जीवनसाथी – 110





  जीवनसाथी – 110


कोई ट्रेन उसी वक्त स्टेशन से छूट रही थी। आदित्य और केसर प्लेटफॉर्म पर पहुंचे की उन गुंडों पर इन लोगों की और गुंडों की इन पर नज़र पड़ गयी…
    उनमें से एक ने अपनी गन उठा कर उन लोगों की तरफ तानी ही थी कि चलती ट्रेन में भाग कर आदित्य चढ़ा और केसर को भी अंदर खींच लिया, लेकिन उसी वक्त उस गुंडे ने गोली चला दी। साइलेंसर लगी होने के कारण बिना आवाज़ के वो गोली केसर के कंधे की हड्डी पर जा लगी……

    केसर कसमसा कर रह गई आदित्य ने तुरंत उसे संभाल लिया कंधे पर से खून की धार बह निकली और पीड़ा में तड़पती केसर ने अपने मुंह में चुन्नी ठूंस कर अपनी रुलाई रोकने की नाकाम सी कोशिश की लेकिन दर्द इतना भी कम नहीं था कि उसे आसानी से सह लिया जाए ।
   उस ट्रेन की एक अच्छी बात ये थी कि उस डिब्बे में उस वक्त बहुत कम लोग मौजूद थे। रात का वक्त होने से सवारियां और भी कम थी ।अनारक्षित डिब्बा था इसलिए अधिकतर सवारियां कामगार मजदूरों की थी…. उस पूरे डब्बे में मुश्किल से चार या पांच सवारी थी वह भी सारे मजदूर ही थे । जो सुबह से काम कर करके इतना थक चुके थे अब कि अपने गमछे से अपना चेहरा ढके खिड़कियों के सहारे टिक कर गहरी नींद सो चुके थे। ट्रेन चलने के साथ ही बाहर से मीठी हवा के झोंके आ रहे थे जो थके हारे लोगों को सुलाने के लिए काफी थे।  केसर को दरवाजे के पास ही नीचे बैठाकर आदित्य एक बार पूरे कूपे का चक्कर लगा आया। ज्यादातर लोग दूर-दूर ही बैठे थे और झपकी ले रहे थे। एक सुरक्षित जगह देखकर आदित्य ने केसर को उठाया और उस सीट पर ले गया केसर को नीचे की सीट पर सुलाने के बाद उसने अपनी जींस की जेब से एक छोटा सा पैना औजार निकाल लिया। ऊपर से देखने में वह नेल कटर जैसा लग रहा था लेकिन उसे खोलने पर अंदर से एक तीखी छुरी नजर आने लगी।
     अपनी जेब से ही रूमाल निकाल कर उसने उसे पानी से अच्छी तरह भिगो लिया और निचोड़ कर ले आया । केसर को उसने पेट के बल लिटा कर उसकी गोली लगी बाजू को देखा….. अब उसका गोली लगा कंधा आदित्य के सामने था। आदित्य ने केसर की चुन्नी का गोला सा बनाकर केसर के मुंह में रख दिया दोनों दांतों  के बीच चुन्नी को दबाए केसर चुपचाप पड़ी रही।
    आदित्य केसर के बालों में हाथ फेरने लगा और बहुत धीमे और प्यार भरे शब्दों में उसे समझाने लगा  ….

    “केसर बाईसा मेरी बात ध्यान से सुनना, अगर यह गोली आज के आज अभी नहीं निकाली गयी, तो उसका जहर पूरे शरीर में फैल जाएगा। मुझे नहीं पता यह ट्रेन कहां तक जाएगी , और कब रुकेगी ।    
   अस्पताल का इंतजार करने में कहीं देर ना हो जाए, मैं जानता हूं तुम्हारे भीतर भी राजपूती खून है। और तुम इस छोटे से दर्द को सह लोगी।गोली बहुत भीतर तक नहीं गई है ऊपर ही है। मुझे नजर आ रही है बस मेरे ऊपर विश्वास रखना। “

   धीमे धीमे बातें करते हुए आदित्य ने उस पैने औजार से कंधे पर जहां गोली लगी थी वहां आसपास जगह बनानी शुरू कर दी थी।  केसर को दर्द हो रहा था…. बहुत दर्द लेकिन शायद उसकी जिंदगी में जितने दर्द उसे मिले थे उससे यह दर्द थोड़ा कम ही था… वह चुपचाप अपनी चीख रोकने का प्रयास करती पड़ी रही। आदित्य ने एक दो बार उस घाव के आसपास कट बढ़ाने की कोशिश की और तीसरी बार में गोली की भीतरी सतह पर चाकू अटा कर उसे तेजी से ऊपर की ओर निकाल दिया।

एक झटके में गोली बाहर चली आई। उस गोली के निकलते ही खून का सैलाब सा बह निकला। आदित्य ने पानी से भीगे अपने रुमाल को छोटे से घाव में भर दिया। खून के कारण सफेद रुमाल रंग कर गुलाबी और फिर लाल हो गया…..
    
  केसर के ही दुपट्टे के दोनों छोर मिलाकर आदित्य ने उसके कंधे पर जोर से बांध दिया । इस सबके अलावा उन दोनों के पास कोई उपाय भी नहीं बचा था। दर्द के अतिरेक से केसर को बेहोशी छाने लगी। दर्द सहते सहते धीरे-धीरे उसने अपनी आंखें मूंद ली लगभग आधी रात के वक्त किसी स्टेशन पर गाड़ी धीमी हुई और आदित्य बेहोश केसर को उठाए स्टेशन पर उतर गया । सामान तो दोनों के पास भी कुछ नहीं था बस आदित्य की जेब में कुछ पैसे पड़े थे और उसके सारे क्रेडिट और डेबिट कार्ड पड़े थे। स्टेशन पर उतर कर धीरे-धीरे उसे साथ लिए आदित्य बाहर निकल गया। लगभग आधी रात का वक्त था पूरा स्टेशन सुनसान विरान पड़ा हुआ था। मुख्य द्वार से बाहर एक रिक्शावाला अपने रिक्शा में बैठा सो रहा था।
अपने चेहरे को अपने ही गमछे से ढके वह गहरी नींद में सोया पड़ा था कि आदित्य ने धीमे से उसे हाथ देकर जगा दिया।
    
” आस-पास कोई अस्पताल है तो ले चलो भैया।

  नींद से जागे रिक्शा वाले की नजर साथ खड़ी केसर पर नहीं पड़ी। उसने उनींदी सी नजर आदित्य पर डाली और बोल पड़ा

” ₹200 लगेगा!”

” हां जो लगेगा ले लेना फिलहाल इस वक्त अस्पताल ले चलो।”

रिक्शा वाले ने उसे बैठने का इशारा किया और पैडल मारने को हुआ कि तभी उसकी नजर केसर पर भी पड़ गई…

” दो सवारी है 300 लगेगा।”

“हां जो भी लगे ले लेना … लेकिन यहां का जो सबसे बड़ा अस्पताल है वहां ले चलो।”

“बड़ा छोटा सब एक ही है बाबूजी! यहां इस शहर में सिर्फ एकमात्र सरकारी अस्पताल है.. वही ले चलता हूं भगवान की कृपा हुई तो डॉक्टर साहब मिल जाएंगे वरना आपकी किस्मत।”


“ठीक है भाई जहां जो है ले चलो!”

रिक्शेवाले ने उन दोनों को रिक्शा में बैठा कर रिक्शा आगे बढ़ा दिया।  धीरे धीरे चलता रिक्शा कच्ची पक्की सी सड़क से होते हुए एक छोटे से सरकारी अस्पताल के सामने जाकर रुक गया। रात के 2:00 बज रहे थे अस्पताल का दरवाजा बंद था रिक्शा वाले ने उन दोनों को उतारा और जाने को हुआ कि, जाने कुछ सोचकर रुक गया और अस्पताल के दरवाजे पर जाकर उसने दरवाज़े पर लगी सांकल खटखटा दी…
  उसके खटखटाने के कुछ देर बाद अंदर से आवाज आई

“इतनी रात गए कौन है?”

” मैं हूं डॉक्टर साहब बिहारी अक्सर आपसे दवा लेकर जाता हूं!”

“इतनी रात में क्या हुआ बिहारी? क्या जरूरत पड़ गई?

आवाज अंदर से ही आ रही थी बिहारी ने फौरन उत्तर दे दिया …

“डॉक्टर साहब कोई मजलूम बाहर से आए हैं। स्टेशन से उन्हें लिए आ रहा हूं । शायद ट्रेन में पत्नी की तबीयत बिगड़ गई आप जरा देख लीजिए एक बार…

अबकी बार दरवाजा खुल गया नाइट सूट पर ओवरकोट डाले एक मध्यम उम्र के डॉक्टर साहब बाहर चले आए ।रिक्शेवाले को देखकर उन्होंने मरीज को लेकर अंदर आने का इशारा कर दिया । उनका इशारा पाते ही आदित्य केसर को लिए अंदर चला आया ।
    यह छोटी सी सरकारी डिस्पेंसरी थी, जिसमें बहुत ज्यादा सुविधाएं नहीं थी। रेजिडेंशियल डिस्पेंसरी होने से ओपीडी के पिछले हिस्से में जो दो कमरे थे उन्हीं में डॉक्टर ने अपना आवास भी बना रखा था। रात के समय अक्सर मरीज नहीं आया करते थे, इसलिए सिस्टर और बाकी स्टाफ की डॉक्टर साहब छुट्टी कर दिया करते थे। डॉक्टर का खुद का परिवार शहर में बसा हुआ था। वह अकेले अपनी सरकारी डिस्पेंसरी में पड़े रोगियों की सेवा में अपना वक्त बिताया कर रहे थे।

          केसर को मरीजों की जांच वाली टेबल पर लेटाने के बाद वह आदित्य की तरफ घूम गए …

  “हुआ क्या? मतलब क्या तकलीफ है इन्हें?”

    उनके सवाल पर आदित्य ने धीरे से रिक्शा वाले की तरफ देखा और डॉक्टर के पास चला आया । उनके कानों में फुसफुसाकर धीरे से उन्हें बता दिया..

  ” कंधे पर गोली लगी है ।”

डॉक्टर के हाथ से स्टेथोस्कोप छूटते छूटते बचा , उन्होंने रिक्शा वाले को देखा और रिक्शा वाले ने उन्हें और दोनों  एक साथ आदित्य को देखने लगे।

” गोली कैसे लगी? आप लोग हैं कौन? ये तो मेडिकोलीगल है फिर?”

डॉक्टर की बातें सुन आदित्य समझ गया था सब कुछ सच बताना उन दोनों के लिए खतरनाक होगा, लेकिन कुछ तो बताना ही होगा।  आदित्य आगे कहने लगा

“मैं आपको सब कुछ सच-सच बता दूंगा डॉक्टर साहब…. फिलहाल उनकी जान बचाने पर फोकस कीजिए।”

   “पर यह पुलिस का मामला है । इन्हें गोली लगी है, मुझे पुलिस को इनफॉर्म करना पड़ेगा। और इस कस्बे में कोई पुलिस थाना नहीं है। पुलिस को इनफॉर्म करके बुलाने में सुबह हो जाएगी।”

” जी डॉक्टर साहब आप घबराइए मत। हम दोनों खुद पुलिस के अधिकारी हैं। यह जो आपके सामने लेटी हैं यह खुद एक आईपीएस ऑफिसर हैं। हम एक केस सॉल्व करके लौट रहे थे, लेकिन हमने जो सबूत जमा कर रखे थे उन्हें हमसे छिनने के लिए ही हम पर गोलियां चलाई गई। और यह मैडम गोलियों का शिकार हो गई। आप चाहे तो मैं मेरे सबोर्डिनेट से आपकी बात करवा सकता हूं। लेकिन फिलहाल मेरे पास मेरे परिचय का कोई सबूत नहीं है। लेकिन यकीन मानिए आप हमारी मदद करके किसी भी तरीके की परेशानी में नहीं फसेंगे।”

आदित्य का लंबा चौड़ा डील डॉल देखकर उसकी बात पर यकीन नहीं कर पाने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। वह तो पैदाइशी पुलिस वाला दिख ही रहा था।

    केसर की भी लंबाई चौड़ाई और उसके चेहरे की मजबूती देखकर आसानी से आदित्य की बात पर यकीन किया जा सकता था, कि केसर कोई आईपीएस अधिकारी है। आदित्य ने सोच रखा था कि अगर डॉक्टर और भी ज्यादा सबूत मांगेंगे तो फिर समर के फोन पर कॉल करके वह उससे डॉक्टर की बात करवा देगा क्योंकि हाल फिलहाल और तो किसी का फोन नंबर उसे याद नहीं था। समर और अजातशत्रु के अलावा किसी के फोन नंबर उसे याद नहीं थे। अपनी इस परेशानी के लिए राजा  अजातशत्रु को परेशान करना उसे सही नहीं लगा। वह समर को फोन करने के बारे में आगे सोचता इसके पहले ही डॉक्टर ने केसर के कंधे पर बंधा दुपट्टा खोल दिया उसने आदित्य और रिक्शे वाले को बाहर जाने को कहा और केसर की चिकित्सा में लग गया।

गोली तो आदित्य ने पहले ही निकाल दी थी उस घाव की अच्छे से ड्रेसिंग करके टिटनेस का और बाकी पेन किलर आदि का इंजेक्शन देने के बाद डॉक्टर ने केसर को नींद की दवा देकर सुलाया और बाहर चला आया।

   आदित्य के सामने दवाइयों का पर्चा रखकर डॉक्टर अपनी कुर्सी में बैठ गया….

  “यहां से कहां जाना है अब आप लोगों को? “

आदित्य को तो यह भी नहीं पता था कि यह जगह कौन सी थी डॉक्टर को कुछ जवाब तो देना जरूरी था आदित्य ने दिल्ली कह दिया डॉक्टर कुछ देर उसका चेहरा देखता रहा फिर सोच में पड़ गया।

  ” आप दोनों की पोस्टिंग दिल्ली है तो आप वहां से इतनी दूर मध्य प्रदेश के मुरैना में क्या कर रहे हैं?”

” जी आपसे बताया ना हम यहां एक केस की तफ्तीश करने आए थे बस सबूत समेटकर निकलने ही वाले थे, कि उन लोगों को हम पर शक हो गया… आप तो जानते ही हैं चोर और पुलिस के बीच छत्तीस का आंकड़ा होता है जब जिसे मौका मिल जाए वह दूसरे पर गोली चला ही देता है।
कभी हम अपने दुश्मनों को ढेर कर जाते हैं, तो कभी वह हम पर भारी पड़ जाते हैं। हमारे साथ यह दिक्कत हुई कि हम भेस बदलकर उनके अड्डे पर गए थे, जिसके कारण हमारे पास ना तो इस वक्त हमारी यूनिफार्म है और ना ही सर्विस रिवाल्वर। यहाँ तक की हमारा परिचय पत्र भी हमने साथ नही लिया था। बल्कि सब कुछ हमने सुरक्षित होटल में छोड़ रखा था।”

“जी मैं समझ सकता हूं आपकी बात लेकिन सर्विस रिवाल्वर भी छोड़ दी। बिना रिवाल्वर के ही दुश्मन के अड्डे पर जाना कहां की बुद्धिमानी है?

“आप सही कह रहे हैं डॉक्टर साहब! लेकिन बहुत बार ऐसी मजबूरी का सामना हम लोगों को करना ही पड़ता है फिर भी कुछ ना कुछ औजार तो हम अपने पास रखते ही हैं । “

        कहकर आदित्य ने अपनी छिपी हुई कटारी निकालकर डॉक्टर के सामने रख दी…
  अपनी रॉयल गोल्डन ईगल गन उसने बड़ी चतुराई से ही छिपा रखी थी। वैसे दिखा तो सकता था लेकिन पुलिस की सर्विस  रिवॉल्वर और उसकी गन का अंतर बच्चा भी आसानी से पकड़ सकता था।
   और उस गन के सामने आते ही अपनी पहचान छिपाना बहुत मुश्किल हो जाता।

” यह देखिए …इसी की मदद से कुछ समय पहले इनकी कंधे पर लगी गोली निकाल चुका हूं।”

    डॉक्टर ने एक नज़र कटार पर डाली और हां में सर हिला कर चुपचाप बैठ गया

   “आप कुछ लेना चाहेंगे चाय या फिर कॉफी?”

आदित्य को चाय की तलब तो लगी थी लेकिन उस डॉक्टर पर पूरी तरह विश्वास भी नहीं कर पा रहा था। मुरैना शहर से लगा यह कोई छोटा सा कस्बा था जो मुरैना जिले के अंतर्गत आता था। अब तक वही एक किनारे जमीन पर बैठे रिक्शा वाले की भी नींद उड़ चुकी थी वह आदित्य से बुरी तरह प्रभावित नजर आ रहा था ।
   अब वह आदित्य के सामने हाथ जोड़े खड़ा हो गया…..

   ” हुजूर बाहर गुमटी से चाय लेता आऊं?”

आदित्य ने डॉक्टर की तरफ देखा और फिर रिक्शा वाले की तरफ घूम के हां में सर हिला दिया।
रिक्शावाला तुरंत मफलर से खुद को ढंकता बाहर निकल गया ।
डॉक्टर की तरफ घूम कर आदित्य ने एक बार फिर देखा और अपनी बात कहने लगा…

  ”  डॉक्टर साहब मैं जानता हूं मेरी बात पर विश्वास करना मुश्किल है, आप चाहे तो अब भी मैं किसी से भी आपकी बात करवा सकता हूं ।अगर आप चाहे तो मैं यही विजय राघव गढ़ के कलेक्टर शेखर जी,  शेखर मिश्रा जी से भी आपकी बात करवा सकता हूं।”

“आप शेखर मिश्रा को कैसे जानते हैं?

  डॉक्टर पढ़ा लिखा और जानकार आदमी था वह अपने प्रदेश के जिला अधिकारियों के बारे में जानता था उसकी यह नब्ज़ पकड़ में आते ही आदित्य के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान चली आई…

” जी शेखर मिश्रा ही क्या मैं तो बांसुरी अजातशत्रु सिंह जी को भी जानता हूं। फिलहाल दून में एडीएम के पद पर काम कर रही हैं। उन्हीं के साथ लीना जी भी हैं जो आईपीएस हैं। जी उनकी पहली पोस्टिंग मध्यप्रदेश में ही कही हुई थी।”

  “लीना मैडम को भी आप जानते हैं… चंबल में बहुत थोड़े वक्त के लिए पोस्टिंग थी उनकी।
एक बार उनकी भी बांह में गोली छूकर निकल गई थी उस वक्त यही से गुजर रही थी वो।  हमारे पास यही आयीं रहीं वो मरहम पट्टी करवाने।”

“अरे क्या बात कर रहें है डॉक्टर साहब! लीना मैडम आपके पास आई थीं?  हम सब ने एक साथ ही ट्रेनिंग कंप्लीट की है… लीना मैडम और यह जो अंदर लेटी हुई है ना  केसर मैडम इन दोनों ने साथ में आईपीएस की ट्रेनिंग पूरी की है।”

  अधिकारियों के नाम बुलाए जाने से अब डॉक्टर के चेहरे पर थोड़ा-थोड़ा भरोसा आदित्य को नजर आने लग गया था। आदित्य ने मन ही मन बांसुरी का शुक्रिया अदा किया” थैंक यू भाभी आज आप के और आपके दोस्तों के कारण जान जाते-जाते बची है।”

   सुबह तक में केसर की हालत में काफी सुधार आ गया था कुछ जरूरी दवाइयां अपने पास से ही देकर डॉक्टर ने आदित्य और केसर को विदा कर दिया! केसर को साथ लिए आदित्य उसी रिक्शे में बैठ कर एक बार फिर निकल गया।

  उस कस्बे में आस पास रुकने के लिए कोई लॉज या धर्मशाला नहीं थी।
   रिक्शेवाले से कहकर आदित्य ने उसे शहर जाने वाली किसी बस में बैठाने के लिए कह दिया ।छोटे से बस स्टैंड पर आदित्य और केसर को उतारकर वो रिक्शावाला वहां से चला गया । केसर को अच्छी तरह से शॉल में लपेटकर एक चाय की गुमटी में बैठाकर आदित्य वहां से निकल गया।

   कस्बा बहुत ज्यादा बड़ा तो नहीं था लेकिन घना बसा हुआ था। वहां जाकर 1-2 घर देखने के बाद ही आदित्य को अपने रहने लायक ठिकाना मिल गया.. मकान मालिक से चुपके से बात कर उसने तुरंत ही 2 महीने का एडवांस पेमेंट किया और केसर को लेने निकल गया दोपहर के वक्त जब पूरी बस्ती अपने अपने घरों में दुबकी पड़ी थी, चुपके से केसर को लिए सीढ़ियां चढ़ पर अपने कमरे में चला गया । इस बार उसने सोच लिया था कि केसर उसके साथ रहती है ये बात आसपास किसी को पता नहीं चलने देगा, क्योंकि जाहिर था ठाकुर के गुंडे उन दोनों को ढूंढ रहे थे इसलिए वह जहां भी पूछताछ करते वहां एक आदमी और एक औरत के रहने का ठिकाना ही पता करते । और अगर  केसर के साथ रहने के बारे में किसी को मालूम ही ना चले तो आदित्य के बारे में की हुई पूछताछ से भी गुंडे उन तक नहीं पहुंच पाएंगे। उसे बस अब केसर के ठीक होने का ही इंतजार था। उसे उम्मीद थी 10 से 15 दिनों में केसर ठीक हो जाएगी, लेकिन उसकी उम्मीद यहां गलत साबित हुई 2 दिन पूरी तरह से बेहोश रहने के बाद आखिर केसर को होश आ गया लेकिन होश में आने के बावजूद वह अपनी जगह से उठने और बैठने में लाचार महसूस कर रही थी। गोली उसकी हड्डी में जाकर लगी थी और शायद इसीलिए उसकी रीढ़ की हड्डी पर भी कुछ असर हो गया था। उसे सीधे बैठने उठने चलने फिरने सब में तकलीफ हो गई थी।
    आदित्य अकेला ही घर से बाहर जाता। जरूरत भर का सामान लेकर वापस आ जाता। उसने मकान मालकिन के बार बार पूछने पर भी काम वाली बाई के नाम पर मनाही कर दी थी।
    दो कमरे और एक रसोई का मकान था।  वह इन कमरों को खुद ही साफ कर लिया करता। यहां शिफ्ट होने के बाद घर की साफ सफाई और जरूरत भर के बर्तन वह खरीद लाया था। दूध वाले को भी ऊपर चढ़कर आने की उसने मनाही कर रखी थी। दूध के समय वह खुद नीचे बर्तन लिए चला जाता।

कुछ एक बार मकान मालकिन ने उसकी तरफ दोस्ताना हाथ बढ़ाने के लिए उसके दरवाजे पर ठकठक भी की लेकिन आदित्य ने कुछ ना कुछ बहाना बनाकर उनके बढ़े हुए दोस्ती के हाथ को हमेशा ही झटक दिया।
    वह वहां उन सभी से केसर को छुपाए रखना चाहता था । कपड़े भी अक्सर रात में धोया करता और सुखा दिया करता। सुबह बाकी लोगों के जागने से पहले ही वह कपड़े निकाल कर अंदर ले आता।
     खाना बनाना उसे नहीं आता था, लेकिन जो जितना आता वैसा ही कुछ भी बनाकर वह अपना और केसर का पेट भर लेता।

उसे लगा था पंद्रह दिन में केसर की हालत में इतना सुधार तो हो ही जाएगा कि वह समर को फोन कर अपने बारे में सूचना दे दे लेकिन पंद्रह दिन बस पलक झपकते बीत गए।
    केसर बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी। केसर की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी ।उसकी कमजोरी बढ़ती जा रही थी। आदित्य को समझ नहीं आ रहा था कि उसे क्या करना चाहिए? क्योंकि इस हालत में केसर को यहां से  लेकर निकलना उसकी जिंदगी से खिलवाड़ ही था… आखिर एक दिन वह केसर को वहीं छोड़ कर शहर चला गया। शहर में एक अच्छे डॉक्टर से मिलकर उसने उन्हें केसर से जुड़ी परेशानियों से अवगत कराया और डॉक्टर की सलाह पर जरूरी दवाइयां और जरूरी मल्टीविटामिन साथ लिए चला आया। डॉक्टर के अनुसार केसर को फिजियोथैरेपी की जरूरत थी लेकिन आदित्य किसी भी तरीके से फिजियोथैरेपिस्ट को अपने कमरे पर नहीं बुला सकता था ।
      आखिर उसने खुद ही कुछ आयुर्वेदिक तेलों की सहायता से केसर की मालिश शुरू कर दी ।
     उसकी रीढ़ की हड्डी पर की जाने वाली मालिश का धीरे-धीरे असर दिखने लगा और हफ्ते भर में केसर बिना किसी सहारे के धीरे से उठकर बैठने लगी….. आदित्य की सेवाओं का असर था कि केसर अब धीरे से अपने दोनों पैर जमीन पर रख बिना सहारे के धीरे-धीरे ही सही चलने लगी थी।
   हालांकि अपनी इस कोशिश में वह दो तीन बार अपना संतुलन बिगाड़ कर गिर चुकी थी, कई बार वह चलते हुए रो पड़ती लेकिन अक्सर आदित्य कुछ ना कुछ बहाना बनाकर उसे चलाने के लिए खड़ा कर ही देता।
   सुबह शाम उसे सहारा देकर वो अब रोज़ ही उसे चलाने लगा था।
   लेकिन अब कभी कभी वो उसे चलाने के लिए खड़ा करके कोई बहाना लगा कर अंदर भाग जाता और अंदर से छुप छुप कर वो केसर को देखा करता ।

  शुरू शुरू में आदित्य जब ऐसा करता तो केसर वापस मुड़कर अपने बिस्तर पर ही जाकर बैठ जाना चाहती, उस वक्त उसे वो दो कदम का फासला भी बहुत ज्यादा लगता। उतना सा चलना भी उसके लिए  भारी पड़ जाता, लेकिन धीरे-धीरे शायद केसर को भी समझ आने लग गया था कि आदित्य उसके साथ ऐसा क्यों कर रहा है ?और अब केसर भी अपनी सारी ताकत समेटकर इस जिद में आ गई थी कि अब उसे अपने पैरों पर चलना ही है।

उनकी मकान मालकिन और उनके आसपास की सखियों के लिए आदित्य अजूबा ही था। एक ऐसा लड़का जो रहता तो अकेले था लेकिन हर सामान हमेशा दो की संख्या में खरीदा करता था। सब्जियां भी हर रोज ताजी लिया करता अंडे भी रोज  लिया करता । दूध  दो लीटर लेता था। मकान मालकिन की समझ से परे था कि अकेला छह फुटिया लड़का कैसे रोज़ छह अंडे और 2 लीटर दूध पूरा का पूरा गप कर जाता है।

समय बीतता जा रहा था और उन्हें वहां रहते कुछ महीने गुजर चुके थे। अब तक आदित्य ने केसर को बाहरी दुनिया से छुपा कर ही रखा हुआ था।  केसर को भी उसने समझा दिया था कि वह खिड़की से बाहर ना झांके। कहीं किसी ने देख लिया तो मुश्किल हो सकती है। केसर अब आदित्य की हर बात चुपचाप मानने लग गई थी।

   आदित्य बाहर से कुछ सामान लेकर लौटा ही था कि दूध वाले का समय हो गया। वह सीढ़ीयां उतरता नीचे पहुंचा ही था कि आजू-बाजू की सभी महिलाओं को अपनी सीढ़ियों के पास ही मकान मालकिन से गप्पे मारते देख लिया उसने दूध लिया और वापस ऊपर मुड़ गया।

   रसोई में खड़ा वो चाय चढ़ा ही रहा था कि दरवाजे पर किसी ने ठकठक की। उसे समझ आ गया था कि इतने महीनों से जिन औरतों को वह मूर्ख बनाता आ रहा था आज उन सभी ने गोष्ठी करके उसका कच्चा चिट्ठा जानने  का मन बना ही लिया था।

उसने दरवाज़ा धीमे से खोल ही दिया….

… सामने समर खड़ा था…

******

     बांसुरी की महल वापसी के साथ ही महल में उसकी गोद भराई की तैयारियां शुरू हो गई थी।
शुभ तिथि मुहूर्त निकाल कर बाँसुरी की दोनो जेठानियाँ तैयारियों में लग गयी थीं।
    गोद भराई वाले दिन सुबह राजा को साथ लिए रूपा और जया कुल देवी के मंदिर में पूजा करवाने चली गईं थीं।
  गर्भावस्था में आठवें महीने के बाद मंदिर प्रवेश नहीं करने के नियम के कारण बाँसुरी नही जा पायी थी।  रेखा बाँसुरी के कमरे में ही उसके पास रुक गयी थी….   उसका बेटा वहीं पास ही खेल रहा था…..

” क्या हुआ रेखा आप कुछ परेशान हो?”

वहीं पास ही खेलते अपने बेटे को देखती बैठी रेखा ने आंखें उठा कर बाँसुरी को देखा और उसकी गीली आंखें देख बाँसुरी घबरा गयी..

” क्या हुआ ? आप तो रो रही हैं!”

  ” कितनी अजीब किस्मत है हमारी बाँसुरी। सोचो तुम्हारी और हमारी शादी एक ही दिन एक ही मुहूर्त में हुई उसके बावजूद कितना अंतर है हमारे वैवाहिक जीवन में। “

  बाँसुरी भी विराज के स्वभाव से परिचित थी। वो चुप ही बैठी रही…

” हम जानती हैं राजा साहब और विराज सा के स्वभाव में बहुत फर्क है !लेकिन फिर भी..
       सब कहते हैं अग्नि के फेरे जिंदगी बदल देतें हैं, फिर उन्हीं अग्नि के पवित्र फेरों में घूमने के बाद तुम्हारी जिंदगी इतनी संवरी हुई , और हमारी जिंदगी इतनी बिखरी हुई क्यों है ? बांसुरी यह मत सोचना कि हमे तुमसे जलन हो रही है.. हमने तुम्हारी तपस्या भी देखी है, समझी है । तुम्हारे और हमारे स्वभाव में भी अंतर है यह भी जानते हैं,लेकिन आखिर किस बात की सजा हमें हमारी  किस्मत दे रही है?
   बचपन से जिस घर को हमने अपना माना जिस राजपूताने की शान में अभिमान से भरे घूमा करते थे वह एक झटके में ही हमसे अलग हो गया।
   ना वह माता-पिता हमारे रहे और ना वो राजपूताना। उसके जाने के साथ ही हमारा अहंकार भी चला गया।
ब्याह हुआ और राज महल में चले आए कुछ समय के लिए रानी की पदवी भी मिली , लेकिन वह भी श्रापित।
   ऑंसू में लिपटी हुई कितनी रातें हमने सिसक सिसक कर अकेले अपने बिस्तर पर गुजार दी यह सोचते हुए कि जाने हमारे राजा जी कहां भटक रहे होंगे। हमारी तकलीफ कौन समझेगा?
   किसी समय हमारी भी यही चाहत थी कि हम रानी बने लेकिन शादी के बाद हमें समझ में आ गया कि हर एक पत्नी यही चाहती है कि उसका पति भले ही राजा ना हो लेकिन दिल से उसका पति ही बना रहे। काश विराज सा हमारी बात को समझ पाते। काश कभी वह हमें समझ पाते ।
    काश उनके अंदर का पुरुष हमारे अंदर की स्त्री को देख पाता लेकिन उनकी आंखों पर जाने किस बात की पट्टी बंधी है।
    विराज सा आज भी उसी झूठे अभिमान में डूबे बैठे हैं जिसमें कभी हम डूबे बैठे थे। लेकिन आज देखो जिंदगी की कड़वी सच्चाईयों ने हमें कहां लाकर पटक दिया । आज हमारे पास ना मायका ही बचा ना ससुराल। रानी मां थी तब तक एक आस थी कि हम भी इस महल का एक हिस्सा है, हमें भी यहां सम्मान मिलेगा लेकिन अब उनके जाने के बाद वह आस भी चली गई।”

” प्लीज ऐसा मत बोलिए रेखा। और किसी पर आप भरोसा करें या ना करें लेकिन हमारे साहब पर आप आंख मूंद कर भरोसा कर सकती हैं। जब तक वह गद्दी पर हैं आपको इस महल में आपका पूरा सम्मान मिलेगा। आप ऐसा क्यों सोचती हैं कि आज आप रानी नहीं है तो आपका सम्मान चला गया। अरे आप इस महल की एक सम्माननीय सदस्या तो हैं ही, इस महल के राजकुमार विराज सा की धर्मपत्नी भी हैं। आपने अपने आप को इतना कम क्यों आंक लिया। और सबसे बड़ी बात एक औरत की पहचान वह खुद होती है ।
    उसके अभिभावक उसका पति या उसका घर नहीं।

    आपकी भी अपनी खुद एक पहचान है, मैं तो यही कहूंगी कि आप अपने नाम से पहचानी जाये। इससे बढ़कर  कोई और बात नहीं।
    
     मुझे मेरे साहब से बहुत प्यार है, मैं अपने नाम के साथ हमेशा उनका नाम जोड़ कर रखना चाहती हूं। लेकिन अपना नाम खोना नहीं चाहती। मुझे मेरे नाम से भी उतना ही प्यार है। मैं सिर्फ रानी अजातशत्रु सिंह ही नहीं कहलाना चाहती मैं बांसुरी अजातशत्रु सिंह के नाम से पहचानी जाना चाहती हूं। और आपसे भी यही कहती हूं कि आप अपने आप को पहचानिए। आपके अंदर भी कोई तो बात है आप अपने उस हुनर को अपनी इस काबिलियत को पहचान कर अपने आप को खड़ा करने के लिए क्यों नहीं सोचती भला?
     आप क्यों हमेशा विराज सा का चेहरा देखती हैं, कि वह आप को सहारा दे।
      सिर्फ शादी हो जाने से ही यह तो नहीं हो जाता की पत्नी पति से अलग कुछ कर ही नहीं सकती? आखिर जिस ईश्वर ने आपके पति को यहां जन्म दिया उसी ईश्वर ने आपको भी तो गढ़ा है।
    तो आप अपने अस्तित्व को कैसे सिर्फ अपने पति के अस्तित्व में घोलकर खुद को भूल जाने पर आमादा है।
  अपने आप को पहचानिए रेखा, अपने आत्मविश्वास को जोड़िए। इस तरह आंसू बहाने से और किस्मत पर रोने से कुछ नहीं मिलने वाला। अपने हक के लिए आपको खुद आवाज उठानी होगी और मैं तो ये भी कहूंगी कि अगर आप विराज सा के साथ खुश नहीं है तो आप उनसे अलग हो सकती हैं।”

बांसुरी की कही अंतिम बातें सुन रेखा चौन्क कर उसकी तरफ देखते हुए मन ही मन सोचने पर  मजबूर हो गई …..क्या विराट से अलग होना उसके लिए इतना आसान होगा?
     वह अपनी सोच में गुम थी की सहायिकाये दोनों को बुलाने चली आयीं। रूपा और जया ने सारी तैयारियां कर रखीं थी।
बांसुरी को कार्यक्रम के लिए तैयार होने छोड़कर रेखा अपने कमरे में चली गई ।कुछ देर बाद ही रनीवास का दीवान खाना महल की औरतों और सेविकाओं से भरा हुआ था।
     रानी माँ को गुज़रे साल नही पूरा था इसी से कार्यक्रम सादा और पूरी तरह निजी रखा गया था….
   बाँसुरी ने जैसे ही अपने कमरे से बाहर कदम रखा उसकी आंखें आश्चर्य से चौड़ी हो गईं…..
    उसके सामने पूरे रास्ते गुलाबों की पंखडियाँ बिखरी पड़ी थी…
   एक तरफ फूलों से सजी पालकी तैयार रखी थी। पालकी के कहारों की जगह पर प्रेम, विराट और बाँसुरी के ताई जी के दोनों बेटों के साथ ही रेखा भी खड़ी थी।
  बाँसुरी आश्चर्य से भरी उन सभी को देखती खड़ी ही रह गयी….

  उसने सोचा ही नही था कि उसकी गोद भराई की रस्म इतनी भव्य होने जा रही है….
   उसे लगा था सिर्फ राजपरिवार की औरतें और कुछ खास आमंत्रित अतिथियों के साथ ही कार्यक्रम कर लिया जायेगा इसलिये उसने अपने मायके को बुलाने की इच्छा भी ज़ाहिर नही की थी…..
     लेकिन राजा अजातशत्रु तो राजा अजातशत्रु हैं, बाँसुरी के मन की बात कैसे नही समझते…..
   अपने मायके के लोगों को देखते ही बाँसुरी के चेहरे पर चमक चली आयी……
   

क्रमशः

दिल से….

   अभी पिछले कई भाग थोड़ा सिरियस मोड में चले गए थे, इसलिए अगले भाग में एक छोटे हिस्से में बाँसुरी की गोद भराई की रस्म होगी, जिसमें हम सब थोड़े मज़े कर पाएंगे। इसके साथ ही बाकी की कहानी आगे बढ़ेगी।

  राम जी से प्रार्थना है कि मेरी कहानी को बीरबल की खिचड़ी बनने से  बचा लो…
    पिछले पांच भाग से मैं ये सोच कर बैठी थी कि कहानी को 110वे भाग में समाप्त कर दूँगी लेकिन राजा अजातशत्रु जी तो अपनी कहानी समाप्त ही नही करने दे रहे।
  पर ऐसे कैसे चलेगा राजा जी? कही तो विराम लेना पड़ेगा।

  अभी फिलहाल सोच रहीं हूँ अगले चार या पांच भाग में कहानी को समेट लूँ,बाकी आगे जैसी राम जी की इच्छा।

     नई कहानी के बारे में भी एक प्लॉट सोच रखा है उसे जल्दी ही एक छोटी सी पाती (पत्र) के रूप में आपसे रूबरू करवाउंगी।

  तब तक सोचते रहिये की वैक्सीन लगवाना ज़रूरी है कि नही….
   … इसी बात पर एक खुरापाती किस्सा मेरी डिस्पेंसरी से ….

   एक महिला आयीं उन्होंने अपनी तकलीफ बताई और मैंने दवा लिख दी।
  फिर उन्होंने मुझसे सवाल किया…

” मैडम ये वैक्सीन लगवाने से हमारे पड़ोस की एक औरत खत्म हो गयी? तो कैसे वैक्सीन लगवाएं मैडम ?

   इसका जवाब देते वक्त मेरा खुरापाती दिमाग शैतानी पर उतर आया…

  क्या आप बता सकते हैं कि मैंने क्या जवाब दिया ?

  जवाब देते वक्त याद रखियेगा , संस्कारी बहुत हूँ मैं…

aparna …..




 
  







  

 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

29 विचार “जीवनसाथी – 110” पर

  1. क्या कहूँ,निःशब्द हूँ, आप ये जीवनसाथी अंत करने की सूचना बार बार मत दिया करो,आप ये कर नही पाओगी,इतने पाठकों का प्यार इस से जुड़ा है कि हम लोग इस होने नही देंगे115 एपिसोड कोई ज्यादा नही होते, आप कहो तो हम पाठक एक मोर्चा लेकर धरना दे दें या सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर दें पर हमारे साहेब और हुकुम को हमसे दूर नही करने देंगे डॉ साहिबा, अच्छे से समझ लो आप

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