जीवनसाथी-98




जीवनसाथी 98



उन सब को दौड़ाने के बाद भी उसके मन में अभी भी हलचल मची थी कि किसी तरह केसर की जान बच जाए, आखिर इतनी सारी राज़ की बातें बताने के बाद अब और कौन सी ऐसी बात बची रह गयी थी जो वो उसे बताना चाह रही थी……

    आदित्य ने फ़ोन वापस रखा और कमरे के अंदर चला गया। अब तक सभी चुपचाप बैठे खाना खा रहे थे। पिंकी का बेटा पीछे सहायिका की गोद में खेल रहा था,  आदित्य को देखते ही उसने जैसे उसे पहचान लिया हो ऐसे आदित्य की गोद में जाने को मचलने लगा।
      आदित्य ने बच्चे को गोद में लेने  से पहले एक नज़र पिंकी पर डाली, पर वो नाराज़गी से अपनी प्लेट ही देख रही थी, रतन ने मुस्कुरा कर इशारा दिया तब जाकर आदित्य ने बच्चे को गोद मे लेकर खिलाना शुरू कर दिया।

     आदित्य बच्चे के साथ खेल तो रहा था लेकिन उसके दिमाग मे केसर और केसर की बातें ही घूम रहीं थीं।

********

   दादी साहब की तबियत में कुछ खास सुधार नही था, वो अपनी बेहोशी में गुम थीं और डॉक्टर्स ये बताने में असमर्थ थे कि वो कब तक जाग पाएंगी।
   राजमहल के सभी पंडित गुरुजन साथ बैठ कर राजा की कुंडली के अनुसार राज्याभिषेक के शुभ मुहूर्त पर चर्चा कर रहे थे।
    जैसी महल और दादी साहब की स्थिति थी , ऐसे में कब और कैसे निर्णय लिया जाए ये भी विचारणीय प्रश्न था। उसके लिए भी सभी आपस मे परामर्श कर रहे थे।
   महाराज ने सिर्फ पांच दिनों का ही समय दिया था और वो चाह रहे थे कि उसके बाद राजा गद्दी पर बैठ जाये, जिससे उनका तनाव कुछ कम हो पाए।

    राजा दीवानखाने में युवराज भैया और बाकी लोगों के साथ था कि तभी बाहर से एक सहायक चला आया। आते ही सबको प्रणाम कर उसने बताया कि कोई शेखर साहब राजा से मिलना चाहतें हैं।

शेखर को अपने ऑफिस की तरफ लेकर आने का निर्देश देकर राजा ने एक दूसरे सहायक को बाँसुरी को बुलाने भेजा और खुद ऑफ़िस की तरफ निकल गया।

    ऑफिस में राजा का इंतज़ार करता बैठा शेखर राजा को आया देख अपनी जगह पर खड़ा हो गया…

” अरे जिलाधीश महोदय बैठिए बैठिए, क्या लेंगे आप? चाय या कॉफी या कुछ और? “”

” आपका थोड़ा सा वक्त चाहिए था राजा साहेब!”

” जी बिल्कुल ! पर प्लीज़ इतना फॉर्मल मत रहिये। ”

” जी शुक्रिया!” राजा से शेखर पहले भी मिल चुका था लेकिन महल के तामझाम के बीच राजा अपने पूरे रुतबे के साथ ऐसा जंचता था कि किसी की भी आंखें उसके व्यक्तित्व के सामने झुक जाएं।
   उन दोनों की बातों के बीच बाँसुरी भी चली आयी..

” कैसे हैं आप शेखर जी!”

अचानक से बाँसुरी को सामने देख और उसकी आवाज़ सुन वो कोई जवाब नही दे पाया। बस हाँ में सर हिला कर बैठा रह गया।

  ” हम दोनों भी सोच रहे थे कि आपसे मिलने आपके ऑफ़िस आएंगे अच्छा हुआ आप ही चले आये। “

  “, जी असल  में कुछ ज़रूरी बातें थी जिसके लिए आया था।
    अब मैं तो ठहरा प्रशासन का आदमी , मुझे सरकार और उसके हुकुम बजाने ही हैं। मैं जो बताने आया हूँ वो ज़रा ध्यान से सुनियेगा। मैं आपको किसी भी तरह से डराने नही आया लेकिन जो भी अंदर की बातें पता चली है,मुझे लगा वो आपको भी बता दूं। ये सारी बातें आपको भी पता होनी चाहिए जिससे आपके पीछे हो रहे षडयंत्रों के बारे में आप जान सकें और पहले से सतर्क रहें।
       बात ये है राजा साहब की आप और आपका नाम आपकी रियासत में भगवान की तरह पूजा जाता है। पहली बार आपसे मिलने पर मुझे भी नहीं पता था कि यहाँ आपको इस कदर माना जाता है।
    प्रभावित तो आपसे पहली बार मिलने पर ही मैं हो गया था लेकिन आपका वर्चस्व और आपकी शख्सियत क्या है वो यहाँ आने पर मालूम चली। ज़मीनी तौर पर कई काम हम लोगों को गांवों के बीच आम लोगों के साथ मिल कर करना होता है , वहाँ मैंने करीब से आपके नाम की ताकत को देखा है। महसूस किया है।
     सबसे पहले तो आपके इन ढेर सारे कामों के लिए आपको सैल्यूट करता हूँ।
   
     राजा साहब आपकी पॉपुलैरिटी से चिढ़ कर या जलन के कारण जो भी कह लीजिए लेकिन अब सरकार आपकी राजशाही पूरी तरह से खत्म करने की तैयारी में है।
                 ये अंदर की बात है, लेकिन मेरे भी कुछ विश्वासपात्र हैं जिन्होंने सब बातें पता कर बतायीं हैं। असल में आपकी वापसी से आपकी रियासत की जनता खुश ही नही बहुत खुश है। पहले भी रियासत के लोग अपने हर काम के लिए आपके पास अर्जी लगा देते थे जिसे सरकार से लड़ झगड़ कर या अपने बूते पर आप करवा लिया करते थे। अब तक ये लोग आपके पारिवारिक झगड़ो के कारण निश्चिंत थे लेकिन आपकी घर वापसी इनके गले का फंदा बनती जा रही है। माफ कीजिये आपके पारिवारिक मामलों में बोलने की जुर्रत की मैंने लेकिन जो बाहर माहौल चल रहा है वो आपको बताना भी तो ज़रूरी है।
     सरकार के लोग आपका पत्ता काटने की तैयारी में बैठे हैं। ये लोग पहले तो एक मोटी रकम के बदले आपसे रियासत और उसकी पद प्रतिष्ठा खरीदने की कोशिश करने वाले हैं, पर अगर आप इस बात के लिए तैयार नही हुए तो किसी भी तरह के गलत आरोप लगा कर और पुराने  कायदों की नियमावली दिखा कर आपको आपकी जगह से हटा देंगे।
   क्योंकि अब राजा की जगह पर आपका बना रहना इन लोगों के लिए सरदर्द बनता जा रहा है।
   इन लोगो का मानना है कि आप खुद अपनी छोटी सी सरकार चला रहे हैं। आसपास के गांवों में इनमें से कोई सुविधा नही है जो आपकी रियासत के लोगों को मिली हुई है।
  आपकी रियासत का हर बच्चा स्कूल जाता है, लगभग हर एक परिवार के पास अपनी रोजी रोटी का सुप्रबन्ध है, घरेलू औरतें भी पढ़ी लिखी हैं, अपने हक और कर्तव्य जानती हैं। रियासत के लिए आपने सर्वसुविधायुक्त अस्पताल खोल रखा है। बैंक की ब्रांच से लेकर , स्कूल कॉलेज सब कुछ आपकी रियासत में है। गांव में बिना ज़रूरत न तो बिजली की कटौती होती है न पानी की किल्लत। इसलिए तो आपकी जनता आपसे इतना प्यार करती है कि बात बात पर आपकी तरफ से सरकार के खिलाफ खड़ी हो जाती है।
    आपने महल छोड़ने से पहले शायद मेडिकल, इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने का प्रस्ताव भी सरकार के पास भेजा था जो अब तक वहीं अटका पड़ा है। बाँसुरी ने एक बार पहले मुझे बताया था। मैंने अभी उस प्रस्ताव को निकलवा कर देखा , उसे निकलवाने के चक्कर मे इतनी सारी बातें मुझे पता चली।
  आपका ये यूनिवर्सिटी प्रोजेक्ट बहुत शानदार है राजा साहब! अगर ये सफल हो गया तो आसपास के ऐसे विद्यार्थियों को इससे बहुत फायदा मिलेगा जो पैसों आदि की कमी से बाहर कहीं दूर पढ़ने नही जा पाते थे। और इसलिए इस प्रोजेक्ट पर अड़ंगा लगाया जा रहा है।
     असलियत ये है कि सरकार आपसे डरी हुई है कि कहीं इसी रफ्तार से आप काम करते रहे तो पूरा हिंदुस्तान आपको राजा न मान ले। लोकतंत्र की समाप्ति न हो जाये, हालांकि ऐसा होना असम्भव है लेकिन फिर भी इनकी सरकार के पैरेलल राजा अजातशत्रु अपनी एक सरकार चला रहे हैं यही सोच उन लोगो की नींद उड़ाए हुए है।

” ये तो बहुत चिंता की बात है। ” बाँसुरी की चिंता देख कर भी राजा के चेहरे पर चिंता की कोई लकीर नही थी…

” रियासत की जनता की मदद करने के लिए मुझे राजशाही की ज़रूरत है भी नही। दिल में जज़्बा होना ही काफी है क्यों बाँसुरी ?”

” बात तो सही है आपकी लेकिन सरकार ऐसा कैसे कर सकती है? आज तक आपने हमेशा सबके बारे में सोचा, सबका भला किया और आज ये लोग आपकी मदद करने की जगह आपकी गद्दी छीनने की सोच रहें हैं। इसका कोई उपाय तो होना चाहिए। शेखर जी आप क्या सोचतें हैं इस बारे में। ”
 
   शेखर ने तो पहले ही उपाय सोच रखा था, वो असल में समस्या नही बल्कि उपाय ही बताने आया था…
   बाँसुरी की बात पर सहमति में सर हिलाते वो राजा की ओर देख अपनी बात कहने लगा…

” मेरे पास इसका एक उपाय है राजा साहब! अगर आप इजाज़त दें तो मैं कहूँ ?”

” अरे शेखर जी इतना फॉर्मल क्यों हो रहे है आप? कहिये जो भी कहना चाहतें हैं।”

” सरकार आपका राजतंत्र खत्म करना चाहती है , क्योंकि उन्हें आपसे डर है। आप एक काम क्यों नही करते, कि राजतंत्र छोड़िए और खुद सरकार में आ जाइये। “

   बाँसुरी शेखर का चेहरा देखने लगी…. उसे देखते हुए शेखर वापस बोलने लगा…

” मैंने एक बार पहले भी ये प्रस्ताव रखा था कि आप चुनाव लड़िये। आज भी यही प्रस्ताव लेकर आया हूँ। इत्तेफाक से चुनाव सर पर हैं और इसलिए सभी राजनैतिक पार्टियां अपने अपने प्रचार में लगी हैं। अब पक्ष हो या विपक्ष जो भी पार्टी इस क्षेत्र में प्रचार के लिए जाती है उनसे ज्यादा जयकारा तो आपके नाम का लगता है , ये भी एक वजह है उन लोगों की आपके खिलाफ होने की।
     तो मेरा ये कहना है कि वो लोग आपको हटाये इसके पहले अपनी पार्टी बना कर आप चुनाव लड़े और पक्ष विपक्ष दोनो का ही सफाया कर दें।

   शेखर की बात पर राजा विचार कर रहा था कि बाँसुरी बोल पड़ी…

” साहब मैं चाहतीं हूँ एक बार युवराज भैया और समर को भी यहाँ बुला लीजिये। उनके सामने भी ये बात हो जाए , सब क्या सोचतें हैं ये जानना भी ज़रूरी हैं।

  राजा के हाँ में इशारा करते ही बाँसुरी ने सहायक से कह कर उन दोनों को बुलवा भेजा। उन दोनों ने भी पूरी बात सुन कर शेखर की बात पर सहमति दे दी।।

  ” लेकिन भैया मैं ये सोच रहा हूँ, कि मैं किस पार्टी से चुनाव लड़ूंगा? मैं किसी पार्टी का कार्यकर्ता नही हूँ, आखिर मुझे कोई भी पार्टी टिकट क्यों देगी

” आपकी लोकप्रियता इतनी अधिक है हुकुम कि अगर आप ये कहेंगे कि आप चुनाव लड़ना चाहतें हैं तो पार्टियां आपको खुद बुला कर टिकट देंगी। वैसे राष्ट्रपति द्वारा मनोनित राज्यसभा सदस्य तो आप अब भी बन सकतें हैं लेकिन आपके काम करने का तरीका जैसा है आपको लोकसभा की सीट के लिए ही चुनाव लड़ना चाहिए। ”

  समर की इस बात का समर्थन युवराज ने भी किया…

” लेकिन कुमार हम चाहतें हैं तुम खुद अपनी पार्टी बनाओ। “

” लेकिन भैया इतनी जल्दी पार्टी बनाना उसे अप्रूव कराना ये सब कहाँ सम्भव है?”

” हुकुम आपके नाम से एक पंजीकृत पार्टी है। कॉलेज के समय पर आपने एक “युवा जनशक्ति” पार्टी बनाई थी, उस वक्त जाने क्या सोच कर आप और आपके कुछ मित्रों ने उसे पंजीकृत भी करवा लिया था। अब भी उस पार्टी से आपके कई मित्र जुड़े हुए हैं जो आसपास के गांवों में ज़रूरतमंदों के लिए काम करतें हैं। आपने खुद उस पार्टी के फंड के लिए सालाना नियमित रूप से राशि तय कर रखी थी, जो आज भी  भेजी जाती है। “

” अरे हाँ मैं तो भूल ही गया था उस पार्टी के बारे में।”

राजा की बात पूरी होने पर शेखर बोल उठा…

” अरे वाह ! ये तो अच्छी बात है तब तो फिर राजा साहब उसी पार्टी से चुनाव लड़िये । “

” शेखर सही कह रहे है कुमार! आखिर आज नही भी किया गया तो कभी न कभी तो हमारा राजतंत्र खत्म हो ही जायेगा। और दूसरी बात अभी भी तुम कई ऐसे काम करना चाहते हो जिसमें तुम्हें सरकार की मंजूरी की आवश्यकता होती है और उसी वजह से तुम्हारा वो काम अटक जाता है।
    जैसा कि शेखर कह रहे हैं अगर वाकई सरकार तुमसे नाराज़ हो गयी तो इसमें हमारी रियासत का भी नुकसान होगा।”

” युवराज सा बिल्कुल सही कह रहे हैं हुकुम। आप खुद देखिए आपने मेडिकल कॉलेज यूनिवर्सिटी का जो प्रस्ताव बना कर भेजा था वो पूरी तरह सही होने के बावजूद पांच साल से अटका पड़ा है। हर बार वहाँ से कोई न कोई शिकायत या समस्या आ ही जाती है , और इसी अड़ंगे के कारण हम उस प्रोजेक्ट को शुरू नही कर पा रहे।
    एक दो बार नही कई बार उस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए मुझे रिश्वत तक देनी पड़ी पर फिर वही ढाक के तीन पात वाली बात हो जाती है।
    जब अगली बार जाओ तो पैसे खा कर डकार चुके ऑफिसर की बदली हो चुकी होती है, और नया ऑफिसर अपना मुहँ खोले बैठा होता है।
     शेखर जी की बात बिल्कुल सहीं हैं, अगर हम खुद सरकार में होते तो क्या उन लोगों की इतनी जुर्रत होती?
    हुकुम अब आप अधिक मत सोचिये, बस हाँ कह दीजिये फिर कहाँ से किसे टिकट देनी है, किन किन को चुनाव में खड़ा करना है ये सब मैं , युवराज भैया, प्रेम देख लेंगे। और अब तो कलेक्टर साहब का भी साथ है। ”


” राजा साहब प्लीज़ हम सब की बात मान लीजिए। क्योंकि यही एक रास्ता नज़र आ रहा है। बात को समझिए, आप जिस ढंग से सामाजिक कार्य करतें हैं और आगे करना चाहतें हैं,  अगर आप सरकार में आ गए तभी आप अपने कार्यों में पूरी तरह सफल हो पाएंगे। वरना इन लोगों के षड्यंत्र तो अंदर अंदर चल ही रहे हैं।
    

  राजा अब भी शेखर की बात मानने को तैयार नही था, लेकिन शेखर समर और युवराज भैया के बार बार समझाने पर वो उन लोगों की बात मान ही गया।

  राजा की रज़ामन्दी मिलते ही समर आगे की तैयारियों के लिए शेखर के साथ निकल गया। शेखर ने जाने से पहले एक नज़र बाँसुरी को देखा…

” कब तक कि छुट्टी पर हो बाँसुरी?”

” पांच दिनों की ही ली थी पहले, लेकिन पांच दिन तो पलक झपकते ही बीत गए। अभी दादी साहेब की तबियत भी बिगड़ गयी है इसलिए छुट्टी बढ़ा ली है मैंने। “

  हां में सर हिला कर शेखर उन सभी से इजाज़त ले समर के साथ बाहर निकल गया।
   समर का काम बढ़ गया था। उसे अब राजा के उन सभी मित्रों से संपर्क करना था जो अब भी उस पार्टी से जुड़े हुए थे। इसके अलावा पार्टी के चुनाव के लायक बनने की जो भी तैयारियां थी वो सब भी शुरू करनी थी।
    इसके अलावा पांच दिन बीत चुके थे, इसी से अगले दिन राज्याभिषेक भी प्रस्तावित था। उसकी तैयारियां महल में चल ही रहीं थी।
  
     राज्याभिषेक के लिए ग्यारह पंडित पूजा पाठ और अभिषेक की तैयारियों में थे। राज्याभिषेक के बाद होने वाला जलसा फिलहाल दादी साहेब की तबियत के कारण नही किया जाना था लेकिन जनता के प्रिय राजा अजातशत्रु के गद्दी पर वापस बैठने की खुशी जनता के लिए इतनी बड़ी थी कि सभी इस ऐतिहासिक क्षण के गवाह बनना चाहते थे। जनता का उत्साह देख कर ही महाराज ने राज्याभिषेक के बाद राजा का जनदर्शन का कार्यक्रम भी रखवा दिया था।

    ग्यारह पंडितों में से कुछ राजा की कुंडली के अनुसार शुभ मुहूर्त देखना चाहते थे लेकिन महाराज इन सब औपचारिकताओं के लिए भी रुकना नही चाह रहे थे। लेकिन फिर रानी माँ की समझाइश पर वो भी मान गए।
     पंडितों ने विघ्नहर्ता गणेश का नाम लेकर पत्रा देखना शुरू कर दिया ….
   एक बार फिर दूसरी बार देखने पर भी कुंडली में लिखी बातें पढ़ पंडित जी के माथे पर शिकन चली आयी।
   उन्होंने अपने सहयोगियों से चर्चा शुरू की और एक बार फिर कुंडली बाँचने में लग गए।
  सभी तरह के जोड़ घटाव के बाद भी कुंडली में जो लिखा था बदला नही जा सकता था, उनके चेहरे पर खींची चिंता की लकीरें देख रानी माँ ने पूछ ही लिया..

” क्या बात है पंडित जी?आप कुछ चिंतित से लग रहे है ? कुमार की कुंडली में सब ठीक है ना? “

” जी रानी साहेब ,बात ये है …”

पंडित जी भी एकाएक अपनी बात कहने की हिम्मत नही कर पा रहे थे, उनका असमंजस देख रानी माँ ने उन्हें समझाते हुए अपनी बात कहनी जारी रखी..

” पंडित जी ऐसे अधूरी बात छोड़ कर हम सभी को डराइये मत। आप साफ शब्दों में कहिये की बात क्या है?

  पांच पंडितों के अलावा वहाँ महाराज और रानी माँ ही थे।
   पंडित जी ने अपनी सारी हिम्मत समेट कर आखिर अपने सामने फैली रखी कुंडली कहनी शुरू कर दी..

” रानी साहेब ! क्षमा कीजियेगा लेकिन कुमार की कुंडली में इस वक्त मारकेश योग दिखा रहा है। “

” इसका मतलब क्या होता है? हम समझे नही।।”


” मारकेश का मतलब होता है ,मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्ट!”

  पंडित जी की बात सुन महाराज जो अभी तक अधलेटे से उनकी सारी बातें सुन रहे थे, तमक कर सीधे बैठ गए…

” ये क्या कह रहे हैं आप पंडित जी? होश में तो हैं आप? कुमार की अभी उम्र ही क्या है? ऐसा नही हो सकता। मरना तो हमें है, उसे कुछ नही होना चाहिए। आपकी कुंडली क्या हमेशा ऐसे ही उलट पुलट ज्ञान देती है? कभी कोई अच्छी बात भी कहती है या बस यही ऊलजलूल।
   नही अजातशत्रु को कुछ नही हो सकता। हमारा बेटा बचपन से ही जिस स्नेह का हकदार था वो हमसे उसे कभी मिला ही नही। युवराज को कम से कम उसकी माँ का स्नेह तो मिल पाया कुमार को तो वो भी नही मिला।
   सारी जिंदगी उसने संघर्ष ही तो किया है। और अब जब उसके संघर्षो पर विराम लगने का समय आया , तब आपका यह गृहविज्ञान उसकी कुंडली में मारकेश दिखा रहा है।
  ये तो सरासर गलत है, ईश्वर का अन्याय है ये। हम ऐसा नही होने देंगे।
  कुंडली में ऐसा लिखा है तो इसका कोई काट भी तो होगा? आप वह देखिए न,बैठे क्या हैं!
   हमारे पुत्र राजा अजातशत्रु को कुछ नही हो सकता। हे ईश्वर ! क्या क्या सोच कर हमने उसका नाम अजातशत्रु रखा था, और विडंबना देखो उसी के शत्रुओं की कमी नही है।
   हमने भी तो अपनी युवावस्था में अपने बच्चों के साथ अन्याय ही किया है। ना उन्हें वो स्नेह दे सके और न ही वक्त।
अब आज जब हम खुद अशक्त पड़े हैं तब हमें अपने कार्यों का लेखाजोखा स्मरण हो रहा है और स्मरण मात्र से ही हम बार बार सोचने पर विवश हो रहे है कि हमने अपने बच्चों के साथ ऐसा क्योँ किया।
  
   महाराज के मन में वर्षों से जमी बर्फ जैसे राजा के प्रेम से पिघलने लगी थी। उन्हें अपना जीवन नज़र आ रहा था कि कैसे अपनी दूसरी रानी के मोह में उन्होंने जाने कितनी बार युवराज की माँ का अनादर किया,जाने कितनी ही बार राजा और युवराज के बचपन से खिलवाड़ किया। उन्होंने उनके बचपन को कभी एक स्नेहसिक्त छांव दी ही कहाँ?

  कहतें हैं बच्चे माता पिता का प्रतिरूप होते हैं। जैसा स्नेह और ममता बचपन में उन पर उनके माता पिता लुटाते हैं उसी का प्रतिदान बच्चे बड़े होने और उन्हें लौटातें हैं।
 
    लेकिन युवराज की माँ के दिये संस्कार ही तो थे कि उनके द्वारा किये इतने अन्यायों के बाद भी उनके बच्चों के मन मे उनके लिए अब भी स्नेह आदर मौजूद था।
   महाराज के मन में चलते विचारों से रानी माँ भी विलग नही थीं। वो भी उतनी ही विचलित थीं। उन्होंने भी राजा और युवराज का बचपन खराब ही किया था। सिर्फ बचपन ही नहीं उन्होने तो……..
    अपने ही विचारों को पूरी तरह सोचने में भी रानी माँ को डर सा लग गया कि कहीं कोई उनका मन पढ़ न ले। और अगर किसी ने उनका मन पढ़ लिया तो फिर महाराज , युवराज, अजातशत्रु इनमें से कोई भी उन्हें माफ कर पायेगा?
    शायद नही। उनका पाप था भी तो इतना बड़ा।

   उन्होंने हर कदम पर विराज और कुमार में प्रतिद्वंदिता रखी लेकिन आज जब उनके अपने खून ने उन्हें कई बार तिरस्कृत किया तब उन्हें युवराज और अजातशत्रु की कद्र महसूस हो रही थी।

     अपने मन में चलते द्वंद से दोनो ही लोग परेशान थे।आखिर रानी माँ ने ही पंडित जी के सामने सवाल रखा….

” इसका कोई उपाय तो होगा पंडित जी? “

” जी मारकेश टाला नही जा सकता रानी साहेब, लेकिन एक काम किया जा सकता है कि ऐसी सारी परिस्थितियों का निर्माण किया जाए जिससे राजा अजातशत्रु सुरक्षित रहें।
   हमारा कहना है कि जब राज्याभिषेक पांच दिन टाल दिया तो तीन चार दिन और आगे कर दीजिए। अभी दो चार दिनों का समय अधिक कष्टप्रद है। तो इस समय में राज्याभिषेक न कर के हम सब महामृत्युंजय जाप अनुष्ठान में लग जातें हैं।
  बाहर किसी से आप लोगों को कुछ कहने की आवश्यकता भी नही है।
सबको यही लगेगा कि अभिषेक से पहले की पूजा अर्चना है।
   चार दिन के अनुष्ठान के बाद पांचवे दिन राजा अजातशत्रु का राज्याभिषेक किया जाएगा, तब तक इस सारी पूजा से कुंडली का प्रभाव कुछ हद तक ही सही कम तो हो जाएगा।
   एक बार ये सप्ताह निकल गया फिर थोड़ी चिंता कम हो जाएगी।

  पंडित जी की बातों से हैरान परेशान महाराज और रानी माँ के पास अब कोई चारा भी नही बचा था।
उन्होंने राज्याभिषेक वापस चार पांच दिन आगे बढ़ाने का संदेश युवराज के पास भिजवा दिया था।
   महाराज स्वयम भी पूजा पाठ का हिस्सा बनना चाहते थे इसलिए पंडित जी की बताई सभी बातों का अनुसरण करते हुए वो भी तैयार थे, अगले दिन से शुरू होने वाली पूजा का हिस्सा बनने को।
    
    कुछ घंटों पहले जो तैयारियां राज्याभिषेक की होने जा रहीं थी वहीं अब महामृत्युंजय जाप की होने लगी।
महल द्वारा फिर से घोषणा करवा दी गयी कि अभिषेक कुछ पांच दिनों के लिए आगे सरका दिया गया है।


   *********

   समर और शेखर के जाते ही युवराज भैया भी महाराज के बुलावे पर उनके कक्ष की ओर बढ़ चले। उनके जाते ही राजा और बाँसुरी भी ऑफिस से बाहर निकल गए।

     रात के खाने का वक्त हो चला था। सभी का एक साथ वहाँ मौजूद होना आवश्यक होने पर भी अभी राजमहल के नियमों में कुछ छूट हो गयी थी।
    खाने की टेबल पर राजा बाँसुरी के अलावा पिंकी रतन, पिंकी के माता पिता के अलावा फूफू साहब का परिवार ही मौजूद था।
    युवराज रातों रात पार्टी के काम से समर के साथ दिल्ली रवाना हो गया था।
    सभी कुछ न कुछ हल्की फुल्की बातों में लगे थे कि आदित्य भी वहीं चला आया। उसे आते देख अब तक चहक कर बातें करती पिंकी चुप हो गयी। उसे एक नज़र देख आदित्य ने एक किनारे की कुर्सी खींची और चुपचाप बैठ गया।
     आदित्य के मन में जैसा कोलाहल मचा था केसर को लेकर, वो बाकी किसी बात पर ध्यान ही नही दे पा रहा था।

    वो आकर बैठा ही था कि उसके सुरक्षा कर्मी का फ़ोन आ गया।
  वो फ़ोन लिए बाहर निकल गया….

” हाँ कहो। केसर का कोई पता चला?”

“जी सरकार ! केसर सा हमें मिल गयी लेकिन जिस हालत में मिली है उनका बचना मुश्किल लग रहा है।”

” क्या बात कर रहे हो? कहाँ है इस वक्त वो? “

“जी उन्हें आपके ऑफिस गोडाउन में छुपा रखा है। हम लोग जब उनकी तलाश में निकले तब पूरे शहर और आसपास का चप्पा चप्पा ढूंढने पर भी जब वो नही मिली तब अपने मुखबिरों से पता करवाया , तब किसी के बताने पर पता चला कि पहाड़ी से शहर की तरफ के रास्ते पर एक कार का कुछ देर पहले भयानक एक्सीडेंट हुआ है।
  हम लोग वहां पहुंचे तो देखा कार केसर बाई सा की ही थी।
  वो शायद शहर की ओर भागना चाह रही थी लेकिन किसी बड़ी गाड़ी की टक्कर से उनकी कार पहाड़ी से पलटती खाई में गिरी। जाने कितने घण्टे उन्होंने वहीं गुज़ार दिए होंगे। जब हम लोग वहाँ पहुंचे उनकी सांस चल रहीं थीं।
   हमनें उन्हें तुरंत उस गाड़ी से निकाला और अपनी गाड़ी में डाल कर ऑफिस के लिए निकल गये। जाते जाते उनकी गाड़ी को आग के सुपुर्द कर गए जिससे इन्हें नुकसान पहुंचाने वाले को ये लगे कि गाड़ी के साथ साथ वो भी नही बची।
   गाड़ी का एक्सीडेंट देख कर समझ आ गया था कि किसी ने जानबूझ कर गलत ओवरटेक कर उन्हें टक्कर मारी है।
   
  ” अभी केसर कैसी हैं? होश में हैं या नही?”

  ” सरकार होश में आ चुकीं हैं केसर सा। डॉक्टर उनकी तीमारदारी में लगें हैं। किसी भी हॉस्पिटल इस वक्त ले जाना हमें सुरक्षित नही लगा इसलिए हम लोगो ने ऑफ़िस में ही पूरी व्यवस्था करवा ली। आपने पहले ही बता दिया था कि उनकी जान को खतरा है।
  अभी भी डॉक्टर यही कह रहे है कि इनकीं जान यहाँ बचाना मुश्किल है और उन्हें तुरंत किसी अस्पताल में शिफ्ट करना ज़रूरी है। यही पूछने के लिए आपको फ़ोन किया था कि क्या किया जाए। ”

” इसमें पूछने की क्या बात है, तुरंत केसर को वहाँ के सबसे सुविधायुक्त और अच्छे अस्पताल में शिफ्ट करवा दो। और तुम सब वहीं बने रहना क्योंकि जिसने एक बार हमला किया वो दुबारा भी कर सकता है, बल्कि करेगा ही।” 

“जी सरकार।”

” अब ऐसा करो सबसे पहले उसे शिफ्ट करवाओ। केसर का ज़िंदा रहना बहुत ज़रूरी है।

” सरकार वो आपसे कुछ कहना चाहती हैं..”

उसने इतना कह कर केसर के मुहँ के पास फ़ोन का स्पीकर ऑन कर रख दिया।

” आदित्य…. बहुत मुश्किल से केसर के मुहँ से बस आदित्य का नाम निकल पाया।।

” केसर आप आराम कीजिये । हम यहाँ से निकल कर तुरंत वहाँ आ रहे, लेकिन हम आपसे दूर भी बहुत है हमें वहां पहुंचने में वक्त लगेगा तब तक आपको अपना ध्यान रखना होगा आप हमें जो कुछ भी बताना चाहती हैं वह आप तब ही बता पाएंगी जब आप पूरी तरह स्वस्थ हो जाएंगी। इसलिए थोड़ा धैर्य रखिए और मजबूत बने रहिए आप को स्वस्थ होना पड़ेगा।

” आदित्य ! हमारे पास समय कम है। आपके मामा ठाकुर साहब रेखा के असली पिता नही हैं।हम आपको सारी बात बता देना चाहतें हैं…
    आप सुन रहें हैं ना…”

सिर्फ इन दो तीन पंक्तियोँ को कहने में ही ऐसा लगा जैसे केसर को बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही थी।

  रेखा ठाकुर साहब की बेटी नही है तो फिर किसकी बेटी है?
आखिर ठाकुर साहब चाहतें क्या हैं?और ऐसी कौन सी बात है जो केसर उसे बताना चाहती है?

  आदित्य कुछ पूछता इसके पहले ही डॉक्टर ने फ़ोन केसर के हाथ से छीन कर एक तरफ फेंक दिया, लेकिन फ़ोन कटा नही था इसी से आदित्य को वहाँ की बातें सुनाई दे रहीं थीं।

  ” व्हाट द हेल इस दिस? पेशेंट कोलैप्स  हो रही है और आपको अभी भी फ़ोन कॉल्स दिख रहे हैं। पहले तो इतने सिरियस पेशेंट को घर पर ही ट्रीट करने बुलवा लिया अब आप लोग उनसे फोन भी करवा रहे। हद है!!
   कल को वो मर गयी तो ज़िम्मेदार हमें समझ कर हमारा कॉलर पकड़ लेना,हमारे साथ मारपीट शुरू कर देना। आप लोग हर चीज़ को इतना फिल्मी क्यों समझ लेते हैं।

” इन्हें अस्पताल शिफ्ट कर सकतें हैं ,अभी अभी सरकार से बात हुई। उन्होंने मंजूरी दे दी है।”

” थैंक गॉड! आपके सो कॉल्ड सरकार ने मंजूरी दी। अब चलिए फटाफट इन्हें शिफ्ट करने में मदद कीजिये, एंड मैडम प्लीज़ आप अब कहीं बात चीत नही करेंगी । आपको सिडेटिव्स दिए गए हैं अगर इसके बावजूद आप जागती रहीं तो आपको दूसरे कॉम्प्लीकेशंस शुरू हो जाएंगे।

   डॉक्टर की आधी ही बातें केसर के कानों में पड़ी और वो फिर एक बार नीम बेहोशी मे चली गयी….


क्रमशः

aparna….


  दिल से ….


  

aparna …..

 




 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s