मायानगरी -3







  मायानगरी -3


      इंजीनियरिंग कैम्पस में भी नई नई चिड़िया चहक रहीं थीं वहीं कुछ कौए भी फुदक रहे थे…
   एक तरफ एक छोटा सा गार्डन बना था, जहाँ एक बड़े से बरगद के पेड़ पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था..
   “यहाँ रैगिंग करना सख्त मना है”

   उसी पेड़ के नीचे बैठे कुछ लड़कों ने उधर से गुजरते कुछ कौवों यानी  कुछ नए लड़कों को आवाज़ देकर बुला लिया..

” फर्स्ट ईयर? “

” यस सर !”

” बेटा पहले दिन ही जीन्स? और ये क्या बाल बना रखें हैं? खुद को नागराज समझते हो? “

” नो सर!”

” तो ये जो बालों का फुग्गा दिख रहा है ना कल कटवा के आना समझे। कल गंगाधर विद्याधर मायाधर ओंकारनाथ शास्त्री बन के आ जाना समझे।”

” ये सारे लोगों जैसा बन कर आना है सर? “

” अबे शक्तिमान नही देखे क्या बे ? हो सकता है तुम्हारे पैदा होने के पहले का सीरियल हो? अबे गूगल कर लेना।  .. और सुनो आज रात आठ बजे होस्टल नम्बर 5 में आ जाना। चलो फूटो अब…

   वो लड़के जान बचा कर भाग खड़े हुए। उन्हें यूँ भागतें देख सभी सीनियर्स में हंसी की लहर दौड़ गयी।
   
        तभी उस लड़की के प्रोपोजल से हैरान परेशान अभिमन्यु वहाँ चला आया। अभिमन्यु के साथ उसका दोस्त अधीर शर्मा भी था…
   दोनो बातें करते गार्डन में पहुंच गए…

” काहे इत्ता सोच विचार रहे हो अभि कोई नई चिरैया होगी आर्ट या कॉमर्स वाली, बेचारी रैगिंग की शिकार !”

” हाँ होगी तो रैगिंग की शिकार ही लेकिन सोचने वाली बात ये है कि उसने इतने लड़कों में मुझे ही प्रोपोज़ किया? “

” अबे ओए तू कोई जॉन इब्राहिम नही है समझा। जो सामने पड़ गया उसे प्रोपोज़ कर चलती बनी, अब इतना मत सोच , भूल जा उसे। “

” हाँ यार !मैं कौन सा सिरियस हूँ। बस ये पता चल जाये कि बंदी है किस फैकल्टी की। वैसे शक्ल सूरत से इतनी खूबसूरत सी थी पक्का आर्ट्स वाली होगी। है ना?

” कॉमर्स या साइंस ग्रैजुएट भी हो सकती है। सभी सुंदर लड़कियां आर्ट्स ही लें ये ज़रूरी तो नही? “

” हाँ यार वैसे बी एस सी में भी अच्छी लड़कियां आती हैं। एक हमारे हिस्से ही दुनिया भर की शशिकला और टुनटुन पता नही क्यों आती हैं। पता नही ये मैथ्स वाली लड़कियां इतना पढ़ती क्यों हैं कि अपने थोबड़े का भूगोल ही गड़बड़ा देती हैं। “

” मैथ्स बिना पढ़े निकलता भी तो नही भाई, अब हर कोई तेरे जैसा अनाप शनाप दिमाग तो नही पाए बैठा है ना?

” हाँ बात में तो दम है तेरी। वैसे तुझे वो पिछले साल की बी एस सी वाली याद है?

” कौन रूही ? जिसके चक्कर में तू उसके बॉयफ्रेंड से पिटने वाला था।

” अबे मैं नही पिटने वाला था, उल्टा उस साले को मैं पीट देता लेकिन रूही का चेहरा देख कर छोड़ दिया। अब यार जब मैं उसके चक्कर लगा रहा था तब वो कमबख्त भी तो फुल लाइन देती थी,मुझे क्या पता था मज़े ले रही है । अपने बॉयफ्रेंड की ताकत नापने का ये कौन सा तरीका होता है भाई। पहले खुद लाइन दो और फिर बॉयफ्रेंड से पिटवा दो।

  अधीर का हँस हँस कर बुरा हाल था…

” और वो याद है तुझे क्या नाम था “भाषा ” क्या स्मार्ट लड़की थी यार वो। मैथ्स ऑनर्स कर रही थी ना।”

  भाषा नाम सुनते ही अभिमन्यु के चेहरे पर चौड़ी सी मुस्कान चली आयी …..

” कैसे भूल सकता हूँ यार। इतनी टैलेंटेड बंदी सच आज तक नही देखी। अब कैंटीन में जब मैं उसे देखता वो भी मुझे देख मुस्कुरा देती। मुझे लगा पट गयी है। फिर धीरे धीरे मुझसे ज्यादा तो वो ही मुझे ताड़ने लगी थी …

” हाँ और फिर आया वो मनहूस दिन!”   अधीर अभिमन्यु की बात आगे बढ़ाता हँसने लगा…

“हम्म ! अबे कैंटीन में राखी लेकर कौन आता है यार!”

” हाँ सारे बवाल तेरे ही हिस्से लिखें हैं। तुझे उसकी आँखों में ममता नज़र नही आई थी जो लाइन मार रहा था। साले वो तुझमें अपना गुमशुदा भाई देखा करती थी और तू…”

” अब मैं क्या करूँ यार। इतनी प्यारी सी लड़की अगर मुझमें अपना भाई देखेगी तो फिर ज़िंदगी ही खत्म अपनी। अच्छा हाँ इसी बात से याद आया, आज भाषा की सहेली धरा छुट्टियों के बाद वापस आ रही है, उसे लेने स्टेशन जाना है मुझे।”

“हां अब बहन बन गयी है तो पूरी शिद्दत से भाई धर्म निभा तू। कब जाना है तुझे स्टेशन? अकेली आ रही है क्या”

” रात में ट्रेन है उसकी। अकेली ही होगी तभी तो भाषा ने स्पेशली फोन कर के कहा कि स्टेशन लेने चले जाना। “

“और ये नही कहा कि अपनी आदत से मजबूर लाइन मत मारना शुरू कर देना। “

  अभिमन्यु नीचे सर किये हँसता अपने बालों पर हाथ फिराता रहा….

” खैर अब भूल जा सुबह वाली को ,चल लाइब्रेरी चलते हैं। अबे यार….. सुबह वाली लड़की मेडिको भी तो हो सकती है। “

” तौबा तौबा , ऐसी नाजुक लड़की डॉक्टर नही बन सकती यार। डॉक्टर लड़कियां न अजीब छिपकली होती हैं पढ़ पढ़ कर इनके चेहरे सड़ जातें हैं, आंखों के नीचे काले घेरे और उस पर मोटा सा चश्मा लगाने वाली लड़कियां, डेडबॉडीज़ को चीरती फाङती लड़कियां , उफ्फ। मुझे तो इनमें चुड़ैल नज़र आती है। दुनिया में आखरी लड़कीं भी बची होगी न तब भी डॉक्टरनी से कभी प्यार नही करूँगा।”

“वैसे लड़कियों के मामले में तूने जो अभूतपूर्व ज्ञान कमाया है उसे देख कर समझ सकता हूँ तू सही ही कह रहा होगा।
   दर्जन भर तो तेरी सिर्फ ए अल्फाबेट से दोस्त रही होंगी , अवनी अनामिका,अनिका, आँचल, आरुषि ,अनन्या अपूर्वीनी और क्या थी वो चैताली मिताली … हे भगवान!

” बस करो यार। जलो मत तुम बराबरी करो। समझे। “

  दोनो बातें करते आगे बढ़ रहे थे कि सामने से एक हैरान परेशान लड़का चला आया…

“”अरे ज्ञानी भैया क्या हुआ ? बड़े टेंशनियाए घूम रहे हो। “

” यार अभिमन्यु सेमेस्टर शुरू हुआ नही की ये प्रोफेसर्स की किचकिच शुरू हो जाती है।

” अब क्या जुल्म हो गया गुरु?

” अब क्या बताएं यार , पिछले सेमेस्टर का बकाया मांग रहे हैं सारे। “

” ओहहो जे बात। चलिए लाइब्रेरी में चलिए कोई उपाय निकालतें हैं ज्ञानी जी।

  ज्ञानी जी का असली नाम हर्षवर्धन गेरा है। दिल्ली के रहने वाले हर्षवर्धन के पापा का रेस्टोरेंट है लेकिन वो अपने लड़के को सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनाना चाहते हैं। बड़े घिस तिस कर हर्षवर्धन को इंजीनियरिंग कॉलेज पहुंचाया गया था। इनके बारे में किवदंती ये है कि मैनेजमेंट कोटा के लिए आवश्यक मिनिमम मार्क्स भी ये नही ला पाए थे। मैनेजमेंट कोटा की मोटी धनराशि पर अपने रेस्टोरेंट की काजू कतली की रुपहली पतरी चिपका कर ही इन्हें इनके पिता ने पार लगवाया था।
पहले जैसे इनके रहने से इनका स्कूल धन्य हुआ पड़ता था अब कॉलेज का वही माहौल था यह कहने को तो पांचवे सेमेस्टर में पहुंच चुके थे लेकिन हर एक सेमेस्टर में कोई ना कोई विषय इन्हें मुंह चढ़ाता वहीं खड़ा रह गया था ।
    कहां जाता है इन्होंने फर्स्ट ईयर की पढ़ाई दो बार पढ़ी सेकंड ईयर की पढ़ाई भी दो बार पढ़ चुके हैं और अभी पांचवें सेमेस्टर में होते हुए भी पिछले सेमेस्टर के कुछ विषय लटके पड़े ही हैं।

     इतनी गहन पढ़ाई के कारण ही इंजीनियरिंग के बच्चों में यह ज्ञानी नाम से सुप्रसिद्ध हैं, अभिमन्यु का साथ मिलने पर उसने इन्हें रात-दिन एक करके पढ़ाया और यह किसी तरह सेमेस्टर की वैतरणी पार कर आगे बढ़ गए इसीलिए यह अभिमन्यु को बहुत माना करते हैं।
      दिल का साफ अभिमन्यु इन्हें सीनियर्स की तरह आदर भी देता था और एक मित्र की तरह प्रेम भी किया करता है अभिमन्यु और अधीर के साथ ही ज्ञानी जी भी इनके रूम मेट है।

  कुछ प्रोफेसर ज्ञानी जी के पांचवे सेमेस्टर में जाने के खिलाफ थे उनका कहना था कि ज्ञानी जी पहले सारे पुराने सेमेस्टर क्लियर कर लें तभी आगे बढ़े इसी बात के फसाद पर ज्ञानी जी अभी अभी किसी से उलझ कर बाहर चले आ रहे थे जिन्हें वापस समझा-बुझाकर अभिमन्यु ने लाइब्रेरी के लिए मोड़ लिया था।

नया सत्र शुरू हुआ था इसीलिए अभिमन्यु को किताबें अलॉट करवाने की जल्दबाजी थी, उसके पास इतने पैसे तो होते नहीं थे कि वह हर एक महंगी किताब खरीद सके, इसीलिए सबसे पहले लाइब्रेरी पहुंच कर अपने काम की किताबें  अलॉट कर के रख लिया करता था।
   भले पढ़ाई से कोई नाता नहीं था लेकिन एग्जाम में फेल होना उसके जमीर को गवारा नहीं था इसीलिए एग्जाम्स में पास होने किताबें और नोट्स उसके पास होना बहुत जरूरी हुआ करता था।
    सीनियर्स भी इस मैजिक माइंड लड़के से प्रभावित थे इसलिए अपने सबसे ज़रूरी नोट्स संभाल कर रखते और सेमेस्टर क्लियर होते ही अपनी वसीयत अभिमन्यु के नाम कर दिया करते।

वहां पहुंचे वह लोग किताबें अलॉट करवा ही रहे थे कि उन लोगों के भी सुपर सीनियर 5-6 के ग्रुप में वहां चले आए उन सभी को हैरान परेशान देख अभिमन्यु और अधीर एक दूसरे को देखने लगे यह सभी ज्ञानी के साथ ही इस कॉलेज को ज्वाइन किए हुए थे इसलिए सभी ज्ञानी को अच्छे से जानते थे वह लोग ज्ञानी और अभिमन्यु के पास ही चले आए।
    उन्हीं में से एक थे सीपी भाई !

  सीपी भाई का पूरा नाम था चंद्रप्रताप सुबोधन। ज्ञानी जी के साथ ही इन्होंने भी कॉलेज में कदम रखा था। पर जहाँ सीपी भाई सारे जहान के जोड़ घटाव गुणा भाग कर कैसे भी कर के पास होते चले गए ज्ञानी जी वहीं उसी सेमेस्टर में रहकर अपना ज्ञान सिंचित करते रहे।

सीपी (c p) ने अपने साथ रखा एक पर्चा अभिमन्यु की तरफ बढ़ा दिया …..

” यह क्या है सीपी सर ?”

” ध्यान से देख ले, पढ़ ले!”

अभिमन्यु उस पर्चे को ध्यान से देखने लगा और उन लड़कों में से एक लड़का उस पर्चे के बारे में बताने लगा ….

” यार अब हद होने लगी है ! ठीक है, माया नगरी एक पूरी यूनिवर्सिटी है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि किसी भी फैकल्टी का कोई भी बंदा कहीं भी घुस जाएगा।”
  हमारे इंजीनियरिंग केंपस में कुल जमा 3 कैंटीन। है कि नहीं?  यह राजा युवराज सिंह आर्ट्स एंड स्पोर्ट्स अकैडमी वाले लड़के जब देखो तब हमारी कैंपस की कैंटीन में चले आते हैं। एक तो साला उनमें विधायक का लड़का है अपनी जीप में धूल उड़ाता फिरता है । सारा वक्त अपनी एसयूवी में सवार रहता है अपने चेलों से घिरा खुद को पता नहीं कहां का राजा समझता है?

    माया नगरी में पढ़ रहा है तो उसे लगता है कि वह खुद भी राजा अजातशत्रु बन गया है। अरे ऐसे कोई थोड़ी अजातशत्रु बन सकता है।
     पता नहीं लीचड़ आदमी खुद को क्या समझता है? जब देखो तब हमारी कैंटीन में चलाएगा और हमारे कैंपस की लड़कियों को छेड़ता रहेगा। इसी सबके लिए यह पेपर लिखा गया है।  इस पेपर को हम डायरेक्ट यूनिवर्सिटी के चेयर पर्सन के पास देने वाले हैं । इसमें यह लिखा है कि जो जिस फैकल्टी का स्टूडेंट है उसी कैंपस में रहे , और उसे किसी और कैंपस में घुसने की मनाही कर दी जाए । हमारी ब्रांच के लड़के इसमें साइन कर चुके हैं। अभी 4 ब्रांच और बची हैं , वहां के भी सारे बच्चों के साइन होने के बाद काफी सारे लोग हमारे फेवर में आ जाएंगे , इसके बाद हम अपने कॉलेज के लेक्चरर और प्रोफेसर के साइन लेने के बाद सीधा माया नगरी की सीईओ के पास जाएंगे।”

” सर पता भी है मायानगरी की सीईओ है कौन?”

“हां पता है ना! वैसे तो माया नगरी के कर्ता-धर्ता राजकुमार विराज सिंह है लेकिन हम डायरेक्टली उनके पास नहीं पहुंच सकते ऑफिस मैनेजमेंट देखने के लिए ऑफिस सीईओ के पास ही हमें जाना पड़ेगा। और सीईओ है श्रीमती निरमा प्रेम सिंह चंदेल ।
      सुनने में आया है थोड़ी स्ट्रिक्ट है मैडम लेकिन है बहुत अच्छी । यह भी सुना है कि स्टूडेंट्स के भविष्य से वह कभी खिलवाड़ नहीं होने देती। कोई भी परेशानी हो वह दोनों पक्षों को सुनकर समझ कर वही निर्णय लेती हैं जिसमें विद्यार्थियों का भला हो।  मुझे तो भरोसा है कि वह हमारी बात सुनेंगे और समझेंगे और उस विधायक के लड़के को भी सही मजा चखा देंगे,  तो बेटा अभिमन्यु साइन कर दो इसमें।

“जी सर!   सर साइन ही नहीं करेंगे बल्कि मैडम के पास चलेंगे भी…
     हम जितने ज्यादा लोग जाएंगे उतना ज्यादा असर पड़ेगा। जाहिर सी बात है कि हमारे कैंपस में सिर्फ इंजीनियरिंग वाले लड़के लड़कियां ही रहें। ना तो आर्ट्स वाले यहां आएँ और ना ही साइंस वाले ।और  मेडिकल वाले भूत तो बिल्कुल ही न आ सकें। सबको अपनी अपनी फैकल्टी अपने अपनी ब्रांच दी गई है सभी के कैंपस सफिशिएंट बड़े हैं। सभी को कैंटीन की सुविधा लाइब्रेरी की सुविधा दी गई है । फिर क्यों इधर-उधर मारे मारे फिरना । सर मैं बिल्कुल आपके साथ चलने को तैयार हूं।

“गुड तुमसे यही उम्मीद थी।  तुम्हारे दोस्त भी बहुत सारे हैं,  तो सब के सब का साइन ले लेना इसमें। ठीक है ?यह पेपर रखो शाम को हमें दे देना

“सर मैं आज शाम तक इसमें 400 लोगों के साइन ले कर आ जाऊंगा भरोसा रखिए…

“गुड तुमसे यही उम्मीद थी ..अब हम चलते हैं बाकी जगह भी जाना है!

उन लोगों के वहां से जाते ही ज्ञानी और अधीर अधीरता से अभिमन्यु का चेहरा देखने लगे।

” अभी 400 साइन कहां से लेकर आएगा तू ?  कुछ ज्यादा ही फेकू नही है ? कुछ भी कह देता है….”

” अबे सिर्फ साइन लेने के लिए 400 लोगों के पास जाने की क्या जरूरत है? भगवान ने मुझे दो दो हाथ  और 10 उंगलियां दी है।
      इन दोनो हाथों की  उंगलियों से ऐसे ऐसे कारनामे करूंगा ना कि 400 ही नही 800 साइन बना लूंगा और किसी को पता भी नहीं चलेगा। “

“अबे साले हद फर्जीवाड़ा है तू। अपना सारा दिमाग बस इसी सब में झोंक दे। सही से पढ़ लिख लेता ना तो कलेक्टर बन जाता कहीं का।”

“कितना कंफ्यूज है यार तू और मुझे भी करता है। इंजीनियरिंग कर के मैं कलेक्टर काहे बन जाता भला? “

” चल अब चलें कम से कम आठ दस साइन तो असली वाले ले ले फिर रात में हॉस्टल रूम में बैठ कर बनाते रहना फर्जी सिग्नेचर। कल मैडम से मिलने भी जाना है।”

अभिमन्यु अधीर और ज्ञानी कैंटीन की ओर चल पड़े…..

**********

रंगोली तैयार होकर अपने गांधी झोले में किताबें और नोटबुक डाल रही थी कि झनक भी नहा कर निकल आयी…

” रंगोली तू तैयार नही हुई अब तक? “

” हो तो गयी हूँ। और क्या तैयार होना बाकी है।?”

” ओए मैडम हम फुज़ी हैं, हमें ये ऊंची सी पोनी टेल , ये चटकीले रंगों के कपड़े और ये स्टाइलिश सी जूतियां अलाऊ नही हैं। समझी।

” ओह्ह ! फिर ।।”

” फिर ? तुझे एडमिशन के समय मेधा रानी ने कुछ बताया नही क्या ? अजब डंबो है यार तू। ये सब तो हमें एडमिशन के साथ ही उसने बता दिया था।

” अब ये मेधा रानी कौन है? “

झनक ने अपने माथे पर हाथ मारा और फटाफट अपनी अलमीरा से एक जोड़ा यूनिफॉर्म निकाल कर रंगोली को थमा दिया…

” मेधा रानी मैडम कॉलेज में फीस कलेक्शन के बाहर इधर उधर भटकती आत्मा के समान टहलती रहतीं हैं। सेकंड ईयर स्टूडेंट हैं, हॉस्टल रूम अलॉटमेंट के साथ ही सारे नियम भी फटाफट बता देती हैं। असल में हर साल सेकंड ईयर की एक लड़की को इस काम के लिए चुना जाता है। जो जूनीज़ को पकड़ कर नियम रटवा दें।
  अब तू पूछेगी नियम क्या हैं। तो बेबी पहला तो हमें दो चोटियां बनानी है , वो भी रेड रिबन लगा कर ऊपर बांधनी हैं। दूसरा यूनिफॉर्म में यही नीला कुर्ता और सफेद सलवार पहनना है ,चुन्नी थ्री पिन करनी है। और पैरों में बिना हील्स के हद दर्जे के बोरिंग पंप शूज़।
  ये सिमिज़ की जलन है बस। क्योंकि हर नई खेप के साथ सीनियर लड़के क्लास में अपने लायक जूनी ढूंढने ही तो आते हैं। इसलिए ये लोग हमें ऐसे नमूना बनवा कर रखतीं हैं।

  झनक की बातों के दौरान ही रंगोली भी तैयार हो गयी।
  दोनो फटाफट अपने गांधी झोले टांगे कॉलेज के लिए भाग चले….

” जल्दी जल्दी कदम बढ़ा, आज सबसे सामने बैठना है एनाटॉमी लैब में। “.

“हां यार मुझे भी अच्छे से पढ़ाई करनी है, सामने बैठेंगे तभी तो समझ आएगा। “

” पढ़ाई वढ़ाई का कोई चक्कर नही है मेरे साथ…. वो तो आज मृत्युंजय सर क्लास लेने वाले हैं, उन्हें ताड़ना है बस इसलिए सामने बैठना है…”

रंगोली फिर आंखों में सवाल लिए झनक को देखने लगी…
  
  झनक रंगोली को देख मुस्कुरा उठी….

” ऑब्विसली तू मृत्युंजय सर को भी नही जानती होगी। हाउस सर्जन हैं अपने यहाँ , क्या डैम हैंडसम बंदा है यार उफ्फ, और जब कभी ब्लैक शर्ट में आता है ना कसम से कितनी लड़कियां तो ऐसे ही कत्ल हो जाती होंगी। वो साउथ का हीरो है ना सुधीर बाबू, वो भी फेल है मृत्युंजय सर के सामने।  ये ब्लैक शर्ट का किस्सा सिमिज़ के मुहँ से ही सुना था, अब तक देखने का सौभाग्य नही मिला। “

  झनक की बातें सुनती हंसती रंगोली झनक को गहरी आंखों से देखने लगी…

” बाकियों का पता नही तू तो अभी से फ्लैट हो गयी ,लग रहा है…”

” अरे कहाँ यार। सर की तो सेटिंग है पहले से। हम तो बस आंखों को सुकून मिले ऐसी चीज़ें देखनी चाहिए, इसलिए देख लेते हैं।”

” ओह्ह तो सर की सेटिंग किससे है? “

” गौरी मैम ! उस दिन दिखी थी न होस्टल में, वही हैं……

  




क्रमशः

aparna …

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

“मायानगरी -3” पर एक विचार

  1. मुझे नोटिफिकेशन मिल रहे हैं 💃💃…. इसमें दिल से मिसिंग है। और खास बात बताऊं ये कॉलेज , स्टूडेंट्स कई कहानियों में पढ़कर भी सब नया सा लग रहा है और बेहद मजेदार भी 😊❣️

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