जीवनसाथी -88

जीवनसाथी 88



      समर रियासत के दौरे पर विराज के साथ एक जगह से दूसरी जगह घूम रहा था, दोपहर ढलने को थी कि उसके पिता का फ़ोन चला आया…

  ” समर तुम्हारी माँ की तबियत कुछ ठीक नही लग रही, उन्हें अस्पताल लेकर चलना है, अगर तुम आ जाते तो…

  ” जी मैं तुरंत पहुंच रहा हूँ …..
  
    माँ की तबियत समर के लिए सबसे संवेदनशील बात थी, उसने विराज से जैसे ही महल वापस चलने की बात कही वो एकदम से खुश हो गया…

  ” नही राजा साहेब आप यहीं रुके, मुझे निकलना पड़ेगा..

” अरे क्यों ? और तुम्हारे बिना हमें कुछ समझ तो आना नही है, इससे अच्छा है हम भी महल ही चलतें हैं, और आज के लिए काम भी बहुत हो गया है समर, इससे ज्यादा काम कर लिया तो हमारे किये काम का ही हार्ट फेल हो जाएगा।”

  विराज की बात पर माँ की चिंता के बावजूद समर मुस्कुरा उठा, उसे भी दिख रहा था कि विराज अपनी क्षमता से अधिक कार्य कर रहा है, आखिर उस पर तरस खाते समर ने आगे बढ़ कर उसके लिए भी गाड़ी का दरवाजा खोल दिया…

   जितनी ही तेज़ी से समर महल की ओर गाड़ी भगाता गया, उतनी ही तेज़ी से महल से माँ और पिता को साथ लिए अस्पताल की ओर भाग चला…

   अब अस्पताल के लिए शहर भागने की ज़रूरत नही थी, राजा के दादा जी के नाम पर वहीं अस्पताल बन चुका था…..
    गाड़ी बाहर खड़े किए समर भाग कर रिसेप्शन पर पहुंच गया। अस्पताल बहुत बड़ा तो नही था लेकिन सर्वसुविधायुक्त था, और अब शहर से कई बड़े डॉक्टर्स भी हफ्ते के अलग अलग दिनों में वहाँ सेवाएं दे रहे थे, कुछ नए डॉक्टर्स भी वहाँ काम करने लगे थे।
   मरीज़ को कैसा लग रहा है? किस डॉक्टर को दिखाना है आदि औपचारिक सवालों के बाद ओपीडी पर्ची बना कर समर के हाथ मे रख सिस्टर ने उसे दाईं तरफ एक कमरा दिखा दिया…

   माँ और पिता को पीछे आते देख वो इस हड़बड़ी में की अभी तो केबिन के बाहर कोई नही है, अगर मैं नही गया तो कोई और न घुस जाए सोचकर डॉक्टर की केबिन का द्वार खटखटा उठा..

  ” यस कम इन!”

  एक मीठी सी आवाज़ सरगम की तरह उसके कानों से टकरा कर लौट गई….

समर दरवाज़ा खोले अपनी माँ की फाइल थामे अंदर चला गया।
    टेबल के पीछे रिवोल्विंग चेयर पर एक लड़की आंखों पर चश्मा चढ़ाये बैठी जल्दी जल्दी किसी फाइल को पढ़ने की कोशिश में थी कि उसके ठीक सामने बैठे समर ने अपनी माँ की फाइल उसके कुछ और सामने खिसका दी।
     अपनी फाइल को पहले पढ़ने का उसका इशारा समझ वो अपनी बड़ी बड़ी आंखों से उसे घूरने लगी, और फिर आखिर उसने समर की फाइल खोल ली….

  ” एज क्या है आपकी ?”

   “जी ?”

  ” एज पूछ रहीं हूँ एज यानी उम्र?”
  सामने बैठी उस डॉक्टर का ऐसा सवाल सुन समर चौन्क गया…

  ” अठ्ठाईस का हो गया हूँ लगभग।”

  चश्में को नाक पर टिकाये वो जल्दी जल्दी समर की फाइल पढ़ रही थी, फाइल में ही आंखें घुसाए उसने फिर एक सवाल पूछ लिया…

  ” लगभग ? लगभग क्या होता है, अब मैं तेईस की हूँ तो हूँ उसमें आधा पौना लगभग थोड़े ही जुड़ता है..”

  ” जी मतलब ? ” समर को ये अजूबी डॉक्टरनी कुछ समझ में नही आई

“देखिए मैं ये कहना चाहती हूँ कि आपकी उम्र बहुत कम है और इतनी छोटी सी उम्र में आपको आर्थराइटिस यानी गठिया वात हो गया है, आपको तो बारिश बिजली वाले मौसम में बहुत दिक्कत होती होगी? “

  समर को समझ आ गया था कि लड़की उसकी माँ की फाइल को उसकी फाइल समझ बैठी है, शायद हड़बड़ी में उसने रोगी के नाम पर ध्यान ही नही दिया था…

  “वैसे बहुत घबराने वाली कोई बात नही है,अभी क्या हुआ था जो आपको अचानक दिखाने आना पड़ा?

  ” जी वो परसों से एक नई दवा शुरू हुई थी, कल से ही उस दवा के बाद पेट में जलन शुरू हो गयी थी लेकिन आज तो घबराहट ही होने लग गयी इसलिए…

  इतनी देर में सामने बैठी डॉक्टर प्रेस्क्रिप्शन पढ़ चुकी थी…

  ” होगी ही, इतनी हाई डोज़ के साथ कोई एसिडिटी रेगुलेटर तो दिया ही नही है, समझे आप?

  उतनी देर में समर के फोन पर उसके पिता का मैसेज आ गया…” तुम्हारी माँ को यहाँ बाहर ही उनकी डॉक्टर मिल गयी , बातचीत कर के इनकीं समस्या सुन उन्होंने एक इंटेसिड इंजेक्शन भी लगा दिया है। यहाँ इनडोर वार्ड के में हैं हम लोग। तुम कहाँ हो यही आ जाओ।”

   ” आइये लेट जाइए !”

  ” लेकिन क्यों? “

  ” आपको इंजेक्शन दे दूं।!”

  ” वो तो हाथ में भी दिया जा सकता है उसके लिए लेटने की क्या ज़रूरत?”

   एक बार फिर फाइल पर झुकी आंखें समर को फटकारने के अंदाज़ में ही उठीं …

  ” ऐसा दर्द होगा न कि नानी याद आ जायेगी,चुपचाप कमर में लगवा लो।”

  ” मुझे डर लगता है इंजेक्शन से !”

  अबकी बार लड़की अपनी जगह से खड़ी हो गयी, मैरून कुर्ती स्टाइल के टॉप के साथ नीली जीन्स पहनी लड़की खुले बालों में बहुत प्यारी लग रही थी, अपने बैग के हैंडल पर फंसा रखा क्लच निकाल कर उसने अपने बाल बांधे और हाथों को स्पिरिट से साफ करने लगी..

  ” जीन्स खोलिए और लेट जाइए।”

  ” व्हाट ? पागल हो गईं है क्या आप? मुझे कोई इंजेक्शन नही लगवाना!”

  अब लड़की सामने बैठे समर को जबरदस्त गुस्से में घूरने लगी….” ये दवा नही खाना वो इंजेक्शन नही लगवाना जब इतने नखरे रहते हैं तो अस्पताल क्यों आते है आप लोग? खुद ही अपना इलाज क्यों नही कर लेते? एक तो हमारे हिंदुस्तान में अस्सी फीसदी जनता स्वयं डॉक्टर होती है, इन्हें सब मालूम है कि किस नजले में क्या दवा खाना है कब क्या परहेज़ करना है लेकिन करेंगे कुछ नही। उल्टा आप जैसे लोग आकर हमारा ही दिमाग खा जातें हैं। सर्दी बुखार से परेशान रहेंगे और हाथ सामने टेबल पर फैला देंगे जरा बीपी चेक कर दीजिए मैडम। मलतब बीपी इंस्ट्रूमेंट न हुआ कोई खिलौना हो गया। ,यहाँ तक कि साथ आया अटेंडर भी कई बार मैडम हमारा भी बीपी जांच देंगी क्या?  की फरियाद लगा जाता है, और उस पर चेक करते समय ही सारे दुनिया जहान की शिकायतें सुनाने लगते हैं। ओ मैन आई एम रियली फेड अप!

       इतनी बकबक के बाद जाने क्या सोच कर वो ज़रा नरमी से पेश आने लगी…

  ” अच्छा मेरी बात ध्यान से सुनो, यहाँ सब कहतें हैं मेरा हाथ बहुत सॉफ्ट है , ये देखो!”

  उसने अपना हाथ समर के सामने फैला दिया, समर उसका हाथ छूने ही वाला था कि उसने अपना हाथ वापस खींच लिया..

” अरे सॉफ्ट है मतलब मेरे हाथ से इंजेक्शन में दर्द नही होता,कैसे बुद्धू हो, चलो जल्दी से लेट जाओ अब..”

  ” नही बिल्कुल नही लेटूंगा।”

” क्यों अब क्या हुआ?”

” मुझे शर्म आती है !”

“किस बात की शर्म?”

” अरे मैं किसी लड़की से इंजेक्शन नहीं लगवा सकता हूं वह भी कमर पर।”

” हर है यार!  मैं लड़की नहीं हूं मैं डॉक्टर हूं!”

” मतलब डॉक्टर कोई अलग जेंडर होता है क्या?”

” हां! बिल्कुल जिस समय हम डॉक्टर होते हैं  ना उस समय हमारे सामने जो होता है वह सिर्फ मरीज होता है वह ना लड़का होता है ना लड़की। अब लेट जाओ चुपचाप। “

  समर लेटने को तैयार नहीं था, आखिर उस लड़की ने इंजेक्शन नीचे रख दिया….

”  चलिए कोई बात नहीं आप इंजेक्शन नहीं लेना चाहते हैं मैं आपको दवा लिख देती हूं… अभी एक मिनट एक बार और मैं आपकी फाइल चेक कर लूं।”

  अबकी बार ध्यान से प्रोफाइल पढ़ती लड़की एक जगह पर आकर अटक गई उसने आंख उठाकर समर को देखा और फिर सवाल पूछ लिया…

” इसमें तो लिखा है मेनो पॉज हो चुका है? “

“जी आप इतनी देर से मेरी माँ की रिपोर्ट पढ़ रहीं हैं”

  वो लड़की जीभ काट कर रह गयी, वो कुछ और बोलने जा रही थी कि एक दोहरे बदन की और हृष्ट पुष्ट महिला चिकित्सक अंदर चली आयी…
    उसे अंदर आते देख वह लड़की झट अपनी सीट से उठकर उस कुर्सी के बगल में खड़ी हो गई रौबदार महिला अंदर आई और रिवाल्विंग चेयर में बैठकर समर की ओर मुड़ गई उसकी फाइल हाथ में लेते ही वो समर को पहचान गई….

” आपकी मॉम को इंजेक्शन दे दिया है उन्हें अभी काफी आराम है सुबह उन्हें जो घबराहट हो रही थी वह दवा की डोज के के कारण हो रही थी! मैंने जरा डोज भी कम किया है।
   आपकी मॉम का पेन बीच बीच में बढ़ता रहता है, मैं सोच रही हूँ फिसियोथेरेपी भी शुरू करवा दूं।”

  वो सीनियर डॉक्टर उस लड़की की तरफ मुड़ गयी….

” पिया कल से फिजियोथेरेपी वाली सुधा को साथ लेकर तुम इनके घर चले जाना । एड्रेस यह लिखवा देंगे सुबह 1 घंटे का सेशन फिजियोथैरेपी का अपनी निगरानी में करवा लेना ठीक है ? ”

  ” ओके मैम! ” उसके बाद वो सीनियर डॉक्टर समर की माँ की फाइल थामे  कई बातें पिया को समझाती रहीं, और वो चुपचाप यस मैम ! ओके मैम ! करती रही।
    एक बार किसी बात पर उसे हल्की सी झड़प भी पड़ गयी। अब तक समर के सामने सीनियर बनी बैठी पिया इस तरह उसके सामने डांट खा कर उदास सी हो गयी।
   सीनियर डॉक्टरनी ने फाइल के साथ पिया को बाहर भेज दिया और खुद समर की ओर मुड़ गयी….
  
   ” अच्छी होशियार बच्ची है। इंटर्न है मेरे यहाँ, सब जल्दी जल्दी  सीख लूँ इसी बात की ललक है। हर फाइल बहुत ध्यान से पढ़ती है मेरी।”

  समर को उनकी बात सुन कुछ देर पहले की बात याद कर हंसी आ गयी..

  “जी !वैसे नाम क्या बताया मैंम आपने उन डॉक्टर का?”

  ” पिया!! पिया नाम है उसका पिया अग्रवाल!

  ” तो यह पिया जी कल से हमारे घर आने वाली है?”

” हां सुबह के वक्त आ जाएगी 9:00 से 10:00 फिजियो का सेशन अपनी निगरानी में करवा कर लेगी, असल में फिजियोथेरेपिस्ट भी नई है,  इसलिए पिया का जाना साथ में जरूरी है। दो-चार दिन बाद सुधा अकेली जाकर फिजियो सेशन ले लिया करेगी।”

  ” जी !” समर उनसे बात कर बाहर निकल गया, वो इनडोर की तरफ बढ़ गया, वहीं उसके माता पिता के पास खड़ी पिया उसकी माँ को दवाओं के बारे में बता रही थी।
    उन्हें एक एक दवा के लेने का तरीका नफा नुकसान समझाती पिया को देख उसे वापस पिया की बेवकूफी याद कर हंसी आ गयी, उसे अचानक सामने खड़ा देख वो वापस झेंप गयी।

  ” आई एम सॉरी ,वो मैंने सोचा आपको आर्थराइटिस की प्रॉब्लम…

  ” इट्स ओके ! कोई बात नही, वैसे कल से आप हमारे घर आने वालीं हैं कहीं माँ की जगह मेरी थेरेपी शुरू मत करवा देना।”

  ” अरे नही ! बिल्कुल नही।”

  ” पक्का ना?”

पिया मुस्कुरा कर नीचे देखने लगी, समर की माँ के वहाँ से उठ कर जाते ही वो भी अपने हाथ में थामी बाकी मरीजों की फाइल लिए दूसरी तरफ बढ़ गयी…

    गाड़ी में माँ और पिता को बैठाने के बाद समर खुद ड्राइविंग सीट पर आया और जाने क्या सोच वापस एक बार अस्पताल की तरफ शायद पिया को एक झलक देखने मुड़ गया, उसी वक्त फाइलें पकड़े आगे बढ़ती पिया भी न जाने क्या सोच मुड़ी और दोनो ही एक दूसरे को देख मुस्कुरा उठे।
    समर गाड़ी को घुमा कर महल की ओर निकल गया और पिया अपने बाकी मरीज़ों को देखने…

  **********

      शनिवार का दिन था , भास्कर ऑफिस ही में था, अदिति की छुट्टी होने से वो घर पर ही थी….
   घर पर होने से उसने अपनी दोस्त को फ़ोन मिला लिया….

  ” जिया आ ना, पनीर के पकौड़े बना लुंगी, साथ बैठ कर खाएंगे चाय पियेंगे और गप्पे लड़ाएंगे..”

  ” नही यार अदिति आज नही आ पाऊँगी, आज ये भी घर पर हैं ना..!”

  ” क्या यार मैंने बेसन भी घोल लिया था पनीर काट लिया था, टमाटर धनिया की चटनी तक पीस ली थी और तू मना कर रही है अब।”

” यार आज माफ कर दे, ये नही होते तो पक्का आ जाती। अरे तूने जब इतनी तैयारी कर ही ली है तो अपने पति को ही खिला देना।

  “हम्म , अब तो उन्हें ही खिलाना पड़ेगा।”

  ” ऐसा क्यों बोल रही यार, अपने पति को तो टेस्टी खाना खिलाना चाहिए पुण्य का काम है।

  “हम्म लेकिन मैं मानती हूँ कि टेस्टी से ज्यादा हेल्थी खिलाना चाहिए पुण्य मिले ना मिले हस्बैंड की हेल्थ अच्छी ज़रूर रहती है। खैर चल तू आ नही रही तो जाती हूँ आज भास्कर को ही खिला दूंगी।”

  शाम को घर में घुसते ही पकौड़ो की खुशबू से भास्कर खुश हो गया। उसके फ्रेश होने तक में अदिति ने गरामगरम चाय और पकौड़े सजा दिए

  ” क्या बात है?आज कौन सी सहेली आयी थी जो पकौड़े बनें थे।”

  अदिति प्यार से भास्कर को देख उसके मुहँ में एक पकौड़ा ठूंस कर मुस्कुरा उठी…

” मेरी जान आज स्पेशली तुम्हारे लिए ही बनाया है।”

” सच्ची? लेकिन आज अचानक इतनी मेहरबानी क्यों?

  भास्कर तुरन्त मोबाइल पर कुछ देखने लगा…

  ” मोबाइल पर क्या देखने लगे?”

“देख रहा हूँ कहीं सोने चांदी का दाम तो नही गिर गया जो सोने के हार के लिए मेरी अदिति मुझे खुश कर रही है।”

  अदिति मुहँ बनाये प्लेट उठा कर अंदर जाने लगी

  “अरे मज़ाक कर रहा था यार,दो वापस प्लेट मुझे दो।

  उसके हाथ से प्लेट ले गपागप खाता भास्कर आज कई दिनों के दलिया और खिचड़ी के बाद पकौड़े पाया था इसी से उसे खाने के बीच रुकना बिल्कुल मंज़ूर ना था…

  “और बताओ अदिति क्या चल रहा ?”

  “बस क्या बताऊँ, चार दिन से जिया रोज़ कह रही थी तेरे हाथ के पकौड़े खाने हैं आज बना कर उसे बुलाया तो मैडम ने मना कर दिया।”


” ओह्ह तो ये वो पकौड़े हैं.”

  अदिति जीभ काट कर रह गयी, बातचीत के प्रवाह में जाने कैसे छिपाई हुई बात सामने आ गयी, वो अपनी बात के लिए माफी मांगती कि उसने देखा भास्कर मज़े से खाने में मग्न था।

  ” अब भई बनाये किसी के लिए भी हों गए तो हमारे ही पेट में । यार अदिति एक कप चाय और मिलेगी क्या? “

  अदिति ने घूर कर उसे देखा… ” अभी तो एक कप पी ना !”

  अदिति के भाव देख भास्कर समझ गया कि इसका अभी उठ कर रसोई में जाने का बिल्कुल मूड नही है लेकिन भास्कर को भी चाय की जबरदस्त तलब लगी थी, आखिर उसने हुकुम का इक्का निकाल ही लिया
    अदिती की आंखों के सामने एक पांच सौ का नोट लहरा गया और उसकी आँखों मे चमक वापस आ गयी….

  “तुम भी ना, सुधरने वाले नही हो।”

  मुस्कुरा कर पांच सौ का नोट लपकती मुस्कुराती अदिति रसोई में भास्कर के लिए एक कप चाय और बनाने चली गयी….


  *********

       प्रेम को शाम में वापस लौटना था, सुबह से निरमा उससे कुछ कहना चाह रही थी। कभी कुर्सी के हैंडल से खेलती कभी बैठे बैठे टांगों को हिलाती अपनी ही सोच में डूबी निरमा को देख प्रेम ने पूछ ही लिया…

“कुछ परेशान लग रही हो? कुछ कहना था क्या?”

  निरमा ना बोल कर वहाँ से उठ गई। मामी और मामा जी पड़ोस वाले घर में सत्यनारायण कथा में सम्मिलित होने गए हुए थे,मीठी भी साथ हो ली थी।

   निरमा के पीछे प्रेम भी अंदर चला आया…

  ” साफ साफ बोलो निरमा क्या बात है? ऐसे मुझे कैसे समझ में आएगा कि तुम किस बात पर परेशान हो?”

” जी वो ….मैं कुछ बताना चाहती थी..!

  ” हाँ बोलो ना!”

  ” I am expecting I mean we are expecting …

  निरमा की बात सुन प्रेम के चेहरे पर लंबी सी मुस्कान चली आयी, उसने आगे बढ़ कर निरमा को गले से लगा लिया…

    लेकिन अचानक ही वो थोड़ा गंभीर हो उठा और उसने निरमा को खुद से दूर कर दिया…

  ” निरमा मुझे नही लगता कि हम अभी दूसरे बच्चे के लिए तैयार हैं!”

  ” मुझे लगा ही था आप ऐसा ही कुछ कहेंगे..

  “लेकिन एक मिनट ये सब हुआ कब? मैंने तो पहले ही कह रखा था कि मीठी के अलावा हम कभी दूसरे बेबी के लिए नही सोचेंगे, और जहाँ तक मुझे याद है हमने हमेशा ही प्रिकॉशन…

  ” हो जाता है कभी कभी! सब कुछ हमारे हाथ में थोड़े न है।
     मैं ये कहना चाहती थी कि मैं इस बेबी को रखना चाहती हूँ। मेरे लिए ये बहुत अनमोल है , आपका और मेरा हिस्सा है ये।
   मैं ये नही कह रही कि मीठी मेरे लिए अनमोल नही है, मैं माँ हूँ आखिर मेरे दोनों बच्चे मेरी आँखों के दो तारे ही रहेंगे….

   निरमा की बात को प्रेम बीच में ही काट गया

  ” तुम्हारी भावनाओं को अच्छे से समझता हूँ निरमा इसलिए तो मैं चाहता ही नही था कि कभी बात यहाँ तक पहुंच जाए।
    तुम्हें क्या लगता है मैं इतना कठोर हूँ कि मुझे बच्चा नही चाहिए या फिर मैं अपनी जिम्मेदारियों और उत्तरदायित्वों से डर कर तुमसे ऐसा कह रहा हूँ।
   मेरे लिए भी तो ये स्वर्णिम क्षण है कि मेरा अंश मेरा अपना हिस्सा तुम्हारे अंदर पल रहा है ।
   आखिर किसी के प्यार की सबसे सुखद परिणीति यही तो होती है ना।
  किसी के प्यार और समर्पण का सबसे सुखद और सुंदर फल उनका अपना बच्चा ही तो होता है लेकिन जाने क्यों मन में एक डर सा बैठा है कि हमारा बच्चा आ जाने पर कहीं हम मीठी की तरफ से लापरवाह ना हो जाएं।
    मैं मीठी के साथ किसी भी तरह का पक्षपात सहन नही कर पाऊंगा, ये तुम भी जानती हो।”

  ” क्यों होगा मीठी के साथ पक्षपात? ये आप कैसी अजूबा बातें कर रहें हैं। क्या दूसरा बच्चा हो जाने से पहले बच्चे के प्रति माँ बाप लापरवाह हो जातें हैं। आप खुद दो भाई होते हुए भी ऐसा कैसे कह सकतें हैं? “

  कहने को तो निरमा कह गयी लेकिन अपनी बात समझने और प्रेम की बात के पीछे छिपा कारण समझने के बाद एकाएक चुप हो गयी।

  “मेरी बहुत ज्यादा बोलने की आदत नही है निरमा। हो सकता है तुम मेरी भावनाएं न समझ पाओ, पर मुझे यही लगता है कि मीठी के अलावा मुझे और बच्चे की कोई चाह नही है।
   और मैं ये बच्चा नही चाहता। बाकी तुम माँ हो तुम्हारे ऊपर है रखना चाहती हो या नही।”

  ” आप समझते क्यों नही,मीठी एक लड़की है कल को अपने घर चली जायेगी फिर ? उसके बाद क्या होगा हमारा? एक बेटा भी तो चाहिए ना?”

  ” तुम्हें कैसे पता कि ये बेटा ही है। और ये तो बाद कि बात है कि क्या होता है, मैं बस ये कहना चाहता हूँ कि मेरे लिए मेरी एक ही संतान है और वो है मीठी। मेरी बेटी या बेटा जो मानना है वो ही है बस और वो ही रहेगी।
   उसके पिता की हैसियत से मैं बस यही कहना चाहता हूँ कि अब मीठी के बाद मुझे औलाद की कोई ज़रूरत नही है।”

    ये सुनना था कि गुस्से में पैर पटकती निरमा सीढ़ियां चढ़ अपने कमरे में चली गयी।
   प्रेम ने भी निरमा के पीछे ऊपर जाने की कोई जहमत नही उठायी। घर का दरवाजा खोल वो भी कहीं बाहर निकल गया…

   कहाँ तो निरमा ने सोचा था अपनी प्रेग्नेंसी का झूठ बोल वो इसी बहाने प्रेम के साथ दिल्ली चली जायेगी और कहाँ बात ही पलट गई, उसने सोचा था प्रेम खुश हो जाएगा और वो उसे इसी बात पर साथ रहने मना लेगी लेकिन यहाँ तो पासा ही पलट गया।
  बात बात पे बात ऐसी बढ़ी की वो तमक कर पैर पटकती ऊपर चली आयी, उस वक्त भी उसे लगा कि प्रेम पीछे से उसे मनाने चला आएगा… पर वो नही आया…
     कुछ देर तक उसकी राह देखने के बाद धीरे धीरे जब निरमा का गुस्सा कम होने लगा तब उसने सिलसिलेवार सोचना शुरू किया और उसे प्रेम के मन की बात समझ आने लगी…
   वो समझ गयी थी कि प्रेम के मन में ये डर बैठा है कि उन दोनों का अपना बच्चा आ जाने से कहीं प्रताप की निशानी के प्रति उन दोनों का स्नेह कम न हो जाये।
   उसके मन में ये आया भी कैसे क्या किसी माँ के मन में ये भेदभाव आ सकता है कभी? और पिता के मन में ?
   हां पिता के मन में तो आ ही सकता है जब एक खुद की संतान हो और दूसरी भाई की तो जाहिर है भेदभाव आ सकता है…. लेकिन प्रेम को खुद पर यकीन नही है?
   जबकि इतने कम समय में मैं खुद उन्हें इतना जान गयीं हूँ कि आशा ही नही विश्वास है, की ये आदमी दोनो बच्चों में कभी कोई भेदभाव नही कर पायेगा।”
    अपने ही मन में उलझी निरमा की आंखों से आंसुओ की घार बह चली…”हे भगवान ! किस मिट्टी से बनाया है इस आदमी को…. सिर्फ इस डर से की कहीं अपने भाई की बेटी के प्रति प्यार कम न हो जाये ये अपनी संतान नही चाहते, धन्य हैं ये और इनके मन के भाव।  मैं भी फ़िज़ूल ही इन पर नाराज़ हो उठी, अब जाकर सच बता देना ही सही रहेगा।”

   अपने आंसूओं को पोछती निरमा नीचे आयी तब तक में मामा मामी भी वापस लौट कर आ चुके थे, उन्हें आया देख वो उनके लिए चाय बनाने चली गयी। उतनी ही देर में  प्रेम भी वापस चला आया।
    आते वक्त वो अपने साथ मीठी के लिए ढेर सारे खिलौने कपड़े और चॉकलेट्स भी उठा लाया था।
सभी के सामने निरमा को प्रेम से कुछ कहने का मौका ही नही मिला …
   रात के खाने के बाद ही उसे वापस निकलना था।
खाने की टेबल पर खाना परोसते वक्त भी निरमा प्रेम से कुछ कह नही पायी, पर उसने इस बात पर गौर ज़रूर किया कि प्रेम और दिनों की अपेक्षा आज कुछ ज्यादा ही खामोश था।
   स्वभाव से गंभीर तो वो हमेशा से था, ज़रूरत से ज्यादा बोलना, बात बात पर मुस्कुराना उसे वैसे भी कम पसन्द था लेकिन आज बात ही अलग थी। आज उसकी ऐसी गुमसुम खामोशी निरमा को खाये जा रही थी, आज पहली बार उसे प्रेम को देख उससे कुछ भी कहने में डर लग रहा था।
     अपनी सारी हिम्मत जोड़ उसने धीमे से गुनगुनाते हुए कहा…

  “मैं भी साथ चलूं? मीठी आपको बहुत मिस करती हैं यहाँ?”

  उसे पूरी उम्मीद थी कि अब प्रेम ज़रूर उसे ज़ोर से डांट लगा जाएगा, लेकिन उसकी सोच के विपरीत वो धीमे से कुछ और ही बोल गया…

  “आधे घंटे में निकलना है फटाफट अपना सामान बांध लो।”

  प्रेम के मुहँ से ये सुनते ही वो भाग कर अपने कमरे में चली गई। अपने खुद के सामान की उसे चिंता नहीं थी लेकिन मीठी का हर एक समान रखना बहुत जरूरी था, इसलिए भाग भागकर कभी इधर कभी उधर से मीठी का सामान जमा कर करके उसने आधे घंटे में अपनी और मीठी की फटाफट पैकिंग कर ही ली।
मामी जी भी निरमा की मदद करने ऊपर ही चली आई

   “इतना अचानक से जाने का प्रोग्राम कैसे बना लिया? मैं तेरे लिए कुछ तैयारी भी नहीं कर पाई!”

” कोई बात नहीं मामी, मैं तो आती ही रहती हूं हमेशा! आपको जो भी भेजना होगा आप कोरियर कर देना”

    मामी निरमा की हड़बड़ी देख मुस्कुरा उठी….

  ” जानती हूं बेटा ऐसा ही होता है हर औरत के साथ,  पति के बिना मायका भी रास नहीं आता,  जाओ खूब खुश रहो दोनो। खूब फ़लो फूलों, माँ बाप और चाहिए भी क्या? बेटी अपने घर संसार में तृप्त रहे सुखी रहे। दामाद भी हमे हीरे सा मिला है।”

  हँस कर निरमा मामी के गले से लग गयी….

   फटाफट सीढियां उतर वो नीचे चली आयी, मीठी को तैयार करते में प्रेम ऊपर से मीठी और निरमा का सामान भी साथ ले आया।
    मुम्बई के ट्रैफिक के कारण उसने मामाजी को अपनी गाड़ी निकालने से मना किया और कैब बुला ली।
    सारे रास्ते मीठी को गोद में लिए बैठा प्रेम मीठी को खिड़की से बाहर कुछ न कुछ दिखाने में व्यस्त रहा और निरमा को रास्ते में उसे सच बताने का मौका ही नही मिला।
   फ्लाइट में भी एकदम अंतिम समय पर बुकिंग होने से निरमा और प्रेम की सीट अलग अलग ही थी।
मुम्बई से दिल्ली पहुंचते में फिर दोनो की इस बारे में कोई बात ही नही हो पाई…

******

     आधी रात प्यास से बेहाल बाँसुरी की नींद खुली , उसने देखा उसके बाजू वाला हिस्सा खाली पड़ा था, वो चौन्क कर उठ बैठी।
   एक ही तो बैडरूम है आखिर राजा चला कहाँ गया सोचती वो तुरंत बाहर निकल आयी…
   बाहर का हॉल भी ख़ाली पड़ा था, रसोई बाथरूम राजा कहीं भी नही था।
   बाँसुरी ने हॉल में लगी बालकनी को देखा और उसकी सांस में सांस आयी…

  बालकनी में कुर्सी पर बैठा राजा अपना लैपटॉप खोले कुछ काम कर रहा था…

  “साहब ! इतनी रात गए क्या कर रहें हैं आप?

   राजा एकदम से बांसुरी को सामने देख चौन्क गया..

  ” यू एस मार्किट इसी वक्त खुला होता है ना हुकुम!बस वही देख रहा हूँ।।”

  ” इतना काम में डूबे रहेंगे तो स्ट्रेस तो होगा न। रात में तीन बजे कौन काम करता है भला!”

” करते हैं हुकुम ! जिनकी आंखों में बड़े सपने होतें है ना वो समय की परवाह किये बिना काम करतें हैं।”

  ” किस चीज़ की कमी है आपको साहेब! उसके बावजूद इतनी मेहनत वो भी उसके लिए जिसने आपको जाने कितनी बार मारने की कोशिश की है।”

  ” ऐसा क्यों सोचती हो। ये सोच के देखो की ये सारी मेहनत मैं अपने ही छोटे भाई के लिए कर रहा हूँ, कल वो भी महल का हिस्सा बन जायेगा तो आखिर ये मेहनत मेरे अपने लिए ही हुई ना? “

” आप और आपके अजीब लॉजिक। मैं तो बस यही मनाती हूँ भगवान से कि लोग आपकी अच्छाई और सच्चाई को समझ सकें। ज़िस दिन इन सभी ने आपको समझना शुरू कर दिया इनके जीवन की सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी।”

  ” कैसे हुकुम? उनकी समस्याएं या मेरी समस्याएं।”

  ” मैंने उन्हीं की कहा हुकुम! क्योंकि जो आपको समझ गया जान गया वो फिर आपसे जुड़ ही जायेगा और आप ऐसा पारस हैं कि आपसे जुड़ने वाला हर इंसान सोना बन जाता है, तो आपसे जुड़ कर उनकी समस्याएं खत्म हो जाएंगी ना! अब समझ में आई मेरी बात?”

  ” हुकुम आप तो आप है। अजीबोग़रीब लॉजिक देने में आप कौन सा पीछे हैं मुझसे।”

  मुस्कुरा कर बाँसुरी भी वहीं बैठ गयी…राजा ने उसे जाकर सोने का इशारा किया और फिर लैपटॉप में घुस गया, जब दस मिनट बीतने पर भी वो नही उठी तो राजा को लैपटॉप बंद करना ही पड़ा …

  ” ज़िद्दी बहुत हो तुम बाँसुरी।अच्छी खासी सो रहीं थी, सोती ही रहती लेकिन जासूसी का शौक है ना!”

” और क्या, जब साहेब बाजू में न हो तो कैसे भला किसी बीवी को नींद आएगी। कहीं पतिदेव बाहर बैठे किसी दूसरी लड़की से इश्क़ न फरमा रहें हों। और मेरा पति तो है भी इश्क़ करने लायक!”

” अच्छा जी ! ऐसा … अब चलो ज्यादा बातें न घुमाओ, चलो चल कर सो जातें हैं।”

  “पक्का सो जाना, अब तो आप पर नज़र रखनी पड़ेगी की सोते भी हैं कि नही उसके बाद मुझे डराते रहेंगे की मैं ये भूल गया मैं वो भूल गया।”

  हंसते हुए राजा बाँसुरी को गोद में उठाये अंदर चला गया।


   अगले दिन रविवार होने से राजा को भी ऑफिस नही जाना था, उसने और बाँसुरी ने शेखर रिदान और लींना को आज खाने पर बुला लिया था। दोनों सुबह से तैयारियों में लगे थे…
      नियत समय से कुछ पहले ही तीनो आ गए। लीना बाँसुरी के साथ रसोई में चली गयी..
   शेखर चुपचाप बैठा था, राजा ही उन लोगों से इधर उधर की पूछताछ में लगा था, ट्रेनिंग से सम्बंधित बातों के शुरू होते ही धीरे धीरे शेखर अपनी लय में आने लगा।
    धीरे धीरे उसकी राजा से खुल कर बातचीत शुरू हो गयी।
    अपनी तैयारी ट्रेनिंग सारी बातें बताते उसने आखिर पूछ ही लिया कि राजा साहब अपना महल छोड़ कर यहाँ क्या कर रहें हैं।
  तब तक में बाँसुरी और लींना भी खाना लिए बाहर आ चुके थे।
  खाते पीते राजा ने बताने लायक सारी बातें उन तीनों को भी बता दी हालांकि आदित्यप्रताप और उससे जुड़ी सारी बातें वो बड़ी शालीनता से छिपा भी गया।
    शेखर बुरी तरह से राजा से प्रभावित हो चुका था,लेकिन उसे इतने बड़े राजा साहब का ऐसा सादा जीवन सुकून नही दे पा रहा था। जाने क्यों राजा को ऐसे देख उसका हृदय उमड़ने लगा था।
   वो खुद नही समझ पा रहा था कि बाँसुरी के पति के लिए तो उसके मन में जलन की भावना होनी चाहिए बावजूद उसे उसके प्रति आसक्ति क्यों महसूस हो रही थी।
    ये राजा के व्यक्तित्व का जादू था या बाँसुरी के प्रति मोह की पराकाष्ठा की उससे जुड़ी हर चीज़ हर बात शेखर को प्यारी हो गयी थी…

  “राज साहेब ! अगर आप आज्ञा दें तो कुछ कह सकता हूँ?”

  ” दोस्त इतना फॉर्मल मत रहो मेरे साथ। तुम सब बाँसुरी के दोस्त हो तो इस नाते मेरे भी दोस्त ही हुए, तुम मेरा नाम भी ले सकते हो।”

  शेखर मुस्कुरा कर रह गया…

  “आपका रिश्ता ही रिस्पेक्ट वाला जुड़ गया है , आप हमारी दोस्त के पति हैं हमारे लिए आदरणीय हुए ना।”

  ” साहेब आप शेखर जी से बातों में नही जीत सकते। इंटरव्यू में इन्होंने सामने वालों के सवालों की जो धज्जियाँ उड़ाई हैं कि इनके पूछे सवालों को अब इंस्टिट्यूट में इंटरव्यू की तैयारी के लिए पढ़ाया जाने लगा है।”

  बाँसुरी के मुहँ से अपनी तारीफ सुन शेखर झेंप गया, राजा ने मुस्कुरा कर शेखर के कंधे थपथपा दिए…

  ” हाँ बोलो क्या कह रहे थे?”

  ” मैं ये कह रहा था कि आप इतने प्रसिद्ध है अपनी जनता के बीच। आप चुनाव में क्यों नही खड़े हो जाते। मुझे सौ प्रतिशत यकीन है कि आप ज़रूर जीतेंगे और एक एक सीढियां चढ़ते हुए एक दिन आप अपनी रियासत के जैसे जाने किने शहरों गावों सब के राजा बन जाएंगे जिस दिन आप अपने राज्य के मुख्यमंत्री बन जाएंगे।”

  ” हाँ आप ठीक कह रहे हैं शेखर जी! इस तरह से तो मैंने सोचा ही नही। अब तक तो एक ही रियासत के हुकुम थे अब पूरे राज्य के मंत्री….

  ” अरे बस बस हुकुम ! आप तो तुरंत सपनों के घोड़ो पर सवार निकल जाती हैं।
   वो सब बाद में देखेंगे आइये पहले कुछ मीठा खा लीजिये, हमारे महल का नियम है खाने के बाद हम सभी मीठा ज़रूर खाते हैं….”

  बाँसुरी को लगा राजा इस वक्त इस बारे में कोई बात नही करना चाहता इसलिए उसने भी दुबारा बिना कुछ कहे खीर की कटोरियाँ सभी की तरफ बढ़ा दीं और अपनी कटोरी से राजा को खिलाती खुश होती रही।
   शेखर ने एक नज़र उन्हें देखा और वापस अपनी कटोरी देखता खाने लगा….

********

      सुबह सात बजे से फिसियो का सेशन होना था इसलिए फिसियोथेरेपिस्ट को अपनी स्कूटी में पीछे बैठाए पिया सुबह सुबह महल पहुंच गई।
   उसे पता लिखवाते समय न समर ने उसे बताया कि ये महल का पता है और ना ही पिया ने जानने की कोशिश की।
  उसे ये ज़रूर मालूम था कि ये अस्पताल महल वालों का है लेकिन उसकी सोच में कोई बड़ा सा अंग्रेज़ो के ज़माने जैसा बड़ा बंगला होगा जिसे ये आत्म मुग्ध लोग महल कहा करतें होंगे।
   लेकिन महल के मुख्य द्वार पर पहुंच कर वो सन्न रह गयी। उसकी सादी सी जीन्स और टीशर्ट के साथ पीठ पर लटका बैगपैक इतने शानदार महल के सामने जैसे उसका मजाक उड़ाता खड़ा था।
   वो स्कूटी खड़ी किये सोच रही थी कि भीतर जाए या नही की पीछे बैठी सुधा चहक उठी…

  ” चलिए न मैडम ! हमें यहीं जाना है।”

  भौचक्की सी पिया सुधा की तरफ मुड़ गयी…

  ” यार ये तो कुछ ज्यादा ही शानदार नही लग रहा बल्कि शानदार से भी ज्यादा कुछ हो तो वो है ये महल। ”

  ” कल उस लड़के को देख के आपको नही लगा था कि वो यहाँ रहता होगा।”

  ” शक्ल से हैंडसम तो था बंदा लेकिन ऐसा रईस निकलेगा ये नही सोचा था मैंने।”

” तो अब सोच लीजिये मैडम और अंदर चलिए। और वैसे भी क्या फर्क पड़ता है हमें। ये रईस और चमकीले लोग मन के ज़बरदस्त काले होते हैं। पर हमें क्या हम तो अपना काम करेंगे सेशन देंगे कुछ खाएंगे पियेंगे और निकल जाएंगे।”

” अरे यार सुधा कितनी खब्बू है यार तू! मरीज़ के घर पर कौन खाता है भला?”

  ” मरीज़ अगर महल में रहता हो तो हम तो खा लेते हैं भई। हम खाने पे ध्यान लगा लेंगे आप कल वाले बंदे को छाप लेना।”

  ” चुप कर यार ! कहाँ मैं इतनी क्लासी डॉक्टर और कहाँ वो …?

” सूझा नही ना कि क्या बुराई करूं?”

  उनकी बातों के बीच ही अचानक बाहर से जॉगिंग कर के लौटता समर उनकी स्कूटी के ठीक सामने आकर खड़ा हो गया, उसे अचानक देख दोनों लड़कियां हड़बड़ा गयीं

  ” किसकी बुराई नही सूझी? मेरी? ”

  ” नही नही! हम तो ये बात कर रहे थे कि आपका महल बहुत शानदार है।”

  “मेरा महल नही है ये। ये राजा अजातशत्रु का महल है, मैं उनका मंत्री हूँ।”

  उसकी बात सुन पिया ज़ोर से हँसने लगी…

  ” सॉरी मंत्री जी आपकी बात सुन मुझे बचपन में खेला एक खेल याद आ गया, राजा मंत्री चोर सिपाही, और वही याद कर के हंसी आ गयी कि मैं अक्सर चोर बन जाती थी उसमें ।”

  वो वापस खिलखिला कर हँस पड़ी पर फिर अपनी बेवकूफी पर झेंपती वो सुधा को साथ लिए अंदर चली गयी…

  क्रमशः

  aparna…..

 


  


 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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