समिधा – 14

  समिधा –14



     अब तक आपने पढ़ा:-

    वरुण को अपनी बीमारी के बारे में पता चलता है और उसके बाद अपनी एक दोस्त सारा की बातों से प्रभावित वरुण को धीरे धीरे अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों की बातों में रुचि जागने लगती है।
   वो मंदिर,श्री कृष्ण, उनके भोग आदि की तरफ अपने झुकाव को महसूस करता है।

     दूसरी तरफ कलकत्ता के एक गांव में पारो के ससुराल में उसकी रिश्ते की भतीजी लाली की सगाई के बीच ही पारो के देवर दर्शन के दोस्त के आकर धमाका करने से सब सन्न रह जाते हैं कि पारो पूरे जिले में प्रथम आयी है।
    देव पहले तो सभी को अपने शब्दों से भली प्रकार समझाने की कोशिश करता है लेकिन जल्दी ही उसे समझ आ जाता है कि सबको समझना टेढ़ी खीर है तब वो अपना आखिरी पैंतरा अपनाता है , जिसमें वो कहता है कि अगर पारो यहाँ रह कर नही पढ़ सकती तो वो पारो को संग ले अलग हो जाएगा।
    और आखिर सदियों से मर्तबान के अंदर कहीं छिपा घी परंपरागत तरीके से उंगली टेढ़ी कर निकालने से निकल ही आता है।
    घर पर लाली की सगाई के बाद देव उसकी जल्दी हो रही शादी को लेकर चिंतित है , और उसे ये भी पता है कि घर पर इस बारे में बात करने का कोई फायदा नही। इसलिए वो सीधे प्रखर से ही बात करके शादी को दो साल आगे बढ़ाने के बारे में सोचता है।
    लाली और प्रखर की सगाई निपटने के बाद प्रखर के घर वाले तिथि मुहूर्त तय करने देव के घर वालों को अपने घर आमंत्रित करते हैं…

   अब आगे ….

********


      अगली सुबह ठाकुर परिवार के लिए बहुत सुखद सौम्य और सुनहरी थी।
   प्रखर के घर वालों की तरफ से विवाह का शुभ दिन मुहूर्त निकालने के लिए देव के घर वालों को निमंत्रण भेजा गया था। घर के सभी पुरुष सदस्यों का न्योता था।
    सुबह सुबह खुश खबरी से घर चहक रहा था। घर की कामवाली कोयल अपने नाम को सार्थक करती इधर से उधर काम जितना करती उससे कहीं अधिक कूकती रहती थी।
     ठाकुर माँ का वो दाँया हाथ थी,घर भर की बहुओं का रोना  ठाकुर माँ उसे ही सुनाया करती और वो भी पूरा रस ले लेकर सुनती और खुद भी किसी न किसी के नाम का चिट्ठा ठाकुर माँ के सामने फाड़ा करती।
         आज घर में सुबह प्रवेश करते ही उसे दो खबरे मिली थी एक लाली की शादी की तारीख तय होने जा रही थी और दूसरा घर की सबसे छोटी बहु ग्यारहवीं कक्षा में प्रवेश लेने जा रही थी।
   पहली खबर तो सामान्य ही थी, उसमें कुछ नया नही था, शादी ब्याह तो होना ही है कौन सा किसी थानेदार कलेक्टर से ब्याह हो रहा? लेकिन ये दूसरी खबर तो बड़ी चटक थी। जबसे सुना था उसके पेट में खलबली मची हुई थी, आखिर ठाकुर माँ के कमरे में उनके बालों में गरम तेल डालने गयी तब जाकर उसे मौका मिला, अपने मन में उफनती नदी को रास्ता देने का।

  ” ए की ठाकुर माँ? ये क्या सुन रही हूँ मैं?

  ” मुझे क्या पता , तू क्या सुन रही है? तेरे कान हैं आखिर, तू जो चाहे वो सुन सकती है।

  ” घर की छोटी बहु अब घर से बाहर पढ़ने जाएगी? ये क्या बात हुई भला? छी बाहर के मर्दों के सामने खुले सर घूमेगी,आपने मना नही किया ? ”

  ” तू भी तो घर से बाहर निकलती है , काम करती है । क्या जिस जिस घर मे तू काम करती है वहाँ मर्द नही रहते?

  ” पापी पेट की मजबूरी न होती तो कौन सी औरत घर से निकलना चाहती है भला ठाकुर माँ। ”

  ” बस ऐसी ही कुछ पढ़ने की भी भूख होती है। तू नही समझेगी, चल जा अपना काम कर। ”

   कोयल ठगी सी खड़ी रह गयी, आज तक अपनी हर बहु में खोट निकालने वाली, गली मोहल्ले की हर औरत के लिए चुन चुन कर गालियां निकालने वाली ठाकुर माँ की भी पढ़ाई में श्रद्धा है, ये उसके लिए बड़ी नई बात थी।
    वो अपनी चोटी के बचे बालों की गूंथती वहाँ से बाहर चली गयी।
   घर की बाकी औरते अपनी अपनी पारी से काम पर लगी थीं।
   कोई रसोई में दाल की बटलोई में कलछी घुमा रही थी , कोई पोटोलोर डालना के लिए परवल साफ कर रही थी।
   कोई पोस्त और हरी मिर्च को सिल पर पीसती बैठी थी तो कोई बड़ी बड़ी मिर्चों में मसाले भरती उन्हें सुखाने की तैयारी में थी।
    बाहर के काम की पारी वाली बहुएं कपड़े धोने सुखाने में लगी थी।

   कोयल ने देखा, रसोई में पारो की सास के साथ उनकी देवरानी जेठानी ही थी , कोयल को मनचाही मुराद मिल गयी…

  ” ए माँ ! ये क्या सुन कर आ रही हूँ मैं ठाकुर माँ के मुहँ से। क्या अब आपकी बहु बाहर पढ़ने जाएगी?

  पिछली रात से जली भुनी बैठी देव की माँ तड़प कर रह गयीं। जाने क्यों उन्हें पारो को पढ़ने जाने के लिए घर भर की सहमति मिल जाना रास नही आ रहा था, उस पर देव का कदम कदम पर ऐसे अपनी दुल्हन का साथ देना उनके ममतामयी कलेजे को मरोड़े दे रहा था।
   अपना ही कोखजाया कैसे एक लड़की की गांठ से बंधते ही पराया हो गया ?
     उन्होंने बड़ी लाचारी से अपनी जेठानी की ओर देखा, दोनो औरतों ने एक दूसरे के मन की पीर समझ ली। उनकी देवरानी भी उन्हीं दोनो को देख रही थी, वो भी देव की माँ का दुख समझ रही थी।
   एक बार घर से बाहर निकली बहु क्या फिर कभी सास के हाथ आयी है भला? वो सब तो आज तक ठाकुर माँ के इशारों पर कठपुतली सी नाचती आयीं हैं और ये आज की लड़की अपने पति को मना कर चोरी छिपे पढ़ने लिखने भी लग गयी और अब तो बाहर जाने वाली है आगे पढ़ने।
   
   मन ही मन अपनी सोच में डूबी वो कुछ कुछ बुदबुदाए भी जा रही थी…” मा दुग्गा रक्षा करो”

  उसकी आवज़ सुनते ही देव की माँ और जेठानी उसे देखने लगे… ” क्या हुआ कृष्णा ?”

  ” कुछ नही दीदी, आपके और आपकी बहु के बारे में ही सोच रही थी। मन को बुरा मत लगाना दीदी लेकिन लक्षण तो शुरू से पारो के सही नही थे, उस पर घर से बाहर जाएगी, अब क्या हाथ आएगी वो आपके? “

  एक ठंडी आह भर देव की माँ वही बैठ गयी…

” क्या करूँ रे, जब किस्मत ही ऐसी लिखी है भगवान ने तो किसकी शरण जाऊँ।
   पहले लगता था बेटा ही ज़रा पागल है कल तो बाप ने भी अपना पागलपन दिखा दिया। अब इन मर्दों को कौन समझाए कि इस कच्ची उमर में लड़की का बाहर जाना सही नही है। है माँ दुग्गा अब तो तुम्ही कोई रास्ता निकालो।”

  कोयल को इस सब बतकही में अपरूप रस मिल रहा था, यही सब तो ठाकुर माँ से सुनने की चाहत थी जो यहाँ आकर मिली। वो दुगुने उत्साह से अपने काम में जुट गई।
    देव के पिता ने बाहर से आवाज़ लगाई और बता दिया कि देव के काका के अतिरिक्त बाकी सभी जन प्रखर के घर जाने को निकल रहें हैं।

   सभी औरतें हाथ धोती अपने पल्लू से पोंछती बाहर निकल आयी। होने वाले समधी के घर भेजने के लिये फल मिठाईयां, पिस्ते बादाम की टोकरियाँ उन लोगों के हाथ में थमा कर तिलक लगा कर उन्हें भेजने के बाद सभी एक बार फिर बातों में लग गईं।


   *****

  शनिवार की सुबह थी,  आज बहुत दिनों बाद ताज़ी धूप खिली थी, वरुण को बाज़ार से कुछ सामान लेना था, उसने अपनी गाड़ी निकाली और सुपर मार्केट निकल गया।
         मार्किट से काफी पहले ही गाड़ी पार्किंग में डाल कर वो पैदल अंदर जाने लगा।
   उसके सामने ही एक भारतीय पति पत्नी का जोड़ा चलता चला जा रहा था, दोनों मध्यम आयुवर्ग के थे, लगभग बावन से पचपन बरस के बीच के।
  दोनो में किसी सामान को लेकर बातचीत चल रही थी। स्टोर बहुत बड़ा होने से समय बचाने के लिए नीचे वाले फ्लोर पर एक और ऊपर वाले फ्लोर पर एक खरीदारी कर लेगा तो उनका काफी समय बच जाएगा। यही बातें तय करते वो लोग स्टोर के भीतर घुस गए, ऊपर जाते जाते औरत ने अपने पति से प्रसाद के लिए मिश्री लेने की बात दो बार कही।

    वो अपनी बात कह कर लिफ्ट में चली गयी और उसकी बात में उलझा वरुण उस आदमी के बगल वाली शेल्फ से सामान निकालते उससे पूछ ही बैठा…

” आपसे एक बात पूछ सकता हूँ? “

  अमेरिका में अपनी बोली सुन हर हिंदुस्तानी का दिल खिल उठता है, और फिर यहाँ तो वरुण ने बिना किसी औपचारिक लाग लपेट के शुद्ध हिंदी में बात शुरू की थी,सामने वाले सज्जन मुस्कुरा उठे..

” जी हाँ पूछिये। “

  ” सवाल ज़रा पर्सनल है, आप बुरा तो नही मानेंगे। “

  सामने वाले ने एक हल्का सा ठहाका लगाया और ना में सर हिला दिया..

  ” नही बेटा बिल्कुल बुरा नही मानूंगा। आप पूछिये तो सही।”

  ” आपकी वाईफ आपको प्रसाद के लिए बार बार मिश्री ही लेने क्यों फोर्स कर रहीं थीं? कुछ खास रीजन है क्या इसका भी। “

   ” जी हाँ, इसका भी एक रीजन है। कहतें हैं भगवान को माखन मिश्री पसंद होता है और इसलिए वही भोग में लगाना चाहिए पर हमारी श्रीमती जी का लॉजिक सुनेंगे तो शायद आपको हंसी आ जायेगी।

  वरुण ने मुस्कुरा कर ना में सर हिला दिया…

  ” हमारी श्रीमती जी को शुरू से भगवान में बड़ी श्रद्धा रही है। शादी के बाद हमें कई सालों तक संतान नही हुई, मैं शुरू से ही यहीं अमेरिका में नौकरी कर रहा था, तो जब दो साल में भी कोई औलाद नही हुई तब डॉक्टरों के चक्कर लगाने शुरू किए। इंडिया में आज जो चिकित्सा विधियां आयी हैं वो तभी यहाँ आ चुकी थी, हमने सारी आज़मा भी ली लेकिन कोई फल नही मिला। इसी सब में आठ साल बीत गए। हम लोग उस साल छुट्टियों में इंडिया आये हुए थे। एक शाम हम दोनों मंदिर गए थे तब वहाँ मंदिर के बाहर बैठे किसी गरीब आदमी ने इनसे कहा कि कुछ खाने को है तो दे दो। उस वक्त इनके पास कुछ नही था, बस मंदिर में चढ़ाने के लिए नारियल और मिश्री और कुछ फल थे । अब ये परेशान हो उठीं की अगर ये नारियल इसे खाने की दे दिया तो अंदर भगवान को क्या चढ़ाऊंगी?
    पर उस गरीब को देख इनके अंदर की माँ जाग उठी और इन्होंने हाथ में थाम रखी सारी प्रसाद सामग्री उस आदमी को दे दी और हम अंदर दर्शन करने चले गए।
    दर्शन कर के वापस निकले तो देखा वो आदमी दिए गए फल आदि से कुछ खुद खा कर कुछ अपने पास खड़ी गाय को खिला रहा था।
   श्रीमती जी चौन्क गयी और ज़रा नाराज़ भी हो गयी…

“ये क्या है? मैंने मंदिर में बिना चढ़ाए सारा प्रसाद तुम्हे दे दिया जिससे तुम्हारी भूख मिट सके और तुमने सब ऐसे गंवा दिया, फल गाय को दे दिए और मिश्री ज़मीन पर फेंक दी। हद है!”

   सामने खड़ा गरीब आदमी संकुचित हो उठा, बुज़ुर्ग था फिर भी श्रीमती जी को पूरे आदर से पुकारता वो अपना ऐसा जवाब दे गया कि फिर हमारे सारे सवाल बेमानी हो गए…

  ” मुझे माफ़ करना माँ !  लेकिन एक बात बताओ अंदर ले जाने वाले सामान को अंदर कौन खाता है भला? “

  उसकी बात सुन श्रीमती जी का क्रोध और बढ़ गया, वो इसे गुस्से में घूरती रहीं।

  ” वो जिसकी पूजा अर्चना करने अंदर जाती हो न वो तो यहीं तुम्हे मिल जाएगा। वो देखो तुम्हारी मिश्री ले कर जाती चींटियां यही तो तुम्हारे कान्हा जी हैं, एक कतार में चलती ऐसी लग रही जैसी बाँसुरी की मोहक ध्वनि में बंधी लयबद्ध किसी प्राकृतिक नृत्य को करती हमे  रिझाती चली जा रही हैं।
   वो देखो तुम्हारे फल खाती गौरा गाय अपने बछड़े को दूध भी पिलाती जा रही है, क्या इससे मनमोहक दृश्य कभी देखा है भला। क्या इस गाय में तुम्हे तुम्हारा
मुरलीधर नही नज़र आ रहा? तुम्हारा भोग खाते हुए समस्त संसार का पालन करता हुआ मनोहारी कान्हा!

    उसकी बातों में जाने क्या चमत्कार था, श्रीमती जी की आंखों से ऑंसूओ की धार बह चली। वो हाथ बांधे उसके सम्मुख खड़ी रह गयी..

  “मुझे माफ़ करना भैया, आज के बाद भगवान को भोग लगाने के बाद सबसे पहले किसी भूखे को भोजन कराउंगी तभी खुद खाऊँगी। “

  ” नही माँ !ऐसा कोई प्रण ना करो जो बाद में पूरा न कर सको। आज तो ये प्रण निभा लोगी लेकिन कल को जब खुद माँ बनने वाली रहोगी तब रोज़ एक भूखा मनुष्य ढूंढ कर पहले उसे खिला कर तब खुद खाना, बहुत कठिन हो जाएगा। इसलिए ऐसी कोई प्रतिज्ञा न करो। ”

  हम दोनों के आश्चर्य का ठिकाना नही था। इसे कैसे पता चला कि हमारी अभी कोई संतान नही है।

  ” आपको कैसे पता कि … मैं अपनी बात पूरी भी नही कर पाया था कि उसने हमारी बात काट दी…

  ” उस परमशक्ति के आगे सब अवश हैं। अगर अपनी परेशानी से निपटने सारे उपाय अपना चुके हो और कोई फल नही मिला तो अब मेरा बताया उपाय भी कर के देख लो। छोटे से बाल गोपाल की जतन से सेवा शुरू कर दो, जो चाहती हो न माँ वो पूरा हो जाएगा। बस श्रद्धा से  उनका भोग ऐसे ही भूखों और ज़रूरतमंदों को खिलाना, हट्टे कट्टे भिखारियों को नही ।”

   कतारबद्ध चलती चींटियों की तरफ देख वो मुस्कुरा उठा, और हम दोनों निरुत्तर से खड़े रह गए।

  समझ नही आया सामने खड़ा वो गरीब जर्जर बूढ़ा असल में याचक था या हम ?

  हम दोनों शांति से वापस चले आये, लेकिन आते आते इन्होंने एक छोटी सी बाल गोपाल की मूर्ति खरीद ली।
    मूर्ति को गोद मे लिए लिए ही घर पहुंची और जतन से उसे हमारे मंदिर में बैठा दिया। शुरू शुरू में पूजा पाठ की औपचारिकता आगे चल कर कान्हा जी की वास्तविक सेवा में बदलती चली गयी। सुबह सवेरे उन्हें नहलाना कपड़े बदलना, खाने में जो भी बना हो वही भोग में चढ़ा कर पहले उन्हें खिलाना फिर खुद खाना, लेकिन इस सब में ये हुआ कि वो भोग जो भगवान को चढ़ाया जाता वो वैसा ही रखा रह जाता, और उसे हम ही प्रसाद मान कर खा लेते। पर जाने क्यों इनका मन नही मान रहा था, इनकी किसी और जीव को खिला कर खाने की इच्छा पूरी नही हो पा रही थी। एक दिन इनकी तबियत कुछ खराब थी , ये कुछ बना नही पायी और प्रसाद में मिश्री चढ़ा दी। उस दिन शाम तक में प्रसाद का पात्र पूरा खाली हो गया, उस दिन इनके मन में एक अलग सा विश्वास पैदा हो गया कि इनके भगवान चींटी के रूप में आकर मिश्री खा कर जाते हैं। और बस कुछ ही दिनों में चमत्कार हुआ, इनके माँ बनने की आहट हुई और हमारी खुशी का ठिकाना न रहा।
   तो ये रहस्य है हमारी श्रीमती जी के प्रसाद में मिश्री चढ़ाने का।

   वरुण उनकी बात सुनता मुस्कुराने लगा….

  ” दुबारा कभी वो सज्जन आपको मिले जिनके आशीर्वाद से आपको संतान प्राप्ति हुई?”

” नही, इसी बात का तो अफसोस है कि वो दुबारा कभी नही मिले हमें। बाद में हमारे गट्टू के जन्म के बाद जब हम उसे लेकर मंदिर गए दर्शन के लिए तब श्रीमती जी ने बाहर बैठे याचकों से उसके बारे में पूछताछ की तो पता चला, ठीक नौ महीने पहले उसका निधन हो गया। ”

   उनकी ये बात सुन वरुण के रोंगटे खड़े हो गए। क्या कोई भक्त इतना भी शक्तिशाली हो सकता है? कि सामने वाले को जीवन देने अपने प्राण त्याग दे? क्या वाकई कृष्ण महिमा और उनकी भक्ति में इतनी अधिक शक्ति होती है?
  ”  है भगवान ये किस मायाजाल में उलझाते जा रहे हो मुझे? ”  अपने ही मन की बात पर उसे आश्चर्य होने लगा, आज तक उसने कभी ऐसे भगवान से कोई सवाल नही किया था लेकिन आज?

   बातों में लगे दोनों ने साथ ही अपनी सारी शॉपिंग भी निपटा ली…
   काम तो सारा निपट गया लेकिन वरुण के दिमाग में कान्हा जी का चमत्कार घूमता चला गया।

    मन ही मन कोई कठोर सा निर्णय लिए वो वहाँ से सीधा मंदिर की ओर मुड़ गया।

*******


      प्रखर के घर पर शादी ब्याह की बातें चल रहीं थीं, सभी बड़े बुज़ुर्ग साथ बैठे पंडित जी से पोथी बंचवा रहे थे।
   शुभ मुहूर्त निकलने को था लेकिन अब तक देव को प्रखर से अकेले मिलने का मौका नही मिल पाया था।।
     वो चाह रहा था कि किसी तरह शादी एक आध साल आगे बढ़ जाये और ये बात कहने के लिए उसे एक ही इंसान उस पूरी भीड़ भाड़ में उचित जान पड़ रहा था ,वो था प्रखर।

   आखिर भोजन पानी निपटने के बाद जब प्रखर कुछ देर को अंदर गया तब देव भी अपना सारा संकोच त्याग उसके पीछे बेधड़क उनके घर के अंदर वाले भाग में चला आया।
   घर के अंदर फैले आंगन में एक और बैठी प्रखर की माँ  मिठाईयों का थाल सजा रही थी। देव को अंदर प्रवेश करते देख वो भी चौन्क गयी..

  ” क्या हुआ देव बाबू? कुछ चाहिए आपको? “

” जी प्रखर बाबू का कमरा कौन सा है?”

   आसमान में उमड़ते घुमड़ते काले बादल अचानक अपने गर्जन तर्जन के साथ बरसने को आये और पलक झपकते ही मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी, प्रखर की माँ ने प्रखर के कमरे की ओर इशारा कर दिया।
   देव जल्दी जल्दी उसके कमरे की ओर बढ़ गया, आंगन में सूखते , मसालों पापड़ों को समेटती औरतें भी बारिश के भय से अंदर की ओर भाग गई।

   प्रखर के कमरे में पहुंचे देव ने देखा प्रखर कुछ पैक कर रहा था।
 
  ” प्रखर बाबू आपसे कुछ कहना चाहता हूँ। “

  देव को अचानक अपने कमरे में देख प्रखर भी चौन्क गया….

  ” अच्छा हुआ आप यहीं आ गए, मैं खुद आपसे मिल कर कुछ कहना चाहता था, ये एक चिट्ठी भी लिखी है लालीमा के लिए, क्या आप ये उसे दे देंगे? “

  हाँ में सर हिला कर देव ने उसके हाथ से वो चिट्ठी लेकर अपने पास रख ली। उसे खुद समझ नही आ रहा था कि प्रखर उससे क्या कहना चाहता है।

  ” कहिये प्रखर बाबू! क्या कहना चाहते हैं आप? “

  ” जी मैंने कुछ समय पहले सेना में भर्ती की चिट्ठी डाली थी, वहाँ से उनका जवाब आया है। मुझे आगे की परीक्षा के लिए बुलाया गया है और सच कहूं तो मैं बहुत खुश हूँ,जाना भी चाहता हूँ लेकिन घर वाले शुरू से इस सब के खिलाफ थे इसलिए उन्हें बिना बताए ही ये फॉर्म डाला था।

   प्रखर शायद इतनी बड़ी बात देव की आंखों में देखते हुए कहने से डर रहा था इसलिए उसने अपना चेहरा दूसरी ओर फेर लिया था, और उसी समय आसमान पर बादलों की तेज गड़गड़ाहट शुरू हो गयी।
   देव को कुछ सुनाई दिया कुछ नही, लेकिन प्रखर एक बार जो शुरू हुआ तो अपनी रौ में बोलता चला गया….

  ” देव भैया मैं अभी कुछ समय के लिए शादी नही कर पाऊंगा , बल्कि हो सकता है शादी ही न करूँ, सेना में जाने के बाद मेरा जीवन पूरी तरह देश को समर्पित हो जाएगा।”

  प्रखर की कही इन सारी बातों में से कोई बात भी देव के कानों में नही पड़ी, वो बस क्या? क्या कहा ? यही पूछता रह गया कि बाहर से हाथ में मिठाई का थाल लिए प्रखर की माँ भीतर चली आयी… आते ही देव के मुहँ में मिठाई का टुकड़ा डालती वो प्रखर की ओर बढ़ गयी।

  ” खूब बधाई! तेरी सप्तपदी की शुभ तिथि स्थिर हो गयी है। ” प्रखर के मुहँ में भी सन्देस का टुकड़ा डाल हंसती खिलखिलाती वो बाकियों का मुहँ मीठा कराने निकल गईं।

   देव इसी बात के लिए हड़बड़ी में था कि एक बार बड़े बुजुर्ग तिथि स्थिर करें उसके पहले ही प्रखर से बात कर शादी दो साल के लिए आगे बढ़ानी है लेकिन वो काम नही हो पाया।
   अब एक बार तिथि मुहूर्त तय हो जाने के बाद तो कुछ भी आगे बढ़ाना असम्भव है, ये वो अच्छे से जानता था।
   प्रखर के चेहरे पर भी कोई चमकीली खुशी की लहर नज़र नही आ रही थी देव को। दूसरी बात की प्रखर ने इतनी देर आखिर उससे अपने मन की कौन सी बात कही थी अब देव के लिए ये भी सोचने वाली बात हो गयी थी?
    क्योंकि बादलों की तेज गड़गड़ाहट में जो टूटे फूटे शब्द उसके कानों में पड़े उसका सार उसे ये लगा कि प्रखर आगे चल कर सेना में भर्ती होना चाहता है और यही बात विवाह से पहले वो लाली और लाली के घर वालो को बताना चाहता है ।
   इस बात से देव के मन में प्रखर के लिए  आदर की भावना और भी ज्यादा बढ़ गयी। उसे प्रखर पर गर्व महसूस हो रहा था।
   उसने मुस्कुरा कर आगे बढ़ प्रखर को सीने से लगा लिया।
   जो बालक अपनी मातृभूमि के लिए सोच सकता है अपनी पत्नी के लिए भी कुछ तो सोचेगा ही, यही सोचता देव बिना अपनी बात कहे ही मुस्कुरा कर प्रखर को बधाई देता बाहर निकल गया।

   प्रखर आश्चर्य में डूबा देव को जाता देखता रहा, उसे समझ आ गया कि वो जो कहना चाहता था देव उसकी वो बात नही समझ पाया है। और अब विवाह तिथि तय होने के बाद उसकी बात का कोई औचित्य भी नही रह गया था।
    अब तो उसे घर वालो से छिप कर ही सेना भर्ती का इम्तिहान देने जाना होगा।
   बस अब भी उम्मीद की एक किरण बाकी थी वो थी लालिमा को लिखी चिट्ठी!
    प्रखर ने जो बातें देव से कही थी वही बातें चिट्ठी में लिख उसने देव के हाथों ही लालिमा के लिए भेज दी थी। आशा की किरण अब वहीं से थी कि पत्र पढ़ कर कहीं लालिमा ने ही मना कर दिया तो वो मन पर बिना किसी बोझ के सेना में चला जाएगा, पर अगर लालिमा ने चिट्ठी पढ़ कर भी शादी से इनकार नही किया तब? या मान लो चिट्ठी पढ़ी ही नही तब?

    अब तब से ऊपर उठ कर प्रखर ने सब कुछ भगवान और भाग्य भरोसे छोड़ा और अपने दोस्त से मिलने निकल गया।

   प्रखर के कमरे से निकल कर आंगन पार कर बाहर के कमरे में आने में ही देव बुरी तरह से भीग गया उसके ऊपर वहाँ से निकलते समय वहाँ से लाली के लिए भेजे जा रहे सामान को बार बार इधर से उधर लेकर जाने आने में रही सही कसर भी पूरी हो गयी।
   उसे उतना भीगा देख कर प्रखर की माँ ने प्रखर के कपड़े पहन कर चले जाने का प्रस्ताव भी रखा लेकिन बस “गाड़ी में बैठते ही घर पहुंच जाएंगे’ कहता देव गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर जा बैठा।
   एक एक कर सभी के बैठते ही उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी।
   घर पहुंचने में लगभग एक डेढ़ घंटे का वक्त लग गया।
  घर पहुंच कर सारा सामान उतार वो अपने कमरे की ओर भाग गया, भीगे कपड़ों में अब सर्दी भी लगने लगी थी।
     शर्ट के बटन खोलते में उसका ध्यान जेब में रखी चिट्ठी पर गया , चिट्ठी पानी से पूरी तरह भीग कर कागज़ की लुगदी सी रह गयी थी। उसे खोल कर देखने के प्रयास में चिट्ठी आपस मे ही और उलझ गए। अंदर लिखे शब्द बस नीली फैली सी स्याही से पता चल रहे थे कि अंदर कुछ लिखा था पर क्या लिखा था ये अब सिर्फ लिखने वाला ही बता सकता था।
    उस चिट्ठी को टेबल पर रख देव अपनी शर्ट खोलने लगा कि पारो चली आयी।
  पीछे से देव की कमीज पकड़ उसने उतारने में मदद करते हुए वहाँ क्या हुआ का हालचाल भी पूछ लिया…
     पारो का स्पर्श पाते ही देव चौन्क कर पीछे मुड़ गया। बाहर से भीगती भागती आयी पारो की गीली लटें उसके चेहरे के आस पास चिपकीं सी थी। बालों पर अब भी पानी की बूंदे मोती के दानों सी निखरी पड़ी थीं।
    पारो के चेहरे को देखता देव जैसे खुद को भी भूलता चला जा रहा था। दोनों हाथों में उसका चेहरा थामें वो कुछ देर एकटक पारो को देखता रह गया…

क्रमशः

aparna..


 
 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s