जीवनसाथी -86


   जीवनसाथी– 86



         दिल्ली के अपने शानदार पंद्रह मंज़िली ऑफिस में आदित्य के पहुंचते ही जैसे हड़कम्प मच गया । हर कोई जो इधर उधर तफरीह करता नज़र आ रहा था अपने अपने डेस्क पर पहुंच गया…
     अपने चमकीले ऑफिस से भी अधिक शानदार व्यक्तित्व के आदित्य में वो सारे गुण परिलक्षित थे जो एक राजपूत युवा में होने चाहिए। लंबी चौड़ी कद काठी , तेजस्वी ओजवान चेहरा, तेज़ दिमाग लेकिन इन सारे गुणों पर भारी था उसका गुस्सा।
     उसके अंदर की नफरत को पालने पोसने में उसने अपना आज तक का जीवन जिया था और इसलिए गुस्सा उसके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन चुका था। साधारण ढंग से बात करना उसने सीखा ही नही था। प्यार मुहब्बत तो फिर बहुत दूर की कौड़ी थी।
     कॉलेज के दिनों में कम बोलने वाले हर बात पर पीछे रहने वाले कॉलेज के मिमिक्री आर्टिस्ट को भले ही कॉलेज के लड़के लड़कियों ने हास्य कलाकार मान लिया हो लेकिन उस वक्त सभी के सामने मुस्कुराते उस लड़के ने अंदर ही अंदर नफरत का जो लावा पाल रखा था उसने उसके स्वभाव को गुस्सैल और चिड़चिड़ा कर दिया था।
    
   एक साथ एक ही कॉलेज में पढ़ते हुए भी उसका और राजा का आमना सामना कम ही हुआ था। एक तो वो राजा से एक साल पीछे कॉलेज में आया था और उसके पढ़ते में ही राजा ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली थी और आगे की पढ़ाई के लिए विदेश निकल गया था।
    राजा की भलमनसाहत के किस्से उसने भी सुन रखे थे बावजूद उसकी नफरत कम होने की जगह बढ़ती ही गयी थी…


    तेज़ तेज़ कदमों से अपने ऑफिस की ओर बढ़ते आदित्य ने उसे ग्रीट करते अपने कर्मचारियों पर एक उड़ती सी नज़र डाली और केबिन में चला गया।
   उसके केबिन में जाते ही उसकी सेक्रेटरी रीमा केबिन की तरफ भाग चली।
   केबिन के डोर से अंदर आने की अनुमति मांग कर हाथ में बड़ा सा कॉफी कप लिए वो भीतर चली आयी।
अपनी माँ की तस्वीर पर दीपक जला कर आदित्य कुछ सेकण्ड्स को आंखें बंद किये खड़ा था। उसके मुड़ कर अपनी सीट में धँसते ही रीमा ने उसके सामने उसकी काली कॉफी रखी और कुछ ज़रूरी फाइल्स उसके सामने फैला दी। बिना दूध और बिना चीनी की उस काली कॉफी की कड़वी घूंट भर कर उसने सेक्रेटरी की तरफ नज़र डाली…

  ” सर वो एक बंदा आया है बाहर! इंटरव्यू के लिए!”

  ” इंटरव्यू ? बट अभी कौन सी पोस्ट निकाली है ?”

  ” सर ये ज़रा आउट ऑफ द वे आया है। वो महीने भर पहले लीगल एडवाइज़र की पोस्ट पर एक नए लड़के को अपॉइंट किया था ना वो हफ्ते भर पहले भाग गया। इस नए लड़के का रिफरेंस जोशी सर ने दिया तब इसे बुलाया है सर!”

  “हम्म कैसा लग रहा है लड़का?”

  ” सर दिखने में तो बहुत हैंडसम है, बिल्कुल इंग्लिश फिल्मों का हीरो लग रहा है…

  आदित्य ने फाइल पर से आंखें उठायी और रीमा को घूर कर देखा

  ” मेरा पूछने का मतलब था कि काम का लग रहा या नही? लुक्स से मुझे क्या लेना देना ? ये आदित्यप्रताप की फर्म है कोई एड एजेंसी नही। समझीं?”

  ” सॉरी सर! मेरा मतलब है शक्ल से काम का बंदा लग रहा, ज़रा सीरियस किस्म का है। अंदर भेजूँ?”

  ” हम्म दस मिनट बाद भेज देना।”

  रीमा हाँ बोल कर वहीं खड़ी थी कि अपनी कॉफी से ध्यान हटा कर आदित्य ने उसे फिर से झिड़क दिया..

” क्या हुआ? अब मेरे सर पर ही खड़ी रहोगी क्या? जाओ चैन से कॉफी पीने दो मुझे।”
   रीमा हड़बड़ा कर बाहर निकल गयी… ठीक दस मिनट बाद किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी और भीतर चला आया।
   अपना सीवी आदित्य प्रताप के सामने रख वो चुपचाप बैठा रहा….

   उसके सीवी को सरसरी तौर पर देख आदित्य ने सामने बैठे लड़के को देखा , लगभग अट्ठाइस उनतीस साल का गठीले बदन का लंबा चौड़ा सा लड़का वाकई कहीं का हीरो लग रहा था…

  ” नाम क्या बताया तुमने ? “

  सामने बैठा वो मुस्कुरा उठा …और अपने सीवी की ओर झांकने लगा। उसके मन के ये भाव की सामने बायोडाटा रख कर नाम कौन पूछता है को समझ आदित्य ने उसे घूर कर देखा .

  ” लिखा होगा इसमें तुम्हारा नाम पर तुम बता दोगे तो नरक में नही जाओगे समझे?”

  ” जी ! अजातशत्रु , अजातशत्रु सिंह नाम है मेरा।”

  नाम सुनते ही आदित्य चौन्क कर सामने बैठे लड़के को देखने लगा ।
    गोरा चिकना सा चेहरा, जेल लगा कर कायदे से सेट किये छोटे छोटे बाल, और आंखों पर लगा चश्मा ! उसे डील डौल से एक झलक राजा अजातशत्रु सिंह बुंदेला की नज़र तो आयी लेकिन इतनी बड़ी रियासत का राजा उसके यहाँ महज पचास हज़ार की नौकरी करने क्यों आएगा भला।
    कॉलेज में जिस अजातशत्रु को उसने देखा था उसके कंधे तक लंबे घने बालों और दाढ़ी मूछ में ही आधे से ज्यादा चेहरा छिप जाया करता था, दिखती थी सिर्फ उसकी बड़ी बड़ी गहरी आंखे… सामने बैठे लड़के की आंखों की गहराई उसके चश्मे के पीछे छिप गयी थीं। नही ये वो तो नही हो सकता !

  ” तुम्हारा नाम बिल्कुल पसंद नही आया मुझे।”

  ” लेकिन काम पसंद आएगा। आप मेरे साथ काम कर के तो देखिए।”

  ” इतना कॉन्फिडेंस ?” आदित्य ने एक तरफ की भौंह चढ़ाये उससे सवाल कर दिया

” एक वही चीज़ तो है अपने पास सर !”

   ” हम्म खैर तुम्हारा सीवी देखना न देखना बराबर है, जोशी जी ने रिकमेंड़ किया है तो कुछ सोचने का सवाल ही नही उठता। काफी सारे बिज़नेस हैं हमारे… हमारे केबिन के बगल वाला केबिन है जहाँ जोशी जी बैठते हैं, उनकी तबियत नासाज़ होने से उन्हों ने ही अपने लिए असिस्टेंट मांगा था, एक बंदा रिक्रूट किया  भी था लेकिन वो टिका नही। अब तुम उनके पास जाओ वो तुम्हें तुम्हारा काम समझा देंगे।
   एक और बात , कॉन्फिडेंस अच्छी बात है लेकिन बिना स्किल्स के कोरा कॉन्फिडेंस मेरे किसी काम का नही। अति आत्मविश्वास स्वघाती होता है , सुना है ना। तो यहाँ अपने कॉन्फिडेंस के साथ स्किल्स भी दिखाइए अजातशत्रु जी । समझे आप! एक बात और तुम्हारा नाम हरगिज़ पसंद नही आ रहा मुझे। मैं तुम्हे इस नाम से नही बुलाना चाहता।”

” आप राजा, राजकुमार या कुमार बुला लीजिये। मेरा निकनेम है।”

   आदित्य ने उबलती आंखों से राजा को देखा…

” जाओ अपना काम समझो, मैं खुद देख लूंगा की तुम्हें क्या कह कर बुलाना है , और आइंदा मुझे एडवाइस करने की कोशिश न करना समझे?”

  ” जी समझा!  लेकिन आया तो एडवाइजर की पोस्ट पर ही हूँ।” मुस्कुरा कर राजा बाहर निकल गया,   आदित्य के इशारा करते ही रीमा भी  वहां से उठ बाहर चली आई। बाहर आदित्य का एक और  सेक्रेटरी राजेश उसे काम समझाने उसका इंतजार कर रहा था।
  
   उसने और रीमा ने आदित्य के तमाम कारोबार का हिसाब किताब राजा को देना शुरू कर दिया। बीच बीच में रीमा तिरछी नज़रों से उसे देखती भी जा रही थी कि कहीं वो बोर तो नही हो रहा?

  ” आई होप आप सारा सब समझ गए होंगे।”

  ” जी सारा कुछ तो नही लेकिन काफी कुछ समझ गया हूँ। सर का मुख्य बिज़नेस कंस्ट्रक्शन का ही है ना!”

  सेक्रेटरी मुस्कुरा उठी…

  ” थैंक गॉड आप कुछ तो समझे! आपसे पहले एक बंदा आया था वो तो बस इतना समझाने पर ही दुबारा लौट कर नही आया।
   तो आपको इन सारे कारोबार का हिसाब किताब रखना होगा और साथ ही इसके लीगल आस्पेक्ट्स देखने होंगे… वैसे सर का मुख्य काम लिकर का है… अब वो बाकी काम छोड़ कर सबसे ज्यादा लिकर की मार्केटिंग पर ही फोकस कर रहें हैं। एक से बढ़कर एक महंगी विदेशी शराब इम्पोर्ट करना और शहर भर के रईसों , फिल्मी सितारों बड़े व्यापारियों की पार्टिस की रौनक बढ़ाना ही उनका काम है।
    एक छोटा सा हम्म कह राजा फाइल पढ़ता रहा…

  राजा काफी गंभीर मुद्रा में सामने खुली फाइल पढ़ने में व्यस्त था। उसे इतनी गंभीरता से फाइल पढ़ते देख तीन बार बज कर बंद हो चुके फ़ोन को उठाये रीमा बाहर निकल गयी। लगभग पंद्रह मिनट बाद वो दो कप चाय लेकर लौटी तब भी राजा उसी फाइल में गड़ा हुआ था।

  ” चाय लेंगे आप?”

  राजा ने सामने खड़ी रीमा को देखा और मुस्कुरा कर हाँ में सर हिला दिया..

  ” अब आप ले ही आयीं हैं तो ले लूंगा। वैसे राजेश कहाँ निकल गया?”

  ” लंच ब्रेक हो गया है ना? आप अकेले ही ऑफिस में हैं बाकी सारे लोग कैंटीन  चले गए। सिर्फ आप और बॉस ही अपने अपने केबिन में हैं!”

  ” आप भी तो नही गयीं।”

  “मैं तो डाइट पर हूँ। अभी डिटॉक्स ले रही हूँ दो दिन बाद फ्रूट डाइट पर आऊंगी।”

  उसकी बात सुन राजा को बाँसुरी की याद आ गयी.. वो भी महल के भारी भरकम गरिष्ठ खाने के बाद अक्सर उसे ऐसे ही उटपटांग बातों में उलझाए रखती थी.. ” साहब ऐसे ही खाती रही तो वजन बहुत बढ़ जाएगा अब दो दिन मैं सिर्फ़ डिटॉक्स लुंगी और उसके बाद दो दिन सिर्फ फ्रूट्स ”

  ” और मुझे कब खाओगी?”

  ” आपका दिमाग तो मेरी फेवरेट डिश है साहेब, वो तो मैं सारा दिन खा सकती हूँ।”

  और उसने हँसती हुई बाँसुरी को अपनी बाहों में कैद कर लिया था।

   पुरानी बातें याद आते ही उसे याद आ गया कि महल से निकलने के बाद बाँसुरी को अपना हाल समाचार देने के बाद से ही उसकी उससे कोई बात नही हो पाई थी।
   अपनी इतनी कड़ी ट्रेनिंग के बीच भी वो जाने कैसे समय निकाल कर उसे संदेश भेजती रहती थी। समय पर खाना खा लेना, समय पर सोना। अभी कहाँ रह रहे हो? हम कब मिलेंगे साहेब?

   राजा ने महल से निकलने के साथ ही अपना नम्बर भी बदल लिया था। समर ने उसके महल से निकलने के पहले ही उसके लिए सारी तैयारियां कर रखी थीं, फिर चाहे आदित्य के ऑफिस के जोशी जी को अपनी तरफ मिला कर उनसे अपने लिए असिस्टेंट की मांग करवानी हो या अपॉइंट किये असिस्टेंट को काम की अति से डरा कर भगाना हो … इस सब के साथ ही उसने आदित्य के ऑफिस के मार्केटिंग विभाग में प्रेम के लिए भी इसी तरह से एक स्थान सुनिश्चित कर उसे भी काम पर लगवा दिया था।
    आदित्य दिमाग से काफी तेज था इसी से राजा और प्रेम के सारे दस्तावेज़ फ़र्ज़ी तरीके से तैयार भी करवा दिए थे । समर कहीं कोई पेंच नही छोड़ना चाहता था इसलिए दस्तावेजों पर उसने काफी काम किया था। दस्तावेज़ ऐसे तैयार करवाये थे कि एकबारगी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और कुलपति भी देखें तो चक्कर खा जायें।
     नए सिम , नए नंबरों के साथ राजा और प्रेम दिल्ली की एक कॉलोनी में बने घर में रहने भी चले आये थे।
    लेकिन ये सब करने से पहले प्रेम ने निरमा को कुछ दिनों के लिए मुम्बई उसकी मामी के पास छोड़ दिया था।

   ” उस समय आप क्या बता रहीं थीं? लिकर के काम पर ज्यादा फोकस है आपके सर का?”

  ” जी हाँ ! पहले कंस्ट्रक्शन पर ज्यादा फोकस था लेकिन अब जब वो बिज़नेस जम चुका है सर ने अपना सारा ध्यान लिकर पर लगा दिया है।”

  ” लेकिन विदेशों से मंगवाई शराब पर तो बहुत कस्टम ड्यूटी भरनी पड़ती होगी?”

  “हाँ सर वो तो है ही।”

   ” हम्म ! मेरे पास एक जबरदस्त सलाह है लेकिन आपके सर किसी की सलाह पसंद नही करते। क्या करूँ?”

  ” उन्हें सलाह मत दीजिये आप। वो बस बिना वजह नाराज़……  रीमा की बात पूरी होने से पहले ही वहीं दरवाजे पर जाने कब से खड़े राजा और रीमा की बात सुनते आदित्य ने रीमा को टोक दिया…
   राजा की कुर्सी के ठीक सामने खड़ी रीमा के पीछे खड़े आदित्य को दोनो ने ही नही देखा था।

  ” क्या सलाह देना चाहते हो?  आते साथ ही ऐसा क्या दिख गया जो तुम्हें आइडियाज आने लगे?”

  आदित्य की बात सुन रीमा चौन्क कर एक तरफ हो गयी और आदित्य राजा के ठीक सामने की सीट पर आ बैठा….

   ” अगर आप कहें तो आपको सलाह दे सकता हूँ?”

  ” बको ना ! कहा तो !”

  मुस्कुरा कर राजा नीचे देखने लगा , और फाइल पर से अपनी नज़र उठा कर आदित्य पर गड़ा दी …

   ” आप अपने व्यापार के लिए लिकर विदेशों से आयात करतें हैं, उन्हें या तो आप लीगली लेकर आते होंगे तब आपको कस्टम ड्यूटी भरनी पड़ती होगी या फिर आप अवैध तरीके से लेकर आएं उसमें भी जाने कितनों को हिस्सा देना पड़ता होगा।”

  ” और उपाय क्या है ? वैध या अवैध तरीके के अलावा कैसे ले कर आ सकतें हैं?

  ” आपने क्रिप्टो करंसी के बारे में सुना है? ”

  ” हम्म कुछ थोड़ा बहुत…”

   ” बिट कोइन्स इसी में आते हैं , ये अलग अलग देशों की करंसी के एक्सचेंज से ऊपर नीचे होने वाली आपकी करंसी है। जैसा शेयर मार्केट होता है कुछ कुछ वैसा ही, अब मैं आपको क्रिप्टोकरन्सी के द्वारा कैसे व्यापार में इंडियन रुपया लगाकर डॉलर की कीमत की चीज़ें खरीद सकतें हैं ये बताऊंगा….”

   इसके बाद राजा लैपटॉप खोले आदित्य को एक से बढ़ कर एक उपाय बताता रहा …. और उसके चमत्कारी उपायों को सुन सुन कर  किसी को अपने सामने कुछ न समझने वाला आदित्यप्रताप एक ही दिन में राजा के सामने हथियार डाल ही गया।
        हालांकि उसका ईगो उसे इतनी जल्दी किसी को खुद से ऊपर मानने को तैयार न था, लेकिन मन ही मन उसने इस धीर गंभीर से लड़के के दिमाग का लोहा मान ही लिया था।

     समय बीतता गया, ऑफिस बंद करने का समय भी हो गया लेकिन राजा की बातों में उलझे आदित्य को समय का बिल्कुल भान ना था। रीमा इधर से उधर परेशान हाल घूम रही थी, कई बार बाहर से कर्मचारी आकर उससे जाने के लिए पूछ चुके थे लेकिन जब तक आदित्य ऑफिस में होता था किसी भी एम्प्लाई को घर निकलने की मनाही थी।
   रीमा पसोपेश में थी आखिर उस पर भी ध्यान राजा का ही गया, और आदित्य से कह कर उसने सभी की छुट्टी करवा दी।
    ऑफिस में अकेले बैठे दोनों व्यापार विनिमय पर चर्चा करते रहे।
        ढेर सारी चर्चा परिचर्चा के बाद राजा के कहे अनुसार ही आदित्य ने अपना एक नया अकाउंट बनाया और राजा जैसा जैसा बोलता गया आदित्य करता चला गया….

    रात के साढ़े बारह बज चुके थे, आदित्य के घर पर भी नौकरों के अलावा कोई था नही जो उसे फ़ोन कर घर आने की गुज़ारिश करता ।
   वो वैसे भी ज्यादा से ज्यादा समय ऑफिस ही में निकाला करता और जब रात में थक कर चूर हो जाता तब घर जाकर कुछ भी खा पी कर सो जाता।
   आज भी साढ़े बारह बज चुके थे कि उसे ध्यान आया कि उसे भले ही घर जाने की जल्दी न हो लेकिन सामने वाले को तो हो सकती है, उसने फटाफट लैपटॉप बंद किया और राजा की ओर मुड़ गया…

  ” आज के लिए इतना बहुत है। अब तुम घर जा सकते हो, पहले दिन के हिसाब से कुछ ज्यादा ही काम कर लिया! ”

  “जी ! अब तो आप भी निकल ही रहे होंगे?”

  आदित्य को इस तरह की टोकाटाकी भी सख्त नापसंद थी पर एक तो राजा का व्यक्तित्व और दूसरा पहला दिन होते हुए भी काम के प्रति उसकी लगन और ईमानदारी ने ऐसा रंग जमाया की  अदित्यप्रताप चाह कर भी उसे अपशब्द नही बोल पा रहा था ।
   और कोई होता तो सिर्फ इसी एक सवाल को पूछने के लिए आदित्य उसकी क्लास लगा चुका होता।

   आदित्य ने अपना काम समेटा और मोबाइल और कार की चाबियां लिए ऑफिस से निकल गया। उसके ठीक पीछे ही राजा भी निकल गया….

  ” ओवरटाइम लेते हो या नही? तुम्हें अपनी तनख्वाह से दुगुना रुपया लेना चाहिए साहब से! क्योंकि ये तो अक्सर ऑफिस बंद होने के घंटो बाद घर जाया करते होंगे?”

   ऑफिस के मुख्य द्वार पर बैठे गार्ड के पास राजा ठिठक गया। उसकी हंसी मजाक की बात सुन गार्ड भी मुस्कुरा कर ऑफिस का दरवाजा बंद करने लगा।

   लिफ्ट में आदित्य के साथ राजा के अंदर आते ही लिफ्टमैन ने ग्राउंड फ्लोर का बटन दबा दिया।
   लिफ्ट के नीचे पहुंचते में ही दूसरी मंजिल पर लिफ्ट रुकी और एक और लड़का भीतर चला आया।
   दूसरी और पहली मंजिल पर मार्केटिंग वालों का ऑफिस था….

  लिफ्ट से बाहर आते ही आदित्य राजा की तरफ मुड़ गया…

” कहीं छोड़ दूं तुम्हें?”
   दुनिया का ये आंठवा अजूबा था कि अदित्यप्रताप ने किसी को अपनी गाड़ी में लिफ्ट देने की बात कही थी।
    ऑफिस की बाहर की सीढ़ियों पर खड़े गार्ड्स आश्चर्य से आदित्य को देखने लगे। जो साहब किसी के हाथ से गाड़ी के ज़रा छू जाने पर पूरी गाड़ी की धुलाई पूँछायी करवा लिया करते थे आज अपनी गाड़ी में अपने साथ कैसे किसी को बैठने को कह रहे हैं? वो दोनो आश्चर्य से राजा को देखने लगे, आखिर ऐसा क्या है इसमें जो साहब ने खुद होकर अपनी गाड़ी में बैठने को न्योत दिया।
    राजा और आदित्य के साथ लिफ्ट से निकला लड़का धीमे धीमे कदमों से आगे की ओर बढ़ रहा था कि राजा ने आदित्य के प्रस्ताव को विनम्रता से ठुकराया और तेज़ कदम बढ़ाता बाहर की ओर निकल गया।

   आदित्य की गाड़ी  फर्राटे के साथ राजा के पास से निकल आगे बढ़ गयी। गाड़ी के आंखों से ओझल होते ही कहीं बाहर किसी गुमटी पर खड़ी रखी अपनी गाड़ी निकाल प्रेम रास्ते पर चलते राजा तक चला आया…

  ” प्रेम क्या ज़रूरत थी मेरे कारण तुम्हें भी ऑफिस में रुकने की?”

  ” आपके साथ हर पल रहने ही तो आया हूँ हुकुम! कहीं भी आपको अकेले कैसे छोड़ दूं?”

  ” लेकिन फिर भी! वो तो अच्छा हुआ आदित्य ने ध्यान नही दिया ,वरना कहीं वो तुम्हे नोटिस कर लेता तो? “

  “मैं भी तो उनका एम्प्लाई ही हूँ अब ।”

  “फिर भी,तुम जब दूसरे माले पर लिफ्ट में आये तो एक पल को मुझे लगा कहीं वो सोच में न पड़ जाए कि मार्केटिंग स्टाफ जब जा चुका है तो तुम अकेले वहाँ क्या कर रहे हो?”

  ” हाँ वो ऐसा सोच सकतें हैं , ठीक है कल से फिर मैं नीचे ही आपका रास्ता देख लिया करूँगा।”

  प्रेम की बात पर राजा हँसने लगा….

” मतलब पीछा नही छोड़ोगे मेरा?”

  ” इस जन्म तो हरगिज़ नही।”

   दोनो हंसते मुस्कुराते आगे बढ़ गए।
सुरक्षा कारणों और पहचान छिपाए रखने के लिए दोनो ने कोई नौकर भी नही रखा था इसी से घर पहुंचने के साथ ही प्रेम रसोई बनाने चला गया और राजा हाथ मुहँ धोकर अपना लैपटॉप खोले अपना काम देखने लगा।
     
   वक्त जहाँ निरमा के लिए ठहर सा गया था , वहीं प्रेम  के लिए तेज़ी से भाग रहा था।
    रोज़ सुबह दूध और फलो का नाश्ता किये प्रेम और राजा ऑफिस निकल जाते। दिन भर  राजा अपने दिमागी तिकड़म से जहाँ आदित्य के प्रोडक्शन को बढ़ाने की जुगत में रहता  वहीँ प्रेम उसके कारोबार की सेल्स बढ़ाने में लगा रहता।
    दोनो नए लड़कों ने कुछ ही महीनों में ऑफिस में अपना सिक्का जमा लिया।
  सेल्स और मार्केटिंग में जहाँ हर किसी को प्रेम की ज़रूरत पड़ने लगी थीं वहीं आदित्य का तो ये हाल हो चुका था कि बिना राजा के अब वो कोई भी किसी भी डील साइन करने से बचने लगा था।
  बिना राजा से सलाह लिए उसने कुछ भी करना बंद कर दिया था।
   उसके इस बदलाव से चकित देहरादून में बैठे उसके मामा भी शंकित हो उठे थे।

    और दिनों की तरह ही ऑफिस से घर पहुंच प्रेम खाना बनाने में लग गया और राजा करंसी मार्केट के उतार चढ़ाव पर नज़र डालने लगा।
   उसका रोज़ रात का किया यही होमवर्क अगले दिन आदित्य को लाखों का फायदा पहुंचाने लगा था, और यही राजा चाहता था।
          दोनो दोस्त खाना खा कर  बैठे ही थे कि प्रेम का फ़ोन चला आया… फोन निरमा का था। उसकी तबियत अचानक बिगड़ जाने के कारण वो प्रेम के पास आना चाहती थी लेकिन उसे आने से रोक कर राजा से बात कर अगले दिन निरमा से मिलने प्रेम मुम्बई निकल गया…
  
   अगले दिन शनिवार होने से उन दोनों को ऑफिस भी नही जाना था इसलिए राजा ने ज़िद कर अपनी कसम देकर प्रेम को मुम्बई रवाना कर दिया।

   **********

    मसूरी की ट्रेनिंग की अवधि समाप्त कर बाँसुरी और बाकी लोग दिल्ली चले आये थे…
   उनकी ट्रेनिंग का अगला हिस्सा संसद भवन में होना था।
  सभी  अगले दिन नियत समय पर अपने अधिकारियों के साथ संसद भवन में उपस्थित थे।
गोलाकार गुम्बदों की आकृति का शानदार संसद भवन देश के भावी कर्णधारों का स्वागत करने तैयार खड़ा था।
   भवन का शिल्प भारत के ही सुप्रसिद्ध चौसठ योगिनी मंदिर से प्रभावित था…
       विश्व के किसी भी देश में विद्यमान वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना संसद भवन था इसकी तुलना विश्व के सर्वोत्तम विधान-भवनों के साथ की जा सकती थी, इस  विशाल वृत्ताकार भवन परिसर में प्रविष्ट करते ही अपने स्वयं के गौरव का अपने देश की थाती का अनुभव कर सभी के सीने गर्व से चौड़े हो गए।
        
  भले ही संसद भवन का डिजाइन विदेशी वास्तुकारों द्वारा निर्मित था लेकिन वहाँ लगा एक एक पत्थर देशभक्ति की भावना जगाने में समर्थ था। इस भवन का केंद्रीय कक्ष विशाल वृत्ताकार परिधि में बना हुआ था यह माना जाता है, 1947 में अंग्रेजों से भारतीयों के हाथों में सत्ता का ऐतिहासिक हस्तांतरण भी इसी कक्ष में हुआ था। इस कक्ष का प्रयोग अब दोनों सदनों की संयुक्क्त बैठक के लिए तथा राष्ट्रपति और विशिष्‍ट अतिथियों-राज्‍य या शासनाध्‍यक्ष आदि के अभिभाषण के लिए किया जाता है। कक्ष राष्‍ट्रीय नेताओं के चित्रों से सज़ा हुआ था।
    सभी की आंखें फैली पड़ी थीं, अब आधिकारिक रूप से वो इस गणतंत्र को चलाने वाले रथ का हिस्सा बनने जा रहे थे।
   
    संसद भवन के तीनों कक्षों के चारों ओर चार मंजिला वृत्ताकार इमारत में सजे मंत्रियों, संसदीय समितियों के सभापतियों और पार्टी के कार्यालयों के साथ ही लोक सभा तथा राज्‍य सभा सचिवालयों के महत्‍वपूर्ण कार्यालय और संसदीय कार्य मंत्रालय के कार्यालय का अवलोकन करने के साथ ही सदन की कार्यवाही की जानकारी जानने में ही उनके कुछ दिन समाप्त हो गए थे।
     भवन की कार्यप्रणाली जटिल थी, एक दिन में सीखने समझने की बात भी कहाँ थी?
     अपनी सारी व्यस्तताओं के बीच कभी बाँसुरी अचानक ही बुझ जाया करती थी। कितने दिन बीत चुके थे ना वो अपने साहब से मिल पाई थी और ना ही उनसे उसकी ढंग से कुछ बात हुई थी।
   वो जब भी रात में अपने कमरे में थक कर लौटने के बाद राजा को फ़ोन करती , अक़्सर राजा मार्किट के उतार चढ़ाव देखने और अपने नोट्स तैयार करने में व्यस्त रहता। वो अक़्सर कुछ देर में फ़ोन करता हूँ कह कर फ़ोन रख देता और उसके फ़ोन का इंतज़ार करती थकी हारी वो सो जाती।

   संसद भवन का टूर लगभग समाप्ति पर था, इसके बाद उन्हें दिल्ली से बाहर जाना था।
      उस दिन भी भवन की कार्यप्रणाली जानने के बाद उन लोगों की मुलाकात गृहमंत्री से होनी थी।
    उनसे मिल कर बाकी सदनों की कार्यवाही देखने के बाद वो सभी वहाँ से निकल चुके थे लेकिन शेखर का तो संसद भवन के ग्रन्थालय से निकलने का मन ही नही हो रहा था लेकिन समय होता देख बार बार लीना और रिदान के बुलाये जाने पर वो भी उन लोगों के साथ बाहर आ ही गया।

   वहां से बाहर सभी के रुकने की साथ में ही व्यवस्था थी। सभी बाहर बने एक कॉफी हाउस में बैठे कॉफी पीते हुए संसद की कार्यप्रणाली पर चर्चा कर रहे थे कि बाँसुरी का फ़ोन बजने लगा….

  कुछ बाँसुरी की धीमी आवाज़ में बातचीत करने का ढंग , कुछ उसका बात बात पर शरमाना सामने बैठे शेखर को बता गया कि फ़ोन बाँसुरी के साहेब का था।

    इतने दिनों  से बाँसुरी के साथ साथ घुमते हुए वो बाँसुरी को काफी कुछ समझने लगा था। जाने कितनी उदास शामें जो बाँसुरी अपने साहब की याद में आंसू बहाती गुज़ार जाया करती थी , उन्हें एक तरफ खड़े चुपके से देखते शेखर ने भी काट दी थीं।

   जब जब किसी मंदिर में बाँसुरी ने राजा के स्वास्थ्य और सुख के मन्नतों के धागे बांधे थे, उन धागों के ऊपर वो भी उसकी खुशी के धागे बांन्ध आया था।

  वो खुद अपने इस एकतरफा प्यार या पागलपन की कोई कैफियत नही पा पाता था। कि क्यों उसे बाँसुरी से इस हद तक प्यार हो चुका था कि ये जानने के बाद भी की वो कभी उसे नही चाहेगी वो उसे चाहना नही छोड़ पा रहा था।
     लींना और रिदान के बार बार समझाने पर की किसी और लड़की में अपना मन लगा ले वो मानने को तैयार ही नही था।
   उसे किसी और के साथ खिलखिलाने से ज्यादा बाँसुरी की याद में आंसू बहाना मंज़ूर हो गया था।

  बाँसुरी की तड़प देख वो खुद तड़प जाता था,वो खुद चाहता था किसी भी तरह वो राजा को उसके पास ले आये।
   
    उसे खुद पर हैरानी भी होती थी और गुस्सा भी आता था। उसका मन अजीब सा हो चला था। बाँसुरी को वो दुखी नही देख पाता था लेकिन राजा की बाहों में उसे देखना और भी दूभर हो जाता था।

   उस दिन लगभग पंद्रह दिनों के बाद बाँसुरी की राजा से ठीक से बात हुई थी, बाँसुरी के चेहरे की खोई हुई मुस्कान लौट आयी थी। लीना बाँसुरी को चहकते देख उसे छेड़ने लगी….

  “क्या बात है? आज लगता है आपके साहेब आ रहे मिलने?”

  ” नही आज मिलने नही आ रहे। कहा है आज रात फ्री रहेंगे इसलिए कॉल करेंगे, कहा है सो मत जाना।”

  बाँसुरी अपनी बात पूरी कर शरमा गयी कि किसी ने पीछे से आकर उसे अपनी बाहों में कैद कर लिया, वो चौन्क कर उठी और पीछे राजा को खड़ा देख उसके गले से लग गयी।
    एकाएक जगह और आसपास बैठे लोगों की सोच वो शरमा कर उससे अलग हो गयी।
   हँसते हँसते राजा ने उसका हाथ पकड़ा और उसकी ठीक बगल की कुर्सी पर उन्हीं लोगों के साथ बैठ गया।

    हल्की नीली गुलाबी चेक्स की शर्ट में क्लीन शेव्ड चश्मा लगाए राजा अपने पुराने अवतार से बिल्कुल अलग ही भेस में था। उसे देख एक पल को बाँसुरी के अलावा सभी चौन्क उठे…

  ” सॉरी राजा साहब लेकिन बाहर कहीं देखा होता तो शायद आपको पहचान नही पाता।”

  शेखर की बात पर लीना और रिदान ने भी सर हिला के हामी भरी और राजा वापस मुस्कुरा उठा..

  “शेखर प्लीज़ यहाँ मुझे राजा साहब मत कहना। मेरा नाम ही लो, मुझे कोई एतराज नही होगा, कोई बात है जिसके कारण ऐसा करने कह रहा हूँ।”

   “लेकिन ऐसे कैसे मतलब..? शेखर के संकोच को देखते हुए राजा का चेहरा कुछ गंभीर हो गया…

  ” बताता हूँ सारी बात बताता हूँ, लेकिन यहाँ इतनी भीड़भाड़ में नही। अगर आप लोग चाहें तो हमारे साथ ही चलिए।”

   राजा की बात सुन बाँसुरी आश्चर्य से उसकी तरफ देखने लगी। ले देकर आज तो राजा साहब के पास फुर्सत हुई थी अपनी हुकुम से मिलने की और आज भी पूरी मंडली को साथ ले चलने को तैयार हैं। हद है!

   बाँसुरी के मन के भावों को समझता शेखर मुस्कुरा उठा….

” नही नही आज आप अपनी हुकुम को साथ ले जाइए, हमारी तो अभी दो दिन की छुट्टी हैं । कल कहीं मिलने का प्लान बना लेते हैं। ”

  राजा ने पास बैठी बाँसुरी को देखा और उसके कंधे के ओर से घेरा बनाते अपना हाथ उसपर कस लिया

  ” तो हुकुम! हम चलें फिर? ”

  शरमा कर हाँ में सर हिलाती बाँसुरी अपना बैग थामे खड़ी हो गयी, और राजा एक बार फिर खिलखिला उठा…

  “अरे अपनी कॉफी तो पूरी पी लेतीं ! इतनी बेसब्री ?”

  बाँसुरी नाराज़ हो वापस बैठ गयी…

  ” एक तो इतने दिनों से कोई हालचाल लिया नही मेरा। ढंग से बात तंक नही जार रहे थे और अब कह रहे इतनी बेसब्री। देखो खुद को क्या हाल बना रखा है, एकदम झटक गए हो, सबसे पहले तो चल कर कुछ बना कर खिलाऊंगी अब उसी के बाद कॉफी गले से नीचे उतरेगी मेरे। समझे!”

   ” हाँ बाबा समझा! अब चलो। ”

  राजा ने अपना पता शेखर के फोन पर मैसेज किया और बाँसुरी को साथ लिए वहाँ से निकल गया।
      जाते जाते भी बाँसुरी राजा से शिकायतें करती रही और किसी नाराज़ रूठी हुई बच्ची सा राजा उससे बार बार कान पकड़ माफी मांगता उसे मनाता रहा।
    दोनो के आंखों से ओझल होते तक शेखर अपलक उस तोता मैना सी जोड़ी को देखता रहा।

    शेखर के साथ साथ लीना रिदान के मन में  भी ये खलबली  मची थी कि  आखिर ऐसी कौन सी बात थी जिसके कारण राजा अपनी पहचान छिपाए वहाँ रह रहा था और कौन सी ऐसी बात थी  जिसे बताने के लिए उन्हें अगले दिन बुला रहा था….

********


     प्रेम मुंबई पहुंचा तब घर पर मामा जी और मामी ही थे। निरमा मीठी को लेकर बच्चों के पार्क गयी हुई थी। सुबह का समय था।
   प्रेम निरमा की तबियत को लेकर चिंतित था, उसने सीधा मामी से ही सवाल कर लिया…

    ” मामी जी निरमा नज़र नही आ रही , तबियत कैसी है उसकी?”

  ” बस यहीं नीचे मीठी को घुमाने गयी है, आती ही होगी। तबियत भी ठीक है! वैसे आप कैसे हैं? आप फ्रेश हो लीजिये मैं चाय नाश्ता ले आऊँ!”

   प्रेम को चाय नाश्ता करने का भी सबर कहाँ था? नाश्ते की प्लेट तो उसने छुई तक नही,  चाय का प्याला थामे उसकी नज़र दरवाज़े पर ही लगी हुई थी।
कि तभी दरवाज़े पर खटका हुआ और निरमा मीठी का हाथ पकड़े अंदर चली आयी। सामने बैठे प्रेम को देखते ही वो चौन्क कर खड़ी रह गयी।

   उसने तो बस ऐसे ही तबियत खराब होने की बात कह दी थी जिससे प्रेम उसे अपने पास बुला ले लेकिन प्रेम ऐसे अचानक अगले ही दिन उसके पास चला आएगा उसने सोचा नही था।
   उसे देख प्रेम तुरंत अपनी जगह पर खड़ा हो गया… लेकिन स्वाभाविक संकोच ऐसा था कि आगे बढ़ कर वो निरमा को गले से नही लगा सका…

  ” आप ? आप कब आये? मेरा मतलब अचानक कैसे?”

  प्रेम निरमा से ये सवाल सुन झेंप गया,वो भी क्या कहता कि जितना वो उसे याद कर रही है उससे कहीं अधिक वो निरमा को याद करते रातें गुज़ार रहा था। दिन तो फिर भी ऑफिस के कामों में कट ही जाता था उसका।

   ” तुम्हारी तबियत कैसी है अभी?”

  अबकी बार निरमा झेंप गयी,नीचे सर किये वो उस तक आकर उसके पास रखी कुर्सी पर बैठी ही थी कि पापा पापा की रट लगाती मीठी प्रेम पर लद गयी। उसे प्यार से बाहों के झूले में झुलाता प्रेम निरमा को सामान्य देख वैसे ही निश्चिंत हो चुका था।

    मामा जी के बेहिसाब सवालों और परिचर्चाओं के बीच अब उसे निरमा से बातचीत करने रात में ही मिलेगा सोच कर प्रेम ने खुद को मामा जी के हाथों सौंप दिया।
    मुस्कुरा कर उसे  चिढ़ाती निरमा मामी के साथ रसोई में लग गयी।
   पूरा दिन पलक झपकते बीत गया….

   रात में प्रेम की गोद में बैठी टीवी देखती मीठी गहरी नींद में सो गई तब उसे प्रेम की गोद से ले निरमा अपने कमरे में लेकर जा रही थी कि मामी जी ने उसे अपने कमरे में लिटा दिया और मुस्कुरा कर खुद भी मीठी के साथ ही सोने चली गयी ।
    मामा जी की बातें खत्म होने को न थी कि मामी ने उन्हें भी अंदर से एक झिड़की लगा ही दी…

  “डॉक्टर ने जल्दी सोने कहा है ना। तो आ क्यों नही रहे आप? नींद की दवा लेने के बाद इतनी देर जागना और इतना बोलना सही नही है। चलिए आइये अंदर!”

   दो तीन बार इसी तरह की झिड़की कहा कर मामा जी भी सोने चले ही गए।
   उनके जाते ही प्रेम ने निरमा को देखा ,वो उठ कर कमरे में चली गयी…

  ” अब बताओगी भी, कि क्या चल रहा है?”

  ” क्या चल रहा है?”

  ” अरे तुमने ही तो कल रो रोकर कहा कि तुम्हारी तबियत बहुत खराब हो गयी है और अब …

  “और अब क्या?”

  ” दिखने में तो हट्टी कट्टी लग रही हो, कहीं किसी एंगल से नही लग रहा कि तुम बीमार हो।”

  “कुछ बीमारियां बाहर से लज़ार नही आती, अंदरूनी भी होती हैं!”

  ” अच्छा ?”

  प्रेम को लगा निरमा को वाकई कोई परेशानी है वो उसके और करीब आ गया

  ” बताओ न क्या तकलीफ है। कल ही हम किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाने चलेंगे।”

  हाँ में सर हिलाती शरारती मुस्कान से प्रेम को बांधती निरमा आगे बढ़ प्रेम के गले से लग गयी…

  “मेरा डॉक्टर तो आ गया। अब मैं बिल्कुल ठीक हूँ!”

  प्रेम को निरमा की शरारत समझ आते ही उसने हंसते हुए उसे अपनी बाहों में कस लिया….

  ” पर अब कहीं यही डॉक्टर बीमार ना कर दे?”

  “मंज़ूर है…..

   हँसते हुए प्रेम को खुद से दूर कर निरमा ने उसे मीठी के छोटे छोटे हाथों की छाप लगा कर बनाया कार्ड दिखाया और बाकी चीजें दिखाने लगी।
      उत्सुकता से और पूरी रोचकता से मीठी के कारनामे सुनाती चहकती निरमा को देख प्रेम ने उसे वापस अपनी बाहों में भर लिया…..

  क्रमशः


   aparna …



   

    
 
   
  
   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s