समिधा – 19




समिधा -19


   खत पढ़ कर वरुण के चेहरे पर आई मुस्कान कुछ चंद मिनटों में ही गायब हो गयी। जाने कौन है ये पारोमिता और जाने कहाँ की है ये ज़ोइता?
    सिर्फ खत ही तो उसके पास पहुंचा था, न भेजने वाले का पता था न खत पहुंचने का ठिकाना लिखा था। ज़रूर लिफाफे में पहुंचने से पहले चिट्ठी उस तक पहुंच गई थी।
    खैर !!अब वो कर भी क्या सकता है। उसने एक नज़र चिट्ठी पर डाली और उसे टुकड़े कर बालकनी से नीचे गिराने के विचार से दोनो हाथों में ले तो लिया लेकिन फिर कुछ सोच उसने चिट्ठी अपने बैग में डाल ली।

  वही बैग जिसमें कुछ देर पहले ही उसने अपने कपड़े रखे थे।
  कपड़ों के साथ ही सफाई से तह किये रुमाल, मोज़े , टॉवेल, चादरें रखने के बाद उसने एक बार पूरी ममता से अपने कमरे को देखा और बत्तियां बुझा कर सोने चला गया।
  अगले दिन सुबह उसे एक बहुत बड़े निर्णय के साथ ये घर छोड़ कर जो जाना था।

*****

   सुबह सुबह देव गहरी नींद सोया हुआ था कि कमरे के दरवाज़े को अंदर ठेलती उसकी माँ चली आयी।
पारो नहा कर नीचे दालान में ठाकुर माँ की पूजा की तैयारी कर रही थी।
    
  “बाबून ऐई बाबून…”

  बोलते बोलते ही जैसे उनकी सांस अटक कर रह गयी। ये क्या कर रहा है उसका लड़का ?
  ये सोफे पर क्यों सोया पड़ा है। अपने जिगर के टुकड़े को सोफे पर ऐसे हाथ पांव सिकोड़े पड़े देख माँ की आंखों में खून उतर आया…
    उन्होंने आंखे  तरेर कर पलंग की ओर रुख किया, पलंग पर एक ही तकिया और एक ही ओढ़ने की चादर सफाई से तह की रखी थी।
  इसका मतलब महारानी जी पूरे पलंग पर अकेली सोतीं हैं।
पर दोनो के बीच बाहर तो सब अच्छा दिखता है । ऐसा दिखता है कि देव पारो से खूब प्यार करता है फिर दोनो अलग क्यों सोते  हैं भला?

  इतने बड़े प्रश्न के साथ व्यथित मन से देव की माँ उसे उठाये बिना ही नीचे उतर गयीं…

” ओ काकी माँ ये क्या ? देव को उठाया नही क्या? अपनी जेठानी की बहू की बात पर जैसे वो सोते से जागीं।

“अ हम्म बस पारो को भेजती हूँ उठाने। मैं चाय चढ़ा देती हूँ देव के लिए। “

फिर कुछ सोच कर उन्होंने जेठानी की बहू को ही पास बुला लिया…

” बहु माँ इधर सुनना ज़रा!”

आनंदी हाथ पोंछती उनके पास जा खड़ी हुई…

” देव और पारो के बीच सब ठीक है ना? “

” हाँ काकी माँ ऐसा क्यों पूछ रही हो? “

” नही वो बस ऐसे ही। तुझसे पारो ने कभी कुछ कहा तो नही। “

” नही तो । अब बताओ भी क्या बात है।”

” वो मैंने आज देखा देव सोफे पर सो रहा था, एक बार पहले भी इस बात पर ध्यान गया था मेरा। शादी को साल बीत गया और दोनो पति पत्नी अलग सो रहे। आखिर माजरा क्या है। तू पूछेगी क्या पारो से? “

  आनन्दी शरमा कर नीचे देखने लगी…

” अरे आप इतना सोचो मत काकी मां। हो सकता है कल कोई बात हो गयी हो,कुछ छोटा मोटा झगड़ा हो गया हो या ये भी हो सकता है पारो की तबियत ठीक न हो! आप इतना सोचो मत,मैं पारो से ही पूछ लुंगी। ”

आनंदी के आश्वासन के बाद उनका मन कुछ हल्का हुआ कि रसोई में चहकती हुई पारो चली आयी।

   मेरा हीरे जैसा लड़का मिल गया, उस पर स्कूल जाकर पढ़ने मिल गया। और क्या चाहिए राजरानी सा रख रहें हैं उस पर तेवर यह कि पति को सोफे पर सोना पड़ रहा है। ऐसे भी क्या नग जड़े हैं लड़की में…
   अपने विचारों में गुम देव की माँ पतागोभी काटने लेकर बैठी ही थी कि पारो ने टोक दिया…

” माँ आज पत्तागोभी क्यों बनाने जा रही हो। आज तो लाली आने वाली है ना जमाई बाबू के साथ,आज तो बैंगन बना दो भरवाँ। उसे बहुत पसंद हैं ना। “

  अपने हाथ से अपने माथे पर एक चपत लगा कर देव की माँ मुस्कुरा उठी..

” ओ माँ मैं कैसे भूल गयी भला?  तभी तो दीदी सुबह सुबह अपनी लाड़ली के लिए माछ ही तो लेने गयीं हैं। ला बैंगन दे दे मुझे और तू फटाफट चाय बनाकर देव को उठा दे बोलना बड़ा बाजार से रसगुल्ला ले आएगा । और कहना आज दुकान खोल कर जल्दी वापस आ जायेगा।

“अच्छा माँ! ” पारो चाय लिए देव को जगाने चली गयी।

   देव के पिता दर्शन को साथ लिए लाली को लेने चल दिए और दोपहर तक लाली अपने मायके पहुंच भी गयी।
   लाल साड़ी में बीच से मांग निकाले उस पर लाल सिंदूर की गाढ़ी रेखा भरी लाली चमचमा रही थी। ससुराल का ज़िक्र आते ही जैसे उसके गाल अबीर गुलाल हुए जा रहे थे।
  पर रह रह कर वो पारो के साथ अकेले में बात करना चाह रही थी।
    दोपहर का खाना निपटाते ही उसे ज़रा वक्त मिल ही गया। लाली की माँ ने उसे कमरे में चल कर आराम करने भी कहा पर उसका मन तो पारो के साथ बैठ गप्पे मारने का हो रहा था।
    दोनो साथ ही ऊपर कमरे में चली आयी…

  लाली अपने ससुराल की तारीफ करते नही थक रही थी। कभी सास का बड़प्पन कभी ससुर की बड़ाई और सबसे ज्यादा अपने पति की । प्रखर की।
  पारो बड़े मन से उसकी सारी बातें सुनती जा रही थी।अपने में खोई लाली अपनी प्रथम प्रीत की सुकोमल भावनाओं के साथ पहले पहले मिलन कि रसीली बातें भी खोल कर पारो के सामने कह गयी।
   पारो के कान लाल हो उठे और वो शरमा कर खिड़की बंद करने भाग गई…

” धीमे बोल लाली कहीं किसी ने सुन लिया तो? “

” हाँ सुन भी लिया तो क्या? पति हैं आखिर मेरे।”

  छुईमुई सी लाली का ससुराल से ये प्रत्यावर्तन पारो को भा रहा था , कभी लाली की बातें सुन शरमा जाती तो कभी हँसने लगती और तभी लाली ने उससे ही सवाल कर दिया…

” तुमने तो मुझे कुछ सिखाया समझाया भी नही था पारो। सब कुछ उन्होंने ही बताया। मुझे उस वक्त कितनी शर्म आयी क्या कहूँ। उन्हें भी लगा होगा कैसी बेढब लड़कीं से ब्याह दिया घर वालों ने। ” रिश्ते में काकी होने पर भी हमउम्र होने से दोनो सखियां एक दूजे का नाम ही लेती आयीं थीं।

  पारो धीमे से मुस्कुरा कर रह गयी…

” तुझे क्या सिखाऊं समझाऊँ लाली ? मेरे खुद के जानने समझने के दिन जाने कब आएंगे। ” पारो ने अपने मन की बात कह तो दी लेकिन लाली को समझ में कुछ भी नही आया।

  उन दोनों की लंबी बातों के बीच ही आनन्दी उनके साथ साथ अपनी भी चाय लिए ऊपर चली आयी..

” खूब लुक छिप कर बातें चल रहीं है दोनों सखियों की। ज़रा हम भी तो सुनें।”

दोनो ने मुस्कुरा कर उसके बैठने के लिए भी जगह बना दी।।

  ” पारो अब तुम भी सोचो परिवार बढ़ाने के बारे में ..!”

” क्या दीदी ?”

” अरे एक साल हो गया शादी को। अब तो बच्चा कर ही लेना चाहिए तुम दोनो को। इस साल नही किया तो अगले साल कहोगी बारहवीं की पढ़ाई कठिन है नही कर पाएंगे। उसके बाद और कोई बात हो जाएगी तो आखिर बच्चे के बारे में कब सोचोगे भला? अब देखो लाली की शादी तुमसे पीछे हुई है पर कहीं इसके पैर भारी हो गए तो? अच्छा लगेगा क्या काकी से पहले भतीजी माँ बन जाये।”

” इसमें मैं क्या कर सकती हूँ बऊ दी। ये जब चाहेंगे तभी तो कुछ हो सकता है। “

” ओ माँ मैं कहाँ जाकर मरूं। अरे यही तो एक बात है जिसमें तुम्हारी चल सकती है। बाकी तो बाहर की हर बात पर मर्द अपनी ही चलाते हैं।”

  पारो सर झुकाये बैठी सुनती रही। आनन्दी अपने अनुभव उसे सुनाती जल्दी बच्चे के लिए प्रेरित कर रही थी कि देव भी कमरे में चला आया…

” अरे रे मैं तो लग रहा गलत चला आया। आप सब इतनी मशगूल हैं आप लोगों को डिस्टर्ब करना सही नही होगा। “
  वो वापस पलट कर निकल ही रह था कि आनन्दी ने उसे भी आवाज़ दे दी।

” आप ही का कमरा है देवर बाबू। आप कहाँ चल दिये? आइये आइये। आपसे शिकायत है मेरी।।

” अरे बोलिये न बऊ दी !”

” पारो का कहना है उसके देव बाबू उस पर ध्यान ही नही देते। ”

देव चौन्क कर पारो की ओर देखने लगा। पारो आनंदी की इस बात के लिए तैयार न थी, वो अपनी बड़ी बड़ी आंखों से मैंने तो ऐसा नही कहा वाले भाव के साथ देव को देखती ना में सर हिला गयी।
   पारो की घबराहट देख देव को हंसी आ गयी…

” कैसे ध्यान नही देता मैं। ज़रा बताइये। “

” कितना ध्यान देते हो हमें दिख रहा है। साल पूरा हो गया पर पारो की गोद में बच्चा नही आया। ऐसे ध्यान रख रहे हो उसका। “

” अरे पारो अभी खुद बच्ची है। अभी से बच्चा कहाँ संभाल पाएगी। “

“सत्रह की पूरी होने वाली है। और क्या बच्ची है?। सही उम्र में संतान हो जाना भी ज़रूरी है देवर जी वरना जब बच्चा दौड़ेगा भागेगा तो आपसे उसके पीछे भागा नही जाएगा। “

” हम्म बात तो सोचने वाली है। ” देव ने अपना सर खुजाते हुए जवाब दिया…

” बच्चे के पीछे भागने के लिए बच्चों वाली उम्र में ही माता पिता बन जाना चाहिए। बिल्कुल सही कहा बऊ दी।”

” लगे मेरा मज़ाक उड़ाने। पर सच कह रही हूँ मैं। अब काकी माँ को ही ले लो। पैंतालीस की भी नही हुई और कुछ समय में पोता खिलाने लगेंगी। यही तो जीवन का सार है।
  कहा जाता है की हमें जन्म देने का ऋण हम अपने माता पिता का कभी नही चुका पाते लेकिन जिस दिन हमारी संतान होती है वो ऋण चूक जाता है।
  समझे।
  अब जल्दी जल्दी सोच लो भई बच्चे का।

” बिल्कुल बऊ दी ! आपकी आज्ञा सर माथे।”

आनंदी मुस्कुरा कर अपने पल्ले को माथे पर सजाती नीचे चली गयी। उसके पीछे लाली भी हंसती खिलखिलाती चली गयी।
   देव ने पारो को देखा वो शरम से नीचे देखती बैठी थी कि देव उसके पास चला आया…

” सोच रहा हूँ आज रात आनन्दी बऊ दी की बात मान ही लेता हूँ। क्यों पारो? “

  देव ने पारो को कंधो से पकड़ कर अपनी ओर घुमाया। पारो शरमा कर उसकी बाहों से निकल नीचे भाग गई।
   नीचे से देव की माँ ने उसके नाम की पुकार मचा दी…

  “बाबून ओ बाबून ”

” आया माँ । ”   देव नीचे पहुंचा तो देखा दालान में शर्मा जी बैठे थे।
   देव के पिता के पुराने पहचान वाले थे लेकिन घर पर और कोई इनसे उतना परिचित नही था।
   देव ने माँ की आंखों का इशारा समझ उनके पैर छुए और एक ओर कुर्सी खींच कर बैठ गया।

” शर्मा जी चाय पानी क्या लेंगे आप? “

” भाभी जी चाय ही पिला दीजिये बढ़िया अदरक वाली। “देव की नज़रों में खुद के लिए सवाल देख वो उसकी ओर मुड़ गए…

   “शर्मा जी बनारस वाले ” हमारा पूरा नाम है। हम गंगा मैया की नगरी से हैं बेटा । महाकाल की नगरी से। ”

हां में सर हिलाता देव उन्हें सुनता रहा..

” ठाकुर दादा ने कहा माँ को केदारनाथ जाना है तो हम चला आया। ”

” नही नही शर्मा जी दादी को तो मैं लेकर जाऊंगा न केदारनाथ। “

” हाँ बिल्कुल ! और तुम्हें हम लेकर जाएंगे। वैसे पेशे से हम बाबू है क्लर्क। दूरसंचार विभाग में काम करतें हैं। गुज़र बसर हो जाती है। लेकिन फिर एक दिन बिस्वनाथ बाबा सपने में आये और बोले कुछ पुण्य का भी काम कर लो शर्मा । बस हम अपने सपने का मतलब समझ गए। तबसे अब साल में दो बार अलग अलग तीर्थ के लिए हम गाड़ी बुक करतें हैं और श्रद्धालुओं को साथ लेकर तीर्थ करवाने का पुण्य कमाते हैं।

” शर्मा जी आप क्यों परेशान हो रहे। मैं दादी को करवा लूंगा दर्शन।”

” कह तो सही रहे हो बेटा लेकिन तीरथ बरत का असली मज़ा लोगों के साथ जाने में हैं। हमारे साथ जाने में कोई कष्ट ना होगा। हम साथ में अपना रसोइया और रसद साथ लेकर चलतें हैं। लंबी चौड़ी बस रहती है उसमें स्लीपर कोच भी है और बुजुर्गों के लिए आराम कुर्सी भी। जगह जगह पर रुकने के लिए हमारी धर्मशालाओं में भी बात तय रहती है। बड़े मजे से सफर कटता है।
आना जाना वहाँ रहना खाना पीना , दर्शन पूजन सब की तैयारी रहती है। बस हाथ हिलाते बैठ चलो हमारे साथ।
   रास्ते में गाने बजाने की भी पूरी तैयारी रहती है। ढोलक मंजीरा सब साथ हैं हमारे।  हमारा रसोइया ऐसा ढोलक बजाता है कि क्या कहें हम ? “

” रसोइया ढोलक बजाता है तो गाता कौन है शर्मा जी? “

” गातें हम हैं। कोई भजन गवा लो हमसे। हमें लगभग सारे याद हैं जो नही बनते उन्हें देख कर गा लेते हैं। खाना भी जबरदस्त बनाता है वो पंजाबी गुजराती बंगाली सभी तरह के निरामिष भोजन बनाने में कुशल है। आलू पोस्ते की सब्जी हो या बैगुनी, छोले भटूरे हो या खांडवी ,खीर हो या गाजर हलुआ सब बना लेता है और बहुत स्वाद बनाता है। हमारे टूर में हफ्ते के सातों दिन अलग अलग खाने के आईटम् …


  मुस्कुरा कर देव ने उनकी बात काटते हुए हामी भर ही दी।

” ठीक है शर्मा जी तो फिर कब निकलना है , केदारनाथ दर्शनों के लिए? “

” आपके पिता यानी दद्दा से हमारी सारी बात तय थी बेटा । आप तैयारी कर लो। बस सुबह सुबह भोर में महादेव का नाम ले चल पड़ेंगे। “

” कब कल? “

” हाँ कल! दिन तय हो चुका है। बस दो ही सीट बची थी हमारे पास की दद्दा का सुबह सवेरे फ़ोन आ गया। अब इस टूर के बाद अगला केदारनाथ ट्रिप अगले साल जाएगा न इसी से उन्होंने इसी में आप दोनो की बुकिंग करवा ली । हम इधर से घर जा रहे थे सोचा मिल कर आपको टूर ब्रोशर देते चलें। बेटा गरम कपड़े खूब रख लेना। हम चलतें हैं, सुबह चार बजे हमारे ऑफ़िस पहुंचना है आपको। ठीक पांच बजे हमारी बस चल पड़ेगी।
    हर हर महादेव ! जय सियाराम !”

अपनी चाय खत्म कर उन्होंने एक ओर टेबल पर रखी
और हाथ जोड़ खड़े हो गए।
  देव ने भी खड़े होकर हाथ जोड़ लिए। उनके जाते ही वो इतनी जल्दी में कोई कैसे कहीं जा सकता है कि बात पर कुछ देर माँ से उलझा रहा फिर ऊपर अपने कमरे में पैकिंग करने चला गया।
   ठाकुर माँ तो पहले ही सारा सामान बांन्ध बूंद कर बैठी थीं जैसे कहीं रात ही बस न निकल जाए।

****

  वरुण ने सोने से पहले एक बार फिर अपना मोबाइल जांचा और तीन बजे का अलार्म लगा कर लेट गया। वो समझ चुका था अब घर पर किसी को भी समझाना व्यर्थ था।
  मंदिर में पंडित जी से उसकी बात हो ही चुकी थी। उन्होंने ही उसे अगले दिन केदारनाथ निकलने वाली टोली के बारे में बताया था।
  उस टोली में मंदिर से कोई दो तीन लोग ही थे बाकी उसी से थे जो असमय सन्यास का सोच रहे थे। ऐसे कुल जमा सात लोगों के साथ उसे किसी तीर्थयात्री बस के साथ अगले दिन केदारनाथ निकलना था।
   
    अपने मन में चल रहे उहापोह के बीच उसकी घर पर वो आखिरी रात आंखों ही आंखों में कट गई। सुबह तीन बजे अलार्म बजने से पहले ही वो जाग गया।
   चुपचाप दबे कदमों से नीचे उतर वो रसोई में चला आया। अपने लिए एक कप कॉफी बनाते हुए उसकी आंखें भर आईं।
पता नही वो सही कर रहा था या नही।
क्या सच में वो ज्ञान की खोज में ही जा रहा था या भाग रहा था अपने आप से।
कहीं ऐसा तो नही की उसकी बीमारी का सुन कर या उसे तिल तिल मरते देख कर उसके माता पिता पर क्या बीतेगी ? इसी डर से तो नही भागा जा रहा वो?

   इन्हीं सब प्रश्नों का हल ढूंढ़ने ही तो उसे पंडित जी ने एक बार केदारनाथ यात्रा कर के आने की सलाह दी थी। उनका कहना था वहाँ तुम्हारा मन शांत होकर सही गलत को समझ कर सही निर्णय ले पायेगा।
 
लेकिन पिता जी के गुस्से के कारण उसकी फिर घर पर ये बोलने बताने की हिम्मत ही नही हुई कि वो केदारनाथ सिर्फ दर्शनों के लिए जा रहा है।
  अपने मन की सारी बातों को पत्र में उतार उसने नीचे हॉल में रख दिया और अपना कॉफी का मग लिए ऊपर चला आया था।
    ” हे ईश्वर तुम्हारी तलाश में निकलूँ या नही ये भी पूछने तुम तक ही आ रहा हूँ। मेरी आँखें खोल देना प्रभु!”

नहा धोकर वरुण तैयार हुआ और नीचे अपनी माँ के सजाए मन्दिर में कान्हा जी के सामने हाथ जोड़े खड़ा हो गया…

” सिर्फ तुम्हारे ऊपर विश्वास कर अपने माता पिता को अकेला छोड़े जा रहा हूँ। मुझे पता है तुम उनके साथ हो।”

  वरुण ने अपना लिखा पत्र हॉल की टेबल से उठा कर मंदिर में कान्हा जी की मूर्ति के पास रखा और अपना बैग टांगे चुपके से दरवाज़ा खोले बाहर निकल गया।

  शर्मा जी का ऑफ़िस उसके घर से कुछ कदमों पर ही था। लंबे लंबे डग भरता वो वहाँ पहुंच गया।
   अब भी अंधेरा छाया हुआ था लेकिन शर्मा जी का ऑफिस उजियारे से उद्भासित था। अलग अलग तरह के लोग बातों में मगन अपनी अग्रिम यात्रा के लिए अति उत्साहित थे।
  एक एक कर सभी बस में चढ़ते चले गए।

वरुण ने भी एक खिड़की वाली सीट पर कब्ज़ा जमा लिया।
  वो बैठा खिड़की से बाहर देख रहा था कि उसका ध्यान एक आवाज़ से टूट गया…

“क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ या किसी और के आने की प्रतीक्षा है? “

  वरुण ने चौन्क कर देखा एक बाइस तेईस बरस का सुंदर सा लड़का उसके सामने मुस्कुराता खड़ा था। वरुण ने मुस्कुरा कर उसे हां कह दिया…

” मैं देवज्योति टैगोर हूँ। अपनी दादी को दर्शन करवाने ले जा रहा हूँ। वो बुज़ुर्ग हैं ना इसलिए वहां सामने उनकी सुविधा वाली सीट पर उन्हें बैठाया है।”

वरुण ने मुस्कुरा कर अपना हाथ आगे बढ़ा दिया…

” मैं वरुण सत्य की तलाश में केदारनाथ जा रहा हूँ। “

  दोनो ने आपस में हाथ मिलाया और एक बिजली सी चमकी ….
     और बस आगे बढ़ गयी…..

क्रमशः



aparna ….

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s