जीवनसाथी – 82

जीवनसाथी –82


    अपने लिए चाय चढ़ाती निरमा मुस्कुराने लगी थी

  ” पता नही जनाब को याद भी होगा या नही कि आज उनकी शादी की सालगिरह है।  सही कहा था मैं बहुत अनरोमांटिक सा लड़का हूँ।”

   मैं का करूँ राम मुझको बुड्ढा मिल गया… गुनगुनाते हुए निरमा अपनी चाय पीती बगीचे में टहल रही थी कि एक कुरियर वाला चला आया…..

   कुरियर वाले को देख निरमा के मन में एक पल को ये बात आई कि हो ना हो अनरोमांटिक पतिदेव ने ही कोई गिफ्ट भेजा होगा शायद।

    उसने साइन कर के कुरियर ले लिया, कुरियर बाँसुरी का था। उसने याद रख के अपनी प्यारी सखी के लिए उसकी शादी की सालगिरह पर तोहफा भेजा था।
   निरमा को ज़ोर की रुलाई आने लगी थी, वो अपने गृहस्थी के जंजाल में कैसे बाँसुरी को भूल बैठी थी….

    कुरियर लिए वो अंदर चली आयी। इतने दिनों में एक बार भी उसने बाँसुरी की सुध नही ली थी और वो वहाँ भी उसे याद रखी हुई थी।
   उसने पार्सल खोला उसकी शादी पर खींची चंद तस्वीरों में से एक तस्वीर जिसमें प्रेम उसकी मांग में सिंदूर भर रहा था और वो नीचे देख रही थी रखी मिली। ये तस्वीरें भी तो बाँसुरी ने ही निकाली थी अपने मोबाइल पर। इस तस्वीर को फ्रेम करवा कर उसने भेज दिया था।
    उसने तस्वीर वहीं सोफे के पास रखे कॉर्नर टेबल पर रखी और अंदर मीठी को जगाने चली गयी।

    कमरे में पहुंच कर उसे लगा हो सकता है जाने से पहले उसके पति ने उसके लिये अलमीरा में ही कोई तोहफा छोड़ा हो, वो चहक कर अलमारी पर पहुंच गई।
   पूरी आलमारी छान मारने पर भी उसे कुछ नही मिला। भरे मन से अपना टॉवेल लिए वो बाथरूम में चली गयी।
     मन ही मन वो प्रेम को इतने दिनों में अच्छे से जान गई थी लेकिन फिर भी दिल के किसी कोने से एक आवाज़ उठ रही थी कि इतना निष्ठुर तो नही हो सकता कि उनके जीवन का सबसे खास दिन भुलाए वो काम पर उससे बिना मिले ही चला गया।
  
   नहा धोकर निरमा के बाहर आते में अम्मा भी चली आयीं थीं।
  निरमा को नीचे आते देख उन्होंने उसके लिए भी चाय चढ़ा दी और नाश्ते की तैयारी करने लगी।
    निरमा साफ सफाई करने जा रही थी कि अम्मा ने उसके हाथ से झाड़न छीन लिया

  “काय बहुरिया दिन रात कुछ न कुछ करना ज़रूरी है क्या? अरे इतना अच्छा पति मिला है महारानी बना रखा है घर की फिर भी तुम्हें इत्ता सा चैन नही है। लगी रहोगी जब देखो तब। अच्छा सुनो आज हम शाम तक यहीं रहेंगी कुछ भी ऊपर का काम हो तो बोल देना।”

   निरमा को चाय पकड़ा कर अम्मा मीठी को लिए उसकी मालिश में लग गयी।
    निरमा को भी लगा कि अम्मा सही ही कह रही है , आज तो प्रेम को भी दोपहर के खाने पर नही आना है तो क्यों न आज वो खुद के साथ ही थोड़ा समय निकाल ले।
   टेबल पर अखबारों के नीचे कोई नॉवेल पड़ी थी। उसने उठा ली — ” the painter of signs ”  आर के नारायण की ये किताब वो कब ले आयी उसे याद नही आया।
   उसने एक नज़र अम्मा को देखा वो मीठी के साथ मस्त थी , वो चुपके से किताब और चाय लिए बगीचे में चली गयी। मीठी को प्यार कर जाते जाते उसने अम्मा को क्या क्या करना है ये भी समझा दिया__

  ” अम्मा मैं यहीं बगीचे में ज़रा ये किताब देख रहीं हूँ, कुछ लगे तो बताना।”

   उसके बाद तो एक पेंटर की प्रेम कथा में डूबी निरमा को लगभग एक घण्टे बाद जब मीठी नहा धोकर तैयार अम्मा के साथ उसका नाश्ता लिए बगीचे में आई तब जाकर कहीं होश आया।
    मीठी को प्यार से गोद में लिए वो सामने रखी नाश्ते की प्लेट देख चौन्क गयी

  ” अम्मा आज नाश्ते में साबूदाने की खिचड़ी बनाई आपने? ये तो मेरा सबसे पसंदीदा नाश्ता है। पर आपको कैसे पता चला?

  ” कैसे ना पता चली बहु? साल भर से तुम्हरे साथ साथ तुम्हरी रसोई में आगे पीछे होते रहतें हैं कि नही। अच्छा सुनो हम सोच रहे ज़रा मीठी को यहीं पास के मंदिर से माथा टिका कर ले आएं?”

   हाँ में सर हिलाती निरमा नाश्ता करने जाते जाते रुक गयी…” चलिए मैं भी चलती हूँ, वापस आकर नाश्ता कर लुंगी।”

    उसका भी रोज़ मंदिर का चक्कर कहाँ लग पाता है अब आज के खास दिन पर तो भगवान को धन्यवाद देना बनता ही है , सोचती निरमा मीठी को संभाले निकल गयी।

    वापस आकर मीठी को खेलता छोड़ वो एक बार फिर अपनी किताब में डूब गई।

   मनपसंद नाश्ते के बाद कॉफी और उसकी किताब थी और थी एक आत्मिक शांति एक सुकून।

    शाम के खाने की तैयारी करवा कर उसने अम्मा को भेज दिया। अब इस पूरे दिन के बीत जाने पर उसे पूरी तरह यकीन हो गया था कि प्रेम आज का दिन भूल बैठा है… लेकिन तब भी वो नाराज़ नही हो पा रही थी। उसका आज का दिन बहुत दिनों बाद वैसा बीता था जैसा वो बहुत दिनों से बिताना चाह रही थी।
    एक ऐसा दिन जो पूरी तरह से सिर्फ उसका हो। आज पूरे दिन में उसने अपने मनपसंद लेखक की किताब पढ़ने के अलावा कोई काम नही किया था और एक अकेला यही काम उसकी आत्मा को तर कर गया था।

  कितने दिनों से सोच रही थी कि पार्लर जाकर पैडीक्योर करवा लें पर हाय रे समय!! ये उसी के पास चिड़िया बन उड़ जाता है या औरों का भी उस जैसा ही हाल होता होगा।
    आज किताब में डूबे हुए उसे ख्याल आया कि दोपहर प्रेम को आना तो है नही क्यों ना पार्लर वाली को ही बुला ले। उसने ड्राइंग रूम में रखे लैंडलाइन के पास पड़ी फ़ोन बुकलेट उठा ली। पहले पेज पर ही उसे नम्बर मिल गया।
     पैडीक्योर करवाती अपनी किताब में खोई निरमा को आज बहुत दिनों बाद अपने लिए समय मिल गया था जैसे।
        एक सुकून मिला था जैसे!!
   प्यार भरी जिंदगी का सुकून !!! मीठी और प्रेम के अस्तित्व का सुकून!!
   और इसी परिपूर्णता ने आज उसका हृदय तृप्त कर दिया था।
    शाम को मीठी के साथ खेलती निरमा बहुत खुश थी। प्रेम का मनपसंद खाना बनाये वो उसकी राह देख रही थी। उन्हें याद नही रहा तो क्या हुआ वो तो याद रख के उसके लिए कुछ तोहफा ला ही सकती है।
   उसके लिए लायी शर्ट उसके पलंग पर रख वो मीठी को खिलाने चली गयी ।

   आज का पूरा दिन उसने बिना प्रेम के बिताया था, वरना तो उसके रहने में वो उसके पीछे ही डोलती रहती थी। मीठी और प्रेम की सेवादारी के बाद खुद के लिए उसके पास वक्त ही कहाँ बचता था।
    यह भी एक तरह का प्रेम ही तो है , जब आप जिसके प्यार में हैं , उसके बिना भी उसके अस्तित्व को अपने आसपास महसूस कर उसकी खुशबू से तर हो जातें हैं।
    अचानक निरमा को लगने लगा कि प्रेम ने तो उसे उससे बढ़ कर तोहफा दे दिया। उसके खुद के साथ एक दिन।
   पूरा एक दिन! जिस दिन वो किसी की पत्नी और माँ होते हुए भी अपने खुद के अस्तित्व में थी।
  जिस दिन दोपहर में पति को क्या पसन्द है ये सोचना छोड़ कर उसने खुद के पसंद के मटर वाले चांवल और दही की चटनी बनवाई थी।
    एक पल को वो थम कर रह गयी और फिर तुरंत भागती सी रसोई में चली गयी।
   रसोई में फ्रीज़ पर जिस मैग्नेट से पर्ची चिपकाई गयी थी उस पर एक छोटा सा क्यूपिड बना था। उसने उस क्यूपिड को हाथ में लिया और प्यार से देख ही रही थी कि उसके बाण वाले हिस्से से वो खुल गया और अंदर रखी हीरे की पतली सी अंगूठी झिलमिला उठी।
    निरमा की आंखें खुली की खुली रह गईं ।

  ” हे भगवान ! पतिदेव तो सुबह सुबह ही गिफ्ट दे चुके थे और वो अनजानी सी अभी तक यही सोच रही थी कि वो शायद भूल गए।”

   मुस्कुराती हुई रसोई से बाहर आई निरमा अंगूठी उंगली में पहनती वहीं बैठ गयी। पास रखी किताब भी उसके साथ मुस्कुरा रही थी। ये भी तो उसकी नही थी, सुबह इस किताब को देख कर लगा कि शायद प्रेम के कलेक्शन की होगी लेकिन अब पूरी कहानी पढ़ कर उसे समझ आ गया कि ये किताब यहाँ रखने वाले ने जानबूझ कर रखी थी।
   किताब के अंतिम पेज पर जिसे वो मीठी के बुलाने पर नही पढ़ पायी थी में उसका नाम लिखा था
    निरमा
    
       हमेशा मुस्कुराती रहो।
      ढेर सारे प्यार के साथ

         प्रेम !!

    मुस्कुरा कर उसने किताब अपने सीने से लगा ली, तभी बाहर गाड़ी की आवाज़ आयी, प्रेम वापस आ गया था।

    बगीचे में बैठी चाय पीती निरमा भी अपने खयालों से वर्तमान में वापस लौट आयी थी।
     उसकी शादी की सालगिरह बीते तीन महीने हो चुके थे और आज भी वो उस दिन को याद कर मुस्कुरा उठती थी। साथ न होते हुए भी उसके खास दिन को कितना यादगार बना दिया था प्रेम ने।

    धीमे कदमों से चलते हुए प्रेम भी बाहर चला आया

  ” क्या सोच सोच कर मुस्कुरा रही हो”

   ” आपके अलावा और कुछ होता ही नही दिमाग में , और क्या सोचूँ?”

  ” अच्छा सुनो निरमा ! अपना और मीठी का सामान पैक कर लेना। हम एक हफ्ते के लिए बाहर जा रहें हैं।”

   ” कहाँ ?”

  निरमा को बिना कुछ जवाब दिए प्रेम ने मुस्कुरा कर सामने पड़ा अखबार उठा लिया , निरमा भी उसकी चाय लेने भीतर चली गयी।

  *******

    एकेडमी के नियम सख्त नही काफी सख्त थे। आखिर देश के भावी सूत्रधारों की ट्रेनिंग थी। इन रंगरूटों को सिर्फ प्रशासनिक ट्रेनिंग ही नही शारीरिक मानसिक हर तरीके की ट्रेनिंग दे कर दक्ष किया जा रहा था।
    सुबह की चुस्त फिज़िकल ट्रेनिंग के बाद दिन भर के थका देने वाले एकेडमिक सेशन्स के खत्म होते ही शाम का रंगारंग कार्यक्रम उन लोगों में वापस अगले दिन जूझने की ताकत से भर देता था।
    इसी सब के बीच बाँसुरी बस यही सोच सोच कर परेशान थी कि अब शायद राजा से जल्दी मिलना नही हो पायेगा।
    राजा का जन्मदिन भी करीब था लेकिन उसने राजा के जन्मदिन को उसके साथ मनाने का खयाल दिल से निकाल दिया था।

    इधर महल में राजा ने डॉक्टर की अनुमति मिलते ही दादी साहेब को अपने साथ देहरादून ले जाने के बारे में अपने पिता और माँ साहेब से भी बात कर ली।
हालांकि राजा का जन्मदिन माँ साहेब महल में ही मनाना चाहती थीं लेकिन राजा की ज़िद देखते हुए उन्होंने उसे जाने की अनुमति दे दी।

   शाम अपने कमरे में किसी काम में लगे समर के दरवाज़े पर खड़ी केसर ने वहीं खड़े खड़े आवाज़ लगाई

  ” क्या हम अंदर आ सकते हैं?”

   समर ने चौक कर केसर को देखा और एक ज़ोर का ठहाका लगा उठा

  ” बस ! एक ही रात में इतनी सुधर गयीं आप? आप कब से किसी से इज़ाज़त लेकर आने जाने लगीं।

   केसर चुपचाप अंदर चली आयी, भीतर आकर उसने दरवाज़े को बंद किया और समर के सामने बैठ गयी

   ” कहीं जाने वाले हैं क्या आप?”

   ” जी ! लेकिन प्लीज़ आप इतनी अच्छी तरह बात कर कर के मुझे हार्ट अटैक मत करवा दीजिएगा ।”


  ” कहाँ जा रहे?”

   समर कुछ देर को केसर को देखता रहा

   ” अजातशत्रु को अकेला छोड़ना सही नही है। वो अपनी दादी साहेब की तबियत को लेकर चिंतित है, उन्हें लेकर हवाबदली के लिए कहीं जाना चाहता है , मैं उसे अकेला नही जाने दे सकता। जाने अकेले कहाँ क्या खिचड़ी पका लें? उसके दुश्मन बहुत हैं तो दोस्त भी कम नही। उसे जानने वाले उसके लिए जान भी दे सकते हैं। वैसे आप उस दिन क्या बता रही थी, आपको कैसे धोखा मिला राजा अजातशत्रु से।”

  ” क्या क्या बताएं आखिर क्या हुआ था हमारे साथ। जाने दीजिए कभी और बता देंगे , मन खट्टा हो जाता है बस और कुछ नही।”

  ” हाँ लेकिन मन खट्टा कर लेने से आपका बदला पूरा तो नही हो जाएगा ना? वैसे लड़कियों के मामले में राजा साहब को क्लीनचिट दी जा सकती है। दो चार नामों के अलावा और कोई बड़ा काम नही जुड़ा उनके नाम के साथ।”

  ” लेकिन हमारे नाम और हमारी इज़्ज़त को खत्म करने में कोई कसर बाकी नही रखी तुम्हारे राजा ने।”

  ” ऐसा क्या किया? ” समर ने पूछते हुए केसर की तरफ वाइन का ग्लास भी बढ़ा दिया। अपने गले को तर कर केसर वापस बोलने पर आई

  ” हम और आपके हुकुम एक ही कॉलेज से पढ़े हैं। उसी समय से आपके हुकुम हमें अच्छे लगने लगे थे लेकिन हम ये भी जानते हैं कि उनका ध्यान हम पर नही था। वो बस खुद में ही गुम रहते थे। शायद उन्हें कुछ सच्चे दोस्तों की तलाश थी लेकिन अक्सर लोग उनसे उनकी राजशाही की वजह से दोस्ती किया करते थे , उनका एक  दोस्त था अदित्यप्रताप! दोस्त नही कह सकते क्योंकि आपके हुकुम उससे अक्सर दूर ही भागा करते थे लेकिन वो उनके पीछे पीछे ही रहता।वो अक्सर हमारे ग्रुप में बिना बुलाये पहुंच जाया करता था।
   हमें वो कभी भी पसंद नही था, उसकी मिमिक्री की आदत सबसे खराब लगती थी। हम सभी की आवाज़ें बिगाड़ बिगाड़ कर वो हमें चिढ़ाया करता था।”

” तब तो हुकुम की भी आवाज़ निकाला करता होगा?”

  ” नही बस उन्हीं की कभी नही निकाली। कहता था अजातशत्रु की आवाज़ बहुत गहरी है, इस आवाज़ की कोई नकल नही कर सकता। एक आध बार असफल कोशिशें कर के फिर उसने कोशिश भी नही की।
   यहाँ के बाद तुम्हारे हुकुम ने पहले बनारस फिर लंदन से अपनी पढ़ाई की और आकर तुरंत ही राजा साहेब का काम संभाल लिया। तुम्हारे महल के राजकोष को बढ़ाने के लिए कई तरह के व्यापार में किस तरह जोड़ घटाव को उल्टा सुल्टा कर महल की तिजोरी भरी जा सकती है उसी गुणा भाग में मेरे पिता सहायक हुआ करते थे।
    उनका भी अपना बिजनेस था। मैं मानती हूँ उन्होंने अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए कई गलत रास्ते भी अपनाए लेकिन महल इस सब में कौन सा पीछे था।
  तुम्हारे हुकुम ने आते ही कमर कस ली कि सारे गलत तरीके से शुरू किए काम बंद किये जायेंगे। तुम्हारे युवराज भैया वैसे भी विदेशों से होने वाले व्यापार पर नज़र रखते थे इसलिए उनकी नाक के नीचे चलने वाला ये काम उन्हें नही दिखा था।
   अजातशत्रु के बनाये कठोर नियमों में अकेले मेरे पिता ही नही जाने कितनों को व्यापार में घाटा होने लगा। तुम्हारे महल को तो प्रिवीपर्स के नाम पर एक बंधी बंधाई रकम मिल ही जाती थी, उस पर हज़ारों की रॉयल्टी भी।
   इतनी सारी ज़मीन थी कि रियल इस्टेट में भी तुम्हारे युवराज सा और काका सा ने मोटा माल कमा लिया लेकिन तुम्हारे व्यापारों पर लगे हमारे शेयर्स के वो पैसे डूब गए जिन व्यापारों को अजातशत्रु ने गलत करार देते हुए बंद करवा दिया।”

  ” प्रिवीपर्स के नाम पर कुछ खास नही मिलता केसर सा । गलतफहमी है ये लोगों की।”

  ” लेकिन कुछ तो मिलता है। यहाँ हमारी हालत खराब होने लगी थी। पापा साहेब का लिकर का बिज़नेस बंद होने के बाद बाकियों पर भी गाज गिरने लगी थी, हम बुरी तरह से कर्ज़ में डूबने लगे थे। ऐसे में एक बार किसी सिलसिले में पापा साहेब हमें साथ लिए महल पहुंचे और महाराजा साहेब से कुछ बातचीत में लगे थे कि उनके प्रस्ताव को तुम्हारे हुकुम ने सिरे से नकार दिया।
   दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए हमारे पापा साहेब ने जब हमारी और आपके हुकुम की शादी की बात रखी उसे भी इस नकचढ़े शहज़ादे ने ठुकराया और बाहर चला गया लेकिन उसी रात हमारे पास इन्हीं का फोन चला आया।
    हमसे कहा कि हमारे सारे कर्ज़े माफ हो जाएंगे अगर हम आज की रात के लिए इनकीं बात मान लें। दिल में कहीं तो उस वक्त थे ही हमें भी लगा कि एक बार मिलने पर शायद हुकुम हमसे शादी के लिए तैयार हो जाएं। सच कहें तो रुपयों के साथ हमें पोजीशन का भी लालच था। अगर हम इस रियासत की रानी बन जाते तो किस की हिम्मत थी हमारे पापा के बिजनेस को चौपट करने की।
   हम तुम्हारे हुकुम की बुलाई जगह पहुंच गए और फिर …”

    केसर जैसी सख्त लड़की भी एक पल को खामोश रह गयी, समर ने उसकी तरफ पानी का गिलास बढ़ा दिया…

   पानी पीकर वो जब तक सामान्य हुई समर ने अपना सवाल तैयार कर लिया था

   ” आपने हुकुम का चेहरा देखा था वहाँ?”

  ” नही ! लेकिंन आवाज़ सुनी थी, वही खुशबू , वही हाथों की उंगलियों पर की अंगूठियां और वही गहरी आवाज़ थी ..

  ” आप देख क्यों नही पा रही थीं?

  “वहाँ पहुंचते ही पीछे से उन्होंने हमारी आँखों पर पट्टी जो बाँध दी थी।”

  ” फिर आप कैसे इतनी श्योर हैं कि वो हुकुम ही थे।”


   ” आप इतने श्योर कैसे हैं कि हुकुम नही थे? और कौन हो सकता है समर ?”

   ” आगे क्या हुआ ?”

  ” आगे जो हुआ वो बताने लायक नही है। हमसे ज़बरदस्ती करने के बाद आपके हुकुम और उनके घटिया दोस्त वहॉं से चले गए। हमारी हालत ऐसी नही थी कि हम घर वापस जा सकें, हम तो खुद की ही जान ले लेना चाहते थे कि उसने आकर हमें रोक लिया

  ” किसने ?”

”  वही जिससे कॉलेज के समय पर हम बहुत चिढ़ते थे।

” आदित्यप्रताप?”

  ” आपको नाम भी याद रह गया?”

   ” एक बार सुनी बात नाम जगह मेरे दिमाग से फिर निकलती नही । तो इसने आपसे हाथ मिलाया।”

  ” हाँ ! हम तो पूरी तरह टूट गए थे इसी ने हमें सहारा दिया , अपनी दोस्ती दी हमें वापस खड़ा होने का भरोसा दिलाया। हम तो अजातशत्रु के सीने में खुद गोलियां उतारना चाहते थे लेकिन इसने रोक दिया।

  ” क्यों?”

  ” समर हम तुम पर भरोसा कर के गलती तो नही कर रहे ना। हमें समझ ही नही आता कि अजातशत्रु से हमें नफरत ज्यादा है या मुहब्बत। जब हम अकेले होतें हैं तो उसकी कोई खुशी हमसे बर्दाश्त नही होती, इसलिए उसकी अच्छी खासी गृहस्थी में आग लगा दी। लेकिन जब वो सामने आ जाता है हम अपनी सारी नाराज़गी कभी भूल भी जातें हैं।
    खैर बदला तो हमारा सिर्फ उससे शादी तंक ही था। सोचो एक राजा की शादी हमारे जैसी से हो जाये ये क्या उसके जीवन पर धब्बा नही है , हालांकि आदित्य क्यों अजातशत्रु से बदला लेना चाहता है ये हम आज तक नही समझ पाए।

   ” ये आदित्यप्रताप है कौन आखिर? इसके बारे में कुछ जानती हैं आप? ”

   ” ये भी पुराने रईसों में से है, देहरादून में कहीं इसके मामा का घर है ….

  केसर अपनी बात पूरी करती उसके पहले ही समर ने उसकी बात आधे में ही काट दी

   ” आदित्यप्रताप सिंह के मामा दून वाले ठाकुर साहब तो नही हैं कहीं?

   केसर ने अनिश्चितता से चेहरा घुमा लिया , वो भी आदित्य के बारे में उतना ही जानती थी जितना उसे आदित्य ने खुद बताया था, और अब समर की इतनी पूछताछ से उसे समर पर शक होने लगा था

   ” हमें लग नही रहा कि आप अपने हुकुम के खिलाफ हैं ? समर सा हमें धोखा दे रहें हैं ना आप? हमें जानते हैं ना , हम बहुत खतरनाक …
   केसर बोल ही रही थी कि उसके हाथों को अपने हाथों में लेकर समर ने अपने माथे से लगा लिया, केसर चौक कर खड़ी हो गयी

  ” मुझे माफ़ कीजियेगा केसर सा, आपके साथ बड़ी नाइंसाफी हुई है। अगर कर सकती हैं तो मुझ पर भरोसा कर के देखिए मैं आपके साथ गलत करने वालों को छोडूंगा नही।
    अब इस सारे हंगामें का अंत करीब है। एक बात और , मैं आपके साथ हूँ।
   अभी इसी वक्त मुझे बहुत ज़रूरी काम से निकलना होगा। वापस लौट कर मिलता हूँ।

   अपना सामान समेटे समर बाहर निकलने लगा कि केसर ने उसे आवाज़ दे दी

   ” समर सा एक मिनट रुकिए ”

  केसर भाग कर समर तक चली आयी , अपने लंबे से ओवरकोट की जेब में हाथ डाल उसने कुछ निकाला और समर के हाथ पर रख दिया।
    बाँसुरी का फ़ोन था जो समर के हाथ में रखा था।
  समर ने मुस्कुरा कर केसर को देखा…

” मेरा सोचना सही था। खैर ये तो नही कहूंगा कि इश्क़ और जंग में सब जायज़ है क्योंकि मैं ये बात नही मानता। ना ही एकतरफा इश्क़ में लड़की के चेहरे पर तेजाब फेंकना जायज़ है और ना ही जंग में कैद सिपाही का सर कलम कर देना ।
    ये भी नही कहूंगा कि रानी साहेब के फ़ोन से सबको गलत संदेश भेज कर आपने बहुत अच्छा काम किया लेकिन हां ये बात है कि ये फोन अब मैं किसी और के हाथ में नही आने दूंगा।”

   बाँसुरी का फोन जेब में डाले समर वहाँ से निकल गया…

  
    *********

  एकेडमी में रविवार का दिन सभी रंगरूटों के लिए सुकून भरा होता था। 
   रविवार का दिन अगर पहले से कोई तयशुदा कार्यक्रम ना हो तो सभी के अपने कार्य करने के लिए आज़ादी का दिन होता था। जिसे शहर जाकर कोई सामान या ज़रूरत की चीज़ें लेनी हो वो काम निपटाने का दिन होता था।
    बहुत से लोग तो सुबह से अपनी मंडली के साथ अपनी लोगो वाली जैकेट डाले लाल टिब्बा या झील पर के दर्शनों के लिए निकल चुके थे।
       शेखर भी तैयार होकर नीचे उतर आया था। नीचे लीना और बाँसुरी चाय पीती बैठी थीं कि शेखर उन लोगो के पास ही जा बैठा…

   “हेलो गर्ल्स? कैसे हैं आप लोग? “

   ” कैसे दिख रहे हैं? ” लीना के जवाब पर शेखर बाँसुरी को देखने लगा

   ” बेहद खूबसूरत ”

    बाँसुरी को देखते शेखर का कॉलर पकड़े लीना ने अपनी तरफ उसका चेहरा मोड़ लिया

   ” हां तो बस हैं!”

   वहीं उनके पास बैठते शेखर ने अपने लिए भी चाय मंगवाने इधर उधर नज़र दौड़ानी शुरू की ही थी कि उसकी नज़रे भाँप कर लीना कूद पड़ी

  ” ओह्ह शहज़ादे यहाँ सेल्फ सर्विस है। काउंटर पर जाइये और जो चाहिए मांग कर ले आइये। यहां हमारा दिल्ली वाला छोटू नही आएगा।”

   ” ओह्ह रियली! कित्ता प्यारा था ना हमारा छोटू । जब उसे कोई जोक सुना देता था मैं ज़ोर से हँस पड़ता था और तब रिदान के ये कहने पर की साले तेरे ऊपर ही था ये जोक अपने बाल खुजाता चला जाता था”

   शेखर उसे याद कर हँसने लगा

  ” हाँ और फिर उन्हीं गंदे हाथों से मस्त गरम समोसे तेरे लिए परोस लाता था!” लीना की बात पर शेखर ने गन्दा सा मुहँ बना लिया

   ” ज़रीना सच कहना तूने बचपन में कभी मधुमक्खी के छत्ते पर हाथ मारा था क्या? हमेशा मधुमक्खियों सी भुनभुनाती रहती है।”

  “हां मारा था ना । उसी छत्ते को तेरे मुहँ पर फेंक के मारने की तमन्ना अधूरी रह गयी। अब यहाँ पहाड़ों पर ज़रूर किसी दिन पूरी कर लुंगी।”

   ” यहां पहाड़ों पर इतनी हसीन वादियों में भी तुझे मारकाट मचाने की पड़ी है, खूनी चुड़ैल ?”

   वो सभी बातों में ही लगे थे कि किसी ने आकर बाँसुरी को बुला लिया, बाँसुरी के वहाँ से जाते ही शेखर और लीना फिर बातों में लग गए, रिदान भी अब तक वहाँ आ चुका था।
   कुछ देर में ही बाँसुरी वापस आयी और लीना से ये कह कर की उसे किसी ज़रूरी काम से बाहर जाना है वो तैयार होने कमरे में चली गयी…

  ” का भवा मिसरा जी ! आजकल बड़े गुमशुदा से लग रहे हैं आप? “

   रिदान के सवाल को लीना ने हंस कर उड़ा दिया

   “वो गाना सुना है तूने रिदान — एक अकेला उस शहर में रात में और दोपहर में, आबोदाना ढूंढता है आशियाना ढूंढता है”  वही हालत है इस कम्बख़्त की।

  ” नही लीना जिज्जी ! हमें तो लग रहा है मिसिर जी उ तिवारीन को श्रीमती मिसरा बनाना चाहतें हैं।”

   “एक तो वो मुंगेरी लाल वैसे ही उटपटांग सपने देखता रहता है उस पर तुझ लाल बुझक्कड़ की सड़ियल बातें उसके दिमाग का हार्ट फेल ना कर दें।

   उन लोग की बातों के बीच ही बाँसुरी सीढियां उतर कर उनके सामने से उन लोगों को बाय बोलती निकल गयी। उसके निकलते ही शेखर भी खड़ा हो गया…

  ” ओये कहाँ चले शहज़ादे ?”

   लीना के सवाल पर शेखर मुस्कुरा उठा

  ” अपनी शहज़ादी के पीछे …”

   ” अरे सुन ! रुक तो ज़रा…. अच्छा मान ले कहीं वो शादीशुदा निकली तो?”

    शेखर एक पल को रुक गया , उसने वापस मुड़ कर लीना को देखा और फिर अपनी मस्ती में मगन हो गया

   ” क्यों मानू? नही मानता जा। ”

  ” अच्छा सुन तो सही…

   लीना की बात सुने बिना ही फिर शेखर रिदान को खींचते हुए बाहर निकल गया।

   उनके बाहर पहुंचते तक में बाँसुरी एक लंबी सी काली गाड़ी का दरवाजा खोल उसमें बैठी और उसके बैठते ही गाड़ी धूल उड़ाती सरपट निकल गयी।
   शेखर ने भाग कर टैक्सी बुलाई और उस गाड़ी के पीछे ही निकल गया।

     मसूरी पर करती तेज़ी से चलती कार देहरादून के एक छोर पर बनी एक राजसी शानदार हवेली के सामने जा कर रुक गयी।
    बाँसुरी के गाड़ी से उतरते ही हवेली के बड़े बड़े लोहे के गेट खुले और अंदर से एक उसी की उम्र की लड़की भाग कर आई और उसके गले से लग गयी। उस लड़की के पीछे एक आदमी गोद में बच्ची को लिए चला आया।
     उनसे कुछ दूर टैक्सी में बैठे शेखर और रिदान के लिए ये सब कुछ आश्चर्यजनक मामला था।
   उन्होंने देखा बाँसुरी ने उस आदमी की गोद से उस बच्ची को झट अपनी गोद में ले लिया। उसे लाड़ दुलार करती बाँसुरी उसी बच्ची में खोई हुई थी कि कार का दरवाजा खोले राजा साहब भी नीचे उतर आये।
    उन्हें देखते ही शेखर का मुहँ एक बार फिर कसैला हो गया…

  ” यार ये ठरकी राजा फिर चला आया। इसकी साले की प्रॉब्लम क्या है?

  ” मैं तो शेखर भाई ये सोच रहा हूँ कि बाँसुरी का इस राजा से क्या कनेक्शन है? उस दिन होटल के कमरे में चली गयी। आज इसी के साथ कार में अकेली यहाँ तक चली आयी।
    भाई बुरा मत मानियो पर लड़की का करेक्टर सही नही है ।”

   शेखर ने घूर कर रिदान को देखा

   ” इतनी मासूम है शक्ल से और तुझे करेक्टर सही नही लग रहा। देखा नही बच्ची के साथ कितने प्यार से खेल रही थी मतलब बंदी कोमल मन की है जल्दी ही शादी और बच्चों में यकीन करने वाली। वो दूसरी लड़की पक्का इसकी दीदी होगी और वो लंबा चौड़ा पहलवान इसका जीजा। अब मतलब इसी का शादी का नम्बर होगा । नही?
  
  ” हाँ पर तुमसे करेगी या नही ये नही पता। यार मैंने सुना है ये राजा शादीशुदा है! फिर भी यार कैसी गन्दी नज़र है इसकी।”

   ” तभी तो राजा है बेटा ! इन लोगों के पास और काम ही क्या होता है? यार पर कुछ ना कुछ तो पेंच है। चल गेट पर खड़े गार्ड से पूछतें हैं।

   बाँसुरी और बाकी लोग गेट के अंदर जा चुके थे।। शेखर लपक के गार्ड के पास पहुंच गया…

   ” राम राम भाई कौन गांव से हो?”  

  गार्ड ने एक हिकारत भरी नज़र शेखर पर मारी ही थी कि शेखर पलट गया। उसके पलटते ही उसकी जैकेट पर छपा एकेडमी का लोगो गार्ड ने पहचान लिया। और उसे एक ज़बरदस्त सैल्यूट ठोंक दिया…
    शेखर ने भी बाहर से कुछ देर पहले खरीदा सिगरेट का पैकेट उसकी ओर बढ़ा दिया …

  ” गोरखपुर से हैं साहब”

  ” अरे हमार यू पी के बबुआ हो , वही हम बोले अतना तेज़ तो हमारे यू पी के भैया लोगो के चेहरे पर ही बरसता है। गुटखा और खैनी खा खा के जो जबरा ज्ञान मटमटा के निकलता है ना कि आत्मा तृप्त हो जाती है।”

  ” काहे आप भी वहीं के हैं का?

  “नही भैया जी हम तनिक करीब के हैं, पड़ोसी ही समझो। खैर ई बताओ बबुआ कि ये हवेली किसका है?

  “वही राजा साहब जो अभी अभी घुसे रहे उन्हीं का है?”

   ” अच्छा तो ऊहे राजा साहब का हवेली है। और उनकी मलिका कहाँ है, उसे कहीं और रख छोड़ा है का?”

  ” उ भी तो साथ में थी अभी अभी…”

   ” उनकी रानी भी साथ ही थी?

   शेखर के आश्चर्य का ठिकाना ना था

   ” हाँ भैया जी और क्या? उ जो मेहरून कलर का कुर्ता पहनी रहीं वही तो रानी साहेब हैं।”

   शेखर और रिदान के आश्चर्य का ठिकाना नही था क्योंकि बाँसुरी और निरमा दोनो ने ही इत्तेफाक से मेहरून कुर्तियां पहन रखीं थीं
   बाँसुरी के वहाँ पहुँचते ही उससे मिलने की बेसब्री में निरमा गेट पर ही भागती चली आयी थी। जब तक दोनो सखियां एक दूसरे के गले लगी सुख दुख साझा करती प्रेम भी मीठी को गोद में लिए चला आया था।
   मीठी निरमा प्रेम और राजा में खोई बाँसुरी का ध्यान कुछ दूर ही टैक्सी में बैठे शेखर और रिदान पर गया ही नही ।
    वो सब के साथ मगन भीतर चली गयी। उसे मालूम नही था कि अंदर उसकी सोच से परे कुछ अप्रत्याशित तोहफा उसका इंतजार कर रहा था….

   क्रमशः

   aparna….


   


लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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