जीवनसाथी-80

      जीवनसाथी




  
…….

      एक दूसरे की बाहों में समाने के बाद ना बाँसुरी के पास पूछने को कुछ बाकी रहा और ना राजा के पास कहने को…
    अब तो बातें आंखों की आंखों से , हाथों की उंगलियों से , साँसों की साँसों से हो रहीं थीं।
  पिघलती गर्मियां बरसते सावन ठिठुरती सर्दियां सारे ही मौसम दोनो से एक दूसरे से बिछड़ने का हिसाब ले रहे थे जैसे….

      एक दूजे में खोए राजा और बाँसुरी अपनी ही दुनिया में थे। उनकी अपनी दुनिया से वापस भी पहले  बाँसुरी ही आयी…

  “साहेब!

  ” हम्म “

  ” सुन रहे हो ना!”

  ” कुछ बोलोगी तब तो सुनूंगा।”

   ” ये तो बता दो की मेरा बॉडीगार्ड कौन है।”

  ” बहुत जल्दी है जानने की?”

” हां लेकिन उससे भी अधिक उत्सुक मैं ये जानने के लिए हूँ कि आखिर मुझे मेरे साहेब खुद से दूर रख कर पढ़ाना क्यों चाहते थे?”

  “असली बात तो अब पूछी है हुकुम ने।”

   राजा मुस्कुराते हुए उठ कर पलंग से टेक लगाए बैठ गया।
  उसके बैठते ही बाँसुरी उसकी गोद मे सर रखे वहीं किनारे लेट गई…

  ” जब तुमसे पहली बार मिला तभी से तुम्हें चुन लिया था खुद के लिए लेकिंन तुम्हारी मर्ज़ी नही मालूम थी। फिर जब ये मालूम चला कि तुम भी मेरे लिए कुछ वैसा ही सोचती हो जैसा मैं तुम्हारे लिए तब किसी शक शुबहे की कोई गुंजाइश ही नही रही।
   अब हम दोनों ने तो एक दूसरे को पसंद कर लिया था लेकिन शादी के लिए जरूरी था हमारे घर वाले भी हमें पसंद करें मॉम का स्वभाव शुरू से ही मैं जानता था उन्हें अपने राजपूत होने पर अपने कल्चर पर अपनी सभ्यता पर बहुत नाज है उनके सामने जब पहली बार तुम्हें खड़ी देखा तो एक पल को लगा कहीं मेरे महल में मेरी बांसुरी खोकर ना रह जाए।
    यह मत सोचना कि तुम में कोई भी कमी है । तुम में कोई कमी नहीं है बांसुरी, ना पहले थी। तुम पूरी तरह से मेरी बराबरी पर हो लेकिन मुझे यह लगने लगा कि अगर तुमने खुद अपनी कोई पहचान नहीं बनाई तो मेरे महल में रहते रहते कहीं तुम अपना अस्तित्व ना भुला दो कहीं तुम मेरी  परछाई मात्र ना रह जाओ। मॉम को भी जानता हूं मैं ।
     मैं समझता था कि वह मौके बे मौके तुम्हें टोक सकती हैं, हो सकता है कभी किसी मौके पर तुम्हें उनका उलाहना ताना भी सुनना पड़ा हो…इसीलिए मैं शुरू से यह चाहता था कि किसी भी तरह की मनो ग्रंथि पालने से अच्छा है कि तुम अपनी एक अलग पहचान बना लो।
    अपने पिता की कन्या होने से अलग तुम्हारी खुद की एक पहचान हो! मेरी पत्नी होने से अलग तुम्हारी खुद की पहचान।
   तुम्हारी काबिलियत पर भरोसा तो था ही क्योंकि तुमसे मिलने से बहुत पहले से ही पिंकी से तुम्हारे चर्चे सुन चुका था कि कैसे तुम उसकी तैयारियों में रात रात भर जाग कर पढ़ने में उसकी मदद किया करती थी, अक्सर उसके नोट्स बनाया करती थी, उसे चीज़े याद करने में उसका हाथ बंटाया करती थी।
    सच कहूं तो प्यार तो मुझे तभी हो गया था तुमसे! तुम्हें बिना देखे बिना मिले ही इसलिए जब पिंकी ने एक बार कहा कि भाई मुम्बई आ जाओ मैं भी तुम्हें एक झलक देखने ही मुम्बई पहुंच गया था।
    ट्रेन में तुमसे पहली मुलाकात में ही टिकट्स के ब्लंडर पर जब तुमने अपना टिकट मुझे दिखाया तो उसमें तुम्हारा नाम पढ़ कर ही मैं समझ गया था कि तुम ही पिंकी की दोस्त बाँसुरी हो।
   क्योंकि रायपुर में रहने वाली मुम्बई में जॉब करने वाली तेईस साल की बाँसुरी तिवारी आखिर कितनी होंगी। ये इतेफाक तो हो नही सकता ?
      तो इस तरह मुझे मेरी बाँसुरी पर पूरा यकीन था कि वो प्रशासनिक में जा सकती है। और पिंकी की जिस तरह से तुम सहायता करती थीं इससे शायद तुम्हारे दिल में भी कहीं न कहीं दबी छिपी एक चाह तो थी ही।
          मैं सच कहूं तो मुझे तुम कहीं किसी कोण से भी मुझसे कम नही लगीं लेकिन महल में कहीं किसी की बातें या स्वभाव तुम्हें दुखी ना कर बैठे इसी से मैं ये चाहता था कि मेरी बाँसुरी जिलाधीश बने।
   मैं भले ही रियासत का राजा हूँ लेकिन ये रियासत और ये पद मुझे मेरे जन्म के कारण मिला जबकि तुम्हें पूरे जिले की बागडोर संभालनी होगी और वो  तुमने अपनी मेहनत से अर्जित की है।
   तो अब  तुम तो खुद अपने दम पर हुकुम बन चुकी हो। अब महल में किसी की हिम्मत नही होगी तुम्हें राजपूत ना होने की या रॉयल ब्लड ना होने के ताने देने की….

    बाँसुरी राजा को देखती बैठी थी, उसकी आँखों से आंसू की मोटी मोटी बूंदे गिर रही थी, वो राजा के सीने से लग गयी

   ” क्यों इतने अच्छे हो ? क्या दुनिया के सभी पति ऐसे होते होंगे। नही बिल्कुल नही……
…. साहेब !!! तुम राम हो मेरे !! वो भी पुरुषोत्तम थे तुम भी कुछ कुछ वैसे ही हो। हो ना।”

   ” पागल बच्चा!” राजा ने बाँसुरी के माथे पर एक हल्की सी चपत लगा दी

   ” भगवान से भी कोई तुलना होती है कभी?”

   ” मेरे तो भगवान ही हो। सच में दिल से तुम्हारे पैर छूने का दिल करता है। ”

  ” बस बस मैडम,  अब सारी तारीफ आज ही कर लोगी क्या ?”

  ” साल भर की बातें हैं,वक्त तो लगेगा ही।”

   ” हम्म लेकिन पहले मेरी एक ज़रूरी बात सुनो बाँसुरी।”

  “कहो साहेब!”

   ” मैंने एक निर्णय लिया है … बल्कि कहना चाहिए कि ऐसा निर्णय लेने की सोच रहा हूँ लेकिन तुम मेरी रियासत की रानी साहेब हो इसलिए तुमसे पूछे बिना और तुम्हारी इजाज़त के बिना किसी निष्कर्ष पर नही पहुँचूँगा।”

   “बोलो ?”

   ” मैंने राजगद्दी विराज को सौंपने की सोची है। अभी तुम्हारी ट्रेनिंग खत्म होने में भी लगभग डेढ़ दो साल लग ही जायेगा। तब तक तुमसे भी बार बार मिलने आना ही पड़ेगा … मन तो मानेगा नही मेरा।
   दूसरी बात विराज को हर तरह से समझा कर देख लिया , अब यही एक उपाय बचता है कि उस पर रियासत की ज़िम्मेदारी डाल दी जाए।
   तुम क्या कहती हो ? क्या मेरा निर्णय सही है?”

   ” सच कहूँ तो आपका निर्णय सही नही है साहेब! क्योंकि जिस रियासत को आप संभालते आ रहें हैं उसे कोई और संभाल ही नही पायेगा क्योंकि जनता आप से दिल से जुड़ी है और आपका गद्दी से हटना जनता को दुखी कर जाएगा ऐसे में विराज को जनता का गुस्सा भी झेलना पड़ेगा।
    एक और बात मुझे नही लगता कि विराज में अभी भी इतनी परिपक्वता आयी है कि वो इतना बड़ा भार उठा सके।
   लेकिन मेरे दिल की कहुँ तो मैं पूरी तरह से आपके समर्थन में हूँ क्योंकि ये रियासत और ये रियासत की जनता ये ही तो मेरे और मेरे साहेब के बीच की दीवार बनी जाती है। अगर आप गद्दी छोड़ दें तो आपका पूरा समय और आप पूरी तरह मेरे हो जाएंगे।”

   बाँसुरी अपनी बात पूरी करती राजा के गले से झूल गयी, राजा ने उसे बाहों में कस लिया…

  ” मैं तो आप ही का हूँ हुकुम ।”

   ” साहेब!!”

  ” हम्म !”

   ” यहाँ कब तक हैं आप ? “

   ” भगाना चाहती हो?”

  ” नही !! रोकना चाहती हूँ।”

  “अच्छा जी ! कब तक!”

  ” इस रविवार को आपका जन्मदिन है। मैं चाहती हूँ आपके जन्मदिन पर हम सारा दिन साथ रहें।

   राजा ने मुस्कुरा कर हामी भर दी। रात में ही वापस लौट जाने की इच्छा रखने वाली बाँसुरी का ध्यान भी नही गया कि कब बातों बातों में रात बीत भी गयी…
   राजा का फोन बजने से दोनो का ध्यान फ़ोन पर चला गया। फ़ोन समर का था…

  ” हुकुम सुबह के पांच बज रहें हैं, रानी साहेब को एकेडमी छोड़ने जाना होगा, उनका सुबह छै बजे से सेशन शुरू हो जाएगा।”

  छोटा सा हां बोल कर राजा ने फ़ोन वापस रख दिया। राजा के बताते ही बाँसुरी घबरा कर तुरंत वापस जाने को तैयार हो गयी

   ” देखा आपके चक्कर में सब भूल जातीं हूँ मैं। ”
  
   राजा को मुस्कुराते देख वो भी मुस्कुराने लगी

  ” क्या हुआ ? अब ऐसे मुस्कुरा क्यों रहे हो?”

  “देख रहा हूँ मेरी बाँसुरी सैंडविच बन गयी है मेरे और अपने प्रोफेशन के बीच। पर चिंता मत करो, अब तुम्हें डिस्टर्ब नही करूँगा।”

   दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाती बाँसुरी वापस आकर उसके सीने से लग गयी

  ” मुझे डिस्टर्ब करना ,बार बार करना। अब तो वैसे भी रियासत विराज को सौंप रहे हो तो यही आ जाना रहने, प्लीज़! ”

   ” ठीक है हुकुम! अब चलें तुम्हें छोड़ दिया जाए वरना पहले ही दिन डिटेन हो जाओगी।”


    एकेडमी गेट पर कार के अंदर राजा से गले लग बाँसुरी की आंखें एक बार फिर भीग गयी। कार से उतरते उतरते वो वापस राजा की तरफ मुड़ गयी

  ” साहेब !! एक बात तो बताई ही नही आपने।”

  “कौन सी बात?”

  “मेरा बॉडीगार्ड कौन है?”

   राजा ने मुस्कुरा कर बाँसुरी को दरवाज़े की तरफ मोड़ दिया…

   “जाओ गेट के अंदर तुम्हारा जवाब तुम्हारा इंतेज़ार कर रहा है!”

   ” बातें घुमाने में आपका कोई मुकाबला नही राजा साहेब!”

   मुस्कुराते हुए बाँसुरी एकेडमी के भीतर चली गयी।
बड़ी अधीरता से तेज़ कदमों से एक तरह से भागते हुए ही वो अपने कमरे की ओर जा रही थी कि उसे लीना और शेखर एक साथ दिख गए, उन दोनों को देखते ही उसे राजा की कही बात याद आ गयी….

   ” ओह्ह तो साहेब ने शेखर को भेजा था मेरा बॉडीगार्ड बना कर। हम्म तभी तो महल से निकलने के बाद से इस ने कहीं पीछा नही छोड़ा।”  मन ही मन अंदाज़ा लगाती बाँसुरी  पहली बार शेखर को देख कर मुस्कुरा उठी।
    राजा की बात ही निराली थी और राजा से जुड़ी हर बात बाँसुरी के लिए खास थी। ये और बात थी कि बाँसुरी की मुस्कान से शेखर के दिल में जो फूल खिले उन्होंने उसे नखशिखान्त महका दिया था।
    बात बात पर बाँसुरी की मदद करने को उत्सुक रहने वाले शेखर की हर हरकत का जवाब आज बाँसुरी को मिल गया था उसे यही लगा कि शेखर ही उसके लिए नियुक्त किया गया था

   ” गुड मॉर्निंग बाँसुरी जी।”

  ” गुड मॉर्निंग शेखर जी।”

  ” अरे ये फॉरमैलिटी बाद में तुम लोग पूरी करना। बाँसुरी जाओ पहले ट्रैक सूट पहन कर आ जाओ। अभी छै बजे से फिज़िकल ट्रेनिंग शुरू होनी है। उसके बाद ब्रेकफास्ट के बाद नौ बजे से एकेडमिक सेशन शुरू हो जाएंगे। एक के बाद एक पांच सेशन में फिर वक्त नही मिलेगा। जाओ फ्रेश हो लो।”

     बाँसुरी हाँ में सर हिला कर अपने कमरे की ओर भागती चली गयी…

   ” इसलिए तुझे फरजीना कहता हूँ, फ़र्ज़ी कहीं की। क्या ज़रूरत थी उसे भगाने की, पहली बार तो बंदी ने स्माइल दी थी यार,वो भी तुझसे सहन नही हुई जल्लू कहीं की।”

  “अबे ओये मुंगेरी लाल, तू अधिकारी बनने आया है या फ्लर्ट करने?”

  “फ्लर्ट नही रे , पसंद है मुझे।”

  “ओ मजनू के बाप ! चुपचाप ट्रेनिंग पर ध्यान दे। जितना हम सलेक्शन के लिए नही तपते उससे कहीं ज्यादा इस ट्रेनिंग में हमें तपाया जाएगा। समझा ऊल्लू।”

  ” यार ज़रीना तू तो बिल्कुल ऐसे अपनी फ्रेंड को प्रोटेक्ट करती है जैसे उसकी फ्रेंड नही बॉडीगार्ड है तू। एक मिनट… और कोई बात तो नही है ना।”

  ” चुप कर पागल, चल तू जॉगिंग ट्रैक पर चल मैं और बाँसुरी वहीं आ रहे।”

  ” अच्छा सुन ना ! उससे एक बात पूछ लेना कि वो राजा साहब लगतें क्या है इसके?”

” मैं क्यों पूछूं? तुझे इतनी माख लगी हैं तो तू पूछ।”

   लीना की बात पूरी होते में रिदान भी वहाँ पहुंच गया

  ”  ये तो कल ही पूछ चुका है । वहाँ राजा साहब के कमरे के बाहर एक डैशिंग सा बंदा था, वो कमरे से निकल कर कहीं बाहर चला गया तो हमारे जेम्स बांड वहीं बैठे रास्ता देखते रहे और जैसे ही वो वापस आया उसके पास पहुंच गए।”

  ” क्या ? ” आश्चर्य से लीना की आंखे चौड़ी हो गयी

  “हां और उससे पूछ ही लिया।”

   ” क्या पूछा?”

  ” यही की राजा साहब कौन हैं? और बाँसुरी को आप लोग कैसे जानतें हैं, वो हमारे साथ दिल्ली से आई हैं हमारे कोचिंग की है वगैरह वगैरह।

  ” बेवकूफ हो यार तुम दोनों पूरे के पूरे।”

   ” क्या कहा फिर समर ने मेरा मतलब सर ने ?”

   ” उनकी रियासत का नाम तो याद नही क्या बताया लेकिन ये कहा कि बाँसुरी के पिता जी राजा जी के पुराने परिचित हैं , इसीसे बाँसुरी को मिलने बुलाया है। कहा अंदर काफी सारे लोग हैं और शायद बाँसुरी के कुछ दूर के रिश्तेदार भी हैं… तब जाकर कहीं हमारे जेम्स बांड को चैन पड़ा और ये वापस एकेडमी आये।”

   बातें करते वो सभी फील्ड तक पहुंच चुके थे। बाँसुरी भी अपनी आदत के मुताबिक भागती दौड़ती सबसे अंत में वहाँ पहुंच ही गयी।

     राजा और समर वापस होटल पहुंचे ही थे कि महल से उनके लिए फ़ोन चला आया…
    फ़ोन रानी माँ का था इसलिए नकारने का सवाल ही नही उठता था…

  ” कुमार कहाँ हैं आप? जहाँ भी हों आप तुरंत वापस आइये।”

  ” क्या हुआ मॉम ? डैड की तबियत तो ठीक है ना?

  “यहाँ कुछ ठीक नही है कुमार! बस आप तुरंत वापस आइये।”

   माँ साहेब ने वापस आने पर इतना ज़ोर दिया कि राजा फिर और कुछ सोच ही नही पाया, वो तुरन्त वहाँ से महल के लिए वापस निकल पड़ा।


    राजा और समर को महल में एक रात पहले हुआ कारनामा पता नही था। उस रात तो नीम बेहोशी के कारण विराज बिना चूँ चा किये प्रेम के साथ वापस आ गया लेकिन अगले दिन होश में आते ही उसे प्रेम का करारा थप्पड़ तुरंत याद आ गया ।
    वो उसी वक्त माँ साहेब के पास पहुंच अपनी शिकायत लगा गया, हालांकि उसने प्रेम से थप्पड़ खाया है ये कहने में उसकी रही सही इज़्ज़त का भी कचरा हो जाना था यही सोच उसने सारी बातें कुछ गोल मोल तरीके से माँ साहेब को कह दीवानखाने में बैठक बुलवाने का फरमान जारी कर दिया।
    उस वक्त राजा और समर नही थे , युवराज भी एक दिन पहले ही किसी व्यापारिक सिलसिले में देश से बाहर गया हुआ था इसी से माँ साहेब ने राजा को तुरंत बुलवा लिया।
    
   बाँसुरी के लिए फ़ोन में एक संदेश ” जल्दी वापस आऊंगा ” छोड़ कर ही राजा समर के साथ निकल गया।
    जल्दी जल्दी सब करने पर भी दूरी ही इतनी थी कि उन्हें  महल पहुंचने में शाम होने लगी थी।

    प्रेम स्वभाव से ही निर्भीक था। उसने विराज के साथ जो किया उसके लिये ना उसे कोई मलाल था और ना ही कोई डर। वो वैसे भी जो भी होगा देखा जाएगा वाले हिसाबों का था इसी से सुबह से ही वो अपने काम में लगा हुआ था।
    आभास तो उसे भी था कि इस बार विराज से उसकी हाथापाई भविष्य में महल के द्वार उसके लिए बंद कर सकती है।
   रुपयों पैसों की उसे भी ऐसी कोई बहुत कमी थी नही, उसके पिता की संचित धनराशि का मूल और ब्याज ही उसके और निरमा के लिए काफी था। इसी से उसने सोच लिया था कि बात अगर ज्यादा बढ़ी तो वो अपने कारण राजा को परेशानी में डालने की जगह चुपचाप वहाँ से निरमा को साथ ले किसी नए शहर में गुज़र बसर के लिए निकल जायेगा।
     यही सब सोच रखने के कारण बिना किसी हैरानी परेशानी के वो अपना रोज़ का काम निपटाता जा रहा था।
    काम कुछ ज्यादा ही होने से वो दोपहर खाने पर भी नही जा पाया था… इसी से शाम जैसे ही घर पहुंचा निरमा ने सवालों की झड़ी लगा दी….

“दोपहर खाने पर क्यों नही आये?”

  ” काम थोड़ा ज्यादा था, अभी हुकुम और समर भी नही हैं ना तो हुकुम के ऑफिस को भी देखना पड़ता है। रोज़ की जाने कितनी अर्जियां चली आती हैं निपटारे के लिए, उन सबको देखना पढना क्या ज़्यादा ज़रूरी है और क्या कम उसी सिलसिले से उन्हें जमाना। कुछ एक अर्जेंट अर्ज़ीयों के बारे में फ़ोन में हुकुम को बता कर निपटारा भी करना होता है।”

  ” बस बस मीठी और उसकी मम्मा को ये सब समझ नही आता, मीठी बस इतना जानती है कि उसके पापा भूखे रहतें हैं तो उसकी मम्मा भी खाना नही खा पाती है।”

  ” अरे! ये क्या बात हुई भला? मैं तो वहाँ काम में व्यस्त था, भूख लगी ही नही पर तुम तो घर ही थी समय पर खा लेना चाहिए था ना।”

  ” मुझे भी भूख नही लगी”

  ” गलत बात है ये निरमा, तुम सारा दिन मीठी की देखभाल करती हो, घर की देखभाल करती हो तुम्हें समय पर खाना चाहिए समझीं।”

  ” बड़े समझदार हैं आप! आप भी तो हम दोनों की देखभाल करतें हैं फिर आपको समय पर खाना क्यों नही चाहिए। जानती हूँ हुकुम और युवराज भैया दोनो ही नही हैं वरना महल से बिना खाये आपको आने नही दिया जाता इसलिए ज्यादा चिंता हो जाती है। जाइये आप फ्रेश हो कर आइये मैं आपका खाना लाती हूँ।”

” सुनो ! अपना भी लेती आना।”

  निरमा मुस्कुरा कर रसोई में चली गयी

  ” मीठी कह रही है मम्मा पापा एक ही थाली में खा लेंगे…

   निरमा के थाली परोस के लाते तक में प्रेम भी कपड़े बदल कर नीचे आ गया, उसके आते ही मीठी उसकी गोद में चली आयी।
     थाली सामने रख दोनो बैठे ही थे कि महल से जय का फोन आ गया….

   ” प्रेम जहाँ हो जैसे हो तुरंत दीवानखाने में पहुंचो।”

    प्रेम इस बात के लिए तैयार ही बैठा था। उसकी बुलवाहट तो सुबह भी एक बार हो चुकी थी लेकिन सुबह दीवानखाने पहुंचने से पहले ही विराज को भयानक सरदर्द उठने के कारण डॉक्टर बुलाना पड़ गया था और डॉक्टर ने हैंगओवर उतारने के लिए दवा के बाद आराम की नींद लेने की सलाह दे दी थी इसी से सुबह की सभा वहीं खत्म हो गयी थी और प्रेम अपने काम पर लौट गया था।
   शाम नींद से जागते ही एक बार फिर विराज को पिछली रात का अपना अपमान याद आ गया और उसने तुरंत ही महल के सभी सदस्यों को तलब कर लिया, इत्तेफाक से उसी वक्त राजा और समर भी महल पहुंच चुके थे।
    दीवानखाने में अपने अपने आसान पर विराजमान सभी बस प्रेम के ही आने का रास्ता देख रहे थे। हालांकि उसके आने से पहले ही विराज प्रेम के लिए उल्टा सीधा बोलना शुरू कर चुका था।
      राजा विराज और प्रेम दोनो के स्वभाव से भली भाँति परिचित था। प्रेम ने वहाँ आते ही राजा के साथ साथ सभी बड़ों को प्रणाम किया…..और कोई जगह होती तो राजा आगे बढ़  प्रेम को गले से लगा लेता लेकिन राजपरिवार और उनके नियम महल में तो मानने ज़रूरी ही थे। धीरे से सर हिला कर उसका अभिवादन स्वीकार कर राजा माँ साहेब की ओर मुड़ गया

  ” कहिये मॉम ! ऐसा क्या हुआ जिसकी वजह से हमें आपने ऐसे काम के बीच से ही बुला लिया?”

” कुमार हम जानतें हैं कि प्रेम पर कुछ ज्यादा ही विश्वास है आपका लेकिन आपने उन्हें कुछ ज्यादा ही सर पर चढ़ा रखा है।”

  राजा ने आश्चर्य से रानी माँ की बात सुन समर और फिर जय की तरफ देखा , दोनों ने ही बात को जानने समझने में असमर्थता जता दी।

  ” बात क्या है मॉम ? क्या किया प्रेम ने?” अबकी बार राजा प्रेम की तरफ देख रहा था

  “इसी से क्यों नही पूछ लेते आप हुकुम! जैसे आपके सामने ये ज़बान में कुल्फी जमाये बैठा रहता है ना इतना सीधा सच्चा नही है ये आदमी।”

   विराज के ज़ोर से चीख कर कहने पर भी प्रेम चुप ही खड़ा रहा

  ” क्या हुआ है विराज ? ”

   राजा अब पूरी तरह से अधीर हो उठा था

   ” वैसे गलती तो आप की है हुकुम। आप नौकरों को नौकर जो नही समझते। आप ने ही सर चढ़ा रखा है तभी तो इसकी इतनी हिम्मत हो जाती है कि महल के राजकुमार की भी इन्सल्ट कर गया।”

  ” प्रेम ने कैसे तुम्हारी इंसल्ट की?” राजा और विराज की बातों के शुरू होने से पहले ही समर किसी को फ़ोन कर सारी बात निकलवा चुका था। उनकी चलती बातों के बीच ही वो राजा के कान में कुछ कह वहाँ से बाहर निकल गया…

  ” हम भी रियासत में कोई अधिकार तो रखतें हैं? मानते है कि नही आप ?

  ” बिल्कुल मानता हूँ, पूरा हक है तुम्हारा विराज।”

  ” फिर क्या अपनी मर्ज़ी से हम कहीं आ जा भी नही सकते। अब क्या नौकरों के हिसाब से हमें चलना होगा। ये प्रेम कौन होता है हमसे ये कहने वाला की हमें किस वक्त कहाँ होना चाहिए?

  “क्या कहा प्रेम ने? “

” हम अपने दोस्त के साथ थे, कुछ ज़रूरी मीटिंग्स थी, कारोबार के सिलसिले में हमें भी लोगो से मिलना जुलना पड़ता ही है, अब ऐसे ही किसी मीटिंग में कुछ ज्यादा ही वक्त लगता देख हमने वहीं खाना पीना भी कर लिया। अब जिस वक्त हमें ढूंढते हुए प्रेम वहाँ पहुंचा उसके कुछ देर पहले ही मीटिंग खत्म कर कुछ लोग वापस चले गए थे। अब ये जनाब उसी समय सन्नी देओल बने वहाँ पहुंचे अब इनकी ज़बान से ज्यादा तो इनके हाथ चलते हैं तो बस!!

  ” ओह्ह तो क्या प्रेम ने तुम्हें मारा ? ” राजा के इस सवाल पर विराज को अचानक सूझा ही नही की इस भरी सभा में इतने सारे लोगों के बीच ये स्वीकार कर की नशे की हालत में वो प्रेम से मार खा चुका है अपनी ही कितनी और बेइज़्ज़ती करा लेगा वो कुछ देर को चुप रह गया

  ” बोलो विराज ! क्या प्रेम ने तुम पर हाथ उठाया?”

  “इस नौकर की इतनी औकात भी है कि हम पर हाथ उठाये ?”

  अब तक में राजा को बात समझ आ चुकी थी, समर भी कान में धीरे से विराज की पिटाई का किस्सा बता ही चुका था

” बिल्कुल! आखिर आप रियासत के राजकुमार जो ठहरे, तो ये बताओ कि आखिर प्रेम ने क्या गुस्ताखी की है?”

  “इसने हमें आदेश दिया कि तुरंत महल वापस चलिए हुकुम , महल में रेखा बाई सा को आपकी ज़रूरत है।”

  ” प्रेम ने तुम्हे हुकुम कहा?”

  ” हां शायद ! ठीक से याद नही !”

  विराज की बात पर राजा हल्के से मुस्कुरा उठा

  ” रेखा को क्या तकलीफ थी, अभी कैसी है रेखा की तबियत?”

   राजा का ये सवाल रानी माँ की तरफ था लेकिन जवाब मिला रूपा से

  ” कुंवर सा आप तो जानतें ही हैं कि रेखा बाई सा के बेटे छोटे कुंवर हमेशा बीमार रहते हैं। परसों रात से उनका बुखार तेज़ होता जा रहा था, दिन भर बच्चे  की  तबियत बहुत ही ज्यादा खराब देख चिंता में रेखा को भी बुखार हो गया था, तब हमने और आपके भाई साहब ने ही प्रेम को विराज सा को ढूंढ कर लाने भेजा था, क्योंकि अगली सुबह ही आपके भाई साहब को भी बाहर जाना था आप यहां थे नही ऐसे में बच्चे की तबियत से हम सभी चिंतित हो उठे थे।
    आपके भाई साहब ने ही प्रेम को विराज सा जहाँ हो जैसे हो वहाँ से वैसे ही ले आने की आज्ञा देकर ही भेजा था, हमें नही लगता कि प्रेम ने खुद होकर कोई निर्णय लिया होगा।”

   राजा ने विराज की तरफ देखा … विराज एकदम से भड़क गया

  ” अब महल में इतने लोगो के होते हुए भी हमें हमारे ज़रूरी काम से खींच कर लाया जाएगा, क्या ये सही है? हम मानते हैं बच्चे की तबियत बिगड़ने से रेखा घबरा गई थी लेकिन हम ही आकर क्या कर लेते , हम कोई डॉक्टर तो हैं नही? जब हमें ज़रूरत है तब परिवार हमारी मदद के लिए नही आगे आएगा तो क्या मतलब ऐसे परिवार का? हर बात के लिए हमें ही कूदना पड़ेगा तो?”

  राजा ने प्रेम की तरफ देखा , वो अब भी पहले जैसा ही शांत निर्विकार खड़ा था, की तभी समर वहाँ वापस चला आया…
   
    ” विराज सा आप जिन बेहद ज़रूरी लोगों के साथ जिस बेहद ज़रूरी मीटिंग में थे वे लोग बाहर स्टडी में आपका इंतेज़ार कर रहें हैं। अगर आपको ऐतराज़ ना हो तो आपके खास मेहमानों को यहीं बुला लूँ या आप बाहर ही मिल लेंगे!”

   विराज को प्रेम के साथ साथ समर भी फूटी आंख नही भाता था, वही हाल समर का भी था। उसे भी विराज से कुछ खास मुहब्बत नही थी,वो आगे कुछ बोलता की कुछ देर पहले ही वहाँ आकर बैठी केसर बोल पड़ी

  ” जब बात महल के राजकुमार की हो रही तो आपको बीच में बोलने की क्या ज़रूरत है समर सा?”

    समर को घूरती बैठी केसर को देख समर मुस्कुरा उठा

  ” ऐक्सक्टली यही सवाल मैं आपसे भी पूछ सकता हूँ। मैं तो फिर भी महल का रहवासी हूँ आप तो पूरी ही आउटसाइडर हैं। पहला तो इस मसले के बीच जब घर के लोग परिचर्चा में थे आपको यहाँ आना नही था और जब आ ही गयीं तो ज़बान पर ताला डाल कर बैठना था।

  ” जहाँ बात न्याय अन्याय की हो हमसे चुप नही रहा जाता रानी माँ!” केसर ने जवाब रानी माँ को दिया

   ” आपसे कहीं चुप नही रहा जाता केसर सा। जिस दिन आप चुप रहना सीख गयीं आधी तो उसी दिन सुधर जाएंगी। ” केसर के पास आकर धीरे से उसके कान में बोल समर वापस राजा की तरफ चला गया

   ” हुकुम स्टडी में विराज सा के खास मेहमान आपका इंतजार कर रहें हैं, चलिए। ” राजा को बाहर लेकर जाते जाते समर ने प्रेम को भी साथ ले लिया और विराज की तरफ भी देख कर मुस्कुरा उठा

  ” आपको ले चलने के लिए स्पेशल पालकी मंगवानी होगी क्या विराज सा?”

   लाचारगी से दांत पीसता विराज भी उनके पीछे हो लिया….

    स्टडी में सबके प्रवेश  करते ही समर ने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया। वहाँ कुर्सी पर बैठी लड़की उन चारों के आते ही खड़ी हो गयी।

  ” अब ये मत कहिएगा विराज सा की आप इन्हें नही पहचानते। यही आपकी खास क्लाइंट हैं जिनके साथ आपकी बिज़नेस मीटिंग्स के बीच से ही प्रेम आपको उठा कर ले आया था? है ना।”

   विराज के पास कहने को कुछ नही बचा था , वो समर पर लगभग दहाड़ उठा

  ” तुझे कहाँ से मिल गयी ये। हां याद आया तुझे वैसे भी हमारी जूठन चाटने का बड़ा शौक़ है ना। याद है ना वो अंग्रेज़न ?”

  बौखलाहट में विराज कुछ का कुछ बोलता चला गया

  ” क्यों खिसियानी बिल्ली बन रहे हैं विराज सा। रेवन से आपका दूर दूर का कोई नाता नही था। ये लड़की भी सिर्फ पैसों के कारण आपसे जुड़ी थी। उस रात जब ये आपके साथ थी तब इसने आपकी जेब से पैसों के साथ साथ आपका ये कीमती रॉयल प्लेटिनम ब्रेसलेट आपकी गुची वॉच ही नही बल्कि आपकी गन भी चुरा ली थी। इसे इतना सब्र भी नही था कि बाजार में बेचने के लिए कुछ हफ्ते रुक जाती। जब प्रेम वहाँ से आपको उठा कर महल वापस ले आया तब आपके पीछे आपके इन खास मेहमान के खास लोग पहुंचे और इसके चुराए माल को बेचने मार्केट में ले गए।
   घड़ी तो चलिए बिक ही जाती लेकिन आपकी ब्रेसलेट पर आपके खानदान का लोगो भी लगा हुआ है, उसे पहचान कर ही दुकानदार ने तुरंत मुझे फ़ोन किया।
    आप सोच भी नही सकते कि आप का ये राजसी ब्रेसलेट अगर चोर मार्किट में आ जाये और इसे कोई खरीद ले तो इससे वो आपको किस तरह से नुकसान पहुंचा सकता है। और तो और आपकी गन भी चुरा ली गयी है। अब उस गन से किसी का खून हो जाये तो इल्ज़ाम किस पर आएगा? ये भी आपको बताना पड़ेगा क्या? माफ कीजियेगा विराज सा लेकिन प्रेम ने तो सिर्फ दो ही थप्पड़ लगाए मैं होता तो…?

   विराज ये सब सुन सकते में था, उसे पता तक नही चला था कि उसकी मदहोशी का फायदा उठा कर उस लड़की ने उसकी जेब साफ कर दी थी। वो अपना सर पकड़े नीचे सर किये बैठा था

   ” विराज कब तक ऐसी बेवकूफियां करते रहोगे? कब बड़े होंगे मेरे भाई? मैंने तो तुम्हारे लिए कुछ और ही सोच रखा था!”

   राजा मन से दुखी लग रहा था, उसके ऐसा कहते ही विराज उसकी तरफ देखने लगा

  ” विराज मैं तो ये सारा राजपाट तुम्हें सौंपने की सोच रहा था ….

   राजा के ऐसा कहते ही समर और प्रेम चौन्क कर राजा की ओर देखने लगे….


******


   एकेडक़मिक सेशन के बीच फोन अलाउ नही होने से बाँसुरी को राजा के जाने के बारे में पता ही नही चला।
    शाम को सारे सेशन निपटने के बाद  रंगरूटों के लिए हल्के फुल्के गेम्स और गाने बजाने की व्यवस्था थी। जिससे कठिन प्रशिक्षण से गुजरने के बाद शाम रात में प्रशिक्षु कुछ आराम पा सकें।
    इस सारे के बाद हिमालय ट्रैकिंग का भी प्रोग्राम होना था।
   उस के पहले प्रशिक्षुओं को फिज़िकली मज़बूत बनाने की भी ट्रेनिंग दी जानी थी, इसलिए सुबह का सेशन वर्कआउट और योग से शुरू होता था।

   शाम को कमरे में फ्रेश होने के बाद चाय पीती बाँसुरी ने राजा का मैसेज देखा और एक पल को उसका दिल डूब गया लेकिन वो जल्दी ही आएगा ये सोच वो वापस खिल उठी।
   
   बाहर रात के खाने के बाद अलाव के आसपास गाने बजाने का हल्का फुल्का सा कार्यक्रम था। सभी अपने अपने गुटों में बैठे बातचीत करते अपने अपने अनुभव साझा कर रहे थे।
      बातों के बीच किसी ने अपने सुर छेड़ दिए उसके बाद तो प्रावीण्य सूची के सारे योद्धाओं के अंदर का आर्यभट्ट निकल कहीं उड़ गया और किसी के अंदर अरिजीत सिंह तो किसी के अंदर किशोर कुमार की आत्मा समा गई।
   एक के बाद एक गीतों की कड़ी आगे बढ़ते बढ़ते शेखर पर आ रुकी। शेखर ने एक नज़र बाँसुरी को देखा और अपने सुर छेड़ दिए….

      ठण्डे ठण्डे झोंके, जब बालों को सहलाएं
    तपती-तपती किरणें, जब गालों को छू जायें
       साँसों की गर्मी को, हाथों की नरमी को
          मेरा मन तरसाए, कोई तो छू जाये
          ऐसा कोई साथी हो…
      नीले नीले अम्बर पर, चाँद जब आये
           प्यार बरसाए, हमको तरसाए
      ऐसा कोई साथी हो, ऐसा कोई प्रेमी हो
           प्यास दिल की बुझा जाए…..

      गाने के बीच बाँसुरी को देख मुस्कुराता शेखर अपने गीत में मगन था, लीना उसके पास चली आयी…

  ” तानसेन प्रभु गाते तो बहुत अच्छा हैं आप लेकिन गलत जगह अपने सुर लगा रहें हैं।”

  “मरजीना तू मर क्यों नही जाती यार मुझ पर ! फिर कम से कम मुझे टोकेगी तो नही। यार बड़ी मुश्किल से तो किसी के चेहरे पर मुस्कान लौटी है, उस मुस्कान को देख कर मैं खुश हो लूँ उसके पहले ही तू जल मरेगी।”

  ” किसी मुगालतें मे मत रहियो….. ना मैं तुझ पर मरूँगी और ना बाँसुरी पे तुझे मरने दूंगी। और वैसे भी अभी तुझे बहुत जीना है , बहुत काम करना है। तू पूरा देश बदलने वाला है बच्चे।”

  ” और माता जी आप मेरा फ्यूचर बर्बाद करने वाली हैं…..

   उन लोगों की बातों के बीच बाँसुरी उठ कर भीतर चली गयी….
     उसे राजा से बातें जो करनी थी….

क्रमशः

aparna….

  
  कुछ दिल से…..


  सबसे पहले सभी सुधि पाठकों को मकर संक्रांति लोहड़ी बिहू की हार्दिक हार्दिक शुभकामनाएं।
  भगवान सूर्य आप सभी के जीवन को सफलता स्वास्थ्य और संपदा से आलोकित करें आप सभी को प्रसन्न रखें।

    कहानी का आज 80वां  भाग लिखते और प्रकाशित करते हुए कुछ अलग ही अनुभव हो रहा था। पहला तो मैंने कभी सोचा ही नही था कि कभी लेखिका बनूंगी दूसरा इतना लंबा लिखना भी मेरे लिए चमत्कार सा ही है।
   इसके पहले मेरी सबसे लंबी कहानी शादी डॉट कॉम ही थी जिसे 33 भाग लिखने पर ही लग रहा था कि कुछ ज्यादा लंबा लिख गयी।
      हालांकि बाद में अधिकतर पाठकों को शिकायत थी कि उसे थोड़ा और आगे बढ़ाना चाहिए था। लेकिन पता नही क्यों कोई कहानी खत्म कर देने के बाद उसका अगला सीज़न लिखना या उसे और आगे बढ़ाना मुझे ज़रा मुश्किल लगता है।
       मेरी कई कहानियों पर पाठकों की प्रतिक्रिया यही होती है कि ये कहानी और आगे जानी थी पर मुझे व्यक्तिगत तौर पर यही लगता है कि हर कहानी वहाँ समाप्त हो जानी चाहिए जहाँ उसे और पढ़ने की चाहत पाठकों में बनी रहे।
    आप सभी का प्यार समीक्षाओं और रेटिंग के माध्यम से जीवनसाथी पर बरस रहा है जिसके लिए आप सभी की आभारी हूँ।
     79 भाग में लगभग 1400 रेटिंग आ गयी, मुझे लगा अगर इतने सारे लोग समीक्षा लिखते तो?
    आप सभी की प्यार भरी समीक्षाओ और ढेर सारी रेटिंग्स के लिएआप का दिल से आभार!!
      शुक्रिया
     नवाज़िश

aparna….

  अगला भाग मंगलवार तक देने की कोशिश करूँगी!!!


 

   

 

  


 
     

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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