जीवनसाथी- 107




जीवनसाथी-107




    राजा रियासत वापस लौट चुका था। उसे लग रहा था सारा मामला उलझता ही चला जा रहा है। वो एक गांठ सुधार कर खोलने निकालता की दूसरी गांठ उलझ जाती, अब सब कुछ ऐसा लग रह था जैसे उसके हाथों से बाहर होता जा रहा था।

  उसने कुछ ज़रूरी बातचीत करने समर को अपने कमरे में बुला लिया….

” समर क्या खबर है ठाकुर की ? “

” हुकुम जैसा आपने कहा था , वैसा ही संदेश अफसरों को भिजवा दिया है।
   ठाकुर साहब का मामला अब तक विचाराधीन है। उन्हें पकड़ने के चौबीस घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश तो कर दिया गया था लेकिन उनका वकील मजबूती से उनके पक्ष में खड़ा रहा, और तो और उसने बेल की आवेदन भी लगा रखी है।
   उसी  ने ठाकुर साहब को अपनी पत्नी को मार कर उसके कार्यक्रम में शामिल होने के बहाने निकलने का रास्ता सुझाया था।
  क्योंकि शायद वो भी समझ गया है कि इतने ढेर सारे सबूतों के साथ अब उनकी रिहाई मुश्किल है।

” हम्म !तो क्या किया जाए? “

” कल सुबह ठाकुर साहब को लेकर दो पुलिस वाले दून निकल रहें हैं, उन्होंने मजिस्ट्रेट तक पत्नी के अंतिम कार्यक्रम में जाने की इच्छा जताते हुए पत्र लिखा था, इसी से अनुमति भी मिल गयी है।”

“चलो फिर कल सुबह ही मुलाकात की जाए उनसे। “

“जी हुकुम ! हुकुम एक बात और कहनी थी। यूनिवर्सिटी का काम लगभग पूरा हो चुका है। काफी सारे रिक्रूटमेंट भी पूरे हो गए हैं। कल यूनिवर्सिटी के प्रबंधन से सम्बंधित चुनाव होना है। तो अगर आप उस इंटरव्यू को ले सकें तो …?

” समर इन सब बातों से दूर ही रखो मुझे। वैसे भी बहुत सारा काम फैला पड़ा है। न हो तो रतन सा को बुलवा सकते हो। बाँसुरी के मित्र शेखर को भी पूछ सकते हो। लेकिन हाँ इन लोगो का खाली होना ज़रूरी है। अपने काम को नकार कर हमारा काम करने कोई भी न आये ये ध्यान रखना। “

” राजा भैया , आप कहें तो मैं कुछ मदद कर सकती हूँ क्या?”

  राजा के कमरे के दरवाज़े पर प्रेम के साथ खड़ी निरमा की आवाज़ सुन राजा उस ओर देखने लगा…

” अंदर आ जाओ। तुम दोनो बाहर क्यों खड़े हो? “

” आपसे मिलने का बहुत मन कर रहा था भैया इसलिए ये जैसे ही घर आये मैं इनके पीछे पड़ गयी कि मुझे अभी महल लेकर चलो वरना ये तो बस टालमटोल करतें रहतें हैं।”

” सही कहा भाभी जी। वो तो आप आ गईं  इसकी ज़िन्दगी में वरना ये जैसा आदमी है जीने में भी टालमटोल करता फिरता।

समर की बात सुन वहाँ बैठे सभी हँसने लगे …..

” भैया बाँसुरी कैसी है? आपके साथ जाने के पहले इन्होंने कुछ नही बताया था,वरना मैं भी साथ चली जाती। उसकी तबियत तो ठीक है ना? “

” हाँ निरमा तबियत ठीक है उसकी, लेकिन आजकल बात बात पर इमोशनल हो जाती है। मैं समझता हूँ उसकी प्रॉब्लम क्या है। किसी किसी में मूड स्विंग कुछ ज्यादा ही होतें हैं शायद!”

” हम्म वो तो है। भैया अभी वहाँ उसके पास काम करने के लिए नौकर चाकर तो ढेरों होंगे लेकिन देखभाल करने के लिए कोई नही है। चाचा जी की तबियत ठीक नही होने के कारण चाची भी उसके पास नही जा पा रहीं हैं।

” हाँ निरमा। मैंने भी कहा कि मम्मी को बुला लो तो उसने मना कर दिया,कहने लगी पापा को अभी मुझ से ज्यादा जरूरत है मम्मी की।”

” अगर आप दोनो इजाज़त दें तो क्या मैं कुछ दिनों के लिए बांसुरी के पास चली जाऊँ। शुरु के तीन महीने ही सबसे क्रूशियल होतें हैं ,अगर ये सही निकल गए तो आगे थोड़ा चिंता कम हो जाती है।”

  राजा ने खुशी से निरमा के दोनों हाथ थाम कर अपने माथे से लगा लिए…

” सच तुम जाना चाहती हो? ” राजा ने एक नज़र प्रेम की तरफ डाली

” हुकुम मुझसे पूछने या इजाज़त लेने की आपको कब से ज़रूरत पड़ने लगी। आप तो बस आदेश कीजिये। आप जब कहेंगे मैं निरमा को छोड़ आऊंगा। “

” तुम दोनो दिल के इतने करीब हो कि मेरे मन में चल रही सारी उथलपुथल तुम्हें पता चल जाती है। मैं सच कहूं तो बाँसुरी को अकेले छोड़ कर आने का मन ही नही था, और उसका अपना काम अधूरा छोड़ कर यहाँ आने का मन नही था।
  निरमा तुमने मेरी कितनी बड़ी मुश्किल आसान कर दी है। तुम्हें क्या बताऊँ? “

  ” एक भाई की परेशानी उनकी बहन नही समझेगी तो कौन भला समझेगा। तो भैया मैं कल ही मीठी को लेकर निकल जाऊंगी।”

    निरमा से बात कर राजा के चेहरे पर तसल्ली चली आयी। मुस्कुरा कर निरमा ने राजा से विदा ली और प्रेम के साथ अपने घर निकल गयी।

   राजा वापस समर के साथ अपनी चुनावी तैयारियों की बातचीत में लग गया….

*****

    अगली सुबह ठाकुर साहब को पांच पुलिस वालों के साथ दून के लिए विदा कर दिया गया।
  ठाकुर साहब की रईसी को दरकिनार कर पुलिस वाले उन्हें ट्रेन से साथ लिए चल पड़े।
ठाकुर साहब बार बार उन्हें फ्लाइट से चलने की दुहाई देते रहे लेकिन उनकी एक न सुनी गई।
लॉ एंड ऑर्डर को निभाते पुलिस वाले उन्हें ट्रेन में साथ लिए निकल गए।
  राजा ने उन अफसरों को संदेश भिजवा रखा था कि वो लोग जब भी ठाकुर को लेकर निकले राजा को पहले ही सूचित कर दें जिससे राजा उनसे मुलाकात कर सके लेकिन ठाकुर साहब के भी कई लोग ऊपरी महकमे में मौजूद थे जो ठाकुर साहब और राजा अजातशत्रु की दुश्मनी के बारे में जानते थे इसलिए उनके सुरक्षा कारणों को देखते हुए एन मौके पर उनके साथ जाने वाले अफसरों और सिपाहियों को बदल दिया गया।
    समर बाहर खड़ा इंतेज़ार करता रहा लेकिन किसी और गुप्त मार्ग से ठाकुर साहब को साथ लिए पुलिस की टुकड़ी निकल ही गयी…

   समर के खबरी ने जब उसे इस बात की सूचना दी की ठाकुर साहब तो यहाँ से निकाले जा चुके हैं समर खून का घूंट पीकर रह गया।
   वो फौरन राजा के पास चला आया….

” अब क्या करें हुकुम ? हमने ठाकुर को थोड़ा कम ही आंक लिया था शायद। वो हमारी आंखों में धूल झोंक कर निकल गया।”

” लेकिन उन्हें कम मत समझियेगा । वो अब भी ताक में होंगे कि कब उन्हें मौका मिले और वो हुकुम पर वार कर सकें। हुकुम अब आपकी सुरक्षा और बढ़ानी पड़ेगी। अब तक चार लोग आपको कवर कर के चला करते थे , अब आप चारों तरफ से एक गोल घेरे में ही अपने कमरे से बाहर निकलेंगे। “

  राजा प्रेम की बात सुन हंसते हुए उसे देखने लगा….

” तुम्हारा बस चले तो तुम मुझे डिबिया में बंद कर के रख दो। “

  राजा भले ही मुस्कुरा रहा था लेकिन दिल ही दिल में उसे भी महसूस हो गया था कि अब ठाकुर और भी खतरनाक हो जाएगा।
  उसे खुद की चिंता थी भी कहाँ, वो बस अपने करीबियों को लेकर ही परेशान था।

“मुझे नही लगता इतनी जल्दी ठाकुर साहब अब कोई कदम उठाएंगे। उन्हें भी मालूम है कि अब हम सब उनकी रग रग से वाकिफ हैं और उनके हर कदम पर हमारी निगाहें होंगी। “

” फिर भी उन्हें कम मत समझियेगा हुकुम। मुझे लग रहा है वो सबसे पहले आदित्य और केसर को ढूंढने निकलेंगे। क्योंकि अब तो उनकी नाराज़गी का सबसे बड़ा सबब आदित्य हो गया है। “

” हम्म मुझे भी इसी बात की चिंता है, आदित्य को उन्होंने ही पाल पोस के इतना बड़ा किया और वो अचानक हमारी तरफ हो गया। खून को खून पुकारता ही है, हम क्या कर सकतें हैं। आदित्य की आंखों पर बंधी पट्टी खुल गयी और वो अपने परिवार के पास चला आया।”

  ” जी मैं निकलता हूँ हुकुम। आदित्य की अब तक कोई खबर नही है। और अब ठाकुर साहब भी लापता हैं।”

  राजा ने हाँ में सर हिलाया और उठ कर अपनी बालकनी तक चला आया।
  उसके उठते ही प्रेम और समर भी वहाँ से निकल गए।

  बालकनी में खड़ा राजा अपने भविष्य के बारे में सोच रहा था। अब जाकर लगने लगा था कि सब ठीक है कि वापस परेशानियां चली आयीं। वो निरमा को बाँसुरी के पास भेज तो रहा था लेकिन वो तो सिर्फ देखभाल कर सकती थी ,और बाँसुरी की सुरक्षा का क्या?
  अभी ही ऐसा समय पड़ना था कि चुनाव सर पर होने से न वो काम छोड़ कर जा सकता था और न बाँसुरी ही आ सकती थी।
    कभी कभी कैसी मजबूरी आ जाती है कि इंसान को न चाहते हुए भी सब कुछ वक्त पर छोड़ना पड़ जाता है…….

********


    ठाकुर साहब को गायब हुए छै महीने बीत चुके थे….
    इस बीच उन्होंने कहीं कोई ऐसी हरकत नही की थी कि जिससे राजपरिवार पर कोई आंच आये।
  पुलिस ने उनके गायब होने के बाद रिपोर्ट तैयार की थी कि स्टेशन से ट्रेन पकड़ने तक वो सबके साथ ही थे। उन्हें हथकड़ियों के साथ ले जाया जा रहा था।
आधी रात के वक्त वो बाथरूम जाने का बहाना कर उठे, उनके साथ दो सिपाही भी भेजे गए थे। बावजूद उन लोगों को चकमा देकर ठाकुर साहब उस स्टेशन से भाग खड़े हुए।
  चलती ट्रेन से मध्यरात्रि में ऐसे अचानक ठाकुर साहब कैसे गायब हो गए पर आला अफसरों की जांच कमेटी बैठी लेकिन कोई फल नही निकला।
   राजा पहले ही समझ चुका था कि ठाकुर साहब और पुलिस वालों की मिलीभगत थी जिसमें उन्हें भागने का मौका मिल गया था।
       समर और प्रेम के लड़कों ने चप्पा चप्पा तलाश किया। जहाँ जहाँ उनके जाने की उम्मीद हो सकती थी हर वो जगह देख ली ढूंढ ली लेकिन ठाकुर साहब घास में गिरी सुई साबित हुए थे।

  वक्त बीतता जा रहा था। महल में समर प्रेम और राजा के अतिरिक्त किसी को भी विराज और ठाकुर साहब के सम्बन्धो के बारे में कुछ भी पता नही था। खुद विराज भी इस बात से अनजान था।
    रानी माँ के जाने के बाद उसके मन में अलग ही उथल पुथल मची थी।
   गद्दी जाने का उसे दुख तो था लेकिन वो भी जनता था कि अकेले गद्दी संभालना उसके बस की बात नही थी।
    राजा के चुनाव में अपनी अलग पार्टी तैयार करने से उसे एक उम्मीद बंधी थी कि पार्टी प्रत्याशी के रूप में राजा उसे ज़रूर चुनेगा।
    उनके राज्य में चुनाव होना था । फिलहाल अस्सी सीटों पर मतदान होने थे। जिनमें से राजा की रियासत जिस जिले में आती थी वहां और उसके आस पास के जिलों का मिलाकर राजा ने कुल ग्यारह पदों पर अपने उम्मीदवार खड़े करवाये थे।
    इन सारी प्रक्रियाओं के पहले राजा ने लगभग पूरे राज्य का दौरा किया था। हर जगह अपनी रैली में उसने जनता को संबोधित करते हुए उनकी समस्याओं को सुनने के साथ ही सुलझाने का वायदा भी किया था।
   इस तरह से रैलियां करने का उसका मुख्य उद्देश्य जनता की रग को पहचानना था। वो जानता था चुनाव में जनता किस करवट बैठे ये पहले से तय करना मुश्किल था। उस पर आजकल की राजनैतिक पार्टियों की उठापटक , ई वी एम मशीनों से छेड़छाड़, वोट बैंक की राजनीति, सिर्फ एक शराब कि बोतल और एक प्लेट मुर्गे पर बिकते लोगों के कारण पूरी ईमानदारी से लड़ना मुश्किल था लेकिन राजा तो राजा था।
    वो शुरुवात में ही अपनी सच्चाई और ईमानदारी से डिगना नही चाहता था।
    रैली करवाने का एक और उद्देश्य अपनी पहुंच को  पहचानना भी था। वो बारीकी से हर गणना करता चल रहा था। वो यही जानना चाहता था कि कहाँ कहाँ से वो अपने उम्मीदवार खड़े कर सकता है।
     उसकी तैयारी चाक चौबंद थी। वैसे भी उसने कभी कोई काम बिना पक्की तैयारी के किया भी नही था।

राजा अजातशत्रु भले ही एक रियासत के राजा हो लेकिन उनकी पहुंच लगभग पूरे राज्य तक थी।….

   राजा की नेकनीयत के किस्से फैलने लगी थे। किस्से कोरे तो थे नही। जब किस्सों के साथ ही जनता काम भी होते देख पा रही थी तो जाहिर है उनका जुड़ाव राजा की तरफ बढ़ता भी जा रहा था….
   जनता अब राजा के इशारे भी समझने लगी थी लेकिन आज भी कोई था जो उससे बैर पाले चल रहा था।
    विराज को न सुधरना था और न वो सुधरा। आखिर खून तो ठाकुर साहब का ही था। उस पर ठकुराइन की मौत के हफ्ते भर बाद जब वो दून गया तब उसके साथ एक और घटना घट गई….

     ठकुराइन की मृत्यु के बाद उनका काम काज निपटने से पहले रेखा की महल वापसी मुश्किल थी। उसने विराज से बात कर वहाँ रुकने की मंजूरी ले ली थी। विराज ने भी जल्दी ही मिलने आता हूँ तभी साथ में वापस लौट आएंगे कह कर उसे मंजूरी दे भी दी थी।
  उन्हीं दिनों एक शाम उदास सी रेखा बगीचे में बेटे को खेलते देखती बैठी थी कि उसका फ़ोन बजने लगा…

  उसने तुरंत उठाया, उसे लगा विराज का होगा लेकिन फ़ोन रोहित का था…

” कैसे हो रोहित? बड़े दिनों बाद याद किया!”

“हां एक केस के सिलसिले में यहाँ आना हुआ था। आपकी माँ के बारे में पता चला , सुन कर बहुत बुरा लगा। अगर आपको ऐतराज न हो तो क्या हम एक बार मिल सकतें हैं।”

” हमें ऐतराज क्यों होने लगा रोहित। तुम माँ साहब की मातमपुर्सी के लिए ही तो आ रहे हो आखिर।आ जाओ। “

” जी लेकिन क्या आपके घर आ सकता हूँ। वहाँ किसी को ऐतराज न हो? “

रेखा भी अपने घर वालो को जानती थी। जब तक उसके पिता यानी ठाकुर साहब थे उन्होंने सब को दबा कर रखा हुआ था, उनके जेल जाने के बाद माँ का भी वही रवैया था। ज़ाहिर है अब उन दोनों के बिना उसके लिये इन सब के मन में कोई बहुत ज्यादा प्रेम तो था नही। वो तो उसकी ऊंची ससुराल की साख के कारण यहाँ उसे पलकों पर रखा जा रहा था लेकिन अगर एक मौका भी इन लोगों को मिल जाये तो उसे नीचा दिखाने से बाज़ नही आने वाले थे।
   यही सब सोचती रेखा ने रोहित को कॉफी शॉप में मिलने बुला लिया था…
   अगले दिन बेटे को भी साथ ले रेखा ड्राइवर के साथ कॉफी शॉप पहुंच गई थी। रोहित पहले ही वहाँ बैठा उन लोगो का इंतेज़ार कर रहा था…
   रेखा ने बाहर से ही गार्डन कैफे में बैठे रोहित को देख लिया था। उसने ड्राइवर को वापस भेज दिया।

   ज्यादा देर न हो इसलिए उसने घरके पास वाले कैफे में ही रोहित को बुला लिया था।
  ड्राइवर घर पहुंचा उसी वक्त विराज भी रेखा से मिलने  सरप्राइज देने चला आया।
   घर परिवार के लोगो ने घर के दामाद का स्वागत किया लेकिन ये पूछने पर की रेखा कहाँ है कोई सही जवाब नही दे पाया ।
    रेखा की काकी ने ड्राइवर को बुलवा भेजा…

” कुंवर सा हमें तो बाई सा ने यही कहा कि किसी सहेली के घर जा रहीं हैं। अब वो तो घर की बेटी ठहरी इसलिए उन पर कोई सूतक तो लगेगी नही इसलिये उन्हें घर बाहर जाने में भी कोई रोक तो थी नही।
  हमने भी मना नहीं किया कि उनका ज़रा मन लग जायेगा । “

” हर्ष को साथ लेकर गईं है क्या? “

” जी हाँ हर्षवर्धन भी साथ गयें हैं उनके, ये खड़ा है ना ड्राइवर यही तो छोड़ कर आया है। क्यों कहाँ छोड़ कर आये हो बाई सा को? आप आराम कीजिये कुंवर सा हम उन्हें अभी फ़ोन लगा देते हैं।

” नहीं काकी सा रहने दीजिये।हम खुद इन्ही ड्राइवर के साथ जाकर उन्हें सरप्राइज देना चाहतें हैं।”

” जी जैसी आपकी मर्जी।”

   रेखा और विराज के दिल आज तक नही मिले थे। पर कुछ राजपरिवार का होने की ज़िम्मेदारी और कुछ रानी माँ का मरने से पहले लिया वादा की कभी रेखा को न छोड़ना के कारण ही विराज जैसे तैसे इस रिश्ते को निभा रहा था।
  वैसा ही कुछ हाल रेखा का भी था। और अब अपने जन्म से जुड़ी सच्चाई जानने के बाद तो उसके मन में एक डर सा बैठ गया था कि कहीं विराज को उसकी सच्चाई पता चल गई तो वो उसे तुरंत महल से निकाल बाहर करेगा और अब ठाकुर साहब और ठकुराइन के न रहने पर मायके में भी वो ज्यादा दिन किसी का मुहँ सहारे के लिए नही देख सकती थी।

   दोनो ही अपनी अपनी तरफ से अपने रिश्ते को बचाने की कोशिश में थे….
   युवराज के बार बार समझाने पर ही विराज रेखा को लेने आया था, और इसलिए उसे बिना बताए सरप्राइज देकर चौंकाना चाहता था।
   ड्राइवर ने विराज को ठीक उसी कैफे के सामने उतार दिया।
  विराज को लगा शायद अपनी सहेली से मिलने रेखा यहीं आयी हैं।
  वो बेधड़क गार्डन के रास्ते अंदर चला गया…अंदर जाते हुए ही उसकी नज़र गार्डन में सबसे किनारे की टेबल पर पड़ गयी….

    एक लंबी कुर्सी कम सोफे पर रोहित के कंधे पर सर रखे रोती रेखा उसे दिख गयी।
  रोहित ने गोद में हर्ष को भी संभाल रखा था। विराज के पैर अपनी जगह पर जम गए। क्रोध से उसकी आंखें उबलने लगीं थीं।
  एक बार पहले भी इसी लड़के से मिलते हुए विराज ने रेखा को पकड़ा था और आज फिर वही।
  इसका मतलब इनके बीच कोई खिचड़ी तो पक रही थी। लड़का भी हिम्मती था तभी तो जो लड़का रेखा से मिलने उसके ससुराल तक पहुंच गया उसके लिए मायके तक पहुंचना कौन सी बड़ी बात थी।
  गुस्से से उबलती आंखों से वो कुछ देर वहीं खड़ा उन्हें देखता रहा …

   रेखा ने रोते हुए अपना सर रोहित के कंधों से हटा लिया । रोहित ने टिश्यू पेपर उसकी ओर बढ़ाया और सामने रखी प्लेट से कुछ उठा कर हर्ष को खिलाने लगा।
   ऑंसू पोंछ रेखा रोहित को कुछ बताने लगी। उसकी बातें सुनता रोहित बीच बीच में हर्ष को खिलाता भी जा रहा था… और अब विराज से खुद को संभालना मुश्किल होने लगा था। वो गरजता हुआ उन दोनों के सामने जा खड़ा हुआ….

” तो ये सब चल रहा है यहाँ ? इसलिए आप नहीं चाहतीं थीं कि हम जल्दी आये आपको लेने और बहाना ये की माँ साहेब के सारे काज निपट जाएं। वाह रेखा वाह। पहले भी एक बार …

” बस कीजिये। आपकी सोच ही घटिया है इससे ज्यादा आप सोच भी नही सकते।
  अगर दो लोग साथ बैठे हैं तो उनके बीच कुछ गलत ही हो ये ज़रूरी तो नही है। लेकिन आप इससे ज्यादा सोच भी तो नही सकते , आपसे और उम्मीद भी क्या करें हम ! “

  रेखा की बात पूरी होने से पहले ही एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गालों पर रसीद कर विराज रोहित की ओर मुड़ने ही वाला था कि उसके खुद के चेहरे पर एक ज़ोर का घूंसा पड़ा और वो एक झटके से नीचे गिर गया।
  गुस्से में रोहित को घूरता विराज खड़ा होता कि रोहित उसके सीने पर सवार उस पर ताबड़तोड़ मुक्कों और घूंसों की बारिश कर बैठा।
   रोती बिलखती रेखा ने रोहित को पकड़ कर खींचा और उसे दूसरी तरफ को धक्का दे दिया…

” बस करो रोहित! तुम्हें ये हक किसने दिया कि तुम हमारे पति पर हाथ उठाओ। सिर्फ दोस्त हो और दोस्त जैसे ही रहो। अभी के अभी यहाँ से निकल जाओ। “

” अब ये सब दोस्ती का ड्रामा करने की ज़रूरत नही है तुम दोनों को। हमने सब कुछ देख लिया है और हम अभी के अभी यहाँ से वापस लौट रहे हैं।”

  रेखा के मन में पनपता डर साकार हो गया था। उसे विराज से प्यार बिल्कुल भी नही था लेकिन विराज के छोड़ देने पर अपने अंधकारमय भविष्य के बारे में सोच अचानक वो उसके सामने हाथ जोड़े खड़ी हो गयी..

” ऐसे मत जाइए विराज सा। एक बार हमारी भी बात सुन लीजिए। हमने कोई गलती नही की। जिस गुनाहगार को फांसी दी जाती है उसकी भी आखिरी इच्छा पूछी जाती है और आप हमें बिना किसी गुनाह के ही बिना मौका दिए छोड़ कर चलें जा रहें हैं। ऐसा मत कीजिये आपको आपके बेटे की कसम।”

  जाने क्या सोच कर हिकारत से एक नज़र रोहित को देख विराज ने हर्ष को गोद में उठाया और आगे बढ़ गया। अपना पर्स संभाले गिरते पड़ते रेखा भी उसके पीछे भागती चली गयी।
   जाते जाते उसने एक बार भरी हुई आंखों से रोहित को देखा और आंखों ही आंखों में उससे माफी मांग निकल गयी।
  अपनी सूनी आंखों से उसे देखता रोहित चुपचाप उसे जाता देखता रहा।
   वो खुद भी यही चाहता था कि रेखा और विराज का जीवन पटरी पर आ जाये लेकिन न चाहते हुए भी वो बार बार उन दोनों के बीच आ खड़ा होता था।

   विराज ने उसी समय ड्राइवर को गाड़ी एयरपोर्ट की तरफ लेने कहा और बच्चे को गोद में लिए बैठ गया।
रेखा भी चुपचाप बैठ गयी। आंखें तो उसकी बरस ही रही थी दिल भी रो रहा था। एक बार मुड़ कर अपना मायका अपना घर देख भी नही पायी थी।
   अपना चेहरा हाथों से छिपाए वो अपने ऑंसूओं को रोकने की कोशिश कर रही थी कि गाड़ी एक झटके के साथ रुक गयी..
  उसने देखा गाड़ी उसके घर के सामने ही रुकी थी।

” जाइये अपना और हर्ष का सामान तुरंत लेकर आ जाइए फिर हम सीधे एयरपोर्ट निकल जाएंगे। “

  विराज के मन में कब क्या चलता है रेखा की समझ से बाहर था। फिर भी बिना किसी से कुछ बोले ऐसे निकल जाने पर तो मायके में उसकी नाक ही नही बचनी थी। कम से कम अब एक बार सबसे मिल कर यह तो कह सकती है कि महल से बुलावा आ जाने से उन्हें ऐसे तुरंत निकलना पड़ रहा है।
   वो सामान लेकर घर भर में सबसे विदा लेकर निकल गयी थी।

      विराज ने उसे लाकर वापस महल में पटक दिया था और एक बार फिर अपनी पुरानी ज़िन्दगी में खो गया था। दोस्तों के साथ पी पिलाकर इधर इधर घूमना, कभी शिकार पर निकल जाना इसी सब में विराज खुद को भुलाए था।
     उसे काम तो कुछ नही करना था लेकिन अधिकार सारे चाहिए थे।

   वक्त बीतता जा रहा था और बीतते वक्त के साथ विराज के स्वभाव की उद्दंडता बढ़ती जा रही थी।


उसे रेखा को साथ लेकर आये छै महीने बीत चुके थे।राजा पूरी तरह से अपने चुनावों की तैयारियों में लगा था।
    बाँसुरी की प्रेग्नेंसी में अब भी मुश्किलें थीं लेकिन अब उसने सात महीने पूरे कर लिए थे। काम भी काफी हद तक उसने समेट लिया था क्योंकि अब उसे छुट्टियों पर जाना था।
   निरमा के आ जाने से उसे काफी राहत हो गयी थी। लीना भी लगभग दो तीन दिनों के अंतर में आ ही जाती थी….
   पंद्रह बीस दिनों में एक बार राजा भी किसी तरह समय निकाल कर आ जाया करता था।
   दिनों में जैसे पहिये लग जाते थे जब वो आ जाता था । दोनों साथ में दो दिन रहे या हफ्ते भर पर दिन पलक झपकते बीत जाते थे , और उसके वापस लौटते ही दिन नीरस से गुमसुम से हो जाते थे।
    बीच में कुछ दिनों के लिए उसकी माँ और फिर ताई भी आ कर रह गईं थीं।
   समय कठिन ज़रूर था पर बीतता जा रहा था। हर एक दिन बीतने के साथ ही बाँसुरी में सकारात्मकता आती जा रही थी।
   उसे धीरे धीरे विश्वास होने लगा था कि अब उसे या उसके बच्चे को कोई समस्या नही आएगी…
    उसने छुट्टियां डाल दी थीं , शाम तक उसे वापस ले जाने राजा भी आ गया था….

    एक दिन के बाद दोनो की महल वापसी थी कि ताई ने टोक दिया….

  ” बंसी बेटा , परसो लंबी यात्रा पर निकलना है उसके पहले एक बार अपनी डॉक्टर से जांच करवा लें छोरी। लंबी यात्रा है तेरी।।”

” कहाँ लंबी है ताई। यहाँ से निकल कर पांच से छै घंटो में तो महल पहुंच ही जाऊंगी।

” ताई सही ही कह रहीं हैं बाँसुरी , चलो अभी ही चलतें हैं । एक बार चेकअप करवा कर ही निकलेंगे। “

  इतने महीने निकल चुके थे ,कुछ छोटी मोटी परेशानियों के अलावा कोई ऐसी बड़ी परेशानी तो हुई नही थी तो अब क्या होगा, यही सोच कर बाँसुरी राजा के साथ अस्पताल निकल गयी।

  डॉक्टर ने उसकी जांच की और चिंता की लकीरें उनके माथे की सलवटों में उभर आयीं….


क्रमशः

 

  aparna ….


 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s