जीवनसाथी-83


जीवनसाथी –83



        शेखर और रिदान के आश्चर्य का ठिकाना नही था क्योंकि बाँसुरी और निरमा दोनो ने ही इत्तेफाक से मेहरून कुर्तियां पहन रखीं थीं
   बाँसुरी के वहाँ पहुँचते ही उससे मिलने की बेसब्री में निरमा गेट पर ही भागती चली आयी थी। जब तक दोनो सखियां एक दूसरे के गले लगी सुख दुख साझा करती प्रेम भी मीठी को गोद में लिए चला आया था।
   मीठी निरमा प्रेम और राजा में खोई बाँसुरी का ध्यान कुछ दूर ही टैक्सी में बैठे शेखर और रिदान पर गया ही नही ।
    वो सब के साथ मगन भीतर चली गयी। उसे मालूम नही था कि अंदर उसकी सोच से परे कुछ अप्रत्याशित तोहफा उसका इंतजार कर रहा था….

      बाँसुरी के भीतर पहुंचते ही उसकी नज़र सामने बैठी दादी साहेब पर चली गयी, वो भाग कर उन तक पहुंच तो गयी लेकिन अपने पहनावे जीन्स और कुर्ती के कारण एक पल को संकोच में खड़ी रह गयी..

  ” क्या हुआ दादी सा को भूल गयी क्या आप बाँसुरी !”

   दादी साहेब ने उसे देख अपनी दोनों बाहें उसके लिए खोल दीं।। वो निसंकोच आगे बढ़ उनके पैर छू कर उनके गले से लग गयी…

  ” तो कलक्टरनी बन गईं हैं हमारी बाँसुरी !”

   ” आप के लिए तो आप की बेटी ही हूँ।”

   दादी सा के पैरों के पास रखे मोढ़े पर ही बाँसुरी बैठ गयी।
   राजा भी वहीं दादी साहेब के पास ही बैठ रहा था कि समर कहीं से चला आया…

  ” बाहर कोई दो लड़के हमारे गार्ड से पता नही क्या बात कर रहें हैं?

   राजा ने समर की बात पर उसे सवालिया नज़रों से देखा ही था कि प्रेम बाहर की ओर जाने लगा, समर ने उसे रोक दिया…

   ” रहने दो प्रेम ! मैंने दोनो को अंदर ही बुला लिया है। सीसीटीवी में ये दोनों गार्ड से कुछ पूछताछ करते नज़र आये इसीलिए गार्ड को कॉल कर लिया मैंने।

   समर के बताते में ही शेखर और रिदान भीतर चले आये…

   शेखर और रिदान के जीवन का यह प्रथम ही अनुभव था जब दोनो किसी महल को अंदर से देख पा रहे थे। दोनो की आंखें आश्चर्य से फैलती जा रही थी.. रिदान कुछ डरा सा भी था…

” अबे तेरे चक्कर में कहाँ आकर फंस गया, कहीं वो ठरकी राजा हमें गोली ना मार दे। साले तेरा पता नही पर मैं कुंवारा नही मरना चाहता।”

  ” शादी कर के मरने पर तुझे कौन सा गैलेंट्री अवार्ड मिल जाएगा बे? शादी हिम्मत का काम ज़रूर है लेकिन अभी भी अवार्ड देने वालों को उतना नोटिसेबल नही लगा है।”

” कमीने अभी भी मसखरी सूझ रही है तुझे।”

  दोनों को बाहर खड़े सेवक ने एक बड़े से दीवानखाने के सामने छोड़ दिया, बड़े बड़े मखमली पर्दे हटाये सेवक के एक ओर सरकते ही वो दोनो अंदर बैठे सभी की नज़रों में आ गए, और अंदर बैठे लोगों उन दोनों की।
   शेखर ही झिझकते हूए पहले दाखिल हुआ, उसे देखते ही समर की आंखें कुछ सोचती हुई छोटी हो गयीं…

   ” तुम दोनों को कहीं देखा हैं मैंने।”


   ” मुझे भी लग रहा आपको कहीं देखा है।” शेखर ने सोचा नही था कि समर उसे पहचान लेगा, वो नही जानता था कि सिर्फ उसे ही नही रिदान को भी राजा और समर अच्छे से जानते थे।
   राजा ने मुस्कुरा कर शेखर की तरफ हाथ बढ़ा दिया। राजा के चुम्बकीय व्यक्तित्व का आकर्षण ही ऐसा था कि उसके सामने खड़ा व्यक्ति फिर बहुत देर तक उसके प्रभाव से अछूता नही रह पाता था।
     
   इतनी देर में बाँसुरी भी अपनी जगह से उठ कर राजा और शेखर तक चली आयी….

  ” शेखर रिदान आप दोनों इस वक्त यहाँ क्या कर रहे? आप लोग तो आज लेक पर घूमने जाने वाले थे ना।”
    समर की तरफ घूम बाँसुरी ने उन दोनों का समर से परिचय भी करवा दिया…

  ” ये दोनों मेरे साथ ही लब्सना में ट्रेनिंग में आये हैं ,ये है शेखर जी और ये  रिदान।”

   बाँसुरी अभी ये सब बता ही रही थी कि निरमा आकर बाँसुरी का हाथ पकड़े सबसे माफी मांगती उसे अपने साथ खिंचती ले गयी

   ” अब जाकर पकड़ में आई है। कहाँ थी अब तक? कर क्या रही थी? और ये माजरा क्या है भई जिनसे रूठ कर निकली उन्हीं के साथ यहाँ बरामद हो रही है। ये दुनिया से लुकाछिपी करते हुए प्यार करने से रोमांस बढ़ता है क्या? ”

  ” सांस तो ले ले नीरू !  यहाँ अभी सब हैं , आराम से सब बताती हूँ, थोड़ा तो धैर्य रख।”

” ओह्ह बड़ी आयी धैर्य वाली। इतनी धैर्यवान है तो हम सब से मिले बिना ही अपने राजा जी के साथ यहाँ एक अलग गृहस्थी भी बसा ली”..

   दोनो सहेलियां बातों में लगीं थी कि प्रेम ने किनारे बैठी दोनो को ही आकर टोक दिया कि दोपहर के खाने का वक्त हो चुका है, और दादी साहेब का समय पर खाना पीना दवाएं लेना बहुत ज़रूरी है।
   दादी साहेब के साथ ही सभी खाने के कमरे में चले आये।
   राजा ने इसरार कर शेखर और रिदान को भी बुला लिया था।
   गेट पर पहली नज़र देखने पर शेखर ने निरमा और प्रेम को बाँसुरी का दीदी और जीजा समझ लिया था लेकिन बाद में जब गार्ड ने मेहरून कुर्ती वाली रानी हैं बताया तो उसे निरमा राजा की पत्नी लगने लगीं थी ।
   मीठी को संभाले हुए प्रेम के बारे में वो अभी भी कुछ सही सही सोच पाने में असमर्थ था।

   राजा जितने ही प्यार से बाँसुरी को बैठने बोल रहा था उतने ही आदर से निरमा के साथ भी उसका व्यवहार था।
     तीन तीन पुरुषों के बीच बैठी इन दोनों नारियों को देख समझ पाना की कौन किसकी घरवाली है टेढ़ी खीर थी ।
    वहाँ बैठे किसी भी अन्य के लिए ये जानना कोई बहुत अधिक कठिन नही था लेकिन शेखर ने अपनी आंखों पर एक पट्टी जो चढ़ा रखी थी, इतने दिनों में उसे कभी लगा ही नही की बाँसुरी विवाहित भी हो सकती है।

   खाते पीते हुए भी सब बातों में लगे थे , पर शेखर का पूरा ध्यान बाँसुरी पर ही था, जिसका ध्यान खाने पर कम और निरमा और मीठी पर ज्यादा था।
   अपनी गोद में बैठी मीठी को कभी कुछ चखाती कभी कुछ चटाती बाँसुरी पूरी तरह से मीठी में मगन थी।
    राजपरिवार के नियम इस कदर राजा के खून में घुले थे कि ना चाहते हुए भी महल से बाहर भी उनका पालन हो ही जाता था।
   इसलिए दादी के सामने खाना शुरू होते ही सब बस खाने में ही लग गए।
   सेवक आते जाते और हर बार कोई नई चीज थालियों में परोस जाते, शेखर और रिदान सोच सोच कर ही थके जा रहे थे कि क्या खाएं क्या नही?
    खाना निपटते ही बाँसुरी से भी साथ ही लौटने के लिए पूछ लूंगा सोचता बैठा शेखर खाना खत्म भी नही कर पाया था कि दादी साहेब से अनुमति ले बाँसुरी निरमा को खिंचती अंदर चली गयी।
     शेखर समझ गया कि दोनों बहनों के बीच आज उसकी कोई जगह नही है।
  वो और रिदान वापस लौट रहे थे कि राजा भी उनके साथ साथ बाहर तक चला आया, अपने ड्राइवर को बुला कर उसने दोनो को ही मसूरी तक छोड़ आने कहा और वापस दोनो की ओर मुड़ गया…

  “आज की शाम मसूरी के सवाई में एक छोटा सा गेट टू गेदर है, अगर आप लोग भी आएंगे तो हम सभी को बहुत अच्छा लगेगा।”

   राजा के इतने पास खड़े शेखर की बोलती ही बंद हो गयी थी। राजा के फैले हाथ को अपने हाथों में ले उसने हाँ कहा और गाड़ी की तरफ बढ़ गया…

  “हो सके तो लीना को भी साथ ही ले आईयेगा।”

  ” जी ज़रूर ! आपके मेहमान बन कर हम गौरवान्वित महसूस करेंगे राजा साहब।”

   रिदान की बात खत्म होते ही राजा का इशारा पाकर ड्राइवर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी…

   शेखर और रिदान को कोई बात ही नही सूझ रही थी। कुछ देर को दोनो चुप से बैठे रह गए…

  ” क्या हुआ ? सांप सूंघ गया क्या जो ऐसे सन्न बैठा है?”

  रिदान के पूछने पर शेखर जैसे नींद से जागा

  ” यार दिमाग काम ही नही कर रहा, एक सिगरेट की बहुत जरूरत है, पर चल जाने दे कहीं इस मुये ड्राइवर ने जाकर शिकायत कर दी तो?”

“दिमाग तो मेरा भी काम नही कर रहा ! यार आजकल के ज़माने भी ये राजे महाराजे होतें हैं? मुझे तो पता भी नही था यार। लगता था सब साले मर खप गए होंगे। ये राजा जी कहाँ से उड़ कर चले आये ।”

   रिदान धीमे ही बोल रहा था लेकिन शेखर ने उसे तब भी ड्राइवर की तरफ इशारा किया तो रिदान ने बीच में लगे ग्लास कवर की ओर इशारा कर दिया।

  ” राजा और उनके मंत्री की छोड़ मुझे तो बाँसुरी से अब तक इनका कनेक्शन नही समझ आया। हमारे साथ रहते में तो कभी उसने ऐसा कोई रॉयल एटीट्यूड तो दिखाया नही भाई। हमारे साथ टपरी की चाय पी लेती थी, रुखी सुखी रोटी ऐसे ही रोल करके खा लेती थी। कपड़े गहने भी कहाँ कुछ पहनती थी। पता नही यार क्या माजरा है।
     चल अब शाम को ही शायद कुछ समझ आये,नही आया तो सीधे उसी से पूछ लेंगे।
अरे एक मिनट ये राजा साहब लीना को कैसे जानते हैं ? उन्होंने कैसे आसानी से कह दिया लीना को भी ले आना।”

  “ज्यादा दिमाग मत खपा यार, शाम को देखेंगे।”

     शेखर और रिदान महल से कब निकले बाँसुरी को पता भी नही चला वो तो मीठी के साथ खेलने और निरमा से गप्पे लड़ाने में ही व्यस्त थी।
    महल से निकलने से लेकर मायके पहुंचने और फिर वहां से दिल्ली और अब मसूरी तक का उसका सफर उसने निरमा को बता दिया।
       उसकी मेहनत सी की गई पढ़ाई लिखाई और पायी सफलता के साथ ही उसकी हर सफलता के पीछे हाथ बांधे मुस्कुराता खड़ा राजा कैसे उसे हर अंधेरे रास्ते पर रोशनी की किरण थमाते चला सब सुनाती बाँसुरी की आंखें भीग गयी तो वहीं ये सारा सब सुनती निरमा भी रो पड़ी….

“लोगों से तो यही सुना था कि हर एक सफल आदमी की सफलता के पीछे कोई ना कोई औरत ही होती है,वो चाहे फिर माँ हो बीवी हो या बहन पर यहाँ तो मेरी सफलता के पीछे एक आदमी का हाथ है। सच कह रही निरमा अगर साहेब ने इतना सब नही किया होता तो मैं कभी नही पढ़ पाती।
    मेरी हर परेशानी को मुझसे पहले समझ कर सुल्टा जाते थे और मैं समझ ही नही पाती थी कि ये सब इनका किया है। बस मुझे यही लगता कि भगवान मेरे साथ हैं इसलिए मेरी मुश्किलें हल हो जातीं हैं। जब सिलेबस देख कर सोचा ही था कि तैयारी शुरू करूँ की रतन जी चले आये गाइड करने।
  जब कोचिंग जॉइन करने की सोची तो साहेब ने रतन जी से दिलाई की सारी कोचिंग इंस्टिट्यूट का ब्यौरा भिजवा दिया, फिर पापा से कह कर एडमिशन करवा दिया और अभी ये दो लड़के जो आये थे उनमें से एक को मेरा बॉडी गार्ड बना कर भी भेज दिया। पहले पहल लगता था कि मुश्किलें आते ही हल कैसे हो जाती हैं फिर समझ आ गया मेरा भगवान जो मेरे साथ था, वैसे सही भी तो है मेरे भगवान ही तो हैं साहेब।”

” सही कह रही बंसी! अभी कितना समय और बाकी है तुझे ट्रेनिंग में? “

“अभी तो शुरू हुई है, अभी तो पूरे दो साल लगेंगे। पता नही अब कैसे रह पाऊँगी बिना साहेब के?”

  ” तू यहाँ चैन से रह पाए इसलिए तो तेरे साहेब त्यागपत्र दे रहे अपनी गद्दी से। ”

   बाँसुरी मुस्कुरा कर नीचे खेल रही मीठी की तरफ देखने लगी

   ” हाँ हाँ अब यहाँ मसूरी की वादियों में तुम लोग भी अपना राजकुमार प्लान कर लेना।”

  ” चुप कर नीरू! कुछ भी सूझता है तुझे। अभी दो चार साल बेबी के किये नही सोच सकती। ”

  “सब कहने की बात है। जैसे ही साथ रहने लगोगे न तुम दोनों बाकी दुनिया को भूल जाने वाले हो”

  ” हाँ जैसे तू भूल गयी है सब कुछ अपने प्रेम जी के प्यार में। मेरा भेजा गिफ्ट कैसा लगा ये तक बताया नही।”

  “तेरा नया नम्बर ही नही था बंसी! फिर जिस दिन तेरा गिफ्ट मिला उसके बाद अंकल को फ़ोन कर तेरा नम्बर मांगा था , पर उन्होंने बड़े मीठे शब्दों में ये भी जता दिया कि बिना किसी ज़रूरी काम से तुझे फोन ना करूँ। मुझे ये तो समझ आ गया था कि तू कुछ पढ़ाई में ही लगी है इसलिए अंकल ऐसा गोल गोल घूमा रहे।
अच्छा एक बात बता, मेरी शादी के समय तो तेरा पुराना फोन तेरे पास था न तो उसमें की तस्वीरें तूने मुझे कैसे भेजी?”

  “अरे कोई ज़रूरी है क्या की जब प्यास लगे तभी कुँवा खोदा जाए।मैंने जब तस्वीरे खींची थी तभी अपने मेल में सेव कर रख ली थी। और वो तस्वीर जो तुझे भेजी उसे तो उसी वक्त फ्रेम भी करवा लिया था लेकिन तुझे दे नही पायी थी। फिर जब तेरी पहली एनिवर्सरी आयी तो माँ से कह कर मेरे कमरे में रखी ये तस्वीर कुरियर करवा दी थी बस। उन तस्वीरों में एक हम चारों की भी तस्वीर थी। एक साल पुरानी वो तस्वीर हमेशा मेरे पास रहती है।”


    ” हम्म ! वैसे ये सब तो ठीक है एक बात बता तूने ये हुलिया कैसा बना रखा है।”

   “मतलब ? थोड़ी दुबली लग रही हूं क्या? यार तैयारियों में खाने पीने की तरफ ध्यान ही नही जाता था इसलिए वजन ज़रा कम हो गया लेकिन अब जो सुबह सुबह उठा कर कसरत करवाई जा रही है ना वजन सही हो जाएगा, चिंता न कर।”

  ” नही मैं वो नही कह रही। मेरा मतलब था किसी एंगल से शादीशुदा लग ही नही रही। ना सिंदूर लगाया है तूने न मंगलसूत्र ? ऐसा क्यों? “

  बाँसुरी मुस्कुरा उठी….

” अब क्या बोलूं यार। मैं जब दिल्ली गयी तब वहाँ लोगों की सवालिया नज़रों से बचने के लिए ही मैंने ऐसा कुछ नही पहना जिससे ये मालूम चले कि मैं मैरिड हूँ। क्योंकि लोग एक सवाल पर रुकते कहाँ हैं? अगर आप मैरिड हैं तो पति कौन है? ससुराल कहाँ है? क्या ससुराल वालों की मर्ज़ी से आप पढ़ रही हैं? पति है तो मिलने क्यों नही आता?
    मैं वहाँ पढ़ने गयी थी कोई सामाजिक दायरा बढ़ाने तो गयी नही थी, इसलिए ऐसे ही रहती थी जैसे कोई आम लड़की हूँ। तभी तो मेरे दोस्त मुझसे बिल्कुल आम लोगों की तरह पेश आते थे।
   अब इस बिचारे शेखर को तो शुरू से पता था कि मैं साहेब की पत्नी हूँ लेकिन शायद साहेब के कहने के कारण ही इसने कभी किसी के सामने ये राज़ नही खोला।”

      बातों में लगी दोनो सहेलियों को समय का पता ही नही चला। बीते साल की हर मीठी तीखी बातें बताती निरमा कभी बुझ जाती कभी खिल उठती, यही हाल बाँसुरी का था।
    
   उधर दादी साहेब के आराम करने जाते ही राजा समर और प्रेम भी दूसरे कमरे में चले आये। केसर से हुई बातचीत राजा को बताते हुए समर जैसे किसी गहरी सोच में डूबा हुआ था…
   उसे सोचते देख प्रेम ने उससे सवाल कर दिया..

  ” केसर सा को बहुत गलत समझ लिया था ना हम सब ने। तुम किस सोच में डूबे हो समर?”

  समर ने एक पल प्रेम को देखा और वापस राजा की ओर मुड़ गया…

  ” मुझे नही लगता कि केसर ने कोई सच्ची कहानी सुनाई है। उससे पहले मैंने भी उसे एक कहानी सुनाई थी, जिसके बाद वो काफी हद तक सदमे में थी, उसी रात उसने ज़रूर अपने पार्टनर को भी मेरी सुनाई कहानी कही होगी।
   हम जब भी ऐसी कोई बात कहते या सुनते हैं तो पहली बार में जो प्रभाव पैदा होता है वो अक्सर दूसरी तीसरी बार तक पहुंचते पहुंचते खत्म होने लगता है। इसलिए तो बात का प्रभाव बढ़ाये रखने के लिए लोग अपने आगे जब बात को पहुंचाते हैं तो अपनी तरफ से मिर्च मसाला लगाते चले जाते हैं।
   खैर मुझे लगता है केसर इतने सदमे में थी कि उसने मेरी कही बात वैसे की वैसी ही उस आदमी को कह सुनाई।
   उस आदमी पर मेरी बात का वो प्रभाव नही पड़ा जो केसर पर पड़ा था। बस उसे मेरी बातों के कमजोर पहलू नज़र आने लगे होंगे और उसने इस बात को महसूस कर लिया होगा कि मेरी कहानी नकली है। इसलिए इसने केसर को एक कहानी बनाकर ढ़ी और मुझे सुनाने कहा..

  ” लेकिन तुम्हें कैसे पता कि केसर की कहानी झूठी है।”

  ” क्योंकि प्रेम केसर ने खुद को जैसा पोट्रे किया वैसी कमज़ोर दिल वो है नही। वो शुरू से ही लालची और सत्ता में आने की भूखी रही है। याद है एक बार मैंने तुम्हें एक पुराने से बंद पड़े ऑफिस भेजा था कुछ तस्वीरें खींचने और सबूत जो मिल जाये लेकर आने।”

” वो तस्वीरें आज भी मेरे पास पड़ीं हैं। उनके बारे में बाद में बताऊंगा। अभी बस आप लोग ये जान लीजिए कि केसर की सुनाई कहानी में कुछ थोड़ा सा सच था तो बहुत सारा झूठ भी था। लेकिन उस सब में एक नाम उभर कर आया है वो नाम है अदित्यप्रताप सिंह!
आप जानतें हैं हुकुम ये कौन है?”
 
   राजा की भौंहों में बल पड़ गए दिमाग पर ज़ोर देते हुए वो सोचने लगा…

  ” शायद मेरे साथ पढ़ाई की है इसने।”

  ” जी हुकुम! इसके आपके साथ पढ़ने का उद्देश्य भी शुरू से साफ था कि ये आप से बदला लेना चाहता था।
    आदित्यप्रताप और कोई नही बल्कि ठाकुर साहब की दिवंगत बहन का इकलौता बेटा और रेखा बाई सा का फुफेरा बड़ा भाई है।”

  ” क्या ? ”

  ” जी ! आदित्यप्रताप की माँ और आपके काका साहेब एक दूसरे को पसंद करते थे, पर राजशाही के कुछ नियमों के कारण आपके पिता साहेब ने काकी सा के पिता को पहले ही ज़बान दे रखी थी, इसी कारण वो काका सा का रिश्ता वहाँ करना चाहते थे। आप तो काका साहेब को जानते ही हैं, शुरू से ही कुछ भीरू स्वभाव होने से वो अपने बड़े भाई से कभी अपने बारे में बात नही कर पाए। लेकिन आदित्य की माँ के ज़ोर देने पर उन्होंने उसकी माँ से मंदिर में शादी ज़रूर कर ली।
   लेकिन उसी समय आपकी बड़ी बुआ को आपके पिता महाराज ने सरे आम उनके प्रेमी के साथ मार डाला। इस बात के बाद आपके काका साहेब बहुत डर गए, और आदित्य की माँ से पीछा छुड़ा सकें इसलिए पढ़ाई के बहाने विदेश चले गए।
    लगभग आठ महीने बाद वो वापस अपने बड़े भाई के बहुत बुलाने पर वापस आये तब उन्हें मालूम नही था कि उन्हें शादी के लिए बुलाया जा रहा था।
   उसके बाद काका साहेब की शादी हो गयी।
काका साहेब की शादी की बात सुनते ही आदित्य की माँ ने खूब सारी नींद की गोलियां खा कर अपनी जान लेने की कोशिश की क्योंकि उस वक्त वो आदित्यप्रताप को जन्म देने वाली थीं।
   उनके भाई यानी ठाकुर साहब को उनकी मंदिर में रचाई शादी का भेद मालूम चल चुका था। नाराज़ तो वो भी बहुत थे लेकिन आपकी ऊंची रियासत के खिलाफ खड़े हिने की हिम्मत नही थी इसलिए वो काका साहेब की वापसी का इंतेज़ार करते रहे। पर जब काका साहेब के लौटने का कोई आसार नजर नही आया तब वो महल आपके पिता के पास पहुंच गए।
    उनकी पूछताछ से परेशान होकर उस वक्त तो महाराज ने उन्हें समझा बुझा कर भेज दिया लेकिन तुरंत काका सा को बुला कर काकी सा के घर वालों से सब तय कर दो दिन के भीतर उनके फेरे करवा दिए।
   इधर काका साहेब की शादी की खबर के बाद ठाकुर साहब की बहन ने खुद की जान लेने की कोशिश की जिसमें वो सफल भी रहीं, उन्हें बचाया नही जा सका लेकिन उनके पेट में पल रहा बच्चा बचा लिया गया।

  ” ओह्ह तो ये बच्चा ही अदित्यप्रताप है।”

   ” जी हुकुम! बचपन से उसके मामा ने उसके दिमाग में आपके पूरे परिवार के खिलाफ ज़हर भर कर ही उसे बड़ा किया है।  उसे इसी ढंग से तैयार किया गया कि आपके पूरे वंश को वो समाप्त कर सके।
   महाराज से बदला लेने का उसका यही तरीका है कि उनके बेटों को वो मार डाले , बिना बच्चों के बुढापे में महाराज वैसे ही ज़िंदा लाश….

  समर ने आगे की बात अधूरी छोड़ दी।

  ” लेकिन इस सब में केसर का क्या कनेक्शन है?”

  प्रेम के सवाल पर समर कुछ सोच में डूब गया

   ” ये सारी बातें जो अभी बताईं हैं ये तो सब मैंने इधर उधर से पता कि हैं अब केसर का कनेक्शन निकालना पड़ेगा कि क्या है।
    बाकी ये तो हमें पहले ही पता चल गया था कि ठाकुर साहब यानी  रेखा बाई सा के पिता ही आपके ऊपर हुए हमलों के पीछे थे।
   आप पर बनारस में जो गोली चली थी उसके पीछे यही आदित्य था।
   ठाकुर साहब की बस एक बात समझ नही आ रही कि जब वो आपके पूरे खानदान से बदला लेना चाहतें हैं तो अपनी बेटी की शादी उन्होंने विराज से कैसे करवा दी।
   विराज से पहले तो आपसे करवाना चाह रहे थे।
      इन सब बातों की तह तक अभी पहुंचना बाकी है हुकुम, लेकिन जल्दी ही सारे राज़ आपके सामने होंगे । ”

  ” हाँ समर ! अब जल्दी ही सारे राज़ खुलेंगे। वैसे मैंने सोचा भी लिया है कि यहाँ से वापस लौटते ही विराज को गद्दी सौंप कर किनारे हो जाना है।”

  ” हुकुम ये कहिये की अस्थायी तौर पर आप विराज को कुछ समय के लिए गद्दी दे रहें हैं।”

  ” ऐसा नही है समर अगर वो सही ढंग से सब चला सका तो इससे बढ़ कर मेरे खुशी की दूसरी कोई बात नही होगी, फिर उसे समझाइश देने के लिए तुम और युवराज भैया दोनो उसके साथ हो। क्यों प्रेम? “

  “मैं तो कम बुद्धि हूँ हुकुम लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि एक दिन विराज गिरता पड़ता खुद आप के चरणों में आकर आपको गद्दी सौंप जाएगा।”

  ” सही कहा तुमने प्रेम ! आपकी ये इच्छा भी सर आंखों पर।
   अब विराज की ऐसी मदद की जाएगी कि वो गद्दी और राज्य में ही रमा रह जायेगा। बाकी किसी दुर्व्यसन की तरफ बेचारा देख भी न पायेगा।”

  ” अरे समर मेरे ऑफिशियल एकाउंट पर अदिति का मेल आया था, मैंने पढ़ लिया था। तुमसे उस बारे में जो कहा था वो कर दिया था ना।”

“जी हुकुम ! आपके कहे अनुसार सब करवा दिया था। लेकिन ये अदिति है कौन? “

   समर के सवाल पर राज को भास्कर और अदिति की अतरंगी जोड़ी याद आ गयी।
   भगवान भी जोड़ियां चुन कर ही बनाते हैं। जैसे उसकी और बाँसुरी की जोड़ी जैसे भास्कर और अदिति की!

    *********


सिंगापुर में भी अदिति का अपना औरतों का अच्छा खासा सर्कल बन गया था। उन लोगों ने सिंगापुर को भी दिल्ली बना डाला था, उनकी थीम किटी वहाँ भी चल निकली थी और तो और एक आध सिंगपोरियन भी उनकी किट्टी का हिस्सा बन चुकी थी।
    शनिवार की शाम थी और अदिति अपनी ऐसी ही किसी पार्टी के लिए तैयार हो रही थी…

  “अदिति ड्रेस कुछ ज्यादा छोटी नही लग रही?”

  घुटनों से ज़रा ऊपर को जाती ड्रेस देख भास्कर के अंदर का हिंदुस्तानी पति करवट ले बैठा

  ” नही तो! ”

  अदिति ने बेफिक्री से उसकी बात उड़ा दी

  ” कुछ जीन्स विंस डाल लो यार ठंड़ भी है।”

  ” ओह्ह प्लीज़ भास्कर! वरसाचे की फ्लोरल ड्रेस के नीचे डेनिम पहन के मैं फैशन डिसास्टर नही बनना चाहती यार। कम ऑन!

   आईने के सामने तैयार होती अदिति ने पलट कर भास्कर को देखा , वो पलंग पर अधलेटा मोबाइल हाथ में लिए उसे ही देख रहा था

  ” क्या वाकई छोटी लग रही। तुम तो जानते ही हो न हमारे ग्रुप में अब कई चिंकी गर्ल्स भी एड हो गयी हैं और उनका क्लोथिंग तो ऐसा ही होता है , फिर मैं कुछ ऑड वन आउट नही बनना चाहती वहाँ। अंडरस्टैंड नो।”

  ” हम्म ! अदिति सुनो कुछ पैसे ही डाल दो यार ।”

  अदिति लगभग चीख पड़ी –“नो !! नेवर ! ये क्या बेवकूफाना लत लगा ली है तुमने। जब देखो तब कभी प्ले रमी, कभी माईनक्राफ्ट कभी जी टी ए 5 ! क्या करूँ यार तुम्हारा मैं? बच्चों के समान वीडियो गेम्स में पैसे उड़ा डालते हो। कभी ये तो हुआ नही की गोल्ड का दाम गिरा है चलो बेबी कुछ दिलवा दूं उल्टा सारे पैसे इन फ़िज़ूल गेम्स में उड़ाते हो।”

  “तुम उड़ाने ही कहाँ देती हो। अभी बस एक हज़ार डाल दो कसम से जीते पैसे मुहँ पे मारूंगा। सोचो न यार तुम भी पार्टी करने जा रही हो मैं अकेले सडूँगा घर में।”

   ” वो तो अच्छा किया कि तुम्हारे सैलरी एकाउंट से ये एकाउंट जोड़ने नही दिया तुम्हें वरना तो मेरा घर चलाना मुश्किल हो जाता। सारा घर फूंक देते तुम अपने इन घटिया वीडियो गेम्स के चक्कर में।
    मुझे तो ये गेम डेवलपर मिल बस जाए सीधे उसके भेजे में गोली मारूंगी।  कम्बख़्त ने बच्चों की जनरेशन तो खराब करी ही है बच्चों के बापों को भी नही छोड़ा। श्रीजा के हसबैंड को तो ऐसी लत लगी है कि ऑफ़स से घर पहुंचने के बाद भी बीवी क्या कर रही उसे कोई लेना देना नही बस मैं और मेरा फ़ोन।  उस दिन बेचारी रसोई में खाना बना रही थी, बच्चे को वहीं बाहर मनीष के पास छोड़ कर गयी थी अब मनीष जी तो बीच बीच में अपने गेम में भिड़ जाते थे बच्चे ने खेलते खेलते एक छोटी बॉल मुहँ में रख ली थी, वो तो वक्त पर नज़र आ गयी कहीं बच्चा निगल जाता तो लेने के देने पड़ जाते।”

  “किसकी नज़र पड़ी? “

  “ऑफकोर्स मनीष की। वही तो वहाँ था।”

  ” अरे तो टाइम पर देख तो लिया ना यार, फिर क्या समस्या है?

  ” यही तो ! और अगर मान लो नही देख पाता तो ? जब समस्या खड़ी हो जाए तभी आप उसका समाधान खोजते हैं श्रीमान जी हम औरतें समस्या से पहले समाधान खोज लेती हैं। खर्च करने से पहले कमा लेती हैं। उड़ाने से पहले…

  ”  अरे बस बस अब इतना भी नही उड़ा देता हूँ यार। प्ले रमि तो एक आध बार जीता भी है।

” हाँ क्यों नही पांच हज़ार उड़ा के पचास रुपये जीते थे आपने हुज़ूर।”

” जीते तो थे ना। जीत मायने रखती है बेगम रुपये नही।”

   ” मेरे लिए तो फिलहाल मायने रखता है कि मैं पार्टी से वापस आऊँ और तुम मेरे मुहँ पर गेम से जीते हुए पैसे फेंक के मारो। मारोगे ना प्लीज़।

   मुस्कुरा के अदिति ने भास्कर को देखा और मोबाइल से कुछ पैसे भास्कर के मोबाइल पर ट्रांसफर कर दिए।

   ” मैडम जितने पैसे दे रही हो ना उसे ब्याज के साथ मारूंगा।”

   हंसते हुए अदिति अपना बैग उठाये बाहर निकल गयी और भास्कर अपने मोबाइल पर लग गया।

    *******

     शाम के वक्त सवाई में एक छोटी सी पार्टी राजा के जन्मदिन के लिए समर ने पहले ही तय कर रखी थी।
बाहर के कुछ एक खास चुने हुए मित्रों के अलावा सिर्फ घर के लोग ही थे।
     सभी लोग दून वाली हवेली से सवाई पहुंच चुके थे। मेहमानों का आना भी शुरू हो चुका था।
   शेखर रिदान के साथ लीना भी चली आयी…
       इतने बड़े बड़े लोगों के बीच वो तीनों अपनी सखी बाँसुरी को ढूंढ रहे थे…
    समर और बाकी लोग यही चाहते थे कि शानदार तरीके से नाम पुकारे जाने के बाद राजा अजातशत्रु परिसर में प्रवेश करें लेकिन राजा को वैसे भी ये सारा तामझम पसंद नही था इसीलिए मेहमानों को भी पार्टी का कारण नही बताया गया था।
   भीड़ भाड़ के बीच ही , राजा बाँसुरी का हाथ थामे चला आया… उसने पहले ही समर और प्रेम से कह दिया था  ” केक किसी हाल में नही काटूंगा”
      राजा जी की सादगी पर महारानी बाँसुरी का इतने दिन बाद किया सिंगार भी भारी नही पड़ रहा था, दोनों ही एक दूसरे के साथ एक दूसरे के पूरक लग रहे थे…
   सभी मेहमानों से मिलते जुलते राजा और बाँसुरी शेखर और लीना तक पहुंच ही गए। लीना को देखते ही बाँसुरी खुशी से उसके गले से लग गयी…

  ” सुबह से तुझे मिस कर रही थी। सवेरे बड़ी जल्दी निकल गयी थी ना मैं?”

   लीना ने बाँसुरी से मिलने के बाद बड़े अदब से राजा को भी नमस्ते किया और बाँसुरी से बातें करने लगी । राजा शेखर और रिदान की तरफ घूम गया…

  “मेरे एक बार कहने पर आप लोग यहाँ चले आये उसके लिए आपका बहुत आभार!”

शेखर के मन में राजा और बाँसुरी को साथ देख के खटका सा तो उठने लगा था लेकिन कैसे पूछूं इसी सोच में था कि राजा आगे बोलने लगा

  ” आप ने जिस तरह से हमारी हुकुम की सहायता की है, उसके लिए आभार के शब्द बहुत छोटे हैं!”

   शेखर बड़ी कठिनता से मुस्कुराने की कोशिश कर ही रहा था कि बाँसुरी भी उन्हीं की तरफ घूम गयी..

  ” और आपने साथ ना रहते हुए भी जिस तरह छाया की तरह सदा मेरा ध्यान रखा उसका क्या साहेब? मैं कैसे आभार करूँ। फिर आप कहेंगे मैं तो पति हूँ तुम्हारा , मेरा तो फ़र्ज़ बनता है। है ना? लेकिन तब भी, आज मैं जहाँ तक पहुंच पाई  हूँ, उसमें मेरी मेहनत से कहीं अधिक आपके जज़्बे का हाथ है।
    बाँसुरी अपनी बात पूरी कर शेखर की तरफ घूम गयी…

  ” और आप सभी का भी। अगर आप तीनों नही होते तो मेरी पढ़ाई बहुत मुश्किल हो जाती। सिर्फ पढ़ने के लिए नोट्स ही नही दिए आपने प्रेरणा भी बहुत दी है शेखर जी, वरना तो मेरे लिए मेरी साहेब को छोड़ कर अकेले रहना और पढना बहुत मुश्किल था”

  बाँसुरी की बात पर रिदान चौक कर उसे देखने लगा

  ” साहेब मतलब ?  राजा साहेब तुम्हारे यानी आपके हसबैंड हैं क्या?”

  हड़बड़ाती सी अटकी हुई आवाज़ में उसने अपनी बात पूरी की।

   हाँ में सर हिलाती बाँसुरी मुस्कुरा कर उन्हें देखती रही

  “मतलब तुम सॉरी आप रानी बाँसुरी हैं?”

  बाँसुरी के हाँ कहते ही वो आंखे फाड़े उसे देखता रहा और राजा ने मुस्कुरा कर बाँसुरी का हाथ थाम लिया

  ” हाँ ये हमारी रानी साहेब है ! रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह!!….


  क्रमशः

aparna….


  
  
    
 
  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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