जीवनसाथी -91


    जीवनसाथी  91


       आदित्य गाड़ी तेज़ी से ही भगा रहा था लेकिन साथ बैठी पिंकी का घबराना कम नही हुआ था।
  पिंकी की गोद में बेटू गाड़ी के चलने के कुछ देर में ही लेटे लेटे सो गया था। और पता नही अपनी लाचारगी पर या समय पर रतन के न आ पाने के कारण पिंकी की आंखों में आंसू आ गए।
   इतनी बेचारी तो वो कभी भी न थी। आज भी ऐसा कुछ बवाल नही हुआ था पर कभी जब मन खराब हो तो हर बात सिर्फ और सिर्फ दुख बढ़ाने का ही काम कर जाती है।
    खुद पर तरस खाती पिंकी अचानक रोने लगी और उसे रोते देख आदित्य बौखला गया।
उसने ज़ोर से ब्रेक मार कर गाड़ी रोक दी। चौन्क कर पिंकी उसकी ओर देखने लगी..

  ” क्या हुआ?”

” आप इसी वक्त गाड़ी से उतरिये ।”

” लेकिन हुआ क्या?” पिंकी अपने आंसू पोंछ इस अजीब से आदमी को देखने लगी। इस संसार का कौन आदमी होगा जो औरत को रोते देख सांत्वना के दो शब्द बोलने की जगह उसे गाडी से ही उतार दे।

  ” प्लीज़। हम जितनी मदद कर सकते थे हमने कर दी। आपके लिए फोन कर के कैब बुक कर देते हैं। आप यही वेट कर लीजियेगा।”

” ओके ! हम उतर जातें हैं। बस हमारी गलती बता दीजिए..”

  ” गलती ?? अरे एक तो आपकी हेल्प की उस पर आप रो रहीं है। हमें रोते बिलबिलाते लोग पसन्द नही हैं। नही मतलब बिल्कुल नही। समझीं आप ! अगर हमारी गाड़ी में चलना है तो खुद को संभालिये, और चुप बैठिए बिल्कुल।”
       वो जाकर अपनी तरफ का दरवाजा खोल गाड़ी में बैठ गया। और कोई दिन होता या पहले वाली पिंकी होती तो बिफर कर पैदल ही अपने स्वाभिमान के रास्ते निकल पड़ती पर राजकुमारी हो या कोई साधारण आम औरत , माँ बनने के बाद वो सिर्फ माँ हो जाती है। उसका सारा अस्तित्व उसके बच्चे में समाहित हो जाता है। उसकी सांस उसका जीवन सब उसका बच्चा ही हो जाता है और बात जब बच्चे की आयु या स्वास्थ्य पर आए तो कहाँ का स्वाभिमान और कैसा स्वाभिमान।
   अपने आंसू पोंछ वो भी ड्राइवर की बगल की सीट पर बैठ गयी। उसके बैठते ही आदित्य ने एक बार फिर गाड़ी भगा दी।

   अकेले परवरिश का जीता जागता नमूना आदित्य किसी को संभालना सराहना जानता ही नही था। कभी उसे किसी ने प्यार से बहलाया फुसलाया हो तब तो वो इस प्यार का प्रतिदान दे पाता।
   बचपन में मामा जी के संरक्षण में उसने सिर्फ खुद को बनाने में ही उम्र बिता दी। मामी की चालबाजियां जहाँ अपनी रेखा पर अधिक प्यार बरसाती वहीं अपनी पापिन नँद के सपूत पर लाख लाख अंगारे ही बरसातीं आयीं थीं।
   मामा जी से भी कोई बहुत विशेष स्नेह तो नही मिला था पर इतनी छोटी उम्र में रहने को घर और दो वक्त का भोजन भी बहुत था।
  उसी का एहसान आज तक आदित्य चुकाता चला आ रहा था।
   उसने जो भी तैयार किया था अपनी मेहनत के बलबूते ही किया था। हाँ बाद में ज़रूर जल्दी पैसे कमाने की फिराक और पॉवर का नशा चखा कर मामा जी ने उसके एक नम्बर के कारोबार को दो नम्बर में बदलने में कोई कसर नही छोड़ी।
    ऐसा नही था कि आदित्य ये जानता नही था लेकिन उसकी स्थिति बड़ी अजीब थी। मामा जी को उसने अपने जीवन में भगवान का स्थान दे रखा था इसी से उनका कहा उनका बताया सब उसके लिए सत्य और जायज़ हो गया था।
   उसके मन में बचपन से बोई विष बेल अब भली प्रकार फल फूल चुकी थी, लेकिन आदित्य के जीवन में अपने शब्दों और कारनामों से रंग भरते रेखा के पिता यहीं चूक गए थे, उन्होंने भले ही खुद को आदित्य का सर्वेसर्वा समझ लिया हो लेकिन उनसे भी ऊपर वो सर्वशक्तिमान बैठा था अपने हाथों में तूलिका लिए , जिससे वो जब चाहे जैसे चाहे रंग उनके जीवन में भर सकता था।
    आदित्य के जीवन में भी बसंत घुलने को था।

   गाड़ी सिटी हॉस्पिटल के पोर्टिको में रोक  कर आदित्य ने पहली बार वो किया जो आज तक उसने किसी के लिए नही किया था।
    पिंकी की तरफ का दरवाजा खोल वो एक तरफ खड़ा हो गया।
  जल्दी से गाड़ी से उतर पिंकी अस्पताल की ओर भागी , पर जाते जाते एक बार ठिठक कर आदित्य की ओर मुड़ गयी….

  “भाई साहब ! बहुत एहसान है आपका, आपने यहाँ तक पहुंचा दिया।”

  उसके सामने हाथ जोड़ वो अंदर चली गयी। आभार प्रकट करने वाले को प्रतिउत्तर में क्या बोलना है ये भी वो कहाँ समझता था, ठीक है में सर हिला कर अपनी तरफ आ कर बैठा और गाड़ी बाहर भगा दी।
    माथे पर शिकन लिए वो गाड़ी भगाता चला जा रहा था । उसकी खुद की समझ से परे था कि अपने स्वभाव के विपरीत उसने उस लड़की की मदद की ही क्यों?

  आज तक आदित्य की गाड़ी में कोई लड़की नही बैठी थी, वो पहली लड़की थी जो उसके साथ सामने की सीट पर शान से बैठ अस्पताल पहुंच गई थी। सोचते हुए आदित्य की नज़र बगल वाली सीट जिस पर कुछ देर पहले पिंकी बैठी थी पर चली गयी और पिंकी का फ़ोन उस सीट पर पड़ा नज़र आ गया।
  फ़ोन पर नज़र पड़ते ही उसने सबसे पहले अपना फ़ोन देखा, और उसे समझ आ गया कि ये ज़रूर उसी लड़की का ही फोन है।
  उसे एक बार फिर उस लड़की पर गुस्सा आ गया। हद है ये लड़कियां इतनी लापरवाह कैसे होती हैं कभी भी लड़कों जैसी नही होतीं। मजाल है जो हम लड़के कहीं कोई ज़रूरी चीज़ भूल जाएं पर इन लड़कियों के बस की बात ही नही की भूलने को भूल जाएं। गाड़ी को आगे से घूमा कर उसने वापस मोड़ लिया।
    और एक बार फिर आदित्यप्रताप की गाड़ी सिटी हॉस्पिटल के पोर्टिको में खड़ी थी…


   ********


          बाँसुरी की ट्रेनिंग सही चल रही थी, लेकिन उसका मन नही लग रहा था।
  वैसा ही कुछ हाल निरमा का भी था। सुबह सवेरे उठ घर के सारे काम निपटाती निरमा को किसी भी भारी काम को प्रेम करने नही देता।
    कपड़े सुखाने की बाल्टी उठानी हो या सिलेंडर बदलना हो, हर काम निरमा के पहले वो कर जाता। मीठी के समय बात अलग थी। उसके घर पर सुमित्रा और अम्मा थी निरमा की मदद के लिए लेकिन इस बार प्रेम की नज़र में निरमा गर्भवती होते हुए भी अकेली थी।
    सुबह के नाश्ते के पहले निरमा ने राजा और प्रेम के लिए फल भी काट रखे थे।
  पपीता थोड़ा सा ही लेकर दोनो ने ही छोड़ दिया, उस प्लेट को अंदर लेकर जाती निरमा को प्रेम ने टोक दिया….

  ” अंदर क्या करोगी इन फलों का?”

  ” मैं खा लुंगी!”

   निरमा के साधारण से जवाब पर प्रेम भड़क उठा और उसके पीछे अंदर चला आया…

  ” ऐसे कैसे खा लोगी! पपीता तो ऐसी अवस्था में नही खाना चाहिए ।”

  और उसके हाथ से प्लेट ले वो बाहर चला गया। राजा के नाश्ता करते में वो बस फल खा कर ही रह गया। अपनी नाश्ते की प्लेट अंदर वैसी ही रख बाहर जाने लगा तो निरमा ने उसे टोक दिया..

  ” इतनी भी क्या नाराज़गी की नाश्ता ही नही खाया आपने?”

” नाराज़गी की बात नही है। फल इतने ज्यादा खा किये की भूख खत्म हो गयी। नाश्ता तुम खा लेना। ”

  ” ओके मतलब ये नाश्ता तो मैं खा सकती हूँ ना?” उसे चिढ़ाने की गरज से कही निरमा की बात पर प्रेम ने उसे घूर कर देखा और बाहर निकल गया। निरमा को लगा अपना सर धुन ले।
    बात सम्भलने की जगह बिगड़ती ही चली जा रही थी। प्रेम नाराज़ तो था लेकिन अपनी तरफ से जितना हो सकता वो उसकी मदद करने की ही कोशिश कर रहा था।
    
    वो मीठी को नाश्ता करवाती बैठी थी कि प्रेम का फोन आ गया। प्रेम का फ़ोन देख वो एक पल को चौन्क गयी क्योंकि बिना किसी काम के फ़ोन करने वालों में से प्रेम था भी नही।। 
    समर आने वाला है ये सुन कर निरमा को भी खुशी ही हुई, महल से दूर जाने के बाद अब महल से आया कोई भी व्यक्ति उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण नही अति महत्वपूर्ण था और फिर ये तो खुद समर आने को था।
   निरमा रात की तैयारियों में लग गयी ……


********


       आदित्य वापस पहुंचा तब पिंकी डॉक्टर के केबिन में ही थी।
  रिसेप्शन पर पिंकी के बारे में पूछने पर ये पता चलने पर की वो अभी अंदर है आदित्य बाहर खड़ा उसकी राह देखने लगा।
  आज उसे खुद पर ही विश्वास नही हो रहा था। पहले एक लड़की को अस्पताल तक लिफ्ट देना उसके बाद उसे रोते देख परेशान हो उठना और अब तो हद ही हो गयी, उसका मोबाइल वापस करने आना।
  आज वो सुबह सुबह किसका चेहरा देख कर उठा था जो अपने रोज़ के व्यवहार से उसका व्यवहार बदला बदला सा हो गया था।
   ये सब उसी अजातशत्रु का किया धरा है। दिन भर ऐसी ऐसी बातें करता है लगता है सारी सच्चाई और ईमानदारी सिखा कर ही मानेगा।
    अपने सर को एक झटका दिए वो बाहर खड़ा पिंकी की राह देखने लगा।
   इतनी देर में बाहर मुख्य द्वार से हड़बड़ी में एक युवक भागता हुआ सा लगभग उसके बाजू से होता हुआ अंदर डॉक्टर के केबिन में घुस गया।
   उसके इस तरह घबराने और बाहर इंतेज़ार किये बिना ही डॉक्टर केबिन में चले जाने से आदित्य समझ गया कि हो न हो ये उस लड़की का पति ही है।
   उस आदमी के पीछे आया एक अर्दली बाहर ही हाथ बांधे खड़ा रह गया।
   आदित्य ने उसे देखा उसने आदित्य को और हल्का सा मुस्कुरा दिया,भौं चढ़ाते हुए आदित्य दूसरी ओर देखने लगा। जान पहचान वालों को तो आदित्य अपनी मुस्कान से मोहताज रखा करता था इस अर्दली की मजाल जो उसे देख दोस्ताना मुस्कान दे गया…

” हमारे साहब हैं। कलेक्टर हैं यहाँ के !”

  ‘कलेक्टर’ शब्द पर कुछ ज्यादा ही ज़ोर डाला गया था, मतलब सामने वाले के लिए चेतावनी सी थी कि भैया तुम होंगे साधारण आदमी हम तो चपरासी हैं वो भी कलेक्टर साहब के।
    कलेक्टर सुन के आदित्य का उबाल भी ज़रा कम हो गया था।
   केबिन का दरवाजा खुला और पिंकी बच्चे को गोद में लिए बाहर चली आयी। उसके ठीक पीछे रतन भी चला आया।
   बच्चे को बुखार की दवा केबिन में ही दे दी गयी थी। कुछ आराम हो जाने से बच्चा पहले से शांत था। उसे शांत देख और रतन को पास देख पिंकी की सांस में सांस आ गयी थी, वो भी अब काफी सामान्य लग रही थी।
   सामने खड़े आदित्य पर नज़र पड़ते ही पिंकी के चेहरे पर मुस्कान चली आयी।
  रतन को सुबह से हुई सारी बात बताती पिंकी आदित्य की मदद का किस्सा भी सुना गयी।
पिंकी की बात सुनते ही रतन ने आदित्य के आगे हाथ जोड़ दिए, भरे गले से उसे धन्यवाद देती पिंकी और रतन उसे अपने साथ घर लेकर जाने की ज़िद पर अड़ गए।
     आदित्य के बार बार मना करने पर भी दोनो ही नही माने और आखिर आदित्य की उनके साथ जाना ही पड़ा….

   खुद पर आश्चर्य करता आदित्य पिंकी को उसका फ़ोन वापस कर वहाँ से निकलने की फिराक में अपनी गाड़ी में जा बैठा की आदित्य का अर्दली उसके पास चला आया…

”  हमको साहब भेजे हैं, कहीं आप उनको धता बता कर पिछली गली से निकल न लें”

  आदित्य को ये मुँहफट अर्दली सहन नही हो रहा था।

” साहब अच्छा नही लगेगा , आप गाड़ी चलाएं और हम मालिक समान बैठे बैठे जाएँ। “

“मुहँ बंद कर बैठो वरना आधे रास्ते उतार दूंगा। हमारी ड्राइविंग सीट पर हमारे अलावा सिर्फ हमारा ड्राइवर ही बैठता है। हर ऐरे गैरे को हम अपनी गाड़ी नही सौंप देते।”

” अरे साहिब आप तो लगता है नाराज़ हो गए। हम कहाँ ऐरे गैरे, हम तो..

  ” पता है, कलेक्टर साहब के अर्दली हो। अब मुहँ पर ताला लगा कर बैठो।”

  बड़ी मजबूरी में आदित्य ने जिलाधीश महोदय की गाड़ी के पीछे अपनी गाड़ी लगा दी।
    कलेक्टर निवास पर गाड़ियों का काफिला रुका और एक एक कर सब उतरते चले गए।
     शानदार लिविंग रूम में प्रवेश करते ही आदित्य की नज़र सोफे के पीछे लगी बड़ी सी तस्वीर पर चली गयी।
  पिंकी और रतन की शादी की तस्वीर थी, जिसमें वो दोनो साथ खड़े मुस्कुरा रहे थे।
   वो भी तस्वीर को देख मुस्कुरा उठा। पिंकी उसे बैठने को बोल बच्चे को लिए अंदर चली गयी।
  आदित्य के बाजू में बैठते हुए रतन ने उसकी ओर पानी का गिलास बढ़ा दिया….

  ”  आज आपने हमारी बहुत मदद की। कभी कभी कैसे इत्तेफाक हो जातें हैं। आज ही मेरी टी एल मीटिंग थी और आज ही पिंकी ऐसी परेशान हो उठी। जैसे ही मैंने फ़ोन ऑन किया इसके ढेर सारे मिस्ड कॉल देख एकबारगी घबरा गया, उसे फ़ोन लगाने जा ही रह था कि घर से मेड का फ़ोन चला आया और बाबा की तबियत और पिंकी का उसे लेकर अस्पताल भागना सुनते ही में भी तुरंत निकल गया।
   भारी धूप में आप उसे अस्पताल तक पहुंचा गए बहुत मेहरबानी ! अनजान होते हुए भी अपने इतनी मदद की वरना आजकल तो लोग अपने सगे रिश्ते नाते ही भूल बैठते हैं।”

  आदित्य को ऐसी सामाजिक बातचीत का कोई अनुभव न था। हाँ में सर हिला कर वो चुप रह गया। पानी पीकर उठने को था कि रतन ने बड़े ईसरार से हाथ पकड़ उसे रोक लिया…

  ” अरे ऐसे कैसे जा सकतें है। कम से कम चाय कॉफी कुछ तो हमारे साथ लीजिये।”

  “जी हम चाय नही पीते । ”

” और तो जो पीते हैं वही ले लीजियेगा। आप बैठिए, अगर ऐसे चले गए तो प्रिंसेस मेरा खून कर देगी।”

  रतन ने बात मज़ाक में ही कही थी लेकिन प्रिंसेस शब्द सुन आदित्य उसे देखने लगा..

” प्रिंसेस ??” आदित्य अगर खुद राजघराने से ताल्लुक न रखता होता तो शायद उसे ये एक सामान्य सी बात लगती। जैसे एक आम पति ने अपनी पत्नी को एक स्नेहसम्बोधन दे रखा हो।
   उसे इस प्रकार आश्चर्य से आंखें फाड़ते देख रतन ने पिंकी का परिचय दे ही दिया….

   “विजयराघवगढ़ की राजकुमारी है मेरी पत्नी पिंकी यानी राजकुमारी भुवनमोहिनी सिंह! लेकिन इनके स्वभाव में ऐसा कोई अहंकार आपको नज़र नही आएगा। मेरे जैसे साधारण आदमी से ब्याह करने के बाद पूरी शिद्दत से निभा रही है। वैसे इनके परिवार की यही विशेषता है। हर एक अपने आप में एक किवंदती सा है, चाहे आप राजमाता को ले लें या अनूठे किस्से सुनाने वाली इनकी दादी सा को। इनके ताऊ जी के बड़े बेटे युवराज सा हों या उनके छोटे भाई और रियासत के राजा , राजा अजातशत्रु सिंह!
    हर एक इतना ज़मीन से जुड़ा इंसान है कि आपको मिल कर लगेगा नही की ये लोग किसी डायनेस्टी के हैं।”

  रतन अपनी रौ में बोलता चला जा रहा था इस बात से बेखबर कि सामने बैठे लड़के के अंदर कितना कुछ टूटता फूटता बनता बिगड़ता चला गया।
      जाने वो कौन सी शक्ति थी जिसके कारण आदित्य अपने पैर जमीन पर संभाले रखे था।  उसका सर एक बारगी ज़ोर से घूम गया था। आंखों के आगे ऐसा लग रहा था जैसे सैकड़ों अनार जल रहें हो।
    उसके दुश्मन परिवार के घर पर वो इस वक्त बैठा था।
  उन्हीं दुश्मनों की लड़की के घर जिनके कारण आज उसकी माँ ज़िंदा नही थी।
वही लोग जिनके कारण आज उसकी कोई पहचान नही थी, जिनके कारण वो अपने नाम को भी अधूरा लिखा करता था। वही लोग जिनके कारण उसका बचपन एक अधूरी आस में बीत कर रह गया था।
      अपनी सोच में डूबे आदित्य के माथे पर पसीने की बूंदे छलक आयीं …

  उसे ऐसे खुद में डूबा देख रतन ने उसकी तरफ शर्बत का ग्लास बढ़ा दिया।
    खुद में डूबे आदित्य का ध्यान ग्लास की तरफ नही गया, कि उसी वक्त पिंकी भी चली आयी ….
    पिंकी के पीछे उसकी सहायिका एक ट्राली में तीन चार अलग अलग नाश्ते की ट्रे सजाए चली आयी..
  सामने टेबल पर सब कुछ सजाती पिंकी ने मिठाई की एक प्लेट आदित्य की ओर बढ़ा दी…

” भाई साहब ! कहाँ खो गए आप?”

  सामने टेबल पर रखे पानी के ग्लास को उठाये एक सांस में आदित्य ने सारा पानी पी लिया … अबकी बार उसने पिंकी की तरफ देखा तो उसकी नज़रों में वो अनजाना पन नही था।
    उफ्फ! वो पहचान कैसे नही पाया… इस लड़की का चेहरा बहुत तो नही पर कुछ कुछ उसी के जैसा तो लग रहा था।
    इसका मतलब ये लड़की उसकी बहन थी! उसकी सौतेली बहन पिंकी।

  आदित्य एक झटके में उठ कर वहाँ से बाहर निकल गया। रतन पिंकी उसे आवाज़ देते उसके पीछे बाहर तक भागते चले आये लेकिन फिर वो किसी के रोके नही रुका।

    ऑफिस पहुंच अपने केबिन में अपनी माँ की तस्वीर के सामने खड़ा आदित्य अपने आंसूओं को रोकने की कोशिश में था कि रीमा भीतर चली आयी…

” सर आज गुप्ता जी से आपकी मीटिंग…

  “कैंसल कर दो..

  ” पर सर ये तो पिछले महीने ही तय की जा चुकी थी।

  ” तुमने सुना नही कैंसल कर दो। कह दो हमारी तबियत सही नही है।”

  ” लेकिन सर ..”

  रीमा की ज़िद पर आदित्य चीख उठा…

  “कह दो आदित्यप्रताप मर गया। तब तो कैंसल होगी ना।”

  ” क्या हो गया रीमा ?” अब तक राजा भी आदित्य के कमरे में आ चुका था..

  “सर वो आज की मीटिंग कैंसल करने बोल रहे हैं..

  रीमा ने अपनी बात पूरी की ही थी कि आदित्य लड़खड़ा कर गिर पड़ा…
   उसे ऑफिस वालों की सहायता से साथ लिए राजा तुरंत अस्पताल की ओर निकल गया…


   ********

    समर कंधे पर एक हल्का सा बैगपैक थामे अपनी माँ के कमरे में पहुंच गया।
अपने माता पिता का आशीर्वाद लिए वो निकल रहा था कि विराज का सेवक उसे बुलाने चला आया।
वो पिछली रात ही विराज को फोन पर बता चुका था कि उसे कुछ ज़रूरी काम से दो दिन के लिए बाहर जाना है।
    असल में जिस दिन होटल का मालिक और मैनेजर आ कर गए थे उसी दिन वहीं से विराज महल से बाहर कहीं निकल गया था।
  समर से बता कर वो अपना गुस्सा दूर करने चार पांच दिन के लिए महल से दूर चला गया था।
   पहले भी वो अक्सर अपने दोस्तों के साथ कभी तिब्बत तो कभी केरल निकल जाया करता था। शादी के बाद भी उसकी घुमक्कड़ी बंद नही हुई थी लेकिन राजा बनने के बाद कामो में व्यस्त वो महल में कैद से हो गया था।
   उस दिन रेखा वाली बात के बाद उससे उलझे बिना उसके साथ रहना मुश्किल था और इसी लिए अपने गम को भुलाने वो एक बार फिर पुराना विराज बन दोस्तों के संग रंग रस में डूबा वो सब कुछ भूल जाना चाहता था लेक़िन राजा बनने के बाद इतनी सारी ज़िम्मेदारियों के बोझ तले जीवन ऐसा आसान कहाँ रह गया था।
   उसने क्या सोच रखा था और क्या हो रहा था? 

  विराज के सेवक द्वारा बुलाये जाने पर समर समझ गया कि विराज वापस लौट आया है।
वो उसके कमरे की तरफ बढ़ रहा था कि सेवक ने दीवानखाने की ओर इशारा कर दिया।
   समर दीवानखाने में पहुंचा तब विराज खिड़की पर खड़ा बाहर खिल रहे फूलों को देखता खड़ा था…

  ” राजा साहब प्रणाम ! मेरा नमस्कार स्वीकार करें, आप ने याद किया…”

  “सुबह सुबह कहाँ चल दिये समर?” समर की आवाज़ सुनते ही विराज पीछे मुड़ कर उसके करीब चला आया।

  “राजा साहेब ! कुछ बहुत ही ज़रूरी काम आ गया है। वर्ना अचानक ऐसे नही जाता।”

” हम्म हम जानतें हैं अगर हमारी ज़रूरत का नही है तो हमें बताओगे नही। पर ये बता दो की हम दो दिन यहाँ अकेले सारा काम कैसे देखेंगे?”

“आप राजा हैं ये सारी रियासत आपकी संतान और आप इनके पिता है। मैं भी इसी रियासत का हिस्सा हूँ राजा साहेब! क्या एक पिता को अपनी संतान का पालन पोषण कैसे करना है ये भी बताने की वस्तु है। आप मुझसे कहीं बेहतर जानतें हैं, तभी तो आप इस गद्दी के प्रति इतने आकर्षित थे।

” उड़ा लो अब तुम भी मज़ाक उड़ा लो,हम पर व्यंग कस रहे हो ना?”

” मेरी इतनी औकात नही है राजा साहेब! मैं बस अपने मन की कह गया अगर कुछ गलत कहा हो तो क्षमा करें!”

” ठीक है जाओ। बस जाते जाते ये बता जाओ की अजातशत्रु को हुकुम कहा करते थे फिर हमें राजा साहेब क्यों कहते हो, हुकुम क्यों नही?

  समर मुस्कुरा उठा….

  ” आप राजा हैं मेरे स्वामी हैं क्योंकी मैं इस राजगद्दी का ग़ुलाम हूँ इस नाते आपका भी ग़ुलाम हुआ और आप मेरे साहेब हुए इसलिए आपको पूरा आदर देते हुए राजा साहब बुलाता हूँ।
    रही बात राजा अजातशत्रु जी की तो उनके साथ मेरा अलग नाता है वो मेरे भगवान हैं आराध्य हैं इस नाते मैं उनका भक्त हुआ , उनका हर आदेश मेरे सर माथे है इसलिए वो मेरे हुकुम हैं। हालांकि उन्होंने कभी मुझे अपना ग़ुलाम या नौकर नही माना। आपके लिए मन में आदर हैं लेकिन वो पूजनीय हैं मेरे लिए।
  एक बात और बताना चाहूंगा वो ये कि उनके लिए मेरे मन में कितनी भी भक्ति हो मैं आपके खिलाफ तब तक नही जाऊंगा जब तक आप मन प्राण से इस राजगद्दी और राजधर्म को निभाते रहेंगे।”

विराज के चेहरे पर एक हल्की स्मित की रेखा आयी और चली गयी…

  ” तुम्हारी कई बातें तो हमारी समझ के बाहर की होतीं है समर। जाओ लेकिन जल्दी लौटना और सुनो तुमने उस दिन की बात किसी से कही तो नही न? और तुमने पता करवाया जो पता करवाने वाले थे।”

“बस राजा साहब कुछ उसी सिलसिले में निकल रहा हूँ।

  समर विराज को प्रणाम कर बाहर निकल गया।

  विराज कुछ तीन चार दिन बाहर रह कर जिस बात को भूलना चाहता था महल वापसी के साथ ही वो बात एक बार फिर फन फैलाये नाग सी उसके सामने आ खड़ी हुई……

   अपने कमरे की ओर बढ़ते उसके  कदम रेखा के कमरे के सामने जाकर ठिठक कर ठहर गए, एक झटके से उसने दरवाज़े को धक्का दिया और कमरे के अंदर चला आया।
          रेखा नहा कर ही आयी थी और वहीं एक ओर सहायिका उसके बेटे की मालिश कर रही थी।
  इस प्रकार विराज को आये देख सहायिका ने उठ कर उसे प्रणाम किया और रेखा की अनुमति ले बाहर निकल गयी।
   रेखा ने विराज को देखा विराज ने रेखा को, दोनो की आंखे आग उगल रहीं थीं…

  ” बिना बोले बिना बताए कहाँ चले गए थे आप? ये भी नही सोचा कि छोटा बच्चा है हम हैं। हम दोनों को आपकी ज़रूरत होगी।”

“तुम्हारी और बच्चे की ज़रूरत के लिए महल में किस चीज़ की कमी है। जो चाहिए होता है सब तुम्हारी उंगलियों पर है फिर हमारी क्या ज़रूरत?”

” ऐसे क्यों बोल रहे हैं आप? क्या आपकी ज़रूरत सिर्फ संसाधनों से पूरी हो सकती है? “

” नही लेकिन बाकी ज़रूरतों के लिए भी तो तुम्हारे पास लोग मौजूद हैं जिनसे समय समय पर मिलना जुलना भी होता रहता है तुम्हारा?”

” ये क्या कह रहे हैं आप? “

” इतनी भोली तो नहीं हैं आप रानी रेखा! चार दिन पहले जिस होटल में आपके पुलिस वाले मित्र ने वहाँ बैठे मवालियों को पीटा था उसकी सारी खबर है हमारे पास।”

  रेखा को अब सारा माजरा समझ आया था। रोहित के साथ हुई उसकी मुलाकात के बारे में विराज को मालूम हो चुका था।
   इसलिए विराज कुछ भी अनाप शनाप बोले जा रहा था। बहुत देर तक सुनने के बाद आखिर उससे भी नही रहा गया….

  “आप करें तो सब जायज़ है और अगर कोई और कर ले तो नाजायज !ये कहाँ का इंसाफ है राजा साहब? अब ये मत कहिएगा की आप बड़े भोले और नादान है।  क्योंकि आपकी महिला मित्रों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है और ये हम जानतें हैं।
  हालांकि अगर आपने  गलती की तो इसका मतलब ये नही की हमें भी वही गलती करने का हक मिल जाता है लेकिन ये भी सत्य है कि हम अभी अपनी सफाई में जो भी कहेंगे आपको सब झूठ ही लगेगा। और जिस आदमी को हमारी बात समझ न आये उससे कुछ भी कहने का कोई औचित्य नही है।”

” होगा भी कैसे? जब आपको उचित अनुचित सभी तरह की बातें करने के लिए दोस्त मिल ही गए तो हमारी क्या ज़रूरत? आप क्या जाने पत्नीधर्म और रिश्ते नाते? ”

” एक बार खुद से ये सवाल कर के देखिए राजा साहब! जब भी हमें ज़रूरत हुई क्या आप हमारे साथ मौजूद थे। आपके ही भाई हैं ना राजा अजातशत्रु एक वो हैं जो एक साधारण लड़कीं से ब्याह के लिए इसी राजगद्दी को छोड़ने तक को तैयार हो गए, अपनी बहन की गलती को कमतर करने गद्दी छोड़ भी गए और एक आप हैं, बच्चा बुखार में तपता रहा और आप कहीं पी पिलाकर पड़े रहे।
  आप हमसे ये सवाल पूछ रहे है कि हम क्या जाने पत्नि धर्म? आप ये बताइये की आपने कब पतिधर्म निभाया है। एक बच्चे को हमारी गोद में डालने के अलावा आपने किया ही क्या है आजतक। सारी प्रेग्नेंसी हमने अकेले सब कुछ सहा, उस वक्त भी आप अपने दोस्तो अपनी पार्टियों में व्यस्त रहे।
महल में निभाये जाने वाले सारे व्रत त्योहार हमने अकेले ने ही निभाएं हैं आपके बिना।
   बच्चे के नामकरण तक में आप मौजूद नही थे राजा साहब?
  बस आपसे बातें करवा लीजिये बड़ी बड़ी। आपको राजा बनने की चाह थी वो आप बन गए, इससे ज्यादा कभी आपने कुछ नही चाहा था और न कभी चाहेंगे।
एक बात और आपसे कहें, हमें तो लगता है, असल मे  आप राजा भी नही बनना चाहते थे ये सिर्फ और सिर्फ जेठ जी से जलन थी, चूंकि राजा अजातशत्रु गद्दी पर बैठने वाले थे इसलिए आपको वो गद्दी चाहिए थी। और जैसे ही उन्होंने गद्दी छोड़ी आपने लपक ली।
   क्या आप इस गद्दी के लिए ईमानदारी से राजा अजातशत्रु से मुकाबला कर इसे जीत सकते थे ? नही कभी नही।
   और एक बार अपने मन में झांक के देखिए क्या आप इस गद्दी को वैसे ही संभाल पा रहें हैं जैसे आपके भाई….
   अगर समर सा ना हों तो आपसे एक फाइल तक तो पलटी नही जाती, और आप बैठे हैं गद्दी संभालने। सिर्फ मंत्री के भरोसे चलने वाला राजा कभी ज्यादा दूर नही चल पाता, अगर आप इन बैसाखियों को नही छोड़ेंगे तो भविष्य मे यही बैसाखी आपको पटखनी भी दे सकती है।
    रिश्ते नाते क्या सहेजेंगे आप जिसे अपने काम तक का ….

” बस करिये! आप हमारी पत्नी है या उसकी, जो उसका गुणगान किये जा रहीं हैं।”

” गुणगान उसी का होता है राजा साहब जिसमें गुण हो। अपना दिमाग इधर उधर की फालतू बातों में लगाने से बेहतर होगा आप अपने राज्य और उसकी जनता की समस्याओं पर ध्यान दीजिए।
   रोहित हमारा दोस्त है उसे शादी से पहले ही से जानते थे। उसकी दादी की तबियत बहुत खराब थी, उसे कुछ पैसों की अचानक ज़रूरत पड़ी थी, और हमने आपसे बिना कहे उसे रुपये दिए थे।
   उन्हीं रुपयों से उसकी दादी का ऑपरेशन हुआ और अब वो स्वस्थ हैं।
  हमारे शहर से गुजरते हुए उसे लगा कि हमें आभार प्रकट कर जाए पर आपके शक्की दिमाग के कारण और राजमहल के नियमों के कारण हमने उसेमहल नही बुलाया और उससे मिलने बाहर चले गए।
  अगर आपका स्वभाव इतना खराब नही होता तो हम ये सब आपसे पूछ के करते लेकिन आपको कुछ भी बताना कीचड़ में पत्थर फेंकने समान है,इसलिए आपसे कुछ नही बोला।
   दूसरी बात हम भी राजपूतानी हैं फेरों और सात वचनों को निभाना हम जानतें हैं।
    हमें छोड़िए आप अपनी रियासत ही संभाल लीजिये वही बहुत है।
   महसूल वसूली की बात पर फिर आपकी रियासत में हंगामा हो सकता है। जाइये राजा साहब अपनी रियासत देखिए।

  खून का घूंट पीकर विराज पैर पटकते हुए उस कमरे से बाहर निकल गया…..

   दीवानखाने में एक ओर बने ऑफिस में बैठा विराज समर की बताई फाइलें खोल पढ़ने और समझने की असफल कोशिश में लग गया।।

*******

     आदित्यप्रताप को साथ लिए राजा स्टाफ की मदद से तुरन्त अस्पताल पहुंच गया। आपातकालीन विभाग में आदित्य की जांच में लगे डॉक्टर्स से बार बार उसकी हालत का जायज़ा लेता परेशान हाल राजा इधर से उधर भटक रहा था और उनींदी आंखों से हल्के होश और हल्की बेहोशी में आदित्य राजा को परेशान हाल मारा मारा फिरता देख रहा था।
    डॉक्टर्स अपनी तरफ से सभी शुरुवाती जांच की प्रक्रिया के साथ ही आवश्यक निदान में भी लगे थे।
   कुछ देर के प्रयासों के बाद ही आदित्य ने आंखें खोल दी थी….
    उसके एक तरफ खड़े राजा और डॉक्टर की बातें उसके कानों में भी पड़ रही थी…

. “घबराने की बात नही है, सिनकोप था। कभी कभी अधिक स्ट्रेस बीपी बढ़ जाने या कभी कभी बीपी घट जाने से भी सही मात्रा में ब्रेन को कुछ सेकण्ड्स के लिए रक्त की आपूर्ति पूरी तरह नही हो पाने से ऐसी बेहोशी हो जाती है।
   इनकी जांच तो कर ली गयी है, ईसीजी और बाकी सब भी सामान्य है इसलिए अब आप इन्हें लेकर जा सकतें हैं।”

“जी धन्यवाद डॉक्टर साहब!”

  “जी मरीज़ को ले जाने के पहले आप ड्यूस क्लियर कर दीजिएगा।”

   सांसारिक मोहमाया अपनी जगह है और प्रोफेशन अपनी जगह !
  डॉक्टर की बात पर मुस्कुरा कर राजा ने हाँ में सर हिलाया और बाहर जाने लगा कि रीमा ने उसे टोक दिया…

  ” सर आदित्य सर का बिल है तो ऑफिस एकाउंट से पे करने के लिए उनके कैशियर को बुलाया….

  रीमा की बात पूरी होने के पहले ही राजा ने उसे टोक दिया…

  “ज़रूरत नही है कैशियर को बुलाने की। मैं पे कर दूंगा।”

” ठीक है सर ! फिर आप बिल रख लीजियेगा, सब रियम्बर्स हो जाएगा।”

” उसकी जरूरत नही है रीमा। मुझे यहाँ खर्च किये पैसे वापस नही चाहिए। और ये बात किसी से कहने की, ज़रूरत भी नही है। ओके!!

” ओके सर !” उसे आश्चर्य से देखती  रीमा उसकी बात का मतलब समझ नही पा रही थी की ये सनकी उस दूसरे सनकी के किये क्यों अपने पैसे खराब कर रहा था?  लेकिन वहीं पीछे बेड पर आंखें बंद किये लेटे आदित्य को कुछ कुछ समझ आने लगा था।
    वो समझ नहीं पा रहा था कि ये वही अजातशत्रु है या कोई और? और अगर ये वही है तो क्यों उसकी इतनी मदद कर रहा था ?
  और सबसे विचारणीय विषय तो यह था कि अगर ये वही है तो अपना महल छोड़ यहाँ क्या कर रहा था?
 
   और ये सारी बात कहीं से पता चल सकती है तो वो एक ही जगह थी और अब उसे वहाँ वापस जाना ही होगा…… सब कुछ जानने के लिये।

******** 

समर ने दिल्ली के एयरपोर्ट पर उतरते ही इधर उधर एक बार नज़र डाली और फिर राजा को फ़ोन लगा लिया….

  राजा अब तक अस्पताल में ही था…

  “पहुंच गए समर ?”

” जी हुकुम ! और जैसा कि  मुझे पहले ही लगा था कि केसर भी महल से दिल्ली के लिए ही निकली थी। मेरा उनके पीछे निकलना सफल रहा , अब यहाँ से में उन्हीं के पीछे जा रहा हूँ।
  मुझे लगता है उन्हें आभास हो गया था कि उनका फ़ोन गायब होने में और बाद में उन्हें अलग अलग फ़ोन देने के पीछे मेरा ही हाथ था।

  उनके दिमाग की भी दाद देनी पड़ेगी, इसके पहले के हर फ़ोन के ट्रैकर को पहचान कर उसने फ़ोन ही इस्तेमाल नही किया। पर इस बार के फ़ोन में शायद उन्हें समझ नही आ पाया है,
इस बार के फोन से मैं उन्हें ट्रैक कर सकता हूँ। लेकिन अब तक उन्होंने कोई संदिग्ध मेंसेज किसी को भी नही भेजा है। मुझे लग रहा है वो आदित्य से इतने दिन से कॉन्टैक्ट नही कर पायीं हैं और इसलिए ही वो दिल्ली आयी है।
    मैं जल्दी ही आपसे मिलने आऊंगा। अभी फिलहाल केसर के पीछे जाना जरूरी है। आप अपना ध्यान रखिएगा।”

  कुछ दो चार बातों के बाद समर ने फ़ोन रख दिया। उसके फ़ोन रखते ही बाँसुरी का फ़ोन चला आया…

  ” क्या कर रहे थे? मेरा मतलब मुझे याद करने के अलावा क्या कर रहे थे?”

बाँसुरी की बात सुन राजा हँसने लगा..

” कुछ नही । अभी ज़रा हॉस्पिटल में था…

  राजा की बात पूरी होने से पहले ही बाँसुरी बोल पड़ी

” आप हॉस्पिटल में क्यों हैं? क्या हुआ? तबियत तो ठीक है ना?”

  उसके इतने सारे सवालों से हैरान राजा मुस्कुरा कर रह गया

  “अरे घबराओ मत बाँसुरी मैं बिल्कुल ठीक हूँ। आदित्य की तबियत ज़रा बिगड़ गयी थी बस उसे ही लेकर आया हूँ।”

” पक्का मेरी कसम!”

” ये क्या हर बात पर कसम ?”

  ” ठीक है तो अभी फ़ोन कट किजिये और मुझे वीडियो कॉल कीर के दिखाइए की आप ठीक हैं।”

राजा समझ गया कि अब ज़िद पर आ चुकी बाँसुरी को बातों से बहलाने का कोई फायदा नही है।
  उसने बाँसुरी को वीडियो कॉल लगा लिया। एक दूसरे का चेहरा देखते ही दोनो के चेहरे पर मुस्कान चली आयी…

  बाँसुरी ने राजा के आसपास सभी कुछ सामान्य देख कर अपनी पूरी तसल्ली कर ली उसके बाद वो भी उसे अपने आसपास की जगह दिखाने लगी…

  ” आपको बहुत मिस कर रही हूँ, खास कर यहाँ घुमते हुए। ऐसा लग रहा है काश आप साथ होते तो हम हाथों में हाथ डाले घुमतें फिरतें, मैं आपको सारी जगह दिखाती..”

  ” एक मिनट ! ये मैं दिखाती मैं बताती क्या लगा रखा है हुकुम? अगर हम दोनों साथ होते तो साथ साथ ही देखते सब।”

” रहने दीजिए। शादी के बाद गए तो थे साथ घूमने। कितना कुछ दिखाया आपने आज भी याद है मुझे। होटल के कमरे की दीवारों के अलावा और आपके चेहरे के अलावा कुछ नही देखने दिया। मेरी सारी ड्रेसेस कोरी वापस चली आयीं इतने अरमानों से खरीद था कि इसे बीच पर पहनूँगी , इसे शॉपिंग के वक्त, लेकिन काम कुछ नही आया।

” तो असल नाराज़गी इस बात की है हुकुम को कि उनके ढ़ेर सारे कपड़े वहाँ काम नही आये और हमारी हुकुम मन भर मॉडलिंग नही कर पाई हैं ना! इस बात के लिए आप खुश हैं या शिकायत कर रहीं हैं हुकुम।”

  राजा के भले से सवाल पर बाँसुरी मुस्कुरा कर रह गयी…

” बस ऐसे ही बातों में घुमाते हैं आप और मैं सारा कुछ भूल जातीं हूँ। वैसे वो दिन कैसे भूल सकती हूँ। मेरी ज़िंदगी के सबसे हसीन पल थे वो जब आपका चेहरा हर पल मेरे सामने था।
   आपकी मुझे देखती हुई गहरी सी आंखें… मेरे बालों से खेलती आपकी उंगलियां, उन उंगलियों में पहना आपका माणिक , आपके मुस्कुराते होंठो का एक ओर ज़रा तिरछा होकर उठना और वहाँ आपका जानलेवा कैनाइन। आपके मणिबंध में बंधा सोने में मढ़ा रुद्राक्ष। आपकी गर्दन पर ठीक पीछे वो काला तिल…

” बस बस बस हुकुम! इतनी डिटेल्स में मत जाओ की यहाँ अकेले रहा न जाये। एक तो तुम्हारे साहेब यहाँ कामों में अकेले व्यस्त हैं उस पर हमारी हुकुम इतनी दूर हैं हमसे अब ऐसे में ऐसी बातें करोगी तो अकेले नींद कैसे आएगी।”

” तो आ जाइये न मेरे पास। मैं तो चाहती ही हूँ कि आप आ जाओ। “

” अभी तो नही बनेगा , लेकिन जल्दी ही कोशिश करूंगा। ”

  फ़ोन रख राजा वापस मुड़ गया। अपने सामने अस्पताल, उसका काउंटर और आस पास भागते दौड़ते अस्पताल के कर्मचारियों को देख उसे एकाएक याद ही नही आया कि वो इस अस्पताल में क्या कर रहा है।
     उसने आदित्य का बिल पहले ही पे कर दिया था, उसकी जेब में रसीद भी पड़ी थी लेकिन इस वक्त वो इन सारी बातों से अनजान एक किनारे की बेंच पर जा बैठा।
   अपने चारों ओर किसी जान पहचान वाले व्यक्ति को ढूंढता राजा दिमाग पर ज़ोर डालने की कोशिश करता रहा कि आखिर वो इस अस्पताल में आया क्या करने था…….


  क्रमशः

aparna….

  


  





    

     



   

     
  
      

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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