जीवनसाथी-96

जीवनसाथी -96




            बाँसुरी ऑफ़िस निकलने तैयार हो रही थी, राजा बाहर बाँसुरी के ड्राइवर के पास खड़ा उसके हाल चाल पूछ रहा था। आदित्य अपने कमरे में खिड़की पर खड़ा चाय पीते हुए बाहर खड़े राजा की सरलता को देख रहा था।
    बताओ ये किसी रियासत के राजा जी हैं जो अपनी पत्नि की गाड़ी के ड्राइवर से उसकी गृहस्थी के बारे में जानकारी ले रहे हैं।
   क्या इतना सरल भी कोई हो सकता है।

  राजा का फ़ोन अंदर ही पड़ा था, समर का फ़ोन राजा के फ़ोन में आने लगा।

     घर पर काम करने वाली मेड ने फोन उठाया और बाहर लाकर राजा को थमा दिया….

  ” हुकुम कैसे हैं आप? “

  ” ठीक हूँ समर! तुम बताओ। वहाँ क्या हाल हैं? महल में सब ठीक हैं?”

” हुकुम आपकी घर वापसी का समय हो गया लगता है। “

” क्या हुआ समर ? “

” महाराज हुकुम की तबियत कुछ ठीक नही लग रही, आपको बहुत याद कर रहें हैं। रानी माँ साहेब ने तुरंत आपको बुलाने कहा है। ”

   राजा की समर से बात हो ही रही थी कि युवराज का भी फ़ोन आने लगा। राजा समझ गया कि बात कुछ अधिक ही गंभीर है अन्यथा समर और युवराज एक साथ उसे कभी फ़ोन नही करते।
    समर से बात कर उसने फ़ोन रखा और तुरंत बाँसुरी को बताने भीतर चला गया।

   राजा के बाँसुरी से बात करते में आदित्य भी चला आया। राजा और बाँसुरी के चेहरों का रंग देख उसे भी समझ आ गया था कि कोई बड़ी बात है वरना छोटी मोटी बातों को तो ये राजसी जोड़ी यूँ ही हवा में उड़ा दिया करती थी।

   आखिर उससे रहा नही गया और उसने खुद से होकर राजा से पूछ ही लिया….

  ” कोई प्रॉब्लम है क्या? “

  राजा ने आदित्य की ओर देखा और हाँ में सर हिला दिया..

  ” मेरे डैड यानी महल के महाराज हुकुम की तबियत ठीक नही है। ऐसे कुछ छोटा मोटा होता तो डैड मुझे कभी नही बुलाते लेकिन वो और मॉम मुझे वापस बुला रहे यही सोचने वाली बात है।
   खैर ! बाँसुरी तुम फटाफट पैकिंग कर लो मैं तब तक देखूँ की समर ने टिकट्स करवा दिए या नही। तुम्हें अपने ऑफिस में छुट्टी भी तो डालनी पड़ेगी न! “

  ” उसकी आप चिंता न करें, मैंने तो ऑलरेडी छुट्टी डाल रखी थी आपके पास आने के लिए, बस उसे थोड़ा प्रीपोन कर लुंगी। आप जाइये टिकट्स देखिए, पैकिंग हुई जाती है।”

आदित्य को एक ही रात में इस जोड़े से लगाव से हो गया था, उसे इस तरह इन दोनों का चले जाना रास नही आ रहा था। मन ही मन वो चाह रहा था कि किसी तरह ये दोनों रुक जाएँ । वो उनकी संगत से इतनी जल्दी दूर नही होना चाहता था।
   और आखिर भगवान ने उसकी सुन ली।

  ” आदित्य !”

  ” जी भैया! ” आदित्य खुद राजा के पुकारे जाने पर अपने इस तरह से राजा को संबोधित किये जाने से चौन्क कर शर्मिंदा हो गया…

  ” सॉरी गलती से मुहँ से निकल गया। ”

  ” अरे इसमें क्या गलत हुआ। तुमसे बड़ा हूँ और भाई भी हूँ तो इस नाते भैया ही तो बुलाओगे न।”

  ” जी ! ”

  ” अच्छा सुनो। किसी से कह कर अपना सामान भी पैक करवा कर् मंगवा लो।”.

  ” जी? ”

  आदित्य के चेहरे पर खिंचे सवाल देख राजा हल्के से मुस्कुरा उठा

  ” तुम भी हमारे साथ चल रहे हो आदित्य!”

  “पर !”

  ” पर वर किंतु परन्तु कुछ नही चलेगा। महल अपने छोटे राजकुमार का इंतेज़ार कर रहा है । समझे। फटाफट समान मंगवा लो, कुछ घंटों में हमारी फ्लाइट है।

आदित्य को अब भी झिझक हो रही थी,पर राजा और बाँसुरी के बहुत जोर देने पर उसने किसी को फ़ोन कर अपना सामान मंगवा लिया।

    समर ने राजा के कहने पर टिकट्स की व्यवस्था की कोशिश जरूर की लेकिन तुरंत ही कोई फ़्लाइट न होने से समर ने महल से चॉपर ही भेज दिया।
   राजा को शुरू से ही अपने खुद पर निरर्थक खर्च किया जाना कभी पसन्द नही था, लेकिन अभी कोई और उपाय न होने से उसने समर की बात मान ली और चॉपर के आते ही तीनो लोग वहाँ से महल के लिए निकल गए।

    राजा को फ़ोन करने के साथ ही समर प्रेम को भी फ़ोन कर चुका था, वैसे तो प्रेम राजा को कहीं अकेले जाने नही दिया करता था पर राजा के बहुत जोर देने पर ही अपने दो अनुचरों को सादे कपड़ों में राजा के साथ भेज कर भी प्रेम संतुष्ट नही था और उसी शाम वो खुद राजा के पास निकलने की तैयारी में था कि समर का बुलावा आ गया और राजा से बात कर वो भी निरमा को साथ ले महल के लिए निकल गया।


  ********


    रतन अपने ऑफिस पहुंचा ही था कि उसके फ़ोन पर भी समर का फ़ोन चला आया। और वो फटाफट एक आध काम निपटा कर घर निकल गया।
      उसकी ज़िद्दी राजकुमारी जो शादी से पहले अपने महल और उसके कायदों से तंग आ कर उनका मजाक उड़ाया करती थी, अब बात बात पर उसी महल के उन्हीं कायदों को अपनी छोटी सी दुनिया में निभाती वापस महल की लाडली राजकुमारी बन बैठी थी, ऐसे में महल से जुड़ी कोई भी दुख भरी बात पिंकी के लिए पहाड़ समान थी ये जानते हुए भी उससे किसी प्रकार का दुराव छिपाव किये बिना रतन ने उसे महाराज की नाजुक हालत बता कर तुरंत महल के लिए निकलने की व्यवस्था करने निकल गया।
    ऑंसू बहाती पिंकी फटाफट कपड़े समेटने और पैकिंग करने में लग गयी।

******

        भास्कर अपने किसी आर्टिकल को लिखने में व्यस्त था कि अदिति दो कप में चाय और कुकीज़ लिए चली आयी…

” क्या बात है, आज तो बड़े ध्यान से कुछ लिखा जा रहा है? “

   भास्कर ने एक नज़र अदिति को देखा और वापस लिखने लग गया…

  ” टॉपिक क्या है ये तो बताईए ज़नाब! ऐसे क्या डूबे जा रहे? “

  ” संडे स्पेशल लिख रहा हूं, टॉपिक है ‘ मायानगरी ‘

  ” मायानगरी ? ये कैसा टॉपिक है? “

  ” ये एक्चुली कोई टॉपिक नही है, ये एक नॉवेल का नाम है..
     उसी नॉवेल का रिव्यू मुझे लिखने दिया गया है।।

  ” तो ऐसा है क्या इस नॉवेल में? “

  ” ये कहानी एक मध्यमवर्गीय लड़के और लड़की की कहानी है जिसमें लड़की बहुत पढ़ लिख कर मेहनत से मेडिकल की सीट पर आती है , जहाँ मेडिकल कॉलेज में आने के बाद उसे मेडिकल सीट्स की धांधलियों का पता चलता है, अस्पताल में चल रही अव्यवस्थाओं का पता चलता है, उन सब से अकेली लड़ती वो सिस्टम के खिलाफ खड़ी होने की कोशिश करती है जहाँ उसकी मदद करता है वो लड़का जो उसके कैम्पस के ही इंजीनियरिंग का छात्र है।शुरू में होने वाली हल्की फुल्की नोंक झोंक आगे चल कर गहरे प्यार में बदल जाती है।

   ” ह्म्म्म कहानी रोचक लग रही है।”

   ” कहानी आगे और भी रोचक हो जाती है जब लड़का इंजीनियरिंग के बाद अहमदाबाद के एम्स से ही एम बी ए के लिए दो बार तैयारी करता है लेकिन अहमदाबाद में सीट नही मिलती।
   तब वो इंजीनियरिंग विद्यार्थी वहाँ कॉलेज के बाहर पड़े पड़े एक दिन वहीं अपना छोटा सा टी स्टॉल डालता है और एक दिन अहमदाबाद के सबसे बड़े टी कॉर्नर का मालिक बन उसी बिज़नेस मैनेजमेंट कॉलेज जिससे मैनेजमेंट की डिग्री लेने का उसका सपना होता है में विद्यर्थियों को मैनेजमेंट के गुर सिखाने जाता है। ये तो मैंने मोटा मोटी सुनाया है, कहानी के अंदर बहुत से मोड़ आते है जो कहानी को कभी पहाड़ों की ऊंचाई पर तो कभी समंदर की गहराइयों तक ले जातें हैं।ऐसे सारे मोड़ो पर भी उन दोनों का प्यार कम नही होता।
   यही है मायानगरी का सच और किस्सा!

  ” है किसकी कहानी? “

  ” वो तो तुम मेरे रिव्यू में ही पढ़ लेना। फिलहाल आओ चाय पी ली जाएं। अरे ये कागज़ कैसे रखें हैं ट्रे में।”

  ” कुछ लीगल नोटिस आया है तुम्हारे नाम का?”

  “व्हाट ! पहले क्यों नही बताया? कब आया ये नोटिस? ऐसा मैने क्या कर दिया जो मुझे नोटिस आ गया? “

  घबरा कर आदित्य जल्दी जल्दी उन कागजों को खोल पढ़ने लगा…

   ” अब जो भी है , तुम्हारा किया धरा है, तभी तो तुम्हे नोटिस भेजा गया पड़ोसी को नही।”

  अब तक में आदित्य उन कागजों को पढ़ चुका था और उसके चेहरे पर एक सुकून भरी प्यारी सी मुस्कान फैल चुकी थी।

   ” तो ये नोटिस सिर्फ होने वाले पप्पा के लिए है ऐसा क्यों? होने वाली मम्मा के लिए क्यों नही? “

  ” क्योंकि मम्मा को तो पहले ही पता चल गया था।”

   मुस्कुरा कर अदिति ने अपनी सोनोग्राफी की रिपोर्ट्स उठा ली और वापस खोले देखने लगी।

  ” लव यू अदिति। पहले क्यों नही बताया मुझे।”

‘ पहले बता देती तो चेहरे की ये वाली चमक और मुस्कान कहाँ देखने मिलती मुझे।

    हँस कर भास्कर ने अदिति को गले से लगा लिया..

  ” तो मैडम एडिटर कब से छुट्टी लेना चाहती हैं। ”

  ” मैं बिल्कुल कोई छुट्टी नही लेना चाहती , अपने काम और प्रेग्नेंसी दोनो में बैलेंस बना कर दोनो को एन्जॉय करना चाहती हूँ।”

   ” ओके मैंम , जैसा आप ठीक समझें। तो कल चले डॉक्टर के पास।  एक बार मेरे साथ चल कर भी रूटीन टेस्ट करवा लीजिये। ”

   अदिति ने मुस्कुरा कर हाँ में सर हिला दिया,भास्कर ने उसके माथे पर प्यार से हाथ फिराया और अपनी माँ को ये खुशखबरी सुनाने चला गया।।  
    आखिर पहले अपनी माँ को ही खुशखबरी देंगे , ये नही की मेरी माँ को पहले बता दें। पर चलो कोई नही यही तो अंतर होता है एक पति और एक बेटे में।
    मन ही मन सोचती अदिति मुस्कुरा कर अपनी माँ को फ़ोन लगाने चली गयी।


   ********


        राजा बाँसुरी के चॉपर से उतर कर गाड़ी तक बढ़ने में ही रियासत की जनता ने राजा अजातशत्रु की जय के नारे लगाने शुरू कर दिए, महल के राजा और रानी पर बरसते फूलों के साथ ही दोनों की सलामती की दुआएं भी हवाओ में बहने लगी थी….
    बाँसुरी तो अब रियासत की जनता के राजा के प्रति लगाव से परिचित थी लेकिन आदित्य के लिए ये सब कुछ एकदम नया था।
    बहुत हद तक जानने के बाद भी हर बार राजा अजातशत्रु का कोई न कोई पक्ष उससे छूटा रह ही जाता था।
     राजा अजातशत्रु के लिए लोगो के मन का प्यार देख वो आश्चर्यचकित था, क्या आज की मतलबी दुनिया के लोग इस हद तक अपने राजा से प्यार कर सकते हैं?
  जैसे जैसे वो लोग आगे बढ़ते जा रहे थे, कोई राजा के सामने प्रणाम की मुद्रा में पूरा का पूरा झुकता चला जा रहा था तो कोई दंडवत प्रणाम कर रहा था, अधिकतर लोग अपने साथ लाये दूध या पानी को उसके पैरों में चढ़ा कर एक ओर खड़े होते जा रहे थे।
   इतनी भीड़ थी, हज़ारों लोग थे, कोई पुलिस या व्यवस्थापक नही थे लेकिन सब कुछ व्यवस्थित था। इस पूरी भीड़ ने जैसे खुद ही में एक अनुशासन बनाये रखा था कि उनके कारण उनके प्रिय राजा और रानी को कोई कष्ट न हो।
     एक छोटी सी बालिका गुलाब लिए राजा के पास चली आयी… गुलाब लेकर राजा ने उसे गोद में उठा कर प्यार किया और नीचे उतार कर अपनी आदत से मजबूर अपने गले से अपनी सोने की चेन उतारने को अपना हाथ बढ़ाया, लेकिन गले में कोई चेन थी ही कहाँ?
    राजा जी तो महल से जाते हुए सब यहीं उतार कर चले गए थे…
    हाथ का सोने का मढ़ा रुद्राक्ष बस बाकी था, वो उसे खोलने जाने ही वाले थे कि उनका हाथ थाम बाँसुरी ने उन्हें रोक दिया , अपने गले मे  पड़ी सोने की चेन उतार उसने उस बच्ची के गले में डाल दी।
     जयकारों की गूंज कुछ और तेज़ हो गयी, आदित्य इस राजसी जोड़ी के आपसी तालमेल , समझ बूझ को देखता और भी ज्यादा इनके प्रति श्रद्धा से भरता चला गया…

   महल में राजा के पहुँचते में ही कुछ आगे पीछे समय अनुसार प्रेम निरमा , पिंकी रतन सभी पहुंच गए।
  महाराजा जी की तबियत कुछ ज्यादा ही खराब थी,  उन्होंने जैसे ये मान लिया था कि उनका अंतिम समय आ चुका है, और वो एक बार अपने सभी बच्चों से मिलना चाहतें हैं।
     राजा के साथ बचपन से वो थोड़े सख्त रहे थे, लेकिन जैसे जैसे राजा बड़ा होता गया था उन्हें उसी में अपना और रियासत का भविष्य दिखने लगा था, और एक समय ऐसा भी आ गया था जब राजा उनकी आंखों का तारा बन चुका था।
    राजा के जाने के बाद विराज के शासन में मची अफरातफरी उनके साथ साथ रानी माँ ने भी देखी थी और अब तक विराज की पक्षधर रही रानी माँ भी कहीं न कहीं विराज के निकम्मेपन से अंदर से दुखी थी, अब वो भी मान चुकी थी कि गद्दी विराज के बस की बात नही है, और इसी से उनसे सलाह मशविरा कर महाराजा जी ने एक कठोर निर्णय ले रखा था।

    सबके उनके कमरे में पहुंचते ही उन्होंने युवराज राजा विराज और विराट को अपने पास बुला लिया, अपने चारों पुत्रो के साथ वो कुछ चर्चा करना चाहते थे।
      कुछ देर में ही रानी माँ और बाकी लोगों को भी अंदर बुला लिया गया और महाराज हुकुम ने अपना निर्णय वहाँ खड़े सभी को सुना दिया…

  ” जैसा कि आप सभी जानते हैं, गद्दी के उत्तराधिकारी की दौड़ में हमारे बेटों में जो भी आगे पीछे रहा हो लेकिन कुमार के बाद गद्दी में विराज को भी बैठने का मौका दिया गया, जिस मौके में वो पूरी तरह असफल रहा और इस बात को स्वयं विराज भी स्वीकार करते है। कुछ ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से युवराज गद्दी पर नही बैठना चाहते ।
     हर बात पर विचार करने के बाद सर्वसम्मति से यही निर्णय सही बैठता है कि राजा अजातशत्रु वापस अपनी जगह अपनी गद्दी संभाल लें।
    हम अपने जीवन काल में अपनी आंखों के सामने रियासत की गद्दी किन्ही होनहार हाथों में सौंपना चाहतें हैं जिससे हम चैन से मर सकें। अजातशत्रु के जाने के बाद रियासत और यहाँ की जनता को कई तरह की अव्यवस्थाओं का सामना करना पड़ा और इसके अलावा अपने राजा के बिना गद्दी अनाथ सी हो जाती है। उसे किन्हीं लायक हाथों में सौंपना भी हमारी जिम्मेदारी है। अगर किसी को भी हमारे निर्णय से आपत्ति है तो अभी अपनी आपत्ति मय कारण दर्ज करे जिससे उसकी शंका का समाधान किया जा सके, वरना आज ही रियासत राजा अजातशत्रु को सौंप दी जाएगी।

      सभी शांत थे सभी के चेहरों पर एक संतोष था। वही रानी माँ जो किसी वक्त अपने साथ हुई अनदेखी का बदला राजा से लेने के लिए और अपने बेटे को राजगद्दी पर बैठाने के लिए जी जान से प्रयासरत थी आज अपने किये कर्मो पर पश्चाताप करती खड़ी थीं।
  राजा ने उनसे बिना कुछ बोले ही उन्हें समझाने की लाख कोशिशें करने के बाद आखिरी उपाय यही अपनाया था कि उनकी इच्छानुसार गद्दी विराज को दे दी थी , और बस इन्हीं चंद महीनों में रानी माँ को भी अपनी भूल समझ आ गयी थी।
    उन्हें रह रह के वो समय याद आने लगा था जब एक बार उन्हें किसी कार्य के लिए कुछ मोटी रकम की ज़रूरत पड़ी थी और उन्होंने अपने सहायक से राजा को संदेश बस भिजवाया था कि आधे घंटे के अंदर राजा समर के साथ रुपयों का बैग लिए खुद रानी माँ के सामने मौजूद था…

  ” कुमार आप खुद क्यों चले आये? किसी के हाथ भिजवा देते। चलिए आप आ ही गए हैं तो हम इन पैसों की क्या ज़रूरत है वो भी आपको बता देते हैं। ”

   पैसों को एक ओर रख राजा ने झुक कर रानी माँ को प्रणाम किया और एक तरफ बैठ गया…

  “आपका आदेश पत्थर की लकीर है मॉम! आपको ज़रूरत है यही सबसे महत्वपूर्ण है। आप माँ है जो कभी गलत नही होती, क्या इन थोड़े से रुपयों का भी अब मैं आपसे हिसाब लूंगा।
    बस एक बात की शिकायत करूँगा वो ये की मैं भले ही सारी रियासत के लिए राजा हूँ लेकिन आपका तो बेटा ही हूँ फिर अपनी जरूरत के लिए मुझसे कैसा आग्रह? आप तो आदेश किया कीजिये।
   और फिर तिजोरी का रखवाला ये खड़ा है समर। आपको जब जितना चाहिए आप सीधे समर को आदेश करें वो आप तक खुद लेकर आ जायेगा,मैं आप दोनो के बीच आने वाला कौन होता हूँ। ”

  उस वक्त रानी माँ मुस्कुरा कर रह गयी थी, और राजा अजातशत्रु पैसो को वहीं छोड़ अपने मंत्री के साथ एक बार फिर उन्हें प्रणाम कर बाहर निकल गए थे।

    राजा के जाने के बाद एक बार जब उन्होंने पैसों के लिए समर से कहा तो राजा की बात याद रख समर पैसे लिए रानी माँ के कमरे की ओर जा रहा था कि विराज ने उसे टोक दिया था…

   ” समर हम से बिना पूछे इतने रुपये कहाँ ले जा रहे हो?”

  ” जी वो रानी माँ हुकुम ने मंगवाए हैं!”

” इतने रुपये ! ऐसा क्या काम पड़ गया माँ साहब को ? तुमने पूछा नही? “

” जी नही राजा साहेब ! मैं उनसे सवाल करने वाला कौन होता हूँ? “

  ” हम तो पूछ सकते हैं, अभी आप माँ साहेब को फ़ोन लगाइए। ”

  विराज के कहने पर समर ने रानी माँ को फ़ोन लगा कर विराज को थमा दिया और उसने उनसे सारा हिसाब किताब पूछने के बाद भी तिजोरी पर पड़ने वाले अतिरिक्त भार के कारण भेजे जाने वाले रुपयों का पूरा हिसाब किताब माँगते हुए उसमें से आधी राशि ही रानी माँ के पास भेजी…
    विराज की उस हरकत पर रानी माँ हतप्रभ थीं पर उनसे उस वक्त कुछ कहते नही बना, अपना सा मुहँ लिए वो न समर से कुछ कह पायीं और न ही विराज से।

   बस मन में एक लहर सी उठ कर चली गयी और वो एक आह भर कर रह गईं।

   आज जब महाराजा हुकुम ने वापस राजा को गद्दी पर बैठाने की बात रखी तो वो सारी पुरानी बातें उनकी आंखों के सामने से आकर चली गईं।
    

  ” कुमार अब हमारे सब के साथ रियासत की जनता भी बेचैन होने लगी है। आप अपनी गद्दी संभाल लीजिये बेटा। ”

  रानी माँ के मुहँ से ऐसा सुनते ही वहाँ खड़े सभी लोगों के साथ साथ विराज ने भी एक बारगी चौन्क कर अपनी माँ को देखा और वापस राजा की ओर मुड़ गया…

  ” कुमार आपकी गद्दी आपके बिना उदास है। अब माफ कीजिये हमें। हम फ़िज़ूल ज़िद पकड़े बैठे थे,  खुद को साबित करना चाहते थे कि हम भी आपसे कम नही हैं। लेकिन सच कहें तो आपका हमारा कोई मुकाबला ही नही। आप आप हैं, आपकी जगह इस जन्म में तो हम कभी नही ले सकते। अब आपकी जगह अगर कोई लेगा तो वो आपका बेटा ही हो सकता है और कोई नही। ”

   विराज की बात का समर्थन वहाँ खड़े युवराज ने भी कर दिया ..

  “अब वापस आ जाओ कुमार !”

  ” जी भैया! बस मैं डैड से कुछ मांगना चाहता हूँ। ”

   अबकी बार महाराजा हुकुम के माथे पर सवालिया निशान उभर आये..

  ” राजगद्दी पर किसी और को बैठाने की शर्त के अलावा आप कुछ भी मांग सकते हैं अजातशत्रु। ”

” जी जैसी आपकी इच्छा !”

” बोलिये क्या मांगना चाहतें हैं। ”


   राजा ने वहाँ बैठे सभी लोगों को अदित्यप्रताप के बारे में सब कुछ बता दिया। वहाँ उपस्थित लोग वैसे भी ठाकुर साहब को अच्छे से जानते थे, लेकिन वो इस तरह से आदित्य को मोहरा बना कर उनके पूरे खानदान को खत्म करने की सोच सकते हैं ऐसा किसी ने नही सोचा था।
    विराज गुस्से में तमकता रेखा से झड़प करने उठ बैठा उसे युवराज ने वापस बैठा दिया…

  ” इसमें रेखा की क्या गलती विराज? हो सकता है इतना सब उसे पता ही न हो। तुम एक बार शांत मन से बता कर तो देखो, उसके बार उसके चेहरे पर आने वाले भाव स्पष्ठ कर देंगे कि वो क्या और कितना जानती हैं। अनजाने में ही उसे कोई कष्ट न दो। ”

  युवराज की बात सुन विराज चुप बैठ गया। आदित्य के बारे में जान कर सभी के चेहरों पर हल्की सी दुख की परछाई आयी और चली गयी। राजमहलों में दो तीन शादियां होना वैसे भी कोई बड़ी बात नही थी, और फिर आदित्य के जन्म के बाद तो उसके पिता उसे अपनाना भी चाहते थे। उन्होंने आदित्य के बारे में सुन राजा को गले से लगा लिया…

” जो हम अपनी पूरी ज़िंदगी नही कर पाए, आपने इतनी आसानी से कर दिया कुमार !
    अभी कहाँ हैं आदित्य? “

  राजा उसे अपने कमरे में ही छोड़ कर आया था। उसने महाराज से पूछ कर उसे बुलाने किसी को भेज दिया….
  बड़े संकोच के साथ ही आदित्य उस कमरे तक आया और राजा ने उसे हाथ पकड़ सबके पास खींच लिया।
    सब एक दूजे को देखते बैठे थे कि महाराजा जी का क्या निर्णय होता है। उनकी आज्ञा के बिना आदित्य को परिवार में मिलाना मुश्किल ही था।

   कुछ तो अपना अंत समय देखते हुए महाराजा जी शिथिल पड़ चुके थे और कुछ उनकी रियासत को राजकुमारों की आवश्यकता भी थी। बात जो भी रही हो महाराज साहेब ने आदित्य को अपने परिवार में सम्मिलित करने की आज्ञा दे दी।
   उनकी आज्ञा मिलते ही काका साहेब ने उठ कर आदित्य को गले से लगा लिया…

  ” बेटा कहाँ कहाँ नही ढूंढा तुम्हे। जाने कितनी बार तो  तुम्हारे मामा के घर जा चुका था तुम्हें पूछने, पर न उन्होंने तुमसे मिलने दिया और न तुम्हारा कोई अता पता बताया। एक बेटे के मोह में तड़पते पिता का क्या हाल होता है तुम सब नही समझ सकते। ”

    आदित्य को सीने से लगाए खड़े काका साहेब के ऑंसू लगातार बहते रहे। उन्हें कंधो से थपथपा कर शांत करते युवराज ने उन्हें  सम्भाल कर एक ओर बैठा दिया।

   युवराज ने भी आदित्य को गले से लगा लिया..

” परिवार में आपका स्वागत है छोटे राजकुमार !”

  उसके बाद तो एक एक कर सभी आकर आदित्य से मिलते चले गए। रानी माँ के आशीर्वाद के बाद सभा समाप्त कर दी गयी ।
   समर और युवराज अगले दिन होने वाले राजतिलक की तैयारियों में चले गये……..

    लेकिन इतना सब सही हो जाने पर भी अभी भी कुछ तो था जो राजा को बेचैन किये था, उसके मन मे खटक रहा था,वो अपने मन की बेचैनी दूर करने बाँसुरी के पास चला गया….

   क्रमशः



   aparna…











        

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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