समिधा -2

समिधा


                            समिधा


  …………….

       सुबह से ही रायचौधरी परिवार में हलचल सी मची हुई थी।
   घर की सबसे बुज़ुर्ग सदस्या यानी पारो की दादी जिन्हें घर के सभी बच्चे नाती पोते ठाकुरमाँ बुलाया करते थे बड़े से आंगन के बीचों बीच बैठी रोहू साफ कर रही थी।
   इतने बड़े परिवार में एक आध किलो मछली कटने से कहाँ कुछ होना जाना था, उतनी तो पकाते में ही सूंघ सूंघ के घर की औरतें खत्म कर देती।
    पांच किलो से कम माछ नही काटा जाता था, हिल्सा की तो फिर बात ही अलग थी।
    ठाकुरमाँ के पास बैठी पारो दौड़ दौड़ कर कभी उनके लिए हंसिया ला रही थी, कभी बड़ी परात, और कभी नून हल्दी।
   उसकी माँ बड़ी माँ उसकी भाभियां सभी रसोई में ही लगी थी। एक बड़े कड़ाह में दूध उबाल मार रहा था।, नीचे एक किनारे खजूर का गुड़ पड़ा था पायेश ( खीर ) में डालने के लिए।
    इतनी सब तैयारियां हो रही थी भट्टाचार्य बाबू के आने की खुशी में।
   भट्टाचार्य बाबू इस परिवार के पुराने परिचित थे, जबसे बाली के हाथों पारो की माँ ने उन्हें वर के लिए संदेश भेजा था वो अपने पेशेगारों के साथ वर संधान में जुट गए थे।
    तीन चार सुयोग्य वरों की चर्चा वो बाली और उसके पिता से कर चुके थे जिनमें से एक लड़का घर के दोनों मुख्य पुरुष सदस्यों की रज़ामन्दी पा कर अब घर के बाकी सदस्यों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत किया जाना था।
     पारो दादी के पास बैठी मछली पर हल्दी पोत रही थी कि उसकी खास सखी जोइता दरवाज़े से कूदती फांदती भीतर चली आयी।
   आंगन में इतना सारा फैलाव देख उसने पारो से आंखों ही आंखों में ये सब क्या हो रहा है का सवाल पूछ लिया।
   सच तो ये था कि पारो खुद नही जानती थी कि ये तैयारियां किस लिये हैं? मालूम नही की मुद्रा में कंधे उचका कर वो वापस अपने काम में लगने जा ही रही थी कि जोइता ने इसे बाहर चलने का इशारा किया और धीमे कदम बढ़ाती सदर दरवाज़े की ओर बढ़ गयी।
    दादी माँ बहुओं की कामकाज की ढिलाई पर निबंध सुनाती मछली में मगन थी कि पारो भी चुपके से सरक कर जोइता के पीछे घर से बाहर निकल गयी।

    घर के बाहर लगे लंबे चौड़े बगीचे को पार करते ही दोनो सहेलियों के पैरों में चक्के लग गए। दोनों एक गति से भागती गांव के किनारे बने पोखरे पर जाकर ही रुकीं।
     आस पास लगा घना बगीचा जिसके बीचों बीच गहरा सा पोखरा था, आसपास लगे केले और चंपा के बीच दो चार ऊंचे मौलसिरी के पेड़ भी लहरा रहे थे।
  मौलसिरी के फूलों की मादक खुशबू के बीच कहीं से रातरानी की महक भी पोखरे तक चली आ रही थी।
      तालाब के किनारे लगे पेड़ की टहनी ऐसे तालाब पर झुकी थी कि उसमें बैठ कर झूले झूलती पारो के पैर बार बार इधर से उधर होने पर पानी की धार को छू जाते और वो किलक कर खुश हो जाती।
    जोइता उसके लिए ढेर सारे बेर लेकर आई थी।
  टहनी पर इधर से उधर झूलती दोनो सखियां बेरों के अद्भुत स्वाद के स्वर्गीय सुख में डूबी थी…

  ” तुझे किताबें मिली पारो? “

  “हाँ मिली ना! बाली दा लेकर आये । मैंने तो एक बार सरसरी तौर पर सारी किताबें देख भी ली।”

   जोइता की आंखें आश्चर्य से फैल गयीं

  ” हाय ! इत्ती जल्दी! मैं तो अभी जिल्द भी नही चढ़ा पायी ठीक से।”

  ” मुझमें जिल्द चढ़ा कर फिर पढूं इतना धैर्य नही है।मैं तो बस नई किताबों की खुशबू में ही मगन हो जाती हूँ।
जिस रात किताबें मिली मैं तो हिंदी की किताब खोल कर नाक पर रखे रखें ही सो गई थी, पर जाने कब माँ किताब को बंद कर किनारे रख गयी।”

  ” हाय ऐसे किताब खोल कर नही सोते , कहतें हैं विद्या उड़ जाती है। अच्छा बता तो तुझे पढना इतना पसंद है क्या करेगी इत्ता पढ़ के।”

   एक पल को पारो की आंखे  चमक उठी..

  ” डॉक्टर बनूंगी !”

  ” हां ना ! डॉक्टर बनेगी ना कद्दू! मेरी माँ कह रही थी माशी तेरे लिए रिश्ता देख रही हैं।”

  “हां तो ? क्या हुआ?”

  ” तो शादी के बाद रसोई बनाएगी या पढ़ाई करेगी।”

  ” दोनों ! शादी के बाद नही पढ़ने का कोई नियम होता है क्या? मैं मेरे दूल्हा बाबू को पहले ही बोल दूंगी की मुझे आगे भी पढना है।”

  ” हाँ जैसे वो मान जाएंगे।”

  ” क्यों ना मानेंगे ? और अगर नही मानेंगे तो मैं शादी ही नही करूँगी।”

  “महारानी जी सपने मत देखिए। माशी( मासी)  अकेली क्या क्या करेंगी तेरे लिए । अब मेशो ( मौसिया या मासा) तो हैं नही जो अपनी लाडली के नखरे झेलें..

  ” मेरी छोड़ ! तू बता तू क्या करेगी पढ़ लिख के।”

  जोइता ज़रा देर को सोच में डूब गई… उसके लिए बड़ी चिंता का विषय था…

  ” मैं तो शादी ही करूँगी! पढ़ाई लिखाई से तो भात और माछ पकाना ज्यादा आसान है।”

     ” ए लड़कियों यहाँ पेड़ पर बैठ कर झूल रही हो कहीं पोखरे में गिर गईं तो तलैया की मछलियां तुम लोगों को ऐसा खायेंगीं की बस हाड़ बचेगा और कुछ नही।”

    बगीचे का रखवाला तब तक घूमता फिरता वहाँ तक आ पहुंचा था, उसकी हांक सुनते ही आड़ी टेढ़ी टहनी पर कदम रखती दोनों ज़मीन की तरफ बढ़ चलीं गिरने के डर से जोइता तो सांस रोके चल रही थी लेकिन पारो को अभी भी मसखरी सूझ रही थी…

  ” क्यों काका  मछलियां हड्डी नही खातीं क्या? फिर उनकी फेंकी हड्डियां कौन खाता है? तुम?

   हाथ मे पकड़ी सुंटिया लहराते काका बाबू दोनो को डराने का अभिनय करने लगे और दोनों लड़कियां हँसती गिरती पड़ती वहाँ से भाग निकलीं।

    पारो जोइता के साथ ही घर पहुंची, घर के भीतर वाले दालान में ही उसके दोनो बड़े पिता जी और बड़े भाइयों के साथ भट्टाचार्य बाबू भी बैठे थे। वहीं एक किनारे ठाकुर माँ भी बैठी सलाह कर रहीं थी कि किनारे से होकर चुपके से अंदर जाती पारो और जोइता पर उनकी नज़र पड़ गयी….

   ” बऊ माँ( बहु) अरी ओ दुग्गा ! ये लड़की को ले जाकर नहला धुला ज़रा। कैसी धूल फांकती आ रही है।”

   पारो का हाथ थामे दादी उसे अंदर उसकी माँ को सौंप आयी, माँ ने एक नज़र अपनी लाड़ली पर डाली और अपना माथा पीट लिया…

  ” तेरे ब्याह के लिए आये हैं भट्टाचार्य दा और तू ही इधर उधर मारी मारी फिर रही है।”

   पारो के हाथ मुहँ धोकर आते ही माँ उसके बाल खोले चोटी बनाने में लग गईं, कि तभी उनके छोटे जेठ की बहू यानी घर की सबसे छोटी बहू चली आयी

  ” आप जाइये काकी माँ पारो को मैं सजा लुंगी।”   जाती हुई माँ का हाथ पकड़ कर पारो ने रोक लिया

   ” इतनी जल्दी क्यों है मेरी शादी की माँ? “

   माँ ने पलट कर पारो को देखा और एकदम से कुछ नही कह पायीं

   ” बोलो ना माँ ! देखो बऊदी कि शादी भी बीस साल की उम्र में हुई, है ना बऊदी? फिर मेरी क्यों पंद्रह में ही कर दे रही हो? अठारह की होने के पहले लड़कियों का ब्याह करा देना अपराध होता है माँ। ”

   अपनी भोली सी बेटी की ज्ञान भरी बातें सुन दुर्गा की आंखें भर आयी। इस पूरे घर में एक वही तो उसकी सगी थी, उसके जिगर का टुकड़ा जिसे वो बाहर के अन्धडो से ढका छुपा कर रखना चाहती थी। पर अपने से बड़े तीन जेठ जेठानियों के परिवारों की गृहस्थी में कोल्हू के बैल सी जुती वो अपनी बेटी का भी वही हश्र नही चाहती थी।
   उसकी पढ़ाई के प्रति लगन से वो भी परिचित थी लेकिन इस घर में रह कर वो अपनी भाभियों के बच्चों की बिना पैसों की आया ही बन कर रह जाएगी, पढ़ाई लिखाई तो बहुत दूर की बात है, यही सब सोच दुर्गा एक आस में की लड़कियां अपनी किस्मत खुद लिखवा कर आती हैं, उसे ब्याह देना चाह रही थी।
   अगर किस्मत में पढना हुआ तो ससुराल रह कर भी पढ़ ही लेगी।

    भट्टाचार्य बाबू लड़के के दूर के रिश्ते से काका होते थे, इसी से घर परिवार और लड़के की उन्होंने खूब बड़ाई की थी।
  पारो को सजा कर छोटी बहू तारा बाहर ले आयी।
सभी बड़ों के बीच चुप रहना होता है ये पारो जानती थी इसी से चुप बैठी रही।
   लड़के की तस्वीर सभी हाथों से घूमती हुई पारो की आंखों के आगे से होते हुए उसकी माँ और घर की औरतों तक पहुंच गयी।
    बाइस साल का देबज्योति अपनी बीए की पढ़ाई के बाद घर की दुकानदारी अपने पिता के साथ संभाल रहा था।
  पारो की तरह उसका भी संयुक्त परिवार था, पर सगे बस वो दोनो भाई ही थे , बड़ा वो और छोटा देवदर्शन।

    सामने से तस्वीर निकलने पर एक झलक पारो ने भी देख ही लिया था, गोरे लंबे से चेहरे पर मूंछे नही थी, उसका आधा डर तो वहीं उड़नछू हो गया था। जाने क्यों बचपन से ही उसे मूंछों वाले आदमी डरावने ही लगा करते थे , अपने बड़े पिता जी लोगों को उसने मूंछो के पीछे से सदा दहाड़ते ही देखा था और अपने बाबा को बिना मूंछो के सदा मुस्कुराते!

    भट्टाचार्य बाबू को बड़ी बड़ी आंखों को झपकाती हिरनी सी वह कन्या भा गयी थी… और रविवार का दिन तय हुआ जब देबज्योति अपने माता पिता और छोटे भाई के साथ पारो को देखने आने वाला था।

       *********

    वरुण के ऑफिस में उसकी पुकार मची थी। उसके बॉस उससे उसके सारे ज़रूर कागज़ पातर जमा करने की गुहार लगाए पड़े थे….

  “यू नो बॉय तुम्हारी वीज़ा प्रोसेसिंग स्टार्ट करवानी है, फटाफट सारे पेपर्स सबमिट कर दो।तुम्हारा एल 1 बी वीसा शुरू हो पायेगा तब , समझे?”

   हां में सर हिलाए वरुण बॉस के केबिन से बाहर निकल अपने क्यूबिक की तरफ जा ही रहा  था कि उसके साथ काम करने वाला आरुष उसे अपने साथ खींचता कैंटीन की तरफ ले गया….

” क्या बे साले! शादी करने जा रहा और हमें बताया भी नही। ऐसी भी क्या नाराज़गी यार। अब दोस्तों से भी राज़ रखे जाएंगे।”

  ” अरे इसमें छिपाने वाली कौन सी बात है? अभी तो बस रिश्ते देख रहें हैं पेरेंट्स, कहीं कुछ पक्का थोड़े ना हुआ है !”

  ” अच्छा बेटा तो आंटी जी मतलब ऐवै शरलॉक होम्स बन रही हैं।”

  ” मतलब ?”

” मतलब तुम घर पर भी ऐसे ही चुप्पे सियार बने रहते हो इसी से तुम्हारी सियारी घर वालों को पता नही चलती इसी कारण मम्मी जी को लगा कहीं उनके बेटे ने पहले ही कोई बहु ऑफिस में छाँट तो नही रखी। बस वही पूछताछ चल रही थी।

  ” मम्मी भी ना यार, कुछ भी करतीं हैं। मैं तो फोटो देखने से पहले ही हाँ बोल चुका हूँ फिर क्या ज़रूरत है जासूसी करने की।”

   वरुण का चेहरा देख आरुष ज़ोर से हँसने लगा..

  ” ये पकड़ा गया हमारा हीरो! आंटी जी ने कोई पूछताछ नही की थी, ये तो बेटा हम तुमसे उगलवाना चाहते थे बस । तू जब रोली को कुछ मेसेज कर रहा था तब उसका भेजा लड़की का फ़ोटो मैंने भी पीछे से झांक लिया था, और बस उसके बाद मेरी तुक्केबाजी थी सारी। साला तू तो घोड़ी चढ़ने तक मुहँ में टेप चिपकाए रहता।”

   वरुण झेंप कर अपने बालों पर हाथ फिराने लगा

  ” चल चल कोई नही , आज कॉफी की ट्रीट दे दे और जिस दिन भाभी जी से मिलवाएगा उस दिन डिनर ट्रीट दे देना ।”

   वरुण मुस्कुराता हुआ अपने और आरुष के लिए दो कैपेचीनो लिए कुर्सियों तक चला आया। अपनी कॉफी हाथ में लेकर आरुष ने फिर एक सवाल जड़ दिया..

  ” वैसे नाम क्या बताया तूने भाभी जी का?”

  ” अभी मैंने बताया ही कहाँ?”   वरुण भी शरारती आंखों से आरुष को देखने लगा

  ” तो अब बता दे !!”

  ” यार सच कहूँ तो मैं तो रोली से नाम पूछना ही भूल गया।”

  “चल झूठे !”

  “नही यार सच ! उसने मुझे घर पर तस्वीर दिखाई थी और बाद में मुझे फोन पर भेज भी दी, लेकिन इस सब के बीच मैं लड़की का नाम पूछना ही भूल गया। रविवार को मिलना तय हुआ है तभी पूछ लूंगा।”

” अरे मेरे बिना पारो के देवदास ! तू कहाँ खोया रहता है यार! ना तेरी लाइफ में कोई पंगा है बॉस का ना लड़की का कोई टंटा है फिर कहाँ खोए हो गुरु? खैर चल छोड़, ला फ़ोटो ही दिखा दे भाभी जी की।”

   वरुण ने बिना किसी ना नुकुर के मोबाइल पर की तस्वीर आरुष के सामने रख दी। एक नज़र तस्वीर को देखते ही आरुष अपनी कुर्सी से उछल पड़ा ….

   ” अबे साले इतना बड़ा हाथ मारा है तूने , जानता भी है कौन है ये?

   वरुण ने ना में सर हिला दिया….

” अबे कादम्बरी पांडेय है ये, शहर के विधायक भंवर लाल पांडेय जी की इकलौती बेटी। उनके पार्टी कार्यालय का लेखा जोखा सब देखती है। हो सकता है अगले चुनाव के लिए इन्हीं का नाम भेज दिया जाए। युवाओं में बड़ा क्रेज़ है इनका। सबसे कमउम्र नेता बनने वाली हैं ये । तुझे पता भी है इनके एक एक ट्वीट कैसे धड़ाधड़ रीट्वीट होतें हैं । इंस्टा हो या एफ बी हर जगह छायीं हुई हैं मैडम जी। फ़ॉलोअर्स की भीड़ है इनके पीछे। कहा तो ये भी जाता है कि अगर मैडम सक्रीय राजनीति में आ गयी तब तो हमारी भावी मंत्री जी यही होंगी, वो तो उम्र कम है इसी से अब तक चुनाव लड़ने की सोची नही है, लेकिन अपने पिता की सीट यही लेंगी उनके रिटायरमेंट के बाद। सेलेब्रेटी है यार ये शहर की, और बोलो तुझे नाम नही पता । हद है यार!!”

  ” अब यार मैं किसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर हूँ ही नही तो कैसे जानूँगा की कौन हैं ये?

  “नेटवर्किंग साइट्स छोड़ तू तो सोशल ही नही है यार। इतनी बड़ी जगह रिश्ता हो रहा और ऐसा लग रहा जैसे साहब को कोई फर्क ही नही पड़ता।”

   अब तक आरुष ने अपने अकाउंट से कादम्बरी का सोशल अकाउंट खोल कर वरुण के सामने कर दिया..

  ” मैं उनकी फ्रेंड लिस्ट में नही हूँ इसलिये मुझे उनकी पर्सनल तस्वीरे नही दिखेंगी लेकिन ये उनके पार्टी कार्यालय और वहाँ के कामकाज की तस्वीरें जो उन्हीने शेयर कर रखीं हैं तू यहाँ देख सकता है।”

    तस्वीरें देखते देखते वरुण ने अपनी कॉफी उठाई, कॉफी ठंडी हो चुकी थी।
   उसने कप उठा कर बीन में डाला और आरुष का फ़ोन उसे वापस करता उसे साथ लिए ऑफिस की ओर निकल गया….

  क्रमशः

  aparna…

  

  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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