जीवनसाथी-97

    जीवनसाथी – 97


  
    महाराज ने अपने मन की बात रख दी थी , और उस वक्त कमरे में मौजूद सभी लोगों ने राजा को राजगद्दी देने वाली बात पर मुहर भी लगा दी थी।
  
     सब कुछ अच्छा होता सा लग रहा था लेकिन इस सब के बीच कुछ तो था जो राजा के मन में खटक रहा था। अपने मन की बेचैनी दूर करने वो बाँसुरी के पास चला आया।

   बाँसुरी कक्ष के ठीक बाहर महल की बाकी महिला सदस्यों के साथ ही थी, राजा के चेहरे पर खींची परेशानी और चिंता की लकीरें देख उसने इशारे से ही पूछा और न में सर हिलाता राजा उन लोगों के पास आकर खड़ा हो गया….

“हम तो आपसे बेहद नाराज है कुंवर सा?”

” क्यों भाभी साहेब! अब मैंने ऐसा क्या कर दिया?

” इतने दिनों बाद हमारी रूठी हुई देवरानी को मना कर लाएं हैं, ये भी कोई बात होती है?

” ये खुद रूठी बैठी थी तो क्या करता? मानने को ही तैयार नही थी, बस झगड़ा किये जा रही थीं और मेरी कोई बात ही नही सुन रही थीं।”

“क्या ये सही बोल रहे हैं? ” राजा की बात सुन रूपा ने आंखे गोल गोल कर बाँसुरी की ओर देखा… बाँसुरी मुस्कुरा कर राजा की ओर देखने लगी…

  “साहेब और इनकी बातें ! पहली बात तो ये मुझे मनाने आये ही नही , एक बार भी नही। बस जब मिले हुकुम सुना दिया कि साथ चलो, और मैं चुपचाप इनके पीछे चली आयी। आपके देवर ने बहुत डरा कर रखा है मुझे भाभी सा। ”  

रूपा आश्चर्य से कभी राजा को कभी बाँसुरी को देख रही थी, उसे इन दोनों की ही बातों में विश्वास नही हो रहा था।

  ” फिर इतने दिनों तक तुम अकेली थीं कहाँ? ”  रूपा के सवाल पूछते में युवराज भी चला आया…

  ” पहले दिल्ली में रह कर पढ़ाई की बाद मे देहरादून से ट्रेनिंग ली और अब आई ए एस बाँसुरी अजातशत्रु सिंह तुम्हारे सामने खड़ी है। ”

   युवराज की इस बात पर रूपा, रेखा, जया बुआ जी सभी ठगी सी खड़ी रह गयी।

    क्या वाकई बाँसुरी कलेक्टर बन गयी है? सबने वापस एक पूरी नज़र से बाँसुरी को देखा, अब उसमें और उसके व्यक्तित्व में एक अलग ही चमक दिख रही थी।
    अचानक वहाँ खड़ी औरतें जो अब तक रूपा की झिड़कियो का लुत्फ उठा रही थीं, खुद में हीन सी भावना लिए रह गईं। बाँसुरी अब तक भी वहाँ सज रही थी लेकिन उसका पद जानते ही वो और चमकने लगी थी। ये और कुछ नही वहाँ खड़े लोगों की नज़रों का फेर था क्योंकी बाँसुरी पहले भी उसी सौम्यता में लिपटी खड़ी थी जिसमें अब।
    रूपा के आश्चर्य का ठिकाना नही था कि उसके पति यानी युवराज भी सब जानते थे तो आज तक कुछ बताया क्यों नही। उसने जलती हुई आंखों से अपना सवाल युवराज पर दाग दिया, उसकी आंखें देख युवराज ने हंसते हसंते कान पकड़ लिए…


” अरे बाबा ये दोनों नही चाहते थे कि पोस्टिंग होने से पहले महल में किसी को पता चले बस इसलिये नही बताया। खासकर तुम्हें सरप्राइज देना चाहते थे। “

” आप ने भी हमें पराया कर दिया कुंवर सा? “रुपा के सवाल पर राजा ने अपने दोनो कान पकड़ लिए…

  ” भाभी सा आप भी जानती हैं कि आप मेरे लिए कितनी आदरणीय है , कितनी प्यारी हैं। असल में हम दोनों यही चाहते थे कि सब अच्छी तरह से निपट जाए, बाँसुरी को पोस्टिंग मिल जाये फिर सबसे पहले आपको ही बताएंगे लेकिन ऐसा मौका ही नही मिल पाया , और अचानक ही हम दोनों को डैड की तबियत बिगड़ने पर वापस आना पड़ गया, वरना तो युवराज भैया का प्लान आपको लेकर देहरादून आने का था, जहां बाँसुरी की पोस्टिंग है। ”

  ” झूठे कहीं के। बातें बनाना कोई आप दोनो भाइयों से सीखे। खुद अकेले अकेले हनीमून मना रहे थे और कहतें हैं आपको बुलाने का प्लान था। सोचा होगा कहीं रूपा भाभी आ गयी तो कबाब में हड्डी न बन जाएं , बस इसीलिए नही बताया ना। सब समझतें हैं हम। “

  “हा हा हा! आप तो सब समझ जातीं हैं मेरी प्यारी भाभी। अब जरा दादी साहेब से मिल आऊँ, कल रात ही उन्हें  सपने में देखा था, तभी से उनसे मिलने के लिए बेचैनी सी थी मन में।”

रूपा की लाड़ भरी नाराज़गी का मीठा सा जवाब देकर राजा दादी साहेब के कमरे की ओर बढ़ने लगा। उसे आगे जाते देख बाँसुरी भी रूपा और बाकी लोगो को प्रणाम कर उन से आज्ञा लिए आगे बढ़ गयी।
    वो लोग जा ही रहे थे कि बाँसुरी के फ़ोन पर किसी का कॉल आ गया, बाँसुरी ने फ़ोन उठाया, फ़ोन उसके ऑफिस से था। उसने जल्दी जल्दी सामने वाले को कुछ समझाया और फ़ोन रख दिया।
      राजा की सवालिया नज़रें देख बाँसुरी उसे बताने लगी __ ” ठाकुर साहब के सभी अनैतिक कामों को बंद करने और उनके सारे टेंडर कैंसिल करने के आदेश जारी किए थे। तो ठाकुर साहब कमिश्नर और आई जी के पास अर्जी देने गए थे। कल ही कमिश्नर साहब का फोन आया था, पर मैंने अपना आदेश वापस नही लिया, आज कमिश्नर ऑफिस से भी उन्हें लीगल नोटिस चला गया और साथ ही उन्हें गिरफ्तार करने पुलिस भी उनके आवास पर पहुंच गई।
    लेकिन उन्हें। पता नही कैसे पता चल गया, और वो फरार हो गए।
   अभी कमिश्नर ऑफिस से उनकी तस्वीर और बाकी जानकारी अस पास के सभी थानों और दूसरे स्टेट भेज दी गयी है।
   लेकिन इस सब की शुरुवात चूंकि कलेक्टर आदेश से हुई थी इसलिए मुझे भी एक चिट्ठी बना कर भेजनी पड़ेगी। दादी साहेब से मिल कर निकलने के बाद मैं लेटर मेल कर दूंगी।”

” मतलब ठाकुर साहब को अब जेल के अंदर डाले बिना मानेंगी नही हुकुम?

  ” बिल्कुल नही। उनकी हिम्मत कैसे हुई आप पर बुरी नज़र डालने की, वो भी एक बार नही कई बार। आप पर गोली चलवाने से लेकर..

  ” बस बस हुकुम! जो बातें दिल को कचोटती हैं उन्हें भूल जाना ही अच्छा है। ”

बाँसुरी मुस्कुरा उठी..

  ” इसलिए मैं सिर्फ आपको याद रखतीं हूँ साहेब, बाकी दुनिया भूल ही तो चुकी हूँ।”

   मुस्कुराते हुए दोनो दादी साहेब के कक्ष में पहुंच गए।
दादी सा उन दोनों को देखते ही मुस्कुरा कर उठने की कोशिश करने लगी, उनकी सहायिका ने धीरे से पकड़ कर उन्हें  उठा कर पलंग के पिछले भाग से लगा कर बैठा दिया।
      राजा दादी साहेब को देखता ही रह गया। दादी साहेब बेहद कमजोर  और बीमार नज़र आ रहीं थीं।
उन्होंने आगे बढ़ कर पैर छूते राजा और बाँसुरी को गले से लगा लिया …

  “ये क्या हाल बना रखा है आपने दादी साहब !”

  ” सब आपका किया धरा है। ना आप दोनो इस तरह रूठ कर महल से जाते और न हमारा सबका ये हाल होता। अपने पिता से मिल कर आ रहे हो न? वो भी तो तुम्हारे जाने के बाद से ही घुले जा रहे थे। और आखिर देखो बिस्तर पकड़ ही लिया।
  हम तो बस ये चाहतें हैं कि अब हम चलें जाएं ऊपर। अब हम और कुछ नही देखना चाहते बस एक इच्छा बाकी रह गई है कि आपके नन्हे से राजकुमार को बस एक नज़र देख लें , फिर आंखें मूंद लेंगे। “

  ” आप भी कैसी बातें कर रहीं हैं दादी साहब ! आंखें मूंदे आपके दुश्मन , आपको तो अभी सेंचुरी लगानी है। “

  “उड़ा लो मज़ाक ! एक तो तुम जानते हो तुम्ही में हमारी जान बसती है कुमार! और तब भी तुम हमें छोड़ कर चले गए, एक बार भी नही सोचा कि तुम्हारे बाद हमारा क्या होगा? खैर अब तुमसे क्या शिकायत करें जब तुम्हारे दादा हुकुम ने ही नही सोचा तो और कोई क्या सोचेगा…
    दादी सा का प्रलाप चलता ही रहा , उनकी नर्स ने धीमे से उन दोनों को इशारा कर दिया कि वो दोनो चाहे तो बाहर जा सकते हैं। पर राजा बाँसुरी वहीं बैठे दादी सा की बातें सुनते रहे।
    दादी सा की बातें कभी उनके अपने ज़माने में पहुंच जाती, कभी आज़ादी की लड़ाई के बारे में तो कभी दादा हुकुम द्वारा बनवाये शाही महल के बारे में बताती दादी सा कभी बच्चों सी किलकारी मार हँसने लगती कभी दुखी हो ऑंसू बहाने लगती।
   उन दोनों को ही समझ आ गया था कि दादी सा के दिमाग पर उनकी उम्र ने हस्ताक्षर कर दिए हैं। अब वो कहते कहते बातें भूलने लगीं थीं।
    कभी उन्हें लगता दादा हुकुम ज़िंदा हैं और उन्हें शाम की चाय पीने बुला रहे हैं, कभी लगता सभी बच्चे एक साथ पिकनिक पर जाने वाले हैं जिनके लिए उन्हें विदेशी तरीके के हैम सैंडविच और मिल्कशेक तैयार करवाना है और वो एलिस को आवाज़ लगाने लगती। एलिस उनके ज़माने में उनकी एंग्लोइंडियन कुक थी जो उनके पति के लिए तरह तरह के विदेशी पकवान तैयार किया करती थी।
    आखिर इतनी सारी बातें कहते कहते थक कर वो सो गयीं।
    उनके सोने के बाद नर्स ने राजा और बाँसुरी की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक तरह से निवेदन था कि अब आप लोग जाएं तो हम लोग भी आराम कर लें।
   क्योंकि उन दोनों को वहाँ बैठे दो घंटे से ऊपर हो चुके थे पर इतनी देर में न राजा ने वहाँ से उठने की जहमत की और न बाँसुरी ने।

   दादी सा के सोते ही राजा ने उठ कर उनका माथा चूमा और भारी मन से बाहर निकल गया।

बाँसुरी जानती थी कि वो दादी सा से बहुत प्यार करता है, राजा की बाहें थामे वो उसे आंखों ही में ढांढस बंधाती अपने कमरे की ओर बढ़ चली।

  *******

    समर राजा से मिलने के बाद अपने कमरे में लौटा ही था कि उसकी माँ ने उसे रोक लिया…
   आज महल में सभी खुश थे , राजा की वापसी ने सभी के चेहरों पर मुस्कन बिखेर दी थी। समर की माँ जिन्हें राजा काकी बुलाया करता था भी राजा और बाँसुरी से मिल कर लौट चुकी थीं।
  समर को वापस आया देख वो और खुश हो गयी…

” समर बेटा वो एक काम था तुमसे । पर रहने दो काम तो साधारण सा ही है, नौकर चाकर भी कर ही लेंगे। तुम जाने दो बहुत व्यस्त लग रहे हो। “

  “नही माँ आपसे बढ़ कभी कुछ ज़रूरी हुआ है क्या? काम बताइये अगर मेरा करना ज़रूरी हुआ तो मैं कर दूंगा वरना किसी से करवा लूंगा। “

  “हाँ वही तो हम कह रहे। अस्पताल वाली डाक्टरनी से हमारी दवाएं मंगवानी थी। खैर तुम रहने दो हम किसी से कह कर मंगवा लेंगे। “

” मैं ले आता हूँ। “

“नही तुम अभी अभी तो आये हो, आराम कर लो…”

  माँ की बात पूरी होने से पहले ही मैं बस यूं गया और यूँ आया कहता समर अस्पताल की ओर निकल गया।

समर अस्पताल पहुंचा, रिसेप्शन पर पता करने पर पता चला कि डॉ पिया की ड्यूटी खत्म हो चुकी है लेकिन वो ड्यूटी रूम में इस वक्त कुछ बहुत ज़रूरी काम निपटा रहीं हैं।
       वो सीढ़ियां चढ़ता ऊपर बने ड्यूटी रूम की ओर बढ़ चला। कमरे का दरवाजा हल्का खुला सा था, समर ने धीमे से नॉक किया लेकिन भीतर से कोई आहट नही हुई।
    उसने आगे बढ़ अंदर झांक कर देखा पिया ज़मीन पर बैठी किसी पेंटिंग में रंग भर रही थी। कानों में इयर फ़ोन लगाए वो गाने सुनती पूरी तल्लीनता से रंग भरने में व्यस्त थी।
   समर ठीक उसके पीछे खड़ा उसे और उसकी पेंटिंग को ही देख रहा था। पिया ने क्या बनाया था वो समझने की कोशिश कर रहा था कि पिया हाथ में रंग की डिब्बी थामे ही खड़ी हुई और जैसे ही पीछे मुड़ी सामने खड़े समर से हुई ज़ोरदार टक्कर में उसके हाथ में पकड़ रखा रंग सामने खड़े समर की सफेद शर्ट पर गिर गया और जगह जगह पर रंग के धब्बे से पड़ गए।

   पिया ने चौन्क कर अपने कान से इयर फ़ोन हटाया और रंग एक तरफ रख समर से माफी मांगने लगी। हड़बड़ी में अपने रुमाल से उस रंग को साफ करने के चक्कर में उसने रंग को और फैला दिया। समर की सफेद शर्ट पर नीले बड़े बड़े धब्बे फैल गए…

. ” सॉरी सॉरी ! वो मैंने देखा ही नही। आई एम सो सॉरी …

  ” देखा क्या आपने तो सुना भी नही। ”

  ” क्या नही सुना ? “

  ” मेरी आवाज़ ! मैंने पहले दरवाज़े के बाहर से आपको आवाज़ दी, फिर अंदर आने के बाद भी आपका नाम पुकारा लेकिन आप जाने कहाँ व्यस्त थीं। “

  पिया ने शरमा कर आंखें नीची कर लीं…

  ” वो एक्चुली आई लव पेंटिंग्स, मैं जब पेंट कर रही होती हूँ तब इतनी तल्लीन हो जातीं हूँ कि आसपास क्या घट रहा पता ही नही चलता। “

  समर ने बाजू में रखे इयर फ़ोन की तरफ देखा उसे उधर देखते देख पिया भी उधर देखने लगी, हंसते हुए झेंप कर उसने कान पकड़ लिए…

” सॉरी बाबा!! गाने भी सुन रही थी इसलिए और कुछ नही पता चला। चलिए आप फटाफट अपनी शर्ट उतार कर दीजिये मैं इसे साफ कर देती हूँ।

  पिया की बात सुन समर हँसने लगा…

” बस इसी बात का इंतेज़ार था मुझे कि तुम कब शर्ट उतारने कहोगी मुझसे। ” समर की शरारती हंसी देख पिया मुस्कुराने लगी..

” ज्यादा दिमाग चलाने की ज़रूरत नही है। मैं शर्ट साफ कर के तुरंत आपको दे दूंगी। ”

“नही कोई जल्दी नही है, आप आराम से भी दे सकती हैं… ” समर मुस्कुराते हुए अपनी कमीज के बटन खोलने लगा

“ओह गॉड ! ये तो अभी ही शर्ट उतारने लगा’ मन ही मन बुदबुदाती पिया के देखते देखते समर ने कमीज उतार कर उसके हाथ में रख दी ….
 
  ” मेरे कहने का मतलब था आप घर जाकर फिर शर्ट भिजवा देते तो मैं अच्छे से धोकर साफ कर देती,  सारे दाग भी निकल जाते।”

” ओह अच्छा ! मुझे तो लगा दाग अच्छे हैं, खैर! तो आपका ये मतलब था पर मैंने तो गलत समझ लिया। चलो कोई बात नही अब आप धोकर साफ कर दो, मैं वेट कर लेता हूँ। ”

  समर ड्यूटी रूम में रखी कैंप कॉट पर आराम से टांगे फैलाये दीवार से टिक कर बैठ गया।

  मन ही मन कुछ जोड़ घटाव करती पिया के दिमाग में कुछ चल रहा था। उसे ये डर भी था कि अस्पताल का कोई कर्मी ऊपर चला आया और बिना कमीज के उसके कमरे में समर को देख लिया तो वो क्या कहेगी। किस किस को जवाब देगी ?इसके साथ ही दिमाग मे ये बात भी थी कि बिना मशीन के अभी शर्ट हाथ से धोने पर सूखेगी नही तो समर कब तक आखिर उसके कमरे में बैठा रहेगा?
   आखिर उसे उपाय सूझ ही गया।

   वो कमीज थामे नीचे बैठ गयी , और सामने रखे रंगों से कमीज पर जगह जगह रंगों के छींटे मार उसने उस सफेद कमीज को ढेर सारे रंगों की छींट वाली कमीज बना दी। रंग भरते समय नीचे अखबार रख लेने से रंग भी जल्दी सूखते चले गए, और कुछ ही मिनटों में शर्ट एक नए कलेवर में सामने थी।
    समर की आंखों के सामने मोबाइल ज़रूर था लेकिन उसकी निगाहें पिया पर ही टिकी थी। रंगों से खेलती , कभी अपनी ज़िद्दी लटों को पीछे करती पिया उसे बेहद प्यारी लग रही थी। वो उसे देख ही रह था कि पिया ने एकदम से सर उठा कर उसे देखा और समर झेंप कर मोबाइल देखने लगा।
   मुस्कुराती हुई पिया ने शर्ट उसके सामने फैला दी

  “बताओ अब कैसी लग रही है शर्ट? ”

  ” हम्म ठीक ही हैं। मुझे तो व्हाइट पसन्द है। ”

  ” मालूम है इसलिए तो सबसे ज्यादा वाइट ही में नज़र आते हो , कभी ऑफ व्हाईट, कभी डस्क व्हाइट कभी पर्ल व्हाइट कभी प्योर व्हाइट ..

” अरे बाप रे! व्हाइट के भी इतने शेड्स होते हैं क्या ? सच मे तुम लड़कियां भी कमाल होती हो, किसी भी बात की तह तक चली जाती हो। मतलब व्हाइट के भी छप्पन शेड । हे भगवान ! कहाँ से इतना दिमाग भरा है इनके अंदर। “

   उसकी बात सुन पिया हँसने लगी

“अब जल्दी से अपनी कमीज पहन लो , कोई आ गया तो क्या सोचेगा ? “

” क्या सोचेगा पिया।”

” सोचेगा पता नही ये दोनों यहाँ कर क्या रहें हैं वो भी आप बेयर बॉडी…

  पिया अपनी बात पूरी करती झेंप गयी और समर ने मुस्कुराते हुए शर्ट पहन ली…

   “वैसे आप यहाँ आये कैसे थे?”

“अरे हाँ मैं बताना ही भूल गया। माँ की कुछ दवाएं कम थी, तुम कुछ नई दवा लिखने वाली थीं ?”

   हाँ में सर हिलाती पिया ने वहीं टेबल पर रखे अपने प्रिस्क्रिप्शन पैड पर एक दो दवाओं के नाम लिखे और साइन कर समर को थमा दिया।
   उसी समय दरवाज़े पर नॉक करती आया दीदी उन दोनों के लिए दो कप में चाय ले आयीं।

  पिया ने सामने खड़े समर की ओर चाय बढाते हुए कमरे में रखी एकमात्र कुर्सी पर उसे बैठने का इशारा किया और अपनी चाय लेकर बेड पर बैठ गयी….

“तो आखिर आ गए आज आपके हुकुम!”

” हाँ ! पर तुम्हें किसने बताया? ”

” मिसेस सिंह , आई मीन आपकी मॉम ने। आज फ़ोन किया था उन्होंने, इन्ही दवाओं के लिए। बहुत खुश लग रहीं थीं, बहुत ज्यादा। “

“हम्म !”

” आज तो आप भी बहुत खुश होंगे। “

  ” हाँ हूँ तो!”

” आपको देख कर ही लगा, वरना इतनी जल्दी मेरी कोई बात आप आसानी से मानते नही।

  समर सवालिया निगाहों से पिया को देखने लगा…

  ” और क्या ? कोई और दिन रहा होता तो आपकी शर्ट पर कलर गिराने के लिए मेरी क्लास ले ली होती!”

” हाँ और आज तुमने मेरी पूरी शर्ट ही बरबाद कर दी लेकिन मैंने कुछ नही कहा। जबकि पहले जो कलर गिरा था उसे तो मैं धुलवा कर साफ करवा सकता था लेकिन अब इस शर्ट का कुछ नही हो सकता..

” क्या मतलब ? ये अब आपके पहनने के लायक नही रही ? “

  ना में सर हिलाते हुए भी समर मुस्कुराता रहा, नाराज़ सी पिया खिड़की से बाहर देखते हुए खुद में ही बड़बड़ाने लगी…

  ” एक तो इतना आर्टिस्टिक कर दिया शर्ट को, ऊपर से इनके नखरे देखो। कैसी बोरिंग व्हाइट पहने रहतें हैं और सोचतें हैं बड़े हैंडसम लग रहे। दुनिया मे इतने रंग बने हैं पर नही इन्हें सिर्फ व्हाइट पसन्द है। “

  ” क्या कह रही हो ज़रा आवाज़ डाल के कहो तो मुझे भी सुनाई दे, खुद में बड़बड़ करोगी तो कैसे सुन पाऊंगा। ”

  समर पिया को परेशान कर रहा था कि समर के फ़ोन पर किसी का कॉल आने लगा, उसने फ़ोन उठाया और बात करते हुए बाहर निकल गया।
    बात कुछ गंभीर थी, बातें करते हुए समर सीढ़ियां उतर कर सीधे महल की ओर निकल गया..

  ” हद है ! एक बार बाय तक नही बोला और चले गए। ”

   पिया ने बाहर रखी समर की चाय की कप उठायी और अंदर ले आयी, समर इतनी हड़बड़ी में निकल गया था कि उसकी चाय कप में ही रह गयी थी। मुश्किल से दो तीन घूंट ही उसने भरे थे। पिया वापस आकर उसी कुर्सी पर बैठ गयी जिसमें समर बैठा था , और अपनी सोच में गुम पिया खिड़की से बाहर मौसम बदलते देखती हुई समर वाली कप से चाय पीने लगी।
    बाहर बादलों के आ जाने से ठंडी हवाएं बहने लगी थी और मौसम खुशगवार सा हो चला था। पिया ने एक बार कप की ओर देखा , उसका चाय का कप बेड के कॉर्नर टेबल पर रखा था, वो अब तक बैठी समर की कप से चाय पी रही थी ये ध्यान आते ही उसके चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान चली आयी।
    उसी समय कमरे के दरवाज़े पर समर वापस आ गया…

  ” वो मैं माँ की दवाएं ले जाना भूल गया था। ”

  उसके आते ही पिया चौन्क कर खड़ी हो गयी। उसके हाथ मे अपना बाहर भुला हुआ कप और बेड के किनारे पड़ा कप देख समर को सारी बातें समझ में आ गईं….
   वो मुस्कुरा कर अंदर आ गया…

” ये ले जाऊँ? ” पर्ची और दवाएं उठा कर उसने पूछा, पिया ने हाँ में सर हिला दिया…

मुस्कुराते हुए समर दवाएं उठाये बाहर निकल गया, खिड़की पर बैठी पिया समर को जाते हुए देखती रही।
   जाते जाते समर ने एक नज़र ऊपर कमरे की ओर उठायी, वहाँ बैठी पिया उसे ही देख रही थी, हाथ हिला कर उसे बाय करता समर अपनी गाड़ी की ओर बढ़ गया।।

**********

  महल में अगले दिन राजा का राज्याभिषेक होना था, लेकिन दादी साहेब की तबियत बहुत बिगड़ गयी थी। दादी सा को दौरे से पड़ने लगे थे, वो कभी सब कुछ भूल जाती , कभी पुरानी पुरानी बातें याद करने लगती, इसी सब में दिमाग पर ज़ोर पड़ने के कारण वो अचानक ही बेहोशी में चली गईं…
    डॉक्टर्स के अनुसार वो कोमा में चली गईं थीं….
महल के नियमों के अनुसार अगर महल का कोई भी सदस्य किसी गहन रोग की अवस्था में हो तो बिना उसकी सहमति के राज्याभिषेक नही हो सकता था। इसलिए अगले दिन होने वाले कार्य को पांच दिनों के लिए टाल दिया गया।
  महाराज को जल्दबाजी थी क्योंकि उनके अनुसार उनकी तबियत भी कुछ ढीली ही चल रही थी, और वो अपने सामने ही राजा को गद्दी सौंप देना चाहते थे।

  इसी सारी उहापोह में राजा भी उलझा बैठा था।
अब उसे अपनी बेचैनी का कारण समझ आने लगा था। उसे अंदर ही अंदर एक डर एक घबराहट सी थी , जैसे वो किसी अपने बहुत करीबी को खो देगा। अपनी परेशानियों में खोया वो चुपचाप अपने कमरे में बैठा अपना पुराना फैमिली एलबम देख रहा था, की बाँसुरी कमरे में चली आयी…

” क्या हुआ साहेब! बड़े गुमसुम से लग रहे आप?

  ” कुछ नही बाँसुरी ! आओ बैठो यहाँ। ”

   ” एक बात बतानी थी साहेब! आप तो जानते ही हैं कि मैंने ठाकुर साहब को नोटिस भेजा था, उसी सब आधार पर जब पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने गयी तब तक वो वहाँ से फरार हो चुके थे। अभी पुलिस उन्हें ढूंढने में लगी है लेकिन उनका कोई अता पता नही है।”

” हम्म !”

  राजा के इस छोटे से जवाब से ही उसे समझ में आ गया कि वो कुछ गहरी चोट लिए बैठा है वरना उसकी बताई किसी भी बात पर इतना ठंडा सा जवाब नही देता। वो उसके पास उसके कंधे पर सिर टिका कर बैठ गयी..

” बहुत परेशान लग रहे साहब!”

राजा चुप ही था, शायद वो भी अपनी घबराहट को शब्द नही दे पा रहा था। ऐसे समय मे अक्सर वो कुछ देर के लिए खुद में गुम हो जाया करता था, आंखों से लगातार खुले आसमान की ओर ताकते और होंठों में कुछ बुदबुदाते राजा को देख बाँसुरी समझ गयी कि वो अभी अपने भगवान से बातें करने में लगा है।
   उसके साथ चुपचाप बैठी बाँसुरी उसके साथ बैठी उसका इंतेज़ार करती रही।

   फ़ोन की रिंग बजने से वो अपने खयालों से बाहर आ गयी। उसने देखा फ़ोन शेखर का था…

” कैसे हैं शेखर जी? “

” ठीक ही हूँ, आप कैसी हैं? आपके लिए एक शानदार खबर है। वैसे मुझे पता चल गया है कि आप हमारे शहर वापस आ चुकीं हैं।

” हाँ अभी छुट्टी पर हूँ। आप बताइए क्या खबर है?

” राजा साहब और आपसे मिलने पर ही बताऊंगा। “

बाँसुरी ने  राजा की तरफ देखा, फ़ोन की आवाज़ से उसकी विचार श्रृंखला भी टूट गयी थी, वो भी बाँसुरी की तरफ ही देख रहा था, उससे इशारों में अनुमति लेकर बाँसुरी ने शेखर को अगली सुबह महल में बुला लिया, हालांकि महल के जैसे हालात थे और जिस तरह से दादी सा और महाराज की तबियत थी, महल में भी सभी डरे सहमे से थे लेकिन महल पर आवाजाही तो नही रोकी जा सकती थी, यही सोच कर राजा ने भी उसे आने की इजाजत दे दी।
    शेखर से बात कर रखने के बाद बाँसुरी राजा का हाथ थामे बैठी रही,वो भी उसके मन में चलते द्वंद को समझ रही थी। बिना कुछ कहे वो चुप बैठी रही…

” बाँसुरी ! ”

” हाँ कहिये। ”

” अपना ध्यान रखा करो। आजकल जाने क्यों मुझे अंदर से बहुत डर सा लगने लगा है कि जैसे मैं किसी करीबी को खो न दूँ । हालांकि जानता हूँ दादी सा को ऐसी हालत में देखने के कारण या डैड की बातें सुनने के कारण ही ऐसा लग रहा है, लेकिन क्या करूँ  एक अजीब सा डर बैठ गया है मन में।”

” डरिये घबराइए मत, जो होना है वो तो होकर ही रहेगा, हमारे सोचने से कुछ बदलेगा नही साहब। इसलिए वर्तमान में रहिए,भविष्य मे क्या होगा  ये सोच सोच कर दुखी मत रहिये।”

” हाँ शायद तुम ठीक कह रही हो, मुझे सोचना कम चाहिए। ”

बाँसुरी ने कॉफी का कप राजा की ओर बढ़ाया और खुद अपना कप लिए उसके पास सरक आयी।
  कहने को उसने राजा से कह तो दिया लेकिन खुद उसके मन को जो डर की छूत लग गयी थी उसका वो क्या करे उसकी समझ से परे था।

   रात का खाना महल के नियमों से हुआ तो नीचे ही, सभी एक साथ थे, बस दादी सा और महाराज की कुर्सियां खाली थी, लेकिन खाया किसी से नही जा रहा था।
   आज लगभग पूरा परिवार साथ था, पिंकी रतन के सामने ही आदित्य बैठा था। आदित्य के बारे में जानने के बाद रतन तो आदित्य से बड़ी जिंदादिली से मिला लेकिन पिंकी ने अपना मुहँ फेर लिया था।
      हालांकि पिंकी की माँ भी अपने शांत सौम्य स्वभाव के बावजूद आदित्य को इतनी जल्दी मन से नही अपना पा रही थी, लेकिन उन्होंने अपनी नाराजगी सभी के सामने दिखाई भी नही थी। आदित्य राजा के बाजू में बैठा धीरे धीरे खा रहा था। युवराज उसका विशेष ध्यान रखे था। सभी शांत बैठे थे जैसे खाने का सिर्फ अभिनय करना हो कि उस शांत माहौल में आदित्य के मोबाइल की घंटी ने सभी का ध्यान तोड़ दिया…

  आदित्य ने देखा फ़ोन केसर का था, उसने काट दिया। काटते ही फिर केसर का कॉल आने लगा । आखिर चार बार फ़ोन काटने के बाद वो धीरे से फ़ोन उठाये  कमरे से बाहर निकल गया…
     केसर की घबराई सी आवाज़ उसके कानों में पड़ी.

” आदित्य प्लीज़ हमारी बात सुने बिना फ़ोन मत काटना..”

” जल्दी बोलो , क्या कहना चाहती हो।

“हमारी जान खतरे में है,.. हम सारी बात तुमसे कहना चाहतें हैं ,ध्यान से सुनना।
   हमारे साथ साथ अजातशत्रु की भी…

  केसर इसके आगे अपनी बात पूरी नही कर पाई, वो जहाँ से बात कर रही थी, वहाँ हो रही तूफान और बारिश में वैसे ही उसकी आवाज़ ठीक से सुनाई नही पड़ रही थी , और उस पर बात आधी ही रह गयी और उसका फ़ोन कट गया।
   आदित्य ने वापस डायल किया लेकिन केसर का नम्बर बंद आता देख वो फ़ोन जेब में डाले वहीं चहलकदमी करने लगा ।

  वो वहाँ  केसर की बातों पर गौर करने की कोशिश कर रहा था, उसने अपनी जान खतरे में बताई और साथ ही राजा अजातशत्रु की भी?
  अगर केसर की जान खतरे में है तो वो यहाँ बैठे कैसे उसे बचा सकता है?
   उसने तुरंत अपने सुरक्षा कर्मियों की टीम को फ़ोन लगाया और केसर का नम्बर ट्रेस करने बोल उसको ढूंढ निकालने की आज्ञा दे दी, उसके पास भी सुरक्षा गार्ड्स की लंबी चौड़ी फौज थी, और सभी आदित्य के एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार थे।
   उन सब को दौड़ाने के बाद भी उसके मन में अभी भी हलचल मची थी कि किसी तरह केसर की जान बच जाए, आखिर इतनी सारी राज़ की बातें बताने के बाद अब और कौन सी ऐसी बात बची रह गयी थी जो वो उसे बताना चाह रही थी……


क्रमशः


aparna……




aparna.. 

       



       

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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