जीवनसाथी- 100




                    जीवन साथी –100


राजा और बांसुरी के साथ प्रेम और निरमा भी रियासत वापस आ चुके थे। इतने दिनों की वापसी के बाद कुछ दिन तो निरमा को घर की साफ सफाई करने में ही निकल गए।
     घर को एक बार फिर रहने लायक बनाने के बाद आज निरमा थोड़ी कम व्यस्त थी। निरमा और प्रेम भी खुश थे क्योंकि आज राजा का राजतिलक होना था। सुबह से सारी तैयारियां करने के बाद जब प्रेम रियासत के लिए निकलने वाला था तब निरमा  आरती सजाकर उसके सामने ले आई। प्रेम की आरती उतारने के बाद उसने थाली नीचे रखी और कटोरी में रखा दही प्रेम के सामने कर दिया… अपने मुहँ के सामने चम्मच देख प्रेम मुस्कुरा उठा…

  “यह क्या नया नया शुरू कर दिया?  यह सब तो पहले नहीं करती थी तुम ?”

” मैं नहीं करती थी तो क्या हुआ?  मुझे पता है तुम्हारी मां तुम्हारे पिता को हमेशा घर से निकलने से पहले दही खिलाया करती थी।
     कहते हैं किसी भी शुभ काम के लिए निकलो तो दही और चीनी खाकर निकलना चाहिए,  उस काम में सफलता मिलती है।”

” अच्छा तो यह बात है।  अपने भाई के सफलता के लिए अपने पति को दही चीनी खिलाई जा रही है? क्यों सही कहा न?”

” बिल्कुल राजा भैया की सफलता क्या हमारी सफलता नहीं है?  आखिर आज बाँसुरी और उनक़ी दोनों की तपस्या पूरी हुई।
     श्री राम ने त्रेता युग में 14 वर्ष का वनवास जिया था और इन दोनों ने कलयुग में जी लिया। ठीक है इन्हें सिर्फ दो तीन साल ही बाहर रहना पड़ा लेकिन वह दो तीन साल भी दोनों ने अलग-अलग रहकर तपस्या ही तो की है आज उनकी तपस्या सफल होने का दिन आया है।
    इसीलिए तो मैं इतनी खुश हूं अपनी सखी के लिए।”

” जब तुम इतनी खुश हो तो तुम भी साथ क्यों नहीं चलती? आखिर तुम्हारी सहेली बांसुरी भी तो आज रानी बनेगी.!

” तो क्या मैं भी चलूं साथ ?

” बिल्कुल!! मैंने कब मना किया है ? चलो।”

निरमा फटाफट कपड़े बदल कर तैयार होने चली गई मीठी को तैयार कर उसने अम्मा के हाथ में दिया और खुद प्रेम के साथ महल के लिए निकल गई ।

  महल में वो सबसे पहले बाँसुरी के पास ही पहुंची थी। बाँसुरी की सहायिकाएं उसे तैयार कर रहीं थीं कि अपने पीछे निरमा को खड़े देखा बाँसुरी खुशी से उससे लिपट गयी….

” अभी फुरसत मिली है तुझे? लो बोलो ये हैं मेरी पक्की सहेली!”

  बाँसुरी के बनावटी गुस्से पर मुस्कुराती निरमा ने अपने पर्स से एक छोटा सा बॉक्स निकाला और बाँसुरी को थमा दिया…

” इसमें क्या है निरमा? “

” गिफ्ट है तेरे लिए। खोल कर देख तो सहीं?”

  बाँसुरी ने बॉक्स खोला, उसके अंदर लाल पत्थर से सजी खूबसूरत सी सोने की अंगूठी थी..

” ये तो माणिक है ? ये तो वही माणिक है जो मैं और तू साथ लेने गए थे ना? तूने ये शायद प्रताप …

  आगे की बात बाँसुरी पूरी नही कह पायी, बोलते बोलते वो खुद ही रुक गयी….

” हाँ वही है। तूने पहचान लिया? “

” कैसे नही पहचानूँगी नीरू । तूने अपनी तीन महीने की जमापूंजी लगा दी थी इसमें। और इतनी चाव से खरीदी गई इतनी महंगी अंगूठी तू मुझे क्यों दे रही है?

  ” अंगूठी तो पहनने वाले के हाथ से महंगी सस्ती होती है बंसी। तेरे हाथों में शोभित होकर ये लाखों की अंगूठी अनमोल हो जाएगी।”

” चुप बकवास मत कर। चुपचाप अपने पास रखी रह, प्रताप की निशानी ही समझ कर रख ले। ”

” प्रताप की निशानी के लिए मुझे अब कुछ भी रखने की ज़रूरत नही है बंसी। उसके साथ जिया हर पल कीमती है मेरे लिए। लेकिन उसकी यादों से कहीं ज्यादा कीमती चीज़ वो मुझे देकर चला गया। अपना भाई !
     प्रेम जी के प्यार में अब ऐसी रंग चुकी हूँ बंसी की अब कोई भी पुरानी याद आंखों में आंसू नही लाती चेहरे पर मुस्कान ले आती है।
  शादी के बाद शुरुवाती दिनों में ज़रूर मैं प्रताप और उसकी यादों को जानबूझ कर अवॉयड करने की कोशिश करती थी, मुझे लगता था कहीं प्रेम जी को बुरा न लग जाये। लेकिन अब साथ रहते रहते समझ आ गया कि उनका प्यार जलन ईर्ष्या दुर्भाव इन बातों से कहीं ऊपर है।
   उन्होंने जितनी शिद्दत से मुझे प्यार किया और मेरे साथ बंधे रिश्ते को निभाया है मुझे उनकी इन्ही बातों से प्यार हो गया।
  शुरू शुरू में लगता भी था कि मैं कितनी अजीब औरत हूँ। पहले किसी और से प्यार किया फिर किसी और से किया!क्या किसी औरत को दो बार इतना सच्चा प्यार हो सकता है!
   फिर लगा हाँ हो सकता है। अगर आपका हमसफ़र प्रेम जी जैसा हो तो किसी को भी उनसे दुबारा प्यार हो सकता है।
   अब तो मेरे संकोच की रही सही बेड़ियां भी कट गयीं है। अब मैं इनके सामने ही प्रताप की फ़ोटो पर दिया भी जला लेती हूँ, मीठी के हाथ जुड़वा कर प्रार्थना भी कर लेती हूँ। क्योंकि जानती हूँ उनका प्यार इतना छोटा नही है, जो इन बातों से प्रभावित हो जाएगा। ये अंगूठी प्रेम जी को नही पहनाने का कारण उनकी राशि है।
   तू तो जानती है मैं इन पत्थरों माणिक मुक्ता पर कुछ ज्यादा ही भरोसा करती हूँ। इसलिए ये अंगूठी प्रेम जी को नही पहनाई क्योंकि उनकी राशि को माणिक सूट नही करता।
   लेकिन मेरी प्यारी सहेली तो सिहं राशि की शेरनी है माणिक पहन कर और तहलका मचाएगी इसलिए तेरे लिए ले आयी।
    तेरी पुरानी माणिक गुम भी तो हो गयी थी ना! “

” हाँ मेरी माँ ! गुम गयी थी और तू बिल्कुल मेरी माँ बनकर मुझे अंगूठियां पहनाती रहा कर। वैसे मैं तो इतना ज्यादा ये सब नही मानती पर तु कहती है तो ज़रूर पहन लुंगी।

” पहन लुंगी नही, तू अभी पहन लें। मैं दूध में रात भर भिगो कर सुबह सुबह सूर्य देव के सामने इस अंगूठी को धोकर सूर्य दर्शन करवा कर लायी हूँ। आज अच्छा दिन है, ईश्वर करे तेरे रास्ते की हर रुकावट भगवान साफ करते चलें। राजा भैया के साथ तू सदा सदा खुश रहे।”

” बस कर , इतना आशीर्वाद देगी तो मैं झुक कर कहीं तेरे पैर न छू लूँ। ला तू ही पहना दे। “

निरमा ने मखमली डिब्बे से अंगूठी निकाली और बाँसुरी की उंगली में पहना दी। उसी वक्त सहायिका उन दोनों के लिए शर्बत लेकर आ रही थी, की सामने से आती दूसरी सेविका को देख नही पायी और दोनो की टक्कर में ट्रे हाथ से छूट गयी। कांच के गिलास कांच की ट्रे के साथ ज़ोर की आवाज़ करते चकनाचूर हो गए।

   बाँसुरी और निरमा दोनो ही चौन्क कर उधर देखने लगीं। राज्याभिषेक के लिए दोनो को निकलना था कि दरवाज़े पर ही कांच टूट कर बिखर गया। उसी वक्त दोनो को साथ  लेने आए रूपा भी दरवाज़े पर ठिठक गयी….

“चलिए आप दोनो हमारे साथ। हम आप लोगो को लेने ही आये थे। और ये कांच के टूटने से परेशान मत होना। कोई बला थी सर पर बाँसुरी  जो कांच टूट कर बिखर गई। अब कोई भय कोई चिंता नही है। कांच टूटना तो अच्छा माना जाता है ऐसा हमारी दादी साहेब कहतीं थीं।”

  निरमा ने आगे बढ़ कर रूपा के पैर छू लिए….

” सदा सौभाग्यवती रहिये आप निरमा!”

  बाँसुरी और निरमा को साथ लिए रूपा भी राज्याभिषेक के लिए निकल गयी।
    दीवान खाने में राजा उन्ही लोगो का इंतेज़ार कर रहा था। वहाँ राजा के पास बाँसुरी को छोड़ रूपा निरमा के साथ आगे बढ़ गयी।
   और राजा बाँसुरी का हाथ थामे उनके पीछे चल पड़ा।
   
   
**********
    


     जहाँ महल के एक हिस्से में राजा का राजतिलक हो रहा था, पंडितो के आशीर्वचनों की अमृतवर्षा से वो सिक्त हो रहा था वहीं दूसरी ओर आदित्य केसर की बातें सुन सुन कर बौखलाता जा रहा था।
    उसे यकीन नही हो रहा था कि इतने बड़े महलों में रहने वाले लोगों के दिल इतने छोटे हैं कि सिर्फ सत्ता के लोभ में वो ऐसी जालसाजियां करते जा रहें हैं।

   ” केसर जो तुम कह रही हो क्या ये झूठ नही हो सकता? “

” नही आदित्य ! हमारी कही एक एक बात सच है। युवराज और अजातशत्रु की माँ साहेब के बीमार पड़ जाने के बाद हर चीज़ पर छोटी रानी का हक होने लगा। महल के अंत:पुर की हर छोटी बड़ी बात का निर्णय उनके हाथों में पहुंच गया।
   उनकी देवरानी यानी पिंकी की माँ को सब कुछ समझ में तो आता ही था लेकिन वो बेचारी अपनी उधड़ी गृहस्थी की तुरपन में ही लगी रहतीं थीं। उनका जीवन भी सुखमय न रहे इसके लिए भी इन लोगों ने चाल चली।
   तुम्हारी माँ की दूसरी शादी हो चुकी है, और वो तुम्हारे पिता को भूल चुकी हैं ऐसा बता कर पहले तुम्हारे पिता को गुमराह किया। वो अपनी उदासी में गुम थे कि उन्हें उनके बड़े भाई ने विदेश भेज दिया। इसी सब के बीच तुम पैदा हुए।
    तुम्हारे पैदा होने के आसपास ही राजा साहब ने तुम्हारे पिता की शादी तय की और उन्हें विदेश से वापस बुलवा कर उनकी शादी कर दी।
   लेकिन उन्होंने पहली रात ही अपनी पत्नी को तुम्हारी माँ और तुम्हारे बारे में सब बता दिया। उन दोनों की गृहस्थी शुरू होने से पहले ही चटक जाती लेकिन रो धोकर अपना गुस्सा और नाराज़गी उतार लेने के बाद पिंकी की माँ अपने मायके चली गयी। जब उनकी नाराज़गी कुछ कम हुई तब वो वापस चली आयी और तुम्हारे पिता से तुम्हें वापस ले आने की गुज़ारिश की। तब तक तुम्हारे पिता ठाकुर साहब से एक बार मिल कर आ चुके थे। ठाकुर साहब ने उनकी मिन्नतों को नकारते हुए उन्हें तुम्हे देने से इनकार कर दिया था।
   पर पत्नी के कहने पर और उनका सहयोग पा कर वो एक बार फिर ठाकुर साहब के पास पहुंच गए, लेकिन इस बार फिर ठाकुर साहब ने बहुत से गणमान्य लोगों के सामने उनकी खूब बेइज़्ज़ती की और उन्हें धक्के मार कर निकाल दिया।
    इस सब का परिणाम यह हुआ कि अपनी बेइज़्ज़ती और तुम्हारी माँ और तुम्हें भुलाने वो शराब में डूबते चले गये ।

   पिंकी की माँ ने उन्हें संभालने की कोशिश भी की लेकिन छोटी रानी सा कोई न कोई नया पैंतरा चल कर पिंकी की माँ को ऐसे व्यस्त रखती की वो अपने पति पर ही ध्यान नही दे पाती, और इधर तुम्हारे पिता के पास अपना ऐसा खास आदमी नियुक्त कर दिया जो उन्हें पैग पर पैग बना कर उन्हें बुरी तरह शराब में डुबोएं रखता।
     इसी सब के बीच तुम्हारा पालन तुम्हारे नाना घर में होता रहा, और उधर पिंकी का भी जन्म हो गया।
    तुम्हारे दूसरे जन्मदिन पर महल से बहुत से तोहफे भेजे गये , तुम्हारे पिता तुम्हे भूल नही पा रहे थे, और वो सुकून से रह सकें इसलिए उनकी पत्नी भी तुम्हें वापस पाना चाहती थीं, लेकिन ठाकुर साहब ने तोहफे लेकर जाने वाले आदमी का सर काट कर तोहफों के साथ वापस भेज दिया।
    राजा साहब को जैसे ही ये बात पता चली उनका खून खौलने लगा। वो नाराज़गी से अपने भाई को डांटने डपटने जाने ही वाले थे कि बड़ी रानी ने उन्हें रोकने का प्रयास किया।
    इसी सब प्रयास और बतकही में बात बिगड़ने लगी। बात बिगड़ने के साथ ही बड़ी रानी की तबियत भी बिगड़ने लगी , लेकिन उनकी बिगड़ती तबियत पर बिना ध्यान दिए राज साहब अपने छोटे भाई के कमरे में पहुंच गए, उस दिन पहली बार छोटे भाई ने भी अपने बड़े भाई को पलट कर जवाब दिया और परिणाम हुआ कि दोनों के बीच ज़ोरदार झगड़ा हो गया।
   कहासुनी आगे बढ़ती जा रही थी कि रनिवास से खबर आई कि बड़ी रानी की तबियत बहुत बिगड़ गयी है। जब तक बाकी लोग वहाँ पहुंचे बड़ी रानी का स्वर्गवास हो चुका था।
     राजा साहब टूट पाते कि उन्हें संभालने के लिए छोटी रानी आगे बढ़ गयी। वक्ति तौर पर राज साहब जज़्बाती हो रहे थे,भावुक थे, उन्हें रानी साहब के जाने के बाद अपनो की ज़रूरत थी और उसी वक्त छोटी रानी ने लगाई बुझाई कर उनके छोटे भाई के खिलाफ राजा साहब के और कान भर दिए। परिणाम यह हुआ कि बड़ी रानी की तेरहवीं निपटने के अगले दिन बिना किसी से कुछ कहे सुने राजा साहब के छोटे भाई अपनी पत्नी और नन्ही सी बेटी को साथ लिए विदेश चले गए।
   अब छोटी रानी का रास्ता साफ था। बड़ी रानी मर चुकी थी, राजा साहब के छोटे भाई का परिवार वहाँ से जा चुका था अब उन्होंने अपना निशाना साधा राजा साहब पर।
     उनके एक पुराने डॉक्टर मित्र की सलाह पर राजा साहब को भी उन्होंने कुछ दवा खिलानी शुरू कर दी जिसके कारण अब राजा साहब का स्वास्थ्य नरम गरम रहने लगा।
   और इसी के साथ सिलसिला शुरू हुआ राजकुमार अजातशत्रु पर हमलों का।
    अब तक राजा साहब के बेटे बड़े हो चुके थे । कुछ शारीरिक त्रुटि और कुंडली दोष के कारण युवराज का गद्दी पर बैठना असम्भव था इसी लिए छोटी रानी के निशाने पर अब अजातशत्रु था।
    उनका पूरा लक्ष्य यही था कि किसी तरह राजा साहब बीमार होकर गुजर जाएं और ठाकुर साहब उनकी जगह गद्दी पर बैठ जाएं लेकिन वक्त बीतने के साथ शायद छोटी रानी के मन के भाव बदलने लगे।
    इसके साथ ही उम्र भी कुछ ढलने लगी थी और साथ ही इतने सालों का वैवाहिक जीवन राजा साहब के साथ बिता लेने के बाद अब शायद उनके मन में राजा साहब को मारने का विचार बदलने लगा था । और इसी सब में राजा साहब को दी जाने वाली दवाएं उन्होंने बंद कर दी।
   उस वक्त उनका और ठाकुर साहब का बहुत बड़ा झगड़ा भी हुआ। लेकिन फिर दोनो के बीच एक अनदेखा सा समझौता हो गया कि गद्दी पर ठाकुर साहब न भी बैठे तो उनका पुत्र यानी विराज तो बैठ ही सकता है।
   और बस विराज के गद्दी पर बैठने के लिए ये सारा चक्रव्यूह रचा गया।
  कभी पागल घोड़े की सवारी अजातशत्रु से करवा दी गयी कभी सलाना जलसे में उस पर भाले और तीरों से वार हुआ। कभी दोस्तो के साथ कि पिकनिक में उसकी गाड़ी के ब्रेक फेल किये गए कभी बनारस के घाट पर उन पर गोलियां चलाई गई लेकिन कहा जाता है ना जाको राखे साइया मार सके न कोई। वैसे ही अजातशत्रु भी हर कठिनाई से जूझता बचता चला गया।
   तब ठाकुर ने अगली और सबसे खतरनाक चाल चली। अपने एक परिचित डॉक्टर का अपॉइंटमेंट रानी साहब की सहायता से उनके अस्पताल में करवा लिया और अजातशत्रु को गलत दवाएं देने लगा।
   लेकिन अजताशत्रु को भी बनाने वाले ने कुछ अजब ही बनाया है, जिन दवाओं के छै महीने लगातार प्रयोग से याददाश्त कमजोर होकर दिमाग धीरे धीरे काम करना बंद कर देता है और आदमी पैरालाइज हो जाता है उन्हीं दवाओं को अजातशत्रु एक साल से अधिक समय से ले रहें थे और अब तक उन पर उसका असर नही हुआ….
     ऐसा लगता है जैसे अजातशत्रु को बनाने वाली मिट्टी में अमृत घोल दिया है उस ऊपर वाले ने। “

    केसर की बातें सुनते आदित्य को पता भी नही चला कि कब उस जैसा पत्थर दिल इंसान इतना कमज़ोर पड गया कि उसकी आंखों से ऑंसू बहने लगे।
    अपने आंसू पोंछ वो बस इतना ही कह सका….

” भैया को भगवान हर बुरी नज़र से बचाये। “

” भैया ? तुम अजातशत्रु को भैया कब से कहने लगे? खैर जवाब बाद में देना। अभी मेरी पूरी बात सुनो। ठाकुर साहब यहाँ से फरार होकर वहीं महल पहुंचने वाले हैं।
   उन्हें वहाँ का एक एक कार्यक्रम पता है, वहाँ शायद कोई कार्यक्रम होना तय है ? “

” हाँ भैया का राजतिलक होना है। ”

“हां तो उसके बाद शायद राज अजातशत्रु जनदर्शन के लिए बाहर जाने वाले हैं , और उसी समय ठाकुर साहब उन पर गोली चलाने वाले हैं।

“क्या? लेकिन क्यों ? “

” इतनी बातें सुनने के बाद भी अभी भी तुम्हारे पास क्यों बचा ही है। एक तो ठाकुर साहब शुरू से चाहते थे कि उनका बेटा विराज गद्दी पर बैठे लेकिन अब जब विराज ने खुद इनकार कर दिया तब अजातशत्रु को मारने के अलावा और क्या चारा बचा। बताओ आखिर  अब अजातशत्रु के मरने पर ही विराज या विराट गद्दी पर बैठ सकते हैं।
   दूसरी बात अजातशत्रु की पत्नी बाँसुरी ने उनके सारे काले कारनामे सबूत सहित खंगाल लिए और सारा सब पुलिस के हवाले कर दिया ,अब इस बात से वो और ज्यादा चिढ़ बैठे। अब तो वो दोनो से ही बदला लेना चाहतें हैं।
    उनका मुख्य उद्देश्य एक ही है कि किसी तरह उनके बेटों में से कोई राजा बन जाये।”

” एक बात बताओ अगर विराज उनका बेटा है तो रेखा कौन है? हमारा मतलब वो किसकी बेटी है? “

” रेखा उनके मुनीम की बेटी थी। ठाकुर साहब की पत्नी जब शादी के काफ़ी सालों में भी माँ नही बन पायीं तब उन्होंने बच्चा गोद लेना चाहा , उस वक्त ठाकुर साहब ने तुम्हें गोद लेने की बात भी रखी। लेकिन ठकुराइन चाहती थी कि उनके गोद लेने वाली बात किसी को मालूम न हो तब घर पर सबसे यह कह कर की वो माँ बनने वाली हैं और उनकी अच्छी तबियत के लिए उनका पहाड़ों पर रहना माफिक होगा, ठाकुर साहब उन्हें लेकर दून चले आये।यहीं उस वक्त उनके मुनीम की पत्नी भी गर्भवती थी। उनके एक संतान पहले ही थी, और ये दूसरी संतान वे पहले अपने बिगड़े स्वास्थ्य के कारण नही चाहती थी लेकिन ठाकुर साहब की पत्नी और वो दोनो अच्छी सखियां थी इसलिए वो ठाकुर साहब की पत्नी को अपना दूसरा बच्चा देने को तैयार हो गईं।
     उनके पहले ही से एक बेटी थी, अगली संतान शायद बेटा हो इसी आस में उन्हें दूसरी संतान चाहिए थी और जब दूसरी के वक्त ठकुरानी ने बच्चे को मांग लिया तो उन्हें भी एक संतोष सा हुआ कि उनकी संतान जो भी हो एक अच्छे घर मे पल बढ़ जाएगा।
   अगली संतान रेखा के रूप में पैदा हुई और उसे ठाकुर साहब और ठकुरानी ने अपनी संतान बना कर ही सबके सामने प्रस्तुत किया।
  ठाकुर साहब की पत्नी ठाकुर साहब के  बच्चों विराज और विराट के बारे में नही जानती थी। उन्होंने बड़े लाड़ प्यार से रेखा को पाला पोसा, यहाँ तक कि अट्ठारह की होने के बाद भी उसे उसके असली माता पिता के बारे में नही बताया।
   ठाकुर साहब के कारनामो के बारे में उनका मुनीम सब कुछ जानता था, उन्हें लगा  कहीं वो अपना मुहँ न खोल दे इसलिए एक बार उनकी गाड़ी का भी एक्सीडेंट करवा दिया , जिसमे मुनीम की पत्नी यानी रेखा की माँ मारी गयी और मुनीम जी हमेशा के लिए अपाहिज हो गए । “

” तुम इतना सब कैसे जानती हो?”

” क्योंकि उन मुनीम की बड़ी लड़की यानी रेखा की बड़ी बहन हम ही हैं।”

” क्या ? “

” हां ! रेखा हमसे सिर्फ चार साल छोटी है।हम इतने छोटे थे कि हमें मालूम ही नही चला की कब हमारी बहन ठाकुर साहब की बेटी बन गयी। उसके बाद ठाकुर साहब रेखा को साथ लेकर अपने घर चले गए।उनके मुनीम यानी हमारे पिता भी उनके साथ ही काम करते थे।
   पहले पहले सब अच्छा था। फिर धीरे धीरे ठाकुर साहब के कारनामे एक एक कर हमारे पिता की नज़रों में आने लगे तब उन्होंने कई बार ठाकुर साहब को समझने की कोशिश की लेकिन वो कुछ समझना ही नही चाहते थे।
तब तक हम और रेखा भी कुछ बड़े हो गए थे। और तभी एक बार किसी विवाद के बाद जब पिता जी माँ के साथ कहीं बाहर गए थे तब लौटते में उनकी गाड़ी का एक्सीडेंट हुआ और बस पिता जी बचे।
    तब हम यही कोई सोलह सत्रह साल के थे। उस वक्त ठाकुर साहब ने ऐसे दिखाया जैसे उनसे बड़ा हमारा शुभचिंतक कोई नही है और हमारा एडमिशन राजा साहब के राजसी स्कूल में करवा दिया, और हमारे पिता को एक जमी जमाई कंपनी का मालिक बना कर राजा साहब की रियासत में भेज दिया और फिर जैसे बचपन से तुम्हारे दिमाग मे ज़हर भरते रहे, हमारे दिमाग मे भी बहुत कुछ भर दिया।।
   हमारे पिता का अच्छे से अच्छा ट्रीटमेंट करवाने के लिए उन्हें विदेश भेजा और एक बार फिर हमारे पिता अपने पैरों पर खड़े हो सके। उन्हें उस वक्त ठाकुर साहब की चालें नही समझ आयी और वो अपनी कंपनी और उसकी डील के लिए राजा साहब और अजातशत्रु से उलझ पड़े। असलियत में वो नही जानते थे कि उन सारी डील्स से फायदा सिर्फ ठाकुर साहब का था, उनका कोई फायदा उसमे था ही नही।
   तब तक हम भी बड़े और समझदार हो चुके थे। अजातशत्रु अपने पिता का बिजनेस देखने के साथ ही रियासत के काम भी देखने लगे थे। उन्होंने हमारे पिता की सारी डील्स कैंसल कर दी और हमारे सरकारी टेंडरों पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया।
       इस सब मे पिता जी की तबियत और बिगड़ी और हमे लगा उनकी तबियत बिगड़ने के पीछे अजातशत्रु का हाथ है।
   उसके बाद हम पर कुछ आदमियों ने हमला किया। उनमें से किसी ने बिल्कुल अजातशत्रु की आवज़ में हमसे कुछ कहा , हमें एक बार फिर धोखा हुआ कि हमारे साथ गलत करने वाला अजातशत्रु ही है।
   हमें हर बार अजातशत्रु के खिलाफ ठाकुर साहब ही भड़काते रहे। हम उन्हें अपना सबसे भरोसेमंद करीबी माना करते थे पर हमें नही पता था कि हमारे साथ हुए सारे काम उन्हीं के कारण हुए हैं।
     उन्होंने हमारे अंदर अजातशत्रु से बदला लेने की ऐसी चिंगारी जलाई की हम खुद आग हो गए।
    हमारे दिल दिमाग पर ऐसी पट्टी बंधी की उससे बदले की आग में जलते हम कुछ भी सोचने लगे। हमें लगा अगर उसकी पत्नी को हम बीमार कर दें तो वो दुखी होगा। जब बच्चे के लिए उसकी बीवी तरसेगी तब वो दुखी होगा। जब तिल तिल उसकी बीवी घुल घुल कर तड़प तडप कर उसके सामने मरेगी तब वो दुखी होगा ।
   पर हाय री हमारी किस्मत!
  उससे बदला लेने हम उसके महल में घुसे और उसे बदले के रंग में  रंगने से पहले हम उसके रंग में रंग गए।
    उसकी संगत में रह कर ही जाना कि इंसान क्या होतें हैं।
   उसकी संगत में रह कर जाना कि भगवान क्या होतें हैं।

” तुमने बहुत कुछ सहा है केसर। पर अब और नही सहन करना होगा।तुम हमारा इंतज़ार करना, हम तुम्हें लेने ज़रूर आएंगे। अभी फिलहाल हम बाहर जा रहें हैं। शंख ध्वनि सुनाई दे रही है इसका मतलब ये है कि भैया का राजतिलक हो चुका है और वो जनदर्शन को जाने ही वाले होंगे। हमे उनके महल से निकलने के पहले ही वहाँ पहुंचना होगा जिससे हम उन्हें बचा सकें।
  केसर हम वापस लौट कर तुम्हें फ़ोन करते हैं…

” ठीक है आदित्य ,हम इंतेज़ार करेंगे। “

“और सुनो केसर एक बात और कहनी थी।

” हाँ कहो। “

” प्लीज़ मरना मत! हम आएंगे तुम्हे लेने।”

   दूसरी तरफ से कोई आवाज़ नही आई। पर आदित्य ने महसूस किया कि केसर ने एक गहरी सांस ली है।

  आदित्य ने फोन बंद कर जेब के हवाले किया और तुरंत आगे बढ़ गया।

********

     राजतिलक सम्पन्न होते ही ग्यारह पंडितो ने एक साथ शंख बजाना शुरू कर दिया।
   राजा अपनी जगह पर खड़ा हो गया। उसे राजधर्म की शपथ लेनी थी।
  अपनी जगह से थोड़ा आगे बढ़ कर उसने अपनी शपथ वहाँ बैठे सभी अतिथियों और राजमहल के रहवासियों के समक्ष दुहराई और महाराज और रानी माँ से आशीर्वाद लेने आगे बढ़ गया। उनके बाद काका साहब और युवराज भैया का आशीर्वाद लेने के बाद वहीं एक ओर बैठी महल की औरतों की तरफ राजा बढ़ गया। रूपा के चरणों में झुक कर आशीर्वाद लेने के बाद उसने अपना हाथ बाँसुरी की तरफ बढ़ा दिया।
बांसुरी चौन्क कर इधर उधर देखने लगी। रूपा ने मुस्कुरा कर बाँसुरी को खड़े होने कहा और धीमे से बाँसुरी खड़ी हो गयी।
    बाँसुरी का हाथ थामे राजा उसे अपनी गद्दी तक ले आया….

” इस राजगद्दी का अधिकारी अकेला मैं नही हूँ। अगर मुझे ये गद्दी संभालनी है तो मैं अपने पूरे व्यक्तित्व के साथ अपने पूरे चरित्र के साथ इस गद्दी पर बैठूंगा। और जैसा कि यहाँ उपस्थित आप सभी जानतें है कि बाँसुरी मेरी वामा यानी वामांग है मेरी अर्धांगिनी है तो अपने आधे हिस्से को खुद से दूर रख कर मैं कैसे सम्पूर्ण रूप से इसमें बैठ पाऊंगा।
   मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व इन्हीं के साथ है तो अब से बाँसुरी आप मेरे साथ यहाँ बैठेगी। ”

  बाँसुरी आश्चर्य से आंखें फाड़े कभी राजा को तो कभी रानी माँ को देख रही थी। युवराज भैया की तरफ देखने पर उन्होंने भी बाँसुरी को वहाँ बैठने का इशारा किया, और उनका इशारा पाते ही वो राजा के साथ उसकी राजगद्दी पर बैठ गयी।

   दोनो के एक साथ राजगद्दी पर बैठते ही दोनो के नाम का जयकारा लगने लगा…
    राजा अजातशत्रु की जय हो!!
     रानी बाँसुरी अजातशत्रु की जय हो!!

और इसके साथ ही अंग्रेज़ो के समय की प्रथा को निभाते हुए वहाँ बैठे सभी अतिथियो ने एक साथ तीन बार तालियां बजायी और तालियों के थमते ही वीणा की तान पर महल की राजकीय धुन बजने लगी।

  सामने अतिथियों में बैठा शेखर उस प्यारी सी राजसी जोड़ी को देखता मन ही मन सोचता रह गया…

” चाँद पाने की ज़िद तो हर बच्चा कभी न कभी ज़रूर करता है पर चाँद हर किसी को नसीब हो ये ज़रूरी तो नही? ”

  शेखर के साथ बैठे आदमी ने उससे पूछ ही लिया” क्या हो गया कलेक्टर साहब ?

” कुछ नही बस ज़रा सा इश्क़ हो गया है। ” शेखर धीमे से अपनी बात कह मुस्कुराता रह गया। उसकी बात साफ न सुन पाने के कारण वो व्यक्ति भी दूसरी तरफ देखने लगा…..


क्रमशः


aparna ……


 
  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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