समिधा -18

  समिधा – 18


      वाह रे भगवान तुम और तुम्हारा संसार !!
अब तुम्हें पूरी तरह समझने आना ही पड़ेगा मुझे तुम्हारे रचे संसार को तज कर तुम्हारी शरण में…..

    रोली की बिदाई के साथ ही घर भर को व्यस्त रहने का जो बहाना मिल गया था वो खत्म हो गया।

वरुण को भी अब वक्त मिल गया था अपने बारे में सोच समझ कर निर्णय लेने का।
  अगले दिन जब एक एक कर सारे रिश्तेदार चले गए तब अपने मन को कड़ा कर वो नीचे चला आया। मासी और उनका परिवार भी उसी शहर का रहवासी था इसी से मासी अब भी नही गयी थीं।
    रसोई में दोनो औरतें समोसे बना रही थीं, लिली वहीं खड़ी उनकी मदद कर रही थी और कमल बाहर कहीं अपने दोस्त से मिलने गया हुआ था।
   वरुण के पिता  चाय पीते अखबार पढ़  रहें थे, की वरुण आकर उनके सामने बैठ गया…

” पापा आपसे कुछ बात करनी है।”

  चश्मे के अंदर से झांकती आंखों से ही उन्होंने वरुण से क्या कहना है पूछ लिया..

” पापा मैं सोच रहा था …
   मैं ये सोच रहा था कि ….. पापा !

अबकी बार हाथ का अखबार एक तरफ रख वो पूरी तरह वरुण को देखने लगे…” बोलो बंटी !”

” पापा मैं सन्यास लेना चाहता हूँ!”

  छन से थाली गिरी और थाली पर रखे सारे समोसे बिखर गए।
   रसोई से बाहर आती वरुण की माँ ने जैसे ही उसकी कही बात सुनी उनके हाथ से प्लेट छूट गयी।

” ये क्या बोल रहा है बंटी ? तू पागल हो गया है क्या? जो मुहँ में आया बक गया। अरे ये कोई उम्र है सन्यास की। तुझे उस लड़की से शादी नहीं करनी तो तू मत कर लेकिन इस सब से बचने के लिए ये सन्यास कोई उपाय नही है बेटा।
  
  वरुण की माँ की बातें सुनती उनकी छोटी बहन ने भी
वरुण के सर पर हाथ फिराते हुए कहना शुरू यरः दिया..

” क्या बात हो गयी बंटी? बेटा इतनी बड़ी बात तुम कैसे बोल गए। सन्यास लेना आसान होता है क्या?


” जानता हूँ मासी आसान नही होता, इसलिए देखना चाहता हूँ और एक मिनट आप लोग  समझ रहें हैं मैं वैसा सन्यास नही ले रहा कि अब आप लोगो से मिल नही पाऊंगा । मैं काफी आसान सा सन्यास ले रहा हूँ।

” आसान कठिन क्या होता है बंटी ? तुम आजकल के बच्चे समझते क्या हो? हर चीज़ तुम लोगो के लिए फैशन हो गयी है। भगवान भी और उसकी भक्ति भी। इस उम्र में सन्यास कौन लेता है भला ? और तुम लोगे भी नही। बस बात खत्म ।

“पर पापा! मेरी पूरी बात तो सुनिए ये एक मंदिर है जो जगह जगह स्थित है । इस मंदिर ट्रस्ट में प्रवेश करने वाले को वहाँ के लोग वेद उपनिषद आदि पढ़ा कर पहले उसका ज्ञान समृद्ध करतें हैं और फिर जगह जगह घूम कर हमें उसी ज्ञान का प्रचार करना होता है। ये वैसा सन्यास नही है जैसा आप लोग सोच रहे। इसमें मैं आप लोगों से मिलने भी आ सकता हूँ, और आप मुझसे मिलने…

” बस कर बंटी ,चुप हो जा। और दिमाग मत खराब कर मेरा। इसी दिन के लिए पैदा किया था न तुझे।

” अरे माँ  कहाँ से कहाँ जा रही हो तुम”

” और क्या? अपना पूरा जीवन खपा कर माँ बाप बच्चे को पालते पोसते हैं , अपनी सारी खुशियाँ एक तरफ रख पहले बच्चे का ख्याल रखते हैं और जब बच्चों का समय आया अपने माता पिता के किये कुछ करने का तब आ गए तुम्हरे मंदिर वाले। तुम्हारा दिमाग खराब करने। अरे उन्हें अपने ज्ञान का प्रचार ही तो करवाना है ना तो उसके लिए सन्यास की क्या ज़रूरत। हम सब मिल कर उनकी किताबें जगह जगह बांटेंगे ना।

” अरे माँ किताबें नही बांटनी है,ज्ञान बांटना है। “

” मैं कुछ नही जानती तू नहीं नही जाएगा बस। और सुन ले तुझे उस लड़की से शादी नही करनी कोई बात नही। तू मत कर शादी लेकिन शादी से बचने के लिए ये सब ऊलजलूल तिकड़म मत लगा।।

” माँ मैं कोई तिकड़म नही लगा रहा हूँ। मैं बस बता रहा हूँ कि…

  उसकी बात आधे में ही काट कर उसके पिता गरज उठे…..

” कोई कहीं नहीं जायेगा। घर को मज़ाक बना कर छोड़ा है। ये सारी बकवास अभी के अभी बंद करो । और सुनिए बंटी की माँ आप विधायक जी के यहाँ कहलवा भेजिए की शादी की तारीख जल्दी से जल्दी निकलवा लें। हम अगले ही मुहूर्त में ब्याह करने तैयार हैं।

” पर पापा!”

” पर वर कुछ नही। मैं भी कुछ तो हूँ ना इस घर का। तो अगर मुझे कुछ भी समझते हो तो आइंदा ये सारी बकवास ना करना। वरना मुझसे बुरा कोई न होगा।।”

“पापा समझने की कोशिश तो कीजिये। “

” तुम समझने की कोशिश करो बंटी। अब तक हम ही सारी ज़िम्मेदारी उठाते आएं हैं। अब जब तुम्हारा वक्त आया तो तुम पलट गए। अपने सारे कर्तव्यों से मुहँ मोड़ कर भागना चाहते हो। सन्यास का हमारे धर्म मे वर्णन है। चार आश्रमों में से चौथा आश्रम। लेकिन उसके पहले गृहस्थ धर्म को निभाओ।
   अपने जीवन में चलते हुए आने वाली मुश्किलों को हल करते हुए जीवन यापन भी तो कला है। दुखों कष्टों परेशानियों के झंझावात में उलझे बिना एक एक धागा सुलझाते सुलझाते कब जीवन का अंत समय आ जाता है पता ही नही चलता और यही सफर तो ज़िन्दगी है।
   लेकिन जो इन परेशानियों से जूझे बिना किनारे खड़े हो जाते है मेरी नज़र में वो कायर है।
अरे ज़िन्दगी से बढ़ कर कोई सत्य नही। अपने कर्तव्यों का पालन ही पूजा है। अपने कर्तव्यों से मुहँ मोड़ कर सन्यास लिए व्यक्ति को कौन सा यथार्थ ज्ञान मिल जाता है।
   मेरी नज़र में ये अपने कर्तव्यों से भागने के सिवा और कुछ नही है।
   अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए जीवन जीना भी तो एक तरह का सन्यास ही है।”

” पापा मैं अपने कर्तव्यों से नही भाग रहा। आप लोगो  को जब भी ज़रूरत होगी मैं दौड़ा चला आऊंगा।।

” वरुण मैंने कह दिया कि तुम कोई सन्यास नही ले रहे हो,बस।।अब अगर तुमने सोच ही रखा है कि तुम्हें अपने बाप की बात भी नही माननी है तो जाओ कर लो अपने मन की। आइंदा मैं तुमसे या किसी और से कुछ नही कहूंगा। ”

   अपने दोनो हाथों से अपना सर थामे वो वापस सोफे में धंस गए। वहीं एक ओर बैठी वरुण की माँ के ऑंसू नही थम रहे थे । मासी कभी उसकी माँ को चुप करवाती तो कभी उसके पिता को समझाती इधर से उधर हो रही थी।
   लिली एक ओर बैठी अपने फ़ोन पर टाइम पास कर रही थी। माहौल ऐसा भारी हो गया था कि उसका कुछ भी कहना यहाँ सही नही था।
  सबको वैसे ही छोड़ वरुण दरवाज़ा खोल बाहर निकल गया।
उसे समझ आ गया था कि उसने बहुत बड़ा धमाका कर दिया है और अब घर पर होने वाले इतने सारे ड्रामे के बाद फिलहाल उसकी कादम्बरी से कुछ कहने की हिम्मत नही हो रही थी।
   रोली की शादी को तीन दिन बीत चुके थे और आज शाम वो पगफेरों के लिए घर आने वाली थी।
   घर मे चलने वाली सारी तैयारियों  को फ़िलहाल उसने ठप्प कर दिया था और जाने क्या सोचता बाहर निकल गया था।
  
  ऐसे ही इधर उधर देखते चला जा रहा था कि उसे कहीं दूर से वही मनमोहक ध्वनि सुनाई पड़ने लगी..

   अच्युतम् केशवं कृष्ण दामोदरं।
    राम नारायणं जानकी वल्लभं।।

मन मे उठता तूफान जैसे थमने लगा और वो उसी आवाज़ की दिशा में आगे बढ़ता चला गया।

*****

   ब्याह के दो दिन बाद लाली की विदाई की तैयारियों के बाद उसकी विदाई हो गयी । घर भर की औरतें थकान से दुहरी होतीं दोपहर का खाना पीना निपटा कर जिसे जहाँ जगह मिली वहीं पसरी पड़ी थीं।
    लेकिन पारो इन सब से अलग ऊपर अपने कमरे में बैठी अपनी प्रिय सखी को चिट्ठी लिखने में व्यस्त थी।
  बहुत दिनों से उसे ज़ोइता की कोई खोज खबर नही मिली थी।
   यहाँ उसकी शादी को साल पूरा हो चुका था, उसने दंसवी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया था लेकिन ये सब वो अब तक ज़ोइता को नही बता पायी थी। हालांकि वो जानती थी कि जोई उसकी माँ से मिल कर उसके बारे में पूछ ताछ करती रहती है। लेकिन अपनी तरफ से उसका भी तो कोई फ़र्ज़ था।
   उसने एक छोटी सी चिट्ठी लिखी और दर्शन को थमा दी ।
   दर्शन को अपने दोस्त से मिलने जाना था। दोस्त के घर के रास्ते पर ही पोस्ट ऑफिस था जहाँ बाहर लगे लाल डब्बे में उसे चिट्ठी डालनी थी।
    दर्शन देव के साथ ही घर से निकल गया। देव अपनी दुकान पर उतर गया और बाइक दर्शन के हवाले कर दी।
     दर्शन  अपने दोस्त के घर पहुंचने की जल्दबाजी में चिट्ठी भूल गया।  दोनों दोस्त साथ साथ बातें करते घूमते घर से बाहर चले आये। टहलते हुए दोनो ही काफी दूर तक निकल गए।
   श्री कृष्ण मंदिर में भजन चल रहे थे जहाँ दर्शन की माँ भी थी। उन्हें घर की चाबी देने दोनों दोस्त साथ ही अंदर चले गए।
    चाबी प्रीतम ने पहले ही दर्शन को थमा दी थी जिसे दर्शन ने जेब में डाल रखा था।
  जेब से चाबी निकालने में जाने कैसे अनजाने में पारो का पत्र भी बाहर निकल गया। दर्शन के अनजाने ही पत्र हवा में यहाँ से वहाँ उड़ता चला गया।

   चाभी प्रीतम की माँ के हाथ में सौंप वो दोनों बाहर निकल गए।।
   और पारो का लिखा खत हवा में उड़ते हुए इत्तेफाक से वहाँ पहुंच गया जहाँ पहुंचने का वर्तमान में भले ही कोई फल न हो लेकिन इस खत से पारो का भविष्य ज़रूर बदलने वाला था…

       गोविंद बोलो हरि , गोपाल बोलो
         राधा रमन हरि गोविंद बोलो….

  वरुण एक ओर खड़ा मंदिर के पंडित जी से बात करने का इंतेज़ार करते कब खुद भजन में मगन हो गया खुद भी नही जान पाया।
       गीत की धुन में सर हिलाते गाते वो वहीं बैठ गया। एक के बाद एक भजन चलते रहे और वो उनमें रमता रहा कि तभी हवा से उड़ता एक कागज उसकी गोद में आ गिरा।

   साफ सुथरा भले से तह किया हुआ गुलाबी कागज़ उसकी गोद में गिरा फड़फड़ाता रहा।
   वरुण ने धीरे से उसे उठा लिया,लेकिन कागज़ को हाथ में लेते ही उसकी आँखों मे एक पल को कोई सफेद सी आकृति उभर आई।
    एक पल को उसे लगा जैसे उसके सामने कोई सफेद सी आकृति बढ़ती चली आ रही है। लेकिन सामने कोई नही था। ये आकृति बस उसके मन में उभरी थी। सेकंड के आधे हिस्से में ही ये घट गया और वरुण ने चौन्क कर वो कागज़ छोड़ दिया। उसे एक पल को लगा जैसे दिमाग में कुछ चमक सी हुई और फिर सब धुंधला हो गया।
   क्या था ये ? वो सोचता बैठा था कि उसके पास बैठी महिला ने वो कागज़ वापस उसके हाथ में रख दिया…
   वरुण ने वो कागज़ लिया कुछ देर उसे देखने के बाद उसे अपनी जेब के हवाले किया और पंडित जी से मिलने चला गया…

  ” कैसे हो वरुण?  तुम तो हमारी उम्मीद से कुछ ज्यादा ही जल्दी आ गए।”

  अमेरिका से वापस आते ही वरुण मंदिर ट्रस्ट आकर पंडित जी से मिल चुका था। इसलिए वो उसके विचारों और निर्णय से परिचित थे।
    

” बस पंडित जी । अब तय कर लिया है , की मुझे जीवन में क्या चुनना है। “

” गलत सोच रहे हो कि तुमने चुना है। बल्कि उस मुरलीधर ने तुम्हें चुना है अपने मार्ग में ले जाने को।
कुछ तो है तुममें वरुण जो तुम्हें बाकियों से अलग करता है। “

” जी पंडित जी। लेकिन घर वालों का क्या करूँ? वो तो नही समझ रहे।”

” कौन से माता पिता होंगे जो अपनी संतान को जवानी में सन्यास लेने के लिए सहमति देंगे। फिर भी मंदिर ट्रस्ट यही चाहेगा कि तुम पारिवारिक सहमति से ही आओ।

” बहुत मुश्किल है समझाना। अब तो मेरी समझ से बाहर है की मैं  आखिर क्या बोल कर घर वालों को समझाऊँ।”

” कोई बात नही । अभी कुछ समय के लिए उन्हें शांत और संयत होकर सोचने का मौका दो। जब थोड़ा समय गुज़र जाएगा तब धीरे से समझ जाएंगे। और हाँ सुनो हमारे गुरुवर अपने कुछ शिष्यों के साथ केदारनाथ निकलने वाले हैं। चाहो तो उनके साथ चले जाओ। तुम्हे भी बाबा के दरबार में अभूतपूर्व शांति मिलेगी। वहाँ से आने के बाद ट्रस्ट आ जाना। कुछ दिन यहाँ का काम धाम देख लो। तुम्हें सही लगा तब दीक्षा ले लेना। लेकिन पहले अपनी जिम्मेदारियों से मुक्ति पा लो। मन पर कोई बोझ लेकर मत आना।”

“संतान की ज़िम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ माता पिता की तरफ होती है। जितने रुपये जोड़ रखे थे सब उनके नाम कर चुका हूँ। एक छोटी बहन है । उस पर और  और उसके पति पर पूरा विश्वास है कि वो दोनो मेरे माता पिता का पूरा ध्यान रख लेंगे।
  रही बात कादम्बरी की तो मुझे लगता है कि मैं उनके लायक कभी था ही नही। वो मेरी बात जरूर समझेंगी और अपने लिए मुझसे कहीं बेहतर रिश्ता देख लेंगी।”

  पंडित जी को प्रणाम कर वरुण वहाँ से बाहर निकल गया।  उसके सर पर हाथ रखे उन्होंने आशीर्वाद दिया..” चिरंजीवी भव!”

     अगर लंबा जीवन मेरे पास होता तो बात ही क्या थी। मन ही मन सोचता वो घर के लिए निकल गया। उसे पता था अभी जब केदारनाथ जाने की बात वो घर पर कहेगा तब भी बवाल ही होना है। घर पर कोई उसे आसानी से जाने नही देगा लेकिन उसने सोच लिया था की अब वो वहाँ जाकर रहेगा।

  बाहर निकल कर जाने क्या सोच उसने कादम्बरी को फ़ोन कर मिलने बुला लिया।
   
    अक्सर कादम्बरी शहर से बाहर बसे एक छोटे से कॉफी हाउस में उसे लेकर जाया करती थी। वहां के एकांत में आज से पहले कभी भी वरुण कादम्बरी के साथ सहज नही हो पाता था पर आज उसने खुद कादम्बरी को वहीं बुला लिया।
      छोटे से बांस के बने कैफेटेरिया के सामने खुला सा गार्डन था और उसके एक ओर पतली सी नदी बहा करती थी, जिसमें बांस का ही पुल बंधा था।
   हाथ में कॉफी लिए दोनो वहीं खड़े थे…

” तुमसे कुछ बहुत ज़रूरी बात कहनी है कादम्बरी!”

  कादम्बरी ने  वरुण के चेहरे की ओर देखा …

” शादी नही करना चाहते हो ? है ना?”

वरुण आश्चर्य से कादम्बरी की ओर देखने लगा, उसे हमेशा से कादम्बरी के तेज दिमाग पर विस्मय होता था।
  वो मन ही मन उसके तेज़ दिमाग और बुद्धिमता का कायल भी था, जाने कैसे वो बिना कहे भी बहुत कुछ समझ जाया करती थी।
    कादम्बरी की आंखों में देखने की उसकी हिम्मत नही थी… उसने आंखें नीचे कर ली..

” कौन है वो ?

चौन्क कर वो वापस उसे देखने लगा…” कौन?”

” जिसके कारण मुझे छोड़ रहे हो? “

   पुल की रेलिंग थामे वो दूर कहीं देखता खड़ा रहा…

” दूर क्षितिज नज़र आ रहा है तुम्हें, जहाँ ऐसा लग रहा आसमान धरती पर झुक गया है। कितना सुंदर लग रहा है लेकिन अगर मैं इसे पकड़ने जाऊँ तो क्या पकड़ पाऊंगा…

  वरुण की बात सुनती कादम्बरी भी आगे कहने लगी…

” अच्छा नही कर रहे हो वरुण। अगर तुम्हारी ज़िन्दगी में पहले ही कोई और थी तो बताना चाहिए था न मुझे। मेरे पापा से ताऊ जी ने कहा भी की ये परिवार सिर्फ तुम्हारा रुतबा और पैसा देख तुमसे रिश्ता जोड़ रहा है। उन्हें अपनी बेटी भी तो ब्याहनी है। और देखो आखिर वही किया तुम लोगों ने।

” जैसा तुम सोच रही हो वैसा कुछ नही है कादम्बरी।”

” तो कैसा है वरुण बता दो न ? ये सिर्फ तुम्हारी मेरी ज़िंदगी की बात नही है। हमारी जिंदगियों से और भी लोगो का जीवन जुड़ा है। मेरे पापा का राजनैतिक कैरियर है ,उनके नाम पर कैसा बट्टा लगेगा कि उन्ही की बेटी की शादी टूट गयी,वो भी बिना किसी कारण के।”

“ये और किसी की नही सिर्फ मेरी ज़िन्दगी की बात है। कैसे बताऊँ कादम्बरी की मेरे पास ज्यादा समय ही नही बचा है। तुमसे शादी कर के भी तुम्हारा साथ जीवन भर तो निभा नही पाऊँगा, इससे कहीं अच्छा है मैं अपनी ज्ञान की प्यास ही बुझा लूँ।
     जितनी सांसे बची हैं उन्हें कृष्ण समर्पित कर दूं। “

  इतना सब मन मे सोचते हुए भी वरुण कुछ बोल नही पाया। बस दूर कहीं देखता खड़ा रहा।
    कादम्बरी का कुछ न कुछ कहना चालू था। उसे सबसे ज्यादा फिक्र अपने करियर की थी। लोग क्या सोचेंगे, आज तक जाने कितनी तस्वीरें वो सोशल मीडिया पर डाल चुकी थी। उसे जानने और न जानने वाले भी उसके और वरुण के रिश्ते के बारे में अच्छे से जानते थे । अब इस तरह से एकदम से वरुण का कदम पीछे हटा लेना उसके लिए झटका ही था।।
    वो मन ही मन यही सोच रही थी कि सोशल मीडिया पर सगाई टूटने की एनाउंसमेंट डालते ही वो ट्रोलर्स से कैसे बचेगी?
   वैसे भी सोशल मीडिया आजकल ट्रोलर्स और रोस्टर्स का ही अड्डा बन चुका है। किसी के साथ कुछ गलत होने का रास्ता ही देखते बैठे रहतें हैं ये लोग। उसके भी तो जाने कितने दुश्मन थे ज्यादातर तो सामने से दोस्त बन पीछे छुरा घोम्पने वाले थे। वो जानती थी कि उसकी सगाई टूटने से ये लोग खुशी से बरसाती मेढ़क से उछलने लगेंगे।
    दूसरी तरफ वरुण की अलग परेशानी थी। वो अपनी तबियत की बात कादम्बरी को बता देना चाहता था लेकिन फिर कादम्बरी और उसके परिवार वाले न जाने क्या निर्णय लेते।
   ज़रूरी तो नही की एक बीमार लड़के से वो अपनी बेटी को ब्याहना पसंद करतें।
   एक बार प्रज्वल ने अमेरिका में उससे कहा भी तो था–” क्यों अपने ऑपरेशन को लेकर इतना चिंतित है? एक बार अपने ससुर से बोलेगा तो वो पैसे की झड़ी लगा देंगे। “

” नही यार ! पहला तो मुझे उनका एहसान नही लेना है। दूसरी बात चल मैंने कह भी दिया उनसे और कहीं ये पता चलते ही कि मैं बीमार हूँ उन्होंने खुद अपने कदम पीछे हटा लिए तब?
    उस वक्त तो मैं और टूट जाऊंगा। अभी कम से कम खुद रिश्ते से मना करने में वो हीनभावना तो नही है जो उनके कदम पीछे हटाने से आ जायेगी। ”

  वरुण ने जाने कितनी बार इस बात पर सोचा था और आखिर उसने यही निर्णय लिया था कि अब वो अपनी बची खुची ज़िन्दगी कृष्ण समर्पित कर देगा। उस ज्ञान को पाने पढ़ने और जानने में अपने जीवन का बाकी बचा समय लगा देगा जिसकी खोज में बड़े बड़े लोग भटक चुके हैं।
  
     वो चुप खड़ा खुद में खोया सा था कि कादम्बरी ने उसके हाथों से कॉफी का खाली कप ले लिया।

” अगर तुम्हारी बात पूरी हो गयी हो तो वापस चलें ? “
.
  बिना वरुण की ओर देखे ही कादम्बरी तेज़ कदमों से अपनी गाड़ी की ओर बढ़ गयी….
   वो भी धीरे धीरे कादम्बरी के पीछे चलता अपनी गाड़ी तक पहुंचा ही था कि कादम्बरी ने गाड़ी स्टार्ट की और एक पल में हवा से बातें करती उसकी गाड़ी आंखों से ओझल हो गयी।

   भारी मन से वरुण भी अपने घर निकल गया।
रात में खाना बाहर से खा कर आ चुका है का बहाना बना कर वरुण नीचे ही नही उतरा।।
  उसकी किसी की ओर देखने की हिम्मत ही नही थी।
अपने कमरे का दरवाजा बंद किये वो बालकनी की रेलिंग पकड़ कर खड़ा दूर फैली रोशनियों को देख रहा था।
    अचानक उसे मंदिर में मिला वो कागज़ याद आ गया। आखिर क्या था उस कागज़ में जो उसे हाथ में लेते ही उसकी आँखों में एक धुंधली सी तस्वीर उभर आई थी। और कौन थी वो लड़कीं जो उसकी तरफ बढ़ती चली आ रही थी।
    वरुण ने तुरंत अपनी जीन्स की पॉकेट से वो गुलाबी सा कागज़ निकाला और पढ़ने लगा…..

  ” प्यारी ज़ोइता !!

  कैसी है तू? अच्छी ही होगी। मुझे पता है खूब बेरियां खाती होगी और काकी से छिप कर अंग्रेज़ी किताबें चित्र देख देख कर पढ़ने की कोशिश करती होगी।
    अच्छा सुन ,सबसे पहले तो तुझे खुशखबरी देने के लिये ये चिट्ठी लिखी है।
  मैं दंसवी कक्षा में पूरे जिले में प्रथम स्थान पर आई हूँ और अब मेरे ससुराल वाले मुझे आगे पढ़ने के लिए मान भी गए हैं।
पहले तो सब नाराज़ थे पर मेरे दूल्हा बाबू ने सबको मना लिया।
  देव बाबू सच बहुत अच्छे हैं जोई। इतने अच्छे की मैं तुझे बता नही सकती। मेरी सारी बातों का ध्यान रखतें हैं। कभी झगड़ा नही करते। बहुत मीठा बोलतें हैं लगता है जैसे शहद उनकी जीभ पर रखा हो। मेरा देवर है ना दर्शन मुझे अब उसके साथ ही स्कूल जाना रहेगा। वो गणित लेने वाला है लेकिन मैं तो जीव विज्ञान ही लुंगी। मुझे तो बचपन से पेड़ पौधे जीव जंतुओं के बारे में जानना पढना खूब पसंद है। तू तो जानती ही है।
   यहाँ सभी बहुत अच्छे हैं।  ठाकुर माँ ने मुझे बुलाकर एक बहुत पुरानी सी कलम भेंट की। उन्होंने कहा ये उनके पिता की पेन है मैं इसे संभाल रखूं।
   जोई अब लगता है मेरे बाबा का सपना ज़रूर पूरा हो जाएगा।
    तुझे याद है माँ हमेशा कहतीं थीं कि बाबा का डॉक्टरों ने सही इलाज नही किया और इसलिए बाबा हमेशा अपनी बीमारी और तकलीफ में यही कहते थे कि अपनी बेटी को बहुत अच्छा डॉक्टर बनाएंगे। बस तभी से ये सपना मेरी भी आंखों में बस गया था और अब लगता है पूरा भी हो जाएगा।
    दर्शन तो कहता है डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए पहले एक इम्तिहान होता है अगर उसमें पास हुए तभी डॉक्टरी करने मिलता है वरना नही।और कहता है ग्यारहवीं से ही उस तैयारी में जुट जाना चाहिए। जब मैंने अपने मन की ये बात की मैं डॉक्टरी पढना चाहती हूँ देव बाबू को बताई तो वो भी खुश हो गए। वो तो जाने कहाँ कहाँ से मोटी मोटी किताबें भी ले आएं है जोई।
   तुझे तो मालूम ही है किताबें मेरा जीवन हैं।
पता है एक दिन मैंने सारी किताबे बिस्तर पर बिछा ली और ज़मीन पर बैठी घंटो उन किताबो में सर रखे बैठी रही। ऐसा लग रहा था बाबा की गोद मे सर रखे बैठी हूँ।

  अब लगने लगा है जोई कि कृष्ण मेरी बात सुन रहें है  समझ रहें हैं। और मेरे कृष्ण मुझे डॉक्टर बनने का अवसर ज़रूर देंगे। बस अब खूब मेहनत  में जुटना है।तू भी अपना ध्यान रखना!
    मैं जल्दी ही आऊंगी तुझसे मिलने। और हाँ मुझे माँ से पता चला कि तेरी शादी भी तय हो गयी है। तेरी शादी में तो पक्का आऊँगी। खूब धमाल करना है। खूब नाचूंगी मैं तो अपनी ज़ोइता की शादी में।
  अब लिखना बंद कर रही हूँ। नीचे से सासु माँ के पुकारने की आवाज़ आ रही है।
  ये पत्र मिलते ही तू इसका जवाब देना। और खुद लिख कर देना मैं तेरी लिखावट का मज़ाक नही उड़ाऊंगी।
   खूब सारा प्यार मेरी प्यारी जोई
        तेरी
           पारोमिता ….

क्रमशः




लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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