जीवनसाथी – 109




जीवनसाथी-109



उन दो कमरों के घर मे रहते हुए उसे और केसर को कुछ दिन ही बीते थे और आदित्य समर को फ़ोन करने की सोच ही रहा था  कि केसर सीढ़ियों पर से गिर कर चोट लगवा बैठी।
   
   भगवान जाने क्या किस्मत में लिखा बैठे थे कि वो चाह कर भी उस छोटी सी जगह से निकल कर सुरक्षित अपने घर नही पहुंच पा रहा था……

    मकान मालकिन उन दोनों को शादीशुदा जोड़ा समझ गाहे बगाहे केसर से इधर उधर की गप्पे मारने में  लगी रहती लेकिन केसर का ठंडा बर्ताव उनके जोश पर घड़ों पानी डाल देता।
   वो भी जुझारू महिला था इतनी जल्दी हिम्मत नही हारने वाली थी….
   कभी वो कढ़ी लेकर ऊपर पहुंच जाती तो कभी चने की भाजी। उन्हें अपने हाथों पर पूरा विश्वास था। उनके हाथों की बनी कढ़ी अच्छे अच्छों को पिघला सकती थी, फिर ये किस खेत की मूली थी…
   ऐसे ही एक शाम वो गरमागरम समोसे लिए ऊपर पहुंच गईं….
   केसर खिड़की से बाहर देखती चुपचाप बैठी कुछ सोच रही थी कि ये धमक पड़ीं…

” ये लो , हम सहीं वक्त पर पहुंचीं हैं ना! “

” कैसे ? ” केसर को बातें घूमा कर करने की आदत तो थी नही, उसके लट्ठमार जवाब पर वो दुगुने जोश से भर गयीं।

” अरे चाय का वक्त हो रहा ना, हमें लगा तुम मियां बीवी चाय पी रहे होंगे , समोसे पहुंचा दें… तुम्हारी चाय का स्वाद बढ़ जाएगा।

  केसर ने एक नज़र उन्हें देखा और मुस्कुरा कर समोसे की प्लेट लेकर रख ली, लेकिन वो अब भी खड़ी हीं थीं…

” ले तो ली आपसे प्लेट! अब जा सकती हैं आप!”

  ऐसे जवाब की आस तो नही थी उन्हें पर वो कौन सा जंग हारने आयी थी यहाँ..

” खाली समोसे देकर थोड़े न निकल जाएंगे, अब तुम दोनों की चाय बनाओगी ही तो हमारी भी चढ़ा लो..!

  गुस्से में उन्हें घूरती केसर प्लेट पकड़े रसोई की ओर चली गयी और जाते जाते भी एक चिंगारी छोड़ ही गयी….

” चाय नही पीते हम लोग। हम कुछ और पीते हैं , पियेंगी?”

  केसर को लगा नही था कि उन्होंने सुन लिया होगा, पर आशा के विपरीत वो सुन चुकी थीं…..

” चाय नही पीती तो क्या पीती हो? काफी…हम काफी भी पी लेंगी!”

  केसर ने रसोई में घुस कर अपना माथा पीट लिया, कि तभी बाहर से आदित्य अंदर चला आया… सीढियों पर ही उसे आवाजें सुनाई पड़ चुकी थी। मकान मालकिन को नमस्ते कर वो फटाफट रसोई में घुस गया…
    रसोई में केसर बर्तन इधर उधर करती गुस्से में खड़ी थी… उसे समझ ही नही आ रहा था कि करे क्या?
  आदित्य ने फटाफट एक बर्तन लिया और पानी गैस पर चढ़ा दिया…आदित्य को देख उसके चेहरे पर राहत चली आयी..

” हम क्या करें आदित्य? हमें तो चाय तक बनानी नही आती? और ये मुटल्लो धमक पड़ी चाय पीने। हद हैं यार ये औरतें भी। समोसे जैसी जेओमेट्री बना सकती हैं तो चाय भी खुद क्यों नही बना ली। जब समोसा ला  ही रही थी चाय भी ले आतीं।”

  आदित्य को हंसी आ गयी…

” मिडिल क्लास में ऐसा ही होता है केसर! “

” व्हाट द .. ” केसर कुछ बोलते बोलते रुक गयी और वहीं किनारे रखी वाइन उठा कर गिलास में डालने वाली थी कि आदित्य ने हाथ बढ़ा कर उससे छीन लिया….

“अभी मत पियो केसर, वो बैठीं हैं बाहर। उन्हें समझ आ जायेगा? “

” तो क्या हुआ? हमें कोई फर्क नही पड़ता? “

” पड़ता है। हमें अभी फर्क पड़ता है। हम ठाकुर के गुंडो से छुप कर रह रहें हैं।अगर कही से भी भनक पड़ गईं उन लोगो को तो हमारा बचना मुश्किल हो जाएगा।
   इसलिए हमें यहाँ यहीं के लोगो जैसे रहना होगा। “

  केसर ने बोतल वापस रख दी…

” क्या कह रहे थे तुम? ये मिडिल क्लास क्या होतीं हैं ?

  चाय खौल चुकी थी, उसे छानते हुए आदित्य मुस्कुरा उठा…” चलो बढ़िया है कि तुम इनके बारे में जानना चाहती हो। इनसे ज्यादा इरिटेट मत होना। ये मध्यम वर्गीय परिवार और खास कर इनके घरों की औरतें ऐसी ही होती हैं। हर किसी से घुल मिल जाती हैं। इनके लिए एक तरफ तो इनका घर परिवार ही पूरी दुनिया है दूसरी तरफ पूरी दुनिया को ये अपना परिवार मान लेती हैं।
  ये सभी के लिए इतनी ही स्वीट होतीं हैं। कोई अनजान आदमी भी इनके घर आएगा, तो ये उसे चाय पिलाये बिना जाने नही देती।
   इनके लिए प्यार जताने का सबसे सामान्य तरीका है उसे खिलाना पिलाना।
  ये तुमसे दोस्ती करना चाहती हैं इसलिए तुम्हारे लिए हमेशा कुछ न कुछ बना कर लाती रहतीं हैं। और तुम अपने घमंड में उनके लाये सामान फेंकती रहती हो!

” घमंड में नही फेंकते। हमसे वो सब अजूबा खाया ही नही जाता!”

” तुमने चख कर देखा भी है कभी वो अजूबी चीजें? जो उनका स्वाद जानोगी? आजतक नौकरों के हाथ का बना ही तो खाती आयी हो… अब पहली बार कोई तुम्हारे लिए स्पेशली कुछ बना कर ला रहा तो उसकी ज़रा सी कदर कर लो..
  चलो आओ उनके साथ ही बैठ कर चाय के साथ ये समोसे खा कर देखो!”

” पर सुनिए आदित्य, ये समोसे वो सिर्फ हम दोनों के लिए लाई हैं वो बस चाय पियेंगी। ऐसा उन्होंने ही कहा।”

” भले ही ऐसा उन्होंने कहा हो लेकिन अंदर से वो चाहती हैं हमारे साथ बैठ कर खाना। वरना देखो क्या इतने समोसे तुम् खा पाओगी। चिड़िया सी तो तुम्हारी डाइट है और जब से यहाँ आयी हो, सिर्फ प्रोटीन शेक पर ही ज़िंदा हो। खैर आज मैं राशन का सामान ले आया हूँ। आज रात में कुछ बना कर खाएंगे। मैं ये रोज़ रोज़ अंडा ब्रेड और मिल्क शेक पी पीकर थक गया हूँ।”

  आदित्य ने ट्रे केसर के हाथ में दी और उसे बाहर निकलने को पीछे से हल्का सा धक्का दे दिया…
   केसर को बहुत अजीब लग रहा था, वो कभी ऐसे ट्रे लिए नही चली थी। उसने फटाफट बाहर जाकर ट्रे टेबल पर पटक दी…
   मकान मालकिन के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी…
आदित्य ने चाय का कप उठा कर उनके हाथ में दिया और खुद अपनी चाय लिए एक कुर्सी पर बैठ गया। केसर आदित्य की तरफ देखने लगी…

” बहुरिया को चाय नही पकड़ाई तो देखो कैसे नाराज़ हो गईं हैं…!”

आदित्य भी मुस्कुरा उठा, उसने एक समोसा उठा लिया… ” खुद ले लेगी”!

  आदित्य को एक नज़र घूर कर केसर ने भी एक समोसा उठा लिया। समोसा मुहँ में रखते ही उसकी आंखें चौड़ी हो गयी…
   ऐसा अमृत सा स्वाद भी हो सकता है किसी वस्तु का , उसने आज तक सोचा ही नही था।
   सालों से उसका एक बंधा बंधाया नाश्ता था। जिम करने के बाद वह अक्सर अंडे और प्रोटीन शेक ही पिया करती थी, इसके अलावा उसने कई सालों से कोई और नाश्ता किया ही नहीं था। दोपहर के खाने में भी वह अक्सर नॉनवेज ही खाया करती थी वही हाल रात के खाने का भी था।
   अपनी अब तक की जिंदगी में उसने समोसे शायद पहली बार ही खाए थे एक खत्म कर उसने दूसरा उठा लिया।
    खुद में मगन केसर को समोसे खाते देख आदित्य को हंसी आ गई…. ” समोसों के साथ चाय भी पीकर देखो। और मज़ा आएगा!”

  आदित्य की बात सुन समोसे के साथ ही चाय पीने के चक्कर में हड़बड़ाहट में केसर ने अपना मुंह जला लिया । समोसे का तीखापन उस पर गर्म चाय! वो अपने हाथों से मुहँ के सामने हवा कर रही थी कि हंसते हुए आदित्य ने उसे पानी की ग्लास पकड़ा दी..

” ज़रा सब्र कर के खाओ। सारे तुम्हारे ही हैं। ” आदित्य का हँस हँस कर बुरा हाल था, उसे हंसते देख मकान मालकिन भी मुस्कुरा उठी…
    अपनी चाय खत्म कर उन्होंने कप नीचे रखी और प्रशंसात्मक दृष्टि से केसर को देखने लगी….

” चाय बड़ी बढ़िया बनाई है बहुरिया ने। खाना वाना तो बढ़िया बनाती ही होगी? “

  आदित्य ने मुस्कुरा कर हां कह दिया…

मकान मालकिन को मुस्कुराते देखा आदित्य ने एक छौंक और लगा दी….

” जल्दी ही कुछ बनाकर पहुंचाएगी आपके पास किसी दिन।”

अब तक दो समोसे टिका चुकी केसर ने घूर कर आदित्य को देखा और खुद को चाय के कप में डूबा दिया। उसे चाय पीते देख मकान मालकिन वहाँ से उठ गयीं….

“हम चलतीं हैं अब शाम के खाने की तैयारी भी करनी हैं। आज मंगोड़ी बनानी है। आप लोग खाते हैं क्या? अगर पसन्द है तो हम भेज देंगी। ”

” हम सांप और चमगादड़ छोड़ कर सब खा लेते हैं.”

  आदित्य की बात पर हंसते हसंते वो नीचे चली गयी…
”  कुछ भी बोल देता है यह लड़का, बड़ा मजाकिया है।”

  उनके जाते ही आदित्य ने दरवाज़ा बंद किया और अंदर चला आया..

” क्यों कैसे लगे समोसे केसर बाई सा? “

  आदित्य अब भी मुस्कुरा रहा था, केसर ने एक नज़र उसे घूरा फिर वापस समोसे की प्लेट देखने लगी..

“नो ! तीसरा खाने की सोचना भी मत। अभी तुम्हारे लिए दो ही बहुत हैं। कुछ समय पहले ही बिस्तर से उठी हो।अभी अपने पाचन तंत्र पर ज्यादा लोड मत दो चाय खत्म कर लो फिर ये बर्तन अंदर रखा आना।”

” माय फुट! हम नही रखने जा रहे कुछ अंदर!”

” ओह बाई सा! यहाँ कोई आपका नौकर नही है।।अपने काम खुद ही करने पड़ेंगे। “

  केसर ने दूसरी तरफ मुहँ फेर लिया और आदित्य हंसते हुए सारे बर्तन समेटे रसोई में चला गया….
आदित्य के बर्तनों को साफ करने की आवाज़ सुन नाराज़गी से केसर भी अंदर चली आयी और उसके हाथ से बर्तन ले लिए…

” जाइये इतना भी एहसान करने की ज़रूरत नही है हम पर। हम धो लेंगे। “

” आपको बर्तन धोने आतें हैं। सिर्फ पानी से साफ नही करना है। वो जो सोप रखा है ना उसे भी लगाइए … हाँ ठीक ऐसे ही, अब पानी से साफ कर लीजिए। “

  नाराजगी से कुढ़ती केसर बर्तन साफ करती रही और आदित्य एक समोसा उठाये गुनगुनाता हुआ बाहर चला गया….

*******

  चुनाव की तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी थीं । आज शाम राजा के ऑफिस में उम्मीदवारों के नामो की घोषणा होनी थीं।
   किस किसको उम्मीदवार घोषित किया जाना था और किस जगह से उन्हें चुनाव लड़ना था यह सारी घोषणाएं आज शाम होनी तय थी। राजा ने विराज को भी बुला रखा था।
            इसके साथ ही 2 दिन बाद माया नगरी विश्वविद्यालय का उद्घाटन भी होना था। सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं….
   यहाँ तक कि अलग अलग महाविद्यालयों का नामकरण भी हो चुका था। वाणिज्य और कला संकाय का नाम जहाँ रानी रूपमती कला महाविद्यालय था वहीं राजा युवराज सिँह क्रीड़ा महाविद्यालय था…
  रानी बाँसुरी अजात शत्रु सिंह जहाँ चिकित्सा महाविद्यालय था वहीं राजा अजातशत्रु सिंह अभियांत्रिकी महाविद्यालय था।
    महाराज के नाम पर विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी का नामकरण हुआ था तो रानी माँ के नाम पर कला वीथिका नामांकित थी।
    कॉमर्स कॉलेज जहाँ विराज के नाम पर था वहीं फोटोग्राफी से सम्बंधित कॉलेज का नाम विराट पर था।
    बराबरी से सभी को कार्यभार दिया गया था। चिकित्सा महाविद्यालय के लिए जहाँ पुराने और अनुभवी डॉक्टरों की टीम मुहँमांगी कीमत पर आयात की गई थी वहीं अभियांत्रिकी महाविद्यालय के लिए भी नवरत्न कंपनियों के रिटायर्ड इंजिनिंयर्स और बड़े नामचीन महाविद्यालयों के प्रोफेसर और लेक्चरर आदि थे।
    इसी तरह से सारे महाविद्यालयों के लिए लेक्चरर और प्रोफेसर इकट्ठे किए गए थे। हर एक महाविद्यालयों की अपनी-अपनी प्रशासनिक कार्य प्रणाली और टीम अलग अलग थी लेकिन उन सब के ऊपर भी एक टीम बनाई गई थी जिस टीम में अधिकतर सदस्य राजमहल से थे कुछ अन्य अधिकारी भी थे।
विश्वविद्यालय का मुख्य कर्ताधर्ता विराज को बनाया गया था इसके साथ ही उसकी सहायता के लिए युवराज समर और खुद अजातशत्रु भी मौजूद थे। विश्वविद्यालय की सीईओ के पद के लिए चुने गए नामों में जब मतदान करवाया गया तो सबसे अधिक मतों के साथ निरमा उस पद के लिए चयनित हुई थी। निरमा को भी चयन के पहले तीन तरह के साक्षात्कार के दौर से गुजरना पड़ा था उसके बाद ही उसे उस पद के उपयुक्त पाया गया था। दो दिन बाद सभी पदाधिकारियों को भी अपनी पदों की शपथ लेनी थी। महल में सभी व्यस्त थे राजा शाम की मीटिंग के लिए पहुंच चुका था समर युवराज भैया विराट काकासाहेब प्रेम आदि के साथ बाकी जिन लोगों को राजा ने बुलवाया था सभी आ चुके थे सिर्फ विराज नदारद था।
   
    सभी आपस में चर्चा कर रहे थे, समय बीतता जा रहा था लेकिन विराज का कोई अता पता नही था। आखिर राजा ने जो मुख्य मुद्दा था उसी पर चर्चा शुरु कर दी…
    उसने जिन जिन स्थानों से अपने उम्मीदवार खड़े करने थे उनकी लिस्ट समर के हाथ में थमा दी… ग्यारह लोगों के नामों की लिस्ट में ठीक पांच मिनट पहले राजा ने कोई बदलाव किया था। उस बदलाव के बाद जब समर ने वो लिस्ट पढ़नी शुरू की ठीक उसी समय विराज भी वहाँ पहुंच गया…
    उम्मीदवारों में अधिकतर वही नाम थे जिनके बारे में महल में शुरू से चर्चा थी कि ये लोग राजा की टीम का हिस्सा हो सकतें हैं। उनमें कुछ राजा के पुराने दोस्त थे, तो कुछ  महाराज के पूर्व परिचित थे।
   राजा ने समर प्रेम और युवराज के नाम भी प्रस्तावित किये थे लेकिन ये तीनो ही लोग सक्रिय राजनीति में उतरे बिना ही अपरोक्ष रूप से राजा का समर्थन और सहायता करना चाहते थे इसलिए महल से सिर्फ दो ही लोगो के नाम उम्मीदवारी में थे। एक विराज और दूसरा स्वयं राजा अजातशत्रु सिंह!

     अंतिम समय में राजा ने सिर्फ उम्मीदवारों के खड़े होने की जगहों में मामूली बदलाव करवाये थे और उन्हीं बदलावों से विराज एकाएक चिढ़ उठा..

” हमने पहले ही कहा था कि हम राजपुर से चुनाव लड़ना चाहते हैं, आपने हमें भुवाली से टिकट दी है। ऐसा क्यों? मतलब आप जानबूझ कर हमेशा वही करेंगे जिससे हमें नीचा देखना पड़े।”

” विराज अभी मैं इस बात का कोई जवाब नही देना चाहता। आज बस स्थान का आबंटन था। अब सभी को अपना अपना नामांकन भरने जाना है उसके बाद देखेंगे।”

” उसके बाद देखने के लिए बचा ही क्या? सबसे कमजोर सीट दे दी हमें। जहाँ से पता है हम नही जीत सकते। “

” भुवाली में जनसंख्या बाकी जगह से कम है,वहाँ पर अच्छे से कैम्पेन कर के हम वहाँ के सारे वोट खींच सकते हैं इसलिए तुम्हे  वहाँ से लड़वा रहें हैं। राजपुर से लड़ना तुम्हारे लिए मुश्किल होगा विराज। वो एक बड़ा विधानसभा क्षेत्र है। “

” हाँ इसलिए उसे खुद के लिए रखा है ना। पर याद रखना, तुम कुल ग्यारह सीट से लड़ रहे हो अजातशत्रु! सारी सीट्स जीत भी गए तो भी पावर में पार्टी आने लायक तो नही ही कर पाओगे।  किसी न किसी पार्टी से हाथ तो मिलाना ही पड़ेगा। “

” वो सब बाद कि बातें हैं। अभी बस इन ग्यारह जगहों पर ही ध्यान देना है,बाकी बाद में देखेंगे। “

” मुझे मंज़ूर नही है, मुझसे कहीं ज्यादा अच्छी सीट तो तुमने बाकियों को बांट रखी है। हर जगह तुम्हारा मुझसे बैर ही नज़र आ रहा है मुझे। “

  ” ठीक है जैसी तुम्हारी मर्ज़ी! अगर चुनाव नही लड़ना चाहते हो तो तुम यहाँ से जा सकते हो। “

  राजा भी अब विराज की हरकतों से परेशान हो चुका था , ऐसे में उसका नाराज़गी से विराज को जाने कह देना विराज को और भी नाराज़ कर गया। वो अपनी जगह से उठने ही वाला था कि कुछ सोच कर वापस बैठ गया…
   मन ही मन उसके कोई षड्यंत्र चल ही रहा था। उसने जो भी सोच रखा हो लेकिन अब भी वो राजा अजातशत्रु को पूरी तरह से शायद जान नही पाया था।

******

      तैयारियों में व्यस्तता से प्रेम रात ज़रा देर से घर लौट पाया था…..
   निरमा अपना सारा काम निपटा कर मीठी का होमवर्क करवाती बैठी थी कि प्रेम की गाड़ी की आवाज़ आयी और मीठी भागती हुई बाहर निकल गयी।
   गाड़ी खड़ी कर प्रेम ने मीठी की गोद में उठा लिया, और मुस्कुराते हुए भीतर चला आया….
   मीठी धीमे शब्दों में अपने पापा से अपनी मम्मा की बुराई कर रही थी और बहुत गंभीरता से प्रेम उसकी बातों को सुन रहा था और धीरे धीरे मुस्कुरा रहा था…

” अच्छा तो आज मम्मा ने मीठी को ज़ोर से डांट लगाई। क्यों भई मम्मा ये क्या बात हुई भला, हमारी स्वीट सी एंजेल को क्यों डाँटा गया है ? “

” आपकी स्वीट एंजेल से पूछिए कहाँ कहाँ से ऐसी खुरापातें सीख कर आती है ? “

” क्यों ऐसा क्या हुआ एंजेल? “प्रेम ने मीठी की तरफ देखा, तो मीठी ने अपने पापा के कंधों पर मुहँ छिपा लिया…

” मैंने सुबह इसे यहाँ लिखने बैठाया और किचन में अपना काम निपटा रही थी, तो ये शैतान होमवर्क करने से बचने के लिए बाहर चली गयी, और वहाँ ज़ोर से इसने कुछ गिरा दिया। मैं घबरा कर भागती हुई वहाँ पहुंची तो ये जनाब वहाँ बगीचे में बैठी रो रहीं थीं। मैंने पूछा क्या हुआ मीठी तो इसने अपनी बाजू मेरे सामने कर दी। मैं घबरा गयी क्योंकि इसके बाजू में से खून बह रहा था।  मैं तुरंत उसे उठाकर अंदर भागी, इसे चुप करवाने लगी, मैंने जल्दी से कॉटन लेकर इसकी बाजू को साफ किया तो क्या देखती हूं यहां तो स्किन बिल्कुल साफ है, मुझे कहीं कोई जख्म नजर नहीं आया । जब मैंने घूर कर इसे देखा और कड़क कर पूछा कि यह क्या था , सच बताओ वरना पिटाई कर दूंगी। तब इस शैतान की बच्ची ने धीरे से कहा कि इसने अपने हाथ में टोमेटो सॉस लगाया था। जिससे कि मुझे ऐसा लगे हाथ से खून बह रहा है, और मैं इसे लिखने को ना कहूं। अब बताइये आप शैतान की खाला है कि नही? इसकी पिटाई होनी चाहिए या नही? “

” अरे बस बस मम्मा! थोड़ा ठंडी हो जाइए और पहले एक बात डिसाइड कर लीजिए..”

” क्या ?”

” वो ये कि मीठी अगर शैतान की बच्ची है तो मैं और तुम क्या हैं?”

  अपने पापा की बात पर मीठी खिलखिला कर हँस पड़ी और वापस अपने पापा से चिपक गयी…
   बनावटी गुस्सा चेहरे पर लिए निरमा रसोई में चली गयी…

” बस ऐसे ही सर पर बैठा रखिये और बिगाड़ दीजिये लड़कीं को। कल को ससुराल जाएगी और अगर किसी ने मुझे दो बातें सुनाई तो मैं तो कह दूंगी, इसके पापा की कारस्तानी है सब। मैं नही जानती।”

” मेरी प्रिंसेस ससुराल क्यों जाएगी मैं तो ऐसा लड़का चुनूँगा जो यहाँ मेरे साथ आकर रहे। कोई भी मुझे मेरी बेटी से अलग नही कर सकता, उसकी माँ भी नही। “

  रसोई में झांक कर प्रेम ने अपनी बात की आखिरी लाइन कही और गोद में मीठी को लिए टहलता रहा।
      चार बरस की होने पर भी अब भी मीठी की सोने की आदतें नही बदली थी।
जब तक प्रेम उसे गोद में लेकर इधर से उधर एक दो चक्कर न लगा ले वो सोती नही थी।
   कुछ दस मिनटों में ही मीठी गहरी नींद सो गई, उसे अंदर ले जाकर निरमा ने उसके पलंग पर सुला दिया…

     खाने की टेबल पर प्रेम के सामने थाली परोस कर निरमा ने रखी और खुद रसोई में चली गयी…

” तुम भी अपनी थाली ले आओ न। रोज़ रोज़ तुमसे कहना पड़ता है।”

“और रोज़ रोज़ मैं आपसे कहती हूँ कि आपको गरमागरम फुल्के खिलाने के बाद ही मैं अपनी परोस कर लाऊँगी।”

  निरमा अपनी थाली भी ले ही आयी, लेकिन आज उसका मन खाने में नही लग रहा था….

” क्या हुआ? कुछ परेशान सी लग रही हो? “

निरमा ने प्रेम की तरफ देखा और अपने मन की बात कहने लगी…

” मुझे कुछ ज्यादा ही बड़ी जिम्मेदारी नही सौंप दी राजा भैया ने? बस वही सोच सोच कर परेशान हूँ क्या इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाने लायक हूँ मैं? कहीं ये पोस्ट मुझे सिर्फ आपके रुतबे के कारण तो नही मिली? “

” ऐसा सोचना भी मत निरमा। हुकुम बहुत बड़े दिल वाले हैं ये बिल्कुल सही बात है लेकिन व्यवहारकुशल भी उनसा कोई नही होगा।
   तुम्हें अगर इस पोजीशन पर बैठाया है तो कहीं न कहीं तुम्हारी कोई ऐसी खूबी तो देखी ही होगी वरना इतने लोगों के ऊपर तुम्हें बिना तुम्हारी योग्यता के बैठा कर वो अपना और अपनी यूनिवर्सिटी का नाम खराब नही होने देंगे।
   और खासकर तब जब ये उनके बाबा हुकुम का सपना रहा हो और उस सपने को अपनी दादी हुकुम के सामने पूरा करने जा रहे हों।
   तुम बिल्कुल निश्चिन्त रहो, और कल की तैयारी कर लो। मुझे मेरी निरमा पर पूरा भरोसा है वो सारे काम कुशलता से निपटा लेगी और फिर कहीं कोई दिक्कत या परेशानी आयी तो मैं तो हूँ ही तुम्हारे पीछे।
   तुम्हें हमेशा सपोर्ट करने के लिए। “

  निरमा की आंखें छलक आयीं। उसे इस वक्त बस यही डर सता रहा था कि वो इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभाल सकेगी या नही लेकिन प्रेम की बातों ने उसके आत्मविश्वास को थोड़ा सा ही सही बढ़ा दिया था….

    अगले दिन पूरी रियासत में त्योहार सा दिन था… रियासत से कुछ दूर मायानगरी को बसाया गया था। प्राचार्य प्रधानाचार्य आदि शिक्षक गणों को उनके लिए बनाई कॉलोनी में बसाया जा चुका था।
   मायानगरी के अंदर खोली गई छिटपुट दुकाने मिल्क पार्लर , कैंटीन, आइसक्रीम पार्लर खुल चुके थे। मायानगरी के उद्घाटन के अगले दिन से वहाँ एडमीशन शुरू होने थे।

    मुख्य द्वार से मंच तक गुलाबों से ढका कालीन बिछा था। मुख्य द्वार से ही अंदर प्रवेश करते ही राजा के दादा हुकुम की विराट प्रतिमा लगी थी। उस प्रतिमा के चारों ओर गोलाकार फव्वारा था जो रंगबिरंगी रोशनियों का पानी प्रतिमा के चरणों पर गिरता किसी म्यूज़िकल फाउंटेन का सा समा बांन्ध जाता था।
   परिसर विशाल था,दूर दूर तक शिक्षा का प्रताप नज़र आ रहा है। हर एक महाविद्यालय का अपना अलग परिसर था। हर एक परिसर में बाहर उसी से सम्बद्ध व्यक्ति की प्रतिमा स्थापित थी। महाविद्यालय के बाहर एक बड़े बोर्ड में सारा ले आउट बना कर लगाया गया था।
      हर एक संस्थान अपने आप में पूर्ण होते हुए मायानगरी का अभिन्न अंग बना हुआ था।
   लेकिन मायानगरी खुद में सम्पूर्ण थी…

  मंच पर सभी गणमान्य अतिथियों के आगमन के साथ ही समर ने कार्यक्रम को शुरू करने की घोषणा करने के लिए राजा अजातशत्रु को बुलाया और उनके घोषणा करने के साथ ही दादी साहेब को सहायिकाएं अपने साथ ले आयीं।
     महाविद्यालय परिसर में पंडित जी द्वारा पूजा करवाये जाने के बाद  नारियल फोड़ कर श्री गणेश किया गया… और दादी साहेब ने अपने हाथों से फ़ीता काट कर शुभारंभ कर दिया….

   निरमा ने आगे बढ़ कर दादी साहेब के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और मंच पर चली आयी…

   मायानगरी की शुभ शुरुवात हो चुकी थी।

*****

      ऐसा नही था कि आदित्य को खाना बनाना आता था , फिर भी किसी तरह उसने अपनी अक्ल लगाकर कुछ सब्ज़ियों के साथ चावलों को मिला कर पका लिया, और पुलाव तैयार हो गया…
   केसर बाहर बैठी कोई पुराना अखबार पढ़ रही थी। कुछ देर में भूख लगने पर वो अपना मिल्क शेक बनाने रसोई में आई तब आदित्य उन दोनों के लिए प्लेट्स में खाना परोस रहा था…

” ये क्या बना लिया और कब बनाया? “

” जब तुम अखबार में डूबी हुई थीं तब… वैसे अभी भी पैर ठीक नही हुआ है तो इतना भागदौड़ मत करो वरना परेशानी में पड़ जाओगी। ”

“क्या है ये ? वेजेटेबल राइस? “

” यस बाई सा, इसे पुलाव भी कह सकतें हैं। आइये खा कर देखिए ज़रा हमारे हाथों का कमाल।”

  दोनों बैठ ही रहे थे कि दरवाज़े पर फिर खटका हुआ। मुहँ बना कर केसर ने आदित्य की तरफ देखा…

” पक्का वही मुटल्लो आयी होंगी, कुछ लेकर। “

” एक तो तुम्हारे लिए कुछ न कुछ लेकर आतीं हैं उस पर तुम उन्हीं पर नाराज़ होती हो। हद है। मना कर दें क्या उन्हें ? यहाँ आने के लिए।

  इतनी देर में आदित्य ने दरवाज़ा खोल दिया था। मकान मालकिन ही थीं, उन्होंने बाहर ही से एक कटोरी आदित्य को पकड़ाई और चली गईं।
  आदित्य ने उन्हें धन्यवाद कह कर दरवाज़ा  बंद कर लिया….

  ” अरे इतनी जल्दी चली गयी वो चैटर बॉक्स? “

  आदित्य ने केसर की तरफ वो कटोरी बढ़ा दी। कटोरी में देसी आम का अचार था।
   एकबारगी आम के अचार की मनमोहक खुशबू से ही केसर की आंखें बंद हो गयी..

“पिकल ? “

“हां लेकिन ये तुम्हारे विदेशी पैक्ड पिकल नही हैं। टेस्ट कर के देखो, आज तक ऐसा स्वाद नही मिला होगा कहीं।”

आदित्य की बात पूरी होने से पहले ही केसर ने एक फांक उठा कर मुहँ में रख ली, और उस अनुपम स्वाद के अवर्णनीय सुख में पूरी तरह से डूब गई…

कुछ देर आंखे बंद किये उस स्वाद में डूबने उतरने के बाद जब केसर ने आंखें खोली तो आदित्य उसे देखता बैठा मुस्कुरा रहा था…

” ऐसे क्या देख रहे हो? “

” देख रहा हूँ तुम्हारी लाइफ से कितनी चीजें मिसिंग थी आज तक। अचार विचार कुछ भी तो नही चखा है आज तक तुमने। खैर ये बताओ कैसा लगा तुम्हे अचार? “

” बहुत बहुत टेस्टी है। कल ही आंटी को थैंक यू बोल कर आऊंगी। “

” वाह ये तो कमाल हो गया,, यानी एक अचार से मुट्ल्लो आंटी में बदल गईं। ”

  आदित्य हँसने लगा और अपनी प्लेट में अचार निकाल कर केसर खाने लगी कि तभी दरवाज़े पर एक बार फिर घंटी बजी…
   इस बार आदित्य को हाथ से बैठे रहने का इशारा कर केसर ही दरवाज़ा खोलने उठ गई….

   केसर ने जैसे ही दरवाज़ा खोला ,सामने से तीन चार आदमी उसे धक्का देते भीतर चले आये…
   आदित्य कुछ समझ पाता कि उन लोगो ने दोनो पर गन तान दी…
   आदित्य ने भी उतनी ही फुर्ती से अपने सामने रखी प्लेट उठा कर उन पर फेंकी और एक दूसरे पर उन लोगों को धकियाते हुए केसर का हाथ पकड़ कर सीढियां उतर कर भाग निकला।
   वो लोग भी उनके पीछे ही उतर गए….
कुछ देर तक वो लोग उनका पीछा करते रहे । पैरों में चोट होने से केसर को भागने में तकलीफ हो रही थी। वो लोग चूंकि गाड़ी में थे इसलिए आदित्य ने संकरी पतली सी गली भागने के लिए चुनी थी, इसलिए उन्हें कोई सवारी गाड़ी भी नही मिल पा रही थी।
  किसी तरह भागतें भागतें वो लोग रेलवे स्टेशन पहुंच ही गए….

   कोई ट्रेन उसी वक्त स्टेशन से छूट रही थी। आदित्य और केसर प्लेटफॉर्म पर पहुंचे की उन गुंडों पर इन लोगों की और गुंडों की इन पर नज़र पड़ गयी…
    उनमें से एक ने अपनी गन उठा कर उन लोगों की तरफ तानी ही थी कि चलती ट्रेन में भाग कर आदित्य चढ़ा और केसर को भी अंदर खींच लिया, लेकिन उसी वक्त उस गुंडे ने गोली चला दी। साइलेंसर लगी होने के कारण बिना आवाज़ के वो गोली केसर के कंधे की हड्डी पर जा लगी……

क्रमशः

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

“जीवनसाथी – 109” पर एक विचार

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