अपना राजसी परिचय किसी को नही दिया था इसी से इतने दिनों बाद ये संबोधन सुन एक गर्व भरी मोहक मुस्कान उसके चेहरे को और भी सुंदर कर गयी थी।

  ” मैं ठीक हूँ। आप कैसे हैं समर सा? और महल में सब कैसे हैं दादी साहेब रूपा भाभी युवराज भाई सा, जया भाभी माँ साहेब पिता साहेब विराट सब?”

” सभी ठीक हैं बाई सा!”

  ” और आपके हुकुम?”

  ” आपसे अभी मिलना चाहतें हैं, तुरंत ।”

  ” लेकिन यहाँ एकेडमी से बिना किसी बेहद ज़रूरी काम के निकलना मुश्किल है। शायद अनुमति नही मिलेगी।”

” किसे अनुमति नही मिलेगी? आपको? आप भूल जाती हैं बाई सा की आप है कौन?”

  ” नही वो बात नही है समर सा लेकिन मुझे ऐसे अपना रॉयल परिचय देकर अपना काम करवाना मंज़ूर नही है।”

” आपको कुछ करना भी नही पड़ेगा बाई सा। मैं आपके लिए बात कर लूंगा वैसे भी अगर राजा साहब खुद ये कहें कि उन्हें किसी कैंडिडेट से कुछ पर्सनल मुलाकात करनी है तो यहाँ किसी को आपत्ति नही होगी। अगर आप नही चाहती तो हुकुम या मैं आपका परिचय नही देंगे।”

  बाँसुरी ने हां में सर हिलाया और एक उड़ती सी नज़र वापस अपने दोस्तों पर डाली इस बार शेखर उसे और समर को ही देख रहा था। ये और बात थी कि बाँसुरी के उसकी तरफ देखते ही वो दूसरी तरफ घूम गया लेकिन कुछ देर बाद जैसे ही बाँसुरी वापस समर से बात करने लगी वो एक बार फिर उसे ही देखने लगा।

   बाँसुरी एक एक कर हर किसी का हाल समाचार पूछती रही और समर बताता रहा। इतने दिनों से उसे महल की कोई खबर नही मिली थी जैसे वहाँ से निकलते ही सभी ने उससे पल्ला झाड़ लिया था ।

  ” महल में से किसी ने ना मुझे रोकने की कोशिश की और ना ही कभी मेरा हाल जानने के लिए कोई फोन किया!”

  बाँसुरी की बात पर समर भी परेशान हो उठा

  ” आपको रोकने के लिए ही तो मैं रूपा भाभी सा और जया भाभी सा भागते चले आये थे लेकिन उस वक्त आप बेहद गुस्से में थी। हाँ फ़ोन की जो बात है वो ये है कि जिस किसी ने महल से आपको फोन लगाया उसे आपकी तरफ से गलत ही जवाब मिला।

  ” पर मुझे तो किसी का फ़ोन नही आया।”

  बाँसुरी के इस तरह चौन्कने पर समर उसे देखने लगा कि तभी जैसे बाँसुरी को कुछ याद आया

  ” समर सा महल से निकल कर रायपुर पहुंचने तक ही फ़ोन मेरे पास था, उसके बाद शायद मैं ट्रेन में ही भूल गयी थी। मैं बस उसी दौरान उन्हीं कुछ घण्टो की बात कर रहीं हूँ। उस दौरान मुझे किसी ने फ़ोन नही किया, आपके हुकुम ने भी नही।”

  “बाई सा ठीक से याद कर के बताइये क्या ट्रेन में आपने अपना फोन उपयोग किया था। मेरा मतलब है किसी को आपने फ़ोन लगाया या किसी का आया था क्या?”

  “नही मैंने तो किसी को नही लगाया। पापा को लगाना चाहती थी लेकिन वो परेशान हो जाएंगे ये सोच कर उन्हें भी नही लगाया।”

   समर कुछ देर सोचता रहा फिर मुस्कुरा उठा

  ” बाई सा आपका फोन ट्रेन में नही बल्कि महल में ही छूट गया था। इसलिए आपके महल से निकलते ही जिस किसी ने भी आपके फ़ोन में आपसे बात करने की कोशिश की वो सफल नही हो पाए। और सिर्फ इतना ही नही आपका फ़ोन किन्ही गलत हाथों तक भी पहुंच चुका था इसलिए आपके फ़ोन का दुरुपयोग भी किया गया है लेकिन आप जैसी शिक्षित महिला से मुझे ये उम्मीद नही थी। अगर आपका फ़ोन खो गया था तो आपने अपना फ़ोन ढूंढने की कोशिश क्यों नहीं की ? फ़ोन की गुमशुदगी दर्ज तो करवानी थी। आखिर आप रानी साहेब हैं कोई आपके फ़ोन का क्या क्या उपयोग कर सकता है आप सोच भी नही सकतीं।”

  बाँसुरी कुछ सोचती खड़ी रह गयी। शायद समर सच ही कह रहा था वो तो सच उस रात महल से निकलने के बाद से अगले दिन तक अपना फ़ोन ही देखना भूल गयी थी।
   उसे तो अपने मायके पहुंचने के बाद अपने फ़ोन का ख्याल आया था और उसने अपनी माँ के फ़ोन से अपने फोन पर रिंग भी किया था। एक बार पूरी रिंग जाने के बाद भी किसी ने उठाया नही और दुबारा फ़ोन लगाने पर फ़ोन बंद आने लगा था। इस सब के बाद वो अपने गम में ऐसी डूबी थी कि फोन भूलभाल गयी थी।
  खैर समर के कहने पर वो भी बाकी सारी बातें भूल समर के साथ राजा के पास जाने को तैयार थी। समर ने इसके बाद एक कॉल कर उसके वहाँ से बाहर जाने की अनुमति भी ले ली थी और ड्राइवर को फ़ोन कर उसने गाड़ी वहीं बुला ली थी।
    बाँसुरी अपने दोस्तों से कुछ कहने की स्थिति में उस वक्त थी भी कहाँ वो चुपचाप गाड़ी में बैठ गयी थी।

    गाड़ी में अंदर घुसते ही उसकी नज़र पास ही बैठे राजा पर पड़ गयी और उसका दिल एक बार फिर वैसे ही धड़क उठा जैसे उससे पहली बार मिलने पर धड़का था।
   उसने सोचा भी नही था कि गाड़ी में राजा बैठा होगा। वो तो यही सोच रही थी कि होटल पहुंचने पर राजा से क्या और कैसे कहेगी। इतने दिनों बाद उसे देखने पर उससे उसे क्या क्या सवाल जवाब करने हैं। इतने दिनों दूर रहने का सारा हर्जाना वसूलना है। इतने दिन उसके बिना राजा क्या करता रहा? कैसे जीता रहा? क्यों एक बार भी उससे मिलने नही आया।
  आखिर उसके बिना राजा का मन लग कैसे गया। अगर वो इतनी नाराज़ हो भी गयी तो एक बार आकर उसे बांहों में भर लेता तो क्या वो मान नही जाती फिर उसने ऐसा कुछ क्यों नही किया।
   अब आज जब वो जी तोड़ मेहनत कर प्रशासनिक अधिकारी के पद के लिए चुन ली गयी तब उसे उसके कर्तव्यपथ से डिगाने चला आया।
   उफ कितना कुछ सोच लिया था बाँसुरी ने जब वो समर से बातें कर रही थी लेकिन गाड़ी में अपने बगल में बैठे राजा को देखते ही जैसे उसकी जिह्वा को काठ मार गया था। उसके बैठते ही ड्रायवर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी थी और वो राजा से क्या कहे क्या ना कहे सोच में डूबी उसे देखती रह गयी थी। वो भी तो उसे ही देख रहा था।

  ” कैसी हो बाँसुरी ?”

  उसके मुहँ से अपना नाम सुनते ही अंदर कुछ पिघलने लगा था…..
   ऐसा लगा झट आगे बढ़ उसके सीने से लग जाये और इतने दिनों से अपने दिल में छिपा रखा सब कुछ आंसूओं में बहा दे लेकिंन उसने बिना कुछ कहे चुपचाप नज़रे झुका ली थी

   ” जवाब नही दिया तुमने, कैसी हो?”

   ऑंसू भारी आंखें ऊपर उसके चेहरे पर टिकाये वो खामोशी से उसे देखती रही।

  ” ठीक हूँ…… आप कैसे हैं?”

  ” कैसा दिख रहा हूँ? कैसा हो सकता हूँ तुम्हारे बिना ? तुम खुद सोच लो, खुद देख लो।”

   सामने बैठे ड्राइवर के कानों में भी तो ये सारी बातें पड़ रही होंगी सोचती बाँसुरी चौन्क कर सामने ड्राइवर को देखने लगी ।
   राजा के इशारे से ये पूछने पर की क्या हुआ उसने इशारे से ड्राइवर की ओर इशारा कर दिया ।
    राजा इतनी गहन गंभीर चर्चा के बीच ज़ोर से खिलखिला कर हँस पड़ा और अपनी सीट और ड्राइवर के सीट के बीच लगे पारदर्शी कवर पर उंगली रख बाँसुरी को दिखा दी

  ” इस कवर के कारण उसे हमारी बातचीत नही सुनाई देगी , चिंता मत करो ।”

   बांसुरी के सुकून से गहरी सांस भरते ही राजा को शरारत सूझने लगी। आखिर इतने दिनों बाद उसकी प्रियतमा उसके साथ थी। वही प्रेयसी जिसके लिए वो अपनी रियासत तक छोड़ने को तैयार था, वही जिसकी कस्तूरी की तलाश में वो दिन दिन भर उसके ना रहने पर उसकी आलमारी खोले उसकी टँगी साड़ियां और पोशाकों में उसे ढूंढता फिरता था। उसकी ड्रेसिंग पर उतार कर छोड़ी चूड़ियां हों या उसका पर्स हर चीज़ को उसने वैसे ही रख छोड़ा था जैसे अपनी बाँसुरी को उसने इन सामानों में संभाल रखा हो।
       उस शाम पार्टी में जाने से पहले बाँसुरी ने साड़ी की ज़री में बार बार फंसती जाती अपनी सुनहरी पायल को भी उतार दिया था, और उसकी जगह एक पतली सी नग लगी पायल पहन ली थी।
    वही उतार कर छोड़ी हुई सुनहरी पायल हाथ में लिए जाने कितनी जागती रातें उसने आंखों ही आंखों में काट ली थीं।
    आज बाँसुरी को अपने करीब पाकर उसका दिल खुद उसके काबू में नही था। इतने दिन से धरा संयम का दुर्ग ढहने को था।
    बाँसुरी की तरफ देख वो मुस्कुरा उठा

  “बड़ी चैन की सांस ली जा रही है..”

  ” हां तो! अच्छा लगता है क्या कोई और हमारी पर्सनल बातें सुन ले।”

  ” तो हमारी हुकुम को ड्राइवर के सामने बातें करने में शर्म आ रही है।”

  बाँसुरी ने नही सोचा था कि राजा इतनी जल्दी सामान्य हो जाएगा। वो भले ही गुस्से में वहाँ से निकली और राजा को उसे मनाना चाहिए था लेकिन इतने दिन उसने भी तो पलट कर राजा की कोई खोज खबर नही ली ऐसे में राजा की उससे नाराज़गी भी तो जायज़ थी।
   लेकिन राजा पहले भी जितना साफ स्वछ हृदय था आज भी बिल्कुल वैसा ही था।
   तभी तो वो उसे भोले भंडारी कहा करती थी। देखा जाए तो राजा था भी वैसा ही। आज भी उसने बाँसुरी से कोई नाराज़गी नही दिखाई उल्टा तुरंत ही उसकी बेवकूफी के लिए उसे माफ भी कर दिया

  ” साहेब !!! ”

  इतने दिनों के बाद राजा के लिए ठेठ राजपुताना  सम्बोधन कहते हुए वो वापस सकुचा उठी

  ” मुझे माफ़ कर दो।” भर्राए गले और आंसूओं से भरी आंखों से इससे ज्यादा कुछ भी बाँसुरी नही कह पायी। राजा ने उसे अपनी तरफ खींच  गले से लगा लिया ।
वो उसके सीने से लगी रोती रही और वो उसके बालों पर हाथ फिराते बैठा रहा।
    सवाई पहुंच कर वहाँ पोर्टिको में कार लगभग पंद्रह मिनट खड़ी रही।

   ” हुकुम होटल आ गया है ..” नीची नज़रे किये ड्राइवर ने धीरे से कवर पर अपनी हथेली से थाप दी और बाहर निकल आया

  ड्राइवर की आवाज़ सुन राजा ने बाँसुरी को खुद से अलग किया और उसकी तरफ अपना रुमाल बढ़ा दिया।
   ऑंसू पोंछ बाँसुरी चुपचाप गाड़ी से नीचे उतर गयी। गाड़ी के बाहर खड़ा समर उन लोगों से पहले वहाँ पहुंच उन्हीं का इंतज़ार कर रहा था।
      समर के पीछे राजा का हाथ थामे बाँसुरी भी आगे बढ़ गयी।
   अब तक अपनी पहचान छुपाए रखने वाली बाँसुरी को आज दीन दुनिया किसी की फिक्र नही थी।

    अपने रॉयल सुईट में पहुंचने के बाद तीनों साथ ही अंदर चले गए ।
     सबके लिए चाय बोलने जा रहे समर को राजा ने टोक दिया

  ” हमारी हुकुम कॉफी वाली हैं समर।”

  ” जी हुकुम मैं भूल गया था, आप क्या लेंगे वैसे? “

  “हम भी वही ले लेंगे जो हमारी शरीके हयात लेंगी। यार समर बड़े दिनों से मन से कुछ खाया पिया भी नही है ऐसा करो कुछ एकदम ही अनहेल्दी सा मंगवा लो जैसे पकौड़े ?”

   राजा बार बार बाँसुरी की ओर देख कर ही बोल रहा था और वो समर के सामने राजा के ऐसे देखने से शरमा कर रह जा रही थी। धीरे से उसने भी अपने मन कि कह ही दी

   ” पकौड़ों के साथ तो चाय ही अच्छी लगेगी कॉफी नही।”

  हां में सर हिला कर समर फ़ोन पर ऑर्डर देने लगा , राजा और बाँसुरी एक दूसरे को देखते बैठे रहे।
  ऑर्डर देकर वो भी उन दोनों के पास ही चला आया

” मैं जानता हूँ इस वक्त मैं आप दोनों को यहाँ बहुत खल रहा हूंगा लेकिन कुछ ज़रूरी बातें हैं जिनका खुलासा होना ज़रा ज़रूरी है उसके बाद मैं तुरंत चला जाऊंगा।”

  ” नही नही ऐसी कोई बात नही समर सा ! आप यहीं बैठे हमारे साथ। मुझे तो कोई एतराज नही।”

   बाँसुरी समर की बात सुन कुछ ज्यादा ही हड़बड़ा कर बोल बैठी और समर मुस्कुरा कर नीचे देखने लगा

   ” इनकी बातों को ज्यादा गंभीरता से लेने की ज़रूरत नही है समर।” राजा  एक बार फिर पहले वाला शरारती राजा बन बैठा था। बात बात पर बाँसुरी को छेड़ने वाला राजा। उसे इतने दिनों बाद इतना खुश देख समर भी अंदर से बहुत खुश था

  ” वैसे देख रहा हूँ एक दूसरे के बिना आप दोनों का ही खाना पीना एकदम ही छूट सा गया था।” उसने सामने सर्व की हुई प्लेट राजा और बाँसुरी की ओर बढ़ा दी , अपनी चाय उठाये वो अब थोड़ा गंभीर होने लगा

   ” हुकुम मुझे लगता है रानी साहेब का फ़ोन महल में ही छूटा था और इनका फ़ोन हो ना हो केसर के पास ही था।”

  केसर का नाम आते ही बाँसुरी का मन खट्टा हो गया , उसके चेहरे से ये नज़र भी आने लगा । उसे एक नज़र देख समर ने राजा से उसका फोन मांगा और उसमें से बाँसुरी के भेजे कुछ मेसेज उसने बाँसुरी के सामने कर दिए।
   उन्हें देखते ही बाँसुरी के माथे पर शिकन चली आयी, वो वापस राजा की तरफ देखने लगी

  ” मुझ पर विश्वास कीजिये साहेब ,मैंने ये मेसेज नही भेजे हैं।”

  “मैं जानता हूँ बाँसुरी “

   राजा के इस आश्वासन के बाद समर बोल पड़ा

  ” लेकिन आप ये नही जानते कि ये मेसेज भेजे किसने हैं ? “

  ” तुम्हारा इशारा केसर की तरफ है ना समर? मुझे भी उस शाम जब केसर मेरे कमरे में आई मुझसे काफी सारी बातें कर रही थी तब उनके बात करने के ढंग से इस बात पर ध्यान गया भी की इन संदेशों में लिखी बातें बिल्कुल वैसी हैं जैसी बोली केसर की है।”

” जी हुकुम ! पहली बात रानी साहेब खुद के लिए “हम” नही “मैं” कहतीं हैं उनके लिए हम का मतलब है वो और आप जबकि इन संदेशों में लिखने वाली ने खुद को ही हम कहा है।”

  ” हां समर ! और इससे बड़ी बात ये है कि बाँसुरी कभी प्रेम के लिए नौकर ये संबोधन प्रयोग नही कर सकती। वो तो हमेशा प्रेम को प्रेम भैया कहा करती थी। मेरा ध्यान इन बातों पर गया था लेकिन एकाएक किसी पर बिना सबूत इल्ज़ाम लगाना भी तो सही नही है ना।”

  ” जी हुकुम आप सही कह रहे।”

  उन दोनों की बातें सुनती बैठी बाँसुरी गहन आश्चर्य में थी कि उसके पीठ पीछे केसर इतना कुछ करती चली जा रही थी और वो अपने ही पति की तरफ से आंखे मूंदे वहाँ इतनी दूर पढ़ने में लगी थी। उसके चेहरे पर खींची आश्चर्य की रेखाओं को पढ़ समर फिर बोलने लगा।

  ” सिर्फ इतना ही नही रानी साहेब अभी तो आप बहुत कुछ नही जानती।
   आपको रात में दिए जाने वाले दूध में राजमहल में किसी के द्वारा एक दवाई मिलवाई जा रही थी…”

बाँसुरी अब तक उस बात से अनभिज्ञ थी कि राजा ये जानता है । समर के मुहँ से ये सुनते ही वो आश्चर्य से राजा की ओर देखने लगी। राजा ने आंखों से ही उसे दिलासा दिया और वापस समर की ओर देखने लगा।

  ” उस दवा के पीछे भी इसी केसर का हाथ है। उसकी पहुंच राजमहल में बहुत अंदर तक है। जाने कितने नौकर चाकर उसने अपनी तरफ मिला रखे हैं। पहले पहल हम लोगों को आपकी सेविका मेनका पर शक हुआ तब मैंने उसके घर और उस पर नज़र रखवानी  शुरू कर दी। मुझे पूरी तरह विश्वास हो गया कि मेनका बेकसूर है तब मैंने उससे जब कड़ी पूछताछ की पर उस में भी वो कुछ नही बता पायी । मुझे पहले ही पता था कि वो कुछ नही जानती लेकिन तब भी उसे सजा के तौर पर नौकरी से निकाल हमने उसे उसके गांव भेज दिया।
   हुकुम से मैंने इस बारे में बात कर ली थी। असल में जो लोग सच मे इस काम के पीछे थे मैं उन्हें ये विश्वास दिलाना चाहता था कि उनके फेंके जाल में हम फंस चुके हैं।
  मेनका के वहाँ से जाते ही जो नई सहायिका सुगन्धा आपकी सेवा में आई पहले भी वही मेनका से रसोई में छिप कर आपकी दूध में दवा मिलाया करती थी।
  सुगन्धा केसर का भेजा मोहरा ही थी, जिस पर शक होने पर जब मैंने उसे पकड़ना चाहा तो केसर ने उसे मरवा दिया।
  

  ” पर समर इस सब के बीच मुझे आज तक ये बात समझ में नही आई कि आखिर तुम केसर से शादी के लिए तैयार क्यों हो।”

  इतने सारे खुलते राजों के बीच सबसे चौकाने वाला राज़ यही था। बाँसुरी आश्चर्य से फिर समर को देखने लगी

  ” हुकुम क्योंकि इतने सारे तिकड़म करने वाली केसर के गुनाहों का हिसाब रखना है और दूसरी बात इतने दिनों में मैं ये भी समझ गया हूँ कि इस सारे मसले के पीछे अकेली केसर नही है।
   केसर असल में किसी का फेंका मोहरा बस है, इसके पीछे किसी और का हाथ है। बस जिस दिन वो चेहरा सामने आ गया केसर के साथ साथ उसका भी सफाया हो जाएगा।”

  ” आप क्या सच में केसर से शादी करने वाले हैं समर सा।?”

  बाँसुरी के चिंतित सवाल पर समर एक हल्का सा कहकहा लगा उठा

  ” नही बाई सा!  केसर मुझसे इतना परेशान है और आगे हो जाएगी कि मंडप पर पहुंचने से पहले ही दुल्हन दूल्हे से डर के भाग जाएगी। चलिए आप लोगों का बहुत समय ले लिया। अब आप लोग बातें कीजिये मुझे ज़रा ज़रूरी काम से जाना है। कल सुबह आपको भी एकेडमी लौटना होगा आखिर?”


   मुस्कुरा कर उन दोनों को बड़े अदब से प्रणाम कर समर बाहर निकल गया। जाते जाते बड़े शरारती अंदाज़ में उसने दरवाज़े के पास बने केबिनेट से डू नॉट डिस्टर्ब का टैग भी उठा लिया। उसके बाहर निकलते ही बाहर खड़े दो लड़कों को उसने होटल स्टाफ समझ लिया और उनमें से एक को अंदर किसी को भी जाने ना देने की ताकीद कर वहाँ से निकल गया।

   समर के वहाँ से जाते ही बाँसुरी वापस राजा की तरफ मुड़ गयी

  ” ये समर सा क्या कह गए मुझे सुबह एकेडमी लौटना है?”

” हां तो क्या गलत कह गए समर सा?” राजा मुस्कुराने लगा

  ” नही साहेब! मुझे अभी ही लौटना होगा वरना वहाँ सब क्या सोचेंगे।”

  ” जो सोचना है सोचने दो। और अब तो सब को अपना परिचय दे ही सकती हो।”

  बांसुरी को कुछ सोच में डूबा देख राजा उसके पास चला आया

  ” क्या हुआ? कोई तकलीफ है?”

” हां ! मुझे ऐसा लगता है अपना रॉयल परिचय वहाँ देते ही मैं उन लोगों के लिए कोई आम लड़की नही रह जाऊंगी। और उन दोस्तों की नज़र में आम से खास बनने के बाद का परायापन मुझे बहुत खलेगा। हालांकि अब मैं वाकई अपना परिचय दे सकती हूँ लेकिन…

  बाँसुरी की बात आधे में ही काट राजा बोल पड़ा

   ” मुझे किसी बात की कोई इनसिक्योरिटी नही है हर हाइनेस! आप चाहें तो अपनी ट्रेनिंग पूरी कर लीजिये।”

   बाँसुरी का चेहरा ही नही आंखें भी मुस्कुरा उठी

  ” तुम सच में राजा हो साहेब रियासत ही नही मेरे भी । अब ये बताओ इतने दिन मेरे बिना कैसे रहे?”

  ” बताऊंगा सब बताऊंगा पहले पास तो आओ।”

  शर्माती मुस्कुराती बाँसुरी ज़रा दूर सरक गयी

  ” ये क्या बात हुई मैंने पास बुलाया तो तुम और दूर चली गईं।”

  ” आप खुद भी आ सकतें हैं मेरे पास।”

  ” ओह्ह तो ये बात है फिर सोच लेना तुम्हारा क्या होगा?

  ” वो सब छोड़िए पहले मेरी बातों का जवाब दीजिये राजा साहब! आखिर क्या किया इतने दिन? क्यों मुझे मनाने नही आये?  मैं तो चलो पढ़ने में किसी तरह खुद को भुलाए बैठी थी लेकिन आप क्या कर रहे थे…

   बाँसुरी को देखता राजा मुस्कुरा उठा

  “सबसे पहली बात तुम्हें मनाने इसलिए नही आया क्योंकि मैं जानता था तुम महल में रह कर नही पढ़ पाओगी इसलिए तुम्हारे महल से जाने पर मैं तुम्हे वापस बुलाने नही आया।”

  ” अच्छा तो मतलब आपको मेरी कोई फिक्र नही थी, इसका मतलब?”

  ” किसने कहा मुझे आपकी फिक्र नही थी हुकुम! मैंने तो आपके लिए सिक्योरिटी गार्ड भी भेज रखा था आपके साथ। ”

  ” सिक्योरिटी गार्ड? लेकिन कौन मुझे तो नही दिखा।”

“सब बताता हूँ , ज़रा सब्र तो करिये हुकुम। सारे साल भर की बातें आज रात ही करनी हैं क्या? असल में मैं खुद चाहता था तुम प्रशासनिक अधिकारी बनो ये मंशा तो मैंने शादी से पहले ही ज़ाहिर की थी लेकिन तुम नही मानी फिर जब यहाँ से रूठ कर गयी तब मुझे लगा अब मेरे ऊपर की नाराजगी को भुलाने ही सही तुम पढोगी ज़रूर। इसलिए तुम्हारे पिता तुम्हारी ताई को मनाया फिर रतन से कह कर तुम्हारे पास सारे कोचिंग के नम्बर और नोट्स भिजवाए। और इस सब के बाद तुम्हारे पिता के द्वारा ही हरि सर से कह कर उस कक्षा के सबसे पढ़ाकू लोगों की संगत तुम्हारे लिए तैयार करवाई और रिज़ल्ट आज तुम्हारे सामने है।
    बल्कि मैं तो खुद तुम्हारे दोस्तों शेखर रिदान और लीना से मिल कर शुक्रिया करना चाहता हूँ।”

  बाँसुरी की आंखें आश्चर्य से फैलती चली गयी…

  ” मेरा सिक्योरिटी गार्ड कौन है?”

   बाँसुरी सशंक नेत्रों से राजा को देखने लगी।

  ” सब बता रहा हूँ बाबा एक एक कर के…कहते हुए राजा ने बाँसुरी को अपनी बाहों में भर लिया…..

क्रमशः

  aparna..

  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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