समिधा- 11




    समिधा 11



आप लोग चिंता न करें, गांव के बाहर एक  बाबा बैठते हैं , बूढ़े नीम के नीचे। सुना है देसी विदेसी सभी तरह की चुड़ैलों को पकड़ने में महारत है उन्हें। अगर माँ आप सब कहें तो मैं पारो को वहाँ से बंधवा लाऊं।”

  सभी औरतों के चेहरे पर एक सी मुस्कान रेंग गयी

  “तू अकेला क्यों जाएगा रे बाबून। मैं चलूंगी न तेरे साथ!”

  “नही माँ तुम घर देखो। इस बार मुझे अकेले ही पारो को ले जाने दो। ज़रूरत पड़ी तो अगली बार तुम्हें साथ ले चलूंगा।”

  गले से अपना आँचल डाल मन ही मन ईश्वर को प्रणाम कर देव की माँ ने उसे पारो को साथ ले अकेले ही बूढा नीम जाने की इजाजत दे दी।

  इजाज़त मिलते ही देव दो दो सीढ़ियां लांघता अपने कमरे में भाग चला। कमरे में अंदर जाकर उसने दरवाज़ा भिड़ा लिया, उसे ऐसे असमय कमरे में देख पारो भी चौन्क गयी…

  “आप इतनी जल्दी आ गए। ”

  पारो के चेहरे की खुशी देख देव मुस्कुरा उठा..

  ” जल्दी से तैयार हो जाओ। तुम्हें बाहर घुमाने लेकर जाना है।”

” हाय सच्ची! लाली को भी संग ले लूँ।”

” नही आज बस हम तुम जाएंगे। तुम फटाफट तैयार हो जाओ, और सुनो अभी बाहर किसी से कुछ कहना नही। ”

  हां में सर हिला कर मुस्कुराती पारो ने अलमारी से अपनी ढ़ाकाई लाल साड़ी निकाली और अखरोट की लकड़ी के पार्टीशन के पीछे बदलने चली गयी।

   उसके तैयार होकर आते में देव कहाँ कहाँ घूमना है यही सोच सोच मुस्कुराता रहा।
   दोनो साथ नीचे उतरे, तब सारी औरतें नीचे साथ बैठी चाय पी रहीं थीं।
   उन लोगों को जाते हुए आज किसी ने नही रोका टोका ये देख पारो भी आश्चर्य में डूब गई। पहले तो लाली और दर्शन के साथ भी कहीं जाना हो तो पचास बहाने लगाने पड़ते थे। देव के साथ तो खैर अकेले जाना ही नही हुआ था कभी।

  वो चुपचाप सर झुकाये देव के कदम से कदम मिलाती उसके पीछे चलती चली गई ….
   बाहर अपनी बाइक में पारो को पीछे बैठाए देव हवा से बातें करता आगे बढ़ गया। इतने महीनों की शादी में आज पहली बार उसकी नाज़ुकदिल दुल्हन उसके साथ बैठी थी।
    दोनों हाथों से सीट के अगले पिछले हिस्से को कस कर थामी पारो बाइक को लगने वाले हर झटके पर ज़रा और आगे लुढ़क पड़ती थी।
    बाइक की पिछली सीट ज़रा ऊंची होने से वो बार बार आगे सरकती जा रही थी, संतुलन बिगड़ने से कहीं गिर न पड़े ये सोच कर उसने धीरे से अपना एक हाथ देव के कंधे पर रख दिया, देव मुस्कुरा कर गाड़ी भगाता रहा…
       शहर के एक मूवी थियेटर के बाहर पारो को उतार वो गाड़ी पार्क कर उसके पास चला आया।
    थिएटर में मूवी लगी थी — दोस्ताना

   दो टिकट लिए वो पारो का हाथ थामे अंदर चला गया। पारो के लिए ये भी एक नया अनुभव था। उसे फिल्मों का बहुत शौक था लेकिन आज तक उसे कभी घर से बाहर फिल्में देखने नही मिला था।
   उसके घर पर भी नीचे ठाकुर माँ के कमरे में रखे टीवी पर बांग्ला दर्पण में बस संतवाणी ही चला करती थी।
  अक्सर शाम के समय वो बाली दा के काम से आने तक तारा बऊ दी के साथ कभी “साँझेर बाती” कभी “जिओन गाथा” कभी “कोने बऊ” ही देखा करती, हां कभी कभी जोइता के घर पर ही उसे फिल्में देखने का सौभाग्य मिला था। वो भी सारी ऐसी ही फिल्में उसने आज तक देखी थी जो उसकी माँ के भी पैदा होने के पहले की थीं।
   फिर भी किस्मत से उसने हमेशा वही देखा जिसके कारण उसका सिनेमा प्रेम बढ़ गया।
अपनी छोटी सी उम्र में उसे ” कागज़ के फूल” के नायक गुरुदत्त का ऑंसू भरी आंखों से
        “ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया
         ये इनसां के दुश्मन समाजों की दुनिया
         ये दौलत के भूखे रिवाज़ों की दुनिया
         ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ”
  गाना भले ही न समझ आया हो लेकिन उस नायक के बहते ऑंसू पारो ने अपनी आंखों में ज़रूर महसूस किए थे।
   उसे दूसरी जो फ़िल्म देखने को मिली वो उसे अच्छी तो लगी लेकिन अंत में नायक का सिक्का उछाल कर मर जाना उसे अंदर तक भिगो गया, और बस जय के मरने के कारण ही उसने शोले को एक बकवास फ़िल्म की उपाधि दे डाली।
  जोयता के साथ इसी बीच उसने छिप छिप कर कई फिल्में देख ली लेकिन अपनी शादी से ठीक पहले उसकी देखी फ़िल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे ने उस पर कुछ अलग ही रंग जमा दिया।
     नायक का हाथ बांन्ध कर नायिका के पलटने का इंतेज़ार उसने भी धड़कते दिल से महसूस किया, और काजोल के पलटने पर शाहरुख की मुस्कान उसका भी दिल ले गयी।
  इस सब के बावजूद उसे आज तक मूवी थियेटर के दर्शन नही मिले थे। और एक दिन उसने बातों बातों में ही देव से अपनी इस अधूरी सी ख्वाहिश का ज़िक्र भी किया था।
  अपनी उसी अधूरी इच्छा का सम्मान देख वो मुस्कुराती इधर उधर थियेटर को आंखे फाड़े देखती धीमे कदमों से बढ़ रही थी कि देव ने उस भीड़ में उसका हाथ थाम लिया…

  ” मेरा हाथ पकड़ी रहो, कहीं भीड़ भाड़ में गलती से किसी और को अपना पति मान उसके साथ न चल देना।”

  मुस्कुरा कर पारो ने ना में सर हिलाया और देव के  साथ आगे बढ़ गयी…

   फ़िल्म शुरू हो गयी , हंसी मजाक मस्ती में फ़िल्म आगे बढ़ती चली गयी और फ़िल्म की कई बातें पारो के दिमाग के ऊपर से निकल गईं…

  ” सुनिए मुझे एक बात समझ नही आई?”

” क्या ?”

” ये हीरोइन दोनो हीरों के साथ रहने क्यों तैयार हो गयी। मतलब उसने क्या कहा वो नही समझा।”

  पारो का सवाल समझ आते ही देव को हंसी आने लगी…. फ़िल्म में दोनो नायकों द्वारा परिस्थिति वश खुद को गे बताए जाने को वो पारो को क्या और कैसे समझाता?
   कुछ इधर उधर की बातें बना कर वो फिर फ़िल्म देखने लगा, लेकिन कुछ देर में ही स्क्रीन पर चलते गीत ” माँ दा लाड़ला बिगड़ गया” पर पारो ने एक बार फिर चीर फाड़ शुरू कर दी।
     फ़िल्म का ओर छोर पारो की समझ से परे था, और वो उस कहानी को अपने हिसाबों से समझ देव को समझाए जा रही थी।
   देव भी पूरी तन्मयता से पारो की बातें सुनने और समझने का नाटक कर रहा था। इसी सब में कभी उसे बीच में हंसी का दौरा भी पड़ जाता तब उसके साथ उसकी हंसी में उसका साथ देती पारो भी खिलखिला उठती।
    फ़िल्म समाप्त होते ही वहाँ से दोनों बाहर निकल गए….
   रास्ते में फुचका खाने के लिए देव ने गाड़ी रोकी तो पारो अचकचा गयी…

” बाहर से खा कर चले गए तो घर का खाना बच रहेगा। घर पर डांट भी पड़ेगी।”

“नही पड़ेगी। मैं हूँ न सब संभाल लूंगा। तुम खाओ जितना खाना हो।”

  मुस्कुराती पारो ने देव को देखा और दोनो गोलगप्पे वाले के पास पहुंच गए..

” मैं तो पचास खा सकती हूँ।”

” बस ! उस दिन तो बड़ी बड़ी बातें कर रहीं थी कि मैं गोलगप्पे खाने की शर्त में सबसे जीत जाती हूँ, बेहिसाब खा सकतीं हूँ। और अब बस पचास?”

  ” अरे तो क्या? जोइता की साथ लगी शर्त जीतना आसान होता था न। वैसे सही कहा मैं तारा बऊ दी से भी जीत ही जाती थी।

  ” तो आओ फिर,मुझसे भी कर लो मुकाबला। वैसे मैं एक बार में सौ खा सकता हूँ।”

” झूठे ! घर पर इतने से चावलों को भी पूरा खाया नही जाता आपसे। बड़े आये सौ गोलगप्पे खाने वाले।”

” तो आओ न मैदान में। देख लो फिर।

  दोनों की शर्त लगी और गोलगप्पे वाला खिलाने लगा
देव तो पारो को जल्दी जल्दी खाते देख ही खुश हुआ जा रहा था। कुछ दो चार खाने के बाद वो बस उसे देखता मुस्कुराता रहा और एक के बाद एक लगभग बीस पच्चीस गोलगप्पे खाने के बाद पारो ने भी हथियार डाल दिये।

   “तो इसका मतलब पारो को गिनती नही आती। इनके यहाँ बीस को पचास माना जाता है। क्यों? है ना?”

” हां बिल्कुल ! जैसे आपके यहाँ पांच को सौ गिना जाता है। बिल्कुल वैसे ही…

दोनो हंसते खिलखिलाते वहाँ से आगे निकल गए।

  पारो की पसंदीदा कुल्फी दिखने पर दोनों ने कुल्फी खाई और आगे बढ़ गए…

  ” कुछ ज़रूरी सामान तो नही लेना पारो?”

” नही। आप तो मेरी ज़रूरत से पहले ही सब ला देतें हैं।”
    पारो ने अपना चेहरा देव के कंधे पर रख दिया। अब दोनो को बातें करने में सुविधा भी थी। बातें करते करते दोनों गाड़ी में इधर से उधर चक्कर लगाते रहे।
   पारो के ही ध्यान दिलाने पर कि रात बहुत हो गयी है अब घर चलना चाहिए देव ने घर की ओर गाड़ी मोड़ ली…
   रास्ते पर पड़ने वाली पान की दुकान पर गाड़ी रोक उसने दो गिलौरी बंधवाई और एक पारो के हाथ में दे दूसरी अपने मुहँ में रख ली..

” उस दिन मुझे पान न खिला पाने की कसक आज ऐसे पूरी कर ली । है ना?”

” हां और अब हफ्ते में एक दिन हम कैसे भी कर के बाहर निकल ही जायेंगे बस एक शर्त है?

” क्या ?”

” किसी से कुछ भी मत बताना कि हम कहाँ घूमे, क्या खाया। कुछ भी नही। समझीं? “

  हां में सर हिला कर पारो ने देव के कंधे पर सर रखे आंखे मूंद ली , फ़िल्म का एक गाना जिसके बोल तो उसे याद नही थे लेकिन कुछ छोटे मोटे शब्द जो याद रह गए थे उन्हें गुनगुनाती पारो आंखें बंद किये मुस्कुराती रही….

        तू है, तो टेड़ी-मेड़ी राहें, उलटी-पुलटी बातें
                सीधी लगती हैं
     तू है, तो झूठे-मूठे वादे, दुश्मन के इरादे
                सच्चे लगते हैं

         जो दिल में तारे-वारे दे जगा
              वो तू ही है, तू ही है
       जो रोते-रोते दे हँसा, तू ही है वही


       जाने क्यूँ (जाने क्यूँ) दिल जानता है
           तू है, तो I’ll be alright …


  ***********


        वरुण का जीवन अपनी गति से चल रहा था।
    उसके रूम मेट प्रज्वल को तीन महीने के लिए यू के जाना पड़ा था, अकेले वरुण का एक बंधा बंधाया रूटीन हो गया था, रोज़ सुबह उठ कर कॉफी बस पीकर ऑफिस निकल जाना और सारा दिन काम में डूबे रहने के बाद शाम को घर आकर कुछ भी बना कर खा लेना और कुछ देर लैपटॉप पर कोई मूवी या शो देख कर सो जाना बस यही उसका रूटीन हो गया था।
      एक शाम इत्तेफाक से टकराई विदेशिनी सारा से भी दोनो की ठीक ठाक दोस्ती हो गयी थी।
सारा वहाँ न्यू जर्सी में रिसर्च स्कॉलर थी , इसी से यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में ही रहा करती थी। कभी महीने में एक आध बार वो उनमें से किसी एक को फ़ोन कर लिया करती थी। प्रज्वल ही अक्सर उसे फोन कर बुला लिया करता था। प्रज्वल के जाने के बाद सारा का भी वरुण के कमरे में आना एकदम से बंद ही हो गया था कि एक शाम वो अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के चली आयी…
     शनिवार होने से छुट्टी  होने से वरुण घर पर ही था और कॉफी पीते हुए अपने लैपटॉप पर कोई मूवी देख रहा था।
    दरवाज़े पर बेल होने से वो बिना लैपटॉप बंद किये ही दरवाज़ा खोलने चला गया।
   सारा को देख उसे भी खुशी हुई…

  ” बहुत दिनों से मिलना नही हुआ था इसलिए मैं ही चली आयी। तुमसे तो फ़ोन की भी उम्मीद नही की जा सकती।

मुस्कुरा कर सारा अंदर चली आयी। वरुण ने हँस कर उसका स्वागत किया और उसके बैठते ही उसके लिए भी कॉफी लेने अंदर चला गया….
   सारा ने जाने क्या सोच कर लैपटॉप की स्क्रीन अपनी तरफ घुमा ली…
  उसी समय वरुण कॉफी लिए बाहर चला आया…

” आई एम सॉरी ऐसे किसी का लैपटॉप बिना उससे पूछे देखना नही चाहिए , पर जो म्यूज़िक सुनाई दे रहा था उसे सुन मैं खुद को रोक नही पायी। इतना भावुक और डिवोशनल था कि…


” ओह्ह नही कोई बात नही, तुम देख सकती हो।”

  ” क्या नाम है मूवी का? “

  ” शायद “कृष्ण सत्य” । मुझे भी सही नही मालूम। बस ऐसे ही सर्च करते हुए नज़र पड़ी और देखने लगा। मूवी मुख्यत: भगवान के चमत्कारो पर है। सो तुम्हें शायद पसन्द न आये। ऐसी मूवीज़ मुझे भी कुछ खास पसन्द नही आती, आज तो बस ऐसे ही नज़र पड़ी सोचा ये सीन खत्म हो जाए फिर बंद कर दूंगा लेकिन एक बार देखना शुरू किया तो देखता ही चला गया।”

सारा मुस्कुराने लगी…

” मेरी थीसिस का विषय भी तो यही है। “भारतीय संस्कृति में भगवान और उनके चमत्कार” मिथ या सत्य।
  एक बात कहुँ अगर संसार में बुरी शक्तियां हैं तो अच्छी शक्तियां भी हैं। मुझे तुम्हारी माइथोलोजी पर विश्वास होता है, और वो भी थोड़ा नही बहुत ज़्यादा। तुम्हारे यहाँ लोग भगवान पर विश्वास करतें हैं और डरते भी हैं। और शायद उसी डर के कारण वो गलत काम करने से पीछे हट जाते हैं। ये एक बहुत स्ट्रांग फीलिंग है कि तुम लोग अपने भगवान को भी अपने जैसा मानते हो। ज़िंदा और तुम्हें देखता हुआ। तुम उसे खाना बना कर खिलाते हो ,तुम उसे सुलाते हो झूले में झुलाते हो,नहलाते भी हो, फूलों और खुशबुओं से सजाते हो … तुम लोग अपने भगवान का वैसे ही ध्यान रखते हो जैसे कोई अपने बच्चे का ध्यान रखता है।
    कभी तुम अपने भगवान को कान्हा मान उसमें बच्चे का रूप देखते हो, और कभी उसमें औरत का रूप मान उसे शक्ति कहते हो। कभी वही भगवान विष्णु के रूप में सारी सृष्टि के रचयिता हो जाते हैं तो कभी शिव के रूप में संहारक।
   इसका मतलब तुम अपने हर सुख दुख का कारण भगवान यानी उस अदृश्य शक्ति को मानते हो…
      और जब तुम्हें कोई तकलीफ होती है तो तुम पूरे हक से उसके सामने हाथ फैला के मांगते हो। बिल्कुल जैसे वो मूर्ति नही है तुम्हारे सामने ज़िंदा खड़ा है और तुम्हारी बातें सुन देख और समझ रहा हो।”

  वरुण सामने बैठे ध्यान से सारा की बात सुनता रहा।

“बात तो सही है तुम्हारी। मेरे घर पर ही मेरी माँ रोज़ सुबह का खाना पहले अपने कान्हा जी को भोग लगाती है उसके बाद हमें खिलाती है। बस मुझे हमारी माइथोलोजी की एक बात बिल्कुल पसंद नही आती और उसी के कारण मैं भगवान पर विश्वास नही कर पाता।”

” क्या है वो बात ?”

  “कुछ खास बड़ी बात नही है लेकिन मुझे हमारे बुजुर्गों का बात बात पर ऐसा करोगे तो भगवान नाराज़ होकर श्राप दे देंगे ऐसा कर दिया तो भगवान ये कहर बरपाएँगे वाली बातें समझ नही आती। बचपन से हमारे यहाँ पाप पुण्य के नाम पर , भगवान के नाम पर या तो हमें डराया जाता है या हमारे इमोशंस के साथ खिलवाड़ किया जाता है।
  बार बार कहा जाता है अगर भगवान मानते हो तो ये पढ़ो, वो करो। अरे बार बार हमें ये साबित करने की क्या ज़रूरत की हाँ हम मानतें हैं।
   ज़रूरी तो नही की अगर हम भगवान पर विश्वास करतें हैं तो हमें धार्मिक किताबें ही पढ़नी होंगी या भजन गाने होंगे…
   बस इन्हीं सब बातों के प्रपंच से बचने के लिए….

  वरुण की बात आधे में काटती सारा आगे बोल पड़ी.

” तुमने नास्तिकता का चोला ओढ़ रखा है। किसी के सोचने और समझने से फर्क भी क्या पड़ता है वरुण। तुम्हारी श्रद्धा और विश्वास तो पूरी तरह तुम्हारे और तुम्हारे भगवान के बीच की बात है। उसमें तुम किसी और का हस्तक्षेप देखते ही क्यों हो। आई मीन किसी और के कुछ कहने से तुम्हें और तुम्हारे विश्वास को कोई फर्क नही पड़ना चाहिए…

” हम्म बात तो सही हैं तुम्हारी..

कुछ देर और इधर उधर की बातें करने के बाद सारा वापस जाने के लिए उठ गई…

  ” आज तुम्हें बहुत बोर किया न वरुण?”

  ” नही बिल्कुल नही। बल्कि मैं तो यही सोच रहा था कि हमारे भगवानों के बारे में हमसे ज्यादा तो तुम जानती हो..”

  सारा मुस्कुरा उठी…

  ” अच्छा मैं परसों इंडिया जा रही हूँ। तुम्हें अगर अपनी सिस्टर या घर वालों के लिए कुछ भेजना हो तो दे देना। “

” अरे वाह ! ये तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन मैंने ऐसा कुछ खरीद नही रखा।

” कोई बात नही। मेरे साथ चलो और अभी कुछ ले लो।”

” हां ये सही रहेगा। चलो फिर साथ ही चलतें हैं , और बाहर ही कुछ खा भी लेंगे।”

  वरुण और सारा मार्किट के लिए निकल गए।
काफी देर की शॉपिंग के बाद वरुण ने अपनी माँ , रोली और पापा के लिए काफी सारा सामान सारा को थमा दिया, एक छोटा सा सॉलिटेयर भी उसने गिफ्ट पैक करवा कर कादम्बरी के लिए सारा को देने के बाद दोनों वहाँ से बाहर निकल गए।
    मॉल की दुकान से बाहर निकलते ही गाड़ी का दरवाजा खोलते में वरुण का सर घूम गया, और उस बार उसे इतनी जोर का चक्कर आया कि वो गाड़ी के बाहर ही बेहोश होकर गिर पड़ा।
   

  *********

    देव पारो को लिए घर पहुंचा तब तक घर पर सब का खाना पीना निपट चुका था। घर के मर्द पारो और उसे पकड़ी चुड़ैल वाली बात पर नाराज़ हो सकते थे इसी से घर की औरतों ने इस अति महत्वपूर्ण बात को उन लोगों से छिपा लिया, उन लोगों के पूछने पर देव के किसी दोस्त के बुलावे पर वो दोनो वहाँ खाने गए हैं का बहाना लगा कर सभी को खिला पिला दिया।
     नीचे ओसारे में बैठे सभी से नज़रे चुराते देव ऊपर जाने लगा कि उसकी माँ ने उसे हाथ पकड़ एक ओर खींच लिया। वो माँ के साथ उनके कमरे की ओर चला गया और पारो धीमे कदमों से ऊपर अपने कमरे में चली गयी…

” क्या हुआ ? सब ठीक तो है ना बाबून?”

  ” सब ठीक है माँ, लेकिन बाबा जी ने कहा है हफ्ते में एक बार पारो को उनके पास ले जाना होगा।”

” हां तो ले जाना। पर बेटा कब तक ले जाना होगा?”

” ये वो अगली बार बताएंगे माँ। अब मैं ऊपर जाऊँ? बहुत थकान सी हो गयी है।

” हां हाँ बेटा। पर सुन तुझे डर तो नही लगेगा ना?”

वरुण ने अपने हाथ में बंधा कलावा दिखा दिया…

” बाबाजी ने मुझे रक्षासूत्र बाँध दिया है माँ, मेरा कुछ नुकसान नही होगा।”

देव की कलाई देखते ही माँ प्रसन्नता से मुस्कुरा उठी…

” भगवान तेरी रक्षा करें बेटा। बाबा जी की जय हो।”

  मुस्कुरा कर हाथ ऊपर की ओर प्रणाम की मुद्रा में जोड़े देव कुछ गुनगुनाता हुआ ऊपर चला गया…

   जाने क्यों दिल जानता है ….
           तू है, तो I’ll be alright….

उसे जाते देख उसकी माँ बाहर बाकियों को भी ये खुश खबर देने चली गयी…


क्रमशः

  aparna …


 
 



 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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