जीवनसाथी -87


  जीवनसाथी 87




     सुबह के छै बजे थे कि विराज के कमरे के दरवाज़े पर दस्तक हुई।
    कुछ देर अंदर से कोई जवाब ना आने पर दस्तक तेज़ होने लगी। शराब के नशे में धुत्त विराज को दरवाज़े पर होने वाली खटखट समझने में भी वक्त लग गया।
    बच्चा छोटा होने से रातों में अक्सर रोया करता जिससे विराज की नींद में खलल पड़ जाया करता, वहीं रात बिरात विराज के पीकर लौटने पर रेखा और उसके बीच होने वाली लड़ाइयों का भी दुष्प्रभाव बच्चे पर पड़ सकता था यही सब सोच रेखा के कहने पर विराज के बगल वाला कमरा रेखा के लिए तैयार कर दिया गया था जिससे रात के समय वो बालक के साथ सुकून से वहाँ सो सके इसी से विराज रात कमरे में अकेले ही था।

   लगातार दरवाज़े पर होती खटखट से थक कर आखिर कान पर से तकिया हटा विराज दरवाज़ा खोलने चला आया। गुस्से में दरवाज़ा खोलते ही सामने समर खड़ा दिख गया…

  “क्या हुआ? आधी रात गए तुम यहाँ?”

   समर ने झुक कर विराज को प्रणाम किया ..

  ” राजा साहब सुबह के छै बज रहे हैं!”

  ” हैं? इतनी जल्दी? लेकिन इतनी सुबह तुम यहाँ क्या कर रहे हो।”

  ” जाग गया था कुछ खुरापात दिमाग में चल रही थी , सोचा किसे सताया जाए और बस आपका चेहरा सामने आ गया… मन ही मन सोचता समर कुछ आड़ा तिरछा गुनगुना कर रह गया

  ” क्या ? क्या कहा तुमने? हम सुन नही पाए!”

” जी मैं ये कह रहा था कि गांव से कुछ लोग आए हैं, फरियाद ले कर।”

” व्हाट फरियाद यार! इतनी सुबह कौन उठता है भला?”

  ” उठते हैं राजा साहब! लोग जिन्हें कुछ कर गुजरने का जुनून होता है वो उठते हैं। जिन्हें कुछ पाने की ख्वाहिश होती है वो उठतें हैं, जो अपने दम पर कुछ बोना चाहतें हैं वो उठते हैं…

  ” अरे बस बस … बस करो । इतना कैसे बोल लेते हो यार?”

“बस हुज़ूर इसी कला की तो खाता हूं। यही करने के लिए आपका महल मुझे एक मोटी तनख्वाह देता है।”


” थोड़ा अपनी जीभ को विराम भी दिया करो। तुम्हें पता भी है कितना ज़ुल्म करते हो तुम अपनी ज़बान पर!”

  ” मैं तो फिर भी खुद पर ही ज़ुल्म ढ़ा रहा हूँ, राजा बनने के बाद से आप किस किस पर जुल्म ढ़ा रहें है कैसे बताऊँ?” ये बात भी मन ही मन सोच कर समर मुस्कुरा कर रह गया, और उसे यूँ मुस्कुराते देख विराज सुलग उठा…

  ” समर एक बात बताओ? तुम सोते कब हो? हमें रात दस बजे तक ऑफिस में कैद कर रखा था तुमने! ज़ाहिर है हमारे वहाँ से निकलने के बाद सब काम समेट कर ही तुम निकले होंगे उसके बाद कुछ खाया पिया होगा तब कहीं जाकर सोए होंगे और अभी छै बजे सुबह से तुम इतना सजे धजे हमारे सामने खड़े हो। यार उल्लू हो क्या तुम ? बस जागते ही रहते हो?”

  ” जी हुज़ूर सही कहा आपने! उल्लू ही तो हूँ माता लक्ष्मी का वाहन। महल की माता लक्ष्मी गलत हाथों में न चली जाए इसलिए इस उल्लू का कर्तव्य है कि वो रात जाग कर इनकी चौकीदारी करे, वैसे आप मुझे चौकीदार भी कह सकतें हैं।
   महल की तिजोरी का चौकीदार!

” तिजोरी से याद आया, हमने अभी तक तिजोरी नही देखी। आज देख लिया जाए एक बार ,क्या कहते हो?”


  ” नही हुज़ूर आज तो मुश्किल होगा। काम बहुत सारा है ना? अभी आपको गांववासियों से मिलना है, उनकी समस्या सुनने और सुलझाने में ही घंटे दो घण्टे बीत जाएंगे। फिर उसके बाद आपको गांव भृमण में भी जाना है , पानी वाली पुरानी समस्या देखने। फिर आज तहसील कार्यालय का भी एक काम कबसे सिर्फ आपके लिए रुका पड़ा है उसके बाद कचहरी..”


” अरे बस बस! बस भी करो एक ही जान है हम। कहाँ कहाँ जाएंगे?”

” ये तो गद्दी पर बैठने से पहले सोचना था !” एक बार फिर समर मन ही मन सोच कर मुस्कुरा उठा

  ” तुम मन ही मन क्या सोच के मुस्कुराते रहते हो?”

  ” बता दूंगा तो आप कत्ल नही कर देंगे मुझे?”

  ” हम्म ! मतलब हमारे लिए ही कुछ गलत सोचते होंगे तभी तो कह रहे कि हम तुम्हें कत्ल कर देंगे।”

  ” हुज़ूर बस यही सोचता हूँ कि अभी तो शुरुवात है,महल तो सारा बिखरा पड़ा है कैसे समेटेंगे आप सारा राज पाट? लेकिन मैं आपका सेवक आपकी मदद के लिए हमेशा तत्पर रहूँगा। जैसा कि आप देख ही रहें हैं..”

  ” यार फिर न शुरू हो जाना तुम अपने ज्ञान का पिटारा खोल कर ज्ञान देना। कभी कभी तो लगता है तुम हमारी मदद कर रहे हो या हमें पीछे से कुएँ में धक्का दे रहे हो।”

  इन्हीं सारी बातों के बीच समर ने विराज को हाथ मुहँ धोने अंदर भेज दिया था और खुद उसके तैयार होते में वहीं खड़े खड़े बातों में लगा था….

  ” मदद तो ऐसी करूँगा आपकी की आप खुद हाथ जोड़ कर खड़े हो जाएंगे कि समर मदद न करो मेरी।     जिस दिन आप कान पकड़ कर हुकुम के सामने अपनी गलती मान कर गद्दी उन्हें वापस कर देंगे उसी दिन से ये समर आपकी मदद करना बंद कर देगा।”

  समर एक बार फिर मन ही मन विचार करता मुस्कुराता रहा और विराज हाथ मुहँ धो कर कपड़े बदल तैयार होकर उसके सामने आ गया।

  ” बोलते बहुत हो समर तुम!”

  ” जी हुज़ूर क्या किया जाए? पर अपनी इस काबिलियत पर घमंड नही किया कभी।”

  विराज ने हिकारत से उसे देखा और अपनी कटार उठा कर रख ली और उसके सामने से होकर कमरे से बाहर निकल गया। समर भी मुस्कुराता उसके पीछे चल पड़ा…..

  ” तो महल तुम्हें बहुत मोटी रकम देता है बोलने के लिये । है ना?”

  ” जी हुज़ूर!”


  “चलो हम तुम्हें ना बोलने की तनख्वाह देंगे। मंजूर है? आज तक बोलने के लिए जितना रुपया तुम्हें मिलता था उसका हम दुगुना देंगे बस तुम चुप रहना।”

  समर ने मुस्कुरा कर हाँ में सर हिला दिया, और उसके सामने से आगे बढ़ एक तरफ को मुड़ कर दीवानखाने की जगह दूसरी तरफ को आगे बढ़ने लगा, उसे ऐसा करते देख विराज एकाएक कुछ समझ नही पाया। आज तक तो सभी मिलने वालों के साथ बैठक दीवानखाने में ही हुआ करती थी फिर ये आज किधर चला जा रहा था? उसने समर से पूछा कि हम कहाँ जा रहें हैं ? पर बिना कोई जवाब दिए बस मुस्कुरा कर समर आगे बढ़ता गया और विराज को भी वहाँ से निकल कर साथ चलने का इशारा किये आगे बढ़ता गया……

   सुबह सवेरे का समय होने से दीवानखाने में बाहर वालों को प्रवेश की अनुमति नही होने से सभी ग्रामवासियों को बाहर बगीचे में ही ठहराया गया था।
   विराज ने वहाँ पहुंच कर देखा तीन चार आदमी और एक औरत साथ थे। विराज ने गुस्से में पलट कर समर को देखा कि इतने कम लोगों के लिए उसकी नींद में खलल डालने की क्या ज़रूरत थी।
     समर ने भी मुस्कुरा कर सिर्फ आंखों से ही इशारा कर दिया कि ज़रूरत थी…

“ज़रा जल्दी जल्दी कहिये क्या समस्या है आप लोगों की?”

   वो लोग समर की ओर देखने लगे। समर विराज की ओर देखने लगा, और विराज वापस समर को देखने लगा…

  ” हमें कोई बताएगा कि बात क्या है?”

   ” हुज़ूर माइ बाप अब का कहे आपसे। ई हमार लुगाई है ।”

” हाँ तो?

  ” तो हुज़ूर बात ये है कि हमार लुगाई  की आदत बहुत खराब है।

  ” तो हम क्या करें?”

  ” आपका समझाए पड़ी हुज़ूर। आप हम जनता के माइ बाप है।

  ” बात को कितना खींचोगे? साफ साफ क्यों नहीं बताते कि बात क्या है?”

विराज मुड़कर समर की तरफ देखने लगा..

” अब आप मुंह खोलेंगे अपना ? आप बताएंगे कि माजरा क्या है?”

   पर समर मुस्कुराकर हाथ बंधे खड़ा रहा क्योंकि अब तो उसे ना बोलने की तनख्वाह दी जा रही थी विराज नाराज होकर वापस गांव वालों को देखने लगा

  “बोलो लेकिन ज़रा जल्दी।”

  ” हुजूर ए हमार लुगाई की आदत बहुत खराब है यह जब देखती है तब घर से भाग खड़ी होती है हम तो परेसान हो गए हैं इससे।”

”  यह तुम्हारा व्यक्तिगत मामला है इसमें हम क्या कर सकते हैं?

  अबकी बार वह औरत बोल पड़ी….

” हुज़ूर हमारी बारी भी तो सुनिए। कोई औरत सौक मा घर से नही भागती। पहले जब ई हमें ब्याह के लाये बोले निसुल्क गैस कनेक्सन मिलने वाला है। हम खुस हो गये। चूल्हा मा खाना पकौना कौन महरिया चाहती है?”

  ” हाँ तो कौन मरद चाहता है उसकी जनानी घर छोड़ अपने यार के घर बैठ जाये।”

  उस आदमी के आक्षेप पर महिला ऑंसू बहाने लगी..

  ” एक मिनट रुको रुको… तुम्हारा नाम क्या है? ” विराज औरत से मुखातिब हुआ

” सुकुवारा हुज़ूर और ई जिसे हमार यार कह रहा वो हमारे मामा का बेटा है। हमार भाई।”

  विराज परेशान हाल उस आदमी को पलट कर देखने लगा

  ” तुम भाई हो इसके?”  औरत की ओर इशारा कर विराज ने सवाल पूछ लिया

” जी हुज़ूर कजिन बदर हैं साहब।” उसकी गंदी इंग्लिश सुन विराज का पारा और चढ़ गया

  ” तो मतलब बात ये है कि तुम अपने पति से लड़ कर अपने भाई के घर रहने चली आयीं।”

  ” नही माई बाप! बात ई है कि जब सरकार ने गैस चूल्हा बांटा तब भी हमार मरद सबसे पीछे खड़ा रहा। हमारी आंख जल गई चूल्हा मा आग फूंक फूंक कर पर ये  आदमी गैस चूल्हा का कनेक्सन नही पा पाया।
   तब हम एक बार रूठ कर अपने भाई घर जा बैठे। फिर हमें मना  के ले गया। उसके बाद सरकार ने सौचालय बनाने का प्रस्ताव भेजा सभी गांव के घरों से नामांकन करके नामांकन सूची में हमार घर का भी नंबर चड गया पर अब आज हुज़ूर दुइ साल बीत गया पर हमारे घर में सौचालय नहीं बना।
     हुजूर हम भी बहुत परेशान होते हैं.. क्या करें?  दुइ साल से देख रहे हैं अब इस साल भी नहीं बन पाया हम फिर रूठ कर अपने भाई के घर चले गए तो ये हमार मरद आपके पास सिकायत करने चला आया।

   “तो तुम्हारे भाई के घर में है शौचालय?”

  ” हुजूर हम कजन हैं उनके और हमारे घर में है टायलेट।  हम अपना खर्चा से बनवाए हैं!”

   ” तुम यार तुम क्यों नहीं बनवा लेते शौचालय?”

  ” हुजूर इतना पैसा होता तो हम महल नहीं बनवा लेते आप के जैसा!”

   विराज की भौहें चढ़ गयीं समर की और उसने देखा समर धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था।

  ” अब आप मुस्कुराते ही रहेंगे या इस बात पर भी ज्ञान का प्रकाश डालेंगे”

  समर ने इशारे से पूछा कि क्या मैं बोल सकता हूं? विराज दोनों हाथ जोड़कर उसकी तरफ देखने लगा
” प्लीज बोलिए”

   समर मुस्कुराते हुए बोलने लगा…

” हुजूर इस भोले भाले गांव वाले की कोई गलती नहीं ना ही इसकी औरतों की कोई गलती है और ना ही उसके कजन की कोई गलती है।”

  “तो गलती किसकी है ?”

” मैं पूरी बात बताता हूं 2 साल पहले जब आपके पिता गद्दी पर थे तब राजकुमार अजातशत्रु सिंह ने पूरे गांव में भ्रमण कर कितने घरों में शौचालय है और कितने में नहीं इसकी पूरी लिस्ट तैयार कर सरकार को भेजा था और उनसे विनम्रता से अनुरोध किया था कि सरकारी बजट पर वह यहां पर हर घर में शौचालय निर्माण करवाएं। असल में तो राजकुमार अजातशत्रु यह चाहते थे कि महल के अधीन आने वाले सभी गांवों में वह खुद अपने खर्चे से यह काम करवा लें लेकिन उस समय पर महाराजा जी इस बात के लिए तैयार नहीं थे, क्योंकि तिजोरी पर इसका अच्छा खासा प्रभाव पड़ रहा था। इसलिए राजकुमार अजातशत्रु जी ने बहुत दौड़ भाग की और सरकार से शौचालय के लिए मंजूरी ले ली लेकिन सरकारी काम तो आप जानते हैं इतनी बार कहने पर भी सरकारी काम अपनी गति से ही चलता रहा ।
    इस सब के बीच जब राजकुमार अजातशत्रु स्वयं राजा बन गए तब उन्होंने राजा बनते ही तिजोरी में आने वाले कर के एक हिस्से से शौचालय बनवाने का काम शुरू करवाना चाहा लेकिन उस समय एक बार फिर राजमाता और आपने शौचालय बनने को मंजूरी नहीं दी क्योंकि महल का पैसा अकेले राजा भी खर्च नहीं कर सकता और उसके लिए उन्हें राज महल के ही कम से कम पांच लोगों के हस्ताक्षर चाहिए। राजा अजातशत्रु ने उस समय आपसे और राजमाता से बहुत अनुनय विनय किया लेकिन आप दोनों तैयार नहीं हुए सिर्फ युवराज भाई साहब और काका साहब के ही हस्ताक्षर थे उसमें।
    राजमाता के कहने पर महाराजा साहब ने भी हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था , उस समय से यह काम अटक गया। हालांकि उसके बाद राजकुमार अजातशत्रु बहुत बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते रहे लेकिन काम वही का वही अटका पड़ा रहा अब दो साल बीत चुके हैं। अगर राजा अजातशत्रु होते तो शायद अब तक काम पूरा हो जाता लेकिन पिछले डेढ़ महीने से इस काम में कोई रफ्तार नहीं है। गांव के लोग परेशान हैं हुजूर और इसीलिए गांव में आए दिन कोई न कोई परेशानी  खड़ी होती रहती है।

  ” ओह्ह तो अब ? हम क्या कर सकतें हैं? “

” राजा साहब आप दो काम कर सकते हैं पहला आप अपनी तिजोरी खोल कर अपने खर्चे पर गांव के जिन घरों में अब तक शौचालय नहीं बन पाया है उन में शौचालय निर्माण करवा दें या फिर दूसरा यह काम कर सकते हैं कि आप सरकार के ऊपर दबाव डालकर उन्हें काम जल्दी करने के लिए कह सकतें हैं…”

“हमसे पहले वाले राजा ने क्या …

   विराज की बात आधे में ही काट समर बोल पड़ा

” हुजूर वह जितना कर सकते थे उन्होंने किया वह अगर अभी गद्दी पर होते तो वह बहुत कुछ करते रहते  उनकी तो बात ना ही की जाए तो अच्छा है आपको मैं यह भी बताना चाहता हूं कि महल से हर एक  राजा को स्वयं भी एक तनख्वाह मिलती है और राजा अजातशत्रु जब तक कार्यरत थे उन्होंने अपनी तनख्वाह को भी गांव वासियों के लिए खोल रखा था। इस गांव के लगभग चार सौ घरों में वह शौचालय निर्माण अपने खुद के पैसे पर करवा चुके थे ।
   इसके साथ ही गांव के किसानों को बीज खरीदी में मदद करना हो या खेती के लिए पानी की जरूरत हो हर जगह वह अपना स्वयं का खर्च वहन कर उनकी मदद किया करते थे , जिससे तिजोरी पर कोई अतिरिक्त भार ना पड़े ।
         क्योंकि वह अच्छे से जान गए थे कि महल की तिजोरी से पैसे निकालने के लिए पांच लोगों के हस्ताक्षर बहुत जरूरी है।
   आप सभी से विनय करने की अपेक्षा वह अपने खुद के खर्च के लिए मिले पैसों से गांव वासियों की मदद कर दिया करते थे, इसीलिए तो महल से निकलते समय उनके पास उनके कुछ कपड़ों के अलावा और कुछ नहीं था।।
       उनकी तो बात ही निराली है।”

  समर एक ठंडी सांस भर चुप हो गया…

  ” अब अगर राजा अजातशत्रु पर आपका महाकाव्य पूरा हो गया हो तो हमे यह भी बता दीजिए कि हम किस तरह से इन लोगों की फिलहाल मदद कर सकतें हैं। “

   ” आप कहें तो मैं ही ना बोल दूं , आपकी तरफ से!”

” हाँ वही सही रहेगा। तुम हमसे कहो फिर हम जनता से कहें इससे अच्छा तुम ही कह दो।”

” जी मैं भी ऐसा ही कुछ सोच रहा था वह ज्यादा आसान रहेगा …
       मैं समस्त ग्राम वासियों से हाथ जोड़कर अनुरोध करता हूं कि इस वक्त आप सभी अपने अपने घरों को प्रस्थान करें हमारे राजा राजा विराज सिंह जल्दी ही आपकी इस समस्या का समाधान करेंगे,  वह आज के आज सरकार के पास आपकी इस समस्या के लिए अर्जी लगाएंगे।  और अगर आने वाले एक महीने में गांव के जिन जिन घरों में शौचालय अब तक नहीं बन पाया है वहां शौचालय नहीं बना तो वह अपने भाई राजा अजातशत्रु की तरह पहले तो महल की तिजोरी से आपकी सहायता करने की कोशिश करेंगे और अगर वे ऐसा नहीं कर पाए तो….

  ” रुको रुको । ” विराज ने घबराकर समर को शांत करवाया और आगे खुद बोलने लगा

” हम पूरी कोशिश करेंगे कि आप लोगों की समस्या का कोई उपाय निकाला जा सके हमें एक महीने का समय दीजिए हम सरकार से आज ही इस बारे में चर्चा करेंगे तब तक आप लोग धैर्य रखकर प्रतीक्षा करें।”

  इसके साथ ही विराज उठ कर वापस अपने कक्ष की ओर मुड़ चला, उसके जाते ही हंसते हुए समर ने सभी ग्रामवासियों को घर जाने के लिए कहा और मुस्कुराते हुए विराज के पीछे चल पड़ा।

  ” समर सर में दर्द हो गया सुबह सुबह। ये गांव वाले भी बड़े बदतमीज़ हैं। अपने मसले खुद सुलझाने की जगह हर छोटी बड़ी बात के लिए महल आ धमकते हैं।”

  ” क्या किया जाए राजा साहेब? राजा होना कांटों का ताज पहनाना है। दूर से ही फूलों का गुलदस्ता नज़र आता है, पास से देखें तो कांटे ही कांटे है।”

  “कुमार सारा दिन यही करता था तो उसका अपना व्यक्तिगत जीवन क्या था?”

  समर मुस्कुरा कर रह गया…

” कहाँ था उनका व्यक्तिगत जीवन। अपना जीवन उन्होंने तो रियासत की जनता को सौंप रखा था। एक बार जब दौरों पर निकलते तो कभी तीन दिन तो कभी सात दिन में घर लौटा करते थे। ना खाने पीने की सुध ना सोने जागने का समय।
   बहुत कम समय हुकुम गद्दी पर रहे लेकिन उन्होंने काफी कुछ बदल दिया इसलिए आपको इतनी सुविधा हो रही राज काज में वरना तो यहाँ इतनी कठिनाइयां थीं कि क्या कहा जाए?
     हुकुम की तो बात ही अलग थी। निराले हैं वो!”

  ” ये कौन सी सुविधा मिल रही हमें , सुबह छै बजे जगा कर कह रहे सुविधा है? चलो अब जरा चाय पी  ली जाए, गला सूख सा गया है।”

  ” जी राजा साहब! आप चाय नाश्ता लीजिये तब तक मैं ऑफिस का एक चक्कर लगा आता हूँ, उसके बाद हमें ग्राम भ्रमण के लिए चलना है। फिर वहीं से तहसील कार्यालय निकल जाएंगे।”

  लाचारगी से समर को देख विराज खाने के कक्ष की ओर बढ़ गया। उसे इतना त्रस्त देख समर मुस्कुरा कर अपनी हंसी छिपाता ऑफिस की तरफ निकल गया।

    समर ऑफिस की तरफ बढ़ रहा था कि सामने से आती केसर उससे टकरा गई..

” संभल के चलिए ज़रा । नज़रें कहाँ हैं आपकी?”

  केसर ने घूर कर समर को देखा पर दूसरे ही पल मुस्कुरा उठी। इधर पिछले कुछ दिनों से उसकी सोची हर चाल उल्टी पड़ती जा रही थी। कहाँ तो बाँसुरी से महल से निकालने की खुशी भी वो ठीक से मना नही पायी थी कि राजा खुद साल बीतते गद्दी छोड़ कहीं निकल गया।
    राजा के वहाँ से निकलते ही उसके ढ़ी मंसूबों पर तो वैसे भी पानी फिर गया था।
   उसने उसी वक्त सोचा की अदित्यप्रताप को इस बारे में खबर देना बहुत ज़रूरी है पर जाने कैसे उसी वक्त उसका फ़ोन महल से गायब हो गया।
     उसकी हालत बिल्कुल पर कटे पंछी सी होकर रह गयी थी। अपने ही जाल में वो उलझ कर रह गयी थी।
पिता की तबियत के साथ अपने ऊपर होने वाले जानलेवा हमलों से बचने के नाम पर ही उसने महल में पनाह ली थी , अब आख़िर जब उसके महल में घुसने का प्रयोजन ही समाप्त हो चुका था वो यहाँ से वापस बाहर निकलने का कोई मार्ग खोज नही पा रही थी।
   ऊपर से समर नाम की विषबेल उससे हर वक्त ऐसी चिपकी पड़ी थी कि वो शांति से किसी से फ़ोन पर बात भी नही कर पा रही थी, और इसी सब के बीच उसका प्राणप्रिय फ़ोन गुम हो गया…

” अब क्या कहें । जिन पर नज़रें थीं वो जाने कहाँ गुम हुए बैठे हैं?”

  केसर का इशारा समझ समर मुस्कुरा उठा…


” आप सी अजूबा लड़की आज तक नही देखी मैंने। अपने ही होने वाले पति के सामने किसी और पुरुष की बात कर रही हैं आप? मानने लायक गट्स हैं आपमें।”

  ” और भी बहुत कुछ है । खैर वो छोड़ो ये बताओ तुम्हारे हुकुम हैं कहाँ?”

  “क्यों आपकी बात नही हुई उनसे?”

“हमारे पास अब फोन ही कहाँ हैं। कबसे गुम हुआ पड़ा है, हम सबसे कह कह कर थक चुके लेकिन हमें एक अदद मोबाइल नही मिला इस महल में।”

  ” ओह्ह हाँ! मैं भूल गया था, आज ही आपके लिए मोबाइल की व्यवस्था हो जाएगी। और मुझे तो यह लगा था कि हुकुम आपसे बात करने के बाद ही निकले होंगे कि वो ये राज पाट छोड़ कर जा रहें हैं हमेशा के लिए।”

  ” क्या ? हमेशा के लिए? हमें तो लगा वो विराज को सबक सिखाने ही एक आध महीने के लिए उसे राजगद्दी देकर  गयें हैं और जल्दी ही वापस आ जाएंगे कुछ समय में।”

” नहीं ऐसा कुछ नहीं है अब वो जल्दी वापस नहीं आएंगे।”

  ” पर गए कहाँ हैं?”

  ” आपको तो मालूम है ना उनके एक हाथ में तकलीफ थी।  वही तकलीफ बढ़ने लगी थी, उस हाथ में पैरालिसिस ना हो जाए इसी से उसे बचाने के लिए वह अपने इलाज के लिए विदेश चले गए हैं।”

  “और उनकी पत्नी?”

  ” उनके बारे में जितना आप जानती हैं उतना ही मैं भी।”

  ” मतलब वह कहां है किसी को नहीं पता? अजीब राज महल है आपका,  राज महल की रानी गायब है डेढ़ साल से और महल को खबर ही नहीं।”

  ” जब उनके पति ही राजा नहीं रहे तो वह रानी कैसी हुई? अभी तो रानी के पद पर रानी रेखा हुकुम हैं।

  केसर अजीब सा मुंह बनाकर समर को घूरती हुई वहां से चली गई । आदित्य प्रताप के लिए अब उसके पास कोई भी खास खबर नहीं बची थी। महल में अब उसके रहने का भी कोई औचित्य नहीं रह गया था ।
    उसका राजा से विवाह करने के पीछे जो भी कारण था उसका राज वह अकेली ही जानती थी…
    लेकिन राजा के इस तरह से वहां से चले जाने से उसके मंसूबों पर पानी फिर चुका था। राजा का हाथ भविष्य में खराब हो सकता है  यह भी उसके लिए एक चिंता का विषय था।
    एक अपाहिज और राज्य से निकाला हुआ राजा जो अपनी राजगद्दी छोड़ चुका है , जो अब पैसों पैसों के लिए मोहताज है क्या इसी राजा से केसर शादी करना चाहती थी? राजा से बदला लेने के पीछे कहीं ना कहीं उसकी चाहत राजा को रास्ते पर ले आने की ही तो थी और आज जब राजा वाकई रास्ते पर आ चुका था तब उसे ह्रदय में इतनी पीड़ा क्यों हो रही थी अपनी परेशानी का कोई हल ना समझ वह वहां से विराट के कमरे में चली गई।
    इस पूरे महल में किसी को वो सच्चे दिल से अपना मित्र मानती थी तो वो विराट ही था….

********

    बाँसुरी अपने दोस्तों से विदा लिए राजा के साथ उसके कमरे में चली आयी।
    दो कमरों और एक रसोई बस इतना ही बड़ा घर था। देखने में बिल्कुल साधारण से उस घर में ज़रूरत भर का सामान और किसी भी तरह की कोई सुख विलासिता की सामग्री न देख बाँसुरी की आंखें भर आईं…

   ” आप यहाँ रह रहें हैं साहेब?”

  ” हाँ क्यों ? घर पसन्द नही आया? “

  ” जिस जगह पर आप हैं वो जगह वैसे ही सोने की बन जाती है , पसन्द न आने की कोई बात ही नही।”

  ” फिर ? आंखों में आंसू क्यों चले आये?”

  “इतनी बड़ी रियासत का राजा जिसका खुद का कमरा उस पूरे घर से दुगुना बड़ा है वो यहाँ रह रहा है और वो भी बिना किसी सहूलियत के… क्या इतना काफी नही है मेरी आँखें  भिगोने के लिए।”

  राजा ने आगे बढ़ कर बाँसुरी को गले से लगा लिया..

  ” इतना भावुक मत हो बाँसुरी! मैंने तो बहुत पहले से ही यह सब सोच रखा था इसी से चाहता था कि तुम खुद अपने बल बूते कुछ कर लो जिससे एक तो तुम्हारा आत्मविश्वास नही डगमगाएगा और दूजा तुम्हें मेरे साथ ये वनवास नही झेलना पड़ेगा।”

  ” अच्छा ! बड़े स्वार्थी निकले आप तो। सारे सुखों का स्वाद चखा कर ज़िन्दगी के असली स्वाद का मज़ा अकेले उठा रहे। ”

  ऑंसू पोछती बाँसुरी उठ खड़ी हुई…

  ” बस मेरी ट्रेनिंग खत्म हो जाये उसके बाद जहाँ मेरे साहेब वहाँ उनकी बाँसुरी । समझे आप? “

  “मैंने कब मना किया हुकुम! लेकिन आपकी सरकार आपको छोड़ेगी नही। वो तो यही चाहेंगे कि आप उनके दिए सरकारी आवास में रहें।”

  ” हाँ बिल्कुल ! तो क्या राजा साहब की आन कम हो जाएगी अगर वो अपनी बीवी को मिले सरकारी आवास में साथ रह गए?”

   “बातें बनाना खूब सीख गई हो।” राजा मुस्कुराते हुए बाँसुरी को देखने लगा…

  ” क्या करूँ ? पिछले एक डेढ़ साल से बातें ही नही की थी किसी से। बस हाँ हूँ से काम चला लेती थी। अब जाकर तो साहब मिलें हैं मुझे अभी भी नही बोलूंगी तो कब बोलूंगी….

  “बोलो बोलो मैंने कब मना किया।”

  ” नही लेकिन पहले मैं कुछ बना कर आपको खिलाना चाहतीं हूँ । आप काफी कमजोर लग रहे मुझे।”

  “ऐसी कोई बात नही। पढ़ पढ़ कर आँखे खराब हो गयी तुम्हारी। अच्छा खासा तो हूँ।”

  राजा को नज़रंदाज़ करती बाँसुरी रसोई में चली गयी। रसोई में जो सामग्री मौजूद थी उसी से खाना बनाती वो वहीं से पूछ ताछ में भी लगी थी। प्रेम भैया कहाँ है? निरमा को साथ क्यों नही ले आते ? कम से कम ढंग का खाना तो खा पाएंगे। वगैरह बातें कहते हुए उसने दाल और चावल बना लिए।
   रह रह के रसोई  में भी उसकी आंखें  भरी आ रही थी। कहाँ महल की राजसी छप्पन भोग थाली और कहाँ ये रसोई।
    सच में आखिर राजा ने इतना कठोर निर्णय खुद के लिए क्यों लिया था उसकी समझ के परे था।
   शुरू शुरू में उसे भी महल में बहुत असुविधा होती थी लेकिन अब तो वहाँ से दूर रह कर वो महल को भी बहुत याद करने लगी थी।
    महल के वो मिलिट्री से कायदे कानूनों में बंधा अनुशासन भरा खाना पीना। सुबह अलार्म से पहले ही जाग कर तैयार हो कर दादी साहेब के साथ आरती के लिए भागना,वो शाम की चाय में महल की सभी रानियों के साथ हल्की फुल्की गपशप करना। अपने कमरे की बालकनी में अपने साहेब की बाहें थामें चाँद देखना…. उसका किटने कुछ उसी महल में छूट कर रह गया था।
      लड़कियों का हृदय इतना भावुक क्यों होता है आखिर। जब तक ससुराल में होती हैं मायका याद आता है और जब ससुराल छूट जाए तब ससुराल की यादें जान लेने लगती हैं।

   लेकिन साहब को क्या होता जा रहा था,वो कईं ऐसा अजीब निर्णय ले बैठे थे। क्या महल में रह कर वहाँ की समस्याओं से निपटा नही जा सकता था?

    वो जब पढ़ने आयी तब तो उसके लिए हर सुख सुविधा का इंतज़ाम उसके साहेब ने बिना किसी कमी के कर दिया था, फिर अब खुद के लिए क्यों इतना संकुचित हो बैठे थे।
   राजा तो राजा ही होता है भले गद्दी पर ना हो तब भी, वो कुछ सोच थाली में खाना परोस कर बाहर चली आयी…

    अपने हाथों से राजा को खिलाती वो पूछ ही बैठी..

” इतना कठोर निर्णय क्या सोच कर लिया साहेब? ना ही विराज में राजा बनने की खूबी थी और ना ही आपके ऊपर राजगद्दी छोड़ने का कोई दबाव था फिर आपने आखिर ऐसा किया क्यों?”

  ” बाँसुरी मैं बहुत सुख से हूँ। तुम इस घर की हालत देख कर ये अंदाज़ा न लगाओ की मैं किसी परेशानी में हूँ। और अब तो कमाने लगा हूँ। बस दो तीन महीनों में इससे ठीक घर लेकर शिफ्ट हो जाऊंगा । ठीक है।”

हां में सर हिला कर बाँसुरी उसे खिलाती रही…

  ” खुद भी तो खा लो। बस मुझे ही खिलाती जा रही हो?”

  ” पता है साहेब ! दुनिया की हर औरत की सबसे बड़ी ख्वाहिश यही होती है कि वो अपने हाथों से खाना बना कर अपने पति को खिलाएं, लेकिन वहाँ महल में मेरी ये इच्छा कभी पूरी ही नही हो पाती थी।”

  राजा मुस्कुराता रहा और बाँसुरी अपनी बात कहती उसे खिलाती रही…

  “वहाँ तो अगर आपके लिए कुछ पकाने रसोई में चले भी जाओ तो आपके खानसामा और महाराज ऐसे घूर कर देखते जैसे कोई पाप हो गया है। आपको पता है एक बार मैं आपके लिए दम आलू बनाने गयी। मेरे बनाते में आपके महाराज मुझे पांच से छै बार टोक चुके थे कि रानी हुकुम हल्दी बस इतनी ही डालें, हुकुम ये मसाला कम करें, हुकुम ये डालें वो न डालें।
   हुकुम हुकुम हुकुम ! मुझे लगा ये मुझे हुकुम बोल बोल कर अपना हुकुम मुझ पर चला रहा उसके बाद बची खुची कसर वो जो आपका चखुआ बैठता था न उसने कर दी।
    बताइये आपके महल की रसोई में एक आदमी सिर्फ भोजन चखने भर के लाखों रुपये चट कर जाता था।”

  “वो तो ज़रूरी है न हुक़ूम! हम महलवासियों के मित्र से अधिक शत्रु होतें है । किसी ने खाने में ज़हर मिला दिया तो? वो अपना जीवन दाँव पर लगा कर हमारा भोजन चखता है आखिर!”

  ” हम्म और उसी चखने चखाने में मेरी बनाई आधी सब्ज़ी खा गया।”

  बाँसुरी के ऐसा कहते ही राजा जोर से हँस पड़ा…
उसे हंसते देख बाँसुरी भी हँस पड़ी। उसका रात वहाँ रुकना मुश्किल था। उसकी ट्रेनिंग अभी समाप्त नही हुई थी ।
    किसी भी प्रशिक्षु को ट्रेनिंग सेंटर से बाहर रुकने की मंजूरी नही मिलती थी लेकिन आज जाने कईं बाँसुरी का राजा को छोड़ कर जाने का बिल्कुल मन नही कर रहा था।
  
   खाना खत्म होते ही उसने रसोई साफ की और कॉफी के लिए दूध चढ़ाने लगी। कुछ सोच कर बाहर निकली ही थी कि उसने देखा राजा गहरी नींद सो चुका था।
    वो कहीं हॉल के बाहर खुलती गैलरी में खड़ी बाहर देखती रही।
    कुछ देर में राजा की नींद खुल गयी वो भी बाहर आ कर उसके पास ही खड़ा हो गया…
  बाँसुरी उसके कंधे से लगी खड़ी रही…

  ” आप क्या बता रहे थे उस वक्त?”

  ” क्या बता रहा था?”

  ” कि आप कमाने भी लगे हैं? कहाँ काम कर रहे आप? और क्या कर रहे हैं?

  राजा कुछ देर को सोच में डूब गया। एकाएक उसे याद ही नही आया कि बाँसुरी क्या पूछ रही है और उसका क्या जवाब होगा।
   वो सोचते सोचते ही अंदर वापस आ गया। सामने सोफे पर रखे अपने लैपटॉप को देख उसे अचानक से सब याद आ गया।
   लैपटॉप खोल वो आज के ट्रेंडस देखने में लग गया।
उसे काम करता देख बाँसुरी भी रसोई में कॉफी बनाने चली गयी…

    बाँसुरी के कॉफी लेकर आने तक में राजा काफी हद तक सामान्य हो चुका था…
  बाँसुरी की तरफ देख उसने कॉफी पकड़ी और उसके बैठने के लिए जगह बनाते हुए लैपटॉप अपनी गोद में रख लिया…
   बाँसुरी भी उसके बगल में बैठी उसकी स्क्रीन को देखती रही…

  ” ये तो आपका अकाउंट नही है? आपके अकाउंट के बारे में तो मुझे पता था, अभी बदल दिया क्या?”

  ” नही ये मेरा अकाउंट नही है। ये आदित्यप्रताप का अकाउंट है जो मैं हैंडल कर रहा हूँ।”


  ” आदित्यप्रताप ?” बाँसुरी को सोच में डूबा देख आदित्य के बारे में राजा उसे सब बताने लगा। सारी बातें सुनती बैठी बाँसुरी चिंतित हो उठी…

  ” अब उसके यहाँ काम करने का क्या मतलब है? मेरा मतलब अगर वो आपको पहचान गया तो?”

  ” मैं तो चाहता ही हूँ कि वो मुझे पहचान जाए, लेकिन राजा अजातशत्रु के नाम से नही बल्कि अपने बड़े भाई के तौर पर। वो भी हमारे महल का ही हिस्सा है और उसे उसका हक मिलना ही चाहिए और मैं उसे भी उसका हक उसका महल में स्थान दिलवा कर रहूँगा।
    मैं ये नही कह सकता कि उस वक्त गलती किसकी थी। शायद वक्त ही खराब चल रहा था ….
   समझ नही आता कि डैड का प्रभुत्वशाली स्वभाव था  या काका साहब की हद से अधिक बुज़दिली लेकिन जो भी था हर्ज़ाना आज अकेला आदित्य भर रहा है।
   इस कुछ समय मे उसे करीब से जानने का मौका मिला है और मुझे यही लग रहा है कि वो अपने चारों ओर  गुस्से और नाराज़गी का एक अभेद्य किला बनाये बैठा है जिससे कोई भी बाहर का आदमी अंदर न प्रवेश कर पाए।
  न वो किसी से ज्यादा बोलता है ना मिलता है। बस सारा समय काम और काम।
  अब बस समर केसर वाला पेंच भी पता कर के बता दे तब मैं अपना अगला कदम बढाऊँ। वैसे अभी तक तो जैसा सोच रखा था वैसा ही चल रहा है।
  आदित्य जो दुनिया में किसी पर विश्वास नही करता अब मुझ पर थोड़ा बहुत ही सही भरोसा करने लगा है।

  जैसा इतने दिनों में मैंने आदित्य को देखा और जाना है मुझे अब केसर वाली बात पर विश्वास नही हो पा रहा है। खैर धीरे धीरे सच्चाई सामने आ ही जाएगी।
   एक बात और कहुँ बंसी ! मुझे कभी कभी आदित्य में पिंकी की झलक भी नज़र आने लगती है।”

  “आप कौन सी मिट्टी से बने हैं साहेब?”

  राजा ने प्रश्नवाचक नज़रें बाँसुरी पर टिका दी…

  “पूरी दुनिया की फिक्र है आपको, एक खुद की ही कोई फ़िक्र नही करते ।”

” क्यों अगर खुद की फिक्र नही करता तो बार बार ऐसे भाग कर तुमसे मिलने क्यों आता भला। खुद की फिक्र है इसलिए तो तुम्हारा साथ चाहता हूँ। तुम्हारे करीब रहना चाहता हूँ।”

  ” बस बातें बनवा लो राजा साहब से।  ”

मुस्कुराती हुई बाँसुरी कॉफी के कप उठा कर जाने लगी…

” अच्छा सुनो बाँसुरी !”

  ” हाँ कहिये साहब !”

  “ऐसा लग रहा है कुछ भूल रहा हूँ मैं? अभी हम क्या बातें कर रहे थे।”

  बाँसुरी आश्चर्य से थम कर उसे देखने लगी….

   ” हाँ याद आ गया….”

    बाँसुरी परेशान सी वापस उसके पास आ कर बैठ गयी।
   राजा ने उसे बाहों में भर लिया…” इतना परेशान मत हो। शायद स्ट्रेस कुछ ज्यादा हो हो गया है मुझे। मुझे एक ब्रेक की ज़रूरत है। आदित्य के कारण आजकल ट्रेंड्स पर भी दिन रात नज़र रखना पड़ रहा है ना।”

  “हम्म” कह बाँसुरी उसकी बाहों में सिमट तो गयी लेकिन दिमाग में उसके कुछ देर पहले पूछा राजा का सवाल चक्कर काटता रह गया….

  क्रमशः


aparna….


         कुछ दिल से…

   आप सभी पाठकों का हृदय से आभार व्यक्त करतीं हूँ । पहला आप लोग मुझे पढ़ते और सराहते हैं दूसरा धैर्य से प्रतीक्षा करतें हैं और तीसरा मेरी कहानी के गुमनाम पात्रों के नाम याद दिला कर उनके बारे में लिखने की मीठी सी गुज़ारिश करतें हैं।
   कभी कोई प्रिंस के बारे में पढना चाहता है तो कोई अदिति भास्कर के बारे में। कोई पिंकी रतन तो कोई युवराज भैया और समर। इस सब में सबके स्वीटहार्ट प्रेम और निरमा को अगर दो एपिसोड न लिखूं तो सब उन्हें भी याद करने लगते हैं।

  वो कहतें हैं ना रायता फैल गया, मुझे तो लगता है मुझसे रायते का पूरा डोंगा ही गिर कर बिखर गया है। ऐसा फैला है रायता की दोनो हाथो से समेटने पर भी  और फैलता ही जा रहा है। जाने कब तक और कैसे समेट पाऊँगी।

   हालात यह है कि अब तो लोग विराज और केसर को भी याद करने लगे हैं।

  आप सभी का प्रेम ही है जो इतना सारा लिख पायी और आगे भी लिखती रहूंगी।

  पिछले भाग में पटाखा नही बॉम्ब समीक्षा मिली जो सिर्फ गुस्से वाली इमोजी थी।
          
            😡😡😡😡😡😡ये

इसे देख कर ही डर लग गया इसलिए जैसे तैसे दौड़ भाग कर ये पार्ट पूरा कर ही लिया।
   वैसे jokes apart …  आप सभी के प्यार के लिए और आपकी लिखी गयी प्रेम भरी पाती ( समीक्षओं) के लिए रेटिंग्स और स्टिकर्स के लिए दिल से धन्यवाद आभार
शुक्रिया
नवाज़िश….

  aparna ….


 



      

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s