जीवनसाथी – 104

जीवनसाथी – 104





       अपनी लाल लाल आंखों से खिड़की से बाहर दूर आकाश को देखते राजा अजातशत्रु की आंखों से ऑंसू बह चले, तभी आकर किसी ने उनके कंधे पर हाथ रख दिया।
   राजा ने पलट कर देखा , सामने विराज खड़ा था।

  राजा उससे गले लग सिसक उठा।
दोनों भाई एक दूसरे को सहारा दिए रोते रहे, पास खड़ा विराट भी उन दोनों के गले से लग गया…..

    ” हुकुम निकलने की सारी तैयारी हो गयी है। रानी माँ को लेकर जाने के लिए एयर एम्बुलेंस तैयार है।”

  समर ने जितने धीमे शब्दों में हो सकता था कहा और चुपचाप एक ओर खड़ा हो गया।
    तीनों भाई अपने आंसू समेटते समर के साथ आगे बढ़ गए।
   उन लोगों के रानी माँ को लेकर महल पहुँचते में युवराज ने सारी तैयारियां कर रखीं थीं।

   सारे महल के साथ ही साथ जैसे सारी रियासत भी अपनी रानी को अंतिम विदाई देने रास्ते पर चली आयी थी।
     रानी माँ को महल में लाने के कुछ समय बाद उनके अंतिम दर्शनों के लिए महल के बाहर बगीचे में रखा गया था और एक एक कर शहर के गणमान्य लोग ,और जनता आती जा रही थी और दर्शनों के बाद फूल चढ़ाती एक ओर से निकलती जा रही थी।

   ऐसा लग रहा था जैसे सारा महल दुख में डूब गया था।

   महल के नियमों का पालन करते हुए आखिर रानी माँ का अंतिम संस्कार कर दिया गया।
   
एक युग का अंत हुआ। एक अध्याय  समाप्त हुआ।

  जाते जाते रानी माँ आखिर पश्चाताप पूरा कर ही गयी। उनके मन की सारी ग्लानि उनका सारा दुख सिर्फ उनके और राजा अजातशत्रु के बीच ही रह गया। उन्होंने क्यों अजातशत्रु की गोलियां अपने सीने पर ले लीं ये राज़ उनके साथ ही दफन हो गया। क्योंकि उनकी राज की बात तो अजातशत्रु किसी से कहने जाएंगे नही।
    अपनी जीवन की सारी गलतियों सारे पाप को उन्होंने अपने अंत समय में राजा से माफी मांग कर तर लिया।
   कहा भी नाता है गलती करने वाले को अगर ये एहसास भी हो जाये कि वो गलत है तो वहीं उसकी गलतियां माफ हो जातीं हैं।
     
   रानी माँ और उनके बेटों का राज़ उनके और राजा के बीच ही रह गया। उन दोनों के अलावा कोई जानता था तो वो थे ठाकुर साहब । और उनसे ये बात महल में महाराज तक पहुंच सकती थी, इसी बात को सोचते राजा ने एक निर्णय ले ही लिया।

  महल में सभी इस दुर्घटना से चकित थे, दुखी थे किसी को कुछ समझ नही आ रहा था कि अचानक ये सब क्या हो गया।

  उस रात फिर महल में किसी से कुछ खाया पिया नही गया।
  
  वक्त जैसा भी हो गुज़र ज़रूर जाता है। ये महल के लिए कठिनतम समय था पर गुजरता जा रहा था।
महल के रिश्तेदारों का आना जाना लगा हुआ था। उस पर बाँसुरी की तबियत भी सही नही थी। उसके माता पिता भी आ चुके थे।
    महल में चलती रस्मों के बीच  फिर बाँसुरी को राजा से अपनी तबियत के बारे में कहने का वक्त भी नही मिला।
   एक एक कर रस्में  निपटती गयीं और रिश्तेदार महल से विदा ले निकल गए।

   बाँसुरी की छुट्टियाँ भी समाप्त हो चुकी थीं उसे अपने काम पर लौटना था। राजा के पास भी अब चुनाव की तैयारियों के लिए समय कम बचा था । सो सभी अपने काम पर लग गए ।
  इतनी सारी व्यस्तता के बाद भी कभी अचानक राजा को रानी माँ से हुई आखिरी भेंट याद आ जाया करती। उनकी अपने बच्चों के लिए चिंता याद आ जाती। और उनसे किया खुद का वादा याद आ जाता।

  अगले दिन बाँसुरी को वापस देहरादून निकलना था। ठाकुर साहब के कारनामों की फाइल्स तैयार करवा कर कोर्ट भेजनी थी। और भी ढेर काम थे। एक दिन पहले शाम में निरमा ने बाँसुरी और राजा को अपने घर बुला रखा था।
     बाँसुरी पहले ही वहाँ पहुंच चुकी थी।दोनों सखियां बगीचे में बैठी बातें कर रही थी कि बाँसुरी के फ़ोन पर पिया का फ़ोन चला आया।
    पिया ने कुछ जाँच करवाई थी उसकी रिपोर्ट वो बाँसुरी को भेजने वाली थी। बाँसुरी ने उसे भी निरमा के घर बुलवा लिया।

   बगीचे में मीठी इधर से उधर भागती खेल रही थी। उसके पीछे पीछे बाँसुरी भी भागती उसे पकड़ने की कोशिश में थी …

” रानी साहिबा अब ये दौड़ना भागना आपको बंद करना पड़ेगा। “

   बाँसुरी चौन्क कर पिया को देखने लगी.. ” क्यों?

” क्योंकि आपकी पदोन्नति हो गयी है। आप माँ बनने वाली हैं। “

बाँसुरी का चेहरा खिल उठा। निरमा भाग कर उसके गले से लग गयी…

” बहुत बहुत बधाई हो बाँसुरी । मुझे लग ही रहा था कि तू हम सबको गुड़ न्यूज़ देने वाली है। जय हो महारानी साहिबा।”

  बाँसुरी मुस्कुरा कर नीचे देखने लगी..

” लेकिन रानी साहिबा आपसे कुछ कहना है। “

” हाँ कहो पिया? “

” आपकी कुछ जांचे और होंगी।”

बाँसुरी से पहले निरमा ने ही सवाल कर दिया…

“लेकिन क्यों ? क्या हुआ ? इतनी शुरुवात में ही इतनी सारी जांचों की क्या ज़रूरत? “

” जी इनकी अब तक जो भी जांचें हुई हैं उससे ये पता चल रहा है कि इनका गर्भाशय कुछ दवाओं के निरंतर प्रयोग के कारण थोड़ा कमज़ोर हो गया है और बच्चे को नौ महीने तक संभाले रखने में अक्षम हो सकता है।”

  पिया की बात सुनते ही निरमा परेशान सी बाँसुरी की तरफ देखने लगी। लेकिन बाँसुरी बिना परेशान हुए पिया तक चली आयी..

” साफ साफ कहो पिया की मैं ये बच्चा कैरी कर सकती हूँ ना? “

” एक और जांच की रिपोर्ट कल तक आएगी उसे देखने से ये स्पष्ट हो जाएगा मैम ! इसलिए कह रहीं हूँ आप पहले टेस्ट की रिपोर्ट देख लीजिये अगर आपका यूटरस कैपेबल है तभी आप बेबी के लिए सोचिये वरना अबो्र्ट करवा लीजियेगा। वरना आगे जाकर ये प्रॉब्लम क्रिएट कर सकता है।”

” ओके! मैं कल ही तुम्हारे हॉस्पिटल ही आ जाऊंगी। फिर मुझे वापस भी निकलना है। कल शाम की ही फ्लाइट है। निरमा कल के टेस्ट की रिपोर्ट के पहले मैं साहेब से कुछ नही बताना चाहती। तुम समझ रही हो न? क्योंकि अगर अबो्र्ट ही करवाना पड़ गया तो अभी से उन्हें एक बार खुशखबरी देकर फिर दुख देने का कोई मतलब नही। अगर टेस्ट में कुछ गड़बड़ हुई तभी उन्हें सारी बात बता कर निर्णय लिया जाएगा। क्यों पिया ठीक है ना?  “

” यस मैम !”

  उन लोगों की बातों के बीच ही राजा प्रेम और समर भी चले आये।
   राजा को अपनी पार्टी के बारे में कुछ बातें करनी थी इसलिए शेखर को भी बुला लिया था।
   
      जब से राजा ने ये घोषणा की थी कि वो राजनीति में उतरना चाहता है पक्ष और विपक्ष दोनों ही पार्टियां उसे खुद में मिलाने को एक से बढ़ कर एक प्रस्ताव रख रहीं थीं।
   इन्हीं प्रस्तावों की आड़ में समर ने शासन पर थोड़ा दबाव बनवा कर मायानगरी के लिए परमिट पास करवा लिया था।
  विश्वविद्यालय खोलने के लिए आवश्यक मानकों को पहले ही वो लोग पूरा कर चुके थे।
  चूंकि राजा खुद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पढ़ा था उसके दिलो दिमाग पर बीएचयू  हमेशा छाया रहता था।
   उसका सपना बीएचयू की तर्ज पर यूनिवर्सिटी खोलने का ही था, फिर भी मायानगरी के ले आउट के पहले वो नालंदा,तक्षशिला सबका चक्कर लगा चुका था।
    और इन सबको देखने के बाद उसने अपने विश्विद्यालय का डिसाइन तैयार करवा लिया था।
वो रात दिन एक किए अपने काम में व्यस्त था। जब कभी वो शाम को खाली अपने कमरे में अकेला होता उसे एकदम से रानी माँ और उनकी कही आखिरी बातें याद आ जातीं और वो वापस कमरे से अपने ऑफिस का रुख कर लेता।
  इसी सब व्यस्तता मेँ बाँसुरी की तबियत उसके मुरझाए से चेहरे पर भी उसका ध्यान नही जा पा रहा था।

  बाँसुरी की शाम की फ्लाइट थी और उसे सुबह डॉ पिया से मिलने जाना था। अपनी बाकी रिपोर्ट्स को पर्स में रख वो तैयार हो रही थी कि पर्स से झांकती एक गुलाबी सी अस्पताल की पर्ची पर राजा की नज़र चली गयी।
    वो जब तक उसे पर्स में ठीक से रख पाता बाँसुरी हड़बड़ी में बाहर आई और राजा के माथे को चूम कर पर्स उठाये बाहर निकल गयी..

” इतनी जल्दबाजी में जा कहाँ रहीं हैं हुकुम?

” निरमा के साथ अस्पताल जा रही हूँ। वापस आकर सब बताती हूँ, तब तक आप भी अपना काम निपटा लीजिये”

बाँसुरी जल्दी जल्दी बाहर निकल गयी, और उसके निकलते में वो गुलाबी पर्ची बाहर गिर गयी…

  बाँसुरी अस्पताल पहुंची तब तक में उसकी पुरानी सारी जांचों की रिपोर्ट्स आ चुकी थी।

   पिया के केबिन में बाँसुरी और निरमा पहुंच कर पिया का इंतजार कर रही थी । पिया किसी केस में थी, वो निपटा कर वहाँ चली आयी।
  आते ही उसने उन दोनो का अभिवादन किया और दराज से फाइल निकाल का बाँसुरी के हाथ में दे दी..

  बाँसुरी फाइल खोले पढ़ने लगी, सब कुछ मेडिकल टर्म्स में लिखा था…  समझने की कोशिश करती बाँसुरी के चेहरे पर प्रश्नवाचक चिह्न देख पिया उन्हें बताने लगी

” मैंम आई एम सॉरी।  पर अभी आपकी रिपोर्ट्स कुछ सही नही आई हैं। इस बार आप अगर ये बेबी कैरी करती हैं तो आप के और बेबी दोनो के लिए खतरा हो सकता है। तो मैं यही सलाह दूंगी की आप इस बार बच्चा न रखें। एबॉर्शन ही बेटर है।
   इन रिपोर्ट्स के ये मतलब नही है कि आप कभी कंसीव नही कर पाएंगी। नेक्स्ट टाइम बेबी प्लान करने से पहले ही आपको प्रॉपर ट्रीटमेंट दी जाएगी जिससे आप हेल्थी बेबी कैरी कर सकें।”

  बाँसुरी का चेहरा मुरझा गया। उसने सोचा था राजा को बताने के बाद उसके चेहरे की खुशी देखने में जो सुकून मिलेगा वो कितना प्यारा होगा।
  उसे खुद भी अब बच्चे की चाह थी। उसकी माँ भी उसे उसकी तबियत की लिए ढेरों हिदायतें देकर गयीं थीं कि ऐसे रहना वैसे रहना। खूब दूध, नारियल पानी पीते रहना। पपीता मत खाना…
   माँ तो उसे देखते ही समझ गयी थीं और उन्होंने ढेरों बातें अपनी बिटिया को समझा सीखा दी थी। जाने कहाँ से काला धागा लाकर उसकी बांह पर तावीज़ के साथ बांन्ध भी दिया था कि उनकी बेटी और उसकी संतान को किसी की नज़र न लगे।
उसे अपनी माँ को समझाना पड़ा था कि अभी महल में कोई उसकी अवस्था से परिचित नही है इसलिए थोड़ा अपनी खुशी को संभाले रखें।
   शुरू से वो चाहती थी कि पहले डॉक्टरी जांच हो जाये तभी वो अपनी अवस्था का सुसमाचार महल में देगी।
   और अब पिया से बात करने के बाद उसकी हिम्मत टूटने लगी थी।
   इतने दिनों बाद तो कोई खुशी की खबर उनके जीवन में आई थी उस पर भी ऐसा वज्रपात?

  लेकिन निरर्थक भावुकता के लिए उसके पास समय भी कहाँ था। उसे वापस लौट कर अपना काम देखना था इसके साथ ही मायानगरी के अंदर खुलने वाले कॉलेज का काम भी उसे देखना था। इतनी सारी ज़िम्मेदारियों के साथ खुद के बारे में सोचने की फुरसत कहाँ थी?

” ओके पिया ! मैं एबोर्शन के लिए रेडी हूँ। “

निरमा चौन्क कर बाँसुरी को देखने लगी। इतनी भावुक लड़की ने इतना बड़ा निर्णय कैसे एक झटके में ले लिया।
  वो बाँसुरी को देखती सोच रही थी… कि बाँसुरी ने एकबार फिर पिया के सामने अपनी बात दुहरा दी। उसी वक्त उसके मोबाइल पर राजा का फोन आने लगा…

” कहाँ हो हुकुम? “

” कहीं नहीं , बस आ रही हूँ वापस !”

” नही तुम वहीं रुको,मैं आ रहा हूँ तुम्हारे पास।”

” अरे पर आप क्यों आ रहे? आपको ढेर सारा काम है मैं आ रहीं हूँ ना। “

” अब छिपाओ मत। तुम अस्पताल में हो मुझे पता है और मुझे खुशखबरी देने की तैयारी में हो। तुम्हारा सरप्राइज मैंने फेल कर दिया । ”

और इतने दिनों बाद राजा के खुल के हँसने की आवाज़ सुन बाँसुरी खिल उठी।

“आप खुश हैं साहेब ? “

” खुश अरे मैं  पागल हो रहा हूँ खुशी के मारे। और एक तुम हो जो मुझे बिना बताए सारे टेस्ट अकेले अकेले करवाई जा रही हो। आखिर कब देने वाली थी मुझे सरप्राइज। बेबी के बर्थ के साथ ? ये भी हद है। मैंने रिसिप्ट देख कर जान लिया फिर सोचा में भी वेट कर लेता हूँ हुकुम जब बताएंगी तभी ऐसी एक्टिंग करूँगा की तुमसे ही पता चला लेकिन देखो न कैसा अधीर हो रहा हूँ कि रहा है नही गया। क्या करूँ? “

  बाँसुरी चुपचाप बैठी मुस्कुराती रही।
राजा अपने दिल की बातें कहता रहा और वो सुनती रही..
” बस दस मिनट में अस्पताल पहुंच रहा हूँ , तुम वहीं इंतज़ार करो। वहाँ से मंदिर चलेंगे, सबसे पहले देवी दर्शन करेंगे उसके बाद ही महल में सब को यह खबर सुनाएंगे।  अरे एक बात तो मैं तुमसे कहना ही भूल गया!”

” क्या साहेब ?”

” मुझे तो तुम्हारी गुड न्यूज पहले ही रानी माँ ने दे दी थी। “

” कब ? मैंने तो उन्हें कुछ नही बताया था!”

बाँसुरी के इस कब का कोई जवाब राजा के पास नही था। उसने रानी माँ की हकीकत बाँसुरी से भी छिपा रखी थी।

” तुम वो सब छोड़ो,मुझे तो लग रहा है , ये सब मॉम की ही ब्लेसिंग्स हैं कि जाते जाते भी वो तुम्हे  और मुझे अपना आशीर्वाद इस रूप में दे गयीं अब वही तुम्हारी रक्षा भी करेंगी। तुम देखना बाँसुरी हमारी प्यारी सी एक बेटी ही होगी,बिल्कूल तुम्हारे जैसी। “

  बाँसुरी ने मुस्कुरा कर उसे जल्दी आने कह फ़ोन रख दिया। बाँसुरी के फ़ोन रखते ही पिया ने उसकी तरफ पर्चा बढ़ा दिया…

” अभी ज्यादा समय नही हुआ है मैम तो आप ये दवा लेंगी तो उसी से एबो..”

“नही पिया। अब मैं कोई दवा नही लुंगी।” बाँसुरी की बात सुन निरमा और पिया दोनों ही चौन्क गयीं..

” ऐसे कैसे बाँसुरी। अब तक तो तू तैयार थी,फिर अचानक ? और फिर ये भी तो क्लियर नही है कि बच्चा कैरी हो पायेगा या नही। कही  आगे जाकर खुद कुछ गड़बड़ हो गयी तो? “

“कुछ नही होगा निरमा। साहेब का भरोसा झूठ नही होता। उन्हें लग रहा कि मुझ पर और मेरे बच्चे पर रानी माँ की विशेष कृपा है तो वो ज़रूर बच्चे की रक्षा करेंगी। “

“पर मैम ये आपके लिए भी रिस्की है। आपका ये डिसीज़न लाइफ थ्रेटनिंग भी हो सकता है। “

” तुमने ‘भी’ लगाया न इसका मतलब नही भी हो सकता। ” बाँसुरी मुस्कुराने लगी

” मेरी माँ हमेशा कहती हैं पिया की आप जैसा अपने लिए सोचते जाते हो आपकी लाइफ वैसी ही बनती चली जाती है।अगर आप पॉज़िटिव सोचो तो सब कुछ पॉज़िटिव होता जाता है।
  फिर मैं क्यों डरूँ। अगर कुछ तबियत ऊपर नीचे हुई भी तो तुम हो न। मैं तुमसे कॉन्टैक्ट में रहूंगी ही।”

” वो तो ठीक है मैंम, लेकिन.”

” अब कोई लेकिन ,किंतु परंतु अगर मगर नही। बस सोच लिया मैंने। और एक बात निरमा तुझे और पिया बस को ये सब पता है तो प्लीज़ तुम दोनों सारी बातें अपने तक ही रखना। साहेब को इस बारे में नही पता चलना चाहिए। साहेब रानी माँ के जाने से बहुत दुखी थे, आज बहुत दिनों बाद उनके चेहरे पर रौनक दिखी है। मैं इस रौनक को जाने नही देना चाहती। और हाँ मैं तुम दोनो से प्रॉमिस करती हूँ अगर आगे किसी भी समय ऐसा लगा की बच्चे को रखने पर मुश्किलें बढ़ रहीं है तब मैं डॉक्टर की सलाह पर ही आगे का फैसला लूँगी।”

“किस बात का फैसला ले रहीं है आप?”

   राजा ने आकर प्यार से बाँसुरी के दोनों हाथों को थाम लिया…

” आपको अकेले छोड़ कर काम पर वापस लौटने का !”

राजा को जैसे अचानक कुछ याद आ गया..

” अरे हाँ आज तो तुम्हें वापस जाना है ना बाँसुरी? “

” हाँ ! आप तो भूल ही बैठे थे!”

” भुला नही था! बस तुम्हारे जाने की डेट याद नही रखना चाहता। अभी तो थोड़ा वक्त है ना, तो चलो मंदिर दर्शन कर तुम्हारे लिए देवी माँ का आशीर्वाद ले लेते हैं।”

  निरमा और पिया बाँसुरी को देखते रहे, बाँसुरी ने अपने जीवन का इतना बड़ा निर्णय ले लिया था वो भी राजा को बिना सच्चाई बताए।
   बाँसुरी ने आंखों ही में निरमा से चुप रहने का इशारा किया और राजा के साथ मंदिर जाने आगे बढ़ गयी। उसके पीछे धीमे कदमों से निरमा भी बढ़ चली।
   बाहर गाड़ी में प्रेम उन्हीं लोगों का इंतज़ार कर रहा था।

***

   शाम बाँसुरी को छोड़ने जाते हुए राजा उसे रोक लेना चाहता था,लेकिन साथ ही वो ये भी जानता था कि बाँसुरी जैसी ईमानदार और कर्मठ कर्मी से ऐसी उम्मीद करना मुश्किल है।

  बाँसुरी को इस हालत में अकेला छोड़ने का उसका बिल्कुल मन नही था। वो इस अवस्था में जब किसी के साथ  और सहयोग की उसे सबसे ज्यादा जरूरत थी , अकेली जा रही थी।
  राजा ने ज़िद कर उसके साथ महल की दो खास दासियों को भी भेजने का निर्णय सुना दिया।
   इस पर भी उसे कुछ खाली सा लग रहा था। उसका काम इस कदर फैला नही होता तो शायद वो भी बाँसुरी के संग चला जाता लेकिन उस पर महल की सारी जिम्मेदारी आ गयी थी, ऐसे में वो अपने मन का राजा रह भी कहाँ गया था?
   जल्दी ही उससे मिलने आने का वादा कर वो उसे फ्लाइट में बैठा कर वापस निकल गया।
   बाँसुरी अकेली नही थी। आदित्य को भी अपना काम धाम संभालने के साथ ही केसर से भी मिलना था, वहीं रेखा को इतने दिनों बाद अपनी सच्चाई मालूम चली थी। वो भी अपनी बहन से मिलना चाहती थी।
   रेखा और आदित्य भी बाँसुरी के साथ ही दून जाने निकल पड़े थे।

*****

     दिन बीत रहे थे, समय अपनी तेज़ी से आगे बढ़ता चला जा रहा था। रेखा को दून पहुंचे चार दिन हो चुके थे लेकिन उसे अब तक अपनी बहन से मिलने का मौका नही मिल पाया था।
   कायदे से वो ठाकुर साहब के घर यानी अपने मायके पहुंची थी। वहां के लिये, ठाकुर साहब की पत्नी के लिए वो आज भी उनकी बेटी रेखा ही थी। उनसे और सबसे मिलने जुलने में ही दिन निकलते जा रहे थे। ठाकुर साहब की पत्नी कभी ठाकुर साहब के जेल जाने को लेकर बहुत दुखी हो जाती कभी बिल्कुल सामान्य हो जाती, जैसे उनके लिए ये एक सामान्य बात थी।
   वो ही ठाकुर साहब की अनुपस्थिति में उनका व्यापार देख रहीं थीं।
ठाकुर साहब के सारे कारनामों से वो भी परिचित थीं लेकिन उनकी नज़रों में ठाकुर साहब गलत नही थे। कुछ उन्ही की तर्ज पर वो भी कारोबार आगे बढ़ा रहीं थीं।
  रेखा को एक दोपहर मौका मिल ही गया , उसकी आदित्य से पहले ही इस बाबत बात हो चुकी थी, उसी ने दोपहर के वक्त उसे लाल टिब्बा बुलाया था…

” मम्मी मैं आज रुचि से मिलने जाना चाहती हूँ। जाऊँ ?”

  रेखा जब से मायके आयी थी, उसके रंग ढंग कुछ बदले बदले से थे, ये ठकुरानी महसूस कर रहीं थीं लेकिन रेखा के स्वभाव का बदलाव उनकी समझ से परे था। पहले बात बात पर तुनकने वाली रेखा अब किसी बात पर कोई टोकाटाकी किये बिना शांत पड़ी रहती।
   पहले मनपसंद खाना न मिले तो थाली फेंक देने वाली रेखा इस बार जो सामने आ जाता चुपचाप निगल रही थी।
     जिसकी बातें ही खत्म नही होतीं थीं अब वो घर भर के लोगों की भीड़ में भी चुपचाप बैठी रहती। जैसे मन ही मन कोई जंग लड़ रही हो।
   ठकुराइन और बाकी लोग यह भी सोच रहे थे कि शायद ठाकुर साहब के कारण रेखा के ससुराल में जो बवाल मच गया उसके बाद रेखा को मायके आने की इजाज़त भी कितनी मुश्किल से मिली होगी। और इस सब चिंताओं में ही मन ही मन घुलती रेखा इस कदर परेशान है कि सामान्य नही हो पा रही है।
   इसके बावजूद जब रेखा ने रुचि से मिलने की इच्छा जाहिर की तो ठकुराइन का माथा ठनक गया।
   रुचि कॉलेज में रेखा के साथ ही थी। और दोनो की ही कभी आपस में नही जमी।
  शादी के बाद रेखा जहाँ अपनी ससुराल में पूरी तरह घुल नही पायी वही रुचि शादी के बाद अमेरिका के रंग में पूरी तरह रंग गयी थी। शादी के तुरंत बाद ही वो अमेरिका चली गयी थी और अब तक वापस नही आई थी।
   रेखा की बात सुन ठकुराइन भी सोच में पड़ गईं उन्हें लगा शायद वो वापस आयी हो।पर जाने क्या सोच उन्होंने घर के पुराने नौकर पूरन को रुचि के घर का चक्कर लगाने भेज ही दिया…

   पूरन ने आकर यही खबर दी कि रुचि जब से अमेरिका गयी वापस ही नही आई। जिसका  अंदेशा था वही हुआ।
    
   और रेखा के घर से निकलते ही ठकुराइन भी उसके पीछे घर से निकल पड़ीं।

*****

   इतने दिनों बाद ऑफ़िस पहुंच कर बाँसुरी अपने काम में पूरी तरह डूब चुकी थी। पुराने काफी काम पेंडिंग पड़े थे , जिनके साथ ही नए कामों का भी अंबार लगा था।
   वो एक के बाद एक फाइल्स पढ़ती उन्हें आगे बढ़ाती जा रही थी कि उसकी नज़र एक चिट्ठी पर पड़ी…

   “अभी भी वक्त है सुधर जाओ वरना दोनो पति पत्नी का वो हश्र होगा कि कुछ सोचने का भी वक्त नही मिलेगा।”

  इन दो पंक्तियोँ के अलावा कहीं कुछ नही लिखा था ,न चिट्ठी भेजने वाले का नाम न अता पता।
बाँसुरी ने चिट्ठी फाड़ कर डस्टबिन में डाल दी। वो अगली फाइल पढ़ ही रही थी कि उसके ऑफ़िस के बाहर एकदम से शोरगुल होने लगा…
    हल्ला जब घटने की जगह बढ़ता ही गया तब उसने अपने पियोन को बुला कर बाहर क्या चल रहा है पूछा ।
  पियोन कुछ जवाब दे पाता उतनी देर में भीड़ का एक रेला बाहर उन्हें रोकते लोगों को धक्का दे अंदर चला आया…

” आप ही हैं यहाँ की ए डी एम मैडम ?”

  उनमें से सबसे आगे खड़े तेज़ तर्रार आदमी ने बाँसुरी की ओर प्रश्न उछाल दिया..

“जी हाँ ! मैं ही हूँ। बोलिये क्या समस्या है आपकी? “

” हमारी समस्या स्वयं आप हैं मैडम ! आपने हमारे शहर के गणमान्य ठाकुर साहब को बिना किसी गुनाह के जेल भेज दिया, अब उनके पूरे परिवार के पीछे पड़ गईं हैं।
  आखिर आपकी दुश्मनी क्या है मैडम? आप क्यों ठाकुर साहब के परिवार के पीछे पड़ी हैं। “

” मैं क्यों उनके परिवार के पीछे पडूंगी। आपको कुछ गलतफहमी हुई है।मैं तो अब तक उनके परिवार से मिली भी नही,बात रही ठाकुर साहब को जेल में डालने की तो उसके पीछे उनके काले कारनामे हैं मैं नही!”

” आप तो ऐसे कह रहीं जैसे बड़ी दूध की धुली हैं आप! सबको पता है कैसे सेलेक्ट होकर आयी हैं आप यहाँ। भई राजा साहब की पत्नी को फेल करने का महापाप कौन करेगा  भला?”


” आपको अगर यही सब कहना है तो यहाँ से बाहर निकलिए और बाहर जाकर ये सब तमाशा कीजिये। “

” आप तो हमें भगाएँगी ही मैडम! सच किसी को हजम जो नही होता। यहाँ का बच्चा बच्चा जानता है ठाकुर साहब और उनके परिवार को। भगवान तुल्य ठाकुर साहब को हवालात की हवा खिलाने से पहले एक बार सोचा तक नही।इतना बड़ा निर्णय लेते हुए सोचा तक नही?

  बाँसुरी समझ चुकी थी कि इन लोगों के मुहँ  लगाना अपना पैर कुल्हाड़ी पर दे मारना है। वो चुपचाप बैठी अपनी फाइल्स खोल देखने लगी….
   वो आदमी बढ़ चढ़ कर बोलता रहा और बाँसुरी अपना काम करती रही।

  उन लोगों के ऑफिस से बाहर जाते ही बाँसुरी और उसके स्टाफ़ ने चैन की सांस ली…

  बाँसुरी के उससे एक जूनियर अधिकारी ने उन लोगों के जाते ही बाँसुरी के सामने पानी का गिलास बढ़ा दिया…

” क्यों वर्मा जी ! ये ठाकुर साहब तो कुछ अधिक ही प्रसिद्ध हैं दून में? “

“नही मैडम ऐसा कुछ नही है। बल्कि उनसे तो यहाँ के रहने वाले खूब चिढ़ते थे। उन्होंने तो अपने तुगलकी फरमानों से सबका जीना मुहाल कर रखा था यहाँ का!”

” तो फिर ये इतना सपोर्ट क्यों कर रहे थे।

” मैडम हमें तो लगता है ये ठाकुर साहब की आड़ में किसी और का काम है? “

” मतलब ?”

” मतलब ये कि आपके साहब यानी राजा जी चुनाव में उतर रहें हैं वो भी बिना किसी पार्टी की सहायता लिए।अब ऐसे में उनके विपक्षियों को डर तो है ही राजा जी से।
   अगर वो लोग किसी तरह आपको यहाँ से बदनाम कर नौकरी से सस्पेंड कर दें तो राजा जी के ऊपर एक दबाव बनेगा न।
अब मैडम आप तो जानती ही हैं प्रशासनिक वालों का जीवन कितना कठिन होता है। हर पल अंगारों पर ही चलाना है।
   अब अगर हमारे घर के किसी सदस्य पर किसी तरह का दबाव बनाना है तो हमारे काम में ये लोग ऐसे ही घोल घाल कर हमारा नाम खराब करने की कोशिश करतें हैं। जिससे हमारा नाम खराब हो। ज़ाहिर है पब्लिक वोट डालने से पहले उम्मीदवार की सातों पुश्तों की तहकीकात करती ही है। बस यही कारण लग रहा हमें तो। ये भी हो सकता है कि आपके द्वारा राजा जी पर पार्टी में मिलने का प्रेशर बनाना चाहते हों।

” यही तो मुसीबत है।सात पुश्तों की तहकीकात करने वाली जनता बस उम्मीदवार की ही तहकीकात कर ले न तो हमारे यहाँ के चुनाव में पारदर्शिता आने लगेगी।

” जी मैडम !”

” ओके वर्मा जी आप अपना काम देखिए। मैं जानती हूँ ऐसे लोगों को कैसे संभालना है।”
   

   इस सारी बातों को निपटा कर बाँसुरी रात में घर पहुंची तब तक थकान से चूर हो चुकी थी। अपनी अवस्था का ध्यान रखे बिना वो काम में लगी थी। उसकी माँ ने कहा भी था कि वो कुछ दिनों के लिए उसके पास आ जाएंगी लेकिन पापा अकेले कैसे मैनेज करेंगे कह कर बाँसुरी ने उन्हें आने से मना कर दिया।

   घर पहुंच कर खाने बैठी ही थी कि राजा का फ़ोन चला आया। मुस्कुरा कर उसने फ़ोन उठा लिया….

  ” कैसे रोज़ जान जाते हो कि अब खाना खाने बैठ रहीं हूँ। “

” बस दिल से दिल को राह जो है। आपको भूख वहाँ लगती है,मुझे यहाँ महसूस हो जाता है। “

” अच्छा जी! आपने खाना खाया साहेब ? “

” बस सोचा पहले अपनी हुकुम से बात कर लूं फिर खाना खाया जाएगा।”

  मुस्कुरा कर बाँसुरी ने उसे भी अपनी प्लेट मंगवाने को कहा और सुबह ऑफिस में घटी सारी बातें उसे सिलसिलेवार बताती चली गयी…

   तभी दरवाज़े पर किसी की आहट सी हुई। बाँसुरी की सहायिका उसे बुलाने चली आयी…
   बाँसुरी बाहर निकलती तब तक में पुलिस के दो आला अधिकारी भीतर चले आये…

” आई एम सॉरी मैडम !आपको इस वक्त थाने चलना होगा!”

  उनके ऐसा बोलते ही बाँसुरी हतप्रभ गयी।

  ” थाने लेकिन क्यों? “

” आप पर हत्या के प्रयास का आरोप है मैडम। मैडम आप भी जानती है। कि हम सब आपको कितना सम्मान देते हैं।
   आपको इस तरह साथ लेकर जाते हुए अच्छा नही लग रहा मैडम लेकिन कानून आप भी जानती हैं और हमसे ज्यादा अच्छे से जानती हैं, इसलिए अगर आप खुद चलेंगी तो ज्यादा सुविधा हो जाएगी….

” ठीक है!  पर क्या मैं एक बार अपने वकील से बात कर सकती हूँ?

  पुलिस वाले कि  इजाज़त मिलते ही बाँसुरी ने तुरंत समर को फ़ोन लगाया ……
     लेकिन बताती क्या, उसे खुद सारा मामला पता नही था……..

क्रमशः





    
  
  
   


   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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