जीवनसाथी -85

जीवन साथी –85




          राजा का मसूरी आना फिर नही हो पाया था। लब्सना में होने वाली ट्रेनिंग का पहला चरण पूरा कर चुके रंगरूटों को ट्रेनिंग के अगले चरण को पूरा करने के लिए देश की राजधानी ले जाया जाना था।
 
   संसद भवन के दर्शनों के बाद ही सबका भारत भ्रमण शुरू होना था।
   लीना और बाँसुरी कुछ ज़रूरी सामानों की खरीदी के लिए बाज़ार जा रहीं थी कि शेखर और रिदान सामने पड़ गए ….

  ” तुम लोगो को भी कुछ लेना है तो चलो साथ में।”

    लीना के सवाल पर रिदान हाँ बोल उन लोगों के साथ निकलने लगा। उसे जाते देख शेखर वापस मुड़ गया…

  ” शेखर जी आपको कुछ नही लेना क्या? अगर आप साथ नही आना चाहते तो अपनी लिस्ट दे दीजिए, हम लोग लेते आएंगे।”

  बाँसुरी मन ही मन शेखर से हद से ज्यादा प्रभावित थी, खास कर जब से उसे ये पता लग गया था कि शेखर राजा द्वारा नियुक्त है। उसे हर उस चीज़ से बहुत लगाव था जो राजा से जुड़ी थी।
   उसके मन में शेखर के लिए जो आदर था वो राजा के कारण पैदा हुआ था लेकिन शेखर के मन के भाव तो अलग ही थे।
   राजा और बाँसुरी की सारी सच्चाई जानते हुए भी जाने क्यों शेखर का मन बाँसुरी की ओर खिंचा चला जा रहा था। अपने मन के विकार से बचने के लिए ही आजकल वो बाँसुरी के सामने जाने से बचने लगा था। जहाँ वो बैठी होती उधर जाते हुए रास्ता ही बदल देता। अगर उनके बैठे में बाँसुरी चली आती तो वो किसी बहाने से उठ जाता । उसकी इन सब हरकतों को लीना और रिदान तो समझ रहे थे लेकिन बाँसुरी अपने साहेब में ऐसी मगन की थी कि उसने इन बातों पर कोई खास ध्यान नही दिया।
    आज भी जब बाँसुरी ने उसकी लिस्ट मांगी तो लीना और रिदान शेखर की तरफ फिर बाँसुरी की तरफ देखते ही रह गए।
  दोनो की समझ से परे था कि क्या कहा जाए…

” छोड़ ना बाँसुरी ! उसे जो चाहिए होगा वो खुद ले लेगा ।”

   बाँसुरी ने लीना कि ओर देखा और फिर शेखर को देखने लगी..

” आर यू श्योर ?” उसने शेखर से सवाल किया और शेखर अपने बालों पर हाथ फिराता उन लोगों के साथ हो लिया..” नो आई एम नॉट! ”

   बाँसुरी मुस्कुरा कर आगे बढ़ गयी, और उसके पैरों के निशानों पर पैर रखते वो भी उसके पीछे पीछे बढ़ता चला गया।

    कुछ ज़रूरी सामान, कपड़े , दवाएँ , वगैरह खरीदते वो लोग आगे बढ़ते गए। कपड़ों की दुकान पर बाँसुरी राजा के लिए भी कुछ देख रही थी। जिन कमीजों को उठा कर उसने देखा लेकिन सही साइज़ ना मिलने से वापस स्टोर पर रख दिया उन्हें शेखर ने तुरंत खरीद लिया….

    ” ये क्या कर रहा है यार?”

  “क्यों क्या कर दिया मैंने?”

  ” उसके पसन्द किये कपड़े पहन लेने से तू उसे पसन्द नही आ जायेगा? ये बचपना क्यों कर रहा?”

  रिदान के सवाल पर शेखर मुस्कुरा उठा

  ” कभी प्यार कर के देखना, तब पता चलेगा इस बचपने में कितना मज़ा है।”

  ” बेवकूफी है ये सरासर !” रिदान एक बार फिर चिढ़ बैठा

  ” प्यार अक्लमंदी से की जाने वाली चीज़ भी तो नही, क्या कीजे?”

  ” यार समझता क्यों नही तू? क्या मिलेगा इससे? शादीशुदा है वो!”

  ” मुझे उससे कुछ चाहिए भी नही। जितना मिल रहा है बहुत है मेरे लिए, उसे रोज़ देख पाता हूँ, सुन पाता हूँ। ये क्या कम है?
    बातें करते चारों कॉफी हाउस पहुंच चुके थे, लीना और बाँसुरी आगे थी, शेखर रिदान उनके पीछे पीछे चले आ रहे थे..
      बाँसुरी अब तक कॉफी हाउस के काउंटर पर खड़ी सबके लिए कॉफी ऑर्डर कर रही थी, लीना भी शेखर रिदान के पास जा बैठी, थोड़ा बहुत दोनो की बातों का मजमून वो भी भांप चुकी थी…..

” रिदान सही कह रहा है शेखर! तू क्यों अपनी हँसती खेलती ज़िन्दगी बर्बाद कर रहा है?

  ” अब क्या बचा मेरी ज़िन्दगी में हंसता खेलता। अब तो जब वो मुस्कुराती है तभी लगता है ज़िन्दगी मुस्कुरा रही।”

   माहौल को हल्का करने के उद्देश्य से लीना ने बातों को मोड़ना चाहा….

  “अबे ओ देवदास ! जब दिख गया है कि ये बाँसुरी तेरे होंठो पर नही सजनी तो दूसरी कोई वीणा बजा ले। एक ही सुरों पर अटका पड़ा है। बी ए मैन यार !! क्या स्कूल कॉलेज के लड़कों जैसा बिहेव कर रहा है।”

  ” तो ले आ ना ढूंढ के दूसरी। बस शर्त ये है कि या तो उसके जैसी हो और या उससे बेहतर। मुझे पता है दोनो ही नही मिलने वाली”

  ” पागल हो गया है तू ”

  ” अब तो मज़ा आने लगा है इस पागलपन में। अब तो उसका दर्द भी मीठा लग रहा … समझी लीना!

  ” नही समझी कुत्ते! और ना समझूँगी!

” तू मेरे को कुत्ता बोली ज़रीना ”

    ” नही रे तुझे कुत्ता बोलने से कुत्ते नाराज़ हो जातें हैं।”

  ” यार कोई कीमत ही नही है मेरी। एक प्यार मुहब्बत से बात कर के लूट गयी तो दूसरी गालियां देकर !!”

  ” ओये वो तुझसे प्यार से इसलिए बात करती थी क्योंकि उसे ये लगता है कि तू उसके राजा साहब के द्वारा भेजा गया उसका बॉडीगार्ड है।”

  ” व्हाट?” शेखर चौन्क गया

” जी हाँ ! कल रात ही मैडम ने ये खुलासा मेरे सामने किया। आप शायद भोपाल से रायपुर की ट्रेन में इन्हें मिले थे ?”

” हाँ मिला तो था।

  ” बस , उसके बाद दिल्ली की कोचिंग में भी इत्तेफाक से आपका और इनका टकराना हो गया, उसके बाद जब वो अपने राजा साहब से मिली तब उन्होंने  उसे बताया कि उन्होंने उसके साथ उसकी सुरक्षा के लिए शुरू से बॉडीगार्ड भेज रखा था , बस उसने तुझे ही अपना बॉडीगार्ड समझ लिया । ये जो इतनी चाशनी घुलती है ना बेटा उसकी ज़बान पर वो इसलिए कि उसे लगता है आप उसके राजा साहब के आदमी हैं।”

  ” अच्छा ! ये बात है। पर यार इसे बॉडीगार्ड की क्या ज़रूरत? नही वैसे सही है बॉडी है भी गार्ड करने लायक।”

  शेखर की बात पर तुरंत लीना ने उसे टोक दिया

  ” लिमिट्स क्रॉस मत कर …

  ” सॉरी यार! बह जाता हूँ कभी कभी। तो ये बात है मैडम मुझे अपना बॉडीगार्ड समझती हैं। चलो इसी बहाने कुछ तो समझा अपना!!
   पर एक बात समझ नही आई!”

  ” क्या?”

  ” ये की ससुरा बॉडीगार्ड है कौन?” शेखर ने रिदान की तरफ देखा उसने कंधे उचका कर मना कर दिया । शेखर और रिदान एक साथ लीना की ओर मुड़ गए, वो उन दोनों को देखती मुस्कुरा रही थी…

  ” तू?” शेखर के बड़े से तू पर लीना ने मुस्कुरा कर हाँ में सर हिला दिया

” हे भगवान ! अब रिदान तू ये बॉम्ब मत फोड़ देना कि तू भी किसी लूटी हुई रियासत का खोया हुआ सुल्तान है। कसम से हार्ट फेल हो जाएगा मेरा।
पहले वो महारानी निकली फिर ये मैडम सन्नी देओल निकली अब तू ?”

  ” नही भाई मैं हद से ज्यादा मध्यमवर्गीय परिवार का हद से ज्यादा गया बीता लड़का हूँ। किसी एंगल से मैं किसी जन्म में राजा महाराजा नही हो सकता ।”

  “हां भाई ! तेरी बात में दम तो है क्योंकि तू शक्ल से ही लुटा पिटा बेदम नज़र आता है। और ये भी बात है कि वो शक्ल से ही कहीं की नूरजहां नज़र आती है।”

” फिर शुरू हो गया…”

  लीना की बात पर उसी समय वहां पहुंची बाँसुरी भी बोल उठी

  ” कौन शुरू हो गया? क्या शुरू हो गया?”

  ” कुछ नही। तुम बोल आयीं कॉफी के लिए।”

  “मैडम जी मैं ट्रे ले कर ही आयीं हूँ। सबकी अलग अलग चॉइस की कॉफी है। मेरी और शेखर की तो सेम चॉइस है।”

  शेखर की ओर कप बढ़ाते हुए वो मुस्कुरा उठी, उससे कप लेकर वो भी मुस्कुरा कर अपनी कॉफी पीने लगा।

कॉफी के साथ क़हक़हे भी लग रहे थे लेकिन बाँसुरी का ध्यान फोन पर ही था। शेखर ने चुपके से झांक लिया था कि वो सुबह से कई बार राजा को संदेश भेजने के साथ ही कॉल भी कर चुकी है लेकिन उसे दूसरी तरफ़ से कोई जवाब नही मिल पाया था।
    वो उसकी परेशानी समझ तो रहा था लेकिन कर भी क्या सकता था तभी शायद लीना का भी ध्यान इस बात पर चला गया और उसने उसे पूछ ही लिया…

“क्या हुआ बाँसुरी तुम्हारे साहब फ़ोन नही उठा रहे क्या?”

” नही लीना! मैं जानती हूँ आज वो बहुत परेशान होंगे। इसलिए सुबह से बार बार मेसेज कर रही हूँ लेकिन साहब के पास मेसेज देखने की भी फुरसत नही है। पता नही वहाँ महल में क्या हालात होंगे।”

  “ओह्ह ! तो ये बात है इसलिए रानी साहेब से कल से कुछ खाया नही जा रहा।”

  लीना की बात पर शेखर आश्चर्य से बाँसुरी को देखने लगा। ये लड़की कुछ पता ही नही लगने देती।

  ” क्यों ? कल से खाना नही खाया तुमने? “

शेखर के सवाल पर अब तक सब के साथ बैठी बाँसुरी की आंखें भीग गयी। जैसे उसने अब तक ना जाने कैसे खुद को संभाले रखा था। सुबह से हँसती बोलती वो जैसे जान बूझ कर अपने गम से भागना चाह रही थी। उसकी आँखों से आंसू बहते देख शेखर एकदम उसके पास चला आया…

  ” प्लीज़ ऐसे मत रोओ। बताओ तो सही बात क्या है?”

  अपने आँसू पोंछ महल में एक दिन पहले घटा सब कुछ वो उन लोगों को बता गयी और साथ ही राजा क्या करने वाला है , विराज को गद्दी कैसे दी जा रही सब बताते हुए उसके ऑंसू रुकने की जगह बहते चले गए।…..


********

   उधर महल में अगली सुबह कुछ अलग ही थी। युवराज भैया  काका साहेब, फूफा साहेब यहाँ तक कि विराट भी राजा को समझा समझा कर थक चुके थे लेकिन वो अपने निर्णय पर अडिग था…

  “समर तुम क्यों चुप खड़े हो? तुम तो हमेशा से सत्य का पक्ष लेते आये थे? फिर आज क्या हुआ?”

  समर सर झुकाये खड़ा ही रहा अपनी भारी बोझिल पलकें उठा कर वो युवराज से इतना ही कह सका…

  ” हुकुम की आज्ञा मेरे लिए पत्थर की लकीर है युवराज सा! अगर वो ये कह दें कि सांस लेना छोड़ दो समर तो समर वो भी कर जाएगा फिर यहाँ तो जो बात है उसमें मुझे उनका पूरा समर्थन करना ही है। अब अगर वो ये चाहतें हैं कि आप और हम विराज सा को गद्दी संभालने में मदद करें तो मैं जी जान से इस काम को करूँगा हुकुम! मैं तो गुलाम हूँ आप लोग जो आज्ञा दें सब मंज़ूर है।”

“, खबरदार जो आइंदा खुद को गुलाम कहा? तुम छोटे भाई हो हमारे।”

  युवराज ने भारी मन और द्रवित हृदय से उसे गले से लगा लिया। सभा शुरू होने का समय हो चुका था। धीरे धीरे महल के लोगों के साथ ही शहर के गणमान्य नागरिक जिन्हें आज के कार्यक्रम के लिए विशेष तौर पर न्यौता दिया गया था पधारने लगे थे।
   सभी के लिए उनके नाम की पर्ची लगी कुर्सियां सजी थी, सब अपना स्थान लेते चले गए।
सभी में आपस में यही चर्चा थी कि आखिर राजा अजातशत्रु आज क्या निर्णय लेंगे…

  रानी माँ और महाराजा हुकुम के आकर अपना स्थान लेते ही राजा भी सभा में चला आया। आते ही अपने माता पिता को प्रणाम कर उसने एक बार राजगद्दी को प्रणाम किया और उस पर जा बैठा।

   प्रेम वैसे तो सभा में कम ही होता था लेकिन आज वो भी समर के साथ वहाँ मौजूद था।
   राजा ने एक बार सभी सभासदों को प्रणाम किया और बोलना शुरू किया….


  ” मैं राजा अजातशत्रु आज आप सभी के सामने एक निर्णय लेना चाहता हूँ। मेरा मानना है आपको कोई भी काम तब तक करना चाहिए जब तक उस कार्य को और आपको एक दूसरे की ज़रूरत हो, जैसे ही वो ज़रूरत समाप्त होती है आपको वो कार्य करना बंद कर देना चाहिए।
   पहले राजकीय निर्णयों के आधार पर राजशाही के नियमों का पालन करते हुए मुझे सर्वसम्मति से राजा के पद पर बैठाया गया , मैंने राजकाज निभाया भी । राजधर्म का पालन भी किया , लेकिन मुझसे भी एक चूक हुई…
       मैंने हमेशा से ही अपने परिवार को सर्वोपरि रखा शायद वही मेरी कमज़ोरी का कारण बन गया।
  मैंने हमारे परिवार के हर सदस्य से बहुत प्रेम किया है और करता रहूंगा।
   मेरे लिए युवराज भैया और विराज विराट में कभी कोई फर्क नही रहा लेकिन एक जगह आ कर मैं भी पक्षपाती हो गया और वो जगह थी पिंकी की।
   मेरी एकलौती बहन पिंकी। महल की एकमात्र राजकुमारी भुवनमोहिनी!!!
   आप सभी को ज्ञात है कि लगभग डेढ़ दो साल पहले राजकुमारी भुवन मोहिनी की मृत्यु हो गयी थी ।”

   राजा थोड़ी देर को शांत हो गया। कुछ देर नीचे देखने के बाद उसने अपना सर उठाया और वापस बोलने लगा….

” राजकुमारी भुवनमोहिनी ज़िंदा है, सही सलामत है और बहुत खुश है।
    मैंने एक स्वांग रचा था, एक झूठ बोला था आप सबसे क्योंकि मैं नही चाहता था कि महल के नियमों के अनुसार पिंकी को भी सज़ा भुगतनी पड़े उस गलती की जो मेरी नज़र में गलती नही थी…”

   राजा की बात सुन सभी सन्न बैठे थे, रानी माँ अपलक नेत्रों से राजा को देख रहीं थीं।। 
    उसने आगे बोलना जारी रखा…

   ” पिंकी की जान बचाने के लिए मैंने उसे और उसके दोस्त रतन को यहाँ से भगाने में मदद की और एक सुरक्षित जगह पर उन्हें छिपाए रखा, उसी समय में यहाँ दो उन्हीं की बनावट की लाशों को उनकी लाशों का रूप दे झूठ मुठ ये साबित कर दिया कि ये वो दोनो हैं।
मैं जानता हूँ ये बहुत बड़ा झूठ था। मेरे अब तक के जीवनकाल का सबसे बड़ा झूठ और इस झूठ के साथ मैं जी नही पा रहा हूँ।
  अपने ही पिता , अपनी ही दादी साहेब, रानी माँ इन सब से मैं नज़रें नही मिला पा रहा था।
   इतने बड़े झूठ को रचने वाले व्यक्ति को गद्दी संभालने का कोई हक नही है…. और इसलिए आज और अभी मैं अपनी गलती मानते हुए ये गद्दी छोड़ने को तैयार हूं।
   और मैं चाहता हूँ , मेरे बाद ये गद्दी मेरा भाई विराज सम्भाले। मैं आशा करता हूँ मेरे इस निर्णय पर आप सभी की स्वीकृति होगी।”

  कुछ देर को राजा शांत हुआ , महल में उपस्थित सभी की आंखें नम थी। युवराज भैया नीचे देखते बैठे थे, उनकी समझ से परे था कि आखिर खुद पर इतने इल्जाम लगा कर ये सब राजा क्यों कर रहा है? आखिर कौन सा ऐसा शासक होगा जिसने कोई न कोई ऐसा निर्णय ना लिया हो, राजशाही में ये सब सामान्य बात होती है लेकिन वो ये भी जानते थे कि उनका भाई निराला था , उसका किया कोई काम ऐसा तो होता ही नही की जिसका फल अभी तुरंत मिल जाये, वो जाने कितने आगे का सोच कर सब करता है।समर और प्रेम अपनी अपनी जगह शांत बैठे सोच मग्न थे…
   रानी माँ को अब कुछ कुछ समझ आने लगा था कि आखिर राजा उनके सामने क्यों इतना भावुक हो गया था….
   तभी महाराजा हुकुम की आवाज़ सबके कानों में पड़ी…


  ” कुमार आप ने गलती तो बहुत बड़ी की है क्योंकि हमारे महल के नियमों के खिलाफ जो जाएगा उसे तो वही सज़ा मिलेगी जो मुकर्रर की गई थी, फिर क्या पिंकी और क्या कोई और?
   आप को क्या लगता है हमने बहुत खुशी से अपनी ही बहन का गला काटा था?क्या हम नही रोये होंगे? हमारी भी बहन थी, बचपन साथ खेले , संग पढ़े थे हमारी भी बचपन की कितनी सुनहरी यादें थी लेकिन उन सब को किनारे कर हमने उन्हें सज़ा दी क्योंकि उन्होंने गलती नही पाप किया था।  जाति से बाहर जाकर विवाह करना चाहती थीं। ये हमारी नज़रों में पाप ही है.. और इसकी सज़ा देना गलत नही है।”

  ” माफी चाहता हूँ पिता साहेब! लेकिन वो तब के नियम थे, आज के नही।
   राजशाही में बहुत से नियमों का संशोधन किया गया है… समय के साथ नियमो में फेरबदल बहुत आवश्यक है वरना राजतंत्र चलाना दुश्वार हो जाता है बहुत कठिन हो जाता है।
    आपके नियम आपकी जगह सही रहे होंगे लेकिन उन नियमों के साथ मैं काम नही कर सकता। “

   राजा वापस कुछ देर को रुका , समर के इशारे पर सेवक पानी का गिलास ले आया।
    राजा ने पानी लेने से मना किया और आगे बोलने लगा…

   ” आज से ये सिंहासन ये राजगद्दी विराज की होगी, अब इस पर राज अजातशत्रु नही बैठेगा , कभी नही। लेकिन अपनी जगह छोड़ने से पहले मैं एक आखिरी निर्णय सुनाना चाहता हूँ….
      जैसा कि आप को बता चुका हूँ कि महल की राजकुमारी भुवनमोहिनी जीवित है तो मैं ये चाहता हूँ कि पूरे राजकीय सम्मान के साथ राजकुमारी भुवनमोहिनी और उनके पति को महल में बुला कर उन्हें वापस हमारे परिवार में शामिल कर लिया जाए।
   क्षमा चाहता हूँ क्योंकि यहाँ इस बात के लिए मैं आपमें से किसी की भी इच्छा या राय नही पूछुंगा । इसे आप एक सनकी राजा का हुक्म ही मान लीजिये।
   तो आज यहाँ मैं राजा अजातशत्रु ये आदेश देता हूँ कि राजकुमारी भुवनमोहिनी को ससम्मान वापस महल बुला कर उन्हें परिवार में सम्मिलित कर लिया जाए, और इसके बाद आगे भी महल उनकी और उनके पति की सुरक्षा को लेकर कटिबद्ध रहे, उन पर किसी तरह का कोई वार प्रहार , आक्षेप न लगाएं जाएं। वो जिस तरह पहले इस महल का हिस्सा थीं वैसे ही अब भी रहेंगी और महल की आमदनी का एक हिस्सा उनके पास भी जाया करेगा।
    उनके पति को पूरे सम्मान के साथ इस महल का जामाता मान कर जो नियम उनके सम्मान के लिए होते हैं उनका पालन किया जाए।
     राजकुमारी भुवनमोहिनी के पति श्री रत्न सूर्यवंशी स्वयं प्रशासनिक सेवा में उच्च पद पर कार्यरत हैं, देखा जाए तो रियासत तो नही लेकिन एक आध जिले की साज संभाल तो कर ही रहे इस लिहाज से और आज के समय के हिसाब से वो भी आखिर अपने जिले के राजा ही ठहरे।
   मुझे उनके सम्बन्ध से कोई आपत्ति नही है और मैं उनके सम्बन्ध पर आपत्ति उठाने वाले को अभी के अभी महल से बाहर का रास्ता दिखा दूंगा।

   अब बताइये, मेरे इस निर्णय से किसी को कोई आपत्ति?”

   वहाँ बैठे सभी की आंखें नम थी, पिंकी की माँ को आज पहली बार आग्रह कर के वहाँ बुलाया गया था, उनके आंसू नही थम रहे थे…. पिंकी के पिता भी पास ही बैठे थे । उनके शांत हृदय में इस वक्त जो कोलाहल चल रहा था वो किसी को समझाना व्यर्थ था।
   उन्होंने एक बार युवराज की तरफ देखा, युवराज ने आंखों ही आंखों में जैसे उन्हें कोई आश्वासन सा दिया और वो वापस अपने हाथ की अंगूठियां घुमाते बैठे रहे।

   ” आज से राजकुमारी भुवनमोहिनी इस महल का इस परिवार का हिस्सा बनती है।
   मॉम आपसे बस यही मांगना चाहता था, कि मेरे इस निर्णय पर आप अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दें। आज तक आपसे मैंने कुछ नही मांगा, आज पहली और आखरी बार मांग रहा हूँ। मैं जानता हूँ आप मुझे निराश नही करेंगी।
अगर आप और पिता साहब की स्वीकृति मिल गयी फिर किसी को कोई चिंता नही रहेगी। और मैं आगे भी पिंकी के जीवन के लिए निश्चिंत रह सकूंगा।

   रानी माँ को उसकी बातें समझ आ रही थीं…. राजा ने अपने शब्द जाल में उन्हें ऐसे फंसा दिया था कि वो सोचने समझने में असमर्थ सी हो गयी थी।

  लेकिन कुछ तो था राजा में जो वो उसकी तरफ देखने के बाद उसकी बात काट नही सकीं…

  ” हम आपकी बात का पूर्ण समर्थन करते हैं कुमार! हम आपको भुवनमोहिनी की मृत्यु का नकली जाल बुनने और इस सारे षड्यंत्र को महल से छिपाने के लिए क्षमा करतें हैं। और भुवनमोहिनी को वापस महल और अपने परिवार में मिलाने की रज़ामन्दी देते हैं। ”

   महाराज अब भी राजा से नाराज़ थे लेकिन रानी माँ की बात के बाद एक एक कर वहां उपस्थित सभी जनों ने राजकुमारी की महल वापसी की हिमायत ही कि ये देख वो कुछ कह नही पाए, वैसे भी पदासीन राजा के सामने अपना पक्ष विपक्ष रखना व्यर्थ था।
   राजा ने अपनी बात कहने के पहले ही अपनी मंशा साफ बता दी थी।
   जब सामने से होकर राज फरमान ये निकल आये की मुझे सिर्फ मेरी बात के पक्षधर ही चाहिए तो फिर सारी बात ही समाप्त हो जाती है।

  विराज यहाँ भी आवाज़ उठाना चाहता था लेकिन गद्दी का लालच उसे चुप रहने को मजबूर किये था।

   वहां बैठे सभी के मन में यही चल रहा था, राजा जी तो बहुत बड़े करामाती निकले।
   अपने विश्वासपात्रों को पहले ही अपनी तरफ कर रखा था, उसके बाद स्वयं पर इतना बड़ा इल्जाम लाद लिया कि पिंकी की गलती छोटी लगने लगी और उसके साथ ही अपने विपक्षी को गद्दी मिलने का चुग्गा डाल उनकी बोलती ही बंद कर दी।

   मतलब राजकुमारी की वापसी के लिए ही राजा जी ने इतनी सारी तैयारियां करी थी। राजा ने किसी को सोचने समझने का कोई वक्त ही नही दिया।
जिस तरह से वो एक के बाद एक बम फोड़ता चला गया सभी सन्न बैठे बस उसके अगले आदेश का इंतेज़ार करते रहे गए….

   उसने बातों का जाल ही ऐसे बुना की ना सिर्फ राजकुमारी की महल वापसी संभव हो सकी बल्कि आगे भी पिंकी के सुरक्षित जीवन की बुनियाद तय हो गयी।
   अब उसे पूरा विश्वास था कि पिंकी के जीवन पर कोई खतरा नही था, उसने माँ साहेब के बाद विराज से भी पिंकी के जीवन के लिए अभयदान मांग लिया था, एक बार दिए वचन को पूरा करना ही राजधर्म था इसलिए विराज की तरफ से वो पूरी तरह आश्वस्त हो सकता था।
   वैसे भी उसे पिंकी की सुरक्षा से ज्यादा उसके सम्मान की ही चिंता थी क्योंकि प्रेम की सेना जिस तरह से उन लोगों की सुरक्षा के लिए कटिबद्ध थी उससे इस तरफ से वो निश्चिंत था।
   उसे उसकी लाडली बहन और उसके पति के ससम्मान वापसी का ही रास्ता तैयार करना था जो उसने कर दिया था।
   अब वो बिना किसी चिंता के बिना किसी सोच विचार के यह पद छोड़ सकता था…..

   अपने आखिरी आदेश के बाद राजा ने प्रेम और समर की तरफ देखा, उसका इशारा समझते ही वो दोनो वहां से बाहर निकल गए।

   कुछ दस बारह मिनट बाद ही दोनो वापस चले आये लेकिन इस बार उन दोनों के साथ पिंकी और उसके पति रतन भी साथ थे।

   महल में सुखद आश्चर्य की लहर दौड़ गयी, उन लोगों को भीतर प्रवेश करते देख सभी अपनी अपनी जगह खड़े हो गए, रानी माँ ने जाने क्या सोच अपना हाथ ऊपर उठा कर समर को रुकने का इशारा किया और महाराज से कुछ परामर्श कर अपने स्थान से नीचे उतर आयीं।

   सहायिका से आवश्यक सभी वस्तुएं मंगवाने के बाद उन्होंने रूपा , पिंकी की माँ जया और महल की बाकी औरतों को बुलाया और पिंकी का स्वागत करने आगे बढ़ गईं।
        पिंकी के माथे तिलक लगाने के बाद रानी माँ ने रतन को भी टीका किया और आरती उतार कर थाल रूपा के हाथ में दे कुछ रुपयों से दोनो की नज़र उतारी और सहायिका के हाथ में रुपये रख दिए।
   एक एक कर हर एक ने महल की राजकुमारी की आरती उतारी और एक तरफ होती गयी।
सबसे आखिर में रानी माँ ने पिंकी के हाथ से उसकी गोद में लेटे छोटे से राजकुमार को थामा और उन सब को साथ लिए अंदर चली आयीं, पिंकी को अंदर लाते समय उनकी आंखें राजा पर ही थीं , उसकी आँखों मे आभार था जो वो अपनी माँ को,  रानी माँ को व्यक्त कर रहा था।

   फिर तो आगे का सब सारा पलक झपकते बीतता चला गया….
   होने वाले राजा यानी विराज को पांच नदियों के संगम का जल छींट कर शुद्ध करने के बाद राजपुरोहित के मंत्रोच्चार के बीच राजा अजातशत्रु ने अपने कुलदेवताओ अपने शूरवीर पूर्वजों को स्मरण करते हुए अपनी जगह खाली कर उस स्थान पर बैठाया और अपनी कटार से अपने अंगूठे पर चीरा लगा कर उस बहते राजपूती रक्त से तिलक कर दिया।
       राजपुरोहित द्वारा अब तक राजा के माथे पर सुशोभित राजमुकुट को जिसे राजा कुछ देर पहले ही निकाल चुका था को विराज के माथे सजा दिया गया।
   ये सब होने के साथ ही राजा एक ओर किनारे हो गया, रानी माँ , महाराज सभी के हाथों होती पुष्पवर्षा में भीगता विराज मुस्कुराता अपनी जगह बैठा रहा।
     और पिंकी अपनी माँ के पास बैठी आँसू बहाती रही, आज फिर उसके जीवन के लिए उसके भाई ने इतना बड़ा बलिदान किया था जो अविस्मरणीय था।

   समर के याद दिलाने पर की विराज को अपना कार्यभार संभालने से पहले वहां उपस्थित सभी गुरुजनों का आशीर्वाद ले लेना चाहिए वो अपनी जगह बैठा ही रहा।
   कुछ देर उसके द्वारा पैर छूने का रास्ता देखने के बाद रानी माँ ने स्वयं अपने पुत्र के सर पर अपना हाथ रखा और उसे आशीर्वाद दे सीढियां उतर महाराज के साथ अपने आसन पर जा बैठी।
   जब विराज ने अपने खुद के माता पिता से आशीर्वाद लेने की जहमत नही उठायी तो फिर युवराज भैया काका साहेब तो दूर की बात थे। वो अपने आसान पर आत्ममुग्ध सा बैठा अपने ही विचारों में गुम था कि समर एक बार फिर उस तक चला आया……

  ” राजा साहब अब आपको उपस्थित सभा सदों को संबोधित कर अपने उद्गार उन तंक पहुंचाने होंगे।”

  विराज समर को आश्चर्य से देखने लगा…

” क्या ? मतलब क्या कहना चाहते हो?”

  “ये कहना चाहता हूँ कि आप दो शब्द सभा से कह दें, उन सभी का आभार व्यक्त करें जो आज के आपके इतने बड़े दिन के साक्षी बने…. ”

  “ज़रूरी है ये सारी चोंचलेबाजी ?”

  समर की तरफ देख विराज ने पूछा

  ” बेहद ज़रूरी।”

   समर के जवाब पर वो वापस समर को देखने लगा

  ” फिर ये भी बता दो की क्या बोलना है?”

  ” मैं ही ना बोल दूं आपकी जगह? “

  विराज के चेहरे पर चमक चली आयी

  ” ऐसा हो सकता है तो बोल दो ,कह दो राजा साहब थकें हैं।”

  ” राजा साहब अब आपके आराम के दिन गए, बड़ा शौक था ना सम्राट बनने का अब भुगतिये…

  मन ही मन सोचता मुस्कुराता समर विराज के पास से हट कर सामने चला आया और वहाँ उपस्थित सभी को संबोधित कर बोलना शुरू कर दिया….

  “महाराज हुकुम, रानी माँ साहेब,युवराज हुकुम, काका साहेब , फूफू साहेब उपस्थित सभी सभासद और हम सब के प्यारे हुकुम राजकुमार अजातशत्रु जी आप सभी को ससम्मान प्रणाम करते हुए मैं समर सिंह राजा विराज सिंह की तरफ से आज के शुभ दिवस पर आपकी उपस्थिति के लिए हृदय से आपका आभार व्यक्त करता हूँ।
    राजा विराज सिंह आगे शपथ लेंगे कि आज से इस रियासत के सारा कार्यभार वो अपने कंधों पर लेते हैं और ये सारा कार्य पूरी कटिबद्धता से मन प्राण से निभाने को प्रयासरत रहेंगे।
    रियासत यानी अपनी मातृभूमि को अपनी माँ समझ कर उसकी सेवा करेंगे और भविष्य में आपमें से किसी को किसी प्रकार का कष्ट नही होने देंगे।
    रियासत से जुड़ी हर वस्तु चाहे वो रियासत की भूमि हो या जनता सभी को अपना बालक मान कर स्नेह करेंगे और हर किसी की परेशानी दुख तकलीफ को स्वयं की परेशानी मान उसे हल करने का प्रयास करेंगे।
   राजकाज के कार्यों को सर्वप्रमुख मान कर निभाने का प्रयास करेंगे और आजीवन इस बात के लिए कटिबद्ध रहेंगे।
   ये आज से अपना सारा जीवन जनता को समर्पित करतें हैं।
     ये सारे राजा विराज सिंह के विचार थे जो मैंने साझा किए अब एक आखिरी बात जो इनके मन की है वो ये है कि आज के जनदर्शन के कार्यक्रम के बाद ये कल सुबह छै बजे ही रियासत की आम जनता से आमने सामने मुलाकात करने गांव गांव में जाकर एक एक आदमी से मिलेंगे और उनकी समस्याएं जानकर समझकर उनसे निपटने की कार्ययोजना बनाएंगे। इनकीं सुरक्षा टुकड़ी को भी आज रात ही इस बाबत सूचना भेज दी जाएगी।”

   समर निरंतर बोलता ही चला जा रहा था,उसकी हर एक बात के बाद विराज को लगता कि अब ये शांत हो जाएगा लेकिन तभी वो एक नई सुरसुरी छोड़ जाता। विराज अपने ही किये जाने वाले कार्यों की रूपरेखा उसके मुहँ से सुन सुन कर परेशान हुए जा रहा था। उसके अनुसार एक सादा सा आभार व्यक्त करना ही पर्याप्त था।
   उसके अनुसार तो आज ही उसका राजतिलक हुआ था, आज तो वो अपने दोस्तों के साथ रात भर पार्टी करने वाला था लेकिन ये समर ने अगले दिन सुबह सुबह ही रियासत भ्रमण का महा बकवास प्लान बना डाला था, और सिर्फ बनाया ही नही उसे सबके सामने बक भी दिया जिससे अब वो चाह कर भी पीछे नही हट सकता था।
   खैर एक आध दिन तो उसे काम करने का दिखावा करना ही होगा यही सोच उसे लगा कि अभी समर जो भी कह रहा उसे मान लेने में ही भलाई है, बाकी तो वो स्वयं अब राजा है,चार दिन बीतने दो वो दिखा देगा कि राजा होना असल में क्या होता है।

   विराज अपने विचारों में खोया था कि सभा ने एक साथ तीन बार करताल कर समर की बातों का समर्थन किया जिसमें से कुछ तो विराज ने सुनी थी और कुछ अनसुनी कर गया था,वो आश्चर्य में डूबा समर को देख ही रह था कि एक बार फिर समर ने उसके किये जाने वाले कर्तव्यों की पोटली खोलना शुरू कर दिया ।
  इस वक्त उसे समर पर ऐसा गुस्सा आ रहा था कि लग रहा था जो शाही कटार उसकी कमर पर बंधी है उसे निकाल अभी यहीं इसी सभा के सामने इस बड़बोले का गला काट इसे शांत कर दे लेकिन वो जानता था ये संभव नही है। वो चुपचाप बैठे बैठे सभासदों को देखता मुस्कुराता रहा और समर उसके पास खड़े उसके कर्तव्यों की वीणा बजाता रहा।
 
   लेकिन इसी सब के बीच उस शाही सभा से राजा चुपके से बाहर निकल गया….
      सभासद भावी राजा के विचारों को उसके मंत्री के मुहँ से सुन कर ही प्रसन्न थे, किसी का ध्यान इस बात पर नही गया कि कुछ घण्टों पहले का इस राजगद्दी का मालिक अब वहां नही था।
    यही तो समाज है और यही है समाज के नियम।

  संसार सदा से उगते सूर्य को ही प्रणाम करता आया है। जो राजा आज तक अपने पारिवारिक जीवन को भुलाए अपनी रियासत में और उसकी समस्याओं में उलझा हुआ था आज जब उसने अपनी गद्दी किसी और को दे दी तो किसी के मुहँ से विरोध का एक शब्द नही निकला । नए राजा को सभी ने उतनी ही सहजता से स्वीकार लिया जितनी सहजता से राजा अजातशत्रु का गद्दी से हटना स्वीकारा।
    हालाँकि अपनी गलती बताने के बाद राजा ने अपनी सज़ा भी स्वयं मुकर्रर कर खुद ही रियासत छोड़ने का निर्णय भी सुना दिया था। जिसे सुन कुछ पल को कइयों के हृदय पसीज गए लेकिन राजशाही की सबसे बुरी और खराब बात यही है कि राजशाही के पालन में नियमों की प्रतिबद्धता निभाने कभी कोई निर्णय हृदय से नही लिए जाते।
    दिमाग से सोच समझ कर लिए निर्णयों के कारण ही बहुत बार ऐसी अप्रिय परिस्थितियों का निर्माण होता चला जाता है कि चाह कर भी कोई कुछ नही कर सकता।
    रियासत की जनता के मन मे राजा के लिए बहुत प्यार था लेकिन ये भी सत्य है कि रियासतों की जनता के हाथ छन्नी से होतें हैं खाली और छिद्र युक्त। उनके हाथों में कभी कुछ नही समा पाता।
   अगर उनमें इतनी ही ताकत होती तो कभी श्री राम को चौदह वर्ष का वनवास ना झेलना पड़ता और ना ही पांडवों को लाक्षागृह की अग्नि में दहकना पड़ता।

  इन नियम कानूनों में बंधे इंसान हृदय से कितने भी दुखी हो ले पर राजशाही के आगे ये नतमस्तक थे और रहेंगे।

   एक बार फिर इतिहास खुद को दोहरा गया था। पर इस बार राजा अजातशत्रु के वनवास का  समय निर्धारित नही था कि उनकी वापसी कब और कैसे होनी थी।

    महल के मुख्य द्वार पर राजा के साथ खड़े युवराज और प्रेम उसे रोकने की निरर्थक चेष्टा में लगे थे लेकिन अपने एक मात्र बैग को कंधे पर टांगे एकदम साधारण कपड़ों में राजा किसी की सुनने को तैयार ना था…

  ” भैया बरसों से जैसे जीवन की चाह थी अब मुझे मिल रहा है उसे मुझसे ना छीने। आपको जिस दिन मेरी ज़रूरत होगी आप आज्ञा दीजिएगा मैं तुरंत वापस आ जाऊंगा लेकिन अभी मेरा जाना बहुत ज़रूरी है।”

  ” कुमार मैं अभी ही आज्ञा देता हूँ कि तुम इस महल से कहीं नही जाओगे।”

  ” भैया कुछ ज़रूरी काम निपटाने हैं और उन्हें निपटाने मेरा यहाँ से निकलना बहुत ज़रूरी है। आप समझिए, अभी सब कुछ नही बता सकता लेकिन जल्दी ही अपनी नई जिंदगी के पते ठिकाने को आपस से साझा कर लूंगा , इस वक्त मुझे जाने दीजिए। प्रेम मेरी बात समझो, अब मैं ना ही राजा हूँ और ना राजकुमार इसलिए मुझे किसी बॉडी गार्ड की कोई ज़रूरत नही। ”

  प्रेम की आंखों में आंसू छलक आये..

“मतलब आज तक आपने मुझे सिर्फ बॉडीगार्ड ही मान रखा था।”

  ” कैसी बात कर रहे हो प्रेम? तुम भाई हो मेरे।”

  “तो ये भाई अपने जीते जी आपको कभी नही छोड़ सकता। आप चाहे जो निर्णय लें मैं आपके साथ ही रहूँगा।”

  ” तुम्हारे ऊपर निरमा और मीठी की ज़िम्मेदारी भी है।”

  ” हाँ मैं उन दोनों को भी संभाल लूंगा लेकिन आपके बिना यहाँ किसी कीमत पर नही रुकूँगा, चलिए।”

  राजा का सामान उठाये प्रेम आगे बढ़ गया, युवराज से एक आखिरी बार गले मिल राजा प्रेम के साथ आगे बढ़ गया….

      ……

   क्रमशः


aparna….

  
      कुछ दिल से….

    सबसे पहले तो शनिवार को भेजने वाला पार्ट आज भेजने का कारण बताना सबसे अधिक ज़रूरी है।
  शुक्रवार तक प्रतिलिपी बहुत प्यारी दोस्ती निभा रहा था लेकिन शनिवार की शाम से जाने क्यों मुझसे ऐसे चिढ बैठा की ना मैं अपनी कहानी पोस्ट कर पा रही थी और ना ही कोई अपडेट दे पा रही थी। शनिवार के बाद से प्रकाशित किन्हीं भी रचनाओं को पढ़ने में भी असमर्थ थी तो आप सभी को कहानी के देर से प्रकाशित होने का कारण समझ आ ही गया होगा।
    आप सभी के साथ मुझे भी बेचैनी थी क्योंकि ना तो मेरे प्रोफ़ाइल पर इनबॉक्स खुल रहा था और ना पब्लिशिंग पेन …

   अभी दोपहर के बाद से प्रतिलिपी सुचारू रूप से चल रही है नोटिफिकेशन आने शुरू हुए , इनबॉक्स ओपन हुआ और आप लोगों के चिंता भरे मेसेज दिखे।

  आपमें से अधिकतर पाठको के सवाल यही थे कि मैं ठीक हूँ या नही? आप लोगों की इतनी चिंता और स्नेह गदगद कर जाता है। मैं बिल्कुल ठीक हूँ स्वस्थ हूँ बस इंटरनेट अस्वस्थ था शायद जिसके कारण ये समस्या आ रही थी।

अब कुछ कहानी के बारे में..

    जीवनसाथी की कहानी का यहाँ से एक नया अध्याय शुरू होगा । इस कहानी का मूल यही था कि कैसे एक साधारण लड़की एक महल की महारानी से लेकर कलेक्टर बनने तक का सफर पूरा करती है। बाँसुरी का ये शानदार सफर आप लोगों ने काफी सराहा।
   इसके आगे राजा अजातशत्रु का सफर शुरू होगा कि कैसे एक राजा अपने शानदार जीवन को त्याग कर एक आम इंसान की ज़िंदगी जीते हुए अपनी स्वयं की मेहनत से राजनीति में अपना परचम लहराता है।

  लेकिन इतने सारे उतार चढ़ाव के बाद भी दोनों एक दूसरे के जीवनसाथी होने को अपने रिश्ते को पूरी शिद्दत से निभाते चलतें हैं। राजा और बाँसुरी के जीवन में आने वाले खुशी के पल उन दोनों की जितना करीब ले आये उतना ही उनके जीवन की कठिनाइयों ने उनके संबंधों को मजबूती प्रदान की।
   दोनो ने ही जीवन के हर मोड़ पर अपने जन्म जन्मांतर के बंधन को कमज़ोर नही पड़ने दिया, जिस तरह बाँसुरी की ज़रूरतों के समय राजा उसकी ढाल बना रहा उसी तरह राजा के जीवन के उतार चढ़ाव में बाँसुरी उसकी परछाई बनी साथ निभाती चलेगी…

   इससे ज्यादा बता देने से कहानी का अंत ही सामने चला आएगा… तो आज बस इतना ही।
   अगला भाग जल्दी ही देने की कोशिश रहेगी ( शुक्रवार)

  आप सभी की स्नेहिल समीक्षाओं रेटिंग्स और स्टिकर्स के लिए भर भर कर धन्यवाद
                    आभार
                    शुक्रिया
                     नवाज़िश

  aparna….

 

 


 
 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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