जीवनसाथी – 101




   जीवनसाथी – 101



” चाँद पाने की ज़िद तो हर बच्चा कभी न कभी ज़रूर करता है पर चाँद हर किसी को नसीब हो ये ज़रूरी तो नही? ”

  शेखर के साथ बैठे आदमी ने उससे पूछ ही लिया” क्या हो गया कलेक्टर साहब ?

” कुछ नही बस ज़रा सा इश्क़ हो गया है। ” शेखर धीमे से अपनी बात कह मुस्कुराता रह गया। उसकी बात साफ न सुन पाने के कारण वो व्यति भी दूसरी तरफ देखने लगा…..

” और एक बात अभी हम कलेक्टर नही एडिशनल कलेक्टर के पद पर हैं। और इसके पहले पंचायत सचिव पे जॉइन किये थे”

  साथ बैठा व्यक्ति वापस शेखर को देखने लगा..

” जी जी कलेक्टर साहब मतलब ए डी एम साहब!”

  राजगद्दी पर बैठने के बाद राजपत्र पर हस्ताक्षर कर राजा एक बार फिर अपनी रियासत का घोषित सम्राट बन बैठा, अघोषित तो वो सदा से था।

   जनदर्शन कार्यक्रम के लिए बाहर लोगों का हुजूम लगने लगा था। राजा भी बाँसुरी को साथ लिए निकल पड़ा।
   मंच से नीचे उतर वो आगे बढ़ ही रहा था कि हड़बड़ाते हुए आदित्य चला आया…


” भैया आप से कुछ बात करनी थी, ज़रा पांच मिनट का समय हमें दे पाएंगे क्या आप? “

  आदित्य के चेहरे की घबराहट देख राजा के साथ बाँसुरी भी चौन्क गयी…

” क्या बात है आदित्य ? कुमार को आप क्यों रोक रहे हैं? क्या आपको नही मालूम कि राजतिलक के बाद ऐसे किसी शुभ कार्य के लिए जाते राजा को रोकना अपशकुन होता है?”

  रानी माँ की बात पर आदित्य ने उन्हें एक नज़र देख कर नज़रे फेर लीं…

” अपशकुन न हो इसलिए ही तो राजा साहब से बात करना ज़रूरी है। ”  मन ही मन सोच कर भी आदित्य कुछ नही बोल पाया लेकिन उसकी डरी सहमी सी दृष्टि ने राजा से बहुत कुछ कह दिया….

” ठीक है आदित्य! चलो पहले तुम्हारी बात ही सुन लेता हूँ।।”

  आदित्य ने आगे बढ़ कर राजा का हाथ थाम लिया…”भैया आपके ऑफ़िस चल सकते हैं क्या? “

  हां में सर हिला कर राजा ने समर की तरफ देखा, राजा का इशारा समझ समर ऑफिस खोलने आगे बढ़ गया। उसके पीछे तेज़ कदमों से राजा और आदित्य भी बढ़ गए….
       
ऑफिस में प्रवेश करते ही आदित्य ने झट दरवाज़ा बंद कर दिया…

” भैया हम आपसे ये कहना चाहते हैं कि आप आज जनदर्शन कार्यक्रम में  न जाये प्लीज़।”

” लेकिन क्यों आदित्य? ऐसी क्या बात है?”

राजा के पूछने पर आदित्य ने सिलसिलेवार सारी बातें उसे बता दीं। पहले उसे लगा छिपाने लायक बातें छिपा भी जाएगा लेकिन बोलने पर आया तो सब कुछ बोलता चला गया…

   सारी बातें सुनते बैठा राजा जितना दुखी और परेशान दिख रहा था उतना ही दुखी समर भी दिख रहा था …
    राजा ने चुपके से अपनी आंखों में आये ऑंसू पोंछ लिए….

” तो अब इस बात का यही उपाय है कि मैं जनदर्शन कार्यकर्म में न जाऊँ? पर ये बताओ कि क्या इस कार्यक्रम के बाद मुझे मारने की साज़िश नही होगी? वो तो होती ही रहेगी न तो अपने मरने के डर से क्या मैं अपनी रियासत के लोगों से दूर चला जाऊँ? क्या करना चाहिए मुझे?”

” हम तो यही कहेंगे भैया की आप आज बाहर मत जाइए , वैसे भी रानी माँ का इतना बड़ा सच पता चलने के बाद अभी आप सम्भल भी नही पाएं हैं।।इस अवस्था मे आपका बाहर जाना सही नही है। “

आदित्य की बात सुन समर उसके करीब चला आया, उसके कंधो पर हाथ रख वो उसके पास ही बैठ गया..

” आदित्य रानी माँ के बारे  और ठाकुर साहब के बारे में हुकुम सब जानतें हैं!”

” क्या ? सच ? “

  आदित्य एक बारगी चौन्क उठा। इतनी बड़ी बात की रानी माँ और ठाकुर साहब ने मिलकर इस रियासत को मिटाने में कोई कसर नही छोड़ी। यहाँ तक की राजा की माँ की मौत के पीछे भी वही कारण थी। उनके दोनो बेटों में भी खानदान का खून नही होने के बावजूद उन्हें गद्दी पर बैठाने की ज़िद उसके अलावा हमेशा राजा की जान पर मंडराते खतरे की ज़िम्मेदार औरत के बारे में सब जानकर भी कोई कैसे इतना सामान्य रह सकता है?

” राजा भैया क्या ये सच है? “

  आदित्य के सब्र का बांन्ध छलका जा रहा था। उसे किसी कीमत पर विश्वास नही था कि राजा सब जानता है। क्योंकि इतने बड़े षड्यंत्र को जानने के बाद तो कोई भी राजा हो ठाकुर साहब और रानी माँ को दीवारों में चुनवा चुका होता, गर्म तेल के खौलते कड़ाहे में उतार चुका होता।
   हे भगवान आखिर ये आदमी किस मिट्टी से बना है?

   आदित्य ने देखा राजा की आंखों में आंसू थे, उसने समर की ओर देखा, उसकी आंखें मानो प्रश्न कर रही थी कि क्या ऐसा सम्भव है?

  ” हाँ आदित्य , हुकुम वाकई सब जानतें हैं। पहले हुकुम को भी इस बारे में मालूमात नही थे, क्योंकि इसके पहले इन पर जितने भी हमले हुए थे वो सारे ऐसे थे कि किसी पर शक की गुंजाइश ना हो, लेकिन जब इन पर बनारस में हमला हुआ तब प्रेम और मैं ज़रा ज्यादा सचेत हो गए। रोहित से कह कर हमने हमलावरों की तलाश शुरू करवा दी और बस उसके बाद एक एक कर हर गुत्थी सुलझती चली गयी। हमलावरों से रोहित ने ठाकुर साहब का नाम उगलवा लिया और रेखा बाई सा से रानी माँ और ठाकुर साहब की दोस्ती का पता चल गया।
   ठाकुर साहब के पुराने कॉलेज के दोस्तों से और भी खुलासे होते गए।
  उसके बाद आई केसर!!
         केसर जिस ढंग से हुकुम के पीछे पड़ीं थीं उसकी जन्मपत्री निकलवाना हमारे लिए बहुत ज़रूरी हो गया था। एक बार मैंने प्रेम को केसर के घर और ऑफिस भेजा था, तब प्रेम ने केसर के पिता की ठाकुर साहब से होती बातचीत सुन ली, उनके फोटो भी लिए और जब मैं और प्रेम सब तरफ से पूरी तरह सबूत जुटा सके तब हिम्मत कर के हमने हुकुम से सब कुछ कह दिया। हुकुम को वक्त तो लगा लेकिन उन्होंने खुद को संभाल लिया। “

” तो मतलब भैया आपने इतने बड़े कसूर के लिए उन दोनों को माफ कर दिया? “

” किसने कहा मैंने माफ कर दिया? “

“तो फिर ये क्या है? आपने अब तक कुछ किया भी तो नही? “

“कैसे कह सकते हो कि मैंने कुछ नही किया?  ज़रूरी तो नही है कि किसी भी गलती की सज़ा तुरंत दे दी जाए। और ये भी ज़रूरी नही की सज़ा ऐसी हो जो सामने वाले को तुरंत तकलीफ दे जाए। मैं तो ऐसी सज़ा देने में यकीन करता हूँ कि सामने वाला खुद अपनी गलती समझ कर माफी मांग ले।”

“मैं समझा नही भैया? आप कहना क्या चाहते हैं? “

” रानी माँ का एकमात्र सपना यही तो था कि विराज गद्दी पर बैठे, बैठा दिया उसे गद्दी पर और सौंप दिया सारा राजपाट की संभालो।
   बाकी लोगों के साथ साथ विराज को खुद समझ आ गया कि वो कितना लायक है कितना नही। ”

  आदित्य सोचता बैठा रहा , की आगे समर ने बोलना शुरू किया…

” भाई हमारे हुकुम अलग हैं दुनिया से। मैं एक उदाहरण देकर समझाता हूँ, जैसे अगर एक इंसान ने दूसरे को मारा तो वो दूसरा उसको मार कर सज़ा दे लेता है या चुपचाप आगे बढ़ जाता है लेकिन हुकुम उस के साथ तब तक बने रहतें हैं जब तक वो मारने का कारण न जान लें। और उसके बाद भी मारने के कारण पर जब तक सामने वाले इंसान को गिल्ट न फील हो जाये हुकुम उसका सहारा बने खड़े रहतें हैं , और जब देख लेतें हैं कि सामने वाले के मन का सारा ज़हर निकल चुका तब चुपके से उसके सर के नीचे से अपना कंधा हटा लेते हैं।
    इनका सज़ा देने का स्टाइल ज़रा अलग है।”

” मेरी तो समझ से बाहर है कि आप कैसे इतना धैर्य रखें हैं। अगर कोई मुझे ऐसे धोखा दे तो मैं तो शायद उसका खून कर जाऊँ!”

” ठाकुर साहब ने तुम्हें भी तो धोखा दिया है पर तुम उन्हें कहाँ मार पाए अब तक? बोलो? “


” मारना तो चाहता ही हूँ। बस मौका नही मिला? “

” मारना तो मैं भी चाहता हूँ आदित्य , बस यही सोच लो मुझे भी मौका नही मिला। ”

राजा के मुहँ से ऐसा सुनते ही आदित्य एक बार फिर चौन्क गया….

” क्या सच में भैया? “

” हाँ आदित्य ! गुस्सा तो दोनो पर ही बहुत आया था मुझे भाई , लेकिन मेरे साथ ये समस्या है कि गुस्से में जैसे औरों का दिमाग काम करना बंद कर देता है मेरा ज़रा ज्यादा चलने लगता है। इसलिए मेरे निर्णय औरों से अलग हो जातें हैं।
     अब सुनो जैसे ही हम लोगों को केसर से ये पता चला कि किसी आदित्य ने मेरा नाम लेकर उसके साथ गलत किया वैसे ही समर और प्रेम उस आदित्य यानी तुम्हारी खोज में लग गए।
   हालांकि एक शक केसर पर यह भी हुआ कि हो सकता है वो अपने साथ हुई ज्यादती का ढोंग रच रही हो लेकिन फिर लगा कि अगर एक प्रतिशत भी उसकी बात में सच्चाई हुई तो तुम्हे  ढूंढना ज़रूरी हो जाएगा।
   तुम्हारी तलाश कर लेने के बाद तुम्हारे बारे में सच जानना था इसलिए मैं और प्रेम तुम्हारे ऑफिस में घुस गए और समर रह गया विराज के पास।
     मैं कभी सामने वाले का पूरा सच जाने बिना उसे सजा नही देता।
   तुम्हारे साथ काम करते हुए ये तो समझ में आ गया कि तुम बेहद गुस्से वाले थोड़े अकड़ू और घमंडी हो लेकिन ये भी समझ आ गया कि ये तुम्हारा असली स्वभाव नही है बल्कि अपने साथ हुई नाइंसाफियों ने तुम्हे दीन दुनिया से इतना उचाट कर दिया है कि तुम अपने चारों ओर एक खोल बनाये घूमते हो। जिससे दुनिया तुम्हारा असली चेहरा न देख पाए।
    और समझ आ गया कि न तुम गुस्सैल हो न अकड़ू और न घमंडी।
  अब बोलों अगर मैं केसर की बात मान कर सीधे तुम्हें सज़ा दे देता तो कैसे तुम्हारे भीतर का छिपा हुआ प्यारा छोटा भाई मुझे मिलता।
    असल में देखा जाए तो सज़ा तुम्हें मिल भी गयी। ज़िन्दगी भर तुम्हारे मामा ने जिस अजातशत्रु को मारने के लिए तुम्हारे अंदर ज़हर घोला आज तुम खुद मन प्राण से उसी अजताशत्रु का जीवन बचाने में लगे हो। ऊपरी तौर पर देखा जाए तो ये सज़ा ही है, लेकिन भाई मेरे तुम्हे मैं किसी सज़ा का हकदार नही मानता। जैसे ही मुझे और प्रेम को समझ में आया कि केसर की बातें भले ही सच हो पर तुमने उसके साथ ऐसा नही किया तब हम लोगों ने तुम्हारी सच्चाई तलाशी और सब समझ आ गया।
   तुम्हारे घर भी गए, जहाँ नौकरों के अलावा और कोई रिश्तेदार नही था। नौकरों में भी बाकी लोग तो काम कर फुर्सत हो जाते थे बस काका रह जाते थे उनसे बात कर महसूस हुआ कि तुमने उन्हें कभी नौकर समझा ही नही उल्टा हमेशा उनकी इज्जत करते रहे ।
   उनसे तुम्हारे जीवन के कई छुपे पहलुओं पर बात हुई और इसी तरह तुम्हारे बारे में और सब पता चलता गया।
   तुमसे भी जुड़े ठाकुर साहब ही निकले और इस तरह हमें पूरा यकीन हो गया कि हर एक मोहरे के पीछे चाल चलने वाला एक ही चेहरा है।
     रानी माँ की बात करूँ तो उन्हें  मैं कभी अपनी माँ की जगह दे ही नही पाया। मेरे लिए उनकी आंखों में मुझे प्यार कभी नही दिखा , बचपन से ही तिरस्कार और घृणा ही दिखी लेकिन मेरी माँ ने मुझे हमेशा सिखाया था कि बेटा घृणा का बदला घृणा से नही दिया जा सकता । बस माँ की वही एक बात मैंने हमेशा अपने मन में बांन्ध रखी थी और इसलिए मॉम की हर घृणा का बदला मैं प्रेम से देता गया।।
    जब रस्सी के बार बार आने जाने से पत्थर पर निशान पड़ जातें हैं तो वो तो आखिर एक औरत हैं एक माँ हैं, प्यार से कैसे अछूती रहतीं। और मैंने खुद महसूस किया कि धीरे ही सहीं लेकिन उनके स्वभाव में परिवर्तन दिखने शुरू हो गए।
    जब ठाकुर साहब ने बनारस पर मुझ पर गोली चलवानी चाही तब मॉम ने उन्हें साफ मना कर दिया था और कहा भी की वो किसी भी तरीके से विराज को गद्दी पर बैठाने की कोशिश करेंगी लेकिन मुझे कुछ नही होना चाहिए लेकिन ठाकुर साहब ने उनकी बात सुने बिना मुझ पर गोली चलवाई ।
     मेरे घर लौटने के बाद भी मेरे लिए चिंता उनका दिखावा नही था बल्कि उनका मन वाकई बदलने लगा था।
   उसके बाद मैंने जैसे ही बाँसुरी वाली बात रखी मॉम को मौका मिल गया ठाकुर साहब से किया वादा पूरा करने का।
  सच कहूं तो उस वक्त दिल से मैं भी यही चाहता था कि राजगद्दी छोड़ कर बाँसुरी को साथ लेकर कही निकल जाऊँ इस सारे झमेले से दूर। शांति से अपना जीवन गुजारने।
  लेकिन भगवान को ये मंज़ूर न था, और भगवान के साथ साथ मेरे शुभेच्छुओं को भी। दादी साहब बिल्कुल नही चाहती थी कि विराज गद्दी पर बैठे और उन्होंने ऐसे सब कुछ प्लान किया कि मुझे गद्दी पर बैठाना सब की मजबूरी सी हो गयी।
    गद्दी पर मेरे बैठते ही ठाकुर साहब वापस अपमान की आग में जलने लगे और मुझे कैसे हटायें यही सोचने लगे और तब उन्होंने मुझे दवाएं देना शुरू करवा दिया, हालांकि दवाओं के बारे में मुझे काफी समय तक कुछ पता नही था।
    और सच कहूं तो मुझे नही लगता कि मॉम को भी दवाओं के बारे में कुछ मालूम होगा, क्योंकि ठाकुर साहब ने अपने जिस डॉक्टर को अस्पताल में काम पर लगवाया था उसके लिए बस यही कहा था कि वो एक गरीब डॉक्टर है और उसका नौकरी में लगना बेहद ज़रूरी है और शायद इसलिए मॉम ने उसे नौकरी पर रखवा लिया होगा।”

“राजा भैया! माफ कीजियेगा लेकिन इतना सब रानी माँ के बारे में पता चलने पर भी आप अभी भी उन पर भरोसा किये बैठे हैं कि वो आपकी जान की दुश्मन नही हैं”

” आदित्य मेरी बात समझो । मेरा ये कहना है कि रानी माँ पहले और जो रही हों लेकिन धीरे धीरे ही सहीं वो बदल चुकी हैं और अब वो मेरी जान नही लेना चाहती। मैं जानता हूँ ठाकुर साहब के लिए आज भी मैं उनका सबसे बड़ा दुश्मन हूँ लेकिन मॉम के विचार बदल चुके हैं वरना उन दोनों के इतने झगड़े न होते।

“फिर भी भैया आपको नही लगता कि आपके पिता और इस रियासत को उन्होंने बहुत बड़ा धोखा दिया है और इस धोखे की कोई माफी नही है।”

” बात तो तुम्हारी सही है आदित्य लेकिन उन्हें भगवान ने इसकी पूरी सज़ा दे दी है। उनके दोनो बेटों में से कोई भी राजकाज संभालने लायक नही बन पाया जिस बात का सपना आंखों में पाले उन्होंने जाने कितने अपराधों से अपने हाथ रंग लिए लेकिन फायदा क्या ? वही सिफर।
   विराज को गद्दी पर बैठा कर ही मैंने दिखा दिया और विराट वो तो कभी भी इन सब के लिए तैयार ही नही हुआ।
    जो औरत ज़िन्दगी भर अपने बेटों के राजा बनने का सपना देखती रही उसके लिए इससे बड़ी कोई सज़ा नही हो सकती कि उसके दोनो ही लड़के निकम्मे निकले।
   अब रही बात ठाकुर साहब की ये वो इंसान हैं जिन्हें मैं अपने जीवन में कभी माफ नही कर सकता। इनके लिए चाहे मैं जितना सोच लूँ मेरे मन में माफी की कोई भावना कभी जन्म ले ही नही सकती।
    नीति भी कहती है कि हर एक व्यक्ति का मूल्यांकन एक सा नहीं किया जा सकता। व्यक्ति के व्यक्तित्व के आधार पर उसकी सजा मुकर्रर की जाती है और ठाकुर को उसकी सजा मैं खुद दूंगा।
    आखिर राजपूत हूँ जब तक मेरी तलवार दुश्मन के खून से रंगेगी नही तब तक मेरी पगड़ी का रंग सजेगा नही।

आदित्य ने आगे बढ़ कर राजा के पैर छू लिए , राजा ने आगे बढ़ उसे गले से लगा लिया।

” चलो अब जनदर्शन के लिए चलतें हैं। वैसे भी महल के मुख्य द्वार पर सिक्योरिटी का इंतज़ाम खुद प्रेम देख रहा है । उसे चकमा देकर अंदर दाखिल होना ठाकुर साहब के लिए एक तरह से असम्भव है। प्रेम की टीम पूरी तरह से वहाँ तैनात है, तो अब डर की कोई बात नही हमें चलना चाहिए वैसे भी समर और प्रेम के रहते राजा को मारना इतना आसान नही है और अब तो आदित्य भी आ गया है अपने बड़े भाई की रक्षा करने। “

” जी भैया!”

  आदित्य के चेहरे पर संतोष तो था फिर भी उसके मन से शंका का पूरा नाश नही हुआ था।
  वो समर और राजा के साथ जनदर्शन के लिए निकल गया।

   ऑफिस से बाहर निकलते ही दरवाज़े के ठीक बाहर प्रेम अपने चार आदमियों के साथ उन लोगों का ही रास्ता देख रहा था।
   उन तीनों के बाहर निकलते ही प्रेम और उसके लोगों ने राजा के चारों ओर सुरक्षा घेरा बना लिया। और राजा को उस सुरक्षा घेरे में लिए आगे बढ़ गए।
   समर और आदित्य उनके पीछे आने लगे, और उन दोनों के पीछे और आजू बाजू प्रेम की टीम के बाकी लोग आगे बढ़ गए।
   महल के बाहर जनदर्शन के लिए अस्थायी मंच बनाया गया था। लोगों का हुजूम उमड़ा पड़ा था, एक तरह से पूरी रियासत वहाँ मौजूद थी।
     महल के बाहर का ये वही मैदान था जहाँ हर साल दशहरा के अवसर पर जलसा रखा जाता था। इसलिए स्टेडियम की तरह अंडाकार आकृति में बने उस मैदान में लगभग दस हज़ार से अधिक लोगों के बैठने की सुविधा भी थी।
  उसमें एक तरफ काफी वृहदाकर मंच बना था लेकिन  उसकी जगह आज के जनदर्शन के लिए मैदान के बीचोबीच एक गोलाकार अस्थायी मंच बना दिया गया था।
  राजा अपने लाव लश्कर के साथ जब वहाँ पहुंचा तब तक महाराज रानी माँ युवराज भैया काका साहेब समर के पिता दीवान साहेब आदि महल के बड़े पहुंच चुके थे और अपनी जगह ले चुके थे।
  राजा के वहाँ पहुंचते ही एक बार फिर जयकारे लगने शुरू हो गए….

  राजा अजताशत्रु की जय हो!!
 
   हाथ में जिनके चमके तलवार
  शेर सा दिल है वो घोड़े पे सवार।।
  जिसका नही शत्रु कोई पैदा हुआ
  ऐसे अजातशत्रु की जयजयकार…
                    जयजयकार ……

  
     ******

   राजा जब समर और आदित्य के साथ निकला तब उसने जाते जाते बाँसुरी को जनदर्शन के लिए तैयार होने भेज दिया था
   राज तिलक के लिए बाँसुरी ने दादी साहब की इच्छा का मान रखते हुए उनकी पोशाक पहन रखी थी।
   दादी सा का कहना था जब उनके पति राजगद्दी पर बैठे तब रियासतों का दौर खत्म होने चला था और अंग्रेज और उनके बाद वाली हिंदुस्तानी सरकार का यही दबाव रहता था कि आप रियासत चलाने के योग्य नही हैं।
    तब उन सब की हेकड़ी दूर करने और अपना शक्ति प्रदर्शन करने उस समय महाराज ने अपने और अपनी महारानी के लिए बनारस और मदुरै से कारीगर बुलवा कर राजतिलक के कपड़े तैयार करवाये थे।
   शुद्ध बनारसी कपड़ो में मदुरै के कारीगरों ने खालिस सोने की ज़री का काम किया था।
   बेलबूटे सजाते काढ़ते नही नही में महारानी के लहंगे में तीन हज़ार तोला सोना गुंथा गया था। लगभग तीस किलो के उस लहंगे को संभाले महारानी ने अपने पति के राजतिलक में उनके माथे पर तिलक लगाया था। वही कुछ हाल महाराज का भी था।
    उनकी सफेद जूतियों पर भी असली सोने की जारी के साथ माणिक मुक्ता पटे पड़े थे।
  महाराज की शेरवानी और जूतियां तो दादी साहेब के कमरे में कांच की अलमीरा में टंगी आने जाने वालों को हतप्रभ कर जाती थी लेकिन उनका खुद का लहंगा उन्हें अति प्रिय था और वही लहंगा उन्होंने अपने सबसे लाड़ले पोते की पत्नी को भेंट स्वरूप दे दिया था।
   आज राजा के राजतिलक के दिन दादी साहब ने एक शाम  पहले उसे और राजा को बुलाकर बाँसुरी से यही निवेदन किया था कि वही लहंगा वो भी अपने पति के राजतिलक में पहने।
इसी से उस भारी लहंगे में सजी बाँसुरी को जनदर्शन में होने वाली असुविधा से बचाने राजा ने उसे कपड़े बदल कर आ जाने को कहा और आदित्य के साथ आगे निकल गया।

    सत्य तो यही था कि उस तीस किलो के भारी लहंगे में असी फंसी बाँसुरी भी चाह रही थी कि कुछ हल्का सा पहन लिया जाए।
   वो निरमा और अपनी सहायिका के साथ अंदर अपने कमरे में चली गयी।

  फटाफट लहंगा बदल उसने धानी रंग की शिफॉन की पोशाक पहन ली….

  ” चंपा सुनो मेरे और निरमा के लिए फटाफट चाय बना कर ले आओगी क्या? “

” जी हुकुम अभी लायी!”

  सहायिका के जाते ही कमरे का दरवाजा बंद कर बाँसुरी निरमा का हाथ थाम कर बैठ गयी…

” जाने क्यों नीरू आज बहुत घबराहट सी हो रही है? “

” क्यों बंसी? अब तो सब ठीक हो गया। राजा भैया वापस गद्दी पर बैठ गए, तू महारानी बन गयी। तेरे जीवन का तो ये मधुरतम क्षण होना चाहिए।”

” हाँ होना तो चाहिए और हैं भी। पर कल शाम से ही अजीब सी बेचैनी ने घेर रखा था, रात भर मैं ठीक से सो भी नही पायीं हूँ, और तुझे बताऊं सुबह सुबह ही ज़रा आंख लगी और सुबह सुबह ही मैंने बहुत बुरा सपना देख लिया ।”

” क्या देखा बंसी? बता दे, बता देने से सपना पूरा नही होता। “

” नीरू इतना बुरा सपना है कि मैं बता भी नही सकती। मैंने साहेब के बारे में देखा है और इतना बुरा की …

बाँसुरी कहते कहते रुक गयी..

” मैं समझ गयी। तुझे कुछ कहने की ज़रूरत नही है बंसी। मामी कहतीं हैं जिसके बारे में ऐसा देख लो उसकी सारी अला बला उतर जाती है और उसकी उम्र भी बढ़ जाती है। अब तू चिंता मत कर तेरे साहब की बला उतर गयी ,समझी! निश्चिन्त रह।

   निरमा से बात कर बाँसुरी को थोड़ा हल्का महसूस होने लगा, इतनी देर में सहायिका चाय भी ले आयी..

” राजतिलक होने तक मेरा उपवास था न इसलिए कुछ नही खाया था, इसलिये चाय की तलब सी लगने लगी थी।”

” अच्छा तो तिलक होने तक राजा रानी कुछ नही खाते हैं क्या? “

” राजा नही सिर्फ रानी नही खाती है। हमें व्रत करना होता है पति का राजतिलक होने के बाद ही हम खा सकतीं हैं। लेकिन साहेब को तो राजतिलक के पहले महल की सभी औरतें अपने हाथ से एक एक निवाला खिलाती हैं। खास माँ और भाभियां। तो आज साहेब को रूपा भाभी , जया भाभी, काकी माँ, पिंकी और फूफू साहेब ने अपने हाथों से फल और मिठाईयां खिलाई हैं।
     रानी माँ ने तो इनके लिए अपने हाथों से खीर भी बनाई थी। और सबसे अंत में इन्हें उन्होनें अपने हाथों से खीर खिलाई भी है। तो इनका तो पेट भरा  है। ”

  बाँसुरी की बात सुन निरमा ज़रा सोच मन पड़ गयी। उसे जब से यह बात मालूम चली थी कि बाँसुरी के दूध में दवा मिलाने वाली केसर थी लेकिन उसे भी रानी माँ का पूरा संरक्षण मिला हुआ था, तभी से वो जाने क्यों रानी साहब से मन ही मन ज़रा द्वेष रखने लगी थी।
   अब भी मालूम नही क्यों वो रानी माँ पर पूरी तरह यकीन नही कर पाती थी।
   
” बुरा मत मान जाना बंसी पर एक बात पूछ सकती हूँ?”

“कैसी बात कर रही है नीरू। ये भी कोई पूछने वाली बात है? बोल ना क्या सोच रही है?”

” तूने खीर पहले किसी से चखवाई थी या सीधे राजा भैया को खिला दी? “

  निरमा के सवाल पर बाँसुरी चौन्क कर निरमा को देखने लगी..
  उसे भी रानी माँ के बारे में कुछ थोड़ा बहुत आभास तो था लेकिन बावजूद उसके दिमाग मे एक बार भी ये क्यों नही आया कि खीर को एक बार किसी और को चखवाने के बाद ही राजा को खिलाने देना चाहिए था।

  बहुत ज्यादा तो नही लेकिन रानी माँ के बारे में इतना तो वो भी जानती थी कि वो विराज को गद्दी पर बैठाना चाहती थीं, और इसलिए तो इतना सब तामझाम हुआ। ये और बात है कि विराज खुद ही संभाल नही पाया और गद्दी छोड़ गया पर रानी माँ की तमन्ना तो यही थी आखिर।
  तो कहीं ऐसा तो नही की खीर में ज़हर मिला कर राजा को उन्होंने खिला दिया और …

  अपने मन में बातें गूंथती बाँसुरी सोच में डूबी खड़ी थी कि उसकी सहायिका बाहर से तेज़ कदमों से भागती चली आयी और ज़ोर ज़ोर से बाँसुरी को पुकारने लगी…

” महारानी हुकुम जल्दी चलिए, वहाँ राजा अजातशत्रु गिर  …”

   बाँसुरी सहायिका की बस इतनी ही बात सुन पायी और पहले से दिमाग में चलती उसकी उलझनो ने एक कहानी सी बुन ली, उसने मन ही मन सहायिका की बात को आधा ही सुन ये सोच लिया कि राजा अजातशत्रु गिर गए हैं और बस इतना सुनते ही बाँसुरी खुद बेहोश होकर गिर पड़ी….

क्रमशः


aparna ….

  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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