जीवनसाथी -89


   जीवनसाथी 89

  
  
    
  प्रेम निरमा को साथ लिए दिल्ली पहुंचा तब तक काफी रात हो चुकी थी, आधी रात में घर पहुंच कर वो राजा को जगाना नही चाहता था, इधर कुछ दिनों से वो भी इस बात पर ध्यान दे रहा था कि राजा की नींद समय असमय खुलती ही रहती है।
    एयरपोर्ट के पास ही एक होटल लेकर वो निरमा और मीठी को साथ लिए वहीं चला गया। निरमा ने कारण पूछना चाहा भी तो गोलमोल सा जवाब दिए वो उन दोनों को कमरे में छोड़ बाहर चला गया।
     प्रेम का इंतेज़ार करती निरमा आखिर मीठी को सुलाते सुलाते खुद भी सो गई।
   सुबह प्रेम के जगाने पर ही उसकी नींद खुली, उन दोनों से तैयार होने बोल वो खुद कैब लेने बाहर चला गया।

      निरमा प्रेम के साथ घर पहुंची तब राजा घर पर ही बैठा अपने लैपटॉप पर कुछ ज़रूरी काम कर रहा था।
  घर में प्रवेश करते ही निरमा की आंखे फटी रह गयी।
उसने सोचा भी नही था कि प्रेम और राजा इतने साधारण से घर में रह रहे थे।
    दो कमरों और छोटी सी रसोई वाला घर जहाँ सिर्फ ज़रूरत भर का फर्नीचर पड़ा था…
  उसे उस घर को देखते ही राजा का महल राजा का आलिशान कमरा राजा का पर्सनल जिम उसका अस्तबल सब याद आ गया।
   राजा के कमरे का बाथरूम इस घर से बड़ा था। आखिर क्या सोच कर ये दोनों सनकी वहाँ सब छोड़ छाड़ कर यहाँ चले आये थे। उससे तो प्रेम ने आज तक कुछ नही बताया था।
  यही एक कमी तो थी प्रेम में! वो उसके पास बैठी सारी दुनिया जहान की बातें उसे बताया करती थी और वो बस मुस्कुराते हुए सब सुनता भर रहता, और कुछ बोलने बोलो तो “तुम्हें सुनना बहुत सुकून देता है” कह कर छुट्टी पा लेता पर मजाल जो महल या राजा से जुड़ी कोई भी बात उसे बता दे।
      अगर राजा ने प्रेम से कह दिया कि ये बात किसी को नही पता चलनी चाहिए तो फिर वो बात उसके सीने में दफन हो जाया करती थी।
    वो सोचने लगी थी , राजा और प्रेम के यहाँ आने से पहले कई दिनों से समर आकर प्रेम के साथ नीचे बैठा जाने किस गूढ़ मंत्रणा में लगा रहता था।
   उसे समझ तो आ रहा था कि ये लोग कुछ बड़ी तैयारी कर रहें हैं लेकिन अचानक से इतना बड़ा निर्णय ?
   वो आश्चर्य में डूबी खड़ी थी कि राजा ने उसे ऐसे खड़े देख पूछ ही लिया…

  ” क्या हुआ निरमा ? अंदर आ जाओ, बाहर क्यों खड़ी रह गयी।”

  वो राजा बनने के बाद भी उसे हुकुम की जगह राजा भैया ही बुलाती थी…

  “कुछ नही राजा भैया। बस ऐसे ही…

” अंदर आओ । मैं चाय बना लेता हूँ, तुम दोनों थक कर आये हो!”

  “अरे नही नही! आप क्यों कष्ट करेंगे। मैं तो आयी ही इसलिए हूँ, मैं अभी बना लेती हूँ।”

  अपनी आंखों के ऑंसू छिपाती निरमा रसोई की ओर बढ़ गयी।
   अब उसे समझ आ गया था कि आखिर प्रेम उसे क्यों नही लेकर आ रहा था।
    इतना बड़ा राजा और ऐसे रह रहा है ? आखिर क्यों? वो चाहे तो अपना परिचय बता कर ही अच्छे खासे ठाठ से रह सकता है बिना एक रुपया खर्च किये।
   खैर अगर ये दोनों ऐसे रह रहे तो इसके पीछे कोई बड़ा कारण ही होगा,खुद के विचारों में उलझी निरमा की आंखों से लगातार ऑंसू बह रहे थे।
   चाय खौलती चली जा रही थी कि प्रेम ने आकर बर्नर बंद कर दिया…

” क्या हुआ ? तुम रो क्यों रही हो? “

  प्रेम जिसने दो दिन से उससे बात नही की थी के सांत्वना भरे शब्द सुनते ही वो सिसक कर रो पड़ी

  ” खुद को संभालो निरमा! हुकुम क्या सोचेंगे भला? ”

” आप दोनों यहाँ ऐसे क्यों रह रहे ? आखिर ऐसी क्या मजबूरी है?”

  ” वो सब बाद में बता दूंगा, अभी चाय छान लो। घर इतना बड़ा नही है कि हुकुम हमारी बातें न सुन पाएं। तुम्हारी परेशानी उन्हें भी परेशान कर जाएगी।”

  “हम्म ” निरमा को खुद पर ही गुस्सा आने लगा, क्यों बिना सोचे समझे वो कुछ भी बोल बैठी। अभी तक तो उसने अपनी सच्चाई भी प्रेम को नही बताई थी । अब कब बताए और कैसे बताए भला?

   वो तीन कप में चाय लिए बाहर आ गयी, मीठी राजा की गोद में फुदकती उसकी घड़ी के डायल से खेल रही थी।

” मीठी नही बेटा कहीं घड़ी टूट न जाए, बहुत कीमती है।”
   निरमा की बात सुन राजा हँसने लगा…

  ” ये क्या सीखा रही हो निरमा बच्ची को। वस्तु की कद्र उसके पहनने वाले से है वस्तु से हमारी पहचान नही है। इसलिए सामान की नही लोगों की कीमत होती है रिश्तों की कीमत होती है।
   अगर मीठी से ये घड़ी टूट भी जाये तब भी उसका मेरा रिश्ता हर उस सामान से कहीं कीमती ही रहेगा जो मैंने कोई मूल्य चुका कर खरीदा है।
बस ये कुछ रिश्ते ही तो हैं जिनके लिए हमें कोई मूल्य नही चुकाना पड़ता बस प्यार लुटाना होता है और ये वो खज़ाना है जो जितना लुटाया जाए और बढ़ता चला जाता है।
   है कि नही?”

  ” राजा भैया ! एक बात कहुँ , आपकी हर बात हर सोच हम आम लोगों से एकदम अलग है । अभी भी आपने जो निर्णय लिया है कुछ सोच कर ही लिया होगा, क्या बाँसुरी जानती है इस बारे में ? मेरा मतलब क्या उसने आपको यहाँ रहते देखा है?”

  राजा एक बार फिर खिलखिला उठा…

  ” जी हाँ! आपकी सहेली ने सिर्फ देखा ही नही बल्कि यहाँ मेरे साथ रुक कर अपने दोस्तों को यहाँ बुला कर दावत खिला कर गयी है!”

  निरमा के आश्चर्य का ठिकाना नही था। उसे इस तरह सोच में डूबी देख राजा ने बाँसुरी को फ़ोन लगा कर कुछ बातें कर फ़ोन निरमा की तरफ बढ़ा दिया….
   निरमा फ़ोन लिए अंदर चली गयी। कुछ दो चार औपचारिक बातों के बाद उसने बाँसुरी से पूछ ही लिया…

” बाँसुरी एक बात पूछूँ ? तू बुरा तो नही मान जाएगी ना ?”

” कैसी बात कर रही नीरू! पूछ ना!”

  “तू इतनी बड़ी कलक्टरनी बनने जा रही है! तुझे अजीब नही लगा इस छोटे से घर में अपने दोस्तों को बुलाने में? तुझे बुरा नही लगा राजा भैया अपने बाथरूम से भी छोटे घर में रह रहे हैं ?”

   उधर से बाँसुरी की भी हल्की सी हंसी निरमा को सुनाई पड़ी…

  “नीरू तेरी परेशानी समझ रहीं हूँ।। बिना किसी सुविधा के साहेब को देख कर दुख तो मुझे भी हुआ कि वो कैसे वहाँ रह पा रहे होंगे लेकिन प्रेम भैया हैं ना उनका खयाल रखने के लिए। दूसरी बात मुझे मेरे दोस्तों को वहाँ ले जाने में कोई झिझक नही हुई क्योंकि जिस जगह वो रह जातें हैं वो जगह फिर किसी महल से कम नही है मेरे लिए…
    महल राजा से होता है राजा थोड़े न अपने महल से पहचाना जाएगा।
  बस एक ही बात खटक रही थी कि इन लोगो के खाने पीने का कोई ठिकाना नही था। दोनों ही काम से बहुत देर से लौटते हैं। प्रेम भैया को भी रसोई संभालनी आती तो है नही,  तो कभी साहेब बना लेते हैं कभी प्रेम भैया और कभी सिर्फ फ्रूट्स और ब्रेड से गुज़ारा कर लेते हैं। मैं तो इसीलिए चाहती थी कि तू आ जाये कम से कम तेरे रहने से दोनों वक्त पर घर तो लौटेंगे।
    मेरे साहब की सुविधा की दो सबसे बड़ी चीजें मैं आज शाम को लेती आऊंगी… तुझसे मिलना भी हो जाएगा और फिर कल से हमारा भारत भ्रमण कार्यक्रम है तो मैं यहाँ से निकल जाऊंगी।”

  ” अच्छा लगा सुन के की आज ही तुझसे मिलना हो जाएगा! क्या खाएगी बताना वही बना रखूंगी।”

  ” मैं आ जाऊँ फिर साथ ही बना लेंगे।”

फ़ोन रखने के बाद निरमा को थोड़ी तसल्ली मिली। अपने बलबूते इतना बड़ा पद पाने के बाद भी बाँसुरी बिल्कुल पहले वाली बाँसुरी ही थी, और उसका विश्वास कितना अटूट था अपने साहेब पर।
  
            वो  खुद कितनी जल्दी विचलित हो गयी थी लेकिन देखा जाए तो उससे बड़ा धक्का तो बाँसुरी को लगा होगा बावजूद उसने मुस्कुरा कर इस सत्य को भी स्वीकार लिया।
       आखिर तभी तो राजा अजातशत्रु सिंह ने बाँसुरी को पसंद किया , क्योंकि उनकी नज़रों ने पहले ही भांप लिया था कि ये लड़की उनका पद और गरिमा देख कर उनसे प्यार नही करती बल्कि उनके व्यक्तित्व से उनसे प्यार करती है…

  मुस्कुरा कर निरमा रसोई में चली गयी… आज इतने दिनों बाद उसे प्रेम के लिए खाना बनाने का मौका मिला था, वो इस मौके का पूरा फायदा उठाना चाहती थी…
   वो उससे नाराज़ भी तो था, पहले तो उससे झूठ बोला और फिर उसकी मर्जी के बिना यहाँ चली आयी… प्रेम की नाराजगी वाजिब भी थी।
   शायद अपनी पसंदीदा खीर खा कर ही प्रेम बाबू का गुस्सा ठंडा हो जाये, और फिर धीरे से वो अपनी झूठी प्रेग्नेंसी वाली बात भी बता देगी।
   अभी तक तो मौका ही नही मिला था ये बताने का की उसने झूठ बोला है।

   नाश्ता कर के प्रेम और राजा अपने काम पर निकल गए थे, पीछे से साफ सुथरे घर की थोड़ी बहुत सफाई कर निरमा ने रसोई देखी और फिर ज़रूरी सामान की लिस्ट बना कर मीठी को साथ लिए बाजार निकल गयी…..

****

    राजा के आने के बाद से आदित्यप्रताप के ऑफिस का नक्शा ही बदल चुका था।
      
  नेतृत्व का गुण किसी विश्वविद्यालय स्कूल कॉलेज में नही सिखाया जा सकता ये अपने अंदर या तो होता है या नही। आप किसी से सम्मान मांग या छीन नही सकते हो। सकता है कभी किसी पद के कारण या किसी डर से कोई आपको सम्मान दे भी दे लेकिन असल सम्मान तो वह ही हैं जो आपने अपने स्वभाव से कमाया है अर्जित किया है।
  राजा के साथ भी ऐसा ही कुछ था। उसका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि वो जहाँ जाए लोग उसके नेतृत्व के आगे हंसते हंसते सर झुका लिया करते थे। उसे कभी किसी से नही कहना पड़ता था कि मेरी बात सुनो!

  उसकी छल कपट रहित वाणी ही इतनी तेजस्वी थी कि उसके सामने खुद ब खुद अगला व्यक्ति नतमस्तक हो जाता था।

   ऑफिस में भले ही उसने वित्तीय सलाहकार का पद धारण किया था लेकिन अब उस ऑफिस के प्रोडक्शन से लेकर मार्केटिंग तक के काम उसकी नज़रों से होकर ही आगे बढ़ने लगे थे।
    ऑफिस का सारा लेखा जोखा अब उसी के पास था। आदित्य को अब भी राजा पर आंख मूंदकर भरोसा कर ले ऐसा नही था लेकिन वो भी उस प्रतिभाशाली युवक से मन ही मन कुछ दबने लगा था।
  सामने से होकर भले ही न दिखाये लेकिन अपरोक्ष रूप से अपने हर काम पर पहले उसकी मुहर लगवा कर ही आदित्य अपने बड़े फैसले लेने लगा था।
   और इसी बात का फायदा उठा कर राजा ने धीरे धीरे आदित्य के अवैध और नीति विरूद्ध कामों को कम करना शुरू कर दिया था।
        
        आदित्य ने अपना काम इतना ज्यादा फैला रखा था कि हर काम का जोड़ घटाव देखना उसके बस के बाहर की बात थी।
    उसके कंस्ट्रक्शन के बिजनेस में मिलावटी सीमेंट और गिट्टी के भरोसे बहुमंजिली कमज़ोर इमारतें बनाने वालों के कम रुपयों के टेंडरों को लाल झंडी दिखाता राजा ईमानदार और कर्मठ लोगों को टेंडर दिलवा कर काम करवाने लगा था।
     बिट कॉइन्स और शेयर मार्केट से कमाया रुपया सही तरीके से व्यापार में लगवा कर उसने आदित्य को कई कर्ज़ों से भी उबार लिया था…
   
    आज भी ऑफ़िस में वो अपनी धुन में मग्न काम पर लगा था कि आदित्य की सेक्रेटरी रीमा हाथों में कॉफी लिए चली आयी…
    
  ” थोड़ा रेस्ट भी किया कीजिये अजातशत्रु जी!”

  राजा ने रीमा की ओर देखा और मुस्कुरा कर कॉफी थाम ली…

  “शुक्रिया रीमा जी !”

  ” सर आपको पता है आज हमारे बॉस का बर्थडे है, लेकिन बॉस इतने बड़े वाले खडूस है ना कि ऑफ़िस में किसी की हिम्मत नही हो रही उन्हें विश करने की।”

  ” पर ये तो गलत बात है। जन्मदिन तो सबसे खास दिन होता है और हम सब को उनके लिए इस दिन को सेलिब्रेट करना ही चाहिए।”

  ” सर हम सब भी करना चाहते हैं। एक साल उनके जन्मदिन पर स्टाफ ने केक और बुके के साथ जैसे ही उन्हें विश किया वो अचानक इतने गुस्से में आ गए कि उन्होंने सब के सामने ही केक उठा कर ज़मीन पर फेंक दिया, फूलों के चिथड़े उड़ा दिए और सख्त हिदायत दे डाली की अगली दफा न ही उनका और न किसी और का जन्मदिन ऑफिस में सेलेब्रेट किया जाए।
उनके अनुसार ऑफिस में सिर्फ काम होना चाहिए, बाकी सभी कामों के लिए घर और दोस्त हैं ना। और वो तो कभी कोई सेलिब्रेशन करना पसंद ही नही करते। सभी के ऑफिस में दीवाली होली सेलेब्रेट किया जाता है पर मजाल हमारे ऑफिस में मिठाई तक आ जाये यहाँ तक कि कोई नया कॉन्ट्रैक्ट मिलने की भी खुशी नही मनाई जाती सर।
   मैंने तो यहाँ तक भी सुना हैं कि सर अपने घर पर भी कोई त्योहार नही मनाते। रिश्तेदारों के नाम से ही उन्हें चिढ़ है।
  

  “और क्या सुना है अपने इनके बारे में?”

  ” और सुना है सर की इनके मॉम डैड बचपन में ही किसी रोड एक्सीडेंट में मारे गए थे , और उसके बाद इनके दादा जी के परिवार ने इन्हें अकेला छोड़ दिया तब इनके एक मामा ने इन्हें पाला पोसा और अपने पैरों पर खड़ा किया है।
   बॉस सिर्फ अपने उन्हीं एक मामा से बात करतें हैं वो भी कभी कभी।
पर एक बात है उनकी कही कोई बात हमारे बॉस कभी नही टालते, एक बार इनके मामा जी यहाँ आये थे, जब उनकी बेटी की शादी किसी रियासत के राजकुमार से तय हुई थी, उस वक्त पहली बार हम लोगों ने बॉस को मिठाई खाते देखा,वो भी इसलिए खाई क्योंकि खुद उनके मामा जी ने अपने हाथों से इनके मुहँ में डाल दी थी वरना ये कहाँ मिठाई विठाई खाते हैं।
 

  ” हम्म इसका मतलब बॉस मिठाई नही खाते? “

” नही कभी नही! अब अपनी खुन्नस के कारण नही खाते या फिटनेस फ्रीक हैं ये तो नही पता क्योंकि बॉस का दोपहर का लंच टाइम या फिर शाम को ऑफिस बंद होने के बाद का टाइम अक्सर ऑफिस के जिम में ही गुजरता है।”

  ” हम्म चलो फिर आज छोटे का बर्थडे सेलेब्रेट कर ही लिया जाए !”

  आदित्यप्रताप के लिए राजा के मुहँ से छोटे सुन रीमा की आंखें चमक उठी…

  “आप भी सर कुछ भी बोलते हैं। वो खडूस गोली मार  देगा सबको!”

  ” हाँ तो खा लेंगे गोली पर उसे केक खिला कर ही मानेंगे।”

   मुस्कुराते हुए राजा ने अपनी कॉफी का खाली कप नीचे रखा और फ़ोन उठाये समर का नम्बर मिलाने बाहर चला गया।

  *****

    महल में विराज की हालत खराब थी, उसे समर ने इतने सारे कामों में उलझा रखा था कि वो चाह कर भी उन कामों से खुद को अलग नही कर पाता था।
  जब उसे लगता कि आज उसने बहुत कुछ समय पर समाप्त कर लिया कि तभी उसी काम से एक नया काम पैदा हो जाता।
        उसका बाहर घूमना दोस्तों के साथ पार्टी करना सब धीरे धीरे कम होता जा रहा था।
  दोस्त भी सारे उसी की तरह के थे,स्वार्थी और मौकापरस्त ।
  उनमें से हमेशा कोई न कोई किसी न किसी बहाने विराज से पैसों की फरियाद लगाए रहता।
  पहले पहल जब राजा गद्दी पर था विराज पैसों को लेकर आये दिन किचकिच किया करता और राजा बिना किसी हील हुज्जत के उसके हाथों में पैसे रख दिया करता था, लेकिन अब दृश्य बदल चुका था।

   एक तो अब विराज उन लड़को के साथ जा नही पा रहा था उस पर भी उसके बिना उसके मित्र बराबरी से अपनी पार्टी में व्यस्त थे ऊपर से अपनी पार्टी का खर्चा भी विराज के सर मढ़े दे रहे थे। इन सब बातों से विराज भी थकने लगा था।
   उस सुबह भी वही हुआ…
 
  वो तैयार होकर दीवानखने में पहुंचा समर के साथ किसी कारोबारी के बारे में विचार विमर्श कर रहा था कि शहर के एक बड़े होटल का मालिक अपने मैनेजर को साथ लिए बदहवास सा वहाँ पहुंच गया…

  ” माफी चाहतें हैं हुकुम ऐसे अचानक आने के लिए लेकिन बात ही कुछ ऐसी थी…”

  विराज की समझ से परे था कि आखिर उसके ऊपर मुसीबतें टूटी हैं या मुसीबतों का पहाड़, बड़ी लाचारगी से उसने समर की ओर देखा, समर की मुस्कान पहले ही उसके लिए तैयार थी।
  समर आगे बढ़ उस आदमी से पूछ बैठा

  ” कहो? क्या परेशानी है?”

  ” जी हुजूर महीने भर से हुकुम के दोस्तों का आना जाना लगा हुआ है हमारे होटल में । पहले तो हुकुम भी आया करते थे उस वक्त भी उन्होंने देखा है कि उनके दोस्त क्या-क्या कारनामे किया करते थे। लेकिन अभी इधर महीने भर से माफ कीजिएगा हुजूर लेकिन आपके दोस्तों की बदतमीजी बढ़ती ही जा रही है,  सब आप के नाम पर खूब खाते पीते हैं तोड़फोड़ मचाते हैं लोगों को डराते हैं गाली गलौज करते हैं और बिना रुपया पैसा दिया चले जाते हैं।
   इन लोगों ने आपके नाम का खूब फायदा उठाया है हुकुम ।
   पहले जब आप इनके साथ हुआ करते थे तब राजा अजातशत्रु के नाम के डर के कारण यह लड़के उतनी दबंगई नहीं दिखाया करते थे लेकिन अब जब आप राजा बन गए हैं तो इन लोगों का हाथ कुछ ज्यादा ही खुल गया है। हुकुम रुपया पैसा तो इन लोगों ने कभी भी मेरे होटल में नहीं दिया और मैंने आज तक मांगा भी नहीं लेकिन कल इन लोगों की बदतमीजी सीमा पार कर गई ।
    कल इन लोगों ने एक लड़की का जो वहाँ अपने मंगेतर के साथ आई हुई थी का हाथ पकड़ लिया और लगे उससे बदतमीजी करने।
   अब साहब कोई आम आदमी भी अपनी मंगेतर के साथ हो रही बदतमीज़ी कैसे झेलता फिर वो लड़का तो पुलिस वाला था।
    उसने पहले उन लोगों को प्यार से समझाने की कोशिश की लेकिन जब उन लड़कों का हाथ सामने बैठी लड़की के माथे पर लिए घूंघट को पलटने उठा कि उस लड़के ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकाल ली हुकुम!”

  ” कोई मर तो नही गया? “

  “नही हुकुम मरेगा कौन? वो सब तो खाली लातों के भूत निकले। किसी मे कोई दम तो था नही बल्कि हम कहें तो आपके मित्र होने के अलावा उनमें कोई खुद का गुण तो है नही, सब के सब पिद्दी से बने एक ओर को हो गए।
   वो लड़का बड़ा सभ्य था, उसने बस गन दिखाई किया कुछ नही, लेकिन जैसे ही अपना बिल भर कर वो जाने को हुआ तो उनमें से एक को जाने क्या शरारत सूझी उसने उसके साथ बैठी लड़कीं के बारे में कुछ भद्दी सी टिप्प्णी दे दी, अब वो लड़का बौखला गया और उसने जो उन लोगों की आरती उतारी की किसी की हिम्मत नही पड़ी जाकर उस पुलिसवाले को रोक सके, वो तो भला हो उस लड़की का जिसने जाकर उसे अपनी कसम देकर रोक दिया और उसका हाथ पकड़ लगभग खींचते हुए उसे बाहर ले गयी, लेकिन हुज़ूर…

  मैनेजर कहते कहते अचानक रुक गया, वैसे भी जब उसने बोलना शुरू किया था तो दीवानखाने से सबको बाहर भिजवा दिया था,वहाँ समर और विराज ही थे बावजूद वो चारो ओर चोर नज़र से देखने लगा कि कोई उसकी गूढ़ से बात सुन न ले।

  ” आगे भी तो बोलिये क्या हुआ? वैसे इतनी बड़ी तो कोई बात लग नही रही, न उस लड़की की इज्जत लूटी और न पुलिस वाले ने किसी का खून किया फिर क्या परेशानी हो गयी मैनेजर?”

  ” हुकुम उस लड़की का चेहरा हम सब ने देख लिया, जिसे उसने इतनी देर से घूंघट की ओट में छिपाए रखा था।”

  मैनेजर के द्वारा बात को इतना लंबा खींचने से समर भी झुंझला उठा … “साफ साफ बताएंगे आप?”

  मैनेजर ने आवाज़ एकदम धीमी कर ली और लगभग गुनगुनाते हुए समर के पास जाकर कह दिया…

  ” जी उस पुलिस वाले के साथ जो लड़की वहाँ बैठी थी वो और कोई नही बल्कि रानी साहेब रेखा विराज सिंह थीं।”

  मैनेजर के मुहँ से ये निकलते ही विराज ने गुस्से में आगे बढ़ मैनेजर का गला पकड़ लिया, होटल का मालिक डर से एक ओर दुबक के खड़ा हो गया। गुस्से में अपने पास रखी कटार निकाल विराज अभी मैनेजर के गले पर रखता की समर ने मैनेजर को दूसरी तरफ खींच लिया, लेकिन उतनी देर में हवा में लहराती कटार से समर के गले से नीचे  लंबा कट लग ही गया। खून बलबला कर छलक आया और जिसे देख विराज का गुस्सा एकदम से काफूर हो गया।
   अब इतने दिनों में समर की गद्दी के प्रति वफादारी ने विराज के मन में भी उसके लिए एक कोमल सी भावना जगा ही दी थी। रेखा और पुलिस वाले का गुस्सा इस तरह समर ने अपने सीने पर ले लिया ये देख कुछ न कर पाने की बेबसी में विराज की आंखों का खून पानी बन छलक आया..

” समर तुम्हें तो हमारे कारण चोट लग गयी और वो भी इतनी गहरी!”

  इतनी देर में हाथ के इशारे से समर ने मालिक और मैनेजर को एक किनारे खड़े होने का इशारा दे दिया था।

  ” हम माफी चाहतें हैं हुकुम लेकिन..”

  मैनेजर फिर कुछ कहने जा रहा था कि समर ने उसे चुप करवा दिया, एक हाथ से अपना ज़ख्म थामे उसने चेकबुक विराज के सामने रख दी..

  ” इसमें आप साइन कर दीजिए ”

समर की बातें मानने की अब एक तरह से विराज को आदत सी होने लगी थी। अभी तो उसका मन भी खट्टा था, इसलिए ज्यादा पूछताछ किये बिना उसने पांच लाख की राशि वाले उस चेक पर हस्ताक्षर कर दिए।

  समर ने चेक मैनेजर की तरफ बढ़ा दिया…

  ” ये बात इस कमरे से बाहर नही जानी चाहिए और अगर बाहर कहीं भी ये बात सुनने को मिली तो समर की गोली होगी और तेरा सर। समझा!”

  “जी हुज़ूर !” होटल मालिक और मैनेजर इशारा पाते ही वहाँ से निकल गए

  ” राजा साहब आपसे निवेदन है जल्दबाजी में और बिना पूरी बात जाने आप रानी साहेब से कुछ मत कहिएगा। मैं अभी अपने आदमियों से सारी खबर निकलवाता हूँ!”

  गद्दी पर सर झुकाये बैठे विराज को कुछ समझ नही आ रहा था। गलतियां तो उससे भी हुई थीं और वो भी ढेर सारी लेकिन आज की रेखा की गलती उसे गुनाह लग रही थी।
   उसे चुप देख समर समझ गया कि अभी विराज शायद एकांत चाहता है ,वो खुद भी अपने दर्द से बेहाल हो रहा था, इसी से विराज को प्रणाम कर वो अपने सीने पर हाथ रखे बाहर निकल गया।

   समर के ड्राइवर ने गाड़ी निकाली और समर को बैठाए अस्पताल की ओर ले चला…
   अस्पताल में रिसेप्शनिस्ट ने उसे वापस उसी कमरे की ओर भेज दिया जहाँ उसकी माँ की डॉक्टर बैठा करती थी।
   अंदर प्रवेश करते हुए उसके मन में अचानक वो लड़कीं चली आयी जो उस दिन इसी केबिन में बैठी थी। हालांकि  उस दिन के अगले ही दिन उससे महल में मुलाकात भी हुई थी लेकिन उसके बाद से वो महल में नज़र ही नही आई थी।
  फिसियोथेरेपिस्ट तो आती थी और उसकी माँ का काम कर जाती थी लेकिन उस डॉक्टरनी ने आना बंद कर दिया था।
   उसके मन में अचानक आया कि काश वो यहाँ एक बार उसे मिल जाती

” आइये समर ! कैसी है मिसेस सिंह?”

समर को दरवाज़े पर देख सीनियर डॉक्टर ने सोचा वो अपनी माँ की ही किसी समस्या के बारे में पूछने आया है लेकिन अपने सवाल को खत्म करते में उन्होंने समर की शर्ट पर लगा खून देख ही लिया…

  “ओह्ह माय गॉड! इतना ब्लीड कैसे कर रहे आप। आइये जल्दी।

” जी बस ज़रा गलती से हुकुम की कटार लग गयी।”

  ” पिया देखना ज़रा। मुझे लगता है स्टिच देना होगा, देख लो तुम हैंडल कर लोगी। घाव देख लो पहले”

  इतनी देर में कमरे में  एक किनारे दवाओं की लिस्ट तैयार करती पिया समर के  सामने चली आयी..

  “ओपन योर शर्ट “

  ” व्हाट? “

पहले तो अचानक से उसके सामने चली आयी पिया को देख समर चौन्क गया उस पर उसका इतना बेतकल्लुफी से शर्ट उतारने को कहना सुन वो भौचक्का सा रह गया..

” समर ये डॉक्टर पिया हैं उस दिन आप इनसे मिले थे ये आपकी स्टिचिंग और ड्रेसिंग कर देंगी। डोंट वरी होशियार बच्ची है।
   पिया अगर वुण्ड ज्यादा गहरा हुआ तो थोड़ा सा एनस्थीसिया दे देना।”

  ” यस मैम ” उसे ज़रूरी सुझाव दे सीनियर डॉक्टरनी नर्स के बुलावे पर एक अर्जेन्सी निपटाने चली गयी।

  पिया हाथों में ग्लव्स चढ़ाये समर की आंखों में देखने लगी, उसे ऐसे खुद को देखते देख वो शरमा कर इधर उधर देखने लगा..

” अरे ओ मंत्री जी इधर उधर कहाँ देख रहें हैं, शर्ट उतारिये !”

  “अजीब लड़की हो यार , जब देखो तब मेरे कपड़े उतरवाने के पीछे पड़ी रहती हो!”

  समर की बात का मतलब समझ पिया झेंप सी गयी लेकिन उसने अपने चेहरे पर बिल्कुल सपाट भाव ही रहने दिए..

  ” ओहहो डबल मीनिंग ! उस दिन इंजेक्शन देना था और आज आपका घाव देखना है। उसकी गहराई ऐसे समझ नही आएगी। अगर गहरा हुआ तो सिलना पड़ेगा वरना सिर्फ ड्रेसिंग कर दूंगी।”
 
  जब तक पिया अपनी बात कहती समर ने एक हाथ से शर्ट खोलने की असफल सी कोशिश की और फिर दर्द से दुहरा होते हुए उसकी तरफ देखने लगा, पिया ने इशारे से पूछा कि क्या मैं खोल दूं? समर के हाँ में सर हिलाते ही उसने एक एक कर सारे बटन खोल कर शर्ट उतारने की जगह बस ज़रा पीछे की ओर कर दी…
   घाव गहरा था जिस पर टांके लगाने ज़रूरी थे, खून लगातार बह रहा था…

  “टांके तो लगाने पड़ेंगे मंत्री जी।” 
 
  घाव को साफ करती पिया कहने लगी

  ” बिना टांकों के काम नही चल सकता क्या? “

  पिया ने समर की आंखों में देखा और ज़ोर से ना में सर हिला दिया…

  ” मुझे ये सुई इंजेक्शन और सच कहूं तो डॉक्टर से भी बहुत डर लगता है!”

समर की बात सुन आंखे  गोल कर पिया समर को देखने लगी

  ” मैं आपको भयानक नज़र आती हूँ?”

  ” नही तो”

  ” तो फिर मुझसे डर क्यों लगता है?”

  ” तुमसे थोड़े न लगता है मुझे तो डॉक्टर …

  समर आधी बात कह चुप हो गया, उसे पिया की बात पर हंसी आ गयी लेकिन उसी वक्त खराब खून बहाने के लिए उसने हल्के से घाव को दबाया और समर की हल्की सी चीख निकल गयी…
   उसे एक नज़र देख कर पिया ने साथ खड़ी नर्स से कर्व्ड नीडल में स्युचर डाल कर मांगा और समर के घाव की तरफ बढ़ी ही थी कि वो ज़ोर से चीख उठा..

” अभी तो कुछ किया ही नही है आप तो बच्चों जैसे घबरा रहें हैं!”

“बच्चा ही हूँ इस मामले में।”

  ” अच्छा मुझे तो लगा आप मंत्री जी हैं.. वैसे मंत्री जी क्या बचपन में कभी चोट नही लगी आपको जो इतना घबरा रहे।”

  ” नही मुझे मेरी जान बहुत प्यारी है वो भी बचपन से ही।
  मैं तो खेल भी बड़ा सम्भल सम्भल कर खेलता था कि मुझे चोट न लग जाये। तभी तो लोगों के शरीर में कितने ज़ख्मों के निशान होतें है बचपन के पर मेरे में एक निशान नही मिलेगा तुम्हें, चाहो तो ढूंढ कर देख लो।”

  ” मैं क्यों निशान ढूंढूंगी भला  ?”

  पिया की बात सुन वापस समर झेंप गया, हड़बड़ी में बोलने पर अक्सर ऐसे ही अर्थ का अनर्थ हो जाता है। उस जैसा सोच समझ कर बोलने वाला भी कैसे कभी कुछ भी बोल जाता है।

  ” बी ब्रेव मैन ! यू आर अ मैन इनफेक्ट यू आर अ मंत्री राजपूत मंत्री! आपको तो बहुत स्ट्रांग होना चाहिए। है कि नही..
 
   और उसी समय पिया ने उसे पहला टांका लगाया और वो फिर एक बार चिहुंक उठा लेकिन इस बार चीखा नही।
  पिया के दूसरे हाथ को कस कर थामे उसने आंखे  बंद कर ली और पांच पांच टांकों का दर्द बिना चीखे चिल्लाए सहन कर लिया….

  ” वेरी नाइस जॉब मंत्री जी! आपने सारे टांके बिना चीखे चिल्लाए लगवा लिए”

पिया की बात सुनते ही आश्चर्य से समर ने आंखें खोल दी…

  ” क्या सच में? सारे टांके लग गए?”

  ” जी हाँ !टांकों के लगने के बाद ड्रेसिंग भी हो गयी, अब जरा मैं पट्टी बांध दूँ, वैसे वो काम सिस्टर जी भी कर लेंगी”

  पिया ने मुस्कुरा कर पट्टी नर्स के हाथ मे थमा दी और खुद सामने बेसिन पर हाथ धोने लगी… समर उसे देखता रहा कि उसका ध्यान पिया के हाथों पर चला गया। पिया के जिस हाथ को उसने पकड़ रखा था उसमें समर के नाखूनों के निशान उभर आये थे।

  ” डॉक्टर साहब सुनिए !”

समर की आवाज़ सुन पिया पलट कर उसकी तरफ आ गयी

  ” जी मुझसे कुछ कहा  आपने?”

  समर ने उसका हाथ अपने सामने पकड़ कर फैला दिया…

  ” आई एम सो सॉरी,मैंने तो आपके हाथों में ज़ख्म कर दिया।”

  पिया में अपने हाथों में बनी खरोचें देखी और मुस्कुरा उठी..

  ” ओह्ह ये ! इनकी तो आदत सी हो गयी है। अक्सर छोटे बच्चे ऐसे निशान दे जातें हैं,बहुत सी औरतें भी डिलीवरी के समय ऐसा करती हैं और कुछ बच्चे तो नाराज़गी में हाथों पर काट भी देतें हैं लेकिन हम लोग भी समझतें हैं आपके दर्द।
  मंत्री जी आपने आखिर बिना एनस्थीसिया के ही टांके लगवा लिए। इसका मतलब समझे आप?

समर ने ना में सर हिला दिया..

  “इसका मतलब डर और दर्द आपके दिमाग में था, आप नीडल देख कर चीख उठे लेकिन जब सिलाई हुई तब उस दर्द को सह लिया।
   हम दर्द से जितनी तकलीफ पातें हैं उससे कहीं ज्यादा उस तकलीफ को सहन करने के ख़ौफ़ से तकलीफ पा लेते हैं।

  “आप तो फिलॉसफर निकलीं।”

  मुस्कुरा कर पिया ने उसके लिए दवाएं लिखी और पर्चा उसके हाथ में पकड़ाते हुए उसे दवाएं कैसे कब लेनी हैं ये भी बता दिया…

  “दवाओं के बाद भी अभी ड्रेसिंग करनी होगी तो आप परसों सुबह फिर आ जाइयेगा..!”

  ” जी आ जाऊंगा ! और मान लीजिये मुझे दवाओं को कैसे लेना है कब लेना है नही समझ में आया तो क्या करूँगा।”

  “फ़ोन कर लीजियेगा !”

  पिया ने उसका पर्चा उसके हाथ से लेकर फोल्डर में डालते हुए कहा

  “नम्बर तो नही है मेरे पास!”

  पिया को एकटक देखते समर की ये बात सुनते ही पिया ने तुरंत ऊपर नज़र कर उसकी ओर देखा और उसे खुद को देखता पाकर लजा गयी

  ” अस्पताल के रिसेप्शन का नम्बर पर्चे पर लिखा है, आप उसी नम्बर पर फोन कीजियेगा।”

  ” ओके ! और माँ कह रहीं थीं उन्हें भी अपनी दवाओं में कुछ परेशानी हैं आप से मिलना चाहती थीं लेकिन आप आजकल आ नही रहीं? “

   मुस्कुरा कर पिया ने सामने बैठे समर को देखा

  “कल सुबह आंटी जी के सेशन के लिए सुधा के साथ मैं भी आ जाऊंगी।”

  ” पक्का !”

  ” हम्म ” समर मुस्कुरा कर खड़ा हो गया।
  दरवाज़े तक जाकर एक बार पलट कर उसने पिया की तरफ देखा वो नीचे सर किये कुछ नोट कर रही थी लेकिन उसकी मुस्कुराहट समर से छिपी न रह सकी।
  मुस्कुरा कर दरवाज़ा खोल वो महल के लिए निकल गया….


*******

     आदित्यप्रताप को लिकर की सबसे बड़ी डील दिलवाने वाले राजनेता फड़के जी ने आदित्य को फ़ोन कर पता नही क्या कहा कि एक दो बार थोड़ा ना नुकुर करने के बाद उसने आखिर हाँ बोल ही दिया।
    अपने केबिन में रीमा को बुला कर उसने पूरे ऑफिस के लिए कहलवा भेजा कि आज शाम सभी फड़के जी की जन्मदिन की पार्टी मनाने जाएंगे…

  ” सर आप और पार्टी? मेरा मतलब आप तो बिल्कुल भी पार्टिस पसंद नही करते!”

  ” बहुत बार अपने मन को मार कर भी काम करना पड़ता है। वो इतना बड़ा राजनेता है और अभी अभी उसी ने बहुत बड़ी डील करवाई है ऐसे में उसे कैसे मना करूँ ? जाना तो पड़ेगा ही। तुम ऐसा करो एक बड़ा सा गुलाब का बुके और कुछ अच्छा सा गिफ्ट ऑर्डर कर दो। पार्टी में जाते हुए शॉप से उठा लेंगे और सारे स्टाफ को कह देना की पार्टी में जाना ही है।
  उन्होंने क्लियरली कहा है कि एक बंदा भी मिसिंग नही होना चाहिये।”

  रीमा को कुछ समझ आ रहा था कुछ नही। उसे अचानक राजा का ये कहना कि ” चलो आज छोटे का बर्थडे सेलिब्रेट कर ही लिया जाए” याद आ गया।
  लेकिन यहाँ ऑफिस का एक मामूली एम्प्लाई आखिर नेता जी तक कैसे पहुंच गया?
   क्या नेता जी से ये फ़ोन इसी अजातशत्रु ने करवाया था?

  रीमा की उलझन बढ़ती जा रही थी कि आदित्य की तेज आवाज उसके कानों में पड़ी…

  “अब यहाँ खड़ी खड़ी मुझे क्या घूर रही हो। जाओ यहाँ से और सुनो एक ब्लैक कॉफी भेज देना।”

  ” जी बॉस” हड़बड़ा कर रीमा बाहर चली गयी।

   रीमा ने स्टाफ को जैसे ही इस बारे में बताया उसके आश्चर्य का ठिकाना नही रहा जब स्टाफ को पहले ही इस बारे में पता चल चुका था और वो सारे लोग जन्मदिन की तैयारियों में लगे थे…

  शाम सारे लोग आदित्यप्रताप की बताई जगह पहुंच चुके थे। नेता जी अपने पूरे परिवार के साथ वहाँ मौजूद थे। इसके साथ ही शहर की गणमान्य हस्तियां भी पधारी हुई थी।
  जैसे ही आदित्यप्रताप ने पार्टी हॉल में प्रवेश किया , अचानक सारी रोशनियां बुझ गयीं सिर्फ आदित्य पर फोकस होती गोल घेरे में रोशनी जलती रही। उसे कुछ समझ आता इसके पहले ही ” हैप्पी बर्थडे ” का धीमा सा संगीत वहाँ बजने लगा।
   वो धीमे कदम बढ़ाता अंदर पहुंचा की एकाएक सारी रोशनियां जल उठीं, उस पर गिरते फूलों के साथ ही उसकी नज़र सामने टेबल पर सजे केक और आस पास उमड़ी भीड़ पर चली गयी।
    उसकी समझ से परे था कि ये क्या हो रहा था। गुस्सा आने को ही था कि नेता जी सहपत्नी उस तक चले आये और बड़े प्यार से उसके हाथ मे छुरी पकड़ा दी …..

  ” भई आदित्य हम ऐसे ही कहीं भी नही चले जाते। तुम में हमें संभावनाएं ही संभावनाएं नज़र आ रहीं हैं। हमारे बेटे जैसे हो आखिर इसलिए सोचा तुम्हारा जन्मदिन अबसे हम मनाएंगे।”

  नेता जी की बात सुन आदित्य निशब्द खड़ा रह गया, उसी वक्त वहाँ आसपास खड़े लोगों की तालियां गूंजने लगी और एक बार फिर हैप्पी बर्थडे की स्वरलहरी हवा में तैर उठी।
  जब तक आदित्य कुछ सोच समझ पाता पास खड़े राजा ने उसका हाथ थाम उससे केक कटवाया और एक छोटा सा टुकड़ा उसके मुहँ में डाल ” जन्मदिन मुबारक छोटे” बोल कर एक ओर निकल गया…
   राजा उस भीड़ भाड़ से बच कर निकलता की आदित्य ने उसकी कलाई पकड़ ली…

  ” बिना पार्टी मनाए ही चले जाओगे?”

राजा मुस्कुरा कर खड़ा रह गया..”कुछ काम आ गया है इसी लिए जाना होगा..”

  “काम तो मेरे यहाँ करते हो ? फिर मुझसे ज़रूरी कौन काम आ गया तुम्हें”

  राजा आदित्य की तरफ ज़रा झुक कर उसके कान तक चला आया… “गर्लफ्रेंड आने वाली है आज मुझसे मिलने। फिर कल वो भारत भ्रमण करने निकल जायेगी।”

  किसी और ने ऐसा कुछ कहा होता तो जाने आदित्यप्रताप उसकी क्या हालत करता पर राजा के मुहँ से ये सुन उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चली आयी..
  
   ” अरे देख देख हिटलर मुस्कुराता भी है।”

उसे मुस्कुराते देख रीमा ने अपने साथ खड़ी रुचि से कहा और दोनो खिलखिला उठी..

  “आप पार्टी एन्जॉय कीजिये। नेताओं के हाथ से पैसे छूटते नही हैं। इन्होंने आपके लिए इतना किया है इसका मतलब आपमें कुछ खास तो है। और इनसे अच्छे सम्बन्ध बनाये रखना भी हमारी मजबूरी है क्या कीजे? आपको पार्टी में खुश दिखना ही होगा।”

  ” हम्म ” हाँ में सर हिला कर आदित्य ने राजा को विदा किया और नेता जी के परिवार की ओर बढ़ गया।
  आगे बढ़ते हुए सामने रीमा चली आयी उसके पास जाकर वो उससे पूछ बैठा…

  ” सुनो रीमा ! मुझे ऐसा लगा उस अजातशत्रु ने मुझे जन्मदिन की बधाइयाँ देने के बाद छोटे कहा? तुमने सुना क्या?”

  ” नो सर ! आपको गलतफहमी हुई लगता है..”

  अब रीमा उससे क्या कहती सुना तो उसने भी था …
अपने सर को झटक आदित्य मेहमानों की ओर बढ़ गया….

क्रमशः

aparna….


   जन्मदिन स्पेशल:— दिल से💞


    आज से ठीक एक साल पहले राजा अजातशत्रु और बाँसुरी की कहानी जीवनसाथी शुरू की थी मैंने ।    आज से एक साल पहले 6 मार्च 2020 को शुरु हुई जीवनसाथी ने एक साल का लंबा सफर तय कर लिया है।
   इस पूरे सफर को जितना मैंने लिखते हुए जिया है उतना ही शायद आप सभी ने पढ़ते हुए जिया है।
     जीवनसाथी इस लिए भी खास है क्योंकि ये मेरी अब तक की लिखी पहली बड़ी कहानी है, इसके पहले लिखी शादी डॉट कॉम 33 भाग में समेट दी थी जिसके बाद पाठकों ने तारीफ के साथ ही जम कर कोसा भी कि कहानी आगे बढ़ानी चाहिए थी। किसी ने कहा -” ये तो सरासर नाइंसाफी है आपने ये तो बताया ही नही कि बाँसुरी राजा को क्या कह कर बुलाएगी?
 
   तो किसी ने कहा–“आप प्रिंस के केस के बारे में लिखना भूल गयीं लगता है?”
 
   किसी ने कहा ” जिनके कारण बाँसुरी और राजा की प्रेम कहानी शुरू हुई वो प्रेम और निरमा तो फ्रेम से गायब ही हो गए! उनका क्या हुआ ये तो लिखा ही नही?”
 
     किसी ने यह भी कहा-” इतनी मुश्किलों से दोनो की शादी हुई। ज़रा लिखना था कि आगे उनकी शादीशुदा जिंदगी कैसी रही?”

  मैं सभी को समाधान बताना चाहती थी लेकिन मुझे लगा उससे बेहतर है एक ऐसी कहानी शुरू की जाए जो शादी डॉट कॉम की समस्याओं का समाधान हो।
   हालाँकि अगर बात शादी डॉट कॉम की करी जाए तो कहानी का मूल था “बाँसुरी की शादी ” जो उसकी बुआ कहीं भी करवा देना चाहती है लेकिन वो होती है बाँसुरी की खुद की मर्ज़ी से।
   और बस राजा से बाँसुरी की शादी होते ही कहानी का मूलभूत उद्देश्य पूरा हुआ और उसके पूरे होते ही कहानी खत्म हो गयी। बाकी कुछ सवाल जब तक पाठकों के दिमाग में कुलबुलायेंगे नही वो लेखक को भला अगली बार क्योंकर पढना चाहेगा?.

  उसके बाद शुरू हुई मेरी अगली कहानी ” जीवनसाथी” इसे शुरू करते समय कभी नही सोचा था कि आप सब इसे शादी डॉट कॉम से भी ज्यादा प्यार दे बैठेंगे।
      पिछली कहानी चूंकि सिर्फ राजा और बाँसुरी की थी इसलिए उसमें प्रेम निरमा पर कोई फोकस नही किया और इसलिए इस बार शुरू में ही मैंने बताया था कि इस कहानी में एक साथ चार प्रेम कहानियां चलेंगी हालांकि चलते चलते कारवाँ जुड़ता गया और कहानियां बढ़ती चली गईं।
    
   कहानी आगे बढ़ते हुए कई रंगों से होकर गुज़री….. जहाँ एक तरफ अंतरजातीय विवाह वो भी उच्च शिक्षित और रसूखदार परिवारों के बीच लिखा तो वहीं विधवा पुनर्विवाह को भी कहानी का हिस्सा बनाया।
   कहानी में जहाँ बाँसुरी और राजा का दीवानगी से भरा प्यार लिखा वहीं राजा के साथ प्रेम और समर की ईमानदारी से भरी दोस्ती भी लिखी।

आप में से अधिकतर पाठक खासकर पाठिकाएँ नही चाहतीं की कहानी खत्म हो लेकिन कुछ एक ( गिनती की सिर्फ दो ) पाठिकाओं ने यह भी शिकायत की कि कहानी अच्छी जा रही है लेकिन बिना वजह खींच कर इसे एकता कपूर  का सीरियल मत बना दीजिएगा। बोलते वक्त आपको तो नही महसूस होता लेकिन जो पूरी शिद्दत से अपनी आत्मा से कहानी से जुड़ कर उसे रचता है उसके लिए ऐसी बातें दिल कचोटने वाली होतीं हैं।
   दूसरी बात मैं तो यही कहूंगी की एकता कपूर बहुत बड़ा नाम है , नाम क्या किवदंती हो गयी है एकता कपूर। उनके सीरियल ने इतिहास रचा है, घर की महिलाओं को यकीन दिलाया है कि वो सभी सासे भी कभी बहु थीं।
   
    पार्वती भाभी के हाथों से बुझती लौ को बचाने की ललक से औरतों के अंदर आत्मविश्वास लौटा है कि हाउस सिर्फ हाऊस वाइफ की मेहनत से हाउस बनता है।
     प्रेरणा का अनुराग से अनुराग भुला कर अपने कर्तव्यों के लिए मिस्टर बजाज से ब्याह कर लेना ने औरतों को अलग ही नैतिकता का पाठ पढ़ाया है।
   और फिर जब मिस कपूर को लगा कि अब संस्कार और नैतिकता का घड़ा इतना भर गया है कि छलकने लगा है तब उन्होंने अपने डगमगाते कदम टीवी के साथ ही वेब सीरीज़ की तरफ बढ़ा लिए। तो भई अगर इतने बड़े नाम से आप मुझे नवाज़तें हैं तो जाहिर है ये मेरे लिए तो गर्व की बात ही होगी।
   तो दोस्तों मुझे एकता कपूर बुलाने को भी मैं अपना सम्मान ही मान लुंगी।🙈🙏

   अब बर्थडे स्पेशल है तो कुछ कहानी की भी बातें कर लें….
   कहानी में आप सभी के पसंदीदा चरित्र हैं … किसी को राजा पसंद है तो किसी को समर और प्रेम। बाँसुरी सभी को ही पसन्द है पर आश्चर्य की बात ये लगती है कि पाठिकाओं के साथ पाठक भी कहानी के मेल कैरेक्टर्स से बहुत प्रभावित लगतें हैं और ये अच्छी बात भी है।

   बहुतों ने सवाल किए क्या ऐसे चरित्र होतें हैं? क्या इतना प्यार करने वाले पति होतें हैं राजा और प्रेम जैसे?
   मज़े की बात ये है कि पाठकों की प्रतिक्रिया में ही किसी ने यह भी लिखा कि अगर पत्नियां निरमा और बाँसुरी जैसीं हो तो पति भी प्रेम और राजा जैसे हो जातें हैं।
  ये जवाब मुझे बहुत प्यारा लगा था, और ये बात सौ प्रतिशत सही भी है। हालांकि अपवाद हर जगह मौजूद है बावजूद अगर आपको प्यार चाहिए तो प्यार देना सीखिए बिना किसी स्वार्थ के।

  लिखना तो बहुत कुछ है लेकिन वक्त मुझे वक्त नही देता की मैं अपने मन का गुबार पूरा एक बार में निकाल लूँ।
   कहानी के एक साल के लंबे सफर के बारे में अगले भागों में भी चर्चा करूँगी अपने दिल से कॉलम में। मुझे अब तक के भागों में सबसे ज्यादा कौन सा एपिसोड पसंद आया। कौन से चरित्र फ्रेम में शुरू से थे और कौन से नही ? इसके अलावा कहानी के किन भागों को मैंने पाठकों की प्रतिक्रिया के कारण बदला है ये सारी बातें अगले भाग में करूँगी, तब तक प्यार से पढ़ते रहिए जीवनसाथी और समिधा भी…

आपकी

aparna

अगला भाग तीन से चार दिन में देने की पूरी कोशिश करूँगी।
  लेकिन जिन पाठकों को अब भी नोटिफिकेशन नही मिल रहे उनसे यही कहना चाहती हूँ कि कृपया आप लोग अपनी समस्या से प्रतिलिपी को अवगत करवाएं।
 

 
   

   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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