जीवनसाथी -81



  जीवनसाथी




     एकेडमी में चलते रंगारंग कार्यक्रम के बीच चुपके से बाँसुरी उठ कर अपने कमरे में चली आयी।
     कमरे में पहुंचते ही उसने अपने साहेब को कॉल लगा लिया…. उधर से फ़ोन उठते ही बाँसुरी चहक उठी….

  ” मुझे ही याद कर रहे थे ना, और देखो मैंने कॉल भी कर लिया, क्या कर रहे थे अभी? खाना खाया?”

  ” अरे बस बस सारे सवाल एक साथ पूछ लोगी क्या? जवाब के लिए भी तो रुकिए हुकुम!”

  ” हम्म ! अब तक दूर थी तो रह ले रही थी अब आपने एक बार मिल कर मेरा यहाँ अकेले जीना दुश्वार कर दिया। कब तक वापस आओगे?”

  ” जब पुकार लो!”

  ” झूठे!! मैं तो अभी पुकार रहीं हूँ आ जाओ।”

  ” नींद नही आ रही मेरे बिना?”

  ” बिल्कुल नही … ”

  ” तो अब तक कैसे सोती थीं?”

  ” सोती ही कहाँ थी? जागती रहती थी पढ़ती रहती थी।
  जब तक जागती आंखें थक कर  खुद न बंद हो जाया करती थीं, तब तक कहाँ सो पाती थी। अच्छा सुनो…

   बाँसुरी की बात के बीच ही राजा के कमरे के बाहर से किसी ने दरवाजा थपथपाया..

  ” एक मिनट बाँसुरी ! दरवाज़े पर कोई है…

   फ़ोन हाथ मे लिए ही राजा दरवाज़े तक चला आया। दरवाज़ा खोलते ही सामने केसर खड़ी थी… उसे देखते ही राजा ने फ़ोन में सिर्फ ” बाद में बात करता हूँ” कह कर फोन रख दिया।
   
  ” किसी ज़रूरी कॉल में थे क्या आप हुकुम?”

   राजा बाँसुरी से जुड़ी कोई बात केसर से नही कहना चाहता था इसी से उसने फोन भी रख दिया था

  ” नही कुछ खास नही! आप कहिये कैसे आना हुआ?”

   ” दरवाज़े पर ही सब पूछ लेंगे क्या?”

  अंदर झांकती केसर ने मुस्कुरा कर पूछा और बिल्कुल ही बिना मन के राजा दरवाज़े से एक ओर हट गया, केसर भीतर चली आयी….

   ” हुकुम !! आपसे एक बात पूछना चाहते थे हम?”

   ” जी पूछिये?”

  ” अकेलापन तो लगता होगा ना आपको, अब देखिए ना ? देखते देखते साल बीत गया और आपकी धर्मपत्नी जी का कोई पता ठिकाना नही है। एक बात कहें अगर हम आपकी पत्नी होते तो आपको छोड़ कर कभी नही जाते, आप धक्के दे कर भी निकालते तब भी नही। आप अपने जूतों की नोक पर हमें रखते तब भी नही। आप कितनी भी रास लीला रचा लेते तब भी नही”

   राजा केसर को देखता उसके सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया

  ” अच्छा ! ऐसी भी क्या खूबी है मुझमें केसर सा?”

  ” आप हमें सिर्फ केसर बुलाया कीजिये! आपकी ज़बान से हमारा नाम कितना खूबसूरत लगता है कैसे बताएं आपको?”

  ” हम्म ! वैसे ऐसा कुछ खास नही हूँ मैं, एक बहुत आम इंसान हूँ जो बहुत सारी गलतियां करता रहता है।”

  ” तो हमारे साथ भी कर लीजिए कोई गलती! वैसे हमें तो नही लगता कि आप आम हैं। एक हीरे को कहां पता होता है कि उसकी चमक से कितने लोग रौशन हो रहें हैं।।
    आप तो इस परिवार का इस रियासत का चमकता सूर्य हैं हुकुम!

  ” अच्छा! और ?

  “और तो क्या कहें आपकी तारीफ में जितना कहा जाए कम है, एक बात और कहें आपसे ? आप बुरा तो नही मान जाएंगे ना?”

  राजा हंसते हुए नीचे देखने लगा

” आपके मन में जो भी है कह दीजिये मैं बुरा नही मानूंगा।”

  ” हुकुम हम जानते हैं आप विवाहित हैं ,हमें आपसे ऐसा नही कहना चाहिए लेकिन क्या करें हम भी अपने दिल के हाथों मजबूर हैं। आप हैं ही ऐसे कि कोई भी आपसे प्यार कर बैठेगा अब इसमें हमारा क्या कसूर। अब ये आपकी अच्छाई है कि एक लड़की अपने दिल के हाथों इतनी मजबूर हो गयी है कि वो आपकी दूसरी दुल्हन बनने को भी तैयार है। बल्कि हम तो कहेंगे कि हम आपके साथ यूँ ही  रहने को…

  ” अरे रुकिए रुकिए केसर जी! आप तो कहाँ से कहाँ पहुंच गईं!”

  ” यहाँ तक पहुंचाने वाले भी आप ही हैं हुकुम! आपको क्या लगता है ज़माना हमारे बारे में बातें नही बनाता होगा? आपको क्या लगता है? खैर आप पुरुष है , समाज के ठेकेदार आपकी जी हुजूरी करते हैं लेकिन यही ठेकेदार आपके और हमारे रिश्ते के बारे में दबी ढकी ज़बान में बहुत कुछ ऊलजलूल भी कहतें फिरतें हैं।  इस महल से बाहर भी एक दुनिया है राजा साहब जहाँ लोगों को यही लगता है कि राजा अजातशत्रु की महिला मित्र केसर के कारण ही उनकी रानी बाँसुरी उन्हें अकेला छोड़ गई।
    यहाँ से बाहर की दुनिया के लोग यही समझते हैं कि हम आपकी मिस्ट्रेस हैं और इसलिए ही आपने हमें महल में पनाह दे रखी है।
   समर से हमारा ब्याह भी आप इसी कारण करवाना चाहतें हैं जिससे हम महल में हमेशा आपके करीब बने रहें। अब बताइये इतना सब जानने के बाद हमारे लिए जीना कितना मुश्किल है, इससे तो अच्छा हम ज़िंदा ही ना रहें लेकिन हमारे पिता को हमारी ज़रूरत है इसलिए मर भी नही सकते।
   आपसे भी सच्चा प्यार हो ही गया है इसलिए अब न आपको छोड़ कर जा सकते ना महल को। ऐसी विषम परिस्थिति है कि हमें समझ नही आ रहा कि क्या करें क्या नही?”

  ” जी समझ सकता हूँ आपकी उलझन! एक स्त्री के लिए उसकी इज़्ज़त उसकी मान मर्यादा से अधिक कुछ नही होता और अगर उसी मान का मर्दन हो जाये तो वो अपने सम्मान को बचाये रखने सारे संभावित प्रयास करने लगती है। जैसे आप कर रही है। मैं समझता हूँ आपका नाम ना खराब हो इसी लिए आप मुझ से विवाह के लिए प्रस्तुत हैं लेकिन एक बात आपको साफ कह दूं केसर जी मेरे जीवन में जो स्थान मेरी पत्नी का है वो मैं किसी को नही दे सकता।”

   ” हमने कब कहा कि हमें उनका स्थान चाहिए? हमें हमारा ही स्थान दे दीजिये वही बहुत है हमारे लिए.. हम आपके लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं ।”

  ” एक बार और सोच लीजिये केसर जी! क्या आप सच में कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं?”

   केसर अपने कंधे से गिरे जाते नाइट गाउन के श्रग को लापरवाही से गिराती राजा के सामने चली आयी

  ” सोच लिया! कुछ भी करवा लीजिये, हम तैयार हैं!”

   राजा ने केसर के श्रग
को ज़मीन से उठा कर उसके कंधे पर डालते हुए मुस्कुरा कर दूसरी ओर चेहरा घुमा लिया

   ” मैंने ये सारी रियासत , ये राजगद्दी सब विराज को देने का फैसला कर लिया है!”

  ” क्या ? आप होश में तो हैं!” केसर भौचक्की सी राजा को आंखें फाड़े देखती रही।

  ” जी हाँ , कल ही इस बाबत एक गोष्ठी बुलाई हैं वहाँ मॉम- डैड , दादी साहेब, समर , काका साहेब, फूफा साहेब और बाकी के बड़ों की उपस्थिति में ये बात रख दूंगा और युवराज भैया के वापस आते ही एक अच्छे मुहूर्त में विराज की ताजपोशी हो जाएगी। अब मैं बहुत थक गया हूँ इस सारे फसाद से। विराज को सम्भालना और समझाना दोनो दिन ब दिन मुश्किल होता जा रहा है।
  कहतें हैं ना चोर को चौकीदार बना दो तो खज़ाना सबसे अधिक महफूज़ हो जाता है वैसे ही गैरजिम्मेदार विराज को जैसे ही इतनी सारी जिम्मेदारी मिलेगी वो खुद सुधर जाएगा।
  मैं भी अब एक साधारण ज़िन्दगी जीना चाहता हूँ। एक आम आदमी की ज़िंदगी … जहाँ मेरे आस पास कोई सिक्योरिटी ना हो। जहाँ मैं खुल कर सांस ले सकूं।
  सारा बिज़नेस देखने के लिए युवराज भैया हैं ही। एक आध कुछ जीवन यापन लायक रख कर मैं यहाँ से कहीं दूर चला जाना चाहता हूँ।
   एक सादा सा जीवन चाहिए मुझे जहाँ सुकून की सांस हो। दो वक्त की रोटी और सर ढकने के लिए एक छत ! बस इतना सा सपना है मेरा।
   बोलिये ! आप मेरा साथ देने को तैयार हैं?

   केसर आंखें फाड़े राजा को देखती रही, उसे जैसे अपने कानों पर विश्वास नही हो रहा था।

” आप सच कह रहें हैं हुकुम? लेकिन आपकी बात मानेगा कौन?”

  “राजा हूँ रियासत का! मुझे सिर्फ आदेश देना है। आप बाकियों की छोड़िए अपनी बताइये। वैसे भी आपने जो कहा कि महल से बाहर के लोग आपके चरित्र पर उंगली उठा रहे तो अब आपके बारे में भी सोचना तो पड़ेगा ही ना?”

  ” हम्म ! हम तो यही कहेंगे हुकुम की आप एक बार ध्यान से और सोच लीजिये। ये निर्णय बहुत बड़ा है। और ये बताइये की आप यहाँ से जाएंगे कहाँ? “

   ” कहीं भी जहाँ मुझे कोई पहचानता ना हो। खेती किसानी कर लूंगा, नौकरी कर लूंगा या आपसे कहा ना दाल रोटी चलने लायक कोई बिज़नेस भी देख सकता हूँ क्योंकि एकदम खाली हाथ शायद युवराज भैया मंज़ूर नही करेंगे मेरा जाना।”

    केसर चेहरे पर खींची चिन्ता की रेखाओं को चाह कर भी मुस्कान में बदल नही पा रही थी। वो अपने कपड़ों को ठीक करती वहाँ से उठ गई….

   ” रात बहुत हो चुकी है हुकुम! हमें अपने कमरे में जाना चाहिए अब!”

   मुस्कुरा कर हां में सर हिला कर राजा ने कमरे का दरवाजा खोल दिया और खुद एक तरफ हाथ बांधे खड़ा हो गया।

    राजा के कमरे से बाहर निकलती केसर ने गाउन पर की बेल्ट कसते हुए अपने कमरे की ओर कदम बढ़ाए ही थे कि किन्हीं दो मज़बूत हाथों ने उसे एक ओर ज़ोर से खींच लिया।
     वो संभल कर उधर देख पाती की उन्हीं दोनों हाथों ने उसकी कलाई पकड़ कर उसे कमरे के अंदर किया और दरवाज़ा बंद कर लिया।

     कमरे में अंदर जाते ही उसकी नज़र कमरे पर पड़ी। कमरे में बहुत हल्की रोशनी थी । कमरा समर का था और उसे खींचने वाले दोनो हाथ भी…

   ” समर ? ये क्या तरीका था हमें खींचने का?”

  ” और आपका ये कौन सा तरीका था, इस आधे अधूरे नाइट सूट में हुकुम के कमरे तक जाने का।”

  “हमारी मर्ज़ी हम कुछ भी पहने कहीं भी जाएं।”

   “अच्छा ये बात है! फिर मैं मेरी मर्ज़ी दिखाऊँ? अभी जाकर सबसे सब कुछ कह दिया ना तो अभी के अभी तुम्हें इस महल से बाहर फेंक दिया जाएगा। मेरे सामने ज्यादा होशियारी दिखाने की ज़रूरत नही है। समझ में आई बात , या और समझाऊँ ?”

  ” ये तो ज्यादती है? तुम तो ऐसे हक जता रहे जैसे हमारे पति हो? “

  ” हूँ नही तो हो जाऊंगा। आखिर होने वाला पति तो हूँ ही। इस लिहाज से मेरा हक बनता है।”

  ” ओह्ह इस गफलत में मत रहना समर सा!”

  ” क्यों ?”
 
  ” क्या क्यों ? क्या सच में ये सोचे बैठे हो कि मैं तुमसे शादी करने वाली हूँ! “

  ” हां तो और क्या? क्या रियासत छोड़ कर एक आम इंसान की ज़िन्दगी जीने जा रहे राजा अजातशत्रु की मिस्ट्रेस बन कर ज़िन्दगी गुज़ार दोगी? या रानी बाँसुरी की सहायिका और हुकुम और रानी साहेब के बच्चे की केयर टेकर बन कर बाकी ज़िन्दगी बिताना चाहेगी । निर्णय आपके हाथ में है केसर सा । भली तरह से सोच लो।”

   ” कहना क्या चाहते हो?”

   ” ये कहना चाहता हूँ कि इतने सालों से इस राजगद्दी को पाने के लिए जो जाल मैंने बिछा रखा था उसे तुम अपनी बेवकूफी में मुझसे दूर कर दोगी।”

   केसर पर एक के बाद एक बम गिर रहे थे, पहले राजा से ये सुनना की वो राजगद्दी विराज के नाम कर देगा उसी झटके से वो अब तक उबर नही पायी थी कि समर ने एक और झटका दे डाला

   ” तुम क्या कह रहे हो। हमे कुछ समझ नही आ रहा?”

   “आएगा भी नही। क्योंकि ये समर का प्लान है जिसका दिमाग तुम जैसों से कहीं ऊपर है।
    तुम्हें मैंने एक दिमाग वाली लड़की सोचा था पर निकली तुम महा बेवकूफ। तुम कहीं कोई गलती ना कर दो इसलिए समय समय पर दूसरों से पहले खुद तुम्हें टोकता रहा लेकिन तुम मेरे दिए इतने सारे हिंट्स भी नही पकड़ पायीं इसलिए आज मुहँ खोल कर कहना पड़ रहा है।
    हुकुम का पारिवारिक जीवन इतना अस्तव्यस्त है कि वो इन सब पर ज्यादा ध्यान ही नही दे पाते।
   उन पर हुए हमले हों या किसी और तरीके से उन्हें। परेशान करना हर बात के पीछे मैं ही था … मेरा किया धीरे धीरे सफल होता भी दिख रहा है।
    अपने ऊपर होने वाले हमलों से वैसे भी हुकुम परेशान होते रहे, उसके बाद उनकी शादी भी उन्हें मुश्किलों में खींच लाई। इसी सब के बीच विराज को भी सारी बुरी लते लगवा कर मैंने पूरी कोशिश की कि विराज भी गद्दी के लायक ना बचे।
    विराट में गद्दी संभालने वाले गट्स ही नही हैं। बात बात पर लड़कियों सा रिरियाने वाला लड़का गद्दी पर नही बैठ सकता ये बात वो दोनो भाई जानतें हैं।

  ” और युवराज ? “

  ” युवराज सा की एक उंगली कम होने से वो भी गद्दी में बैठने के अयोग्य हैं। हालांकि ये बात दुनिया को बताने के लिए है इसके पीछे की असल सच्चाई यह है कि उनके जन्म के समय ही उनकी जन्म कुंडली लिखने और बांचने वाले पंडित ने उसी समय यह भविष्यवाणी कर दी थी कि युवराज जिस वक्त गद्दी पर बैठेगा उसके अगले दिन उसकी मृत्यु हो जाएगी। बस उसी समय राजमाता यानी युवराज की माँ ने राजा साहब को कुलदेवी की कसम खिला दी थी कि युवराज को कभी गद्दी पर ना बैठाया जाए। भले ही परोक्ष रूप से वो गद्दी का सारा कार्यभार संभाल रखे।
   उसके बाद नियमत: गद्दी मिलनी थी युवराज के बाद वाले राजकुमार को।
    मेरा जन्म अजातशत्रु से एक दिन पहले हुआ था लेकिन मेरे नाम पर कोई विचार ही नही किया गया।

   ” पर तुम्हारे नाम पर आखिर क्यों विचार होता?”

  ” इसलिए क्योंकि मैं भी राजसी खून ही हूँ। मैं भी इस महल का हिस्सा हूँ।
    महल के इतिहास में एक महाराज हुए थे जिनकी दो रानियों के बच्चे आज की पीढ़ी तक साथ साथ पलते बढ़ते आये हैं। उनमें बड़ी रानी की संताने अजातशत्रु के पिता वाला पक्ष है तो छोटी रानी की हम लोग।
    मुझसे पहले तक हमेशा बड़ी रानी के परिवार में संतानों का जन्म पहले होने से वो लोग गद्दी पर बैठते रहे। छोटी रानी से एक बार कोई भूल होने से उन्हें  उनकी संतति की एक पीढ़ी को गद्दी पर ना बैठाने की सज़ा सुनाई गई थी लेकिन फिर वो सज़ा आज तक खिंचती चली गयी। जब कि वो चार पीढ़ी पहले ही समाप्त हो जानी थी। अगर सब नियम से चलता तो मुझे भी ऐतराज़ ना होता लेकिंन जब युवराज की जगह किसे गद्दी पर बैठाना चाहिए ये बात चर्चा में उठी तो मेरे पिता द्वारा ये कहे जाने पर की समर अजातशत्रु से एक दिन बड़ा है इसलिए महल के नियमानुसार अब एक मौका छोटी रानी के परिवार यानी हमें मिलना चाहिए पर किसी की कोई उचित प्रतिक्रिया नही आई तब मेरे पिता ने मुझे भी उसी तरह से शिक्षित दीक्षित किया जैसे अजातशत्रु को महल में तैयार किया गया।
    आज तुम खुद देख लो हुकुम की पदवी के अलावा आखिर क्या ऐसा अलग है उसमें और मुझमें। उसमें रुप और गुण हैं तो मुझमें रूप गुण विद्या बुद्धि सब है फिर भी मुझे हमेशा उसका सेवक बना रहना पड़ता है।
   मैं अगर छोटी रानी की संतति हूँ तो इसमें मेरा क्या दोष?
   अरे जब तक मुझे मौका नही दोगे जानोगे कैसे की मैं एक योग्य राजा बन सकता हूँ या नही।

    केसर अब तक शांत बैठी समर का चेहरा देख रही थी..

  ” क्या हुआ? विश्वास नही हो रहा ? मेरी बातों पर?”

  ना में सर हिलाती केसर समर के पास चली आयी

   ” तुम जैसे उटपटांग दिमाग वाले लड़के पर भरोसा नही होता। हो सकता है तुम मेरा विश्वास जीतने के लिए ऐसा कह रहे हो और फिर मैं जैसे ही तुम्हे अपने बारे में बताऊंगी तुम वापस अपने हुकुम की तरफ हो जाओ।”

  केसर की बात सुन समर ने एक ज़ोर का ठहाका लगाया….


“तुम क्या बिगाड़ लोगी किसी का भी?  तुम अकेले ना तो अजातशत्रु का कुछ बिगाड़ सकती हो ना मेरा। तुम्हें क्या लगता है, तुम उसके कमरे में जाकर बाहर सुरक्षित निकल आती हो तो ये मत समझ लेना कि अजातशत्रु बहुत कमजोर दिल है, उसका डील डौल देखा है ना किसी दिन सनक गया तो सिर्फ एक थप्पड़ में तुम्हारी जान ले लेगा फिर ये जो इनका शाही बगीचा देखा है ना वहीं किसी पेड़ के नीचे की मिट्टी के भीतर आराम करती मिलोगी। कम वो भी नही है, चाहे किसी तरीके से उसे लालच दे दो अगर वो फिसलना नही चाहे तो तुम कुछ नही कर पाओगी लेकिन अगर एक बार उसका दिल तुम पर आ गया तो फिर तुम्हें उससे कोई बचा भी नही पायेगा। जो आदमी अपनी रूठी हुई बीवी की खोज खबर नही ले रहा उसकी निष्ठुरता का और कितना प्रमाण चाहिए? खैर ये तो हुई उसकी बात , अब मेरी बात,  मैंने इतने सालों से जो फसल बोनी शुरू की थी अब आज उसके पकने और कटने का वक्त आ गया है। अजातशत्रु अपनी ज़िंदगी से इतना दुखी है कि राजपाट छोड़ने को तैयार है। उसके छोड़ते ही विराज को बैठाया जाएगा, उसे नशे की लत ने ऐसे अपना गुलाम बना रखा है कि वो दूसरे दिन से ही रियासत के काम के नीचे दब कर मर जायेगा। विराट और युवराज से कोई डर नही है मुझे… विराज के लुढ़कते ही इस रियासत के पास मुझे गद्दी पर बैठाने के अलावा कोई चारा नही रह जायेगा , और उसके बाद…

  ” लेकिन विराज के लुढ़कते ही कहीं अजातशत्रु वापस आ गया तो?”

  “सवाल ही नही उठता। अपनी आम आदमी की ज़िंदगी की तलाश में उसके यहां से निकलते ही मेरे आदमी उसका काम तमाम कर देंगे।

  ” क्या?”

  “हाँ ! अब बोलो? तुम यहाँ से चुपचाप निकल जाओगी या तुम्हें धक्के देकर निकालूँ?”

  “कैसे निकालोगे हमे? अब तो हम तुम्हारा सारा राज़ जान गये हैं समर सा । तो ऐसा करो हमसे हाथ ही मिला लो।”

” लेकिन तुमसे हाथ मिलाने का फायदा ?”

  “फायदा हम अभी समझा देते हैं… तुम्हें क्या लगता है हम अकेले हैं जो उनकी गद्दी और उनके दुश्मन हैं। तुम्हें क्या लगता है हम तुम्हारे हुकुम के प्यार में यहाँ पड़े हैं।”

” मतलब उनसे कोई प्यार नही है आपको?”

” बिल्कुल नही है वाली बात भी नही है। कभी तो था, और बहुत ज्यादा ही था लेकिन वक्त के साथ वो बात बीत गयी। तुम्हारे अजातशत्रु ने कितना बड़ा धोखा दिया है हमें जानते भी हो। कर्ज़ में डूबे हमारे पिता और हमसे कहा कि वो सब कुछ उबार लेगा उसके पास एक बढ़िया डील है और उस डील के लिए उसने हमें खुद से मिलने के नाम पर बुलाया, लेकिन….
    हम तुम्हारे हुकुम पर विश्वास किये वहाँ पहुंच गए लेकिन वहां तुम्हारे हुकुम नही बल्कि उनके गुर्गे मिले, और उन्होंने ….
      खैर छोड़ो जब तुम्हारे हुकुम ने बार बार हमारा दिल तोड़ा तब किसी की मदद का हाथ हमारी तरफ बढ़ा, दोस्ती का हाथ।
उस हाथ ने हमें भरोसा दिलाया कि वो हमें कुछ नही होने देगा और हमारे अपमान का बदला भी लेकर रहेगा । बस हमने भी उस हाथ को थाम लिया।

“कौन है वो?”

   केसर आगे कुछ कहती कि दरवाजे पर कोई ज़ोर ज़ोर से खटखटाने लगा।
    केसर को एक ओर कर समर दरवाज़ा खोलने बाहर चला गया, दरवाज़े के बाहर समर का खास सेवक था

   ” क्या हुआ चरण?”

   “साहेब दादी सा की तबियत बिगड़ गयी है, हुकुम उनके कमरे में जाते जाते आपको इत्तिला करने कहते गयें हैं।”

   ” ठीक है ।”

   समर ने अंदर आकर अपना फ़ोन उठाया और केसर को दादी की खबर देकर तुरंत उनके कमरे की तरफ भागता चला गया।
    उसके कमरे में पलंग पर बैठी केसर सोच में  गुम थी उसे अभी भी समर पर पूरी तरह यकीन नही हो पा रहा था। एक बार को उसे लगा कि क्या उसे समर के बारे में उस आदमी को सब कुछ बता देना चाहिये लेकिंन फिर कुछ सोच कर उसने अपना फ़ोन उठाया और कमरे से बाहर निकल गयी।
     केसर का दिमाग सुन्न हो चुका था , शायद आज तक उसने महल के इन पुरुषों को काफी कम आंक लिया था। आज तो समर ने राजा साहब के लिए भी जम कर अपनी भड़ास निकाली थी। तो क्या इसका मतलब राजा अजातशत्रु भी जैसे दिखतें हैं वैसे है नही।
   क्या वो भी बाकी राजाओं की तरह ही छल कपट से भरें हैं लेकिन ऐसा होता तो राज्य और गद्दी छोड़कर सामान्य जीवन जीने वाली बात? हालांकि पहले भी एक बार वो उनके नाम पर धोखा खा चुकी है लेकिन इस बार ये आम आदमी वाली बात में क्या पेंच था?
   इस सब में भी कुछ राज़ छिपा ही होगा। सनकी तो है अजातशत्रु तभी तो साल भर हो गया लेकिन अपनी ही पत्नी की कोई खोज खबर नही ली। अभी भी उसकी किसी बात से ये नही लगा कि वो बाँसुरी को वापस बुलाना चाहता है ।
    सही भी है मन भर गया होगा तो अब क्या ज़रूरत उसकी!
   आज तक तो वो खुद को ही बहुत तेज़ तर्रार समझती आयी थी लेकिन ये समर और अजातशत्रु भी कौन सा कम हैं? वो तो राजा साहब को सीधा और चरित्रवान समझ कर बेधड़क उनके कमरे में घुस जाया करती थी लेकिन जैसा आज समर ने कहा कभी वैसा ही कुछ राजा का दिमाग पलटा तब तो वो उसके चीथड़े उड़ा कर उसकी जान ले यहीं कहीं गड़ा भी देगा और किसी को उसके बारे में पता भी नही चलेगा। पिंकी जैसी बहन की इतनी वीभत्स हत्या करने वाला भी तो यही अजातशत्रु है। इन लोगों में तो इनकीं क्रूरता और इनका गुस्सा ही इनके राजपूताने की शान है। वो कैसे आज तक अजातशत्रु के मोहक मनभावन चेहरे के पीछे छिपे क्रूर राजा को नही देख पायी।
  और समर वो कौन सा कम है। सामने से इतना सजीला दिखने वाला चिट्टा सलोना सा लड़का अपने मन में इतनी कालिख लिए बैठा है वो क्या जानती थी?
    लेकिन अब अगर समर ही राजा बनेगा तो उसे क्या करना होगा।
    उसे  किसे चुनना होगा समर को या अजातशत्रु को?
हे भगवान!! कैसी विकट स्थिति में उसे फंसा दिया था, जैसे पानी के गोल घुमते भँवर में फंसी खड़ी रह गयी थी वो और गहरा काला पानी उसे नीचे रसातल में खींचता चला जा रहा था।
    वो कहाँ से इन सब चक्करों में फंस गई, ऐसा तो उसने सोचा ही नही था। उसे इस काम के लिए मनाते समय बस यही कहा गया था कि उसे राजा साहब को किसी भी तरह अपने जाल में फंसा कर उनसे शादी करनी है।
   हालांकि उसने पूछा भी था कि उसकी शादी हुकुम से होने से सामने वाले को क्या फायदा होगा? लेकिन उसकी किसी बात का जवाब दिए बिना बस उससे ये कहा गया कि इस काम के बदले में उसे रानी हुकुम का गौरवमयी पद ही नही ढेर सारी धनराशि भी मिलेगी और उसके पिता के नाम चढ़ा अरबों का कर्जा भी उतार दिया जाएगा।
    अपने पिता के कर्ज़ों में डूबी वो अपना कितना कुछ गंवा चुकी थी वो आज तक किसी से नही कह पायी थी। राजा अजातशत्रु से उसका प्यार क्यों घृणा में बदला और आखिर क्यों वो उससे बदला लेने उससे विवाह के लिए तैयार हो गयी थी, ये सारी बातें आज वो भावुकता में समर को बता जाती अगर दादी सा की तबियत ना बिगड़ी होती।

    अपने खयालों में खोई वो धीमे कदमों से चलती दादी सा के कमरे तक पहुंची ही थी कि कमरे के बाहर भगदड़ सी मच गई।
   दादी सा की सांसे उखड़ने लगीं थी। महल का हर एक रहवासी उस वक्त वहीं मौजूद था, महाराज खुद अपनी माँ का हाथ थामे बैठे थे।
   डॉक्टर ने आते ही दवाओं के इंजेक्शन दिए और कुछ और दवाएं खिला दी। दवाओं के असर से कुछ देर में आखिर दादी ने आंखें खोल दी…
        बहुत धीमें से दादी ने अपनी जान अपने प्यारे पोते को देखा और पास बुला लिया, उनके इशारे को समझ बाकी के लोग राजा को दादी सा के पास छोड़ कुछ देर के लिए बाहर चले गए ….
     राजा दादी सा के बिस्तर पर उनका हाथ थामे बैठा रहा, कमरे में उस वक्त उन दोनों के अलावा सिर्फ समर ही था जो हाथ बांधे राजा के पीछे खड़ा था

   ” कुमार मरने से पहले एक आखिरी इच्छा है।”

  “शुभ शुभ बोलिये दादी सा! आपको कुछ नही होगा। आप एकदम ठीक हो जाएंगी।”

  ” हमें पता है कि अब हमारे पास समय कम हैं। हमने एक बहुत अच्छी ज़िन्दगी जी है लेकिन लालसाओं का कोई अंत थोड़े ना है। कुमार बस तुम्हारे बच्चे को एक झलक देखने की इच्छा अब भी बाकी है।

 
    ” दादी सा मैं अकेले तो आपकी इच्छा पूरी नही कर सकता ना!”

  “इसलिए तो कह रहे जाकर बाँसुरी को वापस ले आओ। तुम तो ऐसे निष्ठुर नही थे कुमार? क्या हो गया अचानक? क्या उसकी याद नही आती?”

  ” हुकुम ! क्या मैं कुछ कह सकता हूँ।

  ” बोलो समर!”

  ” दादी साहेब के डॉक्टर से पूछ कर अगर दादी सा जाने के लिए राजी हों तो इन्हें हवा बदली के लिए देहरादून की हवेली ले चलतें हैं। कुछ दिन वहाँ रहेंगी तो शायद इन्हें कुछ आराम महसूस हो?”

  “हमें कहीं नही जाना। हम जो कह रहे वो तुम आजकल के बच्चे सुनते ही नही हो।!”

   “समर सही कह रहे हो! अभी डॉक्टर से पूछ लेते हैं और दो एक दिन में दादी सा को लेकर चलतें हैं।”

   ” जी ! दो दिन में इनके हुए सारे टेस्ट की रिपोर्ट्स भी आ जाएंगी”

   उन दोनों की बातों के बीच दादी साहेब मुहँ फुलाये दूसरी ओर घूम कर सो गयीं और वो दोनो मुस्कुरा कर आपस में कुछ बातों में लग गए।

    डॉक्टर से सलाह मशविरा करते समर और राजा बाहर चले आये। डॉक्टर की मंजूरी मिलते ही राजा अपने पिता से सलाह करने चला गया और समर वहां से बाहर निकल आया।

   अपने कमरे की तरफ जाते समर की नज़र वहीं एक किनारे चुपचाप खड़ी केसर पर पड़ गयी। केसर की चिंतामग्न मूर्ति देख मुस्कुराते हुए समर आगे बढ़ ही रह था कि केसर ने उसे टोक दिया…

  ” हमें आपसे कुछ बात करनी थी समर! क्या हम आपके साथ चल सकते हैं?”

  ” नही इस वक्त मुझे कुछ ज़रूरी काम है। आप भी आराम कीजिये काफी रात हो चुकी है। कल आराम से बात करेंगे।”

  ” लेकिन… केसर की बात आधे में ही काट समर ने अपनी बात रख दी

   ” आशा करता हूँ कि आज की हमारी बातें हम दोनों के बीच ही रहेंगी, अगर कोई बात बाहर आई तो अंजाम आप जानती हैं..!

  धीरे से हां में सर हिला कर केसर अपने कमरे की तरफ बढ़ गयी और समर मुस्कुराते हुए अपने कमरे की ओर।


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         और दिनों की तरह निरमा सुबह से उठ कर अपने काम में लगी थी। मीठी का पहला जन्मदिन आने वाला था , वो सोच सोच कर पुलकित थी कि मीठी के जन्मदिन को कैसे विशेष बनाया जाए।
       उसने अपने स्तर पर तैयारी शुरू कर दी थी। मन ही मन हिसाब लगाती वो यही सोच रही थी कि कहीं कुछ बाकी ना रह जाये।

   अपने लिए चाय चढ़ा कर वो एक बार वापस कमरे में चली आयी। प्रेम को गहरी नींद में सोते देख वो मुस्कुरा कर वापस रसोई में लौट गई थी। रात बड़ी देर प्रेम आया था, हालांकि उसकी भी तब तक नींद नही पड़ी थी लेकिन कुछ ज्यादा ही थके होने से ही वो आज वक्त पर उठ नही पाया था।
    वो अपनी चाय लिए बाहर बगीचे में चली आयी थी, पौधों में पानी डालते हुए उसे कुछ महीनों पहले बीती अपनी शादी की वर्षगांठ याद आ गयी थी।
   प्रेम वैसे भी बोलने में कच्चा था। कम नही बहुत कम बोलता था और जहाँ ज़रूरत ना हो वहाँ अक्सर चुप ही रहा करता था।
    
     प्रताप की बरसी वाले दिन वो कितना बुझा बुझा सा महसूस कर रही थी…. किसी काम में मन नही लग रहा था। कैसा अजीब सा कसैलापन उसके मन पे छाया हुआ था। अभी साल भर भी नही बीता था और वो प्रताप को बिसरा कर प्रेम के प्यार में डूब गई थी। मन ही मन वो खुद को धिक्कार रही थी।
    वो तो प्रताप से बेइंतिहा प्यार किया करती थी ना, उसके बिना जीवन की कल्पना भी नही कर पाती थी। फिर आखिर ऐसा क्या हो गया कि उसके जाने के बाद वो धीरे धीरे ही सहीं प्रेम की तरफ आकर्षित तो हो ही गयी।
     ये उसकी उबलती उम्र का असर था या शारीरिक ज़रूरतों का?
    सोच सोच कर उसने अपने सर में दर्द पैदा कर लिया था, उस दिन बिना बात के वो मीठी पर नाराज़ हो बैठी थी, अम्मा पर झींकने लगी थी। सुमित्रा को तो ऐसी फटकार लगाई थी कि वो शाम के वक्त काम पर ही नही आई, लेकिन उसके इस सारे बुरे बर्ताव के बावजूद वो चुपचाप कभी रोती हुई मीठी को चुप कराता रहा कभी अम्मा से आंखों ही आंखों में माफी  मांगता रहा।
    आखिर दिन भर के हवन पूजन ब्राम्हण भोज के निपटते ही जैसे ही घर खाली हो गया और वो एक बार फिर नहाने चली गयी, उसने एक अच्छे पिता की तरह मीठी को खिला पिला कर सुला दिया था।

    कमरे में आने के बाद मीठी को सोते देख एक बार फिर उसका पारा गरम होने लगा था, और वो पहली बार प्रेम से भी अपनी हद से कहीं अधिक तेज़ आवाज़ में बोल उठी थी

   ” क्या ज़रूरत थी इतनी जल्दी मीठी को सुलाने की?”

     आशा के विपरीत उसकी इतनी तेज आवाज सुन कर भी वो चुप ही बैठा रहा तो वो एक बार फिर तमक उठी थी

   ” आप पुरुषों के दिमाग में बस एक ही चीज़ चलती है ना, कभी ये भी सोचा है कि हम औरतें….

    उसकी बात पूरी होने से पहले ही उसने आकर निरमा को कस कर गले से लगा लिया था

   ” सुबह से देख रहा हूँ तुम्हारी उलझन। निरमा अपने दिमाग से एक बात निकाल दो की मुझसे प्यार कर के तुम प्रताप के साथ या उसकी यादों के साथ कोई भी नाइंसाफी कर रही हो।
   प्यार निभाने का सिर्फ ये मतलब नही होता कि आप रात दिन अपने प्रेमी की याद में घुलते रहें, वैसे भी अगर मीठी नही होती तो शायद तुम मुझसे शादी भी नही करती और ज़िन्दगी प्रताप के नाम पर अकेली गुज़ार लेती लेकिन मीठी के भविष्य के लिए ही सही तुमने मुझसे ब्याह किया और उसे निभा भी रही हो।
    साथ रहते हुए तो अपने पालतू पशु से भी इंसान को लगाव हो ही जाता है तो अगर मेरे लिए तुम्हारे मन में भावनाएं जाग गयी तो इसका ये मतलब बिल्कुल भी नही है कि तुमने प्रताप से कोई धोखा किया है।
    प्रताप तुम्हारा खूबसूरत अतीत था जो अब कल्पना मात्र है और  मैं तुम्हारा यथार्थ हूँ।
    तुम्हारे साथ अग्नि के पवित्र फेरे लेते ही मन ही मन सातों कसमों को निभाने का प्रण भी ले चुका हूँ।
   मैं जानता हूँ मुझमें बहुत सी कमियां हैं लेकिन मेरी कोशिश हमेशा ये रही है कि मेरे कारण तुम्हारी आंखें नम ना होने पाएं।
  आज सुबह से ही तुम्हें देख रहा हूँ, खुद से ही नाराज़ लग रही हो। यही सोच सोच कर परेशान थी ना कि प्रताप को गए एक साल भी नही बीता और तुम्हारे जीवन में कोई और पुरुष आ गया, इस बात को इस ढंग से सोचो ही मत निरमा।
    तुम तुम्हारी ज़रूरतों के कारण नही बल्कि मेरी ज़रूरतों को देखते हुए मुझसे जुड़ गई हो। अपने मन में कभी कोई पाप ना आने देना … तुम सी

    प्रेम की बात पूरी होने से पहले ही निरमा सिसकती हुई उसके गले से लगी ,उससे और चिपक गयी

   ” कैसे सब समझ जाते हो? ”

   प्रेम ने मुस्कुरा कर उसे खुद से दूर किया और उसके आंसू पोंछ दिए…

  “निरमा मैं कोई फिल्मी हीरो जैसा बहुत रोमांटिक सा लड़का नही हूँ, मुझे मीठी मीठी बातें करना भी नही आता। मैं शायद कभी दिल खोल कर तुमसे ये नही कह पाऊंगा की तुम मेरे लिए क्या हो? या मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ लेकिन विश्वास मानो अब इस जीवन के सफर में मेरे रहते तुम अपनी किसी भी परेशानी में खुद को अकेला नही पाओगी।”

   ” आई लव यू प्रेम!”

   निरमा के मुहँ से लव यू सुनते ही प्रेम शरमा कर इधर उधर देखने लगा ….

   ” क्या हुआ? आप नही कहेंगे?”

  धीरे से मुस्कुरा कर निरमा के माथे को चूम वो उठ कर मीठी के पास चला गया। निरमा पीछे से आकर उससे लिपट गयी….
     दोनो यूँ ही जाने कब तक खिड़की पर खड़े चाँद देखते रहे।

    प्रताप की बरसी के दो दिन बाद ही तो दोनों की शादी की सालगिरह थी। शादी जैसी परिस्थितियों में हुई थी उसके बाद निरमा ने कभी सोचा भी नही था कि वो इस दिन को कभी भविष्य में सेलिब्रेट कर भी पाएगी या नही? लेकिन प्रेम के प्यार ने उसके जीवन के उस दिन को उसका सबसे खास दिन बना दिया था।
    उस दिन भी तो वो और दिनों की तरह ही सुबह जल्दी जाग गयी थी, लेकिन प्रेम अपनी जगह पर नही था।
  मन में ये सोचते हुए कि हो सकता है वो आज उसके लिए खुद चाय बना रहा हो वो धीमे कदमों से रसोई की तरफ बढ़ गयी थी, पर खाली रसोई जैसे उसे मुहँ चिढ़ा गयी थी।
   फ्रीज़ पर एक पर्ची चिपकी थी__ ” हुकुम का सुबह सुबह फ़ोन आया था, उनके साथ देवगढ़ निकलना पड़ रहा है। वहाँ की हुकुम की ज़मीन पर स्थानीय लोगों ने कोई बवाल खड़ा कर दिया है, हुकुम का खुद जाना जरूरी है , मैं उन्हें ऐसी जगह अकेले नही जाने दे सकता। कोशिश रहेगी कि भले ही रात हो जाये पर आज ही हम लोग लौट आएं।
     वो अपना सर पकड़े वहीं बैठी रह गयी थी…
  अपने लिए चाय चढ़ाती निरमा मुस्कुराने लगी थी

  ” पता नही जनाब को याद भी होगा या नही कि आज उनकी शादी की सालगिरह है।  सही कहा था मैं बहुत अनरोमांटिक सा लड़का हूँ।”

   मैं का करूँ राम मुझको बुड्ढा मिल गया… गुनगुनाते हुए निरमा अपनी चाय पीती बगीचे में टहल रही थी कि एक कुरियर वाला चला आया…..

    उसने साइन कर के कुरियर ले लिया, कुरियर बाँसुरी का था। उसने याद रख के अपनी प्यारी सखी के लिए उसकी शादी की सालगिरह पर तोहफा भेजा था।
   निरमा को ज़ोर की रुलाई आने लगी थी, वोअपने गृहस्थी के जंजाल में कैसे बाँसुरी को भूल बैठी थी….


   क्रमशः


aparna….


   


       

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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