जीवनसाथी -93


    जीवनसाथी — 93



     विराज के तैयार होकर आते में समर ने सारे कागज़ वगैरह भी तैयार कर लिए।
    विराज समर और युवराज सा नए आये जिलाधीश से मिलने पहुंच गए…
   कलेक्टर ने जैसे ही सुना कि स्वयं राजा साहब मिलने आये हैं उसने तुरंत उन्हें अंदर बुलवा लिया…

    कलक्ट्रेट परिसर काफी बड़ा था, खूब सारे आम , बकुल नीम के पेड़ों से घिरे परिसर में एक लाइन से कई ऑफिस बने रखे थे।
    लंबा गलियारा पार करते विराज समर और युवराज अंदर बढ़ते चले गए।
   कलेक्टर साहब के कमरे के दरवाज़े के बाहर खड़े अर्दली ने एक बार फिर उन्हें हाथ बढ़ा कर रोक दिया, तब तक में उनके साथ बाहर से आ रहा अर्दली एक पर्ची उसके हाथ में रख गया।
   पर्ची देख उस ने उन सभी को नमस्कार कर दरवाज़ा खोल दिया….

      ऐसी जगहों पर आकर ही सही अर्थों में समझ आता है कि वाकई अब राजशाही का कोई अस्तित्व इन सरकारी महकमो में नही रह गया है। यहाँ पूर्ण लोकतंत्र ही नज़र आता है।
     सरकार सुचारू रूप से चलाने में सहायक चाणक्यों को भले भी कड़ी परीक्षाओं की अग्नि से जल कर निकलना पड़ता हो लेकिन सरकार चलाने वाले साफ तौर पर जनता के चुने प्रत्याशी ही थे। ऐसे में जब जनता अपना हक जानती है तो वो क्यों अब राजशाही झेलेगी , वो तो अपना चुना प्रत्याशी ही अपने सर पर बैठाना चाहेगी।

   समर के पीछे विराज और युवराज भी भीतर चले आये।
   सामने बैठा सजीला तरुण किसी भी कोने से इतने बड़े पद का अधिकारी नही लग रहा था। ज़ाहिर है अपनी मेहनत से छोटी उम्र में ही उसने इतना ऊंचा पद प्राप्त कर लिया था।
   कलेक्टर भी लगभग समर का ही हमउम्र लग रहा था…
   सामने टेबल पर नाम की तख्ती रखी थी, लिखा था..
              शेखर मिश्रा !!

  ” जी कहिये ?” उसने समर की ओर देख कर ही सवाल किया..
   समर ने विराज की ओर देखते हुए उसका और युवराज का परिचय दिया और बात आगे बढ़ा दी..

  ” जी ये हमारी रियासत विजयराघवगढ़ के राजा है राजा विराज सिंह और ये इनके बड़े भाई राजा युवराज सिंह!”

  युवराज का परिचय पाते ही शेखर के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान चली आयी। तो ये राजा के बड़े भाई साहब थे यानी बांसुरी के जेठ!!
   बाँसुरी से जुड़ी हर बात उसे मीठी लगती थी चाहे वो उसके ससुराल के लोग ही क्यों न हो!
    उसने युवराज के सामने हाथ जोड़ दिए …

  ” कहिये मैं आप लोगों की क्या सेवा कर सकता हूँ।”

  “कलेक्टर साहब , हमारी रियासत की जनता ने हमें त्रस्त कर रखा है। हम पूरी कोशिश करतें हैं उनकी हर समस्या को सुलझाते चलें लेकिन ये लोग हमेशा और एक नई समस्या लिए सामने खड़े हो जातें हैं। अबकी बार तो सब ने मिल कर हंगामा ही कर दिया है।”

  विराज की बात पर शेखर ने दराज़ से एक चिट्ठी निकाली और सामने रख दी …

” जी राजा साहब , मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूँ। ये चिट्ठी आपकी रियासत की ही जनता द्वारा भेजी गई है। गज़ब का असंतोष नज़र आ रहा है लोगों में। वो लोग किसी हाल में आपको राजा मानने को तैयार नही हैं। उनका कहना है कि अब सरकार ही पूरी तरह से आपकी रियासत को अपने अधीन ले ले, और आप जानते ही होंगे कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कोई रियासत सरकार के बिना नही चल रही।
   हालांकि आपकी रियासत भी सरकार के अधीन ही थी लेकिन आपसे पहले आपके दादा फिर आपके पिता और आपके भाई ने जिस ढंग से शासन चलाया उसमें सरकार और जनता किसी को आपत्ति नही थी लेकिन अब जनता आप पर अपना विश्वास खो बैठी है।
   देखिए शुरू से ही सिर्फ इसी एक शर्त पर आपकी रियासत का सम्पूर्ण संविलयन नही किया गया था, कि आप लोग जनता के चहेते थे।
    इसी शर्त पर आपको शासन की अनुमति प्राप्त थी लेकिन अब जब जनता खुद ऐसा नही चाहती तो मैं कुछ नही कर सकता।
   मैं खुद सरकार का आदमी हूँ, और प्रशासन जो चाहेगा मुझे वही निर्णय लेना होगा। मैं अकेला जाकर कुछ नही कर सकता।
    मेरे भी हाथ बंधे हैं आप समझ सकते हैं।”

  विराज अंदर से फूटने को तैयार था लेकिन उसे वहाँ आने से पहले ही समर और युवराज ने पूरे रास्ते यही समझाया था कि कलेक्टर कुछ भी कहे हमें चुप रह कर ही सुनना होगा।
    विराज ने लाचारगी से समर की ओर देखा जो शांति से बैठा शेखर की बात सुन रहा था …

  ” कुछ ले देकर अगर मामला निपटा सकें तो? “

  विराज के सवाल पर शेखर ज़ोर से हँस पड़ा …

  ” कितना देंगे राजा साहब ?”

  शेखर के सवाल पर विराज ने मुस्कुरा कर समर की ओर देखा , उसे लगा उसने बड़ी आसानी से बाज़ी जीत ली…
   समर मुस्कुरा कर रह गया…

  ” आप अपना भाव तो बताइए कलेक्टर साहब, हम पूरा का पूरा खरीद लेंगे आपको। आपकी ज़िंदगी भर की कमाई का चार गुना आपको मिल जाएगा। बीवी बच्चे सब खुश हो जाएंगे। ”

” राजा साहब मैं बड़ा महंगा पडूंगा आपको, और ये सौदा भी खरा नही निकलेगा।
   रही बात बीवी बच्चों की तो इस जन्म तो मुश्किल ही है।

  विराज शेखर की बात समझे बिना ही उससे भाव ताव करने में लगा था…

  ” कितने महंगे पड़ेंगे बताइये तो सही? “

  अब तक चुप बैठे युवराज ने आखिर विराज को हल्की सी झिड़की दे ही दी..

” विराज बिना सोचे समझे आप ज्यादा न बोलें , और शान्ति से बैठ कर वो क्या कहना चाहतें है समझिए। ”

  युवराज ने लगभग विराज के कान में ही कहा था क्योंकि किसी के भी सामने राजा की बात काटना उनके नियमों में नही था। लेकिन तब भी बात शेखर के कानों तक पहुंच ही गयी थी।

  ” ये आपके बड़े भाई साहब है ना? इनकी बातें सुनिए और मानये वही अच्छा रहेगा। दूसरी बात मैंने यहाँ जॉइन करते ही साथ अपने कक्ष के साथ सारे परिसर में कैमेरा लगवा लिया था जिससे मुझे रिश्वत ऑफर करने वाला पहली ही बार में पकड़ा जाए , लेकिन आप खुद राजा हैं इसलिए आपके साथ पहली बार में रियायत बरती जायेगी वरना रिश्वत देने वालों की तो खैर नही है यहाँ..

  विराज आश्चर्य से आंखें फाड़े इधर उधर देखने लगा…

  ” मत ढूँढिये आपको कैमेरा नज़र नही आएगा। तो आइए हम बात आगे बढ़ातें हैं।
   मैं साफ शब्दों में आपको बताता हूँ, आपसे पहले आपकी जनता आकर मुझस मिल चुकी है। मानना पड़ेगा आपको राजा साहेब गज़ब का असंतोष है आपकी जनता में।
   अब अगर आप अपनी राजगद्दी बचाना चाहतें हैं तो आपके पास बस दो ही उपाय हैं ……
   अब या तो राजा बने रहिए और जनता की अप्रसन्नता झेलते रहिए पर इसमें ये होगा कि जिस दिन जनता एकदम ही दुखी हो गयी आपकी सत्ता पलट देगी । अब उस स्थिति में आपको जनता की बात माननी पड़ेगी, जैसे अगर वो आपको राजगद्दी से हटा कर किसी और को बैठाना चाहें तो आपको उनकी बात मंज़ूर करनी पड़ेगी वरना जनता बगावत पर उतर आएगी…
   या फिर आप एक काम और कर सकतें हैं, कि आप इस बार चुनाव लड़ लीजिये। इससे ये होगा कि आप प्रत्यक्ष रूप से सरकार का हिस्सा बन जाएंगे तब ऐसे में जनता अगर अविश्वास प्रस्ताव लाती भी है तो भी सरकार आपकी तरफ से  कम से कम सोचेगी ज़रूर क्योंकि जब तक विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव नही लाता आपका कोई कुछ नही बिगाड़ पायेगा।
   आशा करता हूँ आप मेरी बात समझ गए होंगे। ”

  विराज ने बड़ी लाचारगी से समर की ओर देखा …

  शेखर अपने सामने फैली पड़ी फाइल्स एक तरफ करने लगा…

” आप लोगों के लिए कुछ मंगवाऊ ? चाय या कॉफी? “

  विराज ने एक भर नज़र शेखर को देखा और उठ गया..

  ” हम सोच कर आपको जवाब देंगे। ”

  विराज की बात पर शेखर मुस्कुरा कर रह गया..

  ” जी बिल्कुल! आराम से सोच लीजिये। मैं भी अभी तुरंत आप पर कोई कार्यवाही नही करने या रहा। आपकी शिकायत वैसे भी जनता ने मौखिक ही कि है। और जब तक मेरे पास लिखित में कुछ नही आ जाता मुझे कोई हड़बड़ी नही है।
पर कहूंगा यही की अपनी जनता को समझाने की कोशिश कीजिये क्योंकि अगर किसी ने आपके खिलाफ कुछ भी लिखा पढ़ी कर दी तब मैं आपको किसी हाल में नही बचा पाऊंगा। ”

  विराज अपनी जगह से उठ कर बाहर निकल गया, उसके बाहर जाते ही समर और युवराज भी उठ गए। युवराज के खड़े होते ही शेखर भी अपनी जगह पर खड़ा हो गया।
   उसने एक बार फिर युवराज के सामने हाथ जोड़ दिए।
  समर एक बार पहले भी दून वाले महल में राजा के जन्मदिन के मौके पर शेखर से मिल चुका था, और उसके बाद से ही दोनो में कभी कभी बात चीत हो जाया करती थी, लेकिन आज शेखर का युवराज सा को सम्मान देना समर की भी समझ से बाहर था।
   शेखर से हाथ मिला कर वो भी युवराज के पीछे वहाँ से बाहर निकल गया।


   बाहर गाड़ी में बैठा विराज अब भी गुस्से में था…

  ” ये दो कौड़ी का कलेक्टर समझता क्या है खुद को?”

” कलेक्टर समझता है राजा साहब और देखा जाए तो प्रैक्टिकली उनकी बातें सहीं भी हैं। चलिए आराम से ऑफिस में बैठ कर बात करतें हैं। ”

  समर के कहने पर ड्राइवर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी।

********


      आदित्य कुछ दिन तक तो शांति की तलाश में उधर उधर भटकता रहा और फिर आखिर मामा जी के पास पहुंच ही गया।
    मामा ने पूरी गर्मजोशी से उसका स्वागत किया, केसर को भी वहीं हवेली में देख आदित्य चौन्क गया। केसर ने अपने काम का हवाला दे कर उसे एक सटीक सा कारण दे दिया।
   आदित्य वैसे भी मामा जी के मामलों में ज्यादा बोलता नही था।
   केसर को वो कॉलेज के समय से जानता ज़रूर था लेकिन उससे भी उसकी कोई बहुत ज्यादा दोस्ती नही थी।
  वो वैसे भी जिस स्वभाव का था लड़को से ही ज्यादा नही बोला करता था तो लड़कियां तो फिर दूर की बात थी। मिमिक्री करने के अलावा उसका मुहँ कम ही खुला करता।
       मामा जी ने उसे देखते ही गले से लगा लिया..

  ” ऐसे अचानक आदित्य ? आने से पहले बताया भी नही। हमारे आदमी तुम्हें लेने चले आते ? “

“, बस मामा जी। आप सब की याद आ रही थी तो चला आया। पहले से कोई प्लान था नही इसलिए बिना बताए ही चला आया।

    ” सफर की थकान होगी तुम ऐसा करो आराम करो , हम ज़रा अपने काम से बाहर जा रहें हैं। जल्दी ही आकर मिलतें हैं।”

  ” जी हम भी ठीक हैं, आपके साथ ही चलतें हैं।”

   आदित्य भी मामा के साथ निकल गया। ठाकुर साहब का पहले ही किसी से मिलने का कार्यक्रम तय था,अपने लाव लश्कर के साथ वो निकल गए। एक के पीछे एक लगभग नौ दस गाड़ियां लाल टिब्बा के लिए निकल गईं।
     वहाँ ठाकुर साहब ने पहले ही किसी को मिलने बुला रखा था।
      किसी ज़मीन की सौदेबाज़ी की बात होनी थी।
वहाँ पहुंचते ही सामने बैठा व्यक्ति ठाकुर साहब की लंबी चौड़ी सेना देख पहले ही घबरा गया लेकिन चेहरे पर ऐसे कोई भाव दिखाए बिना वो शांति से बैठा रहा।
   ठाकुर साहब ने उसके सामने की कुर्सी खींची और बैठते हुए उसके सामने सारे कागज़ फैला दिए।

  ” लीजिये नेगी जी ! आपको तकलीफ न हो इसलिए हम सारे कागज़ तैयार कर लाये। बस अब आप आराम से इनमें साइन कीजिये और छुट्टी कीजिये। “

” ठाकुर साहब आपको सौ बार बता चुका हूँ कि मैं उस जमीन को किसी कीमत पर बेचना नही चाहता।”

” हमने आपकी इच्छा अनिच्छा तो पूछी ही नही। अरे पूछना चाहिए था क्या? देखिए नेगी जी , आपकी ज़रा सी ज़मीन से  लगी हमारी ज़मीन पर हमारा काम चल रहा है। अब हमारे लंबे चौड़े काम के बगल में आपकी ज़मीन की कोई पूछ परख तो होगी नही इससे अच्छा है हमसे कुछ पैसे लेकर उसे हमारे नाम कर दो वरना ..”

“वरना क्या ठाकुर साहब ?”

” वरना कल किसने देखा है ? ना आपने न हमने। हो सकता है यहाँ से लौटते वक्त आपकी गाड़ी किसी दुर्घटना का शिकार हो जाये और आप अपनी ज़मीन देखने के लिए बचें ही नही ..

  ” ये क्या बात हुई ठाकुर साहब, ये तो ऐसा हुआ जैसे आप हमें धमकी दे रहें हैं? “

” जी बिल्कुल सही समझे आप , हम आपको धमकी ही दे रहें हैं!”

” और अगर हम आपकी बात मानने से इनकार कर दें तो? “

” तो क्या क्या हो सकता है ये आप सोच भी नही सकते।”

  मुस्कुराते हुए ठाकुर साहब ने अपनी छोटी सी गन निकाल कर सामने टेबल पर रख दी।
   आदित्य के लिए ये सब पहले बहुत सामान्य सी बातें थी, उसका इन धमकियों से आये दिन सामना होता था,  लेकिन अभी कुछ महीनों से राजा अजातशत्रु की संगत में उसका भी काम करने का तरीका बदलने लगा था।
     उसे कुछ दिन पहले की अपनी एक डील याद आ गयी।
   उस डील के लिए वो अजातशत्रु के साथ ही गया था, कुछ इसी तरह की परिस्थितियां वहाँ भी निर्मित हो गईं थी…..
    उसकी मॉल बनाने वाली ज़मीन से लगी हुई लगभग दो एकड़ की ज़मीन सिंघानिया की थी और वो किसी हाल में वो ज़मीन देने को तैयार न था और उस वक्त अजातशत्रु ने कितनी आसानी से सब कुछ हल कर दिया था…

” देखिए सिंघानिया साहब , आपकी ये ज़मीन सिर्फ दो एकड़ की है। एक तरफ से ये आदित्य प्रताप फर्म की ज़मीन से घिरी है तो दूसरी तरफ सरकारी जमीन से, अब ऐसे में आप एक व्यापारी के दिमाग से सोच कर देखिए कि आप इस जमीन के टुकड़े को कैसे उपयोग में ला पाएंगे।
   आज आप इस टुकड़े को हमें बेचने को तैयार नही हैं लेकिन कल जब यहाँ इनका मॉल बन जायेगा तब हर तरह की दुकानें , शॉपिंग सेंटर रेस्तरां सब कुछ मॉल में उपलब्ध होगा उस वक्त आप इस मॉल के सामने क्या और कैसे खड़े कर पाएंगे।
   आज तो आपको फिर भी काफी अच्छे दामों में डील मिल रही हैं क्योंकि अब तक मॉल का काम शुरू नही हुआ इसलिए इन्हें भी लग रहा कि आपकी और इनकी ज़मीन पर एक साथ मिल कर काम करने पर काफी अच्छे तरीके से काम हो जाएगा ।
   इनका तो कम लेकिन इस जमीन के टुकड़े को बेचने पर आपका ही फायदा अधिक है।
  विश्वास कीजिये बाद में ये ज़मीन आपके किसी काम की नही रह जायेगी और तब उतना दाम भी नही मिलेगा जितना अभी मिल रहा।
   एक काम और हो सकता है वो ये की आप ये सारी ज़मीन खरीद लें और आप ही इस सारी ज़मीन का सदुपयोग कर लें। ”
   उस आखिरी बात को सुनते ही आदित्य एक पल को सकपका कर अजातशत्रु की तरफ देखने लगा था कि ये सरफिरा क्या बोल गया? कहीं उस सिंघानिया के बच्चे ने वाकई उसकी जमीन भी मांग ली तो? लेकिन राजा भी कोई कच्चा खिलाड़ी तो था नही…. कुछ समय सोचने के लिए मांगने के बाद आखिर तीसरे ही दिन सिंघानिया ने उस जमीन को आदित्य की फर्म के नाम बेच दिया था।
   बिना किसी हल्ले गुल्ले और शोर शराबे के अजातशत्रु ने कैसे उसका काम आसान कर दिया था। और एक यही काम क्या, जाने कितनी सारी डील्स उसने उसके पक्ष में करवा दी थीं वो भी पूरी ईमानदारी से।
     उसके साथ इतने दिनों से काम करते हुए आदित्य को भी तो उसका काम करने का तरीका ही पसन्द आने लगा था। जब ईमानदारी और सच्चाई के साथ भी व्यापार किया जा सकता था तो आख़िर मामा जी के तरीके अपनाने की क्या ज़रूरत ?

  लेकिन अभी मामा जी को इस बारे में टोकना सही नही होगा यही सोच वो चुप रहा।
    इतनी देर से मामा जी के साथ रहते हुए भी उसका मन अजातशत्रु और पिंकी के बारे में बताने का नही हुआ और वो चुप ही रह गया।
   ठाकुर साहब उस आदमी को थोड़ा और डराते धमकाते कि आदित्य ने उन्हें यह कह के रोक दिया कि सामने वाले को कम से कम दो दिन का वक्त दे दीजिए। हो सकता है अकेले में सोचने के बाद उसे भी लगे कि उसे ज़मीन का सौदा कर लेना चाहिए। आश्चर्य से अपने भांजे को देखते मामा जी ने गन उठाकर वापस रख ली।
    ना ठाकुर साहब को ही समझ आ पा रहा था और न आदित्य को कि उसने क्यों इतनी रहमदिली दिखाई।
खैर कुछ और चीखा चिल्ली मचा कर ठाकुर साहब वहाँ से निकल गए।

    हवेली पहुंचने के बाद खुद में खोया सा आदित्य अपने कमरे में चला गया।

    अपने कमरे में बैठा आदित्य सही और गलत में फर्क नही कर पा रहा था। आखिर जब वो बच्चा था और जब उसे सहारे की ज़रूरत थी तब कहाँ था अजातशत्रु का परिवार। कायदे से तो वो उसी का अपना परिवार था और उन लोगों को उसे अपनाना चाहिए था फिर भी उन लोगों ने उसे खुद से दूर कर दिया, उसे दूध की मक्खी सा अपने जीवन से निकाल फेंका, उस समय यही मामा जी तो थे जिन्होंने उसे पाला पोसा और इस लायक बनाया।
     और आज जब वो खुद सोचने समझने के लायक हुआ तब आ गया अजातशत्रु , उसकी थोड़ी सी सहायता कर उसपर अपना रंग चढ़ाने। क्या इतनी आसानी से वो मामा जी के एहसान भूल कर इस परिवार की ओर चला जायेगा?
   नही कभी नही।
आदित्य उसी समय उठा और मामा जी के कमरे की ओर बढ़ चला। गुस्से में उसका पारा उबल रहा था, कनपटी पर जैसे कोई हथौड़े चला रहा हो।
   आधी रात का वक्त हो चला था लेकिन अपने जुनून में जैसे उसे समय का होश ही नही था।
    तेज़ कदमों से अदित्यप्रताप मामा जी की स्टडी की ओर बढ़ने लगा था। उसे पता था मामा जी रात बारह साढ़े बारह तक वहीं हुआ करते थे।
   हवेली का कोना कोना उसका परिचित था। मामी जी इस वक्त शहर से बाहर अपनी बहन के घर गयी हुई थीं इसलिए भी मामा जी का स्टडी में होना पक्का था।

कमरे का दरवाजा बाहर से उड़का हुआ था, हल्के से दरवाज़े को अंदर की ओर धकेल आदित्य भीतर घुस गया।
   बड़े से हॉल के एक तरफ ढेर सारी बड़ी बड़ी आलमारियों में वकालत की मोटी मोटी किताबें सजी थी वहीं दूसरी ओर शीशम की लकड़ी का बड़ा सा सेलर सजा था।
   ठीक बीच में एक कमरा था जो मामा जी का ऑफ़िस कम आरामगाह भी था।
  उस कमरे के दरवाज़े पर पहुंचते ही उसे अंदर से किसी की आवाज़ें आनी लगी।
   वो एकाएक अंदर जाने की जगह वहीं थम कर खड़ा रह गया। नशे में लड़खड़ाती ज़बान से मामा जी किसी से बातों में लगे थे…

  “तुमने अपना काम तो पूरा किया नही ,फिर किस बात के पैसे केसर ? “

  ठाकुर साहब की बातें केसर से हो रहीं थीं… केसर ने कोई जवाब दिया लेकिन वो बाहर खड़े आदित्य को सुनाई नही पड़ा, वो दरवाज़े के और करीब चला आया।
   दरवाज़े से कान लगाए वो आगे सुनने की कोशिश करने लगा कि मामा जी किसी बात पर ज़रा ज़ोर से केसर पर बरस पड़े। और उनके बरसते ही केसर भी उतनी ही तेज़ आवाज़ में गरजने लगी और बाहर खड़े आदित्य को उन दोनों की बातें साफ साफ सुनाई पड़ने लगी….

“तो हम क्या करते ठाकुर साहब ! महल में घुस कर अजातशत्रु को मारा नही जा सकता था? “

  “हमने  तुरंत मारने कहा भी कब था लेकिन जो जो काम किया तुमने सब सत्यानाश कर दिया। जो दवा अजातशत्रु को पिलाने दी थी वो तुम उसकी बीवी को क्यों देने लगी? “

  ” आपसे किस ने कहा कि हमने अजातशत्रु की दवा उसकी बीवी को दी थी? उसकी बीवी के लिए तो हम अलग ही दवा लेकर आये थे और अजातशत्रु की दवा उसे अभी भी दी जा रही है। ”

  ” झूठ पर झूठ बोलती हो केसर? जब अजातशत्रु महल में है ही नही तो उसे दवाएं कैसे दे रही हो? और उसकी बीवी को दवा देने का क्या मामला है? “

” वो सब हम बताएंगे पहले आप ये बताइये की हमसे आदित्य वाली कहानी समर को सुनाने आपने क्यों बोला था? वो भी झूठी कहानी? हमें आज तक लगता था कि आप बस अजातशत्रु को मारना चाहतें हैं लेकिन अब लगता है आपका इरादा इससे भी कहीं अधिक खतरनाक है! आखिर क्या चाहतें हैं आप? “

” हाँ इरादे तो खतरनाक ही हैं हमारे। और सिर्फ अजातशत्रु ही नही उस पूरे परिवार को खत्म करना है हमें।
    हमारे दिल में जो ये आग लगी है आज की नही है। अजातशत्रु के पिता शुरू से ही अति महत्वाकांक्षी थे। उसने अपने सामने कभी किसी को कुछ समझा ही नही। हर जगह अपने अभिमान से हमारा सर झुकाते ही रहे।
    जब हम सभी की रियासत का संविलयन होता जा रहा था उनके पिता ने गहरी चाल चल अपनी बातों में उलझा कर अंग्रेजों से अपनी रियासत बचा ली। उसके बाद जब हम और वो शासन में आये तब हमने उसकी तरफ बहुत बार मैत्री प्रस्ताव रखा पर उसने हमेशा एक दूरी बनाए रखी।
      जब कभी हम दो चार दोस्त साथ बैठा करते वो अक्सर ही हमारी रियासत का, हमारा मज़ाक बनाये रखता।
   धीरे धीरे हमें उसके स्वभाव के कारण उससे चिढ़ होने लगी। उसी समय हमारी बहन और उसके भाई के सम्बन्धों के बारे में हमें पता चला,हमने सोचा अब इसे हराया जा सकता है। अगर हमारी बहन उनके महल पहुंच जाती तो किसी भी तरह से हम उसे गद्दी पर से हटवा कर उसके भाई को गद्दी पर बैठा देते और फिर उस रियासत पर हमारी बहन का राज़ होता, और फिर धीरे से हम उस रियासत को अपनी रियासत में मिला लेते।
   लेकिन यहाँ भी बाज़ी उल्टी पड़ गयी। उसका डरपोक भाई हमारी बहन का साथ नही दे पाया और उसे अकेला छोड़ गया वो भी ऐसी हालत में कि उसके पास मरने के अलावा कोई चारा नही बचा। फिर भी हमारी बहन सख्त जान थी, उसने मरना नही चुना बल्कि अपने बच्चे को जन्म देकर अकेले ही उसे पालने पोसने का निर्णय लिया।
   उस वक्त भी हमने बहुत कोशिश करी कि वो कलंकिनी ज़िंदा न बचे लेकिन कहतें हैं ना जिसे भगवान बचाना चाहतें है उसे फिर कोई नही मार सकता बस वैसे ही कुछ उसके और उसके होने वाले बच्चे के साथ हुआ।
   उसे हर दो महीने में गर्भपात की हेवी डोज़ दवाएं देने के बाद भी उसके बच्चे पर कोई असर नही हुआ और नौ माह पूरे कर वो बच्चा पैदा हो गया।
   लेकिन उन दवाओं का असर था कि बच्चे को जन्म देने के बाद वो मर गयी।
    पर सोचो स्वाभिमानी ऐसी थी कि अपनी अवस्था का पता चलते ही वो हमारी हवेली भी छोड़ गई थी। पढ़ी लिखी होशियार थी ही , सिर्फ नौ महीनों में उसने अपना काम भी जमा लिया था, कभी कभार आदित्य का पिता भी उससे मिलने आया करता था  इसलिए तो उसे अपनी पूरी गर्भावस्था में हम लोगो की कोई ज़रूरत नही पड़ी। तब तक हमारी माँ साहेब भी जीवित नही थी वरना बेटी के प्यार में वो ज़रूर उनके पास चली जाती, लेकिन उन्हें दवाएं देते रहने के लिए हमारी पत्नी ने उनके साथ हवेली की एक पुरानी नौकरानी को भेज दिया था।
    आदित्य का पिता मानसिक रूप से इतना कमजोर था कि उसकी अपने बड़े भाई से बात करने की हिम्मत ही नही थी और  उसने ये सोच रखा था कि बच्चे के पैदा होते ही बच्चे के साथ ही सुमनलता को भी लेकर महल चला जायेगा। बच्चे का मुहँ देख फिर शायद उसके बड़े भाई की उसे नकारने की हिम्मत नही होगी।
    लेकिन उसी समय किसी काम से आदित्य के पिता को इंडिया से बाहर जाना पड़ा, वो आदित्य की माँ से जल्दी लौटने का वादा कर गया था लेकिन उसके वापस आने के पहले ही आदित्य पैदा हो गया और उसकी माँ चल बसी।
     हवेली की नौकरानी ने जैसे ही आदित्य के जन्म और उसकी माँ के मरने की खबर हमें दी हमने उसे तुरंत ही बच्चे को भी मार कर कहीं फेंक आने को कहा लेकिन इतने दिनों में शायद हमारी बहन के साथ रहते हुए उसे उन लोगों से सहानुभूति हो गयी थी या शायद उसी की दी हुई गलत दवाओं से हुई सुमनलता की मौत का पश्चाताप था कि उसने उस नवजात को मारा नही और हमारी हवेली में ले आयी। यहाँ हमारे पिता उस वक्त जीवित थे उन्हें बच्चे ने मोह लिया और उन्होंने उसे मारने से इनकार कर दिया। अब हमारे पास कोई और चारा नही बचा था।
   उसके कुछ दिनों बाद आदित्य का बाप हमारे पिता के पास चला आया,वो अपने बच्चे को लेकर जाना चाहता था। उसके अनुसार उसके बच्चे का मुहँ देख उसके बड़े भाई उसे माफ कर देंगे लेकिन तब तक हमारे दिमाग मे। एक योजना तैयार हो चुकी थी।
   हमें अब उस नन्हे से बच्चे में अपना चमकता भविष्य नज़र आने लगा था। और तभी हमने ठान लिया कि इस बच्चे के मन में उस महल और महलवासियों के लिए जितना हो सके ज़हर भरना ही है।
    हमारे पिता हालांकि इस काम में हमारी मदद नही किया करते थे ,वो उसे बैठा कर उसकी रियासत के गुणगान सुनाया करते लेकिन उनकी पाठशाला ज्यादा समय तक चली नही जल्दी ही उनका देहांत हो गया एक बार फिर वो बच्चा अनाथ हो गया।
    

  “लेकिन ठाकुर साहब आपने इतना सब किया क्यों?”

  ” अरे इतनी आसान सी बात समझ नही आई आपको। हमने आदित्य को शुरू से अजातशत्रु के खिलाफ खड़ा करने की ट्रेनिंग दी, उसके मन में उस महल के लिए इतना ज़हर बो दिया किवो अजातशत्रु के खून का प्यासा हो गया। उसे अपने पिता के साथ साथ अपने बड़े पिता यानी युवराज और अजातशत्रु के पिता से भी हद दर्जे की नफरत हो गयी, क्योंकि उसके प्रति उसके पिता की कोमल भावनाएं हमने उसे कभी पता ही नही चलने दी।
     अब इसका ये फायदा होगा कि आदित्य अपनी नफरत में खुद ब खुद अजातशत्रु को मार देगा, उसे मारने के बाद युवराज को और उसके परिवार को रास्ते से हटाना उतना मुश्किल न था।
     लेकिन इस सब में कहीं आदित्य के बारे में  उसके पिता को पता चल जाता तो आदित्य गद्दी का अगला उत्तराधिकारी हो जाता क्योंकि आखिर उसके पिता ने उसकी माँ से शादी तो की ही थी इस लिहाज से वो उनकी पहली पत्नी थी।
  इसलिए तुम्हारे ज़रिए अजातशत्रु के उस चालाक मंत्री को उलझाने की कोशिश की, और तुमसे आदित्य के बारे में झूठी कहानी उसे सुनाई जिससे आदित्य का सच जानकर अजातशत्रु भी उसके खिलाफ हो जाये।
   और इस तरह ये सारे भाई आपस में एक दूसरे को मार गिराए और उस गद्दी में बैठने के लिए कोई नही बचे।

” और आपकी बेटी का पति गद्दी पर बैठ जाये।”

  ” गद्दी पर तो विराज सा ही बैठे हैं फिलहाल। और हम यही चाहते थे। जानते है कि उनमें दम नही है कि पूरी रियासत को संभाल सकें। एक तो वो वैसे ही कमज़ोर सिपाही दूसरा अजातशत्रु के बाद गद्दी पर बैठे इसलिए जनता में असंतोष तो होना ही है।
  अब बस हमें इस बात का फायदा उठाना है और उनकी रियासत को अपनी रियासत में मिलाना है।
रेखा की शादी उस निकम्मे विराज से करवाने का यही कारण तो था। हमें पता था कि या तो अजातशत्रु को आदित्य मार देगा जिसके बाद विराज गद्दी पर बैठ सकेगा या फिर विराज अपनी माँ का इतना दिमाग खराब कर देगा कि वो अजातशत्रु से बात कर विराज को गद्दी दिलवा देगी।
   

  “आपकी चाल तो आसान हो गयी क्योंकि अजातशत्रु खुद गद्दी छोड़ कर कहीं चला गया। हमें तो लगता है अपनी बीवी को साथ लिए कहीं दूर चला गया होगा। ”

  ” हाँ उसे वैसे भी राजपाट को कोई रुचि नही थी वो तो उसकी काबिलियत के कारण उसके पिता उसे ही राजगद्दी देना चाहते थे इसी कारण एक बार को हमें रेखा का रिश्ता उसके लिए भेजना पड़ा लेकिन उस लड़की के चक्कर में एक बार फिर उसने हमारा अपमान कर दिया।
   खैर देर से ही सही अब हमारा काम आसान हो गया है। विराज की हालत किसी से छिपी तो है नही। तुम वहाँ रह कर वहाँ की सारी खबरें दे ही रहीं थी। तो अब बस वक्त आ गया है कि इस सारे नाटक को खत्म कर दिया जाए।”

” वो कैसे ?”

  ” अजातशत्रु खुद हमारे रास्ते से हट गया है। अब विराज जब कहीं ठौर नही पायेगा तब हमारे ही पास तो आएगा।”

” और आदित्य ?”

“उसके अंदर तो हमने वैसे भी खूब ज़हर भर रखा है,बवाल है वो। अभी उसके नाम से अजातशत्रु को और भड़का के उन दोनों को आपस में भिड़ा कर दोनो को ही मरवाना है । बस उसके बाद हम अकेले बादशाह रह जाएंगे।”

   बाहर खड़ा आदित्य मामा जी और केसर की बातें सुन कर अपनी जगह पर खड़े खड़े ही बुत बन गया था। उसे समझ नही आ रहा था कि आज तक मामा जी का जो रूप उसके सामने था वो सहीं था या ये रूप असली था,जिसमें उसमें उनके मन की इतनी सारी सच्चाई जान ली थी।
    उसे लग रहा था जैसे किसी अदृश्य ताकत ने उसकी सारी शक्ति सोख ली थी। फिर भी अपनी सारी बची ताकत समेट कर भारी तन और मन से अपने कमरे की ओर बढ़ गया।
   हालांकि अब न वो कमरा और न ये हवेली उसे अपनी लग रही थी।
   उसने सोच लिया था कि अगली सुबह ही वो वहाँ से निकल जायेगा हालांकि जाएगा कहाँ ये अभी तक सोच नही पाया था।

  *****


  अगली सुबह उसके कमरे के दरवाज़े के बाहर से उसे कोई तेज़ी से आवाज़दे रहा था।
  आदित्य ने लपक कर दरवाज़ा खोल दिया ,सामने मामा जी का खास सहायक खड़ा था…

  ” जी आपको साहेब ने तुरंत अपने ऑफिस में बुलाया है।”

  मन तो नही था लेकिन अभी इस वक्त आदित्य मामा जी से कुछ कहना भी नही चाहता था। हाथ मुहँ धो कर वो मामा जी के ऑफिस की ओर बढ़ चला…

  ” जी आपने बुलाया? “

” आओ आदित्य ! ये देखो ये क्या आया है? “

   आदित्य ने सामने टेबल पर पड़े पर्चे को उठा लिया, और उसे पढ़ने लगा….
  कलेक्टर का नोटिस आया था और ठाकुर साहब को तुरंत कलेक्टर ने तलब किया था।
  एक दिन पहले ठाकुर साहब जिसे धमका कर आये थे उसकी शिकायत पर ही ये आदेश पारित हुआ था।
  ठाकुर साहब ने आदित्य को तैयार होने कहा और चिंतित से खुद भी तैयार होने चले गये।

  आदित्य भी कमरे में चला आया,कमरे में पहले से केसर उसकी राह देख रही थी…

  ” हमने कहा था न, लेकिन तुम्हें हमारी बात पर भरोसा नही था। इसलिए कल तुम्हें वहाँ कमरे के बाहर बुलाया था । हम माफी चाहतें हैं आदित्य लेकिन जब से उस महल में हमारा रहना हुआ है और हमने जब से अजातशत्रु को करीब से जाना है हम उस पर का अपना सारा गुस्सा भूल गए।
    हमें तुम्हारे मामा ने अपनी चाल में वैसे ही फंसाया जैसे तुम्हें। हमारे पिता के दोस्त होने का ढोंग, हमारी मदद का ढोंग कर कर के हमारे हितैषी बनते रहे । उन्हें भी पता था कि हम भी अजातशत्रु के खिलाफ हैं इसलिए हमें भी अपने जाल में फांस कर अपना काम निकाल लिया।
   लेकिन जब तुम्हारे साथ उनका किया अन्याय देखा और वहाँ महल के लोगों को भी करीब से देखा तो समझ आ गया कि अच्छे लोगों के दुश्मन बहुत होतें हैं। तभी सोच लिया था कि तुम्हें इस सब की सच्चाई से परिचित करा कर ही रहेंगे चाहे इस सब मे हमारी जान ही क्यों न चली जाए।

  केसर की बात सुनता आदित्य हैरान परेशान सा वहीं अपना सर पकड़ कर बैठ गया…

” केसर हमारी समझ में नही आ रहा कि कल मामा जी के ऑफिस के बाहर बुलाने के लिए तुम्हें धन्यवाद कहूं या तुम्हारा गला दबा दूं। हम आज तक कम से कम इस मुगालते में तो थे इस लंबी चौड़ी दुनिया मे कम से कम मामा जी तो हमारे अपने हैं। कल वो गलतफहमी भी दूर हो गयी। अब तो इस सारी दुनिया में न कोई हमारा रहा न हम किसी के।”

” ऐसे मत कहिये आदित्य। अगर एक रास्ता बंद हो जाये तो कई रास्ते खुल भी जातें हैं। अभी हम ज्यादा देर यहाँ नही रुक पाएंगे वरना ठाकुर साहब या और किसी को शक हो जाएगा। हम चलतें हैं आप अपना ध्यान रखिएगा।”

   केसर के बाहर जाते ही आदित्य कमरे का दरवाजा बंद कर रो पड़ा। इतनी आसानी से उसके ऑंसू निकलते नही थे लेकिन आज जाने क्यों वो अपने ऑंसूओं को रोक ही नही पा रहा था।अपनी माँ की तसवीर हाथ मे लिए वो काफी देर तक बैठा रह गया। आखिर उसके पिता भी तो उसे अपने साथ ले कर जाना चाहते थे फिर क्यों मामा जी ने उसे बचपन में ही उसके पिता के हवाले क्यों नही कर दिया?

  खैर वो मुहँ हाथ धोकर तैयार हो गया। मामा जी के साथ कलेक्टर ऑफिस जाते वक्त भी सारा समय मामा जी परेशानी में उससे कुछ न कुछ कहते रहे और वो चुपचाप बैठा रहा।

  कलेक्टर परिसर में पहुंचने के बाद उसने मामा जी से अपने लाव लश्कर को बाहर ही छोड़ अकेले अंदर चलने की गुज़ारिश की लेकिन न मामा जी को मानना था न वो माने।
   लगभग आठ दस आदमियों के साथ ठाकुर साहब केबिन में प्रवेश कर गए।
   अंदर बैठी कलेक्टर साहिब पर नज़र पड़ते ही ठाकुर साहब चौन्क गए…
    सामने टेबल पर कलेक्टर की नेम प्लेट रखी थी..

   बाँसुरी अजातशत्रु सिंह ।।

क्रमशः

aparna….

 
 
 




लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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