समिधा -15

समिधा — 15




       प्रखर के लिए मन में एक अलग सी आदर की भावना लिए देव वापस लौट आया।
    उस चिट्ठी को टेबल पर रख देव अपनी शर्ट खोलने लगा कि पारो चली आयी।
  पीछे से देव की कमीज पकड़ उसने उतारने में मदद करते हुए वहाँ क्या हुआ का हालचाल भी पूछ लिया…
     पारो का स्पर्श पाते ही देव चौन्क कर पीछे मुड़ गया। बाहर से भीगती भागती आयी पारो की गीली लटें उसके चेहरे के आस पास चिपकीं सी थी। बालों पर अब भी पानी की बूंदे मोती के दानों सी निखरी पड़ी थीं।
    पारो के चेहरे को देखता देव जैसे खुद को भी भूलता चला जा रहा था। दोनों हाथों में उसका चेहरा थामें वो कुछ देर एकटक पारो को देखता रह गया…

    पारो के होंठो को देखता वो उन पर झुकने ही जा रहा था कि दरवाज़े को ज़ोर से धकेलता दर्शन अंदर चला आया।

  ” दादा( बड़े भैया) जल्दी चलो बाबा( पिता) बेहोश होकर गिर गए हैं।”

  ” क्या हो गया दर्शन?” कहता पारो के हाथ मे थामी टीशर्ट को तुरंत पहनता देव दर्शन के साथ दौड़ता हुआ बाहर निकल गया।

   देव के बाबा बेहोश होकर गिर पड़े थे, उन्हें काका ने पलंग पर लिटा रखा था, माथे पर ठंडे पानी की पट्टी रखने के कुछ देर में उन्होंने धीमे से आंखे खोल दी। उतनी देर में देव अपनी बाइक निकाले डॉक्टर को लेने चला गया।
    डॉक्टर ने आते ही उनकी जांच शुरू कर दी। बीपी अचानक कम हो जाने से ही उन्हें चक्कर आ गया था। बीपी अचानक कम कैसे हुआ ये जानने के लिए अगले दिन होने वाली विभिन्न जांचों के लिए उन्हें अस्पताल आने का कह कर डॉक्टर चला गया पर इतनी देर में रो धोकर देव की माँ ने घर सर पर उठा लिया था। उनकी जेठानी देवरानी देव के बाबा से ज्यादा उन्ही की तीमारदारी में लगी थीं।
     लेकिन इस सब के बीच एक किनारे आंगन में बैठी ठाकुर माँ अपनी सुमिरनी जपती मन ही मन कुछ निर्णय भी ले चुकी थीं।
    उन्होंने हाथ के इशारे से देव को अपने पास बुला लिया…

” बाबुन कल तेरे बाबा की सारी जांच परीक्षा हो जाए फिर सब सही आ जाए तो..

” हाँ तो क्या ठाकुर माँ ?”

” तो तू मेरी एक इच्छा पूरी करेगा बेटा। भगवान के दर्शन कर के आना चाहती हूँ और इस घर के लिए आशीष मांग कर भी आना है कि यहाँ सब हँसी खुशी बनी रहे।

  देव मुस्कुरा कर हाँ बोल अगले दिन होने वाली जांचों के लिए नम्बर लगाने की तैयारी करने चला गया।

   अगली सुबह अपने बाबा को साथ लिए वो निकल पड़ा।
   शाम तक में सारी रिपोर्ट्स भी आ गयी। सब कुछ सामान्य ही था, ये जान कर घर वालों के चेहरों पर राहत थी….

  ” ए बाबुन ! अब तू मुझे मेरी मन्नत पूरी करने ले चलेगा न।”

“कहाँ जाना चाहती  हैं आप ठाकुर माँ। “

” केदारनाथ! केदारनाथ जाना चाहती हूँ। अपने जीवन काल में एक बार बाबा के दर्शन कर आऊँ और उन्हें एक बार आभार व्यक्त कर आऊँ, बस अब यही अभिलाषा है।

  मुस्कुरा कर देव की माँ ने देव की तरफ देखा …

” बाबुन अपनी ठाकुर माँ को ले जाएगा न।”

“क्यों नही ले जाऊंगा माँ , लेकिन अभी तो सर पर लाली की शादी टिकी है। आप सब अगर लाली की शादी थोड़ा आगे बढा दो तो मैं ठाकुर माँ को दर्शन करवा कर ले आता हूँ। “

” नही नही बाबुन! अब लाली की सप्तपदी भी निपट जाने दे, उसके बाद चलेंगे , तू और मैं बस। हम पूरे घर भर के लिए आशीर्वाद ले जाएंगे। ठीक है!

  हां में सर हिलाता देव अपने कमरे में तैयार होने चला गया।

*******


    वरुण उस शाम सुपर मार्केट से निकला सीधा मंदिर की ओर बढ़ चला, पर मन मे उमड़ते घुमड़ते विचारों के साथ वो वापस अपने घर की तरफ मुड़ गया।
   मन में चलता द्वंद ऐसा था कि उसे कहीं चैन नही मिल रहा था।
   वो जब से इंडिया से यहाँ आया था, उसके जीवन में जैसे कुछ अलग सा ही बदलाव आ गया था। कादम्बरी भी उससे हमेशा शिकायत किया करती, कि दुनिया जहान के प्रेमी अपनी प्रियतमा के लिए कैसे पागल रहतें हैं और एक वो है कि कभी खुद से फ़ोन तक नही करता। बात भी सही थी गाहे बगाहे कादम्बरी ही उसे फ़ोन कर लिया करती थी।
   पहले रोज़ रातों को फ़ोन करने वाली कादम्बरी धीरे धीरे एक एक दिन के अंतराल में फ़ोन करने लगी थी और अब हफ्ते में एक बार ही उसके भी फोन कॉल्स सिमट गये थे।
    कितने उलाहने होते थे उसके पास वरुण के लिए। हर बात में एक ताना छिपा होता था। ” मिल गयी होगी वहाँ कोई गोरी मेम। लड़को का क्या है बस लड़की देखी की फिसले।”
  वरुण पहले पहल उसे समझाया और मनाया करता था धीरे धीरे वो उसकी बातें सुनता चुप बैठे रहने लगा था।

  कहीं न कहीं इस सब में उसे खुद की भी गलती नज़र आती थी, आखिर वो उसकी होने वाली पत्नी है अगर वो उससे उम्मीद नही रखेगी तो किससे रखेगी पर फिर भी चाह कर भी कभी उसका कादम्बरी को फ़ोन करने का मन ही नही करता।
  
     पुरुष को स्त्री देह की तरफ आकर्षित करने वाली कोई कमनीयता कोई लुनाई वो कादम्बरी में चाह कर भी ढूंढ नही पाता था।
 
     कादम्बरी गोरी थी, गोरी भी बिल्कुल दूध मलाई सी, लंबी छरहरी थी फिर भी उसमें शायद वो चीज़ नही थी जो वरुण को उसकी तरफ खींच पाए।
   और जो भी हो आज तक वो उससे अपने रिश्ते अपने भविष्य के कारण जुड़ा था लेकिन अब अपनी बीमारी के बारे में पता चलने के बाद से उसका मन डगमगाने लगा था, और आज के मंदिर में मिले जोड़े की बातें सुनने के बाद एक ओर जहाँ उसका मन कृष्ण में डूबने लगा था वहीं दूसरी ओर एक आदर्श जोड़े को प्यार से एक दूजे का साथ देते देख यह भी समझ आ गया था कि अगर जीवन को सुखमय रखना है तो सही समय पर सही निर्णय लेना आवश्यक है।
   मन ही मन कुछ सोच कर उसने गाड़ी पास ही के एक पुराने मोन्यूमेंट की तरफ मोड़ ली।

  उस ऊंची सी मीनार के सबसे ऊपरी छज्जे पर पहुंच एक तरफ की रेलिंग के सहारे वो पैर लटकाए वो वहाँ बैठ गया।
  ठंडी हवाएं उसके चेहरे से टकराती उसके मन में चलती उलझनों को राहत के छींटे सी दे रहीं थीं….
  अपने मन को भरसक समेट कर उसने अपनी माँ को फोन लगा दिया…

“कैसी हो माँ? “

” तू कैसा हैं बंटी! बेटा इस वक्त पर फ़ोन लगाया, इतनी सुबह ! सब ठीक है ना?

वरुण के शहर में शाम ढलने लगी थी… उसके मन में इतनी हलचल थी कि उसने समय पर ध्यान ही नही दिया था। माँ की बात सुन उसे ध्यान आया और उसने घड़ी देखी…

“तुम सो तो नही रही थी न माँ?”

” हाँ बेटा, उठ चुकी थी, चाय पी रही थी। तू बता क्या बात है।”

” माँ ! मैं कुछ कहना चाहता हूँ, माँ !!! मैं कादम्बरी से शादी नही कर पाऊंगा!”

  अपनी बात कह कर वरुण कुछ देर को शांत रह गया, उधर उसकी माँ भी चुप थी…..
  जैसे वो शुरू से जानती थीं कि एक दिन यही होना है। वो भी शांत थी , गहरी सांसे लेती हुई चुप बैठी वो अपने विचारों में खो गयीं थीं।
   ना उन्होंने और साधारण माँओं की तरह कुछ पूछताछ की और न कोई समझाइश दी, वो यही सोचने में व्यस्त थीं कि कादम्बरी के घर पर आखिर क्या बोल कर मना किया जा सकता है।

   माँ और बेटा दो अलग अलग देशों में बैठे चुपचाप एक दूसरे की खामोशी सुन रहे थे। आखिर कुछ देर बाद वरुण की माँ ने ही कहना शुरू किया…

“तू ठीक है ना बंटी? अचानक इतना बड़ा निर्णय ?”

” मैं ठीक हूँ माँ। बहुत समय से सोच रहा था लेकिन हिम्मत ही नही हुई, आज जाने कैसे हिम्मत कर ही गया। अब मैं इस रिश्ते के बोझ को और नही सह पाऊंगा। पहले लगता था किसी तरह निभा जाऊंगा, लेकिन अब ये रिश्ता गले की फांस सा अटकने लगा है, मैं जानता हूँ तुम ये सुन कर परेशान हो उठी होंगी। इतना आगे बढ़ने के बाद रिश्ते से मना करना वो भी इतने बड़े लोगों को तुम सब के लिए मुसीबत का कारण बन सकता है। यही सब सोचता अब तक चुप था लेकिन अब नही हो पा रहा माँ।
  मैं तो चाहता हूँ तुम पापा रोली सब यहाँ मेरे पास आ जाओ जिससे वो लोग तुम लोगों को परेशान न कर सकें।

” बंटी इतना सोच मत बेटा। अभी रोली की शादी तक रुक जातें हैं उसके बाद  उनसे बात करेंगे। “

” नही माँ ! जब मन ही नही जुड़ रहा तो अब इस बात को जितना जल्दी कादम्बरी से कह दूं उतना अच्छा है। और फिर ज़िन्दगी का क्या भरोसा?”

” तू ऐसी बातें क्यों बोल रहा है। अपनी माँ पर तो भरोसा है ना, निपट जाने दे बहन की शादी, उसके बाद मैं तेरी बुआ से बात कर लुंगी, रिश्ते की मनाही को लेकर , लेकिन बंटी तब तक तू कादम्बरी से कुछ नही कहेगा, तुझे कसम है।
    मैं जल्दी से जल्दी रोली की शादी की तारीख तय कर तुझे बताती हूँ, तू अपनी छुट्टियां डाल देना। जब शादी मे आएगा तभी आगे की बातें कर लेंगे उनके घर जाकर।
   फ़ोन पर कादम्बरी से ये सब कुछ मत कहना बेटा।”

” ठीक है माँ। जैसा तुम्हें ठीक लगे। “

   वरुण फ़ोन रख उस ऊंची मीनार पर बैठा सोचता रहा सोचता रहा फिर जाने क्या सोच वो उस मीनार की रेलिंग पर खड़ा हो गया।
     बत्तीसवीं मंज़िल पर खड़ा वरुण मुस्कुराने लगा….

“सब कहते हैं तुम हो! मैंने पहले कभी नही माना कि तुम हो लेकिन जाने क्यों आज मन कर रहा है कि तुम्हे चैलेंज करूँ।
   तो सारे संसार के रचयिता, मुरली की तान पर सबकी साँसों की सरगम चलाने वाले वंशीधर मैं वरुण आज इस बत्तीसवीं मंज़िल से कूदने जा रहा हूँ। तुम अगर सच में कहीं हो तो आ जाओ और बचा लो मुझे। उस दिन मंदिर में पंडित जी ने कहा था कि तुम मुझे नास्तिक से आस्तिक बनाना चाहते हो और इसलिए बार बार अपने पास बुला लेते हो तो जब तुम में इतनी ताकत है तो आओ और बचा लो मुझे। “

   आसमान की ओर चेहरा किये वरुण ने अपनी बात पूरी की और आंखें बंद कर अपने शरीर को हल्का छोड़ते हुए अपने आप को एकदम ढीला छोड़ दिया, वो नीचे गिरने ही वाला था कि दो जोड़ी बाहों ने उसे कस कर थामा और पीछे खींच लिया…..

” What are you doing here, have you gone mad?”

    उस मीनार का गार्ड था शायद जो शाम गहराने पर हर एक मंज़िल पर  से लोगों को पुकार कर नीचे जाने कह रहा था। रात गहराती देख कर उस सबसे ऊंची जगह से सभी नीचे जा चुके थे वरुण के अलावा।
   उसे टेरेस पर खड़ा देख गार्ड ने उसे अंदर की तरफ खींच लिया था।
    घबराया सा वरुण उसकी बड़बड़ सुनता उसे सॉरी कहता नीचे उतर गया था।
   पर उस गार्ड की तेज बड़बड़ाहट उसे सीढ़ियों पर बहुत दूर तक सुनाई देती रही। वाकई भीड़भाड़ बहुत कम हो गयी थी। इक्के दुक्के लोग पार्किंग सेअपनी गाड़ी निकालते अपने अपने घरों को निकलते जा रहे थे।
   वरुण भी गार्ड की झिड़कियों को मन ही मन सोचता अपनी गाड़ी की ओर बढ़ा जा रहा था कि गेट पर किसी आदमी की ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ सुन वो भी औरों की तरह ठिठक कर मुख्य द्वार की ओर देखने लगा।
   वहाँ वही कुछ देर पहले का गार्ड जो उसे नीचे उतरने को बोल कर उसी मंज़िल की दूसरी ओर कोई है तो नही देखने चला गया था यहाँ गेट पर खड़ा उस व्यक्ति को पूरी विनम्रता से कुछ समझाने की कोशिश कर रहा था।
   उस गार्ड को देख वरुण का सर चकरा गया। इतनी जल्दी वो गार्ड ऊपर से नीचे कैसे आ गया? आखिर उसकी झिड़की सुन कर तो वरुण पहले नीचे भागा था, फिर वरुण से पहले वो कैसे नीचे पहुंच गया? इतनी ऊंचाई से उससे पहले उसका नीचे पहुंचना असम्भव था।

   वरुण उस गार्ड को देखता हुआ ही पार्किंग की ओर बढ़ने लगा। उसके मन मे अभी भी उथल पुथल मची हुई थी , कि सोचते सोचते उसका ध्यान इस मीनार की ऊपरी छत पर चला गया। उसे लगा जैसे उतनी ऊंचाई पर अभी भी वो गार्ड खड़ा मुस्कुरा रहा है, वापस नीचे गेट पर देखने पर भी वहाँ गार्ड खड़ा था।

  वरुण ने अपनी गाड़ी खोली और अंदर बैठ गया, गाड़ी पार्किंग से निकालते हुए जब वो मुख्य द्वार पर पहुंचा तब तक गार्ड से बहस करता व्यक्ति जा चुका था। गार्ड को अपनी पार्किंग टिकट दिखा कर वरुण आगे बढ़ने ही वाला था कि गार्ड ने नीचे से उठा कर कुछ उसकी ओर बढ़ा दिया…

  ” शायद ये आपका है जो गिर गया था। ”   गार्ड के हाथ मे मोरपंख देख वरुण की आंखे खुली की खुली रह गईं।

  गार्ड के हाथ से मोरपंख लेकर उसने रख लिया और गाड़ी आगे बढ़ा दी।
   रियर व्यू मिरर में उसने देखा मीनार पर अब भी कोई इंसानी आकृति खड़ी थी , जबकि गार्ड अपनी जगह पर मौजूद था।

    तो क्या इसका मतलब खुद श्रीकृष्ण उसे बचाने गार्ड का रूप धर चले आये थे।  नही ये तो हो ही नही सकता। माँ कहती है ये कलियुग है इस युग में भगवान ऐसे आकर दर्शन नही देते, लेकिन फिर वो क्या था?
   उसने कृष्ण को चैलेंज किया और कूदने जा रहा था कि किसी ने उसे खींच लिया,वो गार्ड वहाँ कब और कैसे पहुंचा? जब वो अकेला उतनी ऊंचाई पर था तो आखिर वहाँ कोई कैसे अचानक पहुंच कर उसे बचा सकता है।
  तो क्या उसे गिरने से रोकने वाले स्वयं श्रीकृष्ण ही थे?

    वरुण ने आखिर अपनी गाड़ी मंदिर की ओर घूमा ली।
   अभी वो मंदिर पहुंचा ही था कि उसकी माँ का संदेश उसके मोबाइल पर चला आया….

  ” बेटा पंडित जी से बात हो गयी है, रोली की शादी की तारीख अगले हफ्ते की निकली है, अगले हफ्ते 24 तारीख का शुभ मुहूर्त है। अब तू अपने ऑफिस में बात कर के अपनी छुट्टी का आवेदन दे देना बेटा। ”
 
  वरुण ने मेसेज देखा और मुस्कुरा कर मंदिर के अंदर चला गया।


*********

    देव अपने कमरे से कपड़े बदल कर आंगन में आया कि उसकी माँ ने उसे चाय पकड़ा दी…

” बाबुन लाली के ससुराल से फोन आया था। वो लोग अगले हफ्ते ही शादी कर देना चाहते हैं बेटा। चौबीस तारीख का मुहूर्त निकला है, बस एक ही हफ्ता बचा है अब तो हमें फटाफट तैयारियां शुरू करनी है। मंगल भवन , कैटरिंग सभी की बात शुरू कर देना बेटा। “

हाँ में सर हिलाता बैठा देव सोच रहा था वाह रे भगवान तेरी माया! कहाँ तो मैं शादी दो तीन साल आगे बढ़ाना चाहता था और कहाँ तुमने शादी और जल्दी करवा दी। चलो कोई बात नही, प्रखर ने भी हां कह दिया है तो उन्होंने कुछ सोच रखा होगा।

   चाय पीते बैठा देव अपने जोड़ घटाव में लगा था उधर पारो अपने कमरे में खिड़की पर खड़ी अपने भावी जीवन के सुरीले सपने संजोती आस का दीपक जलाएं खड़ी थी।
     उसका ग्यारहवीं कक्षा में दाखिला हो चुका था। और अब कुछ समय बाद उसका स्कूल शुरू होने जा रहा था। मन में बस एक ही टीस थी उसके कि उसकी पक्की सहेली उसकी प्यारी लाली अब उसके साथ स्कूल नही जा पाएगी…….


क्रमशः


  दिल से …..


      हमारे सब के जीवन मे अलग अलग रंग भरे होतें हैं, सबकी अपनी इच्छाएं कुंठाये सपने होतें हैं इसलिए तो सबका जीवन इतना भिन्न होता है।
    कोई जीवन में जो सब भी मिला उससे खुश नही और कोई ऐसा भी होता है जिसे भले कुछ न मिले लेकिन अपने जीवन से उसे बहुत प्यार होता है जैसे देव!
    देव जैसे किरदार बहुत कम होतें हैं क्योंकि अधिकतर लोग जीवन मे जो नही मिला उसकी शिकायत लेकर बैठे होते हैं। और जो मिला है उसे अनदेखा कर जातें हैं।
 
    वरुण वाले हिस्से में लिखी बातें किसी भी तरह के अंधविश्वास को बढ़ावा नही देती। आज के भाग में लिखी बातों का खुलासा अगले भागों में होता चला जायेगा।
    लेकिन कृपया कहानी पढ़ कर वरुण जैसे एक्सपेरिमेंट करने का सोचें भी नही, ये मात्र एक कहानी है जो लेखिका की कोरी कल्पना है। कभी कभी चमत्कार लिखना अच्छा लगता है खुद के अंदर भी अलग सी सकारात्मकता आती है और पढ़ने वालों के अंदर भी…..

   ईश्वर पर विश्वास खुद पर ही विश्वास करने जैसा है। अध्यात्म जितना आपको भगवान से जोड़ता है उतना ही खुद से भी जोड़ता है।
   भगवतभक्ति कहीं न कहीं खुद से खुद को मिलाने की कोशिश ही तो है, और इसी कोशिश में लगा है कहानी का नायक वरुण! 


  कहानी पढ़ने और सराहने के लिए हृदय से आभार आप सभी का।
  


aparna …..


  

  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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