जीवनसाथी -94


   जीवनसाथी –94



कलेक्टर परिसर में पहुंचने के बाद उसने मामा जी से अपने लाव लश्कर को बाहर ही छोड़ अकेले अंदर चलने की गुज़ारिश की लेकिन न मामा जी को मानना था न वो माने।
   लगभग आठ दस आदमियों के साथ ठाकुर साहब केबिन में प्रवेश कर गए।
   अंदर बैठी कलेक्टर साहिब पर नज़र पड़ते ही ठाकुर साहब चौन्क गए…
   ये तो उनकी बेटी रेखा की जेठानी यानी अजातशत्रु की पत्नी और महल की पूर्व महारानी रानी बाँसुरी थी।
    सामने टेबल पर कलेक्टर की नेम प्लेट रखी थी..

   बाँसुरी अजातशत्रु सिंह ।।

  सामने बैठी बाँसुरी को देख ठाकुर साहब के चेहरे पर चमक चली आयी, उन्हें लगा आज का उनका काम तो ऐसे ही हो गया।
  बाँसुरी उनकी रिश्तेदार है और रिश्तेदार होते हुए क्या वो उन्हें ही परेशान करने की भूल करेगी।
   ठाकुर साहब कुछ देर को खड़े रह गए, उन्हें लगा बाँसुरी अपनी जगह से खड़े होकर उनका अभिवादन करेगी लेकिन वो सर झुकाये अपने सामने पड़े दस्तावेज़ देखती रही।
   कुछ सेकण्ड्स में ही उसने ऊपर सर कर उन्हें देखा, ठाकुर साहब ने उसे देखा कि पीछे से उनका एक सेवक बोल पड़ा…

” ठाकुर साहब हैं , खुद चल कर आये हैं यहाँ तक ..

  अभी वो अपनी बात पूरी करता कि बाँसुरी ने झांक कर उसे देखा और वापस ठाकुर साहब की ओर देखने लगी।
   ठाकुर साहब को पहचान कर उसने उनके सामने हाथ जोड़ दिए , विनम्रता से उन्हें नमस्कार कर उसने उन्हें बैठने कहा, उसके निवेदन पर गौरवांवित ठाकुर साहब बैठ गए। बैठने के साथ ही उन्होंने पीछे पलट कर देखा और बाकियों को भी जगह देख बैठने का इशारा कर दिया। उनका इशारा पाते ही सब बैठने लगे

  “आप सब बाहर इंतेज़ार कीजिये। ”

बाँसुरी की आवाज़ सुन ठाकुर साहब चौन्क गए …

.” लेकिन ये सब मेरे साथ ही हैं.!”

” जी ! इसलिए इन्हें बाहर इंतज़ार करने कह रही हूँ। जाइये आप लोग बाहर बैठिए। ”

पीछे बैठे सारे एक एक कर उठते चले गए, आदित्य भी उन लोगो को देख उठने लगा , उसे उठते देख इशारे से बाँसुरी ने बैठने कहा और फिर ठाकुर साहब की ओर घूम गयी…

” जी ! ठाकुर साहब आपके खिलाफ शिकायत आयी है,बस उसी निराकरण के लिए आपको बुलाना पड़ा। ”

  अब तक शांत बैठे ठाकुर साहब के चेहरे पर उनका गुस्सा छलकने लगा…

” शिकायते तो आनी जानी है उनसे हमारा कभी कुछ बिगड़ा है भला? “

” लेकिन बिगड़ सकता है। इस बार जो शिकायत आयी है उसमें वादी ने दावा किया है कि आपने उन्हें जान से मारने की धमकी दी है?”

” ये क्या बकवास है। गुस्से में तो हम कुछ भी बोल देते हैं ? इसका मतलब कोई भी मुहँ उठाये हमारी शिकायत कर जाएगा क्या?

  ” गुस्से में जिस तरह आप कुछ भी बोल जाते हैं उसी तरह सामने वाले ने गुस्से में आपकी शिकायत भी कर दी। और सिर्फ इतना ही नही बहुत कुछ है यहाँ पर। किसी की शिकायत है कि आप उन्हें उनकी ही ज़मीन पर बने गार्डन को हथियाने के पीछे पड़े हैं, किसी की शिकायत है आप उनकी घर के पीछे बची जमीन को हड़प कर उस पर बैडमिंटन कोर्ट बनवा चुके हैं।। एक किसी की शिकायत तो ये भी है कि आपने एक अनजान पड़ी ज़मीन जिसका कोई मालिक पता नही चल रहा था को चारों तरफ से घिरव कर अपने कब्जे में ले लिया है।”

” ये सब शिकायतें करता कौन हैं? “

“” जी जनता ही है जो करती है। उन लोगो का यह भी कहना है पिछले कलेक्टर से भी शिकायतें की थी लेकिन कोई फायदा नही हुआ , आपने मामला दबवा दिया था?

  ” आप तो सारी तैयारी कर के आयीं हैं? “

  ” जी मैं बिना तैयारी के कुछ नहीं करती। ”

  “खैर वो सब छोड़िए आप हमारी बेटी की जेठानी है इस नाते हमारी भी बेटी जैसी हुई । हैं कि नही?

  बाँसुरी ने मुस्कुरा कर हाँ में सर हिला दिया…

  “तो अब जब हमारी रिश्तेदारी है तो मामले को रफा दफा करिये आप। कुछ कम ज्यादा लगे तो बताइयेगा हम आपके घर पहुंचा देंगे। ”

  ” ठाकुर साहब रिश्तेदारी देखते हुए ही आपसे इतनी विनम्रता से बात कर रही हूँ वरना जितनी शिकायतें है आपके ऊपर इतने में तो मुझे आपको सीधा पुलिस के हवाले करना था। समझे आप? और रही बात कम ज्यादा लगने की तो आप गौर से मुझे एक बार देख लीजिए कि मैं कौन हूँ? राजा अजातशत्रु सिंह की पत्नी से आप ये पूछ रहे हैं कि जो कम ज्यादा लगे वो आप मेरे घर पहुंचा देंगे। गौर से जांच लीजियेगा क्या आपका खज़ाना इतना बड़ा है कि आप राजा अजातशत्रु की पत्नी की जरूरतें पूरी कर सकें? और अगर नही तो आइंदा मुझे ऐसे प्रलोभन मत दीजिएगा वरना एक चार्ज और लग जायेगा आप पर, कलेक्टर को रिश्वत देने का।
 
  बाँसुरी और ठाकुर साहब की बात सुन आदित्य को समझ आ गया था कि सामने बैठी कलक्टरनी अजातशत्रु की पत्नी है।

  ” हम शराफत से बात कर रहे तो आप तो सर पर चढ़ी जा रहीं हैं। धमकी दे रहीं है आप हमें? “

” नही ! कोरी धमकी नही है ये ठाकुर साहब। आपके खिलाफ बहुत कुछ है मेरे पास , और इन सब के आधार पर आप जल्दी ही सलाखों के पीछे होंगे। वादा करती हूँ।
  जहाँ तक है बात रिश्तेदारी की तो वो मैं शुरू से ही देखती आ रही हूँ कि आपने कितनी शिद्दत से मेरे पति के साथ अपनी रिश्तेदारी निभाई है, सब सूद समेत मैं आपको वापस कर दूंगी।
   एक बात और, मैं कभी अपनी काम वाली जगह पर अपना परिचय अपने पति का परिचय को देना पसन्द नही करती और न ही देती हूँ लेकिन क्या करूँ आप हमारे पुराने रिश्तेदार जो ठहरे इसलिए ऐसा करना पड़ा।
   आशा करती हूँ आप मेरी बातों को और मुझे अच्छे से समझ गए होंगे तो अब इजाज़त दीजिये।

” हद है मतलब हम तमीज़ से बात कर रहे तो तुम बदतमीज़ी पर उतर आई। अभी जानती नही हो कि हम क्या हैं इसलिए इतना उड़ रही हो। एक झटके में तुम्हारे पंख काट कर नीचे फेंक न दिया न तो हमारा नाम भी…

  ” बदलने की तैयारी कर लीजिए !”

  ” क्या ? ” ठाकुर साहब की गर्जना पर बाँसुरी की मुस्कान भारी पड़ गयी..

  ” अपना नाम ठाकुर साहब। आप यही तो धमकी दे रहे है ना । तो वहीं कह रहीं हूँ कि बदलने की तैयारी कर लीजिए और अपने लिए एक दूसरा नाम भी सोच लीजिये।
    अभी तो उड़ान भरना शुरू किया है ठाकुर साहब, अभी तो बहुत ऊंचा उड़ना है, सारा आकाश बाकी है। आप अभी से पंख कतरने चले आये,वैसे आप के पास वो औजार होगा भी नही जो मेरे पंख कतर सकें। हो सकें तो अपने सारे इधर उधर के इलीगल धंधों के सही सफेद पेपर्स तैयार करवा लीजिये वरना आपकी मुश्किल बढ़ सकती है। जेल से बचने के लिए कमर कस लीजिये आप क्योंकि आपको जेल के हवाले करने मैंने कमर कस ली है।
      वो कहतें हैं ना … सौ सुनार …

  बाँसुरी की बात आधी ही हुई कि खुद ठाकुर साहब बीच में बोल पड़े … एक लुहार की। ”

  ” जी सही कहा! चाय कॉफी कुछ लेंगे आप ? “

  मुस्कुराती बांसुरी ने उनकी तरफ देखा लेकिन उनकी आंखों से बहते नफरत का लावा चाय कॉफी की गर्मी से बढ़ना ही था,वो गुस्से में अपनी जगह से उठ खड़े हुए..

  ” देख लेंगे आपको भी बाँसुरी जी, कितने दिन बजेंगी आप! अच्छे अच्छे हमारे सामने नही टिक पाए, आप किस खेत की मूली हैं? “

” मुझे किसी के खेत की मूली समझने की गलती भी मत कीजियेगा ठाकुर साहब… आपके घरों में लड़कियां खेतों की मूलियां होती होंगी, मुझे मेरे मायके में मेरे पिता ने राजकुमारी बना के पाला और ससुराल में पति ने रानी बना कर रखा है। अच्छे से देख और जान लीजिए मुझे। ”

  ” आपका इतना बोलना मंहंगा पड़ेगा आपको।”

  ” जबसे साहब से शादी हुई है शौक बड़े महंगे हो ही गए हैं मेरे। क्या करूँ? अब कोई सस्ती चीज़ भाती ही नही… न सस्ते लोग न सस्ती बातें।”

  बाँसुरी के अपनी जगह खड़ी होते ही ठाकुर साहब तेज़ कदमो से बाहर निकल गए। उनके पीछे आदित्य भी बाहर निकल गया।
   बांसुरी अपने किसी काम से वहाँ से निकलने ही वाली थी कि दरवाज़े से आदित्य पलट कर वापस आया और बाँसुरी के ठीक सामने आकर एकदम से रुक गया।
   बाँसुरी जब तक कुछ समझ पाती आदित्य ने झुक कर उसके पैर छुए और वापस खड़ा हो गया। बाँसुरी अचानक उसके इस कारनामे पर चौन्क गयी…

  ” जी ये हमारे मामा जी थे। हम रेखा बाई सा के भाई हैं। आप रेखा सा की जेठानी है ,इस नाते…

  आदित्य की बात समझ कर बाँसुरी मुस्कुरा कर रह गयी… “” खूब खुश रहिए …”

  नाम के लिए बाँसुरी को अटकते देख आदित्य ने उसे अपना नाम बता दिया..

  ” आदित्य अदित्यप्रताप ! नाम है हमारा।

  “खुश रहिए आदित्य। ”

  आदित्य बाहर निकल गया। उसके मन में अजीब सी बेचैनी हो रही थी, आखिर उसके मन को कौन नचा रहा था और क्यों?
    उस अजातशत्रु ने किस तरह उसके मन को सम्मोहित कर लिया था कि इतने सालों से उसके मामा के सींचे पौधे में फूल अजातशत्रु के नाम के महकने लगे थे।
   बाँसुरी के लिए मन में उठी श्रद्धा के पीछे भी कहीं न कहीं वही तो खड़ा था,राजा अजातशत्रु , उसका बड़ा भाई!

   वो परेशान हाल मामा जी के पीछे चलता बाहर निकल गया।
  मामा जी की सच्चाई उसके सामने आ चुकी थी, और अजातशत्रु के व्यवहार की सच्चाई भी।
  अब उसे तय करना था कि उसे आखिर करना क्या है? उसे किसे चुनना है? एक तरफ बरसों से उसे पालती पोस्ती बेईमानी की रात थी तो दूसरी तरफ उसकी तरफ हाथ बढ़ाता सवेरा था। ये अब पूरी तरह उस पर था कि वो इनमें से किसे चुनता है?

  हवेली में पहुंचने के बाद भी आदित्य खुद में परेशान सोचता रहा। उसे चैन नही था।
   उसके सामने जो भी उदाहरण आ रहे थे उनके कारण वो और उलझता चला जा रहा था।
  उसके सामने एक उदाहरण विभीषण का था जिसने ऐसे तो श्री राम का साथ दिया सच्चाई का धर्म का साथ दिया बावजूद अपने सगे भाई से किये धोखे के कारण आज भी उसे घर का भेदी ही पुकारा जाता था।
  वहीं दानवीर कर्ण को हमेशा ही उसकी अच्छाई और इम्णादारी के लिए ही याद किया जाता है क्योंकि उसने अपने नमक का कर्ज जो अदा किया। आखिर दुर्योधन के उसी कर्ज़ को निभाने अपने भाइयों की सच्चाई जानने के बाद भी वो उनके सामने अडिग खड़ा रहा और दुर्योधन का साथ देता रहा।
   
    आज वो भी उसी दुविधा में खड़ा है आखिर, एक तरफ उसके भाई अजातशत्रु युवराज हैं तो दूसरी तरफ उसको पालने वाले उसके मामा। भले ही उनके मन में जो भी रहा हो , और एक समय भले ही वो उसे मारना चाहते रहें हों लेकिन आख़िर आज वो जो है उसे ये बनाने में भी तो उन्हीं का हाथ है। लेकिन अब उसका मन क्यों उनके साथ काम करने की गवाही नही दे रहा।
   लेकिन मन की गवाही का क्या? मन तो उसका चाह रहा कि आजातशत्रु के पास चला जाये पर ऐसे उसके चले जाने से क्या वो लोग उसे अपना लेंगे? उसके पिता उसे अपना लेंगे?

  सोचते सोचते उसके सर में दर्द होने लगा। कुछ देर अपने कमरे मे टहलने के बाद जाने क्या सोच कर वो अपने कमरे से निकल गया। अपनी गाड़ी उठाये वो एक अनजान सफर पर निकल पड़ा ।

  *******


   बाँसुरी को कुछ मीटिंग्स निपटानी थी। अपनी मीटिंग्स पूरी कर वो शाम ढले अपने सरकारी आवास पहुंची तब तक अंधेरा हो चुका था।
    शाम के समय में उसने सभी नौकरों को छुट्टी दे रखी थी।
   रात का खाना बना कर डायनिंग टेबल पर रख कर उसने उषा को भी जाने कह दिया था।
गेट पर के गार्ड के अलावा उषा की ही मासी बाँसुरी के साथ रात में रुक जाया करती थी। दो दिन से बुखार होने से वो भी छुट्टी पर थी। चार दिन बाद ही बाँसुरी भी छुट्टी पर अपने साहब के पास जाने वाली थी इसलिए उसका उत्साह आज देखते ही बन रहा था।
   घर पहुंच कर नहा धोकर उसने सुबह वाली ठाकुर साहब की फाइल निकाल ली।
  उसने सुबह ही सारी फाइल पढ़ ली थी लेकिन लंच के बाद जब वो अपने ऑफिस में आई तब उसके टेबल पर उसी फाइल में  कुछ दस्तावेज़ और भी रखे थे। इसके अलावा उसने एक बात और गौर की थी कि जब वो अपने ऑफिस से राज भवन मीटिंग के लिए जा रही थी तब उसे ऐसा लगा जैसे एक जोड़ी आंखें उसका पीछा कर रहीं हैं।
   अपने आजू बाजू देखने पर उसे ऐसा कोई संदिग्ध नज़र नही आया था।
    शाम में ऑफिस से निकलते समय भी उसे ऐसा लगा कोई तो है जो उसे घूर रहा है। लेकिन इस बार भी उसे कोई नज़र नही आया था।
    उसे चार दिन पहले की उषा की बताई बात याद आ गयी।
  उषा असल में एक अच्छे सम्पन्न घर की बेटी थी पर जल्दी ब्याह हो जाने से न पढ़ पायी न और कुछ सीख पायी। संयुक्त परिवार में जब तक सब साथ रहे किसी को रोटी पानी की किल्लत नही आई लेकिन एक बार सासु माँ ने डेढ़ होशियारी में अपने जीते जी सबका हिस्सा बांटा बांट दिया और उसके बाद उसके जीवन मे भी तकलीफें शुरू हो गयी। उसका पति भाइयों में सबसे छोटा था सो घर की कमाई के एकमात्र साधन परचून की दुकान पर ही भाइयों का साथ दिया करता था लेकिन बंटवारे में मिले कमरे और आंगन के बदले उसे दुकान पर अपना हिस्सा छोड़ना पड़ा और उषा की किस्मत उसे उसी आंगन में बड़िया और पापड़ सुखाने को मजबूर कर गयी।
    जब बड़े भाइयों ने छोटे को दुकान से धक्के मार निकाल बाहर किया तब उषा ने अपने पति को न सिर्फ ढांढस बंधाया बल्कि बड़ी पापड़ अचार बना कर घर घर बेच उसकी मदद भी करने लगी। उसी समय किसी कलेक्टर निवास के अर्दली ने उसे बाँसुरी के घर खाना बनाने का काम दिलवा दिया।
   अपने सुस्वादु खाने से भी स्वादिष्ट बातों के लच्छे बनाती उषा बाँसुरी को रोज़ शाम रात के खाने के साथ आजू बाजू के किस्से भी परोसती चलती।
    कभी किसी ऊंची पहाड़ी से बारातियों की बस पलटने और उस हादसे में सब के मर जाने के बावजूद उधर से गुजरते लोगों को लाल जोड़े में हाथ भर चूड़ियां पहनी नई दुल्हन के भूत का सब को रोक रोक कर अपने पति के लिए पूछताछ करना या फिर अपनी मीठी बातों के जाल में फांस कर अपनी ही बीवी को मार कर अपने गार्डन की मिट्टी के गमलों में दफनाई बीवी को ढूंढने के दिखावे को जब पुलिस भी नही पकड़ पायी तो कैसे बीवी का भूत आकर उसे अपने साथ ले गया। उषा के पास एक से बढ़कर एक किस्सों की पोटली थी। उसके डरावने किस्सों को सुन अक्सर बाँसुरी हँसने लगती और उषा मुहँ बना लेती…

  ” क्या दीदी आपको तो हम पर भरोसा ही न है। मेरी आमा ने ये किस्सा कहा था घर पर यानी मेरे मैत( मायके) में सुना था ये किस्सा।”

  ” उषा तुझे सारे डरावने किस्से ही क्यों भाते हैं?

  उषा बाँसुरी की बात पर लजा गयी थी।

“पता नही दीदी। शायद यहाँ पहाड़ों पर भूत ज्यादा होते हैं ना इसलिए हमें भूतों के ही किस्से सुनाए जाते हैं। वही सुनते सुनते अच्छे लगने लगते हैं। “

  ” मुझे लगता है इन इतने ऊंचे पहाड़ों पर खेलने कूदने में बच्चों के साथ हादसे न हो और वो पहाड़ों से दूर रहे इसलिए ऐसे खतरनाक किस्से गढे जाते हैं गढ़वाल में। तुम गढ़वाल से हो न? “

  ” ना दीदी मैं तो कुमाऊँ से हूँ पिथौरागढ़ की लड़की हूँ। ब्याह कर यहाँ आ गयी टिहरी गढ़वाल। ”

  ” ओह्ह ! भई हमारे लिए तो पूरा उत्तराखंड एक ही है। “

  ” वो तो अच्छी बात है दीदी। लेकिन भूतों को मानना भी ज़रूरी होता है नही ये आपसे गुस्सा हो जातें हैं। आप सच्ची भूत प्रेत नही मानती? “

  ” नही मानती उषा !”

  आज बाँसुरी को घर पर अकेले जाने क्यों उस शाम की उषा की बातें याद आ रही थीं। उस रोज वो बेवकूफ लड़कीं बात बात पर उसे भूतों के अस्तित्व की कैफियत ऐसे देती रही जैसे उसे भूतों का एक्सिसस्टेन्स साबित करने पर नोबल प्राइज मिल जाएगा। और इसी चक्कर में एक के ऊपर एक डरावनी कहानी उसे सुनाती चली गयी थी।।वैसे तो बाँसुरी को डर नही लगता था लेकिन आज की शाम इत्तेफाक से वो घर पर अकेली थी। पहाड़ों पर की सर्द रात उसे और उसके आवास को एक अलग ही नीरवता प्रदान कर रही थी।
    टेबल पर सामने रखी फाइल को बंद कर वो अपने लिए कॉफी बनाने चली गयी, उसी वक्त उसे लगा जैसे उसके कमरे की खिड़की के बाहर कोई खड़ा उसे देख रहा था। वो जब तक पलटी कोई तेज़ी से वहाँ से चला गया।

  *******

   नए कलेक्टर के रंग ढंग विराज को बिल्कुल भी पसन्द नही आये थे। विराज के अनुसार रत्ती भर का भी दिमाग उस नौसिखिए के पास नही था बस अपने पद का रौब दिखा रहा था। अगर वो उसकी रियासत में आया होता तो उसे मज़ा चखा के रहता विराज।
    लगातार चार दिनों तक भी जब विराज के दिमाग से नए कलेक्टर का भूत नही उतरा तब मां साहेब को युवराज और समर को बुला कर पूछ ताछ करनी पड़ी। उन दोनों के मुहँ से सब सुन माँ साहेब चिंतित हो उठी।
      रियासत के काम न कर सकने की असमर्थता के कारण या रियासत की जनता के असन्तोषी स्वभाव के कारण लेकिन जो भी हो अब विराज खुद चिंतित रहने लगा था।
   रातों को सोते में चौंक चौंक कर उठने लगा था। ऐसे ही एक रात कुछ तो भी बुरे सपने ने उसकी नींद तोड़ दी। परेशान हाल विराज उठ कर बैठा तो देखा सामने ही आरामकुर्सी पर रेखा गहरी नींद में डूबी पड़ी थी।
   उसे अपने कमरे में देख वो अचरज में पड़ गया। बहुत समय से वो और रेखा अलग कमरों में रह रहे थे। रेखा को ऐसे कुर्सी पर हाथ पांव सिकोड़े सोते देख उसे अच्छा नही लगा, उसने जाकर रेखा को जगा दिया..

“यहाँ क्यों सो रही हैं आप? “

  नींद से एकाएक जागी रेखा को एकदम से कुछ समझ नही आया। कुछ देर में सामान्य होते ही उसने विराज की ओर देखा..

” आप जाग कैसे गए? कुछ चाहिए आपको?

  न में सर हिला कर विराज ने वापस अपना सवाल पूछ लिया…

  ” जी आजकल आप नींद से चौंक चौंक कर जागते हैं, सपनो में बड़बड़ाते रहतें हैं। ऐसा लगता है जैसे आपके ऊपर बहुत ज्यादा दबाव है। अपने दबाव में आप इतने अधिक परेशान हो गए है कि आपको अपने आसपास की भी सुध नही रही। अभी अपने जय हमारे बेटे के बारे में भी पूछा कि उसे मैं कैसे अकेला छोड़ आई, वो तो चल भी नही पाता, जबकि राजा साहब आपका बेटा तीन साल का हो चुका है। चलने फिरने क्या दौड़ने भी लगा है।

  ” अच्छा ! कहाँ है अभी ?”

  ” हमारे कमरे में सो रहा है अभी। आप कहें तो हम सुबह ले आएंगे उसे। “

” रेखा ऐसा करतें हैं कल कहीं बाहर घूमने चलतें हैं। दो चार दिन ज़रा बाहर रह कर आएंगे तो हम लोग भी फ्रेश महसूस करेंगे। है ना? “

“जैसा आपको सही लगे। हमारी एक बात मानेंगे? “

” हाँ बोलो ?

” नही कुछ नही। जाने दीजिए, कभी और हम कहेंगे।

  विराज ने हाँ में सर हिलाया और एक सिगरेट सुलगाये खिड़की पर जाकर खड़ा हो गया।
  उसके कमरे से अजातशत्रु का कमरा नज़र आता था। कमरे की बुझी हुई बत्तियां और वीरान पड़ा कमरा देख उसे अजीब से सुनेपन ने घेर लिया। वो वहीं खड़े बाहर देखता कुछ सोच में डूब गया।


********

  कॉफी बना कर बाँसुरी लौटी तब तक में टेबल पर रखी फाइल वहाँ से गायब हो चुकी थी। बाँसुरी को समझ आ गया कि ये जो कोई भी है यहाँ उसके घर इस फ़ाइल को ही चुराने आया था।
   वो तुरंत खिड़की पर पहुंच कर बाहर झांकने लगी,लेकिन कोई नज़र नही आया। वो भाग कर बाहर वाले दरवाज़े पर पहुंच गई, लेकिन वो दरवाज़ा भीतर से बंद था। इसके अलावा एक दरवाज़ा पीछे की तरफ था, वो उस तरफ भी लपक कर पहुंच गई। वो दरवाज़ा वो खुद अंदर से बंद कर के गयी थी,वो वैसे का वैसा था।
    छत पर से भी कोई नीचे उतर सकता था लेकिन छत का दरवाजा भी अकेले रहने पर शाम से पहले ही वो बंद करवा दिया करती थी।
   उसकी समझ से बाहर था जब सारे दरवाज़े अंदर से बंद है तो कोई अंदर आया कैसे?
    वो वापस अपने कमरे में चली आयी। फ़ोन उठाये वो अपने सिक्योरिटी गार्ड को फ़ोन लगाने जा रही थी कि अचानक पावर कट हो गया।
    और उसकी एक घुटी हुई सी चीख निकल गयी। रह रह के अब उसे उषा पर गुस्सा आने लगा था,अपने डर की छूत उसे भी लगा गयी थी। वैसे उसे भूतों से डर नही लगता था लेकिन अकेले ऐसी सर्द रात में बिना रोशनी के ऐसा डरावना माहौल तैयार हो गया था कि कोई भी डर जाए।
   भूतों से ज्यादा उसे सुबह की ठाकुर साहब की धमकी याद आ रही थी,कहीं उन्होंने ही किसी को भेज उसकी फाइल गायब तो नही करवा दी।
   फ़ोन पर की टॉर्च लाइट जलाए वो बाहर गार्ड को आवाज़ देने जा रही थी कि पर्दे के पीछे खड़ी किसी लंबी चौड़ी आकृति से टकरा कर गिरने को हुई और एक जोड़ी बाजुओं ने उसे कस कर थाम लिया।

    बिना सामने वाले को देखे भी उस खुशबू को उस एहसास को उन बाजुओं को उसने पहचान लिया, और  खुशी से वो उससे लिपट गयी।

  ” आप कब आये साहब ? “

  “मैं तो सुबह से आपके घर पर हूँ हुकुम। सुबह से आपका रास्ता देख रहा हूँ,लेकिन आप व्यस्त थीं।”

” अरे तो मुझे फ़ोन करना था न,मैं आ जाती। ”

” मैं चाहता ही नही था कि तुम काम छोड़ कर आओ। इसलिए आराम से तुम्हारा रास्ता देख रहा था। “

  ” मेरे वापस आते साथ भी तो सरप्राइज दिया जा सकता था न । इतनी देर क्यों लगा दी आपने? “

  “तुम्हे देख रहा था, तुम्हारा काम करते हुए। कैसे तुम हर बात पर मुझे मिस करती हो ये देखना बहुत अच्छा लग रहा था। मेरे यहाँ न होने पर भी हर बात मुझे बताती हुई तुम बहुत प्यारी लग रही थीं। “

” क्या क्या सुन लिया आपने छिप कर।”

” वही सब जो उस फाइल के बारे में बोल रहीं थी, उसके बाद ठाकुर साहब के बारे में, किसी उषा के बारे में भी, उसकी कहानियों के बारे में … बहुत कुछ सुना। “

” हे भगवान ! मैं कहीं पागल तो नही होने लगी हूँ। ऐसे अकेले में बड़बड़ाते मुझे कोई देखेगा तो पागल ही सोचेगा। ”

” हाँ और इसीलिए मैंने सोच लिया है अब मैं यहीं तुम्हारे पास रहूँगा जिससे तुम्हे बात करने को कोई मिलता रहे वरना अपने इमेजनरी साहब से बातें करती हुई तुम्हे कोई देख लेगा तो वाकई पागल सोचेगा।

  बाँसुरी राजा की बात पर खिलखिला कर हँस पड़ी, और उसका हाथ थामे उसे डायनिंग में ले आयी..

” चलिए खाना खा लेते हैं!”

  राजा भी उसके साथ आकर एक कुर्सी खींच बैठ गया…

   डोंगे खोल बाँसुरी ने देखा आज सब कुछ उषा ने उसकी ही पसंद का बनाया था। गट्टे की सब्जी,भरवां बैंगन और बूंदी का रायता। उसने वापस पलट कर राजा की ओर देखा…

” तो आपने बनवाया है ये सब ? “

” जी बिल्कुल! जब तुम मेरी पसन्द का ध्यान रख खाना बनवाती हो तो मैं क्यों नही? “

  मुस्कुराते हुए बाँसुरी खाना परोसने लगी। खाना खाते हुए दोनो बातों में लगे रहे। बाँसुरी ने सुबह ठाकुर साहब से हुई मुलाकात के साथ ही आदित्य के बारे में भी राजा को बता दिया।
   आदित्य के उस व्यवहार को सुन राजा भी अचंभित था क्योंकि उसने आज तक आदित्य का बेशुमार गुस्सा ही देखा था।
    बाँसुरी आदित्य को पहचान नही पायी थी, इसलिए सिर्फ रेखा के भाई होने से उसका इस तरह बाँसुरी को आदर देना बाँसुरी के भी समझ से परे था। बाँसुरी की परेशानी देख राजा ने आदित्य के बारे में शुरू से लेकर अंत तक सारी बातें उसे बता दी।
     सारी बातें सुनने के बाद बाँसुरी और भी आश्चर्य में डूब गई , जो लड़का उसके पति से बेइंतिहा नफरत अपने सीने में पाले बैठा था वो उसे कैसे इतने हक से सम्मान दे गया।
   उसका बांसुरी के पैरों पर झुकना कहीं से भी उसे रेखा का भाई नही बता रहा था। उस वक्त आदित्य की आंखों में जो बाँसुरी को दिखा था वो तो देवरानी होते हुए भी आज तक रेखा की आंखों में न देख पायी थी।

     दोनो बातें करते हुए घर से बाहर निकल आये। बाहर की सीढ़ियों में बैठे दोनो अपनी बातों में खोए थे कि सामने के रास्ते से एक बड़ी सी लैंड रोवर निकल गयी।
   गाड़ी इतनी तेज स्पीड में निकली की उसे देख दोनो ही घबरा गए..

  ” ये गाड़ी तो आदित्य की लग रही थी। पहाड़ी रास्तों पर ये ऐसे गाड़ी क्यों भगाता जा रहा है? “

  ” मुझे सुबह भी ये कुछ परेशान लग रहा था, एक बात और जो मैं बताना भूल गयी वो ये की ठाकुर साहब के निकलने के बाद जब ये वापस अंदर आया तब एक पल को लगा ये मुझसे कुछ कहना चाहता है लेकिन फिर ये बिना कुछ बोले ही चला गया। “

” हम्म चलो मेरे साथ। ”

  राजा ने गाड़ी निकाली और बाँसुरी को साथ लिए आदित्य की गाड़ी के पीछे निकल गया।

      ******

       समर गहरी नींद सोया था कि फ़ोन की बेल से उसकी नींद खुल गयी…
    फ़ोन पिया का था…

” हेलो!”

” मंत्री जी ! सो रहे थे क्या ?

  समर ने बेड के बाजू में रखी घड़ी पर समय देखा , रात के साढ़े बारह बजे थे !

” नही फ़ुटबॉल खेल रहा था, क्यों आप सो गयीं थी क्या?

” क्या ? इस वक्त आप फुटबॉल खेल रहें हैं? आपकी तो बात ही निराली है।”

  नींद से बेहाल समर को झुंझलाहट तो हुई लेकिन अपने स्वर को जितना हो सके उतना शांत रख उसने बात आगे बढ़ाई

“वैसे इतनी रात गए मेरी याद क्यों आने लगी आपको। “

” मंत्री जी मेरा डाउट सही निकला। मैंने एक बहुत ज़रूरी बात बताने के लिए आपको कॉल किया है। “

“क्या बताने कॉल किया आपने? “

” मेरा शक एकदम सही निकला है?”

” वो तो ठीक है लेकिन किस बारे में?  क्या कह रही है आप? “

” आपको अब तक समझ में नही आया?

” आधी नींद से उठा कर आप मेरे साथ सस्पेंस पज़ल खेलेंगी तो मुझे समझ भी क्या आएगा ? मैं ये जान  गया हूँ कि आप सस्पेंस क्वीन हैं प्लीज़ अब असली बात बता दीजिए।”

“नही वो तो मैं कल सुबह बताऊंगी। कल सुबह आपके महल  आती हूँ , वही बताऊंगी।”

” तो अभी क्यों कॉल किया यार ? अच्छी खासी नींद खराब …

” ओह्ह मतलब आप सच मे  सो रहे थे? “

” रात में बारह बजे कोई और क्या कर सकता है भला? वैसे आप क्या करती हैं उस वक्त? “

” मैं तो पढ़ाई करती हूँ। इसी वक्त सबसे अच्छी पढ़ाई होती है , पूरा माहौल शांत जो रहता है। आपको पता है बहुत से लोग मेडिकोज को उल्लू इसलिए ही तो कहतें हैं , एक कारण हमारा रातों को जाग कर पढना और दूसरा लोगो को लगता है लक्ष्मी जी हमारे ऊपर ही सवार होकर भ्रमण करती हैं।”
   अपनी बात पूरी कर पिया खिलखिला उठी लेकिन दूसरी तरफ से उसे समर की कोई आवाज़ नही सुनाई दी, बल्कि हल्के खर्राटे सुन वो आश्चर्य से फोन देखने लगी..


” अजीब लड़का है, बात करते करते अचानक सो गया। ऐसा कौन करता है भला? “


    अगले दिन सुबह महल जाना है ये सोच पिया भी सोने चली गयी। अगले दिन उसे समर को न सिर्फ सच्चाई बतानी थी बल्कि उसके सबूत जो उसके पास आ चुके थे भी समर को सौंपना था।

  क्रमशः

  aparna ….

 










 


लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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