समिधा-13




   समिधा — 13


      बातचीत चलती रही, सब अच्छा अच्छा सा ही लग रहा था, शाम होते होते लड़के वाले चले गए। घर की औरतों ने सुबह से बहुत सारा परिश्रम किया था। जिसको जो अच्छा बनाना आता था उसने वही बना कर परोस दिया था, एक तरह से होड़ सी मच गई थी सासू और बहुओं के बीच।
   सभी ने कलछी तोड़ कर रख दी थी।

   रात होते होते पारो ने बाकियों के साथ मिल कर सारा काम समेटा और देव के लिए एक कटोरी में खीर लिए कमरे में चली आयी। आते आते रास्ते में उसने लाली को भी कमरे में ही बुला लिया…

   ” तुम चलो काकी मैं आती हूँ। ” कह कर लाली अपनी माँ के साथ कुछ विचार विमर्श करती रही।

  कमरे में पहुंच कर पारो देव के पास खीर ले आयी…

” ये क्या ले आयीं? “

” पायेश !!” मुस्कुरा कर पारो ने उसकी ओर खीर बढ़ा दी..

” अरे मैं तो खा चुका था बाबा! मैं इतना मीठा कहाँ खाता हूं, और फिर तुम लेकर आई हो कहीं नमक तो नही मिला रखा ना!”

  हंसते हुए उसके हाथ से खीर की कटोरी ले वो खाने लगा

  ” लाली को बुला कर आई हूँ, आप उससे भी एक बार पूछ लो कि वो क्या सोचती है? वैसे आगे क्या करना है? कुछ सोच रखा है आपने?”

  ” हाँ ! अगर लाली ने मना किया तो फिर मैं सीधा उस लड़के से मिल कर मना कर दूंगा। कहूंगा कि शादी तय करने के बाद दो साल रुक जाए। दो साल में लाली अट्ठारह की हो जाएगी तब ब्याह कर देंगे। “

” और अगर नही माना तो ? “

” अब तुम्हारे अनुसार नमक वाली चाय पी गया मतलब उसे रिश्ता पसन्द है तो मान भी जाएगा ही । है ना? “

  मुस्कुरा कर पारो ने हाँ कहा कि उसी समय लाली भी उनके कमरे में चली आयी। उसे आया देख देव और पारो एक दूजे की ओर देखने लगे कि बात कैसे शुरू की जाए । दोनो सोच रहे थे कि लाली ने अपने गले का हार पारो को दिखाते हुए खुद ही बोलना शुरू कर दिया…

” काकी ये हार कैसा लग रहा? सुंदर है ना। पूरे पांच तोले का है इसके साथ के झुमके भी ढाई ढाई तोले के मतलब कुल जमा दस तोला।”

” हाँ वो मैं समझ गयी लेकिन ये तो कहो कि इतना गणित क्यों लगाया जा रहा। ”

  ” गणित और मैं? गणित मरा कद्दू। ये तो मैं तुम्हे दिखाने लायी हूँ । मुझे बिदाई में माँ यही पहनाने वाली हैं। और छोटू माँ यानी तुम्हारी सास कंगन पहनाएगी वो भी पूरे आठ तोले के। ”

  लाली का चेहरा फूलों सा दमक रहा था। उसके दमकते चेहरे को देख पारो देव की ओर देखने लगी…
  देव ने धीरे से लाली से पूछ ही लिया..

.” तू खुश है लाली ?”

  संस्कारी लज्जाशील घर के बेटी अपने ही काका के सामने अपनी होने वाली शादी के लिए अपनी खुशी कैसे बताती भला। वो तो अपनी काकी से अपने गहनों की खुशी जताने भागती चली आयी थी,लेकिन इस सब जोड़ घटाव में काका उससे उसकी खुशी भी पूछ बैठेंगे उसे कहाँ पता था?

  वो शरमा कर नीचे देखने लगी…

” बोल न लाली! अगर तुझे रिश्ता पसन्द नही होगा तो हम इस रिश्ते के लिए मना कर देंगे.. ठीक है तू कुछ न बोल ,तेरे काका कल ही लड़के से मिल कर मना कर आएंगे….

  पारो की बात पूरी होने से पहले ही लाली ने काट दी

  ” मैंने कब बोला कि मुझे रिश्ता नही पसन्द ! बल्कि मैं तो आप को गहने दिखाने आयी थी काकी।”

  मुस्कुरा कर पारो लाली के गले से झूल गयी …

” इसका मतलब लाड़ो रानी को प्रखर बाबू खूब भा गए । है ना? ”

  लाली शरमा कर नीचे देखने लगी और देव उन दोनों को बातें करता छोड़ वहाँ से उठ कर कमरे के एक तरफ बने दरवाज़े को खोल बाहर छोटी सी बालकनी में चला आया। उसके मन में जो द्वंद चल रहा था न वो पारो समझ पा रही थी और न लाली । यहाँ तक कि उसकी माँ बड़ी माँ किसी को भी तो कोई फर्क नही पड़ता था।
   खैर उसकी खुद की शादी के पहले वो भी कहाँ इतनी गहराई से सोच पाता था, जितना अब सोचने लगा था।
   पारो के आने के बाद ही तो उसे इस बात का एहसास हुआ था।
   वो काफी देर  वहाँ खड़ा बाहर खिलता चाँद देखता रहा, काफी देर बाद जब वो अंदर आया तब तक लाली वहाँ से जा चुकी थी।
    पारो अपनी किताबें जमा कर रख रही थी, देव ने अंदर आकर बालकनी का दरवाजा बंद कर लिया और अपना तकिया उठाये सोफे की ओर बढ़ गया..

  ” रोज़ रोज़ कमर नही दुखती, वहाँ सोफे पर सोते हुए!”

  ना में सर हिला कर मुस्कुराते हुए देव ने अपना तकिया वहाँ बिछा लिया..

  ” आप यहाँ भी सो सकते हैं,पलंग बहुत बड़ा है, और मैं लात भी नही मारती । ”

पारो की बात सुन देव हँसने लगा…

  ” अरे हँसने की क्या बात है इसमें ? सच कह रही हूँ मैं। मुझसे घबराने या डरने की ज़रूरत नही है। ”

  ” तुमसे नही घबराता ! मैं खुद से अपने आप से डरता हूँ इसलिए तुमसे दूर रहता हूँ। ”

” मतलब ? “

“मतलब तुम नही समझोगी। अभी चुप चाप सो जाओ। हो सकता है कल तुम्हारा रिज़ल्ट आ जाये।”

हाँ में सर हिलाती पारो ने दरवाज़े पर सांकल लगाई और बत्तियां बुझा कर सोने चली गयी।

  अगले दिन भी दंसवी कक्षा का चिरप्रतीक्षित परिणाम किसी कारण से नही आ पाया लेकिन प्रखर के घर से रिश्ते के लिए सहमति आ गयी।
   और उसके अगले दिन ही वर पक्ष के गुरुजन दुल्हन को आशीर्वाद देने पहुंच गए।
   घर पर एक बार फिर उत्सव का माहौल था। सभी अस्त व्यस्त इधर उधर वर पक्ष की सेवा में लगे थे।
  देव को ये बाल विवाह रुच नही रहा था लेकिन घर वालों की लंबी चौड़ी फ़ौज के सामने उसकी हस्ती नक्कारखाने में तूती की आवाज़ से ज्यादा न थी।

   सगाई का वैसे तो देव के घर पर प्रचलन न था लेकिन प्रखर के घर वाले इन लोगों से थोड़ा ज्यादा आधुनिक थे इसी से अंगूठी की रस्म अदायगी के लिए सभी घर के बीचों बीच बने आंगन में जमा थे।
     पंडित जी के कुछ मंत्रोच्चार के बाद दूल्हा बाबू को उनकी भाभी ने चांदी की थाली में। गुलाबों की पंखड़ी के बीच रखी सोने की अंगूठी लाली को पहनाने के लिए आगे बढ़ाई, और दूल्हा बाबू ने जैसे ही अंगूठी हाथ में उठायी की सदर दरवाज़े को ठेलता दर्शन का परम मित्र प्रीतम भागता हुआ भीतर चला आया।
   हाथ में थामे अखबार को ज़ोर ज़ोर से हिलाता वो खुशी से जो चिल्लाता हुआ आया, उसे सुन वहाँ उपस्थित सब के सब सन्न रह गए…

  ” दर्शन अरे दर्शन कहाँ है रे तू। देख तेरी भाभी पूरे डिस्ट्रिक्ट में पहला स्थान लेकर पास हो आयी हैं।”

  कुछ समय को सारा ठाकुर परिवार प्रीतम को देखता रह गया…
   घर के पुरुष धीरे से उसकी ओर बढ़ने को हुए वहीं महिलाओं में कानाफूसी शुरू हो गयी…

. “देखा मैं ना कहती थी लड़का ज़रा पागल है, दीदी तुम तो अपने दर्शन को इससे बचा कर ही रखो।”

  तभी देव के पिता ने आगे बढ़ उसकी खबर लेनी शुरू कर दी

  “क्या बक रहा है रे लड़के? दर्शन की कौन सी भाभी प्रथम आ गयी।” उन्होंने पलट कर एक नज़र अपनी पत्नी को देखा। उनके आंखों ही आंखों में पूछे सवाल को समझ श्रीमती जी ने न में सर हिला दिया।
   उतनी देर में देव कूद कर प्रीतम के पास पहुंचा और उसके कंधे पर हाथ रखे उसे अपने साथ बाहर ले गया।
   प्रीतम “अरे देव दा , रुकिए तो। सुनिए तो ।” कहता उसके साथ बाहर चला गया।
   देव ने बाहर जाते ही उसके हाथ से अखबार लिया और फटाफट खबरों पर अपनी नज़र दौड़ाने लगा…
    प्रीतम सही कह रहा था पारो ने पूरे डिस्ट्रिक्ट मे सबसे ज्यादा नम्बर लाकर पहला स्थान प्राप्त किया था।
  देव की खुशी का ठिकाना नही था उसने आगे बढ़ प्रीतम को ही गले से लगा लिया।

  ” बहुत बहुत बधाइयाँ दादा। आज तो पार्टी लूंगा आपसे।”

” हाँ हाँ ले लेना प्रीतम । खुशखबरी भी तो गज़ब की सुनाई है तूने। ”

  ” कैसी खुशखबर देव ? “

  देव को लगा नही था कि उसके पीछे उसके पिता भी बाहर चले आये थे। वो हड़बड़ा गया..

” कुछ नही बाबा !

” क्या छिपा रहे हो देव? खैर अभी ये सब सोचने और बोलने का समय नही है। अभी अंदर चलो ,एक बार सगाई निपट जाए फिर तुमसे और इस झल्ले से निपटूंगा। तू भी अंदर आ जा। खाना खा कर ही जाना।”

  प्रीतम ने सर झुका कर हाँ बोला और देव के साथ ही अंदर चला आया।
   सगाई निपट गयी, भावी वर वधु ने सभी बड़ों का आशीर्वाद लिया और इसके साथ ही खाना पीना शुरू हो गया।
  सभी मगन थे सभी खुश थे,लेकिन सबसे ज्यादा खुश था देव।
   अब तक पारो को उसने कुछ नही बताया था। पर खुशी के साथ ही मन में एक शंका भी थी कि घर पर सच्चाई जानने के बाद क्या होगा?

सब को व्यस्त देख वो भी इधर उधर व्यस्त दिखने का प्रयास करने लगा।।

   ********

   वरुण की तबियत में दवाओं से कुछ सुधार आने लगा था। समस्या उसे पहले भी कुछ खास नही थी। बस कभी कभी उसका सर घूम जाया करता था।
    और अधिक दूर चलने पर हल्की सांस फूलने लगती थी। लेकिन दवाएं शुरू होने के बाद अब उसे आराम था।
   अस्पताल से छुट्टी के एक हफ्ते बाद  उसने वापस ऑफ़िस जॉइन कर लिया था।
  प्रज्वल और सारा के बहुत कहने पर भी उसे काम की दरकार थी ही क्योंकि किसी भी हाल में उसे पैसे जोड़ने ही थे!

   शाम में ऑफिस से वापस आकर वरुण ने अपने लिए कॉफी बनाई और बालकनी में आ बैठा। बाहर लंबी चौड़ी इमारतें देखना उसे बहुत भाता था। अभी अंधेरा नही हुआ था इसी से रास्ते पर आते जाते लोगों की भीड़ भाड़, पार्क से आता बच्चों का शोरगुल सब कुछ उसे अच्छा लग रहा था।
    दरवाज़े की आवाज़ हुई और सारा के साथ प्रज्वल भी अंदर चला आया..

.”ये लो तू यहाँ बैठा है। यार आज शनिवार है ,अब तक तैयार नही हुआ? “

” कहाँ के लिए?

” लाइव कॉन्सर्ट है स्मूथ जैज़ का यार , ये देख टिकट्स भी जुगाड़ ली हैं मैंने। मिल नही रही थीं। ये साले अंग्रेज हमसे बड़े भ्रष्टाचारी हैं। ब्लैक हो रहीं थी …

  बोलने के साथ ही प्रज्वल का ध्यान साथ खड़ी सारा पर चला गया और वो अपनी जीभ काट कर रह गया। सारा ने नाराजगी से उसे देखा और वापस वरुण की ओर देखने लगी…

” मैं नही जा रही किसी लाइव कंसर्ट पर। मुझे कहीं और जाना है। वरुण क्या तुम मेरे साथ चलोगे, मैं कृष्णा टेम्पल जा रही हूँ आज वहाँ कॄष्ण लीला का एक छोटा पार्ट दिखाया जाएगा ।”

  वरुण को सारा के साथ जाने में बिल्कुल रुचि नही थी, रुचि तो उसे जैज़ सुनने में भी नही आ रही थी लेकिन ये भी पता था कि अगर सारा के साथ नही गया तो प्रज्वल ज़बरदस्ती उसे पकड़ कर ले जाएगा।

  ” ओके मैं तुम्हारे साथ चलूँगा सारा। ”

  सारा ने विजयी मुस्कान से प्रज्वल की ओर देखा और उसने ना में सर हिलाते हुए अपने दोनों हाथ खड़े कर दिए। जेब से टिकट्स निकाल कर उसने फाड़ कर ट्रेश में डाला और उन लोगों की तरफ आगे बढ़ गया।

   तीनों कुछ देर में एक साथ मंदिर के लिए निकल गए।

   उनके पहुंचते में लीला प्रारम्भ हो चुकी थी। बरसाने में होली का प्रसंग चित्रित था। उल्लास लास में राधिका रानी और गोपियाँ मगन थी कि उन सब को एक ओर से देखते मंदिर के पंडित श्री केशव व्यास माइक थामे आगे चले आये….

  ” आप सभी जानतें है जहाँ कृष्ण है वहाँ राधा और जहाँ राधा है वहाँ कृष्ण।
   राधा का अर्थ होता है मोक्षप्राप्ति को इच्छित जीव। तभी तो गोकुल की हर गोपबाला में राधा थी,और हर राधा के भीतर उसे मोक्ष प्रदान करता कान्हा।
  लेकिन जैसे ही कृष्ण कान्हा से द्वारिकाधीश हुए उनसे गोप गोपियां राधा और उनके जीवन का सारा रस विलग हो गया।
   क्योंकि अपने कर्मो के मायाजाल में फंसे उस नीलवर्णी सखा से मोक्ष तो पहले ही सबने प्राप्त कर लिया था।
  कान्हा के दो मातापिता थे, दो गुरु थे, अनंत सखा थे, अस्सी पुत्र और चार पुत्रियां भी थी लेकिन सखी केवल एक थी… राधा ।
   द्रौपदी को भी उनकी सखी माना जाता है पर वो उनकी मानस भगिनी भी मानी जाती है। जबकि राधा उनकी एकमात्र सखी थी।
   एक ऐसी सखी जिसके संसर्ग में कान्हा अपने सम्पूर्ण रूप में अपने पूरे व्यक्तित्व के साथ होते थे। बिना राधा के तो वो भी सांसारिक प्रपंचों में कर्मरथी हो जाते थे जहाँ हर किसी को उनके एक अलग व्यक्तित्व के दर्शन हुए।
   कृष्ण पार्थसारथी हुए। ये भी सांकेतिक रूप से दिखाता है कि जिस प्रकार उन्होंने युद्ध में पार्थ की सहायता की उसी तरह वो मानव मन के विचार सारथी हैं।
   विचारकों के विचारक!! ज्ञानियों में ज्ञानी!! अजेय योद्धा!! तत्वज्ञ योद्धा।
    योद्धा इसलिए नही क्योंकि उन्होंने अपने परिश्रम से युद्ध लड़े ,बल्कि उन्होंने अपनी और दूसरों की जीवन की समस्याओं में समाधान ढूंढा। उनके अनुसार जीवन का अर्थ है अपने अंदर की तेजशक्ति का शोधन। जो व्यक्ति इस शोधन को करने में समर्थ हुआ वो अपने अंदर के हर विकार को जीत सकता है। शारीरिक ही नही मानसिक भी….”

  पंडित जी की बात ध्यान से सुनते वरुण ने अचानक अपना हाथ ऊपर कर दिया…
   उसके हाथ उठाते ही पंडित जी ने हाथ से उसे कहने कहा….

” आपने कहा कृष्ण हमारे जीवन के भी सारथी हैं।”

“हाँ बिल्कुल!”

  ” और उनके अनुसार जीवन का तातपर्य अपने अंदर की शक्ति का शोधन है। तो क्या अपने अंदर ऐसी शक्ति जागृत की जा सकती है जो आपके अंदर के विकारों को सही कर दे।”

” अगर तुमने पूरे विश्वास से खुद को कृष्ण समर्पित कर दिया तो तुम्हारे सारे विकार वो हर लेता है और अपने अंदर का सारा आह्लाद तुम्हारे अंदर भर देता है।

उनकी बात सुन वरुण सोच में खो गया……
लीला समाप्त होते ही प्रसाद वितरित होने लगा… भोग में खिचड़ी थी, जो वरुण के गले से नही उतरती थी लेकिन प्रसाद देने आए महिला के कहने पर की “प्रसाद को मना नही करते ,ज़रा सा चख तो लो , खुद ब खुद पुरी खा जाओगे। ” उसने प्रसाद का दोना पकड़ लिया।
    गरमा गरम खिचड़ी चखते ही वरुण चौन्क गया। खिचड़ी ऐसी भी हो सकती है?
  उसने फटाफट एक दोना खत्म कर बड़े शरामते हुए उन्हीं आंटी जी से एक और दोना भी मांग लिया…

” देखा मैंने कहा था न?”मुस्कुरा कर उसके हाथ मे भोग की खिचड़ी देते हुए वो आगे बढ़ गईं…..

  “खिचड़ी ऐसी बने तो कभी कभी खाई भी जा सकती है।”
     वरुण की बात पर पंडित जी भी बोल पड़े..

  ” ये स्वाद खिचड़ी का नही बल्कि उसके भोग की होने का है। वो अनन्तदृष्टा जिस पर नज़र डाल दे उसका स्वाद बढ़ ही जाता है। ”

  पंडित जी की बात पर वरुण मुस्कुरा कर उन्हें देखने लगा…

” तो उससे कहिये ना मुझ पर भी नज़र डाल दे। ”

  “तुम पर तो डाल ही चुका है तभी तो नास्तिक नास्तिक का रट लगाने के बाद भी तुम बार बार यहाँ कैसे खिंचे चले आते हो? तुम खुद सोचो? तुम्हारा जन्म तुम्हारे कर्म और तुम्हारा भाग्य सब वो पहले ही रच चुका है। तुम और कुछ नही बस उसके द्वारा रचे संसार रूपी नाटक के एक अभिनेता मात्र हो…
    वो वहाँ बैठे सब को देख रहा है।


  ********

   प्रखर के घर वालों के जाते ही घर के लगभग सारे पुरुष और महिलाएं एक साथ आंगन में जमा हो गए।सभी की नज़रों में एक ही सवाल था।
  महिलाओं की नज़रे प्रीतम पर अटकी थी तो वहीं देव के पिता देव को घूर रहे थे..

“” तुम दोनों में से कोई बताएगा कि आखिर चल क्या रहा है? “

  प्रीतम ने डरते डरते अपने कान पकड़ लिये और देव की ओर इशारा कर दिया…
   देव ने एक बार अपने गले को अच्छे से साफ किया…..
     उसे समझ आ गया था कि वो सिकंदर की सेना के सामने खड़ा पोरस है और अब उसकी सच्चाई ही उसकी रक्षा कर सकती है।
  मन ही मन माँ काली को स्मरण कर उसने बोलना शुरू किया…

  ” मैं आप सभी से एक बात कहना चाहता हूं। एक बात थी जो मैंने आप सभी से छुपा रखी थी और इस पूरी बात में सारी गलती और सारा दोष मेरा है मतलब मेरे अकेले का है।
    आप सब नहीं जानते इस बात को की पारो भी दर्शन की क्लास में पढ़ाई कर रही थी।  बाबा जी से झाड़-फूंक करवाने के बहाने मैं पारो को ट्यूशन क्लासेस लेकर जाया करता था। जहां वह अपने कठिन विषयों के लिए मास्टर जी से ट्यूशन लिया करती थी।
    कभी सुबह के वक्त और कभी शाम के वक्त बाबाजी मंत्र फूंकने  जो बुलाया करते थे वह असल में मास्टर जी होते थे जो पारो को पढ़ाने बुलाते थे।
  बीच में जब हर दो दिन में हमें सुबह मंत्र फूँकवाने जाना पड़ रहा था उस समय पारो की परीक्षाएं चल रही थी।
     पारो ने बहुत मेहनत और लगन से पढ़ाई की और उसका परिणाम आप सबके सामने हैं।
मैं आप सभी से हाथ जोड़ कर यह कहना चाहता हूं कि पारो एक होशियार लड़की है जिसका पढ़ने लिखने में बहुत दिल लगता है आपसे यह भी कहना चाहता हूं।
     वैसे मैं जानता हूँ मेरे परिवार वाले शिक्षा के महत्व को अच्छे से समझतें हैं और बड़े हृदय से शिक्षित व्यक्तियों का सम्मान भी करतें हैं।
  तो आज अगर आपके घर की बहु पढना चाहती है तो हम क्योंकर उसे रोकें भला?
    शिक्षा हमारा हम सबका बुनियादी अधिकार है, हमारे संविधान के हमारे मौलिक अधिकारों में भी आता है।
   तो हम पारोमिता से उसका बुनियादी अधिकार छीनने वाले कौन होतें हैं भला?
    मैं जानता और समझता भी हूँ कि आप लोग अपनी बेड़ियों में संस्कारों में जकड़े हुए है लेकिन साथ ही ये विश्वास भी दिलाता हूँ कि घर से बाहर निकल कर, और पढ़ाई कर के भी पारो आपकी बहु ही रहेगी, और बिल्कुल जैसे आज है ऐसी ही हमेशा रहेगी।”

  सब सांस रोके वरुण की बात सुनते रहे… वरुण ने अपने बाबा की तरफ देखा और फिर ठाकुर माँ की तरफ..

  ” ठाकुर माँ आप रात दिन भगवान का जप करती हैं , बताइये क्या ही अच्छा होता अगर आप उनकी सुख सागर मुझसे या दर्शन से सुनने की जगह खुद पढ़ पाती।
    माँ आप मुझसे हमेशा कहतीं हैं ना कि बाबून मेरे परलोक गमन के पहले जब मेरे मुहँ में गंगा जल और तुलसी देगा तब मुझे गीता का सत्रहवाँ अध्याय सुना देना ,एक इस अध्याय को सुन लेने से ही मोक्ष मिल जाता है तो बोलो माँ अगर तुम्हारे बाबुन को पढ़ना ही नही आता तो वो पढ़ कर सुनाएगा कैसे?
     तो अगर बाबुन पढ़ सकता है तो पारो क्यों नही? जब मुझे अपनी मर्ज़ी से खाने पीने पहनने ओढ़ने घूमने फिरने का अधिकार है तो सिर्फ लड़की का जन्म लेने और किसी के घर की बहु बन जाने की पारो को इतनी बड़ी सजा क्यों मिले ?
     अगर उसकी चाह है कि वो आगे पढ़ाई करे तो मैं अपना पति धर्म निभाते हुए अपनी पत्नी की इच्छा का सम्मान करते हुए उसे आगे पढ़ाना चाहता हूँ। “

  ” तो कलक्टर बनाएगा अपनी बहु को?

इतनी देर में उसके बाबा के मुहँ से इतना ही निकल पाया।

  ” हाँ बाबा अगर वो बनना चाहेगी और उसमें इतनी काबिलियत होगी तो मैं ज़रूर उसकी मदद करूँगा। हम लाली को तो स्कूल भेजतें ही हैं ना कल को अगर उसके ससुराल वाले उसे और पढ़ाना चाहेंगे तो क्या आप लोग मना कर देंगे। बोलिये बाबा? काका जी आप बताइए? माँ बोलो? ”

  सब को चुप देख वरुण की हिम्मत और बढ़ गयी और उसने आखिरी ब्रम्हास्त्र भी चला ही दिया …

   ” ठीक है अगर आप सबको पारो की पढ़ाई से परेशानी है तो मैं उसे लेकर कहीं और चला जाऊंगा रहने। ”

   ” बस कर बाबुन ! कोई कुछ नही बोल रहा तो तू कुछ भी कहता चला जायेगा। अब हम औरतों का क्या है? अगर ये पढ़ती है या नही इससे हमारी रसोई में क्या फर्क पड़ जायेगा? घर के मर्द ही सोच समझ कर बता सकतें है कि घर की बहु नंगे सर बाजार हाट घूम सकती है कि नही? “

  “माँ बातों का रुख मत मोड़ो!”

“रे मैं बातों का रुख नही मोड़ रही मेरे कहने का मतलब यही है कि हम औरतें क्या बोलें? जो बोलना है यही लोग बोलेंगे।”
   देव की बातों के बीच ही घर की औरतों के नैन मटक्के में बिना एक शब्द बोले ही सारी बातें हो गईं थीं।
   पुरुष सभी एक तरफ हाथ बाँधे खडे थे आख़िर देव के छोटे काका सबसे पहले बोल पड़े..

  ” भई मुझे तो कोई समस्या नही है। आखिर मोइत्रा मालिनी हों या शुभस्मिता सरकार । ये भी तो हमारे बंगाल की महिलाएं है आज पढ़ लिख कर परचम लहरा रहीं हैं ना।

  देव के पिता ने एक नज़र अपने भाई पर डाली की वो सकपका कर चुप हो गए..

. ” नही दादा मेरा मतलब था…

” तुम्हारा जो भी मतलब रहा हो और बाकियों का भी जो मतलब रहा हो मुझे वही निर्णय लेना है जो इस घर के लिए सही साबित होगा।
   और पूरी तरह सोच कर मैंने ये निर्णय लिया है कि पारो आगे पढ़ाई जारी रखेगी, लेकिन इससे उसके पहनने ओढ़ने में कोई फर्क नही आना चाहिए और न ही उसके स्वभाव में…
  
   अपनी बात पूरी भी नही कर पाये थे देव के पिता की देव उनके चरणों में गिर पड़ा…

  ” थैंक यू !! थैंक यू बाबा!”

  मुस्कुरा कर देव ने पारो की ओर देखा, अब तक सबसे किनारे खड़ी आंसू बहाती पारो के आंसुओं से भीगे चेहरे पर गीली गुलाबी सी मुस्कान रेंग गयी….

  क्रमशः

aparna …

   दिल से ….

 
   मैं बहुत बार अपनी पसंदीदा किताब का ज़िक्र कर चुकी हूँ। उस वक्त मैं चौदह या पंद्रह साल की थी जब मृत्युंजय पढ़ी थी और उसके बाद पूरी तरह से मैं दानवीर कर्ण की प्रीत में पूरी तरह खुद को भी भूल गयी थी।
   गनीमत रही कि मैंने एग्जाम पास कर लिए, गणेश जी ने फेल होने से बचा लिया लेकिन उस किताब को पढ़ने के बाद और कोई किताब पढ़ने की इच्छा ही नही रही। जबकि मेरे जैसे पढ़ने की शौकीन जो खाते वक्त भी किताब खोले रहती थी ने मृत्युंजय के बाद एक लंबा ब्रेक ले लिया था।
    उसके बाद मेरी माँ ने मुझे एक और किताब लाकर दी… “युगन्धर ”   श्रीकृष्ण के जीवन पर रचित ये किताब भी शिवजी सावंत द्वारा मराठी में। लिखी गयी जिसका अनुवाद उनकी धर्मपत्नी श्रीमती मृणालिनी सावंत ने हिंदी में किया।
    पर उस समय मृत्युंजय का बुखार ऐसा था कि युगन्धर को दो पेज के बाद आगे नही बढ़ पायी और न पढ़ पायी।

   समिधा का विचार जैसे ही दिमाग मे आया सबसे पहले युगन्धर याद आयी।
   अपनी किताबों की आलमारी खोले मैं उसे ढूंढने लगी। आप सब विश्वास नही करेंगे मुझे दो घण्टे सिर्फ किताब निकलने में लग गए, ना इसलिए नही की वो कहीं पीछे खो गयी थी, बल्कि इसलिए कि आलमारी खोलते ही सब की सब ऐसा लगा मुझसे इतने दिन से न मिलने की शिकायत करने लगीं। फिर एक एक कार कभी मन्नू भंडारी जी कभी ममता कालिया जी कभी हिमांशु जी को खोल खोल कर एक एक कहानी पढ़ती चली गयी।

    समिधा में। आगे जो भी कृष्ण सम्बंधित लिखूंगी उसके पहले युगन्धर ज़रूर पढूंगी जिससे जो भी लिखूं तथ्यात्मक हो और ये क्यों ? या ये कैसे? के सवाल पैदा न हों।

   समिधा पूरी तरह से समर्पित है उस मुरलीधर को जिसकी कृपा से मेरी लेखनी चल पा रही है।

  🙏🙏🙏🙏🙏

  मुझे पढ़ने के लिए आप सभी अपना कीमती वक्त निकालतें है और उसके बाद प्रशंसा के शब्दों से मुझे अभिभूत कर जातें हैं।
   आप सभी के स्नेह के लिए हृदय से आभार धन्यवाद।

आपकी

aparna..

  
   




  
 
 
  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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