जीवनसाथी -92


जीवनसाथी — 92



      फ़ोन रख कर मुड़ते ही अपने आस पास अस्पताल और इधर उधर भागती दौड़ती नर्सो को देख कर राजा सोच में डूब गया कि आख़िर वो अस्पताल आया किस लिए है?
   उसे लगा जैसे वो सोच ही नही पा रहा कि वो यहाँ क्यों आया और कैसे आया?
   एक किनारे की बेंच पकड़ कर वो चुपचाप बैठ गया।
अपने दिमाग पर ज़ोर डालने की कोशिश करता वो सोचने लगा कि सुबह से लेकर अब तक उसने क्या क्या किया और आखिर यहाँ तक कैसे पहुंचा।।
  इतना सोचने पर भी उसे कुछ देर को कुछ भी याद नही आ पा रहा था, उसने अपना मोबाइल निकाला और ऑन कर लिया,स्क्रीन पर ही बाँसुरी की मुस्कुराती तस्वीर थी।
    उस तस्वीर को देखते ही राजा भी मुस्कुराने लगा …

  ” चाहे सारी दुनिया भूल जाऊँ लेकिन आपको कभी नही भूल सकता हुकुम।”

  मोबाइल स्क्रॉल करते हुए उसकी नज़र अदित्यप्रताप के नम्बर पर चली गयी, उसी वक्त भीतर से बाहर आती रीमा राजा के पास चली आयी। उसे आदित्य की बेहतरी के समाचार देकर वो कैंटीन की ओर कॉफी लेने चली गयी, और राजा को अचानक सब कुछ याद आ गया।
   वो भी एक ओर लगे वॉशबेसिन की ओर मुहँ हाथ धोने चला गया।
    अस्पताल से उसी रात आदित्य की छुट्टी हो गयी। उसे उसके घर पर छोड़ कर राजा अपने घर के लिए निकल गया।
   समर अपना काम पूरा कर अगली सुबह राजा से मिलने आने वाला था।

*****


  अगली सुबह समर कुछ जल्दी ही चला आया। काफी देर इधर उधर की बातें करने के बाद समर राजा को साथ लिए निकल गया।
   प्रेम को उसने कह दिया था कि राजा को वो किसी डॉक्टर से मिलवाने लेकर जा रहा है उन्हें लौटने में रात भी हो सकती है।
   प्रेम की राजा के प्रति चिंता से वो भी परिचित था।

    उन सब के जाने के बाद नाश्ते की प्लेट्स उठाये निरमा रसोई में चली गयी। बाजू वाले घर में रहने वाली हमउम्र बच्ची के साथ मीठी की भी दोस्ती हो गयी थी, उसके बुलाए जाने पर मीठी उसके साथ खेलने चली गयी थी।
  घर पर निरमा और प्रेम ही थे। प्रेम मीठी के किसी खिलौने को ठीक करने में लगा था और निरमा प्रेम को छेड़ने के लिए कुछ गुनगुनाते हुए काम भी करती जा रही थी…

   
    ”  अब के सजन सावन में
       आग लगेगी बदन में
     घटा बरसेगी, मगर तरसेगी नज़र
         मिल न सकेंगे दो मन
           एक ही आँगन में
        अब के सजन सावन…

     दो दिलों के बीच खड़ी कितनी दीवारें
      कैसे सुनूँगी मैं पिया प्रेम की पुकारें
    चोरी चुपके से तुम लाख करो जतन, सजन
        मिल न सकेंगे दो मन…”

  धीमी धीमी गुनगुनाहट का स्वर इतना तेज़ था कि प्रेम के कानों तक उसकी आवाज़ पहुंच जाए…

   प्रेम ने निरमा के गाने पर ध्यान दिए बिना ही अपना काम जारी रखा, उसे उसी तरह उदासीन देख निरमा वापस बाहर के कमरे में आकर साफ सफाई करने लगी। सफाई करते हुए भी उसका गाना शुरू था…


        आजा पिया, तोहे प्यार दूँ
         गोरी बैय्याँ, तोपे वार दूँ
        किसलिए तू, इतना उदास?
     सूखे सूखे होंठ, अखियों में प्यास
          किसलिए, किसलिए?
                 आजा पिया…

      होने दे रे, जो ये जुल्मी है, पथ तेरे गाँव के
     पलकों से चुन डालूँगी मैं, कांटे तेरे पाँव के
         लट बिखराए, चुनरियाँ बिछाए
              बैठी हूँ मैं, तेरे लिए
                    आजा पिया…

  गाने के बोल सुनते ही प्रेम ने एक नज़र निरमा को देखा और वो एकदम से चुप हो गयी।
   प्रेम ने सही किया खिलौना एकतरफ रखा और अपना मोबाइल उठाये एक तरफ लेट गया। निरमा समझ गयी कि अब प्रेम या तो कुछ पढ़ रहा होगा या गूगल पर कुछ सर्च कर रहा होगा….
     वो अंदर से सब्जियां उठा लायी और कुछ गुनगुनाते हुए सब्जी काटने में लग गयी….

       ओ मियां हमसे न छिपाओ
     हो बनावट कि सारी अदाएं लिये
        कि तुम इसपे हो इतराते कि
       मैं पीछे हूँ सौ इल्तिज़ाएं लिये
 जी में खुश हूँ मेरे सोना झूठ है क्या, सच कहो ना      कि मैं भी साथ रहूँगी रहोगे जहाँ ओ मेरे …
ओ मेरे सोना रे सोना रे दे दूंगी जान जुदा मत होना रे

     गुनगुनाहट कुछ अधिक ही तेज़ थी, प्रेम को सब कुछ सुनाई दे रहा था, वो अचानक उठ कर इधर उधर कुछ ढूंढने लगा…. ” मीठी ! कहाँ हो बेटा?”

  ” मीठी तो नीचे खेलने गयी है,कुछ काम था क्या ?”

  “हां मीठी से पूछना था उसकी मम्मा अकेले अकेले अंताक्षरी क्यों खेल रही है?”

  प्रेम ने इतने संजीदा स्वरों में कहा कि कुछ सेकण्ड्स को निरमा भी सोचने लगी, फिर बात समझ में आते ही उसे हल्की सी हँसी आ गयी…

  ” मम्मा भी क्या करे, मीठी के पापा रूठे जो बैठे हैं?”

” किसने कहा मीठी के पापा रूठे बैठे हैं?”

  निरमा आंखे फाड़े प्रेम को देखने लगी।
प्रेम उठ कर उसके एकदम करीब चला आया, और उसने पहली बार वो किया जो आजतक उसने कभी नही किया था…
   
       ओ फिर हमसे न उलझना
     नहीं लट और उलझन में पड़ जाएगी
           ओ पछताओगी कुछ ऐसे
      कि ये सुरखी लबों की उतर जाएगी
          ये सज़ा तुम भूल न जाना
          प्यार को ठोकर मत लगाना
    कि चला जाऊंगा फिर मैं न जाने कहाँ ओ मेरे …

  प्रेम को गाते हुए निरमा ने पहली बार सुना था, उसकी आंखें आश्चर्य से खुली रह गईं, वो शरमाते हुए उसकी बाहों में चली आयी।
   उसे बाहों में कसने के बाद प्रेम उसके कानों में आकर गुनगुना उठा…

  ” अपनी सेहत का भी ध्यान रखा करो निरमा! एक और बात तुमसे कहना चाहता हूँ। ”

  ” हां बोलिये ।”

” शादी के इतने दिनों में मैं नही जानता कि तुमने मुझे कितना जाना या समझा है लेकिन मैं तुम्हें बहुत कुछ जानने लगा हूँ। तुम एक बेहद समझदार और ज़िम्मेदार माँ और पत्नि हो। तुमने कभी भी घर की जिम्मेदारियों या मीठी की ज़िम्मेदारी से पीछे कदम नही हटाये। मैंने तुम्हें मीठी के कारण रात रात जागते देखा है । और उन लंबे जगरातों के बाद भी सुबह मुझसे पहले उठ कर हमेशा तुमने मेरी तैयारी भी की है।
   आज तक किसी दिन भी मेरी टेबल से नाश्ते की प्लेट गायब नही रही चाहे रात दिन कितनी भी मेहनत क्यों न करनी पड़ी हो, चाहे कितनी भी थकान तुम्हें झेलनी क्यों न पड़ी हो।
  मैं जानता हूँ दुनिया की अधिकतर औरतें ये सब अपने घर पति और बच्चे के लिए करती ही होंगी। उनके लिए ये शायद बड़ी बात नही है लेकिन मेरे लिए तो है।
तुमने न कभी माँ का फर्ज निभाते हुए पत्नि धर्म को कमतर किया और ना ही पत्नि धर्म निभाते हुए माँ के फ़र्ज़ से पीछे हटीं इसलिए मुझे लगता है माँ बनने या न बनने का फैसला पूरी तरह तुम्हारा है और होना भी चाहिए।
    मेरी सोच मेरा डर मैं तुम पर नही लाद सकता क्योंकि मैं जानता हूँ तुम माँ हो , तुम कभी दोनो बच्चों में कोई भेदभाव न करोगी न किसी को करने दोगी।
  इसलिए ये निर्णय पूरी तरह तुम्हारा है और मैं इस निर्णय में तुम्हारा पूरा साथ दूंगा। इतने दिनों से यही उधेड़बुन चल रही थी मन में, लेकिन धीरे धीरे ही सहीं मुझे समझ आ गया कि क्या सही है और क्या गलत।
बल्कि अगर मेरी बातों ने तुम्हारा दिल दुखाया है तो….”

  प्रेम की बात अधूरी ही काट कर निरमा बोल उठी…

  ” एक बात कहुँ? नाराज़ तो नही हो जाओगे?”

  ” नाराज़गी वाली बात हुई तो ज़रूर हो जाऊँगा।”

  ” नही ऐसा मत बोलो न प्लीज़!”

.” ठीक है बोलो। नाराज़ नही होऊंगा।”

  ” हम्म कैसे बताऊँ?  आई मीन कैसे बोलूं?”

  ” आंखें बंद करो और बोल दो।”

  ” ह्म्म्म।कोशिश करती हूँ, वो असल में बात ये है कि……..
            मैं प्रेग्नेंट नही हूँ।”

  आंखें बंद किये निरमा ने जल्दी से कह दिया और चुप खड़ी हो गयी …….

” मतलब ?”

निरमा ने धीरे से आंखें खोली,प्रेम उसे थामे ही खड़ा था… प्रेम के चेहरे पर गुस्सा न देख निरमा की जान में जान आयी…

” मतलब आपके साथ यहाँ आने और आपके पास रहने के लिए मैंने झूठ बोला था।”

  एक राहत की सांस ले प्रेम ने निरमा को वापस अपनी बाहों में भर लिया…

” वैसे इतने दिनों में मुझे लगा आप भी तैयार हो गए हैं इस बात के लिए।
    जैसे आपको छोटी निरमा मिल गयी मुझे भी एक छोटा सा प्रेम देने के लिए।”

निरमा की बात सुन प्रेम ज़ोर से हँस पड़ा…

” तुम्हें सच में दूसरा बेबी चाहिए।”

हां में सर हिला कर निरमा खड़ी रही…

  ” ठीक है ! तो चलो फिर!”

” कहाँ चलें?”

” बेबी प्लान करने!”

  निरमा ने आश्चर्य से प्रेम को देखा और उसकी बाहों से खुद को छुड़ा कर बाहर भाग गई…

” क्या हुआ ? कहाँ चली गईं तुम अब?”

” आपके लिए चाय बनाने, क्योंकि आपका दिमाग खराब हो गया है!”

“अरे तुम्हें ही तो चाहिए था न छोटा प्रेम ! तो आ जाओ!”

  प्रेम मुस्कुराने लगा….
       और उसका मजाक समझ निरमा भी खिलखिलाने लगी…..
    प्रेम भी निरमा के साथ रसोई में चला आया…
निरमा चाय चढाने लगी…

” क्या हुआ? जितने गाने याद थे सारे गा लिए क्या? “

प्रेम के छेड़ने पर निरमा मुस्कुराने लगी…

“, जिसके लिए गा रही थी जब वो मान गया तो अब क्या ज़रूरत गानों की..?”

” ज़रूरत है ! चलो जल्दी से तैयार हो जाओ, कहीं घूम कर आतें हैं। आज हुकुम भी देर से आएंगे।”

  निरमा ने हाँ में सर हिलाया और तैयार होने चली गयी।
    उसके तैयार होकर आते ही राजा को फ़ोन में बता कर प्रेम निरमा को साथ ले बाहर निकल गया। जाते जाते बाहर से ही मीठी को भी दोनो ने साथ ले लिया।

*******


      राजा समर के साथ निकल गया था। राजा का काफी सारा काम दिल्ली में भी था। उनकी रियासत के फैला हुआ व्यापार दिल्ली तक था। इसी से अक्सर युवराज राजा और समर का दिल्ली आना जाना हुआ ही करता था।
    दिल्ली के ऑफिस के लोगों से छिपने ही राजा और प्रेम ने एक साधारण सी कॉलोनी में आम सा घर ले रखा था।
   लेकिन अभी इस वक्त वो अपने ऑफिस के गेस्ट हाउस ही जा रहा था। समर वहीं रुका हुआ था।
  समर के साथ ऑफिस के कुछ ज़रूरी लीगल पेपर्स देखने के बाद राजा कुछ सोच में डूब गया। समर ने उसे चिंतित देख कुछ तस्वीरें उसके सामने रख दी।
तस्वीरों में केसर एक आदमी के साथ नज़र आ रही थी।
  तस्वीरें राजा ने उठा ली, वो कुछ सोचते हुए समर की ओर देखने लगा…

” समर ये ?”

  राजा के सवाल पर समर ने उसे देख कर हां में सर हिलाया और आगे बताने लगा…

  ” हुकुम ये सब इन्हीं का किया धरा है। बाकी सारे लोग तो बस मोहरे बन कर रह गए हैं। मैं सारी बातें सिलसिलेवार आपको बताता चलूँगा…

   समर अभी अपनी बात पूरी भी नही कर पाया था कि तेज़ कदमों से चलती हुई पिया उन दोनों तक चली आयी।

  ” हेलो मंत्री जी ! कैसे हैं आप? और आपका ये गेस्ट हाउस तो बेहद शानदार है, लेकिन  मुझे गेट पर आपके गार्ड ने रोक लिया था , वो तो आपका दिया हुआ एंट्री पास था वरना मुझे अंदर आने ही नहीं मिलता।”

  पिया रेल की गति से बोलती चली गयी, राजा और समर दोनो उसे अचकचा कर देखने लगे, कि पिया का ध्यान समर के साथ बैठे राजा पर भी चला गया…
और समर ने पिया के बारे में राजा को बताना शुरू कर दिया….

  ” हुकुम! ये डॉक्टर पिया हैं .. आपकी रियासत में आपके अस्पताल में काम करती हैं और डॉक्टर साहब ये …”

“मैं समझ गयी ये आपके राजा साहब हैं। द ग्रेट एम्परर राजा अजातशत्रु सिंह ।”

  पिया तुरंत अपनी जगह खड़ी हुई और उसने राजा को एक जोरदार सैल्यूट  मार दिया। उसकी इस हरकत पर समर और राजा ज़ोर से हँसने लगे, उन्हें इस तरह हंसते देख भी पिया को अपनी बेवकूफी समझ नही आई। उसके अनुसार राजाओं महाराजों को इसी तरह सम्मान दिया जाता था..

  “क्या हुआ? मैंने कुछ गड़बड़ कर दी क्या मंत्री जी?”

समर ने हंसते हंसते अपने पेट पर  एक हाथ रख दूसरे से ना में हाथ हिलाया लेकिन हंसी के कारण उसके मुहँ से कुछ नही निकला।

  ” सॉरी सॉरी आप राजा अजातशत्रु सिंह नहीं हैं क्या?”

  पिया ने राजा से ही सवाल कर दिया, राजा मुस्कुराते हुए समर की ओर देखने लगा…

” ओह्ह समझी । आप प्रेम जी हैं ? है ना?”

  अबकी बार राजा ने समर की ओर देख आंखों ही आँखों में इशारे से कुछ पूछा और समर ने ना में सर हिला दिया…

” डॉक्टर पिया जी आपने सही पहचान लिया मुझे। मैं ही अजातशत्रु हूँ।”

  ” ग्रेट! आपसे मिल कर बहुत खुशी हुई राजा साहब। सच कहूं तो मैं अपनी लाइफ में पहली बार किसी जीते जागते राजा को देख रही हूँ।
   एक्चुली आपके अस्पताल में काम करते समय आपके महल और आपकी राजशाही के किस्से  सुने तो थे, लेकिन मुझे लगता था ये सब बनी बनाई बातें हैं। आज के ज़माने में कहाँ राजा और कहाँ मंत्री? “

  अबकी बार पिया समर की तरफ देख मुस्कुराने लगी…

  ” लेकिन जब पहली बार आपके महल गयी तब लगा कि बॉस ये लोग तो सच्ची के राजे महाराजे हैं फिर आपके ये मंत्री जी मिल गए…

  ” बस बस डॉक्टरनी साहिबा! हमारी और हमारे महल की तारीफ बस करें।  अब जरा आपकी तारीफ का मौका भी दीजिये।”

  ” मुझमें तो ऐसी कोई खास खूबी है नही जो तारीफ के लायक हो,लेकिन हां आप अपने किसी दोस्त की तबियत के बारे में कुछ पूछना चाहते हैं उस बारे में शायद कोई मदद कर पाऊं? वैसे आपके वो दोस्त हैं कहाँ?”

  ” जी डॉक्टर साहिबा! “

  राजा समर की ओर देखने लगा, समर ने उसे आंखों जी आंखों में इशारा किया और पिया की ओर घूम गया..

” यही है मेरे दोस्त,मेरे हुकुम राजा साहब। इन्हें अभी पिछले कुछ दिनों से एक समस्या का सामना करना पड़ रहा है। होता यूं हैं कि हुकुम कुछ देर के लिए कुछ थोड़ी बहुत बातें भूल जातें हैं।”

” अरे समर तुम उस दिन की बाँसुरी की बात को इतनी गंभीरता से क्यों ले रहे हो। कभी कभी स्ट्रेस के कारण ऐसा हो जाता है। इतनी चिंता की बात नही है।”

  ” है हुकुम !ऐसे भूलना चिंता की बात है । रानी बाँसुरी की चिंता बिल्कुल वाजिब है। आप उस रात गिटार नही बजा पाए और उसी रात के बाद से रानी हुकुम बहुत परेशान हो उठी हैं।

   अब तक उन दोनों की बात सुनती पिया राजा की ओर देखने लगी…

  ” मंत्री जी आपको थोड़ा ज्यादा डरा रहें हैं। उतना डरने की भी ज़रूरत नही है राजा साहब लेकिन आपके साथ ऐसा क्यों हो रहा ये जानना ज़रूरी है। एक बात बताइये क्या बचपन में या कभी बाद में आप बहुत ऊंचाई से गिरे थे या सर पर कोई चोट लगी थी आपको।”

” ऐसा कुछ याद तो नही है। लेकिन हां एक बार घोड़े पर से गिरा था, और अभी कुछ समय पहले मुझे हाथ में गोली भी लगी थी।”

“किस जगह पर लगी थी गोली?”

” बस कंधे को छूती निकल गयी।”

  ” क्या आप मुझे निशान दिखा सकते हैं?”

राजा ने कमीज हटा कर पिया को वो निशान दिखा दिया…

  ” क्या आपको ये हाथ उठाने चलाने या इससे कुछ पकड़ने में असुविधा होती है?”

” हाँ कभी कभी होती है। लेकिन ऐसा कुछ खास तकलीफ तो नही है।”

” हम्म ! कल कुछ टेस्ट करवा लेते हैं आपके, जिससे और क्लियर हो जायेगा कि परेशानी क्या है।।
  मुझे आपकी समस्या अल्ज़ाइमर्स नही लग रही है।
   ,क्योंकि इतनी कम उम्र में ऐसा संभव नही है। स्ट्रेस एक कारण हो सकता है
    मुझे लग रहा है आपकी किसी ऐसी नस का प्रभाव आपकी मेमरी पर पड़ रहा है जो शायद बुलेट लगने से दब गयी है। लेकिन ऐसा मेरा सोचना है ,आपको किसी स्पेशलिस्ट को दिखाना होगा। हमारे कॉलेज में हमारे एच ओ डी सर से आज ही बात करती हूँ, उनसे ही मीटिंग की कोशिश करती हूँ।”

  ” कब तक अपॉइंटमेंट मिल जाएगा?”

” अगर सर इंडिया में हुए तब तो कल की ही अपॉइंटमेंट मिल जाएगी।”

  पिया ने फ़ोन निकाला और उन दोनों से इजाज़त ले एक तरफ जाकर बात करने लगी…..

राजा समर को देखने लगा…

“समर तुम भी ना, एक दो बार बस ज़रा फोकस नही कर पाने के कारण मैं कुछ भूल बैठा और तुम सीधा डॉक्टर को पकड़ लाये, और वैसे इन डॉक्टरनी से तुम्हारी अच्छी खासी दोस्ती हो गयी है मंत्री जी। मेरे साथ साथ प्रेम के बारे में भी इन्हें पता है?”

  ” अरे नही हुकुम! वो तो पहले मैंने सोचा था आपसे घर पर ही मिलने आऊंगा उस वक्त इन्हें कहा था घर पर आपके अलावा प्रेम भी होगा और बस यही कहा था कि प्रेम मेरा बहुत करीबी दोस्त है, बस !!!

  ” हम्म और ये भी आपकी काफी करीबी लग रहीं है मंत्री जी!”

  समर राजा की बात पर हँसने लगा..” नही हुकुम ! ये मेरे लिए नही अपने खुद के लिए दिल्ली आई हैं। अपनी शादी के लिए लड़का देखने।”

  उन लोगों के बात करते में वो वापस चली आयी…

  “माफी चाहती हूँ राजा साहब! हमारे सर अमेरिका शिफ्ट हो गए हैं, लेकिन उन्होंने कुछ टेस्ट और कई चीजें मुझे बताई हैं। वो सब हम कल करवा लेंगे । और ज़रूरत पड़ी तो अमेरिका आपके लिए कौन सा दूर है?
   क्यों मंत्री जी? “

  समर ने हां में सर हिला दिया।  पिया के बात करते में उसने कुछ स्नैक्स और कॉफी मंगवा ली थी। स्नैक्स देखते ही पिया की आंखें फैल गयीं…

   समर ने हंसते हुए उसकी तरफ प्लेट बढ़ा दी….


**********


      चाहे सुख के पल हों या दुख की घड़ियां, वक्त अपने दिन रात के दोनो पहियों के साथ बराबरी से घूमता चला जाता है। ना उसे सुख में किसी के लिए रुकना है ना दुख में।

    समर और पिया ने राजा की सारी ज़रूरी जांचे करवा ली..
   बात कुछ परेशानी की थी और डॉक्टर के अनुसार राजा का इलाज जल्दी से जल्दी शुरू हो जाना चाहिए था।
    राजा के बहुत जोर देने पर समर ने इस बारे में बाँसुरी और प्रेम दोनो को ही कुछ भी नही बताया था।

         आदित्य की तबियत में काफी सुधार आ चुका था। वैसे भी उसकी दिनचर्या में कुछ खास था नही जो उसके स्वास्थ्य से बनता बिगड़ता।
  एक पुराने नौकर के अलावा उसके घर पर कोई नही था जो उसकी देखभाल करता, और इसलिए राजा का उसके लिए परेशान होना आदित्य को भी अंदर से परेशान कर गया था।
    अब वो ऑफिस में भी राजा पर पूरी नज़र रखने लगा था। राजा कब क्या करता है, कब ऑफिस आता है? कब जाता है? ऑफ़स के किस विभाग में सबसे ज्यादा समय बिताता है , अब राजा के हर कदम पर आदित्य की निगाहें  थी। हालांकि उसे अब तक राजा का परिचय नही मिला था बावजूद उसे राजा की ईमानदारी पर विश्वास नही हो पा रहा था।
   राजा पर खुद नज़र रखते हुए अदित्यप्रताप ने अपने लोगों से पिंकी पर भी नज़र रखवाना शुरू कर दिया था। नज़र रखवा कर धीरे धीरे उसने पिंकी का सारा रूटीन जान लिया था। उसे पता चल गया था कि हफ्ते के किस दिन किस वक्त पर पिंकी कहाँ जाया करती थी?
   कब वो अपने बेटे को लिए पार्क जाती? कब बेटे को घुमाने मॉल ले जाती? सारे आंकड़े उसके लड़कों ने उसे बता दिए थे।
       उसे लगने लगा था कि राजा अगर वही राजा है तो उसका असली परिचय पिंकी के घर पर ही मिल सकता है।
    उसे अपने दुश्मनों से बदला लेने का घर बैठे मौका मिल गया था।
  कहाँ तो वो बिज़नेस में राजा और उसके परिवार को टक्कर दे कर उन्हें नीचे दिखाना चाहता था, उनके पूरे खानदान को रास्ते पर लाना चाहता था, और कहाँ ये लोग अब खुद ब खुद मरने उसके पास चले आये थे।
    शुरू से ही उसका पूरा ध्यान राजा और उसके परिवार को व्यापार में चुनौती देकर पटखनी देने पर ही था, भले ही मामाजी ने उसका ध्यान बार बार राजा को मारने पर लगवाया हो लेकिन अंदर से वो ना तो पहले और न अब किसी भी तरह की मारकाट का पक्षधर था।
    मामा जी ने उसे ही तो बनारस भेजा था अपने गुर्गों के साथ।
   उसने उस वक्त काफी दूर से राजा अजातशत्रु को एक झलक देखा था , लंबाई चौड़ाई तो इसी राजा के समान थी, पर चेहरा उस वक्त ध्यान से देख नही पाया था, घनी दाढ़ी मूंछो और बालों ने चेहरे को लगभग ढक रखा था।
    कितनी नफरत थी उसे उस राजा अजातशत्रु से! लेकिन इतनी गहरी नफरत के बाद भी जब उसके बाजू में खड़े मामा जी के गुंडे ने राजा के सीने पर गोली चलानी चाही उसने पता नही क्यों उस गुंडे की बांह पर हल्की सी टक्कर मार उसका निशाना बिगाड़ दिया था और सीने पर लगने वाली गोली बांह को चीरती निकल गयी थी।
            वो आज तक भी अपने उस दिन के किये कार्य की कोई कैफियत नही पा पाता था कि आखिर अपनी ज़िंदगी के सबसे बड़े दुश्मन पर गोली चलते वो क्यों नही देख पाया था? जबकि इसी बात का तो वो कबसे इंतेज़ार कर रहा था।
   वो गुंडे तो तुरंत वहाँ से भाग गए थे, मामा जी से बिना कुछ बोले मामा जी के बताए रुपयों को दुगुना कर उन्हें देकर उसने वहाँ से भगा दिया था।
     लेकिन अब यहाँ इस राजा को देख वो बार बार कॉलेज के राजा अजातशत्रु से बनारस वाले अजातशत्रु से चेहरा मिलाने की नाकाम कोशिश में लगा रहता था।
            अगर ये वही था तो यहाँ क्यों हैं?
     पिंकी से तो उसे और भी ज्यादा नफरत थी। क्योंकि यही वो लड़की थी जिसकी माँ के कारण उसकी माँ को वो सम्मान नही मिला था जिसकी वो हकदार थी।
     अपनी बेपनाह नफरत के बाद भी आदित्य के मन में कभी खून खराबा करने की बात खुद नही आती थी लेकिन मामा जी के मन में उस पूरे परिवार को समूल नष्ट करने की बात ही थी, और आदित्य के धीमें शब्दों की मनाही को वो अपने तेज़ तर्रार उबलते शब्दों से अक्सर बहा जाते थे।
   आदित्य के मन में जो भी बात हो लेकिन इस बार उसने पिंकी से जुड़ी कोई बात मामा जी के कानों तक नही पहुंचाई थी।
    वो खुद अपने स्तर पर ये जंग लड़ना चाहता था। और इसलिए अब वो पिंकी से बदला लेने और उसे नुकसान पहुंचाने के तरीके सोचता हुआ कभी उसके पार्क के सामने तो कभी किसी और जगह अपनी गाड़ी में बैठा रहता।
    कई शामें तो वो अपनी गाड़ी में बैठे पिंकी के बच्चे को खेलते देख कर ही बिताने लगा था। पहले पहल उस बच्चे को किसी तरीके से तकलीफ पहुंचने से उसकी माँ को कितनी तकलीफ होगी यही सोचता आदित्य उसी बच्चे के खेलते हुए गिर पड़ने पर चौक कर उसे उठाने जाने को आगे बढ़ते अपने कदमों को जानबूझ कर रोक लेता।
     एक शाम पार्क में खेलते बेटे को पास बैठी पिंकी देख रही थी, उसके साथ ही उसकी सहायिका भी थी कि तभी रतन का फ़ोन आने से पिंकी एक ओर चली गयी।
   उसी समय सहायिका भी किसी से बातों में लग गयी और बच्चा बॉल लुढ़काते हुए एक तरफ की झाड़ियों की तरफ बढ़ता चला गया।
   आसपास बहुत से बच्चे खेल रहे थे ,इधर उधर भाग रहे थे, गिर रहे थे लेकिन आदित्य का पूरा ध्यान पिंकी के बेटे पर था,वो भागता हुआ उस तक चला आया..
   बच्चा कांटे वाली झाड़ियों में उलझता उसके पहले आदित्य ने उसे संभाल लिया और गोद में उठा लिया। इतनी देर में सहायिका के साथ साथ पिंकी भी वहाँ पहुंच गई….

  आदित्य का गुस्सा उसकी कनपटी पर हथौड़े चला रहा था…

  “” क्या बदतमीज़ी है ये, अगर अभी बच्चा कांटों में उलझ गया होता तो? अक्ल है या घास चरने गयी है? इसलिए रखा है काम पर की दूसरी औरतों से बैठ के बातों में लगी रहो।”

   पिंकी आदित्य का गुस्सा देख सन्न रह गयी, उसकी खुद की हालत खराब थी, गुस्से और झुंझलाहट में वो खुद भी कहाँ अपने ऊपर काबू कर पाती थी लेकिन वो कुछ कहती उसके पहले ही उसके मन के भावों को जैसे का तैसा आदित्य ने उतार दिया।

  सहायिका चुपचाप एक ओर सर झुकाये खड़ी थी। पिंकी ने आगे बढ़ कर आदित्य की गोद से बेटू को ले लिया…

” आप यहाँ कैसे ? “पिंकी के सवाल का आदित्य के पास कोई जवाब नही था…

  ” बस इधर से निकल रहा था कि पार्क में बच्चों को देख रुक गया, और तभी इस चिम्पू पर नज़र पड़ गयी, वैसे नाम क्या रखा है आपने? “

  ” जी हमने नही रखा इसके मामा जी ने इस छोटे नवाब का नाम रखा है आदित्य और हम सब इसे प्यार से आदि कहतें हैं।”

  आदित्य नाम सुन कर चौन्क गया,लेकिन पिंकी खुद में मगन आदि की बदमाशियों की पोटली खोल एक से बढ़ कर एक किस्से सुनाती रही। आदित्य को भी सुनना अच्छा लग रहा था, लेकिन वो पिंकी पर किसी तरह का तरस नही खाना चाहता था इसी से वो उससे विदा ले वहाँ से निकल गया।
   उसके मन की कोमल भावनाओ से वो स्वयं अपरिचित था। जो लड़की उसकी सबसे बड़ी दुश्मन थी उसी के बेटे को झाड़ियों से बचाने वो क्यों कूद पड़ा?
    जिस लड़की से बदला लेने के तरीके से सोचने चाहिए अब उसी की एक झलक देखने के बहाने वो क्यों खोजने लगा था।
     आदित्य अब किसी न किसी बहाने से पांच छै दिन में पिंकी के घर पहुंचने के तरीके सोचने लगा था, लेकिन कभी उसके दरवाज़े से तो कभी उसकी कॉलोनी के ही बाहर से वो वापस निकल जाया करता।
   एक शाम कॉलोनी के बाहर से ही लौट रहा था कि रतन ने उसे देख लिया और साथ लिए घर पहुंच गया।
   बहुत इसरार के साथ उसे रात के खाने पर रोकने के बाद दोनों पति पत्नि बैठे उससे इधर उधर की बातों में लगे थे कि किसी बात पर पिंकी अपना फैमिली एलबम उठा लायी।
    आदित्य धड़कते दिल से उस एलबम को देख रहा था और आखिर एक तस्वीर देख उसका दिल उसके मुहँ तक आ ही गया।
    तस्वीर में राजा अजातशत्रु सिंह अपने सफेद घोड़े पर बैठे थे….
   उस तस्वीर को देखते ही आदित्य राजा को पहचान गया। तस्वीर राजा के बाइसवें जन्मदिन की थी , और उस समय राजा बिना दाढ़ी के बिल्कुल वैसा ही लग रहा था जैसे अभी ऑफ़िस आया करता था।
      उस तस्वीर को देख और पिंकी का चहक चहक के सब कुछ दिखाना देख कर आदित्य को ये समझ आ गया था कि पिंकी उसे किसी तरह भी नही पहचानती लेकिन राजा आखिर क्यों उसके ऑफ़िस में जमा बैठा है और क्यों कदम कदम पर उसकी मदद कर रहा है ये आदित्य की समझ से परे था।
    कुछ देर इधर उधर की बात करने के बाद वो वहाँ से निकल गया, लेकिन आज स्ट्रेस से उसका बीपी बढ़ने की जगह उसके अंदर कुछ अलग ही एहसास जाग रहे थे।
  उस दिन के बाद से अब किसी न किसी बहाने आदित्य का पिंकी के घर आना जाना बढ़ने लगा था। ऑफ़िस में भी वो बराबर राजा पर नज़र रखने लगा था।
    किसी भी बड़े प्रोजेक्ट के बारे में वो राजा से ज़रूर चर्चा करता और राजा की सलाह पर अमल करने से होने वाले फायदे को देख देख कर खुद ही सोच में डूबा रहता कि आखिर राजा क्यों उसकी इतनी मदद कर रहा है।
    धीरे धीरे ही सही पर न चाहते हुए भी आदित्य का राजा के ऊपर के गुस्सा और नाराज़गी कम होने लगी थी….
    उसे अपने अंदर की नफरत को जिलाये रखने के लिए मामा जी की ज़रूरत महसूस होने लगी थी और वो कुछ दिनों की छुट्टी ले वहाँ से कहीं दूर चला गया था।

  *******

     समर वापस आने के बाद दुगुने जोश से अपने काम समेटने में लगा था, लेकिन रियासत की सारी बागडोर अकेले संभाल ले इतनी क्षमता उसमें भी नही थी।
  वो रियासत के व्यापार के भी सारे विधिक और मौद्रिक मामले देखा करता था। उसके हिस्से इतना सारा काम था कि बहुत बार रियासत से जुड़े मामलों में विराज को अब अपने दूसरे सहायक के साथ अकेले ही सब देखना सम्भालना पड़ रहा था।
इसी सब में एक के बाद एक विराज गलतियों पर गलतियां करता चला जा रहा था।
   पारिवारिक जीवन वैसे भी उसका अस्तव्यस्त था, दोस्त उसके बचे न थे। इसी सब में खुद से जूझते विराज को आखिर एक बड़ा झटका मिल ही गया।
  रियासत की जनता में राजा के जाने के बाद से असंतोष बढ़ता चला जा रहा था और आखिर इतने दिनों से रोक गया बांन्ध वेगवती नदी सा बांन्ध तोड़ आगे बढ़ अपने साथ साथ विराज को भी बहाता ले चला।

    सुबह सुबह कमरे पर आहट सुन विराज में दरवाज़ा खोला तो सहायक ने उसे तुरंत दीवानखाने में पहुंचने की सूचना दी और एक ओर खड़ा हो गया।

   आनन फानन में भागते दौड़ते विराज वहाँ पहुंचा , वहाँ पहले ही युवराज ,काका साहेब और समर बैठे किसी बात पर विचार विमर्श कर रहे थे।
   विराज को देखते ही सबके चेहरे पर चिंता की लकीरें चली आयीं।

  ” क्या हुआ आप सब इतने परेशान क्यों लग रहे हैं? युवराज भाई साहब क्या बात है? “

  ” रियासत में असंतोष इस हद तक फैल गया है कि अब लोग राजशाही के खिलाफ जाने लगे हैं। ज़रूर इन सब में कोई तो है जो गांव की भोली भाली जनता को बहला फुसला रहा है लेकिन अब जो भी हो अगर इनका ये आंदोलन उग्र हुआ तो हमारी रियासत और गद्दी को कोई नही बचा सकता।”

  युवराज की बात पर चिंतित से विराज ने समर की ओर देखा…

  ” जी हाँ राजा साहब! युवराज सा सही कह रहे हैं।रियासत की जनता अब सरकार के अधीन जाना चाहती है। और अगर हमारी रियासत की जनता खुद को सरकार के अधीन सौंप देती है तो आपके हमारे हाथ कुछ नही बचा रहेगा।”

  ” ऐसे कैसे? कोई गाजर मूली है जो सलाद की प्लेट में हमें सजाया जाएगा या नही ये जनता तय करेगी।”

  ” लोकतंत्र है हुज़ूर। जनता अपने वोटों से चुना हुआ प्रत्याशी लाती आ रही है। स्वतंत्रता के बाद से यही चलन चल रहा है। कुछ एक गिनी चुनी रियासतें ही तो बची हैं उसमें भी यही एक रियासात है जो अब भी सरकार के अधीन नही थी, और इसे बचाये रखने के लिए हम सभी चाहे वो युवराज सा हों या काका साहेब सभी ने आज तक एड़ी चोटी का जोर लगाए रखा था। सरकार को मोटी धनराशि के साथ ही रियासत की जनता का भी ख्याल रखा जाता था लेकिन अब लग रहा है कि सब कुछ हाथ से निकलता जा रहा है। “

  ” समर परेशानियां मत बताओ । हमें उपाय सुनना है।उपाय क्या है ये बताओ? “

  “उपाय तो एक ही है है राजा अजातशत्रु !” धीमे से गुनगुना कर समर आने मन कि बोल गया और उसकी बात को सुन कर भी अनसुना कर विराज वापस उसे देखने लगा …

  ” जवाब दोगे हमें, कि अब क्या किया जाए आखिर!”

  “जी शहर जा कर आपको एक बार कलेक्टर से मिल लेना चाहिए। कोई नई नियुक्ति है, अब ये नए नए लोगों को तो जानते ही हैं आप । इनके सर पर ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा का भूत सवार होता है। मुझे लगता है ये इस नए कलेक्टर का ही कारनामा है।

  ” कलेक्टर से हम मिलने जाएं? ये काम तो तुम भी कर सकते हो!”

  ” मैं तो अकेला राज्य भी चला सकता हूँ लेकिन चलाता तो नही  राजा साहेब। कुछ काम पद निर्धारित होतें हैं,मैं मिल सकता हूँ कलेक्टर से लेकिन जब एक राजा खुद मिलेगा तो उसका प्रभाव अलग ही पड़ेगा। अब आप कहेंगे कि कलेक्टर को यहाँ क्यों नही बुलवाया जा सकता ? “

” बिल्कुल ! हम यही पूछने वाले थे?”

  ” जी मैं समझ गया था। उन्हें। इसलिए नही बुलाया जा सकता क्योंकि हमारी राजशाही अपनी जगह है और कलेक्टर की अपनी जगह। देखा जाए तो संवैधानिक नज़रिए से आज जिलाधीश का पद एक राजा के बराबर ही है। आप फिर भी एक रियासत संभाल रहे उनके हाथ में पूरे जिले की बागडोर है। इसलिए हमारा उन तक जाना ही उचित है। आपके आने के पहले हम सब यही बात कर रहे थे। आप जल्दी से तैयार  हो जाएं तो हम कलेक्ट्रेट की तरफ निकल चलतें हैं, वहाँ पहुंचने में भी वक्त लगेगा।”

  ” समर तुम्हारे साथ काम करने में यही परेशानी होती है। तुम हमें मिलिट्री के कायदों से चलाने लगते हो। सुबह इतनी जल्दी उठवा कर काम में लगा देते हो कि सुबह जल्दी उठने के डर से रात में मन भर कर पी भी नही पातें है। हमारी पार्टिस और दोस्तों पर तो तुमने अपनी शनि की कुदृष्टि डाल ही दी है, जाने हमारे सारे दोस्त किस गहन कंदरा में छिपे बैठे हैं आजकल कोई नज़र ही नही आता।
   तुम्हारे साथ काम करो तो बस तुम हमें सारा दिन काम में खपाये रखते हो। खाने और खास कर पीने तक का वक्त नही देते हो।
  और तुम्हारे बिना काम करना और बड़ी मुसीबत है। कोशिश की तुम्हारे बिना सब संभालने की तो नौबत यहाँ तक चली आयी कि अब गद्दी और सिंहासन क्या महल भी गंवाना पड़ सकता है।
    क्या हो तुम समर ??”

समर मुस्कुरा कर नीचे देखने लगा…

” समय पर आप समझ चुके होते की मैं क्या हूँ तो शान्ति से गद्दी की दाहिनी ओर बैठे अपनी ऐशोआराम की ज़िंदगी का मज़ा ले रहे होते , लेकिन होशियारी तो आपको ही सूझी थी न राजा बनने की। अब भुगतिये। ”

  धीमे से अपने मन की बात कह समर वापस चुप खड़ा रह गया…

  ” जानतें हैं हम हमें मन भर जे गालियां देते हो और अपने हुकुम के कसीदे पढ़ते हो है ना?”

  ना के सर हिलाए समर विराज की ओर देखने लगा

  ” हुकुम के कसीदे ज़रूर पढ़ता हूँ लेकिन आपके लिए गालियां कभी नही निकाली। मैं बस सच्चाई को देखता और महसूस करता हूँ राजा साहेब। चलिए तैयार हो जाइए कभी पहुँचने में देर हो गयी तो कलेक्टर साहब किसी दौरे पर न निकल जाएं। फिर उतनी दूर जाना व्यर्थ हो जाएगा।”

  “आधे घंटे तो दोगे कम से कम। हम तैयार होकर आते हैं।”

” जी “!

   विराज अपने कमरे की ओर निकल गया और युवराज समर वापस अपनी चर्चाओं में लग गए।

क्रमशः


aparna ……


    
   
 

    





लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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