समिधा -10

समिधा 10



       आरती समाप्त हो चुकी थी, पंडित जी ने आरती सामने रखी और चरणामृत वितरण करने लगे।
  एक एक कर लोग आगे बढ़ते जा रहे थे और आरती लेकर वापस लौट रहे थे।
प्रज्वल भी जाकर आरती लेकर माथे पर चंदन का तिलक लगाए वापस आ गया लेकिन वरुण हाथ जोड़े खड़ा ही रहा।
    निशब्द ! निष्चेष्ट !!!

  ” वरुण !!! कहाँ डूब गया भाई। “

  प्रज्वल के हिलाने पर जैसे वरुण की संज्ञा वापस लौट आयी। वो साथ खड़े प्रज्वल को देखने लगा..

” क्या हुआ भाई कहाँ खो गया था!”

  “अरे कुछ नही प्रज्वल। कुछ पल को ऐसा लगा जैसे मैं यहाँ हूँ ही नही। बस शरीर ही यहाँ है बाकी मैं कहीं और उड़ चला था।”

  “हाँ देखा मैंने! खुली आँखों से सो रहा था तू !आंखे खुली थी जैसे मूर्ति को देख रही हों लेकिन मन जाने कहाँ भटक रहा था।”

  अब तक पंडित जी दोनों के काफी करीब चले आये थे..

   ” बेटा इस अवस्था को मन की सूक्ष्म अवस्था या ध्यान की अवस्था कहतें हैं। बड़े बड़े संत महात्मा इसी अवस्था को पाने के लिए रात दिन तपस्या में लीन रहते हैं कि अपने मन को साध सकें।
  तन को भले ही साध लो मन को साधना बहुत कठिन है। और अगर मन सध गया तब तो कोई विकार मनुष्य में बचेगा ही नही।
    तुमने उस अवस्था को जिया है जिसे पाने में अच्छे अच्छों के पसीने निकल जाते हैं।
    स्व को केंद्रित करना आसान नही है बेटा। आत्मकेंद्रित वही हो सकता है जो इस संसार के सुख दुख के पार सोच सके, जो अपनी आत्मा तक पहुंचने का मार्ग चाहता हो। जो इस संसार की भौतिकता में उपस्थित नश्वरता को समझ सके और अपनी आत्मा की अनश्वरता पर विश्वास कर सके।
  अपनी खुद की आत्मा से मिलन है ध्यान की अवस्था!
   अपने आप से मिलन है ध्यान ।
 

  ” जी आपकी बात समझ नही पाया गुरु जी!”

पंडित जी ने चरणामृत का कलश एक तरफ रखा और अपनी आसनी पर बैठ गए। वरुण भी उनके पास ही बैठ गया।
   वरुण को बैठता देख प्रज्वल भी उसी ओर बढ़ गया…

   ” बेटा हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने जीवन का अध्ययन किया था। वे रोगों कष्टों का उपाय तो बताते ही थे साथ  ही ऐसा जीवन जीने की कला सिखाते थे कि आप आधि व्याधियों से त्रस्त ही न हो। इसी लिए महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग की अवधारणा दी।
अष्टांग योग का प्रादुर्भाव ही मानव स्वास्थ्य के लिए किया गया I  इसके आठ भाग होतें हैं — यम नियम आसन प्राणायम प्रत्याहार ये अष्टांग योग के पांच भाग शरीर सौष्ठव के लिए हैं जिन्हें बहिरंग कहतें हैं। और धारणा ध्यान समाधि जो मन के सौष्ठव के लिए हैं जिन्हें अंतरंग कहतें हैं।
    अभी तुम जिस अवस्था में थे वो ध्यान की अवस्था थी।
तुमने अपने मन को केंद्रित कर लिया था , उस एक अनन्त सूक्ष्म बिंदु पर जहाँ से आगे बढ़ने पर तुम्हें एक अलौकिक मार्ग मिलता ,समाधि का।
   समाधि की अवस्था में पुरुष सभी बाह्य वस्तुओं के प्रभाव से विलग हो जाता है। ना भूख प्यास लगती है और न सुख दुख का अनुभव होता है।
   तभी तो कहा जाता है– “योगश्चितवृत्तिनिरोध”

   श्रीमद्भागवत गीता का सार भी तो यही है।

  ” जी पंडित जी! गीता सार सुनने फिर कभी आयेंगे अभी ज़रा भोग ले लेते हैं, फिर घर भी लौटना है।”

  प्रज्वल ने हाथ से ठेल कर वरुण को उठने का इशारा किया,लेकिन वरुण के हाव भाव से लग नही रह था कि वो वहाँ से हिलना भी चाहता है।
   खैर प्रज्वल की बात भी सही थी, उसे खुद एक प्रेजेंटेशन पर काम करना था। वो प्रज्वल के साथ उठ गया। उसने झुक कर पंडित जी के पैर छुए ….

  ” दीर्घायू भव!”

  प्रज्वल के साथ वरुण बाहर निकल आया, भोग प्रसाद खा कर दोनों अपने घर के लिए निकल गए…

    प्रज्वल गाड़ी पर एकमात्र हिंदी गानों का चैनल ट्यून करने में लगा था …

  ” अरे छोड़ मैं ही कुछ सुना देता हूँ प्रज्वल!”

  “नही भाई! अभी जिस ढंग से मंदिर में तू प्रवचन सुन रहा था उससे पूरा अंदेशा है तू प्रवचन ही झेलायेगा मुझे।
  और अभी इस वक्त इतने खूबसूरत मौसम में कुछ रोमांटिक सा सुनने का मन है। कोई मीठा सा गाना हो और रोड पर खड़ी कोई तीखी सी लड़की मिल जाये, बस इतनी सी चाहत है अपनी।”

  एक नज़र प्रज्वल को देख वरुण सामने देखता गाड़ी चलाता रहा..

          क्यूँ ना बोले मोसे मोहन
        क्यूँ है रूठे-रूठे मोहन यूँ
      कैसे मनाऊँ, हाय कैसे मनाऊँ
          उन बिन कटे ना रैना
     उन बिन आवे ना इक पल चैना
    उन बिन जीयूँ तो कैसे मैं जीयूँ हाय
    बहे नैना भरे मोरे नैना, झरे मोरे नैना
   मोहे नैना सुने नहीं कहना, बहे मोरे नैना…..

  गाने के बोल सुन वरुण को वापस कादम्बरी के साथ बितायी एक शाम याद आने लगी…
   उस शाम भी वो ऑफिस में काम निपटाता बैठा था कि कादम्बरी का मैसेज चला आया…
  ”  तुम्हारी माँ के साथ शॉपिंग में गयी थी कि हमारा एक छोटा सा एक्सीडेंट हो गया है, सिटी हॉस्पिटल में हूँ। हो सके तो आ जाओ।”

  मेसेज पढ़ते ही भागता दौड़ता वरुण बॉस के केबिन में  गया और कुछ देर बाद कि होने वाली सेक्टर सी ई ओ की मीटिंग में अनुपस्थिति के लिए माफी मांग छुट्टी ले बाहर निकल गया था।
      पार्किंग लाउंज से गाड़ी निकाल कर मेन गेट तक लाने में ही वो पसीना पसीना हो चुका था…
    लेकिन सामने अपनी लैंडरोवर से टिक कर खड़ी खुले बालों को लहराती कादम्बरी को देखते ही वो अचरज में डूबा गाड़ी को उस तक ले जाकर रोक गया..

” तुम यहाँ हो और माँ कहाँ है?”

  “मालूम था मुझे अगर तुम्हारी माँ का नाम नही लेती तो कभी ऑफिस से ऐसे नही निकलवा पाती तुम्हें, क्योंकि सिर्फ मेरे एक्सीडेंट की बात सुन तुम तुरंत मुझे फ़ोन करते हाल चाल जानने लेकिन माँ की बात सुनते ही तुम्हारा दिमाग सुन्न हो गया और तुम बाहर भागे।”

  अपनी बात खत्म करती कादम्बरी उसके गले में बाहें डाले झूल गयी थी, और अपने दिमाग को झटक कर उस पर आता गुस्सा वरुण ने जब्त कर लिया था।
   उसकी गाड़ी वापस पार्किंग में डलवा कर अपनी गाड़ी में उसे बैठा कादम्बरी खुद ड्राइव करने लगी थी।
  सीट पर बैठते ही माँ को फ़ोन मिला कर बार बार उसकी सलामती की पुष्टि कर लेने के बाद भी वो काफी देर तक सामान्य नही हो पाया था…
   उसके लाल लाल चेहरे और लाल आंखों को देख एक पल को दबंग कादम्बरी भी डर गई थी…

” क्या हुआ? नाराज़ हो गए क्या?”

उसने कादम्बरी को भरी नज़र से देखा ज़रूर लेकिन कोई भी अपशब्द नही बोल पाया

  “ऐसा झूठ कौन बोलता है कादम्बरी?”

  ” मैं बोलती हूँ वरुण! अपने प्यार का समय चुराने के लिए। फिर तो तुम बिदेसी बाबू बन जाओगे। और एक बार विदेश जाने के बाद सहज ही वापसी तो होगी नही।”

  “अरे तो साफ सफेद सच कह देती,  कि मिलना चाहती हूँ, आ जाओ। माँ के नाम का झूठ बोलने की क्या ज़रूरत थी…

  वो और भी बहुत कुछ कहना चाहता थाअपने मन की सारी पीड़ा सारा राग उस वक्त बहा देना चाहता था लेकिन कादम्बरी ने रेडियो ट्यून कर गाना चला दिया और उसके होंठो पर अपने होंठ रख उसे चुप करा दिया था……

       क्यूँ ना बोले मोसे मोहन
        क्यूँ है रूठे-रूठे मोहन यूँ
      कैसे मनाऊँ, हाय कैसे मनाऊँ
          उन बिन कटे ना रैना
     उन बिन आवे ना इक पल चैना
    उन बिन जीयूँ तो कैसे मैं जीयूँ हाय
    बहे नैना भरे मोरे नैना, झरे मोरे नैना
   मोहे नैना सुने नहीं कहना, बहे मोरे नैना…..

  ” अबे रोक रोक रोक गाड़ी…!

  वरुण कादम्बरी को सोचता गाड़ी बेखबरी में भगाए जा रहा था कि प्रज्वल की तेज आवाज सुन जैसे नींद से जागा …

  ” क्या हुआ ? क्यों रोकना है गाड़ी?”

  “अबे आंखें है या बटन ? साले दिख नही रहा गोरी मेम लिफ्ट मांग रही है और तू गाड़ी भगाए जा रहा, चल रिवर्स ले ले।”

  ” तुझे भी कहाँ से क्या नज़र आ जाता है?”

  ” अबे मुझे तो रास्ते पर खड़ी खूबसूरती नज़र आ रही है भाई पर तू तो आजकल आंखें खोले भी जाने क्या देखता रहता है, और सुन ले दो सौ साल हम पर शासन किया है गोरों ने तो उनकी इज़्ज़त करना तो बनता है बॉस ।
    और वैसे भी खूबसूरत लड़कियों को लिफ्ट न देने से पाप पड़ता है। समझा !”

“हम्म !” अब तक में वरुण ने उस लड़की के सामने गाड़ी रोक दी थी ,प्रज्वल ने इशारा कर वरुण को पीछे भेज दिया और खुद लड़की को सामने बैठा कर खुद ड्राइव करने लगा।

   वरुण मुस्कुरा कर पीछे बैठ गया..” साले ठरकी !”

  ” अबे क्या बोल रहा है कहीं अंग्रेज़न समझ गयी तो?”

  ” हिंदुस्तान में रहने वाले अंग्रेज तो अब तक “नेमस्टे ” से आगे बढ़े नही तो ये मैनहैटन की गोरी हमें क्या समझेगी। वैसे भी इनके लिए हिंदी गरीबों की बोली है इन्हें हिंदी बोलने समझने में शर्म आती है।”

  वरुण अपनी बात पूरी कर अपने मोबाइल में कुछ देखने जा रहा था कि सामने बैठी लड़कीं पीछे उसी की ओर मुड़ गयी..

  ” मैं हिंदी समझती हूँ। टूटा फूटा बोल भी लेती हूँ। असल मे मुझे आपका कल्चर एंड ट्रेडिशन्स बहुत पसंद है । आपके लार्ड कृष्णा पर मैं रिसर्च कर रही हूँ! और इसके लिए जल्दी ही इंडिया जाने वाली हूँ… मतुरा( मथुरा)  जाना है मुझे जहाँ लार्ड कृष्णा का बर्थ प्लेस है”

  उसकी बात सुन दोनो के दोनों अपनी जीभ काट कर रह गए…. हैरान परेशान प्रज्वल और वरुण की पहचान सिर्फ पंद्रह मिनटों में सारा मिल्टन से दोस्ती में बदल गयी और अपने गर्ल्स हॉस्टल की जगह वो उन दोनों के साथ उनके कमरे में गप्पे मारने और कॉफी पीने चली आयी….

  *********


     देव पारो का फॉर्म भर चुका था। नई नई किताबे कॉपियां और उनमें डूबती उतराती पारो।
  उसके लिए जीवन का अमृत पर्व चल रहा था। सुबह देव और घर के बाकी पुरुषों के काम पर निकलने के बाद जल्दी जल्दी अपनी सासु माँ का हाथ बंटाती पारो का पूरा ध्यान अपनी किताबो पर ही गड़ा रहता …
  कब रसोई से मुक्ति पाये और अपने कमरे का दरवाजा बंद किये अपनी किताबों में खो जाए। अपने से बड़ी उम्र की पढ़ाई कर रही थी वो, इसी से अक्सर गणित में उसे कठिनाई का सामना करना पड़ जाता था। और इसमें उसकी मदद करता था देव।
   दुकानदारी में और कुछ आये न आये दुकानदार को ज़िन्दगी का गणित तो आ ही जाता है, फिर किताब के सिलेबस का बीजगणित ज्यामिति और अंकगणित में क्या रखा था।  फिर देव तो पक्का दुकानदार था। उसके यहाँ काम करने वाले लड़के अक्सर उसे कहते ” मालिक उस गिराहक से आपने दो रुपिया कम लिया” और वो मुस्कुरा कर रह जाता।
   क्योंकि अपने यहाँ काम करने वाले भोले जीवों को कैसे समझाता की आज दो रुपये कम कमा कर वो रुपये नही बल्कि ग्राहक  कमा रहा था। कल को उसकी दुकान से संतुष्ट यही ग्राहक अपने जान पहचान के दस ग्राहक उसकी दुकान में भेजेगा और वो दस और दस दस को।
   तो वर्तमान के दो रुपये के नुकसान से भविष्य का सैकड़ों का फायदा कहीं ज्यादा भला है।
  यही गणित तो उसकी अपनी ज़िंदगी में भी उसने उतार रखा था।
    छोटे छोटे प्यार भरे मनके उसकी और पारो की जीवन माला में पिरोता वो बड़े आराम से अपने भावी जीवन का ठोस किला तराश रहा था।

    रसोई में अपनी भाभी को गोभी साफ करते देख पारो को पिछली रात पढ़ा विज्ञान का पाठ याद आ गया…

  ” बऊ दी जानती हो गोभी को फूल क्यों कहते हैं?”

ना में सर हिला कर लाली की माँ वापस हंसिये से भिड़ गयीं…

  ” फूलों के एक प्रकार को कोरिम्ब कहा जाता है। ऐसे फूलों का स्टॉक या तना फूल से ज़रा लंबा होता है और ऊपर छोटे छोटे फूल मिलकर छत सी बना लेते है। इसे कोरिम्ब कहतें है, गोभी उसी प्रकार में आता है इसलिए इसे भी  फूल की संज्ञा दी गयी है।”

  लाली की माँ के साथ साथ पारो की खुद की सास उसकी ताई सास काकी सास सभी अपने अपने हाथ में पकड़े अस्त्र शस्त्रों के साथ आंखें फाड़े उसे देखने लगी।
    रसोई के अपरिमित ज्ञान कोष में “कद्दू की छौंक में मेथी की अनिवार्यता” हो या “उरद के बड़ों की पिट्ठी में हींग” “सरसों में पकने वाली माछ के गुन और स्वाद की वृद्धि वर्णन हो या “नारियल और गुड़ के पूर की विशिष्टता” इसी तरह के ज्ञान का साम्राज्य था, उस ज्ञानोदधि में अब तक वहाँ उपस्थित किसी धुरंधर को इस गोभी महाज्ञान का परिचय न मिला था।
  
    ये कल का आया पैदल सैनिक तो महारानी की गद्दी तक पहुंचने को तैयार था।

   गोभी तो सिर्फ काट कर पकाने और खाने का विषय है, अधिक हुआ तो सामिष पकेगा या प्याज़ लहसन पड़ेगा इससे ज्यादा गोभी पर कौन विचार करता है?  गोभी का भाजा पकाना है या तरी, अधिक हुआ तो पकौड़े इससे ज्यादा महत्व की तो गोभी थी भी नही, फिर ये अजूबा सवाल कहाँ से और कैसे पैदा हुआ इस दो बित्ते की छोकरी के दिमाग में?
  पारो की सास ने अपनी जेठानी को देखा, जेठानी ने उन्हें और आंखों ही आंखों में जाने क्या गूढ़ मंत्रणा हो गयी…

  ” ठीक है ठीक है, ये सब मालूम कर के क्या करना है भला?  रसोई के भीतर गोभी बनानी आती है या नही बस यही विचारणीय है । समझीं। अब जरा जल्दी जल्दी हाथ चलाओ,घर के मर्दों के आने से पहले भोजन तैयार करना ज़रूरी है।”

   भोजन तैयार होता गया और इसके साथ ही एक साथ पारो की सभी सासों के दिमाग में भी कुछ पकता गया।
     मर्दों के खा पीकर चूकने के बाद औरतें बैठी और एक बार फिर तीनों सासों के सर भिड़ गए,सर से सर जुड़ाये उन तीनों ने पारो की अभी की और पहले की भी बातों पर विमर्श किया और सर्वसम्मति से यही निर्णय स्थिर हुआ कि ” पारो को तलैया वाली भूतनी चिमट गयी है। ” इसी से ये नासमझ बालिका ऐसी बहकी सी बातें कर रही है।

   शाम को लाली और दर्शन स्कूल से थके हारे लौटे, दोनों को नाश्ता पानी के साथ ही पारो पर चढ़ बैठी भूतनी की बात भी परोस दी  गयी।
    लाली तो अपनी माँ की बात हवा में उड़ा गयी लेकिन दर्शन के कान तुरंत खड़े हो गए।
  वो भाग कर देव भैया की दुकान पर पहुंच गया और एक सांस में घर पर चल रही सारी बात भैया को सुना दी।
   पारो को जकड़ रखी प्रेतनी को कोई आम आदमी नही पकड़ सकता था इसी से गांव के बाहर बड़े नीम के नीचे झोपडी बना कर रहने वाले कर्मकांडी बाबा के पास घर की औरतें अभी कुछ देर में पारो को लेकर जा सकती हैं हो सकता है काका बाबू साथ जाएं।
   दर्शन की बात सुनते ही देव घर की ओर भागा। अच्छी बात ये थी कि अब तक पारो ऊपर ही थी, और घर की औरतें ठाकुर माँ से सलाह मशविरे में लगी थी।
  देव को अचानक समय से पहले घर पर देख उसकी माँ को राहत ही मिली..

  ” अच्छा हुआ बाबून तू आ गया। आ तुझे कुछ बताना है!”

” क्या हुआ माँ बोलो?”

” बाबून ज़रा आराम से सुनना बेटा। हम सब को लगता है तेरी दुल्हन को तलैया की चुड़ैल चढ़ गई है।

  ” ऐसा क्यों लगता है माँ ? ”

  “बाबून क्या बताऊँ बेटा तेरी दुलहिन अजीबोग़रीब बातें करती है। एक दिन काम वाली श्यामा की दस साल की बेटी को बोलने लगी कि पौधे खाना बनातें हैं। अब बोल हम उसे क्या समझाएं छोटी बच्ची है क्या ? अब अगर पौधे ही खाना बना लेते तो हम औरतें क्या रसोई में घास छिलतीं हैं?  एक दिन कहने लगी हमारे सीने में उड़ती हुई हड्डियां भी होती हैं। हे माँ दुग्गा रक्षा करो माँ ! आज लाली की माँ से कहने लगी गोभी असल में फूल होती है। मैं जानती हूँ बेटा पारो में कोई अवगुण नही है लेकिन अगर किसी स्वस्थ व्यक्ति को भी भूत पकड़ ले तो वो ऐसी अबूझ बातें कहने ही लगता है।


  अब तक एक किनारे चुप खड़ी लाली की माँ भी आगे आकर अपना अनुभव बांटने लगी..

  ” लाला बाबू बुरा मत लगा लीजियेगा लेकिन मैंने अक्सर उसे दोपहर को अपना कमरा बंद कर के बड़बड़ करते सुना है।”

  ” क्या बड़बड़ाते सुना है बऊ दी ?” मन ही मन अपनी हंसी छिपाते देव ने बड़े यत्न से गंभीरता का चोला संभाले हुए प्रश्न किया..

” मालूम था कि आप लोग विश्वास नही करेंगे इसलिए जितना टूटा फूटा लिख सकती थी लिख लिया कि आप सब को दिखा पाऊं! वो तो पूरे राग में गाती है ये गीत!
   
  अपने कमरे से एक मुड़ा तुड़ा सा पर्चा लिए लाली की माँ चली आयी…
   ” हाईडोजान हीलेयम लिथीयाम …..

   हाइड्रोजन हीलियम लिथियम .. इसका मतलब पारो कमरे में मेंडलीव की आवर्त सारणी याद किया करती थी, जो इन लालबुझककड़ो के लिए ताल की चुड़ैल के गीत हो गए थे।
   बेहद तकलीफ से ही देव ने अपनी हंसी रोक रखी थी। लाली की माँ के टूटे फूटे अक्षरों को देख कर उसकी खुद की सास का सीना अपनी बुद्धिमती बहु के कारण चौड़ा हो गया। आख़िर उन सब अंगूठा टेको में उनकी बहू चौथी कक्षा तक पहुंची तो थी, भले ही फेल हो गयी हो।
  अब ये नई महारानी आंठवी कक्षा की पढ़ी आयी थीं।
जभी तो पहले के लोग कहते थे लड़कियों को ज्यादा पढ़ाना लिखाना सही नही है,भूत पकड़ जाता है।
  
  “दुग्गा दुग्गा !”माँ दुर्गा को स्मरण कर वो एक ओर बैठ गईं।

  ” ये तो बड़ा गंभीर मसला हो गया माँ।”

  देव की बात सुन उसकी मां ने बड़ी करुण दृष्टि से अपने भोले बाबून को देखा… ” हाय इतना सुंदर सोने समान लड़का और इसी की दुल्हन को चुड़ैल चिपक गयी। पूरे गांव में क्या और कोई घर नही मिला चुड़ैल को?”

  ” आप लोग चिंता न करें, गांव के बाहर एक  बाबा बैठते हैं , बूढ़े नीम के नीचे। सुना है देसी विदेसी सभी तरह की चुड़ैलों को पकड़ने में महारत है उन्हें। अगर माँ आप सब कहें तो मैं पारो को वहाँ से बंधवा लाऊं।”

  सभी औरतों के चेहरे पर एक सी मुस्कान रेंग गयी

  “तू अकेला क्यों जाएगा रे बाबून। मैं चलूंगी न तेरे साथ!”

  “नही माँ तुम घर देखो। इस बार मुझे अकेले ही पारो को ले जाने दो। ज़रूरत पड़ी तो अगली बार तुम्हें साथ ले चलूंगा।”

  गले से अपना आँचल डाल मन ही मन ईश्वर को प्रणाम कर देव की माँ ने उसे पारो को साथ ले अकेले ही बूढा नीम जाने की इजाजत दे दी।

  क्रमशः

aparan…..

  




    

  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s