समिधा- 16

समिधा –16




       माँ से बात करने के बाद वरुण के मन का बहुत बड़ा बोझ हट चुका था।
    वो शांत मन से मंदिर की ओर निकल गया….

   हमारे देश की तरह वहाँ मंदिर सुबह शाम दोनो वक्त खुलता हो ऐसा नही था। उस मंदिर के पंडित मंदिर ट्रस्ट की तरफ से रखे गए थे, जो अक्सर सुबह ही लंबे समय के लिए मंदिर खोला करते थे। शाम को सिर्फ एक से डेढ़ घंटे में वो मन्दिर बंद कर दिया करते थे। इस बात की अनभिज्ञता के कारण वरुण मंदिर की ओर बढ़ चला, उसकी किस्मत से मन्दिर खुला था।

   वो मंदिर पहुंचा, आसपास के कुछ लोग मंदिर में थे। कान्हा जी आज कुछ विशेष साज सज्जा में थे। उनका पूरा श्रृंगार फूलों से किया गया था। सफेद पीले फूलों से सिर्फ उनकी मूर्ति ही नही उनके आसपास का पूरा परिवेश सजा था।
  मूर्ति इतनी सजीव लग रही थी कि वरुण उस मूर्ति को देखता खो गया।
   कान्हा जी के सामने हाथ जोड़े वो अपलक उनके नेत्रों को देखता रहा, उसे ऐसा भान हुआ कि उसे देखते हुए कान्हा जी मुस्कुरा रहें हैं।
   वो भी उन्हें  देख मुस्कुरा उठा और उसके होंठ स्वयं उनकी प्रार्थना में लग गए।।
  पंडित जी उसे देख मुस्कुराने लगे..

” पंडित जी आपसे एक सवाल करना चाहता हूँ, अगर आप चाहें तभी जवाब दीजिएगा?”

“बिल्कुल मैं नही चाहूंगा तब भी कोशिश करूंगा कि तुम्हारी शंका का समाधान हो सके।

” पंडित जी कभी कभी ऐसा लगता है जैसे कान्हा जी मेरे साथ ही हैं , कहीं आसपास। भले ही उन्हें देख नही पाता तब भी। लेकिन कभी लगता है क्या वाकई इनका कोई अस्तित्व है?”

” शंका का कोई समाधान नही है
   चरित्र का कोई प्रमाण नही है
   मौन से बेहतर संधान नही है
   और शब्दों से तीखा कोई बाण नही है।

  यानी जब तक भगवान के अस्तित्व का तुम्हें पूर्ण रूप से विश्वास न हो तब तक किसी भी तरीके से कोई तुम्हारा समाधान नही कर सकता…

पंडित जी अभी अपनी बात कह ही रहे थे कि वरुण ने बीच में ही उनकी बात काट दी और अपनी बात रख दी …

” पंडित जी मैं धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहता हूँ। जिस तरह बुद्ध ने सत्य की तलाश के लिए संसार से विरक्त होकर कठिन तप किया ,में भले ही वैसा न कर पाऊं लेकिन ईश्वर क्या है, ब्रम्ह क्या है सत्य क्या है ये सब जानने के लिए मुझे भी सांसारिक प्रपंचों को त्यागना होगा ,और मैं इसके लिए तैयार हूँ।”

” संसार को त्याग कर , उसके परपंच त्याग कर संसार बनाने वाले को खोजने चला है? अरे वो तुझे इसी संसार में मिल जाएगा, आंखे बस खुली रख। “

   वरुण की बात उसी समय मंदिर में प्रवेश करते स्वामी जी ने सुनी और उसकी बात का जवाब दे पड़े। उनकी बात सुन वरुण पीछे पलट कर उन्हें देख सोच में पड़ गया। उसके सर पर हाथ रख स्वामी जी आगे कहने लगे…

“तू चाहता है तो कुछ समय के लिए मंदिर ट्रस्ट में आ जा। तुझे पूजा अर्चना भाव भक्ति तप साधना सब कुछ पास से देखने  और जानने का मौका मिल जाएगा।
   उसके बाद अगर तुझे लगता है कि तू सांसारिक मोह माया के लिए नही बना है तभी पूर्ण स्वेच्छा से दीक्षा ग्रहण करना।
  क्योंकि हम किसी के गले पर कटार रख कर उसे अपने धर्म में शामिल नही करना चाहते। और वैसे भगवान धर्म कर्म जात पांत से कहीं ऊंचा है, ये उसकी भक्ति और स्मरण से तुझे खुद ज्ञात हो जाएगा।
   जो पूर्ण तल्लीनता से उसे याद भी कर लेता है, उसका फिर हाथ पकड़ कर वो भक्तिरस के काननकुंज की ऐसी सैर करवाता है कि उसमें फिर डूबे रहने का ही मन करता है, उससे उबरने का फिर जी ही नही चाहता..
    हरे कृष्ण हरे कृष्ण! कृष्ण कृष्ण हरे हरे!

  स्वामी जी अपनी बात पूरी कर कृष्ण धुन में लीन हो गए, उनके पीछे खड़े अनुयायी भी उनके साथ कृष्ण धुन में मगन खड़े खड़े ही अपने हाथ ऊपर किये गाने लगे।
  वरुण को भी पता नही चला कब वो खुद उसी धुन में मगन घंटो तक “हरे रामा हरे कृष्णा !कृष्णा कृष्णा हरे हरे” बोलों को गाता रहा।

    भजन पश्चात स्वामी जी अंदर जाने लगे तब वरुण ने आगे बढ़ कर उनके पैर पकड़ लिए…

” स्वामी जी मुझे अपनी शरण मे ले लीजिए प्लीज़!”

” तू तो अभी जवान है, शादी भी नही की लगता है? फिर क्यों सन्यासी बनना चाहता है?”

” शांति की तलाश है स्वामी जी , जो सिर्फ यही इसी मंदिर में पूरी होती है। “

” बहुत कठिन तो नही हैं, लेकिन कुछ नियम हैं जो पालन करने पड़ेंगे। कर पायेगा?”

” जी ! कर लूंगा। “

” अरे पहले सुन तो ले। मांस मछली नही खा पायेगा, शराब सिगरेट सब छोड़नी होगी। मंदिर में रहेगा तो यहीं का सादा भोजन खाना पड़ेगा बिना प्याज़ लहसन वाला।
   हर तरह के व्यसन त्यागने होंगे, जुआं, सट्टा शेयर मार्किट ये सब बंद।
  रोज़ स्वध्याय के लिए कम से कम एक घंटा निकालना ही होगा जिसमें वेद पुराण उपनिषदों का अध्ययन करना होगा । पर स्त्री/ पर पुरुष के लिए किसी भी प्रकार से मन में कोई कुविचार नही आना चाहिए।
   बोल यह सब त्याग पायेगा।
कहने को हमारे नियम आसान हैं लेकिन हर कोई इनका पालन कर पाए ये आवश्यक नही इसलिए हम लोग किसी से नही कहते कि हमारे साथ चलो, जो स्वेच्छा से जुड़ता गया वही आगे बढ़ता गया।”

  वरुण ने स्वामी जी के पैर पकड़ लिए…

” स्वामी जी मैं सब करने को तैयार हूँ, आप बस अपनी शरण मे ले लीजिए। “

स्वामी जी मुस्कुरा उठे, उन्होंने वरुण के सर पर हाथ रखा और आशीर्वाद देते बोल पड़े…

” जा पहले अपने सांसारिक दायित्वों को पूरा कर ले। अपने घर वालों से परामर्श कर ले फिर आ जाना, मंदिर तो सभी के लिए खुला है। चिरंजीवी भव!!”

  स्वामी जी का आशीर्वाद सुन वरुण सोच में पड़ गया, जिसकी अगली सांस का भरोसा नही उसे किस विश्वास से स्वामी जी ने चिरंजीवी होने का आशीर्वाद दे दिया।
   उन्हें प्रणाम कर वो मंदिर से बाहर निकल गया।
मन में एक अभूतपूर्व शांति महसूस करता वो अपने फ्लैट के लिए निकल गया।

******

          समय सबसे बड़ा सौदागर होता है,
    जो हर पल आपके जीवन के साथ खेलता है।।

   आप चलें न चलें समय अबाध गति से चलता ही चला जाता है। एक हफ्ते का समय पलक झपकते कब बीत गया वरुण को पता ही नही चला।
  अपने ऑफ़िस में बात कर वरुण ने छुट्टियाँ ली और हिंदुस्तान पहुंच गया।।
  
   घर पर रोली की शादी की तैयारियां जोरों से चल रहीं थीं। उसे माँ ने जितना कहा था वो उतने रुपयों का इंतज़ाम कर लाया था। उसके इतने सालो की नौकरी में उसने जो भी रुपया जोड़ा था उसके साथ ही रोली की शादी के लिए कुछ रकम अपने ऑफिस से भी लोन में उठा रखी थी। अब वो यही सोच रहा था की अगर वो सन्यास ले लेगा तब उसे नौकरी छोड़नी पड़ेगी और तब वो इतनी मोटी रकम अपने ऑफिस में कैसे चुका पायेगा।
   पहले वाला वरुण होता तो इसी बात को सोच सोच कर परेशान हो उठता लेकिन स्वामी जी से मिल कर आने के बाद से उसमें एक अजब से परिवर्तन हो गया था।
  अब वो पता नही किस कारण लेकिन निश्चिंत हो गया था।
उसे लगने लगा था कि अब सब कुछ कृष्ण संभाल लेंगे। चाहे उसकी तबियत हो, ऑफिस से लिया लोन हो या बहन की शादी।
   वो निष्फिकर रोली की शादी की तैयारियों में मगन हो गया।
   दोपहर माँ के बार बार बुलाने पर वो खाना खाने आ पाया…. नीचे पहुंचते ही उसकी नज़र माँ के पीछे रसोई से हाथ में डोंगा थामे आती कादम्बरी पर पड़ गयी और एक सेकंड को उसका चेहरा दप्प से बुझ गया…
   ये यहाँ क्या कर रही है? वो सोच रहा था कि कादम्बरी ने उसकी थाली में मटर पनीर परोस दिया…

” बंटी बेटा तू सुबह से व्यस्त था, इसलिए कादम्बरी ने मना कर दिया तुझे बताने के लिए। आज दोनो सब्जियाँ और कढ़ी उसी ने बनाई है। ” माँ ने पहले ही वरुण को कादम्बरी से रिश्ते से मना करने के लिए रोक रखा था इसलिए न चाहते हुए भी उसे कादम्बरी को देख मुस्कुराना पड़ा..

   वरुण से कुछ कहते नही बना, उसने धीमे से कादम्बरी की तरफ देखा , वो उसके सामने की कुर्सी पर बैठी उसे देख कर मुस्कुरा रही थी। रोली वरुण मौसी के बच्चे ये सभी डायनिंग पर बैठे थे इसलिए वरुण के पिता सोफे पर ही अपनी प्लेट लेकर चले गए थे।
   अगले दिन से शादी की रस्में शुरू होनी थी और अगले दिन से ही मेहमानों को आना था। अब तक सिर्फ वरुण की मौसी के बच्चे ही आये थे।
    खाने की टेबल पर उन लोगों की चुहलबाज़ी चलती रही। मौसी के बच्चे कमल और लिली वरुण रोली के हमउम्र ही थे। दोनों कादम्बरी और वरुण को छेड़े जा रहे थे।


” क्या बात है भाभी जी, खाना तो आपने बहुत स्वाद बनाया है। मतलब अब वरुण मोटा ज़रूर हो जाएगा, हमेशा मुझे पेटू पेटू कह कर चिढ़ाता रहता है। अब देखूंगा रोज़ रोज़ इतना टेस्टी खाना खा कर तू कैसे मोटा नही होगा? “

” मैं मोटा होने दूंगी तब मोटे होंगे न! और वैसे भी मेरे घर पर मैं खाना नही बनाती, हमारे यहाँ शेफ है बनाने के लिए तो जाहिर है इन्हें उसी के हाथ का रोज़ खाना पड़ेगा। ”

  अपनी बात पूरी कर कादम्बरी मुस्कुराने लगी लेकिन वहाँ बैठे बाकी लोगों के मुहँ का स्वाद खराब हो गया।
कादम्बरी के व्यक्तित्व के सामने किसी की ये बोलने तक की हिम्मत नही हुई कि वरुण उसके घर पर घर जंवाई नही बनेगा।
      वरुण और उसकी माँ के दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था, लेकिन माँ के मना करने के कारण वरुण ने अब तक कादम्बरी से कुछ नही कहा था।
   खाना निपटने के बाद कादम्बरी ने शॉपिंग प्लान बना रखा था,वो रोली के लिए रोली की ही पसन्द से कुछ लेना चाहती थी।
      रोली को साथ लिए वरुण और कादम्बरी मार्किट के लिए निकल गए, कमल और लिली भी साथ हो लिए।

    रोली का बहुत मन था कि वो बंगाली लड़कियों की तरह ट्रेडिशनल सफेद लाल साड़ी पहने। उसकी शादी के दिन एक रस्म के लिए थीम भी बंगाली चुनी गई थी।

  “रोली मेरी तरफ से वही ट्रेडिशनल बंगाली साड़ी ही ले लो। तुम्हारी पसन्द की रहेगी तो मैं भी निश्चिंत रहूंगी। और उसके साथ पहनने के लिए गोल्ड के झुमके भी ले लेना। “

” भाभी इतना सब देने की क्या ज़रूरत है। मैं बस साड़ी आपकी तरफ से ले लुंगी। ”

” ज़रूरत कैसे नही है ? आखिर तुम नन्द हो मेरी। मेरा भी तो फ़र्ज़ बनता है ना।”

  रोली का हाथ थामे सामने सजी लंबी चौड़ी सी ” वेदम ” में कादम्बरी घुस गई।

   ” कुछ अच्छा सा दिखाना ट्रेडिशनल ब्राइडल में।”
 
  दुकानदार ने साड़ियां फैलानी शुरू की…

” नही ये नही, कुछ रिच सा दिखाओ ….

  कमल लिली रोली कादम्बरी फिर वरुण बैठा था,सामने गद्दी पर दुकानदार साड़ियों का अंबार लगाता जा रहा था।
   वरुण से थोड़ा हट कर उसके बगल में पहले से बैठे पारो देव और लाली भी साड़ियां देख रहे थे।
   
      देव के घर पर लाली की शादी की सारी तैयारी हो चुकी थी लेकिन पारो का मन था अपनी प्यारी सखी लाली की  शादी में वो और लाली एक सी साड़ियां पहनें और इसलिए वो चाहती थी कि देव उन दोनों के लिए एक से कपड़े ले आये।
   देव जानता था कि पारो अपनी पसंद का तोहफा लाली को देना चाहती है, इसलिए लाली और पारो को मंदिर घुमा लाने की बात कह देव उन दोनो को साथ लिए शॉपिंग के लिए कोलकाता चला आया था।

  शॉपिंग से पहले तीनो ने मन भर कर फुचका ( गोलगप्पे) खाया , कुल्फी खायी और फिर हंसी मजाक करते दुकान में घुस गए।
    दुकान का मालिक तो काउंटर पर था, उसके लड़के कपड़े दिखा रहे थे।
  दुकान बड़ी थी, अलग अलग जगह अलग अलग लड़के कस्टमर को कपड़े दिखा रहे थे।
   इत्तेफाक से पारो की बगल वाली कुर्सी पर वरुण आ बैठा। पारो को साड़ियां दिखाता लड़का उत्साह से एक से एक नयी कलेवरों की साड़ियां दिखा रहा था उधर कादम्बरी को कपडे दिखाने वाला साधारण ही दिखा पा रहा था।
    एक बहुत खूबसूरत सी मयूरपंखी रंग की साड़ी को हाथ में लिए उसके रेशमी आँचल पर हाथ फिराती पारो के सामने बिछी उस साड़ी पर नज़र पड़ते ही कादम्बरी ने लड़के को उस साड़ी को खुद दिखाने को कहा और तुरंत वो साड़ी झपट ली।
    पारो को भी वह साड़ी पसन्द आ रही थी लेकिन मूल्य देख कर वो सोच में पड़ी थी कि उसके हाथ से छिनवा कर कादम्बरी ने उस साड़ी को पसन्द किया और पैक करवाने एक ओर रख दिया।
     
   पारो ने कादम्बरी को देखने के लिए अपने एक ओर निगाहें डाली तो उसकी नज़र पास बैठे वरुण पर पड़ गयी और उसे अचानक उस शाम मंदिर के बाहर मिली वो जोड़ी याद आ गयी। द्वारिकाधीश और सत्यभामा की जोड़ी!
    पारो के चेहरे पर मुस्कान चली आयी… “आखिर सत्यभामा तो सत्यभामा ही रहेगी”

   पारो की गुनगुनाहट बहुत धीमी थी लेकिन वरुण के कानों तक पहुंच ही गयी..

” सॉरी ! आपने कुछ कहा? “
 
  उसने पास बैठी पारो से पूछ ही लिया, और ना में सर हिला कर पारो दूसरी साड़ियों की ओर देखने लगी।

क्रमशः

aparna ….



  
  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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