जीवनसाथी – 106




  जीवनसाथी – 106



       लीना की बात खत्म होने तक बाँसुरी सांस रोके उसकी सारी बातें सुनती रही। उसे यकीन नही था कि कोई आदमी ऐसा भी हो सकता है कि सिर्फ और सिर्फ अपने फायदे के लिए अपनी पत्नी तक को दांव पर लगा दिया।
   सुबह से कुछ अधिक ही दौड़भाग हो चुकी थी, कुछ शारीरिक थकान और कुछ भूख से अब बाँसुरी को वहाँ अच्छा नही लग रहा था…
    फिर भी उसने खुद को संभाले रखा था…
अचानक उसे जैसे कुछ याद आ गया…

” लीना वहाँ ठाकुर साहब की पत्नी के साथ जो दूसरी औरत मिली वो कौन थी?”

कुछ देर लीना नीचे देखती चुप बैठी रही…
   फिर धीमे से उसने बाँसुरी को सच बता दिया..

” तुम्हारी देवरानी रेखा थी। ठाकुर साहब की बेटी। अंदाज़ा यही लगाया जा रहा है कि वो और उसकी माँ किसी से शायद मिलने जा रहीं थीं। शायद ठाकुर साहब के केस के लिए की कैसे उन्हें बचाया जाए? और विडंबना देखो अपने पति को ही बचने जाने वाली औरत को उसके पति ने खुद की जान बचाने मरवा दिया।
   एक पॉइंट ये भी हो सकता है कि ठाकुर साहब ने खुद अपने किसी आदमी से कह कर ठकुराइन को घर से बाहर उस समय पर निकलवाया हो और उन पर हमला करवा दिया हो।
    अभी इन्वेस्टिगेशन चल रही है, मामला थोड़ा और साफ हो तभी सच्चाई पता चलेगी।”

” रेखा से कोई पूछताछ नही हुई क्या? “

” नही अभी वो इस हालत में नही है। शायद एक्सीडेंट के समय वो बेहोश हो चुकी थी और उसे अपनी माँ का इस तरह चले जाना मालूम नही हो सका। अभी कुछ समय पहले ही होश आया है। अभी डॉक्टर्स ने ऑब्जरवेशन में रखा है, सुबह उससे पूछताछ की जाएगी।
   तुम्हारे लिए कुछ खाने को मंगवाया है, थोड़ा सा खा लो वरना सेहत पर असर पड़ेगा। “

   लीना के इशारे पर बाहर से एक अर्दली खाने की प्लेट लिए अंदर चला आया…
   थाली देखते ही बाँसुरी की सुबह से सोई भूख जाग उठी..

” वाह ! मशरूम मसाला और चांवल … देखते ही जो खुशी बांसुरी के चेहरे पर आई पहला निवाला लेते ही वो गायब हो गयी।
   उसे ऐसी उबकाई आयी कि उससे कुछ खाया नही गया…
   लीना ने एक नज़र उसे देखा और मुस्कुरा उठी..

” ओहो तो डबल प्रोमोशन हो गया है कलक्टरनी जी का। बहुत बहुत बधाईयां बाँसुरी! पर अभी मुझे बताओ कि तुम क्या खाओगी , वही मंगवा लेते हैं। “

  “अब कुछ मंगवाने की ज़रूरत नही है लीना। इनका खाना मैं साथ लेकर आया हूँ। “

  राजा को अंदर प्रवेश करते देख बाँसुरी के चेहरे पर हंसी खिल गयी। वो भाग कर राजा के गले से लग गयी…
    मन इतना परेशान था कि उसके ऑंसू बहने लगे..

” अब रोने की क्या बात है हुकुम? आ गया हूँ मैं। “

” हम्म थोड़ा परेशान हो गयी थी। आजकल मूड स्विंग भी बहुत होता है ना!”

बाँसुरी को प्यार से एक तरफ कर राजा ने लीना को देखा …

” थैंक्स लीना! तो क्या अब मैं बाँसुरी को लेकर जा सकता हूँ। “

” जी हाँ! सुबह हो सकता है कुछ पूछताछ के लिए आपको आना पड़े। वैसे आप परेशान मत होना मैं ही घर आ जाऊंगी।  और एक बात, आप लोग अभी रेखा को अपने साथ नही ले जा पाएंगे। उसे कल अस्पताल से छुट्टी के बाद हम ज़रा पूछताछ के लिए यहाँ ला सकतें हैं।”

” रेखा ? रेखा अस्पताल में है? “

लीना आश्चर्य से राजा की ओर देखने लगी। उसे लगा था कि राजा और बाकी के लोग इस बात को जानते होंगे।

” राजा साहब कल रात ठाकुर साहब की पत्नी और बेटी रेखा एक साथ ही बाहर निकले थे। वो दोनों ठाकुर साहब के बचाव के लिए कुछ सबूत इकट्ठे करने जा रहे थे शायद, और उसी बीच ये हादसा हो गया….
   … हालांकि ये भी कहा जा रहा है कि….

लीना कुछ देर को सोच में पड़ गयी कि क्या उसे पूरी बात बता देनी चाहिए या नही लेकिन वो आगे बता पाती उसके पहले ही समर जो कुछ देर पहले ही किसी के फोन के कारण बाहर गया था, वापस चला आया। और उसके राजा से कुछ बात करने के कारण लीना अपनी बात कह नही पायी।

” हुकुम विराज सा बहुत नाराज हैं। वो दरअसल जब लीना से आपकी बात हो रही थी उसी वक्त उनका फोन आया और उन्होंने ये बात सुन ली कि रेखा ठाकुर साहब के बचाव के लिए प्रयास करने जा रही थी।”

“” ओह्ह ये तो गलत हो गया।”

” जी हुकुम ये गलत हो गया। अब वो गुस्से में वहाँ से निकल रहें हैं यहाँ रेखा बाई सा की खबर लेने। और आप उनके गुस्से को जानतें ही हैं। वैसे उनसे बात होने के बाद विराट का भी हमें फ़ोन आया था । उन्होंने कहा है कि वो विराज सा को अकेले नही छोड़ेंगे। और कोशिश यही करेंगे कि वो अभी न आये पर अगर नही मानये तब वो भी साथ ही आ जायेंगे।”

” ठीक है, दोनो साथ रहेंगे तो कम से कम विराज का गुस्सा तो सम्भल जाएगा, लेकिन अब मुझे एक और बात की चिंता हो रही है समर।।
  एक तो ये कि रेखा ने हम सब के साथ ये धोखा क्यों किया? उसे क्या ज़रूरत थी ऐसा करने की? मतलब ठाकुर साहब की सारी सच्चाई पता चलने के बाद भी वो अपने पिता को बचाना और किसी तरह से इस सब से बाहर निकालना चाहती थी। वैसे रेखा को पूरी तरह गलत भी नही मान सकते क्योंकि वो तो ये सब अपने पिता के लिए कर रही है लेकिन अब विराज इस बात को समझेगा नही , उसने मॉम को खोया है और ज़ाहिर है अभी इस बात को ज्यादा वक्त बीता नही तो उसका इस बात को सामान्य मानना मुश्किल है। उसे यही लगेगा कि रेखा ने बहुत बड़ी गलती कर दी है। “

लीना बाकी बातें भी बताने की सोच रही थी कि राजा बाँसुरी को लेकर निकलने लगा। उसे भी बाँसुरी और उसकी हालत देख तरस आने लगा था। वो जितनी जल्दी घर पहुंच कर आराम कर ले उतना अच्छा है सोच कर लीना ने ठाकुर साहब के बारे में और कुछ नही कहा और समर और प्रेम के साथ राजा बाँसुरी को संग लिए अपनी कोठी के लिए निकल गया….. रात वैसे भी आधी से ज्यादा बीत चुकी थी।


     बाँसुरी ने भी थकान के कारण राजा से ज्यादा कुछ नही कहा।
   कोठी में पहुंचते ही बाँसुरी सीधे अपने कमरे में चली गयी।  राजा समर और प्रेम से बातें करता अपनी अगली रणनीति के बारे में सोच रहा था, उसे अभी सबसे ज्यादा चिंता विराज की ही हो रही थी। अचानक उसे आदित्य की भी याद आ गयी…

” समर आदित्य की क्या खबर है? वो भी तो यहीं होगा? रेखा को लेकर तो वो ही आया था दून !”

” हुकुम उनका फ़ोन बंद आ रहा है। कल शाम के पहले बात हुई तो थी पर ऐसी कोई खास नही, थोड़ा परेशान लग रहे थे। ज़ाहिर है अभी जैसी घटनाएं घट रहीं हैं उनका परेशान होना स्वाभाविक भी है।”

” हम्म !” छोटा सा जवाब देकर राजा फिर किसी सोच में डूब गया था। उसकी जिंदगी में सारे मोती ऐसे बिखरे पड़े थे उन्हें एक साथ एक धागे में सहेजना कितना मुश्किल लग रहा था।
   वो सोच में गुम था कि उसके मोबाइल पर बांसुरी का मैसेज चला आया…

” साहेब ऊपर आइये ! ”

  बाँसुरी का मैसेज पढ़ते ही वो प्रेम और समर को भी आराम करने बोल ऊपर चला गया…

” क्या हुआ बाँसुरी ठीक तो हो ना? “

  बाँसुरी ने मुस्कुरा कर राजा की आंखों में देखा …  और ना में सर हिला दिया…

” आप यहीं मेरे पास रहिये साहब! आजकल घबराहट सी होने लगी है, हर बात पर। “

  राजा ने हां में सर हिलाया और बाँसुरी के पास पहुंच गया।
   राजा की गोद में सर रखे बाँसुरी खिड़की से बाहर दिखते आसमान को देखती रही…
     वो अपनी ही परेशानी में गुम थी। उसकी तबीअत और उसकी प्रेग्नेंसी की जटिलता के बारे में राजा को कुछ नही मालूम था। उसने एक बहुत बड़ा निर्णय अपने अकेले के बलबूते ले लिया था। अगर वो राजा को सब बता देती है तो वो ज़रूर उसके स्वास्थ्य को देखते हुए उसे प्रेग्नेंसी टर्मिनेट करने ही कहेगा।
  वैसे ही उसकी परेशानियां कम नही हैं उस पर ये एक और सरदर्द हो गया। इससे अच्छा तो ये प्रेग्नेंसी ही नही होती।
   कुछ दे कर छीन लेना तो हृदय को हमेशा छलनी कर जाता है। आखिर भगवान ने उसके साथ ऐसा क्यों किया है।
  अभी भी एक डर तो हमेशा उसके मन में बना रहेगा कि कहीं आगे चल कर कुछ गड़बड़ न हो जाये। और ऐसा हुआ तब भी तो राजा दुखी हो ही जायेगा तो क्या  इससे अच्छा अभी ही बता कर बात खत्म कर लेना चाहिए । बांसुरी ने लंबी सांस खींची और बैठने ही वाली थी कि राजा ने उसे वापस खींच कर लिटा दिया। उसके बालों में हाथ फेरते वो उसे अपने बचपन के किस्से सुनाने लगा…
   अपनी माँ से जुड़ी बातें बताना उसे सदा से पसन्द था ये और बात थी कि माँ से जुड़ी यादें ही गिनी चुनी थी उसके पास।
  बस उन्हीं गिनी चुनी यादों के मोती वो बाँसुरी के साथ अक्सर चुनता अपने बचपन को याद किया करता था….

“माँ साहब को गाने का बहुत शौक था बाँसुरी ! मैं बहुत छोटा था पर मुझे बहुत अच्छे से याद है अक्सर शाम के वक्त माँ साहेब अपने कमरे में बैठ वीणा बजाया करतीं थीं।
   महल के नौकर चाकर भी सुनने आ जाया करते थे। और मैं मेरा तो पूछो ही मत, बिल्कुल खो जाता था उनके सुरों में।
   बाँसुरी ये जो हमारी बेटी होगी न उसे मैं सबसे पहला तोहफा अपनी माँ की वीणा ही दूंगा। मुझे उसे देख कर ऐसा लगेगा जैसे इतने सालों बाद मेरी माँ वापस आ गयी। है ना बाँसुरी!

  बाँसुरी की आंखें भर आईं , दुनिया भर के सामने इतनी मजबूती से खड़ा रहने वाला राजा अजातशत्रु उसका पति अंदर से अब भी एक बच्चा ही तो है। आज तक उसने राजा के अंदर की इस बात को पहचाना क्यों नही।
    वो एक कुशल शासक है,बहुत आज्ञाकारी छोटा भाई है तो उतना ही साज संभाल करने वाला बड़ा भाई भी है।
   जितना ही उन्मुक्त  और उतावला प्रेमी है उतना ही परवाह करने वाला , ध्यान रखने वाला पति भी है।
  अपनी प्रजा का पालक है तो मैत्री के लिए अपने प्राणों तक की परवाह न करने वाला सखा भी है।
  लेकिन उसके इन सारे रूपों में उसका बाल रूप उसने कहीं भीतर सहेज रखा है, छिपा रखा है सबसे। अपने अपूर्ण बाल्यकाल की मधुर स्मृतियों के साथ, जिन स्मृतियों में वो एक नन्हा बालक है और उसके साथ है सिर्फ उसकी माँ!

   राजा अजातशत्रु का एक पक्ष ये भी है कि उसकी उन स्मृतियों से उसने अपने हर करीबी को दूर रखा है। उन स्मृतियों की तिजोरी में उसके और उसकी माँ के अलावा कोई नही है , न उसकी प्रजा न पिता न भाई न दोस्त यहाँ तक कि बाँसुरी भी नही।
  उन यादों में गोते लगाता वो हमेशा एक नौ साल का बच्चा बन जाता है जो अपनी माँ का आँचल थामे बस उसके आगे पीछे घूमना चाहता है। बस उन्हीं की बातें सुनना चाहता है।
   वो बच्चा जो बार बार अपनी माँ की हथेली खोल कर सूंघ लेता है। और जब उसकी माँ पूछती है ” ये क्या मेरे हाथो को सूँघता रहता है  तू कुमार?

तो वो उतने ही भोलेपन से कह देता ” आपके हाथो से खुशी की खुशबू आती है माँ साहेब !”

  ” चल पगला! कुछ भी कहता है! खुशी की भी कोई खुशबू होती है!”  और प्यार से उसके बालों पर हाथ फेर वो इधर उधर व्यस्त हो जातीं।
   और उसी खुशी की खुशबू से महका वो छोटा सा लड़का अपने खिलौनों में व्यस्त हो जाता।
   उसे क्या पता था कि ये खुशबू उसके पास क्षणिक ही थी।।
   इसलिए तो अपनी माँ के जाने के बाद वो शायद अपना बचपना ही भूल गया था।
   सारे राजमहल के खिलाफ जैसे उसने अदृश्य तलवार खींच ली थी। महल के हर कायदे कानून की धज्जियां उड़ाने में उसे आनन्द आने लगा था।
    महल के नियमों को ताक पर रख उसने महाराज को पिता साहब की जगह डैड और रानी माँ साहेब को मॉम कहना शुरू कर दिया था। जाने छोटी मोटी ऐसी कितनी ही निरर्थक और उद्धेश्यरहित नियमावली को उसने अपने स्वयं के लिए बांन्ध कर फेंक दिया था।
   रियासत से बाहर पढ़ने की आज़ादी के लिए लड़ झगड़ कर बनारस जाना हो या बिना अनुमति लिए रियासत की आम जनता के घर पर हो रहे शादी ब्याह में सम्मिलित होना हो उसने हर जगह महल के नियम कानूनों वहाँ के प्रोटोकॉल को पलट कर रख दिया था।

      बाँसुरी से मिलने के बाद तो उसने सोच ही लिया था कि उससे शादी कर महल और रियासत सब छोड़ कर अलग चला जायेगा लेकिन उसकी नियति को ये मंज़ूर जो नही था।
  नियति के साथ साथ युवराज भैया, दादी साहेब, समर सब ने मिल कर जिस ढंग से उसे गद्दी पर बैठाया वो मना भी तो नही कर पाया था।
   और गद्दी पर बैठने के साथ ही एक नए अजातशत्रु का जन्म हुआ था।
  महल के नियमों कायदों के लिए प्रतिबद्ध , अपने वचनों के लिए कटिबद्ध अजातशत्रु!

स्नेह तो उसके मन में सदा से सबके लिए था,बस जिन नियमों की अवहेलना करता फिरता था अब उन्हीं नियमों का पालन सबसे करवाने लगा था।
  पर जीवन के इतने उतार चढ़ावों में भी उसने अपने अंदर का वो नौ साल का मासूम बच्चा जो अपनी माँ की हथेलियों में खुशी की खुशबू सूंघा करता था को बचा कर रखा हुआ था।

    बाँसुरी की आंखें झरने लगी थीं। वो जब से राजा से मिली थी हर बात के लिए उसी पर तो निर्भर होती चली जा रही थी। बिना मन की भास्कर से होती शादी में भी वो खुद कहाँ कुछ कह पाती अगर राजा ने आगे बढ़ कर उसे हिम्मत न दी होती।
    महल के लोगों को मनाना था या उसके मायके वालों को हर जगह राजा ही तो आगे था। वो तो बस उसे देखती मुग्ध होती हर जगह चुप ही खड़ी थी।
   यहाँ तक कि उसकी पढ़ाई उसकी तैयारी में भी वो हर कदम पर साये की तरह उसका साथ देता रहा और अपने सुख दुख के पलों में भावविह्वल होती वो कभी उसके अंदर छिपे बच्चे को देख ही नही पायी।

  वो जब कभी अपनी माँ से जुड़े किस्से उसे सुनाता,वो सुनती ज़रूर लेकिन उसके साथ ही वो अपने किस्से कहने लगती और अक्सर वो उसकी बातें सुनता चुप हो जाता।

  “राजा राजा! तुम इतने अच्छे क्यों हो? क्या सच में तुम्हारे जैसा कोई इंसान हो सकता है। नही ! शायद सैकड़ों सालों में कभी तुम्हारे जैसा कोई पैदा होता होगा और मेरी किस्मत है कि तुम मुझे मिल गए।
   तुम्हारी इस खुशी तुम्हारे बच्चे के लिए मेरी जान भी चली जाए तब भी मैं अब उसे जन्म देकर ही रहूंगी। “

अपने मन में चलती उहापोह से बाँसुरी को राहत मिल गयी थी।

  राजा खुद में खोया उसे कुछ न कुछ ऐसी बातें बताता जा रहा था जिन्हें सुन कर बाँसुरी को हंसी आये और वो थोड़ा सुकून महसूस कर सके। लेकिन उसकी गोद में सर रख कर उसकी बातें सुनती बाँसुरी की आंखें बरस रहीं थीं।

“अरे ये क्या?तुम रोने क्यों लगी?  क्या हुआ हुकुम। कुछ परेशान हो? “

गला इतना रुन्ध गया था कि वो कुछ बोलने की हालत में ही नही थी। उठ कर उसने राजा को गले से लगा लिया…

” साहेब ! एक बात कहुँ!”कुछ सम्भलने के बाद उसने अपने आंसू पोंछ कर राजा की तरफ देखा

” बोलो बाँसुरी!

” कभी मेरी भी हथेली सूंघ लो। शायद तुम्हारी खोई हुई खुशी की महक मिल जाये। “

” क्या हुआ बाबू ? तुम अचानक इतनी उदास कैसे हो गयी? “

  बाँसुरी की भरी हुई आंखें देख राजा ने उसे अपने गले से लगा लिया।
   बाँसुरी रोती रही , और वो उसके बालों पर हाथ फिराता बैठा रहा।
  उसे समझ आ रहा था कि ये सब बाँसुरी के मूड स्विंग्स के कारण हैं,इसलिए शान्ति से बैठे उसने उसे रो लेने दिया।

*****

   सुबह राजा के मना करने पर भी बांसुरी रेखा से मिलने चल ही दी…
   आखिर वो दोनो यहाँ साथ ही तो आयीं थीं दून।  रेखा के बहुत इसरार से बुलाने के कारण वो एक बार उसके मायके जाने भी वाली थी लेकिन उसी वक्त पड़े किसी ज़रूरी काम के कारण नही जा पायी थी। और बस उसी के बाद ये हादसा हो गया था। हालांकि ठकुराइन यानी रेखा की माँ ने उससे कभी सीधे मुहँ बात नही की थी।
  उस दिन भी फ़ोन पर गरज बरस कर फ़ोन उन्होंने पटक दिया था।
  
  राजा के साथ ही प्रेम और समर भी थे लेकिन अंदर सिर्फ बाँसुरी और राजा ही गए।
अब तक रेखा को भी होश आ चुका था। उसके मायके से भी रिश्तेदार वहाँ उससे मिलने आ कर जा चुके थे क्योंकि ठकुरानी का काम भी आज ही होना था, इसी से रेखा को आज ही छुट्टी दिलवाना भी ज़रूरी था।
   रेखा के रिश्ते के एक मामा बाहर अस्पताल की औपचारिकता पूरी कर ही रहे थे कि राजा और बाँसुरी के वहाँ पहुंच जाने से वो उनसे मिलने आगे बढ़ गए। रेखा के बारे में उनसे पूछ कर राजा बाँसुरी के साथ आगे बढ़ गया और जाते जाते समर को बिल्स और बाकी चीज़े देखने का इशारा करता गया।
    रेखा की हालत अब भी बहुत खराब थी, बाँसुरी के साथ आये राजा को देख उसे लगा ठकुराइन की खबर सुन कर ही राजा विराज के साथ वहाँ आया होगा।
  राजा को देख वो अपने बिस्तर से उठ कर खड़ी हो गयी..

” नही खड़े होने की ज़रूरत नही है रेखा। तुम आराम करो। हम दोनों बस तुम्हें देखने आए थे। “

” जी भाई साहब !” धीरे से बैठने के बाद भी उसकी नज़र बाहर दरवाज़े की ओर ही थी…
  उसे बाहर की तरफ देखते देख बाँसुरी ने पूछ ही लिया..

” किसी का इंतेज़ार था क्या रेखा? “

” हाँ हमे लगा भाई साहब के साथ विराज सा भी होंगे। उन्हें भी तो हमारी माँ ..
   इससे आगे वो और कुछ नही बोल पायी और वापस उसकी सिसकियां उस कमरे में गूंज उठी। बाँसुरी ने रेखा को गले से लगा लिया..

” खुद को संभालो रेखा। हम सभी तुम्हारी हालत समझ सकतें हैं। अभी कुछ दिन भी नही हुए जब हम सब ने रानी माँ को खो दिया, और अब तुम्हारी माँ भी….
   फिर भी तुम्हें खुद को संभालना तो होगा ही ना।”

  रेखा के ऑंसू थम नही रहे थे। उसके बगल में बैठी बाँसुरी उसकी पीठ पर हाथ फेरती उसे सांत्वना देती रही । कुछ देर में ही रेखा के मामा भीतर चले आये। ठकुराइन के अंतिम संस्कार का समय आ गया था, रेखा की वहाँ पूछ मची थी।
  मामा जी के साथ रेखा अपने घर के लिए निकल गयी। उनके साथ ही राजा और बाँसुरी भी उसके घर की ओर बढ़ गए।
  

*******

      ठकुराइन को गुजरे तीन चार दिन बीत चुके थे। अब तक रेखा अपने घर पर ही व्यस्त थी।
अब राजा भी वापसी की तैयारी कर चुका था। बाँसुरी भी राजा के आ जाने से काफी कुछ सम्भल चुकी थी और अपना ऑफिस का काम भी उसने संभाल लिया था।
   अभी उसे उसके गृहग्राम में पोस्टिंग मिलना संभव नही था लेकिन समर इसके लिए भी प्रयासरत था कि किसी तरह अब बाँसुरी को वापस अपने शहर में ही पोस्टिंग मिल जाये।
   उन लोगों को शाम में निकलना था। दोपहर में ही लीना उनसे मिलने चली आयी, इत्तेफाक की बात थी कि उस वक्त रेखा भी बाँसुरी से मिलने आई हुई थी।

    रेखा से एक बार पहले भी पूछताछ के सिलसिले में लीना मिल चुकी थी।

” अब कैसी तबियत है आपकी रेखा जी। “

“जी पहले से अब ठीक हूँ।

” जी !! वैसे उस दिन आप इतनी परेशान लग रही थी कि आपसे कुछ पूछा ही नही गया। लेकिन बात ये भी है कि अगर हमें सच्चाई नही पता चलेगी तो हम उन हत्यारों तक पहुंचेंगे भी कैसे?.
  आपकी माँ ने आखिरी बार बाँसुरी से बात की थी, इसलिए पुलिस का एक शक बाँसुरी पर भी जाता है।अगर आप सारी बातें बता पाएंगी तो हो सकता है बाँसुरी को कुछ राहत हो जाये। फिलहाल एक फोन कॉल के अलावा और कोई सबूत बाँसुरी के खिलाफ न होने से ही मैंने अभी तक उसका अरेस्टेशन रोक रखा है, वरना तो यहाँ एक भी सबूत मिला और लोग हम पर चढ़ पड़ेंगे उसे सलाखों के पीछे भेजने के लिए।”

” नही ऐसा कैसे हो सकता है? भाभी साहेब तो वहाँ थी ही नही। “

आज तक रेखा बाँसुरी को उसके नाम से ही बुलाया करती थी, उसका अचानक से ऐसे बोलना सभी को चकित कर गया। रेखा राजा की तरफ देखने लगी। राजा ने समर और प्रेम की ओर देखा और वो दोनों बाहर चले गए।

   उनके बाहर जाते ही रेखा ने एक एक कर सारी बातें राजा और बाँसुरी को बता दी। उसका केसर से मिलने जाना , ठकुराइन का उसका पीछा करते हुए उसके और केसर तक पहुंच जाना। उसने सब कुछ बता दिया। केसर ने ठाकुर साहब के षड्यंत्र और उनकी प्लानिंग की जो बात कही वो भी सारी बात उसने राजा को रोते रोते बता ही दी…

” हमें तो यकीन नही हो रहा कि ये वही इंसान है जिसे हमने अपना पिता माना था कभी। वो इतना गिर सकते हैं ये हमने कभी सपने में भी नही सोचा था। अपनी रिहाई के लिए उन्होंने अपने ही लोगों से कह कर माँ को भी मरवा दिया।”

  राजा के चेहरे पर नाराजगी झलकने लगी थी लेकिन उसने अब तक कुछ भी नही कहा था।

” इतनी बड़ी चालें चलने वाले ठाकुर साहब को मौका तो मिला था अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार में आने का? फिर वो अभी आये क्यों नही?”

बाँसुरी के सवाल पर लीना ने जवाब दिया…

“ठाकुर साहब के घर से अर्जी भेजी गई थी लेकिन वो सही समय पर वहाँ की जेल में रिसीव नही हो पाया। उसके बाद वहाँ के जेलर और बाकी ऑफिसर्स ने ठाकुर साहब से इस बारे में बात कर उनसे कहा कि अगर आपके परिवार वाले रुक सकते हैं तो आप को भेज दिया जाएगा , पर उन्हें। पहुंचने में समय लग जाता इसलिए सभी ऑफिसर ने मिल कर उन्हें पांचवें दिन भेजने का निर्णय लिया है।”

  लीना की बात सुन राजा कुछ सोच में पड़ गया। ” इसका मतलब ठाकुर साहब कल या परसों निकलेंगे” लीना के हाँ कहते ही उसने अपनी  घड़ी पर नज़र डाली और तैयार हो गया। उन लोगों का भी निकलने का वक्त हो गया था। उसका बाँसुरी को साथ ही ले जाने का मन भी था लेकिन बाँसुरी ने कुछ समय बाद छुट्टियां लेने की बात कह उसे अकेले ही वापस लौटने को मना लिया था।

  किन्हीं कारणों से विराज का आना  भी नही हो पाया था।
   उसके भी दो दिन बाद ही आने की गुंजाइश बन रही थी।

  राजा बाँसुरी को अकेले छोड़ कर जा नही पा रहा था, लेकिन उसका रुकना भी मुश्किल था। उसकी परेशानी समझती बाँसुरी ने लीना को अपने पास ही रोक लिया था।

  लीना के सुरक्षित हाथों में बाँसुरी को सौंप राजा थोड़ा निश्चिन्त तो था, लेकिन फिलहाल उसके दिमाग में क्या चल रहा था, ये कोई नही समझ पाया था….

क्रमशः




 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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