जीवनसाथी – 108




   जीवनसाथी -108




   इतने महीने निकल चुके थे ,कुछ छोटी मोटी परेशानियों के अलावा कोई ऐसी बड़ी परेशानी तो हुई नही थी तो अब क्या होगा, यही सोच कर बाँसुरी राजा के साथ अस्पताल निकल गयी।

  डॉक्टर ने उसकी जांच की और चिंता की लकीरें उनके माथे की सलवटों में उभर आयीं….

” मैडम मुझे पता हैं आप अपना पूरा ध्यान रखती होंगी लेकिन अभी इस वक्त आपके गर्भाशय में पानी की मात्रा बहुत कम दिख रही है।”

” ओह्ह, डॉक्टर क्या ये बहुत परेशानी की बात है? “

” हां परेशानी की बात तो है आपको कुछ दवाई दे दे रही हूं साथ ही ये पाउडर ले लीजिएगा। और फिलहाल अभी आपको एक दवा की ड्रिप चढ़ानी पड़ेगी उसके बाद हो सकता है कि तुरंत में ही थोड़ा सा इंप्रूवमेंट दिख जाए।”

“ठीक है डॉक्टर! पर क्या मैं ट्रैवल कर सकती हूँ?”

डॉक्टर थोड़ी देर के लिए सोच में पड़ गयी….

” आपके हसबैंड को भी अंदर बुला लेते हैं फिर बात करते हैं ।”

   बांसुरी कुछ कह पाती इसके पहले ही डॉक्टर ने बेल बजा कर पियोन से राजा को अंदर भेजने के लिए कह दिया…
    राजा के अंदर आते ही उन्होंने इशारे से उसे बैठने को कहा और वापस बांसुरी की ओर मुड़ गई….

” जी वैसे मैं ट्रैवलिंग की इजाज़त तो नही दूँगी क्योंकि आप खुद अपने गर्भाशय की स्थिति जानती हैं……

राजा अब तक इन बातों से अनजान था। उसने बाँसुरी की तरफ देखा, बाँसुरी ने आंखें झुका ली…

  डॉक्टर राजा की तरफ देख कर कहने लगी..

” राजा साहब आप तो जानते ही हैं मैडम मेरे पास अपने चौथे महीने में आयीं थीं ,तब तक बच्चे की ग्रोथ हो चुकी थी, ऐसे में एबॉर्शन करना रिस्की था। स्पेशली मैडम की जान के लिए….

  राजा को डॉक्टर की कोई बात समझ में नही रही थी… वो बार बार बाँसुरी और डॉक्टर की तरफ देख रहा था।
  

” सॉरी लेकिन मैं आपकी बात समझ नहीं पा रहा हूं क्या आप मुझे पूरी बात बता सकती हैं?

राजा के सवाल पर डॉ बड़े आश्चर्य से उसे देखने लगी…

” जी हां बता सकती हूँ। आप दोनों को तो पता ही होगा कि इनकी प्रेगनेंसी में शुरू से ही कॉम्प्लिकेशन थी। इन्होंने इतनी ज्यादा गर्भनिरोधक गोलियां खाई थी कि उसके कारण इनका गर्भाशय गर्भ को अपने अंदर रोक सकने में सक्षम नहीं था। यह बात मुझसे पहले इन्हें देखने वाली डॉक्टर ने इन्हें बताई या नहीं यह तो मैं नहीं जानती, लेकिन जब यह मेरे पास आईं तब मैंने इन्हें इनकी प्रेगनेंसी से जुड़ी सारी कॉम्प्लिकेशन समझा दी थी। शुरुआत में भी डर था लेकिन समय बढ़ने के साथ ये परेशानी भी बढ़ती चली गयी…
   जैसे-जैसे गर्भ का वजन बढ़ता जा रहा, वैसे-वैसे गर्भाशय की कैपेसिटी कम होती जा रही है। इसीलिए इन्हें शुरू में ही सजेस्ट किया गया रहा होगा कि यह बच्चा ना रखें। लेकिन अब क्योंकि इन्होंने रख लिया और 8 महीने बीत भी चुके हैं तो अब बस यही कहूंगी कि जैसे भी हो एक सुरक्षित डिलीवरी हो जाए। अभी भी गर्भाशय की क्षमता में कमी होने के कारण ही बच्चे का वजन भी जरा कम है और इसी कारण गर्भाशय में पानी भी कम है । मुझे तो लगता है कि बांसुरी मैडम को और भी कोई दिक्कतें आई होंगी। हो सकता है इन्होंने मुझसे शेयर नहीं किया ? मैडम आप से पूछती हूं, क्या कभी आपको नाक से खून आना या और कुछ ऐसी तकलीफ हुई है? “

बांसुरी ने बिल्कुल नहीं सोचा था कि उसकी प्रेगनेंसी की कॉम्प्लिकेशन इस तरह से राजा के सामने आ जाएगी, लेकिन अब तो बात खुल चुकी थी अब उस बात पर पर्दा डालने का कोई मतलब नहीं था उसने डॉक्टर की तरफ देखकर हां में सर हिला दिया राजा वापस चौक कर बांसुरी को देखने लगा…

” क्या? क्या सच में कभी तुम्हें नेज़ल ब्लीडिंग हुई है ?बाँसुरी ने फिर हां में सर हिला दिया अबकी बार डॉक्टर भी परेशान हो गई

“आप पढ़ी-लिखी हैं मैडम आपको ऐसा  नहीं लगा की आपको यह बात मुझसे शेयर करनी चाहिए।”

बांसुरी के पास किसी के सवालों का कोई जवाब नहीं था। वह जानती थी कि उसने राजा के साथ गलत किया है, लेकिन उस वक्त उसे यही सही लगा था । उसने राजा की तरफ देखा और उसके दोनों हाथों को थाम लिया ….

” मुझे माफ कर दीजिए साहब , लेकिन बच्चे के नाम पर आप इतने खुश हो गए थे, इतने खुश हो गए थे कि मुझे यह बता कर आपकी खुशी छीनना उस वक्त जायज नहीं लगा।  जब मुझे मेरी कॉम्प्लिकेशंस का पता चला तब मैं भी बहुत डर गई थी। एक पल को लगा कि मुझे यह बच्चा नहीं रखना चाहिए। पर जाने क्यों दूसरे पल ही यह ख्याल आ गया कि यह मेरे साहब का बच्चा है। मेरे अंदर साहब का ही अंश तो पल रहा है, तो जब मेरे साहब इतने स्ट्रांग फाइटर हैं, तो उनका बच्चा कैसे इतना कमजोर हो जाएगा कि अपनी जिंदगी की जंग ही ना लड़ पाए बस आपके ऊपर जो भरोसा था, जो विश्वास था उसी विश्वास ने मुझे रोक लिया। और डॉक्टर मैं आपसे भी यही कहना चाहती हूं कि इस पूरे प्रेगनेंसी में मुझे बच्चे से कोई तकलीफ नहीं हुई। कभी-कभी काम की अधिकता से या सोने जागने में देर सवेर हो जाने से नाक से हल्का खून आ जाया करता था, लेकिन मेरी एक फैमिली डॉक्टर हैं। डॉक्टर पिया, उन्होंने मेरी बहुत मदद की है। मेरी प्रेगनेंसी के शुरुआत से ही उन्होंने मेरा बहुत साथ दिया। मैं रात बे रात किसी भी वक्त उन्हें फोन करूं वह हमेशा मेरे लिए तैयार रहती थी। तो आप दोनों से मैं यही कहना चाहती हूं कि अब भी यूट्रस में पानी की कमी हुई है लेकिन बच्चा तो अब भी नॉर्मल ही है ना। हां वजन जरूर उसका थोड़ा कम है, उसे मैं उसके बाहर आने के बाद खिला पिला कर पूरा कर लूंगी । बस डॉक्टर आप इतना बता दीजिए कि मैं पूरे प्रिकॉशंस के साथ अपने घर तक ट्रेवल कर सकती हूं या नहीं मुझे पता है, मैं ना साहब के साथ रहूंगी तो मैं सुरक्षित रहूंगी और मेरा बच्चा भी पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। डॉक्टर आप जरूर हैं लेकिन आप से मैं प्रॉमिस कर रही हूं कि मेरे बच्चे को कुछ नहीं होगा मुझे भरोसा है और मैं जानती हूं मेरा यह भरोसा मेरे साहब टूटने नहीं देंगे।”

“बांसुरी लेकिन इतनी बड़ी बात तुमने छुपाई कैसे मुझसे?  पिया को मालूम था इसका मतलब निरमा को भी मालूम था… तुम सब ने मिलकर छुपा लिया। तुम्हें एक बार भी नहीं लगा कि यह बात मुझे पता होनी चाहिए और वह भी तब जब बच्चे के बढ़ने से तुम्हारी जान पर भी खतरा हो सकता है!”

“अच्छा बताइए साहब अगर मैं आपको यह सब पहले ही बता देती तो क्या आप यह बच्चा रखने देते?  अभी तक जो भी हो आज आठवें महीने तक पहुंच गया है ना, तो बस एक हफ्ते की बात है ..नौवां महीना लग ही जाएगा उसके बाद तो यह पैदा भी हो सकता है। तो जब इतना लंबा सफर तय कर लिया तो यह एक हफ्ता भी पलक झपकते आपके साथ तय कर लूंगी। मैंने बहुत समय अकेले गुजारा है इस बच्चे के साथ। अब इसके जन्म होने तक मैं अपने महल में अपने कमरे में रानी बनकर आपके साथ रहना चाहती हूं । प्लीज मुझे महल ले चलिए मैं अपने घर पहुंच जाऊंगी, फिर मुझे कुछ नहीं होगा।”

राजा ने एक नजर डॉक्टर पर डाली डॉक्टर ने भी धीमे से हां में सर हिला दिया….

“सारी जरूरी दवाइयां मैं आपको बता दे रही हूं आप वह सब लेकर ट्रैवल कर सकते हैं”

डॉक्टर की रजामंदी मिलते ही बांसुरी के चेहरे पर मुस्कान चली आई और वह अपनी जगह से खड़ी हो गई उसके वहां से उठते ही राजा भी उसकी फाइल समेटे उसके साथ बाहर चला आया । राजा कुछ कहने ही जा रहा था कि बाँसुरी  ने उसकी होंठों पर अपना हाथ रख दिया…

” अब कुछ बोल कर इस कीमती समय को ज़ाया मत कीजिए साहब । अब तो कुछ हो भी नहीं सकता , अब जो होगा वह सिर्फ डिलीवरी होगी आपके बच्चे की डिलीवरी। हमारे बच्चे की डिलीवरी। “

राजा यह भी समझता था कि गर्भावस्था में मां को ज्यादा परेशान करना सही नहीं है अब उसके हाथ में कुछ रह भी नहीं गया था इसलिए बांसुरी को साथ लिए वह उसके घर के लिए निकल गया। एक दिन बाद उन दोनों की वापसी की फ्लाइट जो थी….

***

  बांसुरी को साथ लिए राजा महल में पहुंच चुका था। दोनों अभी मुख्य द्वार में पहुंचे ही थे कि दौड़कर एक सहायिका ने उन्हें मुख्य द्वार पर रोक दिया। राजा चौक पर उसे देखने लगा कि अचानक उन्हें इस तरह रोकने वाली यह कौन होती है कि तभी उसके पीछे से रूपा आरती का थाल और पानी से भरा कलश सहायिका के साथ लिए वहां चली आई… सेविका से कहकर उसने पानी का कलश लिया और बांसुरी और राजा की एक साथ नजर उतार कर वह कलश सहायिका को पकड़ा दिया। इसके बाद दोनों की आरती उतारकर चंदन कुमकुम का तिलक कर बांसुरी को उसने अपने आंचल की छांव में ले अंदर कर लिया…

” बहुत-बहुत बधाइयां आपको बांसुरी ! आखिर इतने दिन अपने ऑफिस के कामों में और अपने सड़े से सरकारी बंगले में बिता दिए अब जाकर हमें मौका दिया है अपने राजकुमार के लिए मनपसंद बनाने और उसकी मां को उसका मनपसंद खिलाने का।
   भई महल भी तो पलके बिछाए अपने राजकुमार का इंतजार कर रहा है…

  रूपा की  लाड़ भरी बातें सुन बांसुरी मुस्कुरा उठी। जया और रूपा ने बांसुरी को प्यार से बिठाया और उसके लिए तरह तरह की खाने पीने की सामग्रियों से सामने रखी टेबल सजा दी।  दोनों ने बांसुरी के साथ चहल भरी शरारतें भी शुरू कर दी….

“अच्छा राजकुमार ही होगा यह आपको कैसे पता भाभी साहिब? “

जया के सवाल पर रूपा मुस्कुरा उठी

” इनकी शक्ल देखी? शक्ल से ही लग रहा है कि पेट में इस रियासत का भावी राजकुमार पल रहा है , तभी इतनी मुरझा गई हैं…”

” यह भी कोई बात हुई भाभी साहेब! इतनी लंबी यात्रा भी तो करके आ रही हैं उसकी क्लान्ति भी तो चेहरे पर ही नजर आएगी।

” बिल्कुल यात्रा की क्लान्ति तो चेहरे पर नजर आती है लेकिन अगर पेट में बिटिया होती है ना तो वह मां को अंदर से भी थकने नहीं देती इसलिए मां के चेहरे में चमक रहती है। बेटा शुरू से ही लाडेसर होता है इसलिए मां के सर पर चढ़ा रहता है और मां बेटे के शौक खुशी खुशी पूरी करते थक जाती है । प्यार तो दोनों से ही होता है दोनों ही तो अपना हिस्सा है लेकिन दोनों के प्यार करने के तरीके अलग होते हैं बस और कुछ नहीं”

रूपा जया उन दोनों के बच्चों फूफू साहब इन सब के बीच पहुंचकर बांसुरी को बहुत राहत मिली थी। उसके चेहरे की मुस्कान से संतुष्ट होकर राजा भी मुस्कुरा कर बाहर निकल गया जाते-जाते उसने बांसुरी से इजाजत भी ले ली बांसुरी भी घर पहुंच कर खुश थी उसने मुस्कुराकर राजा को जाने की इजाजत दे दी।

******

   मध्यप्रदेश के छोटे से एक कस्बे में राशन की दुकान पर लंबी लाइन में अपनी पारी की प्रतीक्षा करता वो बार बार अपनी घड़ी पर नज़र भी मार लेता था।
    उसे घर जाने की कुछ ज्यादा ही जल्दी थी….

” अरे भैया ज़रा जल्दी कर दो ना। कब से हम लाइन में खड़े हैं आपको नजर नहीं आ रहा है?”

” अरे आप भी देखे ना भैया भीड़भाड़ भी तो बहुत है। दुकान में आज दो ही लड़के हैं दो लड़कों ने छुट्टी मार ली हम भी क्या करें अकेले बताइए कहां कहां देखें गल्ला तो हमें ही देखना है ना।”

ठीक है ठीक है दीजिए जल्दी।”

लड़के को बहुत जल्दी थी उसने जैसे तैसे वहां से सामान लिया और तेज कदमों से चलता हुआ एक तरफ निकल गया दो चार गलियां पार करके वह अपने घर की गली में मुड़ गया।
  लोहे के गेट को खोल वो किनारे से ऊपर को जाती सीढियां चढ़ता ऊपर पहुंचा। जेब से चाबी निकाल उसने दरवाजे पर लगा ताला खोला और भीतर चला गया……

उसके ऊपर जाते ही उसी घर पर नीचे रहने वाली औरत बाहर निकल आयी…
  उसके बाहर आते ही उसके बाजू वाली और उसके भी बाजू वाली भी महिलाएं बाहर चली आयीं…
  आपस में तीनों की ही खुसर पुसर चालू हो गयी…

  ” देखा मैंने कहा था ना ये अकेला नही रहता है यहाँ!”

” फिर ? और कौन रहता है जिज्जी ? वैसे लगता तो हमें भी है कि कोई और है ज़रूर, लेकिन ये तो बाहर जाते हुए ताला लगा कर जाता है।”

” हाँ तो क्या ? हमने अपने इन्हीं आंखों से देखी है जिज्जी उनके छत पर एक दिन जनानी कुर्ती सूख रही थी। आप ने जे कैसे मोड़ा को घर किराए पर दे दिया जिज्जी। घर देने के पहले पड़ताल भी नही की! हम तो कह रहीं अंदर किसी मोड़ी को छिपा रखा है जे लड़के ने। “

” अरे अब हम का बताई बहन? फलाने से मिल कर गया रहा मोड़ा, बात कर रखी थी। इनके हाथ में एडबाँस रुपल्ली धर गया अब हरे हरे नोटों के सामने इनकीं जबान कहाँ खुले है फिर?
   अब देखो यहाँ रहते पूरे चार महीने हो गए…
  आया भी कैसे था तुम्हें बताएं। आधी रात जब पूरा मुहल्ला गहरी नींद में सोया पड़ा था ये चला आया,दबे पांव। और फिर बस वो दिन और आज का दिन है।
  किसी बहाने से इसे घर बाहर निकलने की कोशिश करो पहले ही इसके पास बहानों का ढेर रहता है। एकदम शांत पड़ो रहतो है तो अब हम भी क्या बहाना बना बना कर, झगड़ें तुम ही कहो।
  हमने तो इनसे कह दी है कि मोड़ो को घर से निकाल फेंको बाहर। कोई तो राज छिपा रखा है इसने?

” जिज्जी चलो न दरवाज़ा पीट पीट कर बाहर निकाल उसके घर की तलाशी ही ले लेते हैं।”

“राम राम ऐसी बातें न करो। हमारे ये सुन लेंगे न तो वो मोड़ो को नही हमई को घर से निकाल बाहर करेंगे। जे सुनना ही नही चाहते उसके खिलाफ कुछ। जैसे पंद्रह हजार में पुरो घर खरीद रखो हो मोड़ो ने।”

” जे का बात कर रहीं जिज्जी। ये आपके इत्ते से माचिस की डिबिया से घर का पंद्रह हजार। “

  औरत की आंखे फट  कर बाहर आने को थीं….

कहने वाली कह गयी लेकिन उसकी साफगोई मकान मालकिन को चुभ गयी…

“काहे लता तुम्हे हमार जे घर माचिस की डिब्बी सा लगे है तो तुम कौन से हवा महल में बसेरा कर रही हो। है तो तुम्हारे भी लाने कुल जमा तीन कमरे। हमाये तो फिर भी नीचे का घर देखो इत्ता बड़ा आंगन,रसोई दालान शिव मंदिर,इतना फैला घर बना रखा है। ऊपर तो जाने कौन कैसा रहने या जाए इसी से गुड्डू के पापा ने ऊपर दुइ कमरे निकलवा के छोड़ दिया। अब वो माचिस का डिब्बा कहाँ से हो गया। और इतनी माख लगी है जाओ न किसने रोका है बनवा लो और चढ़ा लो किराए पे।”

” अरे जिज्जी बुरा मान गयीं तुम तो।
  ये लो लौकी की लापसी बनाई है,ज़रा चख के बताओ। हम यही देने तुम्हे आये रहे कि इस सारी पंचायत में अपन असली काम तो भूल ही गये…..

  लापसी ने माचिस की डिब्बी को उड़ा कर रख दिया, कटोरा थामते ही मकान मालकिन को शुद्ध घी की खुशबू ने सराबोर कर दिया और वो कुछ समय के लिए ऊपर रहने वाले रहस्यमयी लड़के के बारे में भी भूल गयीं।।

   ठीक उसी समय वो धड़धड़ाते हुए सीढियां उतर आया, उसे अचानक आया देख तीनों अपनी बातचीत भूल उसे देख मुस्कुराने लगीं…

  उसने उन्हें देख हाथ जोड़े और वहाँ उसी वक्त पहुंचे दूध वाले से दूध लेकर ऊपर चला गया….

” ए रुको ज़रा…. उनमें से एक ने उस लड़के के उपर जाते ही दूध वाले को रोक कर कहा…

” तुम दूध देने ऊपर काहे नही जाते।सीढियां चढ़ने में आलस आता है तुमको..”

” नही अम्मा जी। वो तो भैया जी ही मना किये हैं। उनका कहना है दूध के वक्त पे वो ही नीचे उतर आएंगे। वरना हमें कौन तक्लीफ होनी है उपर जाकर देने में।”

” हम्म ठीक है ठीक है, जाओ… दूध लेते कितना हैं तुम्हारे भैया जी?”

” दुइ लीटर !”
  और दूध वाला अपना केन उठाये निकल गया…

  तीनो एक बार फिर एक दूसरे को देखती सलाह मशविरा में लग गईं….
   ” अकेला मोड़ा दुइ लीटर दूध पी जाता है? जे तुमको ठीक लग रहा जिज्जी? इसके लच्छन ठीक न लग रहे हमें….

   दूध वाले से दूध ऊपर ले जाकर आदित्य ने दरवाज़ा धीमे से खोला और अंदर चला गया……

   भगोने में दूध पलट कर उसने उबालने रखा और उसी वक्त निकाला हुआ जूस हाथ में लेकर दूसरे कमरे की ओर बढ़ गया…

  कमरे में एक पलंग पर केसर लेटी हुई थी। आदित्य ने उसे सहारा देकर उठाया और जूस का ग्लास धीमे से उसके कांपते हाथों में थमा दिया….
  कृतज्ञता से उसे देखती केसर ने बहुत जोर लगा कर और बड़ी मुश्किलों से उस गिलास को पकड़ा। यूँ लगा उस गिलास को पकड़ने में भी उसे कितनी तकलीफ हो रही होगी…
   आदित्य साथ ही बैठा उसे देखता रहा, लेकिन आगे बढ़ कर उसने ग्लास पकड़ने में उसकी कोई मदद नही की।

बहुत मुश्किल से आधे घंटे से ज्यादा वक्त लगा कर केसर ने किसी तरह ज्यूस खत्म किया कि आदित्य ने हाथ का सहारा देकर उसे पलंग से नीचे उतार लिया.. और उसका हाथ थामे उसे उसी कमरे में इधर से उधर धीमे कदमों से चलाने लगा….

” अरे भूल गया, मैं अपने लिए चाय चढ़ा कर आया था। तुम बस दो पल के लिए खड़ी रहो मैं फटाफट चाय लेकर आता हूँ।”

  आदित्य ने धीरे से उसे अकेले वहीं खड़ा छोड़ा और रसोई की ओर भाग गया… एक पल को केसर को लगा वो गिर जाएगी, लेकिन फिर उसने खुद को संभाल लिया… और बहुत मजबूती से अपने पैरों पर ज़ोर देती खड़ी रहने की कोशिश करती रही…
       कुछ देर वैसे ही खड़ी रहने के बाद उसने धीमे से अपना एक पैर उठा कर रखने की कोशिश की और धीरे से आगे बढ़ने लगी,एक पल को उसे लगा वो भरभराकर गिर पड़ेगी लेकिन उसने खुद को संभाल लिया…
    कमरे के बाहर दरवाज़े के पीछे से आदित्य छिप कर खड़ा उसे देखते हुए मुस्कुरा रहा था।
   बहुत डगमगाते हुए केसर धीरे धीरे आगे बढ़ती चली गयी…

  उसे इस तरह खुद से बिना किसी सहारे के चलते देख आदित्य ने राहत की सांस ली और अंदर चला गया…

    दून से केसर को साथ लेकर भागतें हुए आदित्य का सामना ठाकुर साहब के आदमियों से हो ही गया था। कितना बचते बचाते निकला था वो लेकिन ठाकुर के आदमियों के हत्थे चढ़ ही गया था।
     केसर की तबियत संभली नही थी। उसे जैसे तैसे लेकर वो ट्रेन में सवार हो गया था।
   उस वक्त उसे लगा कि उसने केसर की जान ठाकुर साहब और उनके आदमियों से बचा ली थी। ट्रेन में आरक्षित सीट तो थी नही, जैसे तैसे टीटी से बात कर और सीट का दुगुना मूल्य चुका कर ऐसी प्रथम के कूपे में उसने केसर को आराम से लेटा दिया था।
    खुद बाहर निकल इधर उधर झांकते वो यही देखने का प्रयास कर रहा था कि कहीं वो लोग उसका पीछे तो नही हैं।
   आखिर ट्रेन स्टेशन से छूटी और उसे राहत मिली थी।
   ट्रेन वहाँ से कहाँ जा रही थी, उसे नही पता था। ट्रेन छूटते ही उसने सोचा था कि फ़ोन कर के राजा को अपने और केसर के बारे में बता दे लेकिन फ़ोन अपनी जगह  से नदारद था। यानी इतनी भागदौड़ में फोन उसकी जेब से निकलकर कहीं गिर गया था। वह तुरंत केसर तक पहुंचा और उससे उसका फोन मांग लिया , केसर की तो हालत ही ऐसी नहीं थी कि वह अपने फोन या अपनी  किसी भी चीज़ का ध्यान रख पाती। परेशान हाल आदित्य दूसरी सीट पर पैर फैलाए बैठ गया था, सोचते-सोचते जाने कब उसकी आंखें लग गई।
    दिन भर की थकान और भागदौड़ ऐसी थी कि आदित्य को भी गहरी नींद ने घेर लिया था उसी गहरी नींद में उसे अचानक लगा कि उसके माथे पर कोई चीज रखी गई है । उसने आंखें खोली सामने ठाकुर साहब का आदमी उस पर गन ताने खड़ा था । आदित्य चौक कर अपनी जगह बैठ गया उसने बाजू वाली सीट पर देखा  केसर के माथे पर भी गन ताने दो लड़के खड़े थे । उस पूरे कूपे में वह तीन आदमी उन दोनों पर गन टिकाये  मौजूद थे, फिर तो उसके अंदर का सोया राजकुमार जाग गया और अपने  राजपूताना खून की गर्मी से झुलसते आदित्य ने  पलक झपकते ही उन तीनों पहलवान से लड़कों को पटखनी दे दी । उसकी पिटाई से वो तीनों एकबारगी बेहोश हो गए, चित पड़े तीनों लड़कों पर एक नजर डाल वह केसर का हाथ थामे उस कूपे से बाहर निकल गया था। ट्रेन किसी स्टेशन पर जरा सा धीमी हुई थी कि आदित्य केसर के साथ वहीं उतर गया, उसे नहीं पता था कि यह कौन सा स्टेशन है?
    बाहर निकलने पर उसने देखा स्टेशन का नाम भिंड था।

  नई जगह नया शहर और उन दोनों अजनबीयों के पास कोई सामान तक नहीं था। बारिश से बचते बचाते वो स्टेशन पर बाहर बनी एक चाय की टपरी पर रुक गए। आदित्य ने वहां बिछी बेंच पर केसर को बैठाया और उसके हाथ में गर्म चाय पकड़ा दी। चाय वाले से वह आस-पास रहने लायक होटल या लॉज के बारे में पूछताछ कर ही रहा था कि एक रिक्शा उसके सामने चला आया…

” आइए बाबू जी हम आपको एकदम सस्ती और अच्छी जगह पहुंचा देंगे!”

आदित्य ने एक नजर उसे घूर कर देखा फिर उसे अचानक याद आया कि यहां उसे अपनी पहचान छिपाए रखनी है। क्योंकि अभी भी ठाकुर साहब और उसके आदमियों का डर बना हुआ था। वो केसर को साथ लिए उस रिक्शा में बैठ गया । रिक्शावाला कोई गाना गुनगुनाते हुए उन दोनों को साथ लिए एक लॉज में पहुंच गया।
एक नजर देखते ही आदित्य को वो लॉज बिल्कुल पसंद नहीं आया उसने रिक्शेवाले से किसी अच्छे होटल में ले चलने को कहा। इस तरह एक जगह से दूसरी जगह घूमते आखिर आदित्य को अपने लायक एक ठीक-ठाक होटल मिल ही गया। किसी तरह समझौता करते हुए आदित्य केसर को लिए एक रूम में चला गया लेकिन रह रह कर उसके दिमाग में ट्रेन वाला किस्सा घूम रहा था। जब ठाकुर साहब के आदमी ट्रेन तक पहुंच गए तो वह यहां तक भी पहुंच सकते थे। उसके दिमाग में अब पूरी तरह से केसर को लेकर चिंता समाई हुई थी। केसर की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उन लोगों का इस तरह किसी भी लॉज धर्मशाला या होटल में रहना सुरक्षित नहीं था।। ठाकुर साहब के आदमियों को उसने बहुत कम आंक लिया था। जब वह केसर के साथ भागा था तब उसके पीछे लगभग दर्जन भर लोग भागे थे लेकिन ट्रेन में उसका सामना सिर्फ 3 लोगों से हुआ इसका मतलब बाकी के लोग ट्रेन में ही उन दोनों को तलाश रहे थे और इन तीनों के हत्थे वह दोनों चढ़ गए थे। वह तो अच्छा हुआ कि उसने बाकी लोगों के आने से पहले ही उन तीनों को ठिकाने लगा दिया और एक स्टेशन पर उतर गया लेकिन जैसे ही उनके बाकी साथी इन तीनों तक पहुंचे होंगे उन लोगों को आभास हो गया होगा कि आदित्य और केसर किस स्टेशन पर उतरे हैं? वह जरूर भिंड और इसके अगले और पिछले स्टेशनों की भी तलाशी लेंगे और तलाशी लेने वाले शहर के लॉज, होटल और धर्मशालाओं की ही तलाशी लेंगे । यह सब सोचते सोचते आदित्य के दिमाग में यह बैठ गया कि केसर को लेकर उसका किसी होटल में रुकना सही नहीं है। यही सोचकर अगले दिन सुबह ही उसने केसर के साथ वह होटल खाली कर दिया। बाहर एक रिक्शा कर उसने रिक्शेवाले से किसी भी वर्किंग विमेन हॉस्टल ले चलने की बात कही। केसर को समझा-बुझाकर उस हॉस्टल में सिर्फ 2 दिन रुकने के लिए मनाया और उसे वहां छोड़ अपने लिए कमरा देखने निकल गया था। कितनी मुश्किलों के बाद उसे रहने लायक एक दो कमरे का घर मिल ही गया था। और वो केसर को लिए वहां चला भी आया इसी बीच उसे अखबारों में दून की आईएएस ऑफिसर बांसुरी अजातशत्रु सिंह की हिरासत की खबर भी पढ़ने को मिल गई थी और इस खबर को पढ़ने के साथ ही उसे समझ आ गया था कि केसर का जिंदा रहना कितना जरूरी था।
      हालांकि अगले दिन के अखबारों में ही बाँसुरी की रिहाई की खबर भी छपी मिल गयी थी, और उसे समझ आ गया था कि फिलहाल उसके पास केसर के पूरी तरह स्वस्थ होने तक का वक्त मिल गया है।
   केसर की हालत ऐसी नही थी कि उसे लेकर इस वक्त महल तक लौटा जाए, और सबसे बडी बात या बड़ा डर उसे इसी बात का था कि महल के आसपास ठाकुर साहब के लोग घात लगाए बैठे उन दोनों का इंतज़ार कर रहें होंगे।
   वो यही सोच रहा था कि दो चार दिनों में जब केसर की हालत कुछ ठीक हो जाये तब समर से बात कर वो यहाँ से केसर को साथ लेकर निकल जायेगा, लेकिन एक के बाद एक कुछ न कुछ ऐसा घटता चला गया कि वो वहाँ से बाहर ही नही निकल पाया।
    उन दो कमरों के घर मे रहते हुए उसे और केसर को कुछ दिन ही बीते थे और आदित्य समर को फ़ोन करने की सोच ही रहा था  कि केसर सीढ़ियों पर से गिर कर चोट लगवा बैठी।
   
   भगवान जाने उसकी और केसर की  किस्मत में क्या लिख बैठे थे कि वो चाह कर भी उस छोटी सी जगह से निकल कर सुरक्षित अपने घर नही पहुंच पा रहा था……

क्रमशः

 


aparna…..
  
   





  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s