जीवनसाथी – 99




   जीवनसाथी — 99


    

        महल पूजा पाठ में लगा हुआ था। पूजा का आज अंतिम दिन था। इक्यावन पंडित जाप में लगे थे । जाप सम्पन्न होने के बाद हवन होना था। हवन समाप्ति के बाद होने वाले प्रसाद वितरण के लिए पूरी रियासत की जनता को निमंत्रण दिया गया था।
   पांच दिन की पूजा पाठ सम्पन्न होने जा रही थी, और अगले दिन राजा का राजयाभिषेक होना था। ये पांच कठिन दिन जो पंडित जी के अनुसार अगर निकल गए तो काफी हद तक राजा की कुंडली सुरक्षित थी लगभग निकल चुके थे।
    महाराज और रानी माँ ने बाहर किसी को भी कुंडली और उसकी पूजा के बारे में नही बताया था, यहाँ तक कि राजा को भी यही लग रहा था कि पूजा पाठ का कारण राज्याभिषेक ही है।

   पूजा समाप्ति की ओर थी कि समर  भी तेज कदमों से पूजा स्थल पर चला आया।
    पूजा में महाराज और रानी माँ के साथ ही राजा और बाँसुरी भी थे। समर ने आते ही राजा के कान में कुछ कहा और राजा का चेहरा खिल उठा…
    पिछले दस दिन से सुध बुध खो चुकी दादी साहेब को होश आ गया था….

    महाराज और रानी माँ भी यह सुन आश्चर्य मिश्रित खुशी से खिल उठे ।
   समर राजा से कुछ देर बात करने के बाद उठने लगा तो पंडित जी ने उसे रोक उसके हाथ में हल्दी से पीले किये चावलों के साथ फूल दिए और हवन के शुरू होने पर सींचने कह दिया,समर का बाहर कुछ काम बाकी था, वो बस दादी साहेब के बारे में बताने आया था। उसने चुपचाप चावल हाथ में रख लिए, उसी वक्त उसका फ़ोन खनखनाने लगा।

   एक हाथ मे चावल लिए दूसरे हाथ से उसने फ़ोन उठाया, फ़ोन पिया का था…
   समर ने पंडित जी की ओर देख बाहर जाने की इजाज़त मांगी और उनके हाँ में सर हिलाते ही वो वहाँ प्रणाम कर बाहर निकल गया।

   ऑफ़िस में दादी साहेब की रिपोर्ट्स के साथ पिया के हाथ में कुछ और कागज़ भी थे।
   समर के आते ही उसने वो कागज़ उसकी ओर बढ़ा दिए। समर हाथ मे रखे चावल कहाँ रखूं यही सोच रहा था कि पिया ने हाथ बढ़ा दिया, उसके हाथों में चावल रख समर ने उसी के दुपट्टे से हाथ पोंछे और वो कागज़ खोल देखने लगा….

” मेरा सफेद दुपट्टा पीला कर दिया..”

  मुस्कुरा कर उसे देखते समर ने हाँ में सर हिला दिया..

” मुझे दे दो, तुम्हारे दुपट्टे को भी खूब सारे रंगों से रंग दूंगा, फिर इस सफेद कुर्ते के साथ रंगीन दुपट्टा ओढ़ा करना। “

  पिया मुस्कुरा कर रह गयी.. ” आखिर उस दिन का बदला ले ही लिया मंत्री जी!
  मंत्री जी आपको याद है उस दिन हम अस्पताल गए थे उस डॉक्टर की खबर लेने। उसने  आपके डर से कहिये या अपने कन्फेशन के लिए कहिये पर उसने हुकुम को दी जाने वाली गलत दवाओं के बारे में सारी जानकारी बना कर मुझे मेल कर दी।
  मैं वही सब हार्ड कॉपी में निकाल लाइ हूँ, इसके अलावा उन डॉक्टर साहब को अब इतना बुरा लग रहा था कि वो पुलिस के सामने समर्पण को भी तैयार हैं। लेकिन अगर वो पुलिस के सामने जातें हैं तब उनका केस मेडिकल काउंसिल तक चला जायेगा और उसके बाद मेडिकल काउंसिल क्या एक्शन लेती है ये नही कहा जा सकता। हो सकता है इनकी डिग्री और लाइसेंस रद्द कर दिए जाएं।
  इसलिए मैंने उन्हें अभी रुकने और आपसे मिलने कहा है।
  तो अगर आप फ्री हैं तो हम उन से मिल लेते हैं। वो बेचारे बहुत ज़्यादा डिप्रेशन में आ गए हैं। कहीं कुछ गलत कदम न उठा लें।

  समर ने फौरन उन कागज़ों को समेट कर अपने पास रखा और पिया के साथ उन डॉक्टर साहब से मिलने निकल गया।


  ********


    केसर को अस्पताल ले जाने के बाद से उसकी हालत में कुछ सुधार दिखने लगा था, लेकिन अब तक उसकी बात आदित्य से नही हो पाई थी। 
   बात करने में वो अभी भी कुछ थकान सी महसूस कर रही थी, लेकिन जो बात उसे मालूम चली थी, उसे वो जल्दी से जल्दी अदित्य को बताना चाहती थी। क्योंकि केसर से जितनी देर होती जाती राजा के लिए खतरा उतना ही बढ़ता जा रहा था।

    लेकिन अस्पताल में मौजूद डॉक्टर और नर्सेज की निगरानी में केसर का फ़ोन भी उससे छीन लिया गया था।

   रात के दूसरे पहर जब पूरा अस्पताल थक कर सोया पड़ा था, किसी तरह केसर ने अपने तकिए के नीचे से छिपा कर रखा मोबाइल निकाल लिया।
   सुबह आदित्य के आदमियों में से एक से उसने चुपचाप अपना मोबाइल मंगवा कर छिपा लिया था। उसने फ़ोन करने के लिए आदित्य का नंबर लगाया ही था कि दो रिंग जाने के बाद ही मोबाइल बंद हो गया। पिछले तीन चार दिनों से मोबाइल उसी के कमरे में एक अलमीरा में बेजान सा पड़ा था, जब उपयोग ही नही हो रहा था तो चार्ज करने की कौन सोचता?
   खीझ कर केसर ने मोबाइल वापस छिपाया और सोने की कोशिश करने लगी। हालांकि उसके दिमाग मे अब भी यही सब चल रहा था कि कल किसी तरह उसे आदित्य से बात करनी ही पड़ेगी….

  *******

    पूजा समाप्त होते ही राजा बाँसुरी, महाराज और रानी माँ के साथ दादी साहब का आशीर्वाद लेने चल पड़े।
     प्रसाद वितरण के लिए भले ही रियासत की सारी जनता को बुलाया गया था लेकिन राजा के लिए चिंतित महाराज ने उसका जनदर्शन का कार्यक्रम आज की जगह कल पर टाल दिया था।
   पंडित जी के अनुसार भी पांच दिन अधिक कष्टदायी थे , हालांकि ऐसा नही था कि उसके बाद राजा पूरी तरह सुरक्षित था लेकिन इन पांच दिनों की अपेक्षा नुकसान कम होने की संभावना थी।

   दादी साहब उन सभी को एक साथ देख मुस्कुरा उठी…

” हमें जिला( जीवित ) ही दिया कुमार आपने ! सिर्फ आपके बच्चे को देखने का मोह था जो हम संसार से विरक्त हो जा नही पाए। यमराज ने प्रयास पूरे किए लेकिन हमारी लालच की डोर आप दोनो से ऐसी बंधी है कि हम वहाँ पहुंच कर भी वापस चले आये।”

“आप को कुछ नही होगा दादी साहेब, अभी आपको शतक पार करना है।”

   राजा ने हंसते हुए उनके दोनो हाथ पकड़े और उनके पास ही बैठ गया।
    उसे पास बुला कर उसके माथे को चूम कर दादी साहेब रानी माँ को देखने लगी…

” कल किस वक्त का मुहूर्त है रज्याभिषेक का? हम भी कुमार को टीका लगाना चाहतें हैं!”

  ” सुबह नौ बजे कर तीस मिनट का मुहूर्त है माँ साहेब। लेकिन आप इस अवस्था में वहाँ कैसे जा पाएंगी? “

” कोई बात नही मॉम, दादी साहब वहाँ नही आ पाएंगी तो मैं यहाँ आ जाऊंगा। ”

  दादी साहेब एक बार फिर मुस्कुरा उठी…

” कुमार हमें सच में तुम्हारे राजकुमार को देखने का बहुत मन है। हम देखना चाहतें हैं कि वो अपने पिता पर जाता है या अपनी माँ पर ..”

  पास खड़ी बाँसुरी शरमा कर दूसरी तरफ देखने लगी…

आज महल में खाने की टेबल पर सभी खुश नजर आ रहे थे, एक तो अगले दिन महल का चिरप्रतीक्षित दिन था राजा का दुबारा  रज्याभिषेक होना था और दूसरा सही समय पर दादी साहब भी ठीक हो गईं थीं।
   
     सभी के चेहरों पर उल्लास भरा स्मित था, रूपा भाभी और जया बाँसुरी और रेखा के साथ चुहल करने में लगी थी, जिसमें पिंकी भी उनका पूरा सहयोग कर रही थी।
   रेखा का बेटा बाँसुरी की ही गोद में था,बाँसुरी अपनी प्लेट से उसे भी खिलाती जा रही थी। उसे देख पिंकी का बेटा भी आदित्य के पास जाने की ज़िद करने लगा, पिंकी ने दो एक बार उसे समझाने की कोशिश की लेकिन बच्चे की ज़िद के आगे जब उसकी न चली तो उसने बच्चे को ज़ोर से डपट दिया।
   राजा रतन युवराज को सब समझ आ रहा था लेकिन सभी पिंकी के स्वभाव से परिचित थे।।
रतन और राजा को पता था कि जितनी तेजी से पिंकी का गुस्सा उबाल मारता था उतनी ही तेज़ी से शांत भी हो जाता था, इसी से सब उसके सामान्य होने का इंतज़ार कर रहे थे।
   आदित्य के दिमाग मे अलग ही कुछ चल रहा था, इसलिए वो अपनी परेशानी में गुम न पिंकी की तरफ ध्यान दे पा रहा था और न उसके बच्चे की तरफ।

   अगली सुबह महल के लिए खास थी।
सूर्योदय नई उमंगों, नई योजनाओं और नए हौसलों के साथ हुआ था।।
   यूँ लग रहा था महल की सुबह होली और रात दीवाली की हो गयी हो जैसे। और सिर्फ महल ही क्यों सारी रियासत में रंग बिखरे पड़े थे। लोगों में अजब उत्साह नज़र आ रहा था। दादी साहेब के ठीक होने से कार्यक्रम एकदम से बदल गया था। जो कार्यक्रम सादा सा होने वाला था अब परिवर्तित हो गया था एक चमकीले कार्यक्रम में।
    महल में होने वाले सारे कार्यक्रम का सीधा प्रसारण बाहर जनता के लिए दिखाया जाने वाला था।
और राज्याभिषेक होने के बाद राजा का जनदर्शन कार्यक्रम था।
    सभी अतिथि महल के सभागार में पहुंच चुके थे। यही वो जगह थी जहाँ आज भी पुराने राजे महाराजों के समय की तरह ही शाही गद्दियाँ, ऊंचे ऊंचे झाड़फानूस , पैर धंसते कालीन बिछे पड़े थे। राजगद्दी के दोनों और दो सिपाही खड़े थे।
   राजगद्दी के एक ओर महाराज और रानी माँ के बैठने के लिए आसन थे , दूसरी तरफ युवराज और काका साहेब की जगहें थीं।
   उसके साथ ही सभागार में दोनों ओर महल के बाकी सदस्य और सम्मानित अतिथि विराजित हो चुके थे।
    राजा और बाँसुरी भी अपने निर्धारित समय पर धीमे कदमो से सभागार में प्रवेश कर गए। उनके सामने सेविकाएं फूल बिछाती चल रही थीं।
    दोनो के मंच पर पहुंचते ही करतल ध्वनि के साथ उनका स्वागत होते ही रानी माँ ने आगे बढ़ कर राजा का हाथ थाम लिया और उसे राजगद्दी तक ले चली। बाँसुरी भी उनके पीछे से सीढ़ियां चढ़ ऊपर चली गयी, एक ओर खड़ी रेखा रूपा और जया के साथ वो भी खड़ी हो गयी।
     पंडितों ने मंत्रोच्चाण शुरू किया और औपचारिक रूप से राजा का राज्याभिषेक शुरू हो गया।
    सभी वहीं थे खुश थे। आदित्य भी मुस्कुराता खड़ा सब कुछ देख रहा था कि उसके फ़ोन पर रिंग होने लगी।
      ऐसे कार्यक्रम से उठ कर चले जाना अच्छा नही लगता ये सोच कर उसने धीमे से फ़ोन को देखा, कोई अनजाना नम्बर था। वो बंद हो चुके नम्बर को पहचानने की कोशिश कर रहा था कि वापस उसी नम्बर से कॉल आना शुरू हो गया, इस बार बिना इधर उधर देखे आदित्य तुरंत फोन उठाये बाहर निकल गया…

   फ़ोन केसर का ही था….

” आदित्य सुनो , पहले हमारी पूरी बात सुन लेना, उसके बाद ही कुछ बोलना या पूछना! हमारे पास वक्त बहुत कम है। यहाँ हमसे हमारा फ़ोन छीन लिया गया है, हमें तो लगता है ये लोग भी ठाकुर साहब के ही लोग है,वो तो तुम्हारे आदमियों के डर से हमे कुछ कर नही पा रहे लेकिन हमें ऐसा लगता है जल्दी ही ये लोग हमें ज़हर देकर मार डालेंगे। अभी भी जाने कैसी दवाएं देते हैं कि हमें सारा दिन नींद आती रहती है, जिससे हम तुम्हे क्या किसी को भी ठाकुर साहब की सच्चाई न बता पाए।
   एक दिन तुम्हारे ही एक आदमी को बताने की कोशिश भी की लेकिन ज़बान ऐसी लड़खड़ाने लगी कि हम क्या बोल रहे थे न हम समझ पा रहे थे न वो।
  जाने कैसी दवाये हैं। हम ये नही कह रहे कि सारे डॉक्टर वैसे हैं लेकिन कुछ एक पर तो हमे पूरा संदेह है।
   अच्छा अब वो बात सुनो जो बेहद ज़रूरी है। ठाकुर साहब के ऊपर जब बाँसुरी ने ढेर सारे चार्जेस लगा कर उन्हें अरेस्ट करवाना चाहा तब वो वहाँ से भाग खड़े हुए।
    वहाँ से फरार होने से पहले वो किसी से फ़ोन पर बात कर रहे थे ….. जो हमने छिप कर सुन ली थी।
हम चुपचाप वहाँ से निकलने वाले थे कि उन्होंने हमें देख लिया और हमारे पीछे अपने गुंडे छोड़ दिये।
   हम भाग कर किसी ऐसी जगह छिप जाना चाहते थे जहाँ से तुम्हे सब कुछ सच सच बता सकें।
    तुम तो जानते हो हमारे भी दादा सा का घर वही तुम्हारे मामा के घर से कुछ दूरी पर ही है, लेकिन हम वहाँ भी नही जा सकते थे।
    पर इत्तेफाक से दादा सा की गाड़ी हमारे पास थी , हम उसी में वहाँ से निकल गए। लेकिन ठाकुर साहब के गुंडे हमारा पीछा करते रहे। पहाड़ों पर वैसे भी गाड़ी चलाना कम सरदर्द नही है उस पर वो लोग ट्रक और जीप दोनो से हमारा पीछा कर रहे थे। किसी तरह हम अपनी गाड़ी भगाते रहे और आखिर एक मोड़ पर उन लोगों की गाड़ी ने हमें टक्कर मार ही दी।
    हमारी गाड़ी लुढ़कते हुए खाई मे गिरने लगी। तब ऊपर खड़े उन लोगों ने निशाना साध कर हम पर गोलियाँ भी चला दी।
    उन्हें लगा इतनी ऊंचाई से हमारे गिरने से हमारी जान चली ही गयी होगी, और वो लोग लौट गए।”

  अब तक सारी बातें सुनते आदित्य का सब्र का बांन्ध छलक उठा…

” तुमने बात क्या सुनी थी केसर ?”

” हाँ हम बता रहें हैं आदित्य! हम जब छिप कर सुनने की कोशिश कर रहे थे तब ठाकुर साहब अजातशत्रु के  महल के किसी सदस्य से बात कर रहे थे – उन्होंने कहा अगर मेरा बेटा गद्दी पर नही बैठा तो मैं उस पूरी रियासत को उजाड़ दूंगा। उस खानदान का कोई इंसान ज़िंदा नही बचेगा। न वो राजा अजातशत्रु , न उसका बड़ा भाई युवराज और न उन लोगो की बहन भुवनमोहिनी ।
    मैं उस घमंडी महाराज और उसके छोटे भाई को भी चिता पर चढ़ा कर ही मानूंगा। अगर इतना सब करने के बाद भी मेरा बेटा गद्दी पर नही बैठ पाया तो क्या मतलब हमारे इतना करने का। “

” मामा जी ओह्ह यानी ठाकुर साहब का बेटा है कौन ? “


” विराज ! असल में विराज उनका दामाद नही बल्कि बेटा है , रेखा उनकी बेटी नही है। और ये बात विराज और रेखा दोनो ही नही जानते। “

” ये क्या बकवास है? “

“बकवास नही आदित्य यही असली सच्चाई है। उस रियासत के पीछे चलने वाले हर षड्यंत्र का कारण यही है बस । और इस सारे षड्यंत्र में ठाकुर साहब की सहभागी है वहाँ की रानी माँ।
  वहाँ उस दिन की ठाकुर साहब की बातें सुनने के बाद हमें काफी कुछ समझ आ गया था लेकिन हम वहाँ से भागते तब तक में उनके एक आदमी ने हमें पकड़ लिया और ठाकुर साहब के सामने ले गया और तब उन्होंने अपने मुहँ से हमें सब कुछ कह सुनाया। सब सुनाने के बाद वो हँसने लगे कि अब हमें मार देंगे तो ये सारे राज़ भी हमारे साथ दफन हो जाएंगे लेकिन उनके गन हम पर तान कर चलाने से पहले ही हम उन्हें ज़ोर का धक्का देकर वहाँ से भाग गए।
   उनकी ये कहानी शुरू होती है जब राजा अजातशत्रु के पिता और ठाकुर साहब कॉलेज में पढ़ते थे। कॉलेज के अंतिम वर्ष में राजा साहब का विवाह एक नामी रियासत की राजकुमारी से उनके पिता ने तय कर दिया। उस समय राजा साहब की रियासत डगमगाने लगी थी और उनके पिता को इसी बात की चिंता थी कि ऐसा ही रहा तो रियासत का मोह छोड़ना पड़ेगा तब भैरवगढ़ के राजा ने अपनी बेटी के साथ विवाह के बाद अपनी सारी रियासत राजा साहब को भेंट करने का प्रस्ताव रखा और राजा साहब के पिता यानी अजातशत्रु के दादा सा ने ये बात मान ली।
    विवाह हो गया, और भैरवगढ़ की राजकुमारी राजा साहब की पत्नी बन रियासत में चली आयीं।
   सब कुछ अच्छा ही चल रहा था, ठीक ग्यारह महीने बाद युवराज का जन्म भी हो गया। अब दो रियासतो के मिल जाने से राजा साहब के पिता का रुतबा बढ़ चुका था, और वो अपना सुप्रशासन कायम किये थे। इधर राजा साहब अपनी पत्नी और संतान को यहीं छोड़ आगे की पढ़ाई के लिए कॉलेज वापस चले गए।

     कॉलेज में उनके सहपाठी थे ठाकुर साहब जिनकी आपस में कभी नही जमी। कॉलेज का कोई भी काम हो इन दोनों ने हमेशा एक दूसरे को नीचा ही दिखाना चाहा।
   यूथ फेस्ट हो या कोई सेमिनार ये लोग हर जगह उलझ पड़ते।
  उसी समय ठाकुर साहब की पूर्व परिचित परिवार से वहाँ एक नई लड़की ने एडमिशन लिया। ठाकुर साहब ने हर जगह उसे अपनी महिला मित्र बोल कर प्रचारित करना शुरू कर दिया।
   ठाकुर साहब को चिढ़ाने के लिए राजा साहब भी उस लड़की से दोस्ती की पींगे बढ़ाने लगे और एक बार फिर ठाकुर साहब और राजा साहब उस लड़की को लेकर उलझ पड़े।
   अब तक तो बातें छोटे मोटे पैमानों पर होती थी लेकिन इस बार बात ज़रा बढ़ गयी।
  अब दोनो ने ही उस लड़की से दोस्ती को अपना जीवन मरण का सवाल बना लिया, प्रेम तो शायद ही कोई करता रहा हो उससे लेकिन अब उसका साथ पाना इन दोनों के लिए प्रेस्टीज इश्यू बन गया।
    आये दिन ये लोग किसी न किसी बहाने से उसे लेकर झगड़ पड़ते और फिर अचानक ठाकुर साहब किनारे हो गए।
   उन्हें किनारे होते देख राजा साहब को लगा वो जीतने लगे हैं इसी उत्साह में वो पूरे दम खम से उस लड़की के पीछे लगे रहे। राजा साहब के मित्रों ने उन्हें उकसाना जारी रखा, और धीरे धीरे वो लड़की भी राजा साहब की ओर ही झुकने लगी।
       इसी बीच राजा साहब की एक और संतान भी हो चुकी थी, वो गद्दी पर बैठ चुके थे। कॉलेज की बातों के साथ ही वो लड़कीं और उसकी यदि भी पीछे छूटने लगी थी, कि राजा साहब के छोटे भाई और ठाकुर साहब की बहन के रिश्ते चर्चा में  आने लगे। पहले ही राजा साहब से चिढ़े बैठे ठाकुर साहब ने अपनी बहन को आश्वासन दिया कि वो उसकी और राजा साहब के छोटे भाई की शादी करवा देंगे , और दोनो को मंदिर बुलवा कर उनका कत्ल करने की साज़िश रची लेकिन जब उन्हें ये मालूम चला कि ये दोनों पहले ही शादी कर चुके हैं और उनकी बहन तीन महीने के गर्भ से है तब उनका गुस्सा सांतवे आसमान पर पहुंच गया और एक बार फिर वो कुछ नए मंसूबे बनाने लगे। वो वापस राजा साहब के पास गए कि उनकी बहन का विवाह राजा साहब के भाई के साथ हो जाये लेकिन राजा साहब ने एक बार फिर उन्हें अपमानित कर निकाल दिया और अपने भाई को विदेश भेज दिया।
   नाराज़गी में वापस लौट कर वो अपनी बहन को मारने वाले थे लेकिन घर के बाकी लोगों ने जैसे तैसे उसे बचा लिया।
     इधर अपमान की आग में सुलगते ठाकुर साहब ने अपनी उसी दोस्त के साथ मिलकर एक चाल वापस चली।
  
    राजा साहब की एक विवादित ज़मीन पर कोई  कब्जा किये बैठा था। उस से निपटने राजा साहब ने बहुत बार अपने आदमियों को भेजा लेकिन उसके गोल मोल जवाब से राजा साहब संतुष्ट नही हो पा रहे थे। ज़मीन का टुकड़ा कीमती था, और आखिर एक बार राजा साहब जब उसकी हवेली पहुंचे तो उसने अपनी प्राचीन संपदा का ऐसा बखान किया कि राजा साहब प्रभावित हो गए। सब कुछ कोर्ट कचहरी में फंसा है , पट्टे की ज़मीन,नेपाल की तराई में बसी छोटी सी रियासत और ढेर सारा सोना।
      सब कुछ वापस मिलते ही आपकी ज़मीन का कब्ज़ा भी आपको मूल्य चुका कर लौटा दूंगा , की सिफारिश करते व्यक्ति के पास कौन सी ऐसी मूल्यवान वस्तु अभी हो सकती है जिससे उसका ऋण चूक सके , राजा साहब यही सोच रहे थे कि सेविका के हाथ से चाय की ट्रे भेज पीछे उस आदमी की बेटी भी आ खड़ी हुई।
  ये तो वही कॉलेज वाली लड़की थी जिससे राजा साहब के मधुर संबंध रह चुके थे।
   राजा साहब और वो एक दूसरे को पहचान कर बातों में लग गए और उसके पिता को उम्मीद की किरण अपनी बेटी में नज़र आने लगी।
   सामने वाले ने जब अपनी इकलौती कन्या से विवाह प्रस्ताव रखा तो राजा साहब सहर्ष तैयार हो गए। जब वो उससे पहली बार मिले तो उनकी खुशी का ठिकाना नही रहा था आखिर ये वही कॉलेज वाली लड़की जो थी, जिसे एक तरह से वो ठाकुर साहब से जीत चुके थे।
   उन्होंने ज़मीन के सारे मसलों के कागज़ उनके हवाले किये और उनकी बेटी से विवाह कर उसे अपने महल में ले आये।
    और महाराज यहीं चूक गए।

   वो नही समझ पाए कि उनके साथ कितना बड़ा धोखा हो चुका था। उनकी शादी जब उस लड़की से हुई तब वह दो महीने की गर्भवती थी, और उसके गर्भ में ठाकुर साहब की संतान थी।
   पहले तो उन दोनों ने यही सोच रखा था कि किसी तरह राजा साहब को रास्ते से हटाने के बाद रानी के गर्भवती होने की बात फैला कर उनसे दूसरा विवाह कर ठाकुर साहब उनके पति बन गद्दी के हकदार हो जाएंगे लेकिन उनके मंसूबे कामयाब नही हो पाए।
   विवाह के ठीक सात साढ़े सात माह के बाद विराज और विराट का जन्म हुआ। जुड़वा बच्चे होने से समय से पहले हुए प्रसव पर किसी का ध्यान नही गया।
   और बस तभी से ठाकुर साहब ने कसम खा ली कि राजा साहब की कोई संतान गद्दी पर नही बैठने पाएगी बल्कि उनकी जगह उनके खुद की संतान यानी विराज या विराट ही गद्दी का अधिकारी होगा।

  राजा साहब से जलन और चिढ़ ने उनके अंदर की कुंठा को इस हद तक बढ़ा दिया कि अब रात दिन उनकी आंखों में इस पूरी रियासत की तबाही का स्वप्न ही पलता रहा।
    इसके लिए वो जो जो चालें चल सकते थे समय समय पर चलते रहे।


” ये सब क्या कह रही हो केसर? ”

” हम हर एक बात सही कह रहे हैं। हमारे पिता भी बहुत सी बातें जानतें हैं इनके बारे में। उनके एक्सीडेंट में भी इन्ही का हाथ था जो हमे बाद में पता चला। इन दोनो ने न सिर्फ हमें अपना मुहरा बनाया बल्कि तुम भी उनकी बिसात के मोहरे ही भर हो। “

” हम्म वो तो हम कब का समझ चुके थे केसर!और क्या किया इन्होंने?

” हम सारी बातें सिलसिलेवार तुम्हें बताते जा रहें हैं। ध्यान से सुनना। इन दोनों की साज़िशें यहीं थमी नही बल्कि साज़िशें यहाँ से शुरू हुई।
    एक एक कर इन दोनों ने महल के अंदर घुन बन कर सबको खाना शुरू कर दिया…
तुम्हें क्या लगता है अजातशत्रु की माँ की मौत कैसे हुई? “

” क्या उन्हें भी इन्हीं लोगो ने  मारा? “

“हां और वो भी ऐसे की किसी को शक तक नही हुआ, ये लोग अपना हर काम ऐसे करते चले गए कि महल में घट रहा सब कुछ सभी को बहुत स्वाभाविक लगता चला गया…..
    एक शाम छोटी रानी ने बड़ी रानी को महल की छत पर बुलावा भेजा और सबसे किनारे की मुंडेर के पास नीचे काफी सारा तेल जैसा कुछ फैला दिया।
   छत पर दासियां और सेविकाएं दोनो महारानियो की सेवा में तैनात थी। चाय की टेबल सजी थी,मौसम खुशगवार था, की छोटी रानी ने बड़ी रानी से मुंडेर तक चल कर नीचे फैली रियासत देखने का प्रस्ताव रखा..
   बड़ी रानी सहमति जताते हुए आगे बढ़ गईं, उनके पीछे चलती छोटी रानी ने ठीक मुंडेर तक पहुंच कर उनके दुपट्टे पर हौले से अपना पैर रख दिया, हड़बड़ी में आगे बढ़ती रानी साहेब का संतुलन बिगड़ गया और वहीं पर फैले पड़े तेल पर उनका पैर पड़ा और वो फिसल कर मुंडेर से नीचे गिर गईं।
    उनकी रीढ़ की हड्डी में  गंभीर चोटें आईं जिसका परिणाम यह हुआ कि वो पूरी तरह से लाचार बिस्तर पर पड़ गईं, ये सब इस ढंग से हुआ कि सीधे सीधे छोटी रानी पर कोई उंगली नही उठा सका।

” इसका मतलब बड़ी रानी सा की जान जाने के पीछे छोटी रानी का हाथ था? “

” सिर्फ इतना ही नही और भी बहुत कुछ किया है इन्होंने! इनके पाप की गठरी इतनी छोटी नही है…
  बस तुम सुनते जाओ आदित्य, आगे और भी ऐसे खुलासे होते जाएंगे कि तुम चौन्क जाओगे….

क्रमशः

aparna…..

 
    
   


   

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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