जीवनसाथी-102




   जीवनसाथी — 102


     बाँसुरी सहायिका की बस इतनी ही बात सुन पायी और पहले से दिमाग में चलती उसकी उलझनो ने एक कहानी सी बुन ली, उसने मन ही मन सहायिका की बात को आधा ही सुन ये सोच लिया कि राजा अजातशत्रु गिर गए हैं और बस इतना सुनते ही बाँसुरी खुद बेहोश होकर गिर पड़ी….

    निरमा ने सहायिका की सहायता से उसे उठा कर बिस्तर पर लिटा दिया और उसके पास बैठी उसकी हथेलियां मसलती रही।
    सहायिका के डॉक्टर को बुलाने की बात पर निरमा ने अस्पताल से किसी को बुलाने की जगह पिया को ही फ़ोन कर बुला लिया।
  इस वक्त किसी को बाहर से बुलाने में ज्यादा हंगामा होने की संभावना देखते हुए ही निरमा ने पिया को बुला लिया था।
    पिया के आते में बाँसुरी को होश आ गया था। पिया ने कुछ ज़रूरी जांच के बाद अगले दिन बाँसुरी को अस्पताल बुला लिया था…

” आपके कुछ टेस्ट करने होंगे मैम , उसके बाद ही कुछ क्लियर बता पाऊँगी। वैसे ऐसा पहली बार हुआ न ? “

  बाँसुरी ने हाँ में सर हिला दिया..

” कोई घबराने वाली बात तो नही है पिया? “

” नो नॉट ऐट ऑल। “

  बाँसुरी ने निरमा की तरफ देखा..” साहेब ?”

” अरे बिल्कुल ठीक हैं तुम्हारे साहेब। फ़िज़ूल ही तू बेहोश हो गयी। उस चंपा की बच्ची की भी अच्छी क्लास ले ली मैंने। वो ये कहने जा रही थी कि तुम्हारे साहेब गिरनार पर बैठ कर मंच तक गये हैं और ये अभूतपूर्व दृश्य वहाँ उपस्थित सभी मीडिया कर्मियों ने कैप्चर कर लिया है। और इस दृश्य की साक्षी आप यानी साहेब की हुकुम भी बन पाए इसलिए समर ने तुझे बुलाने उसे भेजा था। “

  पिया की प्रश्नवाचक दृष्टि देख निरमा हँसने लगी..

” गिरनार यानी रियासत का सबसे पुराना हाथी। वो इनके साहब यानी राजा जी का प्रिय हाथी  है। राजा जी के दसवें जन्मदिन पर ग्वालियर रियासत के राजा के यहाँ से तोहफे में आया था। राजा अजातशत्रु की शान कहलाता है गिरनार। और जब अपनी पूरी सजधज के साथ झूम झूम कर चलता है तो लगता है जैसे ऐरावत आ गया। “

” मतलब सफेद हाथी हैं? “

” हाँ सफेद हाथी हैं।

“तब तो मुझे भी देखना है। आप लोग भी तो वहीं जा रहें हैं ना? मैं भी साथ चलूं? “

पिया के सवाल पर निरमा और बाँसुरी दोनो ही मुस्कुरा उठी..

” बिल्कुल चलो। पर ये बताओ कि हमारी महारानी बाँसुरी चल सकती हैं या इन्हें आराम करने दिया जाए। “

” जी चल सकती हैं अब नींबू पानी के बाद इन्हें पहले से बेटर लग रहा होगा? “

हाँ में सर हिला कर बाँसुरी भी उठ बैठी।

तीनों वहाँ से मैदान की तरफ निकल गए…

तीनो साथ साथ चल रहे थे कि पिया के मोबाइल पर समर का मैसेज चला आया…

” कहाँ हो? “

समर का मैसेज पढ़ वो मुस्कुरा उठी..

” क्यों ?”

” ऐसे ही बस पूछ लिया? “

” काम पर हूँ।”

” ओके ! वैसे आज हुकुम का जनदर्शन था तो मैंने सोचा तुम्हे इनवाइट कर लूं। तुम भी हमारे राजा रानी को देख लो। “

” वो तो मैं दोनो से मिल भी चुकी हूँ। “

” वो अलग बात थी। आज दोनो अपने असली अवतार में हैं । और रियासत की सारी जनता आयी थी इसलिए मैंने सोचा तुम भी आ जाती..

हंसते हुए पिया ने अपनी लाइव लोकेशन समर को भेज दी…
   उसकी लाइव लोकेशन देख समर चौन्क गया

” तुम महल में हो ? तुम महल में क्या कर रही हो? “

” आपकी महारानी जी ने बुलवाया था। आप को तो अभी याद आया कि मुझे बुलाया जाए। “

” अरे नही यार। कल से थोड़ा ज्यादा ही बिज़ी था। अब चलो फटाफट आ जाओ। ऐसे मोबाइल पर घुसा हुआ मैं अच्छा नही लगता।”

” बस इसे ही कहते हैं सेल्फ ऑब्सेस्ड। मैं ऐसे में अच्छा लगता हूँ ऐसे में नही लगता। मैं इत्ता हैंडसम हूँ मैं इतना स्मार्ट हूँ। अरे कभी खुद को छोड़ दूसरों को भी तो देखिए।”

” आ जाओ तुम्हे देख लेता हूँ। “

” बस बातें बातें बातें करवा लो मंत्री जी से, पैसे थोड़े न लगने हैं आखिर? “

” हा हा हा!! चलो बस करो। इस बारे में बाद में बात करेंगे । अभी फटाफट पहुंचो। हुकुम जनता को सम्बोधित करने वाले हैं।”

मुस्कुरा कर फ़ोन रख पिया भी बाँसुरी के पीछे चल पड़ी।

  प्रेम जनदर्शन कार्यक्रम में पहले से ही था और अभी समर के बताने के बाद पूरी मुस्तैदी से अंदर आये सभी लोगों को देखने जांचने की कोशिश में लगा था। लेकिन इतने लोगो की भीड़भाड़ में खुद का चेहरा छिपाए कोई और भी था जो भीतर आ चुका था…

” कोई भी अपने चेहरे को ढाक कर नही रखेगा, सभी से निवेदन है कृपया चेहरे पर रखा गमछा या रुमाल हटा दें।”

  प्रेम की टीम के सदस्य भीड़ भाड़ से गुजरते हुए सभी से अपील करते जा रहे थे।

  मंच में ही एक तरफ महाराज और रानी माँ के लिए भी आसन थे। रानी माँ  शांति से बैठी कार्यक्रम की प्रतीक्षा कर रहीं थीं की उनका फ़ोन घनघना उठा…       फ़ोन पर आए नम्बर को देख उन्होंने अपने साथ बैठे महाराज को देखा और फ़ोन लिए एक ओर चली गयी…

” हम यहाँ इधर उधर ठोकरें खा रहे और आप मंच पर आसीन हैं ? आपको ज़रा सा भी नहीं लगता है ना हमारे लिए? “

” आप यहाँ कहाँ पहुंच गए? कहाँ हैं अभी आप?”

” बस ऐसी जगह हैं कि आप साफ नजर आ रही हैं? “

ठाकुर साहब की बात सुन रानी माँ इधर उधर देखने लगीं..

” ऐसे यहाँ वहाँ देख कर हमें नही ढूंढ पाएंगी आप? “

“”क्यों आये हैं आप यहाँ? “

” ओहो ऐसे तेवर? जैसे आप जानती नही की हम क्या चाहतें हैं और क्यों आएं हैं? “

” अब क्या चाहतें हैं आप ठाकुर साहब? “

” अब क्या चाहतें है तो आप ऐसे पूछ रहीं जैसे हमारी सारी चाहतें पूरी कर दी हों आपने। अब तक जो करते आये हैं हम अकेले ही तो करते आये हैं , आपको तो आपके बेटों के सिवा कुछ नज़र ही कहाँ आता है। अगर आपके बेटे हमारे बीच नही होते तो अब तक आप हमें भुला चुकी होतीं।”

” ये सब क्या फसाद लिए बैठे हैं आप ? अब तो ये सब भूल जाइए। अब जो जैसा है वैसा ही रहने दीजिए और हो सके तो सब कुछ भूल भाल कर यहाँ से वापस चले जाइये। वैसे भी किस चीज़ की कमी है आपको। एक रियासत ही होने से सब कुछ थोड़े न हो जाता है। धन दौलत रुतबा किस बात की कमी है।”

” अच्छा तो क्या सिर्फ धन दौलत रुतबे के लिए ही था ये जो था? “

“नही था। लेकिन अब तो सब भूल जाइए। उम्र के इस पड़ाव पर आकर हमें लगने लगा है कि ये सारी बातें कितनी गैरजरूरी थीं। ये बदला ये लालच इन सब की कोई ज़रूरत ही नही थी।”

” तुम्हें क्यों ज़रूरत होगी? तुम तो वैसे भी बड़ी रानी को मार कर गद्दी पर पहुंच ही गयीं फिर जब बच्चों का समय आया तब चाल चल कर विराज को गद्दी पर बैठा दिया लेकिन जब ये लगने लगा कि विराज गद्दी के लायक नही है और रियासत नही संभाल पाने के कारण कही जनद्रोह न तो जाए और तुम्हारे पास विराज को हटा कर उस अजताशत्रु को बैठाने के अलावा कोई चारा नही बचा तब बड़ी चालाकी से तुम उसके पाले में चली गयीं । इस डर से की कहीं राजा बनने के बाद वो तुमसे बदला लेने के लिए कहीं तुम्हे रियासत से निकाल न फेंके तुमने उसकी तरफदारी शुरू कर दी और साथ ही हमें रास्ते से हटाने के लिए अजातशत्रु की बीवी को भेज दिया।
   उसने जाने कौन  कौन से गड़े मुर्दे उखाड़ने शुरू कर दिए और हमारे किये हर कुकर्म का लेखा जोखा पोथी पत्रा तैयार कर हमारे मुहँ पर मार गयी।
   सब कार्यों के सबूत उसके पास हैं यहाँ तक कि उसके पति पर बनारस पर चलाईं जाने वाली गोली पर भी हमारा नाम लिख रखा है उस घमंडी एस डी एम ने. क्या नाम है उसका …”

” बाँसुरी ?”

” हाँ उसी बाँसुरी ने। अपने कद से ऊंचा काम कर गयी है वो भी आते ही। उस लड़की को पता नही है कि उसने किस पर हाथ डाला है, उससे तो ऐसा बदला लिया जाएगा कि उसकी सात पुश्तें कांपेगी। “

” अब उसके पीछे पड़ने से आपको क्या मिलेगा ठाकुर साहब। अब ये सब छोड़िए।

” हम इतनी आसानी से किसी को नही छोड़ने वाले। उस लड़की और अजातशत्रु को तो कभी नही। दोनो को ऐसी मौत मारेंगे की मौत भी घबरा जाएगी। बहुत घमंड है उस लड़की को अपने पति पर तो पहले उसका पति मरेगा और फिर वो भी तड़प तड़प कर जान दे देगी। हमारी तलवार हमारी बंदूक प्यासी है और इसकी प्यास बुझाना हमारा धर्म है। ”

” गलत कर रहे हैं आप। बल्कि हम कहते हैं आप सरेंडर कर दीजिये, अभी भी कुछ नही बिगड़ा है।”

“बिगड़ा आपका कुछ नही है रानी साहेब। आपके तो दोनो हाथो में लड्डू है। पहले आप हमारे साथ थीं क्योंकी आपको विराज को गद्दी पर बैठाना था अब आप अजताशत्रु के साथ हैं क्योंकि आपको अपना जीवन बचाना है। हद दर्जे की स्वार्थी औरत हैं आप। आप किसी की सगी नही हो सकती , कभी नही। ”

” ऐसा ही है तो आप हमें मार दीजिये। आपके बदले की आग शायद हमारे खून से ठंडी हो जाये। आपकी तलवार की आपकी बंदूक की प्यास बुझाने के लिए अगर हम ये कर सकते हैं तो हमें खुशी होगी।”


” अब असली खुशी तो हमें तभी होगी जब आपके खानदान का नामों निशान मिट जाएगा। और सबसे पहले मरेगा अजताशत्रु!
   लेकिन इतनी जल्दी नही। अभी तो हम आपके चेहरे पर फैली घबराहट को और देखना चाहते हैं। जाइये जा कर अपने पति के पास बैठ जाइए।
   पर जो भी हो रानी साहिबा आज भी आप भले ही अपने पति के साथ बैठीं हो पर मन में तो हम ही होंगे।

” आप कुमार को कुछ नही करेंगे। उस पर हमला नही करेंगे आप! आपको हमारी कसम।”

” अभी के अभी तोड़ दी आपकी कसम! अब हमें कोई फर्क नही पड़ता न आपकी कसम से और न आपसे।
  अब आप बैठ कर इंतज़ार कीजिये हमारी गोली को अजातशत्रु के सीने के आर पार जाते। भले ही हम पकड़े जाएं मारे जाए लेकिन आज अजताशत्रु को कोई नही बचा सकता। ”

  रानी माँ और कुछ कह पाती कि ठाकुर साहब ने फोन बंद कर दिया। रानी मां के दुबारा लगाने पर फोन बंद आने लगा, वो परेशान हाल वापस जाकर अपनी जगह पर बैठ गईं….

राजा अजताशत्रु का उद्बोधन शुरू होने वाला था उसके पहले राजा जी के मंत्री समर सिंह मंच पर एक ओर रखे माइक पर चले आये …

” मैं समर सिंह मंच पर आसीन सभी आदरणीय जनों और आप सभी गणमान्य नागरिकों  का अभिवादन करता हूँ।”

  समर के अभिवादन के साथ ही उत्साहित जनता ने करतल ध्वनि से सभा गुंजायमान कर दी।
   उसी समय समर के मोबाइल पर मैसेज बीप बजी..

” जंच रहें हैं मंत्री जी! पर कभी तो काली या सफेद के अलावा कोई और शर्ट पहन लिया कीजिये ।” 

पिया के भेजे मेसेज पर नज़र पड़ते ही समर मुस्कुरा उठा… मुस्कुराते हुए उसने अपनी बात आगे बढ़ाई…

” आप सभी की आंखें जिस प्रतीक्षा में थी आज आखिर आप सभी का वो चिरप्रतीक्षित दिन आ गया। आप सभी के प्रिय राजा हमारे राजा “राजा अजताशत्रु सिंह बुंदेला” आज वापस अपनी राजगद्दी पर बैठ चुके हैं….
    गद्दी पर बैठना और रियासत को संभालना राजा साहब के लिये अपनी संतति का पालन करने जैसा ही है। वो हमेशा से अपनी प्रजा के पालक ही रहें हैं। उनके यहाँ नही होने पर भी अपरोक्ष रूप से उन्होंने आप सभी का ध्यान रखा ही है, लेकिन अब धीरे धीरे सरकार हुकुम के कार्यो में उनका पूरा पूरा साथ देने में असमर्थता जता रही है। मनमाने ढंग से हुकुम की बनाई योजनाओं पर कोई क्रियान्वयन नही कर रही है।
  हुकुम ने गांव के एक ओर पशुभूमि योजना तैयार कर के प्रस्ताव भेजा था इसके अंतर्गत इधर उधर आवारा घूमते पशुओं के लिए रियासत में एक ओर चारागाह और पशुओं के दान पानी की व्यवस्था की जाएगी जिससे पशुओं पक्षियों को भी आहार मिल सके। पहले सरकार ने समर्थन किया लेकिन अब उसी ज़मीन के लिए रोड़ा लगा रही है। अब ऐसे में कुछ भी अकेले अपने दम पर करना मुश्किल हो जाता है। और ये तो सिर्फ एक योजना है ऐसे ही जाने कितनी योजनाएं है जो अब तक शासन के बक्से में बंद पड़ी रह गई।
   इसी सब निपटने के लिए हुकुम ने यह निर्णय लिया है कि वो अब चुनाव में भी उतरेंगे..

  समर के इतना कहते ही ज़ोर की हर्ष ध्वनि के साथ जनता ने जोरदार तालियां बजानी शुरू कर दीं।
  मुस्कुराते हुए समर ने पलट कर एक नज़र राजा की तरफ देखा वो भी बैठा मुस्कुरा रहा था।।

” आप सब से यही उम्मीद थी कि आज तक जितना प्यार आप लोगों ने अपने राजा जी को दिया है यही प्यार जब हमारे राजा जी मंत्री बन जाएंगे तब भी देते रहेंगे।”

  समर खुद ही अपनी ही बात पर धीमे से हँस कर राजा को माइक पर बुला कर एक तरफ हाथ बांधे खड़ा हो गया।

   राजा के माइक पर आते ही वापस ज़ोर की हर्षध्वनि शुरू हो गयी।
  राजा ने मुस्कुरा कर अपनी जनता को देखा और दोनो हाथ जोड़ दिए। एक बार फिर राजा अजातशत्रु की जयकारों से पूरा मैदान भर गया…

*******


   आदित्य मंच के दोनों तरफ बने सिक्योरिटी मचान पर खड़ा दूरबीन हाथ में लिए उस भीड़भाड़ में अपने मामा को ढूंढ रहा था।
   आज उसे अपना सारा बचपन अपनी आंखों के आगे से गुजरता दिख रहा था।
  उसकी मामी से उसे कभी कोई स्नेह नही मिला था। माता पिता का प्यार तो उसने कभी पाया ही नही लेकिन जब तक उसके नाना जीवित रहे उन्होंने उसे कभी कोई कमी नही होने दी।
   उसके नाना के घर की यही सबसे बड़ी समस्या थी कि परिवार तो बहुत बड़ा था लेकिन अपना कहने को वहाँ कोई न था।
उसकी माँ और मामा बस दो ही सगे भाई बहन थे.. उनमें भी माँ उसे जन्म देकर रहीं नही और मामा जी के मामी से कोई संतान नही हो पाई।
  नाना जी का लंबा चौड़ा परिवार ज़रूर था, उनके चार उनसे छोटे भाइयों का परिवार भी साथ ही रहता था लेकिन सभी अपने अपने स्वार्थों में लिप्त थे।
   नाना जी के चारों भाइयों  के भरे पूरे परिवार थे।  छोटी सी रियासत नुमा पैतृक संपत्ति के कारण घर पर होने वाले ढेरों विवाद के बावजूद सभी एक साथ ही थे।
   लेकिन ये साथ भी नाना जी के रहने तक ही था।
उसे आज भी याद है, बचपन में परिवार के किसी भी बच्चे से कोई भी गलती हो हर कोई उसे ही कूट जाया करता था एक नाना जी ही थे जो हमेशा आकर उसके बहते ऑंसू पोंछ दिया करते थे।
  उस वक्त तो वो बहुत छोटा था इसलिए उसे उस नफरत का कारण कभी समझ ही नही आया कि आखिर क्यों घर भर की औरतें उसे देखते ही मुहँ चढ़ा लिया करती थी,घर भर के मर्द उससे नौकरों सा व्यवहार करते थे और बच्चे उन्हें तो उनके अभिभावकों ने सख्त मनाही कर रखी थी उसके साथ उठने बैठने खेलने कूदने से।
  खाने के समय पर जब घर भर के बच्चों को साथ बैठाया जाता तब उसकी मामी उसकी थाली एक किनारे सबसे अलग लगा दिया करती। एक बार तो उसने ये बात नाना जी से अनजाने ही कह भी दी थी। उसमें मामी की शिकायत करना है ऐसा कुछ तो सोचा ही नही था लेकिन उसके बाद नाना जी से पड़ी डांट का बदला मामी ने उसकी चमड़ी उधेड़ कर ही लिया था।
  रात जब नाना जी के कमरे में सोते वक्त वो दर्द से कराह उठा तब नानाजी ने उसकी शर्ट ऊपर कर उसकी नाजुक सी पीठ पर उभर आये गुलाबी निशान देख लिए थे।
   इतने छोटे बच्चे को इतनी कड़ी और कठोर सजा देने वाली बहु को फिर उन्होंने अगले ही दिन आड़े हाथों लिया था। पर हाय री किस्मत !
    अगले दिन बहु को डांटते डपटते ही दिल का ऐसा ज़बरदस्त दौरा उन्हें पड़ा कि ईलाज के लिए अस्पताल गए नानाजी फिर कभी वापस लौट कर नही आ पाए।
    और इतने बड़े घर परिवार में वो एक बार फिर अकेला रह गया।
   उसे हमेशा से अपनी ज़बरदस्त याददाश्त से चिढ़ थी। बचपन की छोटी से छोटी याद भी उसके जहन में ऐसे बसी थी जैसे कल ही कि बात हो।
   एक बार किसी बात पर उसकी मामी ने उस पर हाथ उठा दिया था और उनके गुस्से को सहन करने की क्षमता चूक जाने के बाद वो खुद गुस्से में पैर पटकता वहाँ से चला गया था लेकिन उसकी आँखों से एक बूंद ऑंसू नही टपका था। वहीं बैठे मामा जी फिर उसके पीछे भागे चले आये थे और उसे मना ही लिया था। और उसी दिन के बाद से शायद उसके मामा जी ने उसके अंदर की सहनशीलता को परख लिया था और उसके अंदर के इंसान को पत्थर बनाने में कोई कोर कसर नही छोड़ी थी।
     उस छोटी सी घटना के बाद से मामा जी उसे अपने साथ ही रखने लगे थे, अपने साथ घुमाना फिराना और राजा अजातशत्रु की रियासत और उनके खानदान की बुराई गिनाना यही उनका काम रह गया था। पर इस सब में एक बात ये अच्छी हो गयी कि उन्होंने आदित्य को बदला लेने के काबिल बनाने के चक्कर में उसकी पढ़ाई लिखाई पर अतिरिक्त ही ध्यान देना शुरू कर दिया था।
   उसका दिमाग इतना तेज था कि मामा जी को कभी उसके लिए बहुत ज्यादा खर्च करने की ज़रूरत ही नही पड़ी। स्कॉलरशिप की सीढ़ियां चढ़ते उसने अपनी प्रतिभा के बल पर ही रियासत के राजकुमारों के लिए बने स्कूल में अपना स्थान बना लिया था।
  ये उसकी योग्यता ही थी कि एक एक कर सफलता की सीढ़ियां चढ़ता आज वो एक नामी बिज़नेस मैन बन चुका था।
वक्त कैसे करवट लेता है कोई उससे पूछता। वही घर परिवार के लोग, वही रिश्ते की मामियां जो पहले उसे देख नाक भौं सिकोड़ती थी अब उसके लंबे चौड़े कारोबार पर रीझ कर अपनी सखियों की बेटियों के रिश्तों का चुग्गा उसके लिए फेंकने लगी थी। अपने बच्चों को उससे दूर रखने वालियों के वही बच्चे आज उसी की फर्म में काम कर रहे थे।
    अपने अनचाहे से बचपन की तंग और कड़वी यादों ने ही तो उसे गज़ब का चिड़चिड़ा और सख्त मिज़ाज़ बना छोड़ा था ।
  मामा जी ने वाकई उसका जीवन नरक बनाने में कोई कसर नही छोड़ी थी।
   जब पहली बार उसके शिक्षक ने उसकी शिकायत की थी कि उसने अपने साथ पढ़ने वाले लड़के पर गुस्से में कुर्सी के हत्थे से वार किया तब मामा जी ने उसे डांटने की बजाय उन शिक्षक महोदय को ही आड़े हाथों ले लिया था।
   ऐसे ही एक बार किसी ने जब मामा जी को ये बता दिया कि वो स्कूल के बाहर दोस्तों के साथ छिप कर सिगरेट पी रहा था तब भी उसे डांटने के बजाय मामा जी ने बताने वाले को ही उल्टा डपट दिया था….

“राजपूती खून है, सिगरेट चिलम के छल्ले नही उड़ाएगा तो क्या धुनि रमायेगा मसान में? “

और शिकायत करने वाला उलटे पैरों वापस लौट गया था।
   मामा जी ने उसी शाम उसे वापस बुलाया और अपने साथ बैठा कर पिलाना शुरू कर दिया। क्या अगर उसके सगे पिता होते तो ऐसा करते। कभी नही।
माना कि उनके घरों में पीना पिलाना सामान्य बात होती है लेकिन उम्र का एक लिहाज तो होता ही है, और होना भी चाहिए।
   वो कितना भी तेज हो गुस्से वाला हो पर फिर भी सिर्फ दो दिन की मुलाकात में ही उसकी अजातशत्रु के सामने अब ग्लास पकड़ने की हिम्मत नही होगी।
   मामा जी ने तो उसे ऐसी लत लगवा दी की कुछ समय पहले तो उसकी तबियत भी बिगड़ने लगी थी। डॉक्टर ने कहा भी था कि अगर वो इसी तरह पीता रहा तो एक दिन उसका लिवर खराब हो जाएगा। पर उसे खुद की जान की फिक्र ही कहाँ थी। बल्कि आज के पहले उसे कभी न अपनी न किसी और कि जान की फिक्र थी लेकिन आज ….
    आज मामला बदल चुका था। आज तो उसकी भावनाये अजातशत्रु के लिए इस कदर परिवर्तित हो चुकी थीं कि वो उनके लिए अपने प्राण भी त्याग सकता था।
   बल्कि अब उसके अंदर ये भावना प्रबल होने लगी थी की आज तक उसके किये हर पाप का प्रायश्चित करने का यही मौका है कि राजा अजताशत्रु किसी तरह बच जाएं भले ही उनकी जगह उसे खुद को क्यों न मरना पड़े।
      उसके हाथ में वही गन थी जो कभी अजताशत्रु को मारने के लिए मामा जी ने ही उसे भेंट की थी। एक बार गन बाहर निकाल उसने हाथ में रख बड़ी ममता से उसे देखा और फिर वापस डाल लिया।
    भले ही किसी भी कारण से दी हो लेकिन इस गन की गोलियों पर कभी राजा अजताशत्रु का नाम नही लिखा जा सकता।
    भीड़ भाड़ से नज़र हटा कर उसने मंच पर सामने खड़े राजा जी पर नज़र डाली और आँखों को झपक कर वहीं से प्रणाम किया और वापस भीड़भाड़ की तरफ देखने लगा।
   गहरी नज़रों से एक एक चेहरे को टटोलते आखिर उसकी नज़र उस एक चेहरे पर जाकर अटक ही गयी, जिन्हें वो पूरी शिद्दत से ढूंढ रहा था।
   उन्हें देखते ही वो उसने तुरंत प्रेम को फ़ोन लगाया और उनकी जगह उसे बता कर खुद नीचे उतर चुपचाप उनकी तरफ बढ़ने लगा…
    दूसरी तरफ से प्रेम भी अपनी सिक्योरिटी के लोगों को बाकी तरफ से उन्हें घेरने भेज एक ओर से उनकी तरफ बढ़ने लगा…
   मंच पर सामने खड़ा राजा अपने दिल की बात अपनी रियासत से कह रहा था…..

  ” मैं राजा अजताशत्रु सिंह आप सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ। आप सभी के स्नेह के कारण ही मैं वापस आ पाया हूँ।
  ईश्वर का शुक्रगुजार हूं कि उसने मुझे हर उस चीज़ से बख्शा है जो मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ थी।
मेरा बचपन, मेरे अभिभावक, मेरी शिक्षा दीक्षा, मेरी कार्यस्थली हर जगह पर उसने मुझे वही दिया जो मेरे लिए  श्रेष्ठ था। इसके साथ ही एक सबसे बड़ा तोहफा जो उसने मुझे दिया है वो है मेरे रियासत की जनता…

  एक बार फिर उल्लसित जनता जयकार करने लगी..

” आप सब पर अटूट विश्वास होने से मैंने ये निर्णय लिया है कि मैं इस बार चुनाव लड़ूंगा। चुनाव में अब बहुत समय बाकी नही है। अभी तक नामांकन भी नही दिया क्योंकि मन के किसी कोने में एक शंका थी कि क्या मैं चुनाव लड़ कर जीत पाऊंगा। सच कहूं तो , अभी जो भी पार्टी शासन में है और जो विपक्ष में मुझे दोनो की ही तरफ से चुनाव नही लड़ना है।
  मैंने अपनी पार्टी बनाने का निर्णय लिया है। और इसके लिए मुझे आपमें से ही कुछ जुझारू कार्यकर्ता चाहिये जो पार्टी के लिए जी जान लगा दें। मुझे कुछ ऐसे लोग भी चाहिए जो जिन्हें टिकट देकर अलग अलग जगह से मैं खड़ा कर सकूं मेरे साथ लड़ने के लिए। एक तरह से आप ये समझ लीजिये की मैं बिना किसी राजनैतिक पार्टी की सहायता के पूरी तरह अपने कंधों और आपके भरोसे ये चुनाव लड़ना और जीतना चाहता हूँ…
    अभी चुनाव जीतना तो दूर की बात है सबसे पहले तो चुनाव लड़ना ज़रूरी है। क्या हम सब मिल कर चुनाव लड़ भी पाएंगे? क्या हम सभी में वो एकजुटता है वो ताकत है कि हम शासन के विरुद्ध खड़े होकर लड़ सकते हैं?
     क्योंकि एक बात तो तय है अगर हम एक बार भी शासन के विरुद्ध अपनी पार्टी बना कर खड़े हो गए उसके बाद कहीं हम हार गए तो …..

  राजा की बात बीच में ही रोक ज़ोर ज़ोर से जनता ने नारे लगाने शुरू कर दिये कि राजा अजातशत्रु का हार जाना असम्भव है।

  मुस्कुराते हुए राजा ने आगे कहना जारी रखा।

”  बच्चों के स्कूल के बाद महिला कॉलेज खोला था रियासत में। लेकिन मुझे हमेशा से यही लगता था कि रियासत और आस पास के गांव के बच्चों को अगर चिकित्सा विज्ञान पढ़ना है या इंजीनियरिंग करनी है तो बहुत दूर जाना पड़ता है पढ़ने के लिए। इसके अलावा और भी कई ऐसी शिक्षा शाखाएं हैं जिनके बारे में अपूर्ण ज्ञान होने से हमारी रियासत के बच्चे पढ़ नही पाते क्योंकि उन्हें मालूम ही नही होता कि ये भी शिक्षा का एक हिस्सा है। इन्ही सब समस्याओं पर बहुत समय से हमारा सबका विचार विमर्श चल रहा था। युवराज भाई साहब हमेशा से यही चाहते थे कि जैसा हमारी रियासत का हम राजकुमारों के लिए स्कूल बना है सर्व सुविधा युक्त वैसा ही एक विश्वविद्यालय यहाँ बनना चाहिए जहाँ सिर्फ हमारी रियासत के बच्चे ही नही बाहर के भी बच्चे आकर उचित फीस में शिक्षा पा सकें।
   विश्वविद्यालय का आधे से अधिक खर्च रियासत वहन करेगा और बाकी का विद्यार्थियों की फीस से किया जाएगा।
  कोशिश तो शुरू से यही है कि शासन की मंजूरी के साथ ही कुछ वित्तीय सहायता भी शासन की तरफ से मिल जाये। पर अगर नही भी मिल पाई तब भी रियासत इस विश्वविद्यालय को खोल कर रहेगी। मेरी तरफ से लगभग सारी तैयारियां की जा चुकी हैं। शासन का अप्रूवल मिलते ही मेरा यूनिवर्सिटी का सपना भी पूरा होने की राह पर चल पड़ेगा। यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग की अलग अलग ब्रांचेज़ के अलावा मेडिकल कॉलेज, कला संकाय और वाणिज्य कॉलेज भी होंगे।
   रियासत से बाहर शहर की ओर जाते समय हमारी ही रियासत की काफी लंबी चौड़ी ज़मीन है । इस जमीन पर कभी हमारे पूर्वजों ने एक नगर बसाने की सोची थी। लेकिन किन्ही कारणों से उनका वो सपना पूरा नही हो सका।
     पूर्वजों के देखे उस स्वप्न को पूरा करने की चाह मेरे पूज्य दादा साहेब के मन में भी थी और उन्होंने उस नगर का नाम भी चुन लिया था।
  उनके अनुसार उस नगर में किसी वस्तु की कमी नही होनी थी और इसके लिए उन्होंने तैयारी करवानी शुरू भी कर दी थीं। और इसलिए वो ज़मीन खाली तो है लेकिन उसमें बगीचे उद्यान और कुछ एक आधी अधूरी इमारतें तैयार हैं। दादा साहेब ने उस नगर का नाम तक रख लिया था — “मायानगरी”
    एक ऐसी नगरी जहां किसी को किसी चीज़ की कमी न हो।
   वर्तमान संदर्भ को देखते हुए मुझे युवराज भैया और महल के बाकी युवाओं यानी मेरे भाइयों को लगा कि नगर बसाने की जगह अगर हम उस वृहत नगरी में विश्वविद्यालय बसाएं तो बहुत से विद्यार्थियों का भला हो जाएगा।
     हम सब की चाहत ऐसी प्रबल थी कि शासन की सहायता मिले बिना ही हमने वहाँ का काम शुरू करवा भी दिया है।
  मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए साथ ही अस्पताल होना भी आवश्यक है। उसके लिए हमारा 50 बिस्तरों का अस्पताल पहले ही खुल चुका है।
  उसका निरीक्षण होने के बाद हमे चिकित्सा महाविद्यालय की अनुमति मिल चुकी है। इसलिए मायानगरी का एक बड़ा हिस्सा मेडिकल कॉलेज के लिए निर्धारित किया जा चुका है। वहाँ की इमारतें,लैब मोर्चरी लड़कों और लड़कियों के हॉस्टल बन कर तैयार हो चुके हैं।
   इंजीनियरिंग की अलग अलग फैकल्टी के लिए ऑडिटोरियम कक्षाएं लैब लड़को लड़कियों के हॉस्टल तैयार करने के साथ ही वहाँ के प्रोफ़ेसर लेक्चरर के रहने के लिए कॉलोनी भी डेवलप की जा चुकी है।
   कला संकाय, विज्ञान , वाणिज्य के लिए भी अलग अलग कक्षाएं स्टाफ रूम्स लाइब्रेरी लैबोरेट्री सभी कुछ पूरी तरह तैयार हो चुके हैं।
   सभी कॉलेज बिल्डिंग्स के बीचोंबीच सेंट्रल लाइब्रेरी है।
    उस पूरी मायानगरी को हम सब ने मिल कर शिक्षा का हब बनाने की तैयारी कर ली है।
   बहुत सी बातों के लिए शासन की स्वीकृति मिल भी चुकी है , कुछ एक चीजों की स्वीकृति मिलते ही एक महीने के अंदर यूनिवर्सिटी का शुभारंभ …..

    राजा की बात पूरी नही हो पाई थी कि सट की आवाज़ के साथ एक गोली उसके कान के पास से छूते हुए निकल गयी।
    गोली उसके माथे पर निशाना लगा कर साधी गयी थी लेकिन जब तक गोली उसका माथा फोड़ कर आगे बढ़ती, उससे तेज़ गति से रानी माँ ने आकर उसे एक ओर धक्का दे दिया, जिससे गोली कान के पास से होकर गुजर गई..
    लेकिन चलाने वाले ने एक के बाद एक लगातार तीन फायर किए।
  पहली भले ही राजा के कान के पास से गुज़र गयी लेकिन बाकी की दोनों गोलियाँ उसके सीने पर उतारने को निशाना साधा गया था।
    उन तीन गोलियों को चलाने वाले ने अगली गोली भी राजा पर साध रखी थी लेकिन तब तक में प्रेम ने उसे पकड़ कर उसका हाथ इतनी जोर से पकड़ कर मरोड़ा की वो दर्द से कराहता नीचे गिर पड़ा।
    उसकी गन उछल कर दूसरी ओर गिर पड़ी थी, जिन्हें सुरक्षा कर्मियों ने उठा लिया।
   घुटनों पर झुके ठाकुर साहब को अपने गन पॉइंट पर रखे प्रेम की आंखों में खून उतर आया था। वो गुस्से में वहीं शायद ठाकुर साहब को गोली मार चुका होता लेकिन इधर उधर फैले हाहाकार के बीच उसे बाँसुरी की चीख ‘साहेब ‘ सुनाई दी और वो ठाकुर को अपने आदमियों के हवाले कर तुरंत स्टेज की ओर भाग खड़ा हुआ।
    प्रेम के ठाकुर साहब के पास पहुंचते तक में आदित्य भी पहुंच चुका था। लेकिन इतनी तैयारियों के बाद भी आखिर वो लोग चूक ही गए और ठाकुर साहब की गन से गोली चल ही गयी…..

क्रमशः

aparna…..

  
   





 



   




  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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