जीवनसाथी – 84

जीवन साथी –84



बाँसुरी की बात पर रिदान चौक कर उसे देखने लगा

  ” साहेब मतलब ?  राजा साहेब तुम्हारे यानी आपके हसबैंड हैं क्या?”

  हड़बड़ाती सी अटकी हुई आवाज़ में उसने अपनी बात पूरी की।

   हाँ में सर हिलाती बाँसुरी मुस्कुरा कर उन्हें देखती रही

  “मतलब तुम सॉरी आप रानी बाँसुरी हैं?”

  बाँसुरी के हाँ कहते ही वो आंखे फाड़े उसे देखता रहा और राजा ने मुस्कुरा कर बाँसुरी का हाथ थाम लिया

  ” हाँ ये हमारी रानी साहेब है ! रानी बाँसुरी अजातशत्रु सिंह!!….

  छन्न से कहीं कुछ टूटा लेकिन आवाज़ किसी के कानों तक नही पहुंची…

  रिदान दुखी था परेशान था हैरान था लेकिन सबसे अधिक त्रस्त वो शेखर को सामान्य देख कर था।
   उससे कहीं अधिक झटका तो शेखर को लगा होगा फिर ये बंदा इतना सामान्य कैसे बना हुआ था। बाँसुरी से हँसता बोलता , लीना को पहले की तरह छेड़ता खाने पीने में मगन कैसे था?
   रिदान से वहाँ एक निवाला भी खाया नही गया और वो एक किनारे चुपचाप बैठे कभी शेखर कभी बाँसुरी तो कभी बाँसुरी के राजा अजातशत्रु जी को देखता रहा।
   वैसे राजा रानी की इस जादुई जोड़ी को देखने के बाद ये तो जाहिर था कि इनके परस्पर प्रेम के बीच कोई नही आ सकता। जिस ढंग से राजा जी कदम कदम पर अपनी रानी का ध्यान रख रहे थे वैसे प्यार को देखना भी एक अद्भुत अनुभव था।

   पार्टी निपटने में वक्त था , शेखर रिदान और लीना बाँसुरी और राजा से मिल कर जाने के इरादे से उन तक पहुंच गए…

  ” साहेब ! अब मैं भी निकल ही जाती हूँ। और रात करने का क्या मतलब । कल सुबह से फिर ट्रेनिंग शुरू भी हो जाएगी।”

  ” क्यों अभी से निकल कर क्या करोगी? सुबह चली जाना।”

   राजा ने आंखों ही आंखों में बाँसुरी से रुकने की ऐसी गुज़ारिश करी की हुकुम के लिए मना करना मुश्किल होने लगा।
   दोनो को एक दूसरे की आंखों में झांकते देख शेखर वहाँ से बाहर निकल गया।
   एक बार फिर राजा साहब को प्रणाम कर रिदान भी शेखर के पीछे भाग खड़ा हुआ, लीना भी निकल रही थी कि समर ने उसे रोक लिया…

  ” किसी से कहा तो नही ना लीना?”

  “नही समर सर डोंट वरी। मुझे तो लगता है आपकी हुकुम भी अब तक नही समझ पायी की मैं ही उनकी बॉडीगार्ड हूँ।

  “हम्म  तुम्हारी भी सुरक्षा की बात है आखिर, । वैसे बहुत अच्छा काम रहा तुम्हारा लीना। ”

  ” क्या सर? ट्रेनिंग तो सारी आप लोगों की ही दिलवाई हुई थी। मैं तो स्पोर्ट्स कोटे के चक्कर में थी कि शायद कोई पोस्ट मिल जाये पर आपके हुकम ने और आपने मेरी ज़िंदगी ही चमका दी। मेरी तैयारी , इंस्टिट्यूट की फीस के साथ साथ मेरे रहने खाने का ही खर्चा नही किया बल्कि मेरे घर भी हर महीने रकम भेजते रहे। मैंने तो कभी सोचा भी नही था कि मैं यहाँ सेलेक्ट हो पाऊँगी, लेकिन आपके मुझ पर विश्वास ने मेरे खुद पर के अविश्वास को झुठला दिया। आप ग्रेट हो सर ।”

  ” अरे बस बस इतनी तारीफ हज़म नही होती मुझे। और कहीं ज़्यादा तारीफ से नज़र ना लग जाये ।”

  समर ज़ोर से हँस पड़ा, मुस्कुरा कर उससे विदा लिए वो भी अपने दोस्तों की तरफ बढ़ गयी।
   राजा साहब की गाड़ी तीनों को ही उनकी एकेडमी पर उतार कर चली आयी।
  रास्ते भर तीनो चुप बैठे रहे। रिदान और लीना की शेखर से कुछ कहने की हिम्मत नही हो रही थी।
   गेट पर शेखर हल्का सा लड़खड़ा गया कि रिदान ने उसे थाम लिया

  ” भाई एक सिगरेट पी ले, थोड़ा राहत मिल जाएगी।”

  ” नही यार! अब जब फूंकने के लिए कलेजा ही नही बचा तो सिगरेट से क्या जलाऊंगा?”

  अपनी लाल लाल आंखे लीना और रिदान से छिपाता शेखर अपने कमरे में चला गया, रिदान उसके पीछे जा रहा था कि लीना ने उसे रोक लिया…

  “उसे अकेले रहने दे रिदान! वो खुद संभल जाएगा। जो लोग इतना ज्यादा हँसते मुस्कुराते हैं ना वो सिर्फ अपनी हंसी ही दुनिया से बाँटना चाहतें हैं ऑंसू नही।
इनके आँसू इनके लिए निहायत ही निजी मामला हो जाता है, आज तक वो बाँसुरी के नाम से हर मज़ाक कर जाता था लेकिन देख लेना वो बाँसुरी के नाम से कभी हमारे सामने नही रोयेगा… बहुत मजबूत है वो इतनी आसानी से नही टूटेगा। और जो टूट भी गया तो दिखायेगा नही।”

  रिदान परेशान हाल अपने कमरे की ओर बढ़ गया, उसके जाने के बाद लीना भी अपने कमरे की ओर बढ़ चली।
      उन लोगों के पार्टी से निकलते ही बाँसुरी निरमा के पास पहुंच गई….

  “मन भर कर बात करने पर भी मन नही भरा ना । कितना अच्छा लग रहा है आप सब से मिल कर मैं क्या कहूँ? मैं जब भी सोचतीं हूँ साहेब के लिए कुछ स्पेशल करना है ये उसके पहले ही मुझे उससे बढ़ कर सरप्राइज़ दे डालते हैं। ”

  बाँसुरी की बात सुन निरमा मुस्कुरा उठी, दादी साहेब ने बाँसुरी को अपने पास ही बैठा लिया

  ” महल आपका इंतजार कर रहा है बाँसुरी ! अब वापस भी आ जाओ।”

  ” दादी साहेब अब जब यहाँ तक का रास्ता तय कर ही लिया तो ये ज़रा सा और जो बचा है उसे भी कर ही लेती हूँ। मैं तो सदा से ही आपकी हूँ और ज़िन्दगी भर रहूंगी । मुझे भी वापस लौटने की बहुत जल्दी है, मैं खुद मेरा कमरा, मेरा बिस्तर मेरे साहेब सबको बहुत मिस करती हूँ।”

  जल्दबाजी में बाँसुरी बोल तो गयी लेकिन जब निरमा के चेहरे पर खेलती शरारत भरी मुस्कान देखी तो अपनी बेवकूफी समझ झेम्प कर रह गयी…
   तब तक मेहमानों को निपटाते हुए राजा भी वहाँ पहुंच चुका था। उसके हाव भाव यही दर्शा रहे थे कि आज बाँसुरी को वहीं रुक जाना चाहिए…

  ” दादी साहेब चलिए अब वापस चलतें हैं आपके लिए बड़ी देर हो गयी, तुम भी तो हमारे साथ दून चल रही हो ना?”

  बाँसुरी की तरफ देखता राजा पूछ बैठा

  ” नही आप लोग जाते जाते मुझे एकेडमी में उतार दीजिएगा, अभी यहाँ से दून पहुंच भी नही पाऊँगी की लौटने का वक्त हो जाएगा।।”

   दादी साहेब का हाथ थामे निरमा कुछ आगे निकल गयी, बाँसुरी उन तक जा ही रही थी कि राजा ने उसका हाथ पकड़ पीछे रोक लिया…
 
  ” जब रात रुकना ही नही था तो फिर दिन भर आप निरमा के कमरे में क्या कर रहीं थीं?”

  बाँसुरी पलट कर राजा को देखने लगी

  ” साल भर बाद मिली हूँ अपनी प्यारी सहेली से और उसकी प्यारी सी गुड़िया से । ऐसे कैसे छोड़ देती भला । बल्कि हमारी तो बातें भी खत्म नही हो पायीं।”

” अच्छा जी और यहाँ आपका पति जो मारा मारा फिर रहा है उसकी कोई कदर नही!”

  ” समझिए ना राजा साहब। देहरादून जाने आने में ही पूरा वक्त निकल जायेगा।”

  ” तो हम दोनों दून नही जाते, हम यहीं सवाई में रुक जातें हैं, सुबह आपको यहाँ से एकेडमी ड्राप कर के वापस निकल जाऊंगा।”

  बाँसुरी ने शरमा कर आंखें झुका ली..

  “अब क्या हुआ?”

  ” सब लोग क्या सोचेंगे।”

  ” अरे क्या सोचेंगे? बीवी हो मेरी आखिर! ”

  “हां लेकिन…. नही साहेब जाना ही होगा मुझे।”

  ” पक्का?”

  हां में सर हिलाती बाँसुरी मुस्कुरा उठी, परदे की ओट में राजा ने उसे गले से लगा लिया…

  ” कल वापस लौट जाऊंगा। तुम अपना ध्यान रखना ,अभी कुछ दिन प्रेम और निरमा दादी साहेब के साथ यहाँ रुकेंगे “

  ” तो तुम क्यों लौट रहे इतनी जल्दी? रुक जाओ ना!”

  “नही रुक सकता, काम है। दस बारह दिन बाद दादी साहेब को लेने आऊंगा तब मिलने आऊंगा ना।”

  बाँसुरी का माथा चूम कर राजा ने उसे खुद से अलग किया और दोनो बाहर निकल गए।

   बाहर सभी की गाड़ियां एक दूसरे के पीछे कतार बनाती निकल गईं, तभी बाँसुरी ने ड्राइवर को रोका और राजा की ओर मुड़ गयी..

  “अब चलो अंदर वापस..!”

  “क्या हुआ तुम एकेडमी नही जा रही”

  ना में सर हिलाती बाँसुरी ने राजा का हाथ पकड़ा और गाड़ी का दरवाजा खोल बाहर निकल आयी।
उसका हाथ थामे वो उसके साथ लिफ्ट में दाखिल हो गयी, राजा का एक कमरा जो हमेशा बुक ही रहता था में जाने के लिए राजा ने फ्लोर का बटन दबाया की बांसुरी ने सबसे ऊपर टेरेस पर जाने का बटन दबा दिया।
    टेरेस पर लिफ्ट के खुलते ही सामने ऑर्किड के फूल बिछे थे, राजा उन्हें देखता आश्चर्य में डूबा जा रहा था कि बाँसुरी उसका हाथ थामे उसे आगे ले गयी।
    सामने खुली छत के बीचों बीच एक गोल टेबल सजा था जिसपर एक ग्लोब के जैसा पिनाटा केक रखा था, पास ही एक खूबसूरत सा हैमर रखा था।
   पास ही लंबा चौड़ा सा बुके और चॉकलेट्स रखी थी।

   राजा ने बाँसुरी की तरफ देखा…

  ” तो मुझसे झूठ कहा जा रहा था कि जल्दी जाना है , वापस जाना है, लोग क्या कहेंगे वगैरह वगैरह..!

  “तो और क्या करती? इतना कम समय दिया आपने सरप्राइज़ प्लान करने के लिए, इसी बीच निरमा को भी पटाना पड़ा कि वो दादी सा को अपने साथ लेकर आगे निकल जाए। ”

  ” निरमा को पटाने में क्या दिक्कत?”

  ” हाँ उसे नही लेकिन प्रेम भैया को इस बात के लिए मनाना बहुत मुश्किल था। वो आपको अकेला छोड़ना ही नही चाहते। मैंने कहा प्लीज़ आज के लिए बस अपने हुकुम मुझे दे दीजिए…”

  ” तुमने ऐसे हाथ जोड़ कर कहा?”

  ” हाँ और क्या? आपके लिए तो मैं पूरी दुनिया के पैर में गिर जाऊँ। ”

  राजा के हाथों को चूम बाँसुरी उसे आगे टेबल तक ले गयी

  ” ये क्या हथौड़ी ? ये केक काटने का कौन सा नया। तरीका ढूंढ लिया आपने हुकुम?

  ” राजा साहब एक छोटी सी छुरी से केक काटे ये अच्छा नही लगता , ये केक दुनिया है और ये हथौड़ी आपकी मर्जी है आप अपने हिसाब से आज रूल कीजिये हुकुम।”

  राजा ने हथौड़ी से दो तीन हल्के वार किए और केक की ऊपरी चॉकलेट कवर टूट गयी, उसके अंदर छोटी छोटी सुनहरी चॉकलेट्स के बीच एक छोटी सी गिटार की शेप का केक रखा था ।
     राजा के केक काटते ही बाँसुरी ने टेबल के नीचे छिपा कर रखी गिटार निकाल कर राजा के सामने कर दी। जिसे देखते ही राजा के चेहरे पर एक मुस्कान चली आयी….

  ” गिब्सन !! इतनी महंगी गिटार क्यों ली? पैसे थे तुम्हारे पास?”

” जी हाँ ! मेरा महीने का खर्च बहुत कम था और आप पापा से बोल कर मुझे तीन गुना ज्यादा पैसे भिजवाया करते थे। अभी भी बहुत पैसे पड़े हैं एकाउंट में साहेब!”

   राजा मुस्कुराते हुए गिटार ट्यून करने लगा …

  ” क्या सुनाओगे?”

  ” जो तुम कहो। तुम कहो तो रात भर अंताक्षरी खेलता रहूँ तुम्हारे सामने..”

   “पर मेरा तो रात भर गाने का मूड नही है।”

  बाँसुरी की शरारती आंखें देख राजा उसके और पास खिसक आया

  ” फिर क्या मूड है हुकुम का?”

   ” इतने दिन बाद शिकार सामने आएगा तो शेरनी का क्या मूड होगा सोच लो।”

  राजा अपनी जगह से तुरंत खड़ा हो गया__

  ” तो चलो फिर..!”

  ” कहाँ चले?”

  ” कमरे में ।”

  ” कहीं जाने की ज़रूरत नही है राजा साहब!! आज ये पूरी छत ये खुला आसमान ये चाँद ये सितारे सब आपके लिए बुक कर रखे हैं। आज यहीं प्यार बरसा लो अपनी हुकुम पर !”

   राजा ने बाँसुरी को देखा …

  “गज़ब क्लासी है मेरी हुकुम ! ”

  ” आप कौन सा कम है ? आप की क्लास के सामने सब फीका है, अपनी जान भी दे दूं ना तो वो भी कम ही होगी…

   बाँसुरी अपनी ही रौ में बोलती चली जा रही थी कि राजा उस पर झुकता चला गया…. और वो चुप हो गयी

   ******


  ट्रेनिंग वापस शुरू हो चुकी थी। लीना और रिदान बाँसुरी के सामने शेखर के साथ बिल्कुल सामान्य रहा करते पर वो दोनो शेखर की हालत समझते थे, उस शाम भी लीना और रिदान बैठे चाय पी रहे थे , शेखर एकेडमिक के बाद अपने कमरे में चला गया था, बाँसुरी भी कमरे में ही थी।

” यार लीना एक आइडिया आया है।”

” बोल।”

“यार तू ना शेखर की गर्लफ्रैंड बन जा, उसे थोड़ा सहारा हो जाएगा।”

  ” रिदान सीरियसली एक बात बोलूँ?”

  ” मैं जानता था तुझे आइडिया पसंद आएगा।”

  रिदान मुस्कुरा कर अपने बालों पर हाथ फिराने लगा

  ” अबे सुन तो ले, मैं सोच रही थी तू  गधा ज्यादा बड़ा है या उल्लू।”

  उनकी बातों के बीच शेखर भी अपनी चाय का कप थामे चला आया

  ” क्या हो गया? तुम दोनों सांप और नेवले का झगड़ा फिर शुरू।”

  ” अबे यार मैं तो बिना मतलब का कैरेक्टर आर्टिस्ट बन के रह गया हूँ।”

  रिदान की बात पर शेखर ने उसे देख कर क्यों इशारे से ही पूछ लिया..

” अब और क्या। मेरे सगे दोस्त को एक शादीशुदा लड़की से प्यार हो गया और उसका दिल टूट गया अब वो शायर बदनाम हो गया हीरो और मैं बन गया उसके पीछे घूमने वाला ज़ीरो।”


” अरे नही भाई! तू तो सबसे बड़ा हीरो है और मैं कोई बदनाम शायर नही बना हूँ। समझे!!! मैं बिल्कुल ठीक हूँ। यार ये कोई मूवी थोड़े ना है कि मैं पी पिला कर खुद को खत्म कर दूं। सीधी सी बात है जिसे हमने चाहा उसकी जिंदगी में तो पहले से ही कोई और था, तो ये तो मुझे भगवान ने ही फेयर चांस नही दिया ना! अब किसी और से क्या शिकवा गिला।
    लेकिन एक बात पक्की है अगर मैं पहले मिला होता ना तो आज वो मिसेस सिंह की जगह मिसेस मिश्रा होती ।
  खैर जो बीत गयी सो बात गयी…

  ” कौन सी बात तुम लोगों ने मुझे बिना बताए ही बिता दी?”

  अब तक बाँसुरी भी चली आयी उसे देखते ही सब हंसते मुस्कुराते बातों को घुमाने में लग गए….

  ” क्या बात है शेखर जी आजकल आप ज़रा सीरियस से हो गए हो ? क्या बात है? “

  ” सीरियस तो शुरू से ही था, आपको नज़र ही नही आया?”

  ” मतलब ?”  बाँसुरी की बात पर शेखर ने पता नही कहा और वहाँ से उठ कर जाने लगा

    ” इसे क्या हो गया लीना ? कोई प्रॉब्लम है? “

   “पागल है यार ये, तू इसे छोड़ ये बता अब कब आ रहे तेरे राजा जी?”

  ” पता नही! वहाँ महल में अभी विराज के राज्याभिषेक की तैयारियां चल रहीं है। यहाँ से तो साहेब यही सोच कर गए थे कि तुरंत उसे गद्दी पर बैठा कर आ जाएंगे लेकिन राजपुरोहित ने सुदिन ही महीने भर बाद का निकाल दिया।
   कल का मुहूर्त है , अब ये सब निपटाने के बाद ही उनका इधर आना हो पायेगा।
   निरमा और प्रेम भैया भी दादी साहेब को लेकर वापस लौट गए।
  तुम तीनों नही होते तो मेरा तो मन ही नही लगता यहाँ।”

  ” हाँ मैं समझ सकती हूँ, भरे पूरे परिवार को छोड़ कर रहना बड़ा मुश्किल हो जाता है। अच्छा सुन कल छुट्टी है तो ज़रा मार्केट चलेंगे क्या? अगले हफ्ते हमारा संसद भवन पार्लियामेंट  टूर है और मैं बहुत ज़्यादा उत्सुक हूँ। यार अब सच में महसूस होने लगा है कि हम इतने बड़े गणतंत्र को संभालने की ट्रेनिंग ले रहे हैं, है ना? तुझे नही लगता ये कितना एक्ससाइटिंग होगा , इतने बड़े संसद भवन में जहाँ किसी भी आम इंसान का घुसना मना है वहाँ इतने सारे एम एल ए और नेताओं के बीच हम शान से अपनी ब्लेज़र में चमकते हुए जाएंगे।
   रियली मज़ा आ जायेगा , है ना।”

  हाँ में सर हिलाती बाँसुरी अपने हाथ में पकड़े कप को देखती कुछ सोचती बैठी रही।

  *******

   महल में जब से ये बात राजा ने कही थी कि वो विराज को गद्दी देना चाहता है सभी महलवासियों के दिमाग में अलग अलग कहानियां घूम रहीं थीं।
  कोई इस बात से नाराज़ था तो कोई बहुत नाराज था लेकिन कोई ऐसा भी था जो खुश था लेकिन घबराहट के साथ।
   रानी माँ खुश थी ,बहुत खुश!! क्योंकि आज उनका ज़िन्दगी भर का सपना पूरा जो होने जा रहा था।

    उनकी पटरानी बनने की इच्छा सिर्फ इच्छा ही रह गयी थी, सारे जोड़ तोड़ करने पर भी। पहली रानी के गुज़र जाने  के बाद  भी उन्हें हमेशा छोटी रानी का ही दर्जा मिला। महाराज जी अपने समय में क्रूरता की हद तक क्रूर और गुस्से वाले थे। उनके गुस्से ने उनकी बड़ी बहन ही कि जान नही ली जाने कितनों को मौत के घाट  उतारा था।
उस वक्त अपने तेज़ स्वभाव और गर्मी के कारण उन्होंने ऐसे ही ना जाने कितने दुश्मन पाल लिए थे। उस पर भी अकड़ ऐसी थी कि कभी किसी के सामने ना झुके ना हाथ फैलाया। आधा तो उनके गुस्से से डर कर ही रानी साहेब ने विराज को राजा बनाने की बात कभी सीधे से उनके सामने नही कहीं। क्योंकि कुछ भी हो युवराज और राजा उनकी पहली पत्नी की संताने थी, उन बच्चों ने ही सबसे पहले उन्हें पिता होने का दर्जा दिलाया था ऐसे में अपने बच्चों के लिए फरियाद नही की गई रानी साहेब से।
     लेकिन अब जब महाराज के बेटे राजा को अपनी पसंद से जाति से बाहर जाकर विवाह करना था उस समय उनका सारा अभिमान सारा गुस्सा व्यर्थ हो गया। इतनी आसानी से वो अजातशत्रु की बात सुन कर मान लेंगे ये रानी साहेब ने सपने में भी नही सोचा था।
   अब कहाँ गया वो तेज़ वो अकड़ वो निर्भीकता?

  क्या एक बूढ़ा और अशक्त राजा अपने ही जवान बेटों से डरने लगता है?
        की कहीं समय रहते उनके हाथों सत्ता नही सौंपी तो कहीं अपने ही पिता को कटार के दर्शन ना करा दें? बात जो भी रही हो लेकिन राजा जी की इन्हीं सब बातों ने रानी माँ के मन में राजा और उसकी पत्नी के लिए हल्की सी कड़वाहट ले आयी थी।
    और उसी कड़वाहट में वो जाने कितनी बार राजा के साथ साथ बाँसुरी का भी दिल दुखाती चली गईं थीं।
    शुरू शुरू में बाँसुरी पर चलाये हल्के फुल्के व्यंग बाण उनकी आदत में शुमार होने लगे थे। उसे रुला कर उन्हें खुशी मिलने लगी थी।
   औरत का मन भी बड़ा अजीब होता है। बहुत बार वो अपने आप की अपने स्वभाव की कोई कैफियत नही पा पाती थीं कि क्यों राजा से मिलने वाले सच्चे प्यार के बदले भी उनके मन में राजा के लिए प्यार नही था। या शायद वो उस प्यार को कहीं अपने मन में दबा कर  मिट्टी डाले उसे नफरत की खाद से सींचती चली जा रहीं थीं।
  जब तब बाँसुरी को रेखा और बाकी लोगों के सामने उन्होंने बेइज़्ज़त करने में कोई कसर नही रखी थी और आखिर राजा उनके पास अपनी बाँसुरी के लिए चला आया था….
     उस वक्त उन्हें भी एक पल को उस बिना माँ के लड़के पर कितना तरस आने लगा था जब उसने उनसे कहा कि अब वो ये राज पाट नही संभाल पायेगा और आगे सब कुछ उन्हें और विराज को ही सम्भालना होगा।
      वो तो दिखावे के लिए उससे पूछ भी बैठी की वो ऐसा क्यों कर रहा लेकिन उसे उन्होंने शुरू से ऐसा ही तो देखा था एकदम ज़िद्दी और खुद पर आ जाये तो किसी की ना सुनने वाला।
    अपनी लाल लाल आंखों से उन्हें देखते हुए कैसे उसने उनके हाथ थाम लिए थे ….

“मॉम मैं नही संभाल पाऊंगा आपके बिना कुछ भी। मैं जानता हूँ मैंने अपनी मर्ज़ी से शादी की इसलिए आप नाराज़ हैं , आपकी नाराज़गी समय समय पर दिखती भी रहती है,लेकिन बाँसुरी शायद सहन ना कर पाए।
   मैं उसे लेकर कहीं और चला जाना चाहता हूँ। मैं जल्दी ही सारा काम आसान कर विराज को ये गद्दी सौंप कर यहाँ से कहीं दूर चला जाऊंगा।
  बस इतनी विनती है कि तब तक बाँसुरी की तबियत पर कोई आंच ना आये।”

   उस दिन राजकुमार अजातशत्रु की बड़ी बड़ी आंखों में छलक आये ऑंसू उनके भी दिल के किसी कोने को भिगो गए थे, लेकिन वो उस दिन भी नही समझ पायी और आज तक ये बात उन्हें समझ में नही आई कि उनके तानों से बस बाँसुरी के स्वास्थ्य पर कैसे असर पड़ने लगा था।
   खैर इस बात के कुछ दिनों बाद ही तो बाँसुरी महल छोड़ कर चली गयी थी।
    हालांकि उस लड़की से इतनी नफरत होने के बाद भी जाने क्यों उसका इस तरह से चले जाना उन्हें अच्छा नही लगा था। उन्हें इंतज़ार तो था कि वो वापस आ जाये लेकिन उस मनहूस रात को बीते आज डेढ़ साल होने को आ गया और वो वापस नही आई थी।

   उस पर अजातशत्रु की ज़िद ने महल के रहने वालों को झुकने और उसकी विराज को गद्दी पर बैठाने की ज़िद मानने पर मजबूर भी कर ही दिया था।

   आज वो खुश तो थी कि उनका अपना खून गद्दी पर बैठने वाला है लेकिन कहीं न कहीं इस सारी खुशी के साथ मन में एक बोझ भी तो उमड़ा जा रहा था।
    वो दो बड़ी बड़ी लाल पानी से भरी आंखे जिनमें उनके लिए टूट कर प्यार और ममता ही भरी थी उन आंखों से पीछा छुड़ाना इतना आसान कहां था।
   उस रात भी जब अजातशत्रु उनके पास विराज को गद्दी पर बैठाने की बात करने आया तब एक अजीब सी बात उसने कही थी ” मॉम आपसे जीवन में पहली बार कुछ मांगना चाहता हूँ। क्या आप देंगी? “

   उस वक्त कोई भी जवाब कहाँ सूझा था उन्हें । वो तो बस उसकी याचना भरी आंखों को देखती रह गयी थीं “सब कुछ आपका ही तो है राजकुमार” इससे ज्यादा कुछ भी कहाँ कहा गया था उनसे । उसकी आँखों का पानी उनके गले को अवरुद्ध कर गया था।
   अब जब कल विराज का राज्याभिषेक प्रस्तावित है ऐसे में अभी कुछ देर में ही आपसे मिलने आऊंगा का संदेश भेजने वाला राजा आकर उनसे क्या मांगने वाला है आखिर?

   जब सारा राज्य ही विराज को सौंप दिया तो आखिर अब क्या मांगेगा अजातशत्रु!
   पर जो भी हो , अपने मन में इतनी कड़वाहट को सहेजे रखने के बाद भी जब उस लड़के से सामना होता है तो एकबारगी जैसे सारी कड़वाहट बह जाती है, ऐसा लगता है उसके स्वभाव का माधुर्य वो हर किसी में घोल जाता है।
   कभी तो ये भी मन में आ जाता है कि अजातशत्रु तुम हमारी अपनी संतान क्यों नही हो?
  लेकिन दूसरे ही पल महल में बड़ी रानी के सामने कदम कदम पर हुआ खुद का अपमान, अपने अस्तित्व के लिए जीवन भर लड़ी लड़ाई, महाराज की बर्बर क्रूरता सारी बातें याद आते ही आंखों में वापस वही नफरत वही बदले की भावना लहराने लगती हैं हम भी क्या करें।
  
    रानी साहेब अपने विचारों में गुम थी कि सेविका ने आकर बताया कि राजा अजातशत्रु आ रहे हैं:

  राजा ने वहाँ पहुंच कर रानी माँ को प्रणाम किया और उनके सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गया

  ” कैसे हैं आप कुमार? आजकल आपके आने जाने का कोई ठिकाना नही रहता। कभी यहाँ कभी कहीं”

  राजा मुस्कुरा कर नीचे देखता रहा

  ” मॉम जैसा कि आप जानती है कल मेरे लाडले भाई विराज का राजतिलक होना है। नियमों के अनुसार पांच साल से पहले किसी राजा को गद्दी पर से बिना किसी ठोस कारण के हटाया नही जा सकता और ना ही कोई राजा बिना किसी ठोस कारण के गद्दी छोड़ सकता है, इसलिए हमें भी कोई ना कोई बहाना तो बनाना ही था।
  
  ” क्या बहाना किया कुमार आपने?”

   “वो जाने दीजिए मॉम ! उससे कुछ ज्यादा महत्वपूर्ण बात करने आया हूँ। याद है आपसे एक दिन मैंने कहा था कि मुझे आपसे कुछ चाहिए।”

  ” आप दिल खोल कर कहिये कुमार, ये सब आपका ही तो है।”

  ” पर जो मुझे चाहिए वो आप ही दिलवा सकती हैं सिर्फ आप! वो बात पूरी हो जाये फिर मुझे कुछ भी नही चाहिए, मैं ये सब कुछ छोड़ कर चला जाऊंगा .. हमेशा के लिये

   ” बोलिये तो सही क्या चाहिए?”

 
   ” कल विराज के पद भार संभालने के पहले मैं एक आखिरी काम का आदेश देना चाहता हूँ वो भी आपकी अनुमति से।”

  “आपको अनुमति है कुमार! क्या कल ही हमें भी पता चलेगा कि आप क्या चाहते हैं।”

  “जी ! अब मैं चलता हूँ मॉम रात बहुत हो गयी है आप भी आराम कीजिये।”

  रानी माँ को प्रणाम कर राजा बाहर निकल गया और छोड़ गया रानी माँ के माथे पर चिंता की चुनी हुई लकीरें कि आखिर अपने राजधर्म का पालन करते हुए जो सब कुछ पूरे अधिकार से कर सकता है वो आखिर अपनी किस ज़िद को मनवाने की अनुमति कल सब के सामने उनसे मांगने वाला है….
     वो रात कठिन थी… सिर्फ रानी माँ के लिए ही नही खुद राजा के लिए भी…
    उसने जो निर्णय लिया था उस पर उसका ही नही इस पूरे महल का भविष्य टिका हुआ था। इतना बड़ा निर्णय सही साबित होगा या नही ये तो भविष्य ही बताएगा लेकिन आज की रात एक राजा के तौर पर उस महल में उसकी आखिरी रात थी।
   कल से फिर वक्त किस करवट बैठेगा इसका अंदाज़ा उसे ही क्या किसी को भी नही था।


   क्रमशः..

  aparna..

  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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