समिधा – 20




  समिधा -20


             
         मैं देवज्योति टैगोर हूँ। अपनी दादी को दर्शन करवाने ले जा रहा हूँ। वो बुज़ुर्ग हैं ना इसलिए वहां सामने उनकी सुविधा वाली सीट पर उन्हें बैठाया है।”

वरुण ने मुस्कुरा कर अपना हाथ आगे बढ़ा दिया…

” मैं वरुण सत्य की तलाश में केदारनाथ जा रहा हूँ। “

  दोनो ने आपस में हाथ मिलाया और एक बिजली सी चमकी ….
     और बस आगे बढ़ गयी…..

     उस तेज़ बिजली की रोशनी में एक पल को वरुण को लगा वो देवज्योति के चेहरे पर खुद को देख पा रहा है।
    उसे समझ नही आया कि ये क्या हुआ था। देव के माथे को देखता वरुण कुछ देर को खो सा गया। उसका और देव का चेहरा तो अलग था लेकिन कोई एक चीज़ थी जो दोनो को एक कर रही थी….
   उन दोनों का चेहरे का ऊपरी भाग, यानी माथा।

” क्या हुआ वरुण जी ? आप कुछ घबराए से लग रहे। बारिश बिजली से डर लगता है क्या?”

  वरुण ने चौन्क कर ना में सर हिलाया और बस से बाहर देखने लगा। उमस भरी गर्मी बीत चुकी थी, जेठ का महीना समाप्ति पर था और आषाढ़ लग चुका था। हालांकि जून में ऐसी बारिश होती तो नही पर न जाने क्यों कल रात से ही बारिश लगातार हो रही थी ….
…..
    वरुण को जाने क्यों ऐसा लगने लगा कि ये बारिश उससे कुछ कह रही है।

           इधर सुबह सवेरे बम भोले का जयकारा लगा कर बस अपने गंतव्य की ओर चल पड़ी थी।
    बस में जगह जगह से आये लोग थे। सभी का आपस में परिचय हो रहा था। शर्मा जी ने सबसे पहले सामने खड़े होकर अपना परिचय दिया और फिर एक एक कर हर एक कि सीट पर आगे बढ़ते चले गए…

    शर्मा जी का हंसी मजाक शुरू था, लोग अभिभूत हो रहे थे….
   देव पूरी तन्मयता से शर्मा जी बात सुनता उनकी हर बात का समर्थन कर रहा था , और वरुण खिड़की से बाहर  अपने शहर को छूटते देख रहा था।
   कल तक जो बहुत मजबूती से अपने निर्णय पर अटल था , आज अपने घर को अपने शहर को छोड़ता हुआ पसीजता जा रहा था। उसे एकाएक लगा कि वो रो पड़ेगा पर उसने खुद को संभाल लिया….
सीट पर पीछे सर टिका कर उसने आंखे मूंद ली…

  ” शर्मा जी कोई भजन वजन सुनाइये ”

  देव की फरमाइश पर शर्मा जी बड़े नाज़ नखरे दिखाते भजन सुनाने को तैयार हो गए….

       ” ठीक है देव बेटा तुम्हारे कहने पर हम हरि ओम शरण जी का सुप्रसिद्ध भजन सुनाते हैं तुम्हें …

        
   ये गर्व भर मस्तक मेरा, प्रभु चरण धूल तक झुकने दे.
          मैं ज्ञान की बातों में खोया,
          और कर्म हीन पड़कर सोया,
          जब आँख खुली तो मन रोया,
            जग सोये मुझको जगने दे,
             ये गर्व भरा मस्तक मेरा,
           प्रभु चरण धूल तक झुकने दे।
             ये गर्व भरा मस्तक मेर……


   शर्मा जी की मीठी आवाज़ का असर था या भजन के शब्दों का बस में बैठे सभी यात्री झूमने लगे, लेकिन वरुण की आंखों से दो बूंद ऑंसू ढुलक पड़े..

  देव से छिप कर उसने आंखें पोंछ ली।

  गाते बजाते बस काफी दूर निकल आयी थी, सुबह के दस बज रहे थे, सभी को भूख भी लग आयी थी। आज पहला ही दिन होने से नाश्ता बना पाने में असुविधा थी इसलिए हाइवे पर एक अच्छा सा ढाबा देख बस रोक दी गयी….

   सभी बस से उतर कर अपने हाथ पांव सीधे करने लगे।
  देव ने दादी को एक आरामदायक जगह में बैठाया और उनके लिए नाश्ता और चाय ले आया…
  दादी के साथ ही बैठे उसने भी एक आलू का पराठा खाने के बाद अपनी चाय की गिलास उठायी, ढाबे से एक और चाय लेकर वो वरुण की टेबल पर जा बैठा…

” अपने कुछ खाया ही नही दोस्त? बुरा मत मानियेगा आपको दोस्त मान सकता हूँ।”

  हां में सर हिला कर वरुण ने देव की लायी हुई चाय थाम ली….

” मन नही कर रहा था। “

” बात तो सही हैं बिना मन के कोई काम नही करना चाहिए। बहुतों को जीवन में ये मौका भी मिलता है बिना मन के कोई काम नही करने का।
     लेकिन हमारे जैसे मध्यमवर्गीय लड़कों को तो हमारा मन किसमें है ये भी जानने का अवसर नही मिलता।
   बचपन में पढना नही चाहता था, तब बाबा पढ़ाई के पीछे पड़े रहे। बड़ा हुआ तब पढना चाहता था तब बाबा ने कहा “तू पढ़ेगा तो दुकान कौन देखेगा? ” तो बस पढ़ाई छोड़ दी।

वरुण ने मुस्कुरा कर देव की ओर देखा और वेटर को इशारे से बुला कर अपने लिए भी नाश्ता मंगवा लिया…

” वैसे किस चीज़ की दुकान है तुम्हारी। व्यापारी तो बातों के लगते हो?”

  वरुण की बात पर देव ने एक ज़ोर का कहकहा लगा दिया…..

” आप जो समझ लें । वैसे छोटी सी जगह में रहता हूँ। बाबा ने अपने ज़माने में राशन की दुकान डाली थी, अब वो तीन मंजिला सुपर मार्केट है। “

” वाह ! बहुत खूब!मतलब पढना चाहते थे पर मजबूरी में दुकान करना पड़ा और उसे परचून की दुकान से सीधा सुपर मार्केट बना डाला।

  हां में सर हिलाता देव मुस्कुराता रहा..

” मैं कभी किसी बात का रोना लेकर नही बैठ सकता।मेरा स्वभाव ही नही है वो। मुझे अगर कुछ चाहिए और वो नही मिला तो मैं मान लेता हूँ कि वो मेरे नसीब का था ही नही और जो मुझे मिलता है उसे फिर मैं अपने माफिक बना लेता हूँ।
   सच कहूँ तो मैनेजमेंट की डिग्री लेना चाहता था। ग्रेड्यूएशन के बाद यही करने का सोचा था पर बाबा ने मना कर दिया और दुकान थमा दी।
  मुझे लगा कि ये लो मुझे तो डायरेक्ट मौका ही मिल गया अपने मैनेजमेंट स्किल्स को प्रैक्टिकली प्रूव करने का।
   और मैं जी जान से अपनी उस छोटी सी दुकान को सजाने में लग गया। तीन साल खूब मेहनत की। रात दिन एक कर दिया… अपनी दुकान की सेल्स कैसे बढ़ा सकता हूँ ? क्या नया दुकान में रख सकता हूँ सारी रिसर्च की। कोलकाता की बड़ी बड़ी सुपर मार्केट्स के चक्कर लगाए और धीरे धीरे कर अपनी दुकान को फैलाता गया।
   अब हमारे कस्बे में कोई घर ऐसा नही जिनकी रोज़ की ज़रूरत का कोई सामान मेरी दुकान पर न मिलता हो।
  शुरू में मेरा ये जुनून बाबा को पागलपन लगता था लेकिन फिर जब उन्होंने एक शाम दुकान की बैलेंस शीट देखी तब उन्हें लगा कि उनका सनकी बेटा भी कुछ कर सकता है।
    बाबा की आंखों में खुशी के ऑंसू चमक उठे। मेरी ओर उनके हाथ आगे तो बढ़े लेकिन एक पिता का संकोच उन्हें अपने बेटे के गले लगने से रोक गया।
  आप तो समझ सकतें हैं हमारे बाबा और माँ जिस जनरेशन से हैं वहाँ वो बच्चों के दोस्त नही बन सकते। वो हमेशा खुद को हमारे सामने कठोर दिखातें हैं जिससे हम उन्हें पर्याप्त आदर सम्मान दे सकें।
   मैं समझ गया बाबा चाह कर भी मुझे गले से नही लगा पाएंगे। मैंने उनके पैर छुए और उन्हें  सुपर मार्केट के बाकी फ्लोर घुमाने ले गया। उस दिन पहली बार मैंने उनकी आंखों में चमक देखी थी।

” तुम तो यार कमाल के लड़के हो। पहली नज़र में देख कर मुझे लगा था एक सामान्य से कॉलेज गोइंग लड़के होंगे तुम पर तुम तो बिज़नेस टाइकून निकले।”

” नही ऐसी कोई बात नही। मैं बहुत सामान्य सा लड़का ही हूँ छोटी छोटी बात पर खुश होने वाला..!”

” जैसे ! अभी यहाँ किस बात पर खुश हो? “

” अरे यहाँ तो ढेर सी बातें हैं। कलकत्ता की सड़ी गर्मी के बाद कल रात बारिश की फुहारें कैसी ठंडक दें गयीं मैं उसी में खुश हो गया। अभी ठाकुर माँ मेरा मतलब मेरी दादी को प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठाने जा रहा था कि हॉटल के एक कर्मचारी ने दौड़ कर छोटी सी गद्दी ला दी। दादी को उसमें बैठा कर मैं खुश हो गया।
   मैं बाहर चाय नही पीता क्योंकि अच्छी चाय नही मिलती पर यहाँ देखिए कैसी लाजवाब चाय था,बस मैं…

” …. खुश हो गए।” देव की बात आधे में ही काट कर वरुण बोल गया…

” बहुत अच्छा लगा तुमसे मिल कर बड़े खुशमिज़ाज़ हो ..!”

” हम्म लेकिन आप क्यों ऐसे असहज से लग रहे हैं जैसे अंदर ही अंदर कोई बात चल रही हो। जैसे कोई दुख साल रहा हो आपको?  अगर बताना चाहें तभी बताइयेगा!”

  वरुण देव के सवाल पर कुछ देर सोचता बैठा रहा और फिर अपनी धुन में कहता चला गया…

” मैं तुमसे काफी अलग हूँ देव। मुझे मेरे जीवन में जो सब मिल सकता था मिला पर भी मैं शायद संतुष्ट नही हो पाया।
   अच्छा घर , प्यारे माता पिता, शानादार नौकरी, विदेश में पोस्टिंग सुंदर लड़की से सगाई सब कुछ वही मिला मुझे जिसकी मेरे जैसे लड़के को आस रहती है……..
    …. लेकिन फिर अभी कुछ समय पहले ही मुझे मालूम हुआ कि मुझे हार्ट की बीमारी है, ऐसी बीमारी जिसमें मैं कभी भी अचानक मर सकता हूँ।
   इस बीमारी के बारे में पता चलते ही मेरे अंदर का डरपोक वरुण मेरे सामने खड़ा हो गया। मैं भगवान में अपना मन लगाकर डर दूर करने की कोशिश करने लगा। और इसी कोशिश में जाने कब मैं उसकी भक्ति में डूबता चला गया।
     मुझे अचानक भगवान के चमत्कारों पर विश्वास होने लगा, और मुझे लगा मुझे भी कृष्ण मरने नही देंगे, बचा ही लेंगे।
    लेकिन मैं जानता हूँ कि अभी भी मेरा कृष्ण पर विश्वास सौ फीसदी नही जाग पाया है। क्योंकि अगर मेरा विश्वास सौ फीसदी होता तो मैं अपनी शादी तोड़ कर अपने माता पिता को अकेला छोड़ कर नही भागता।
   अभी भी दिल के एक कोने में यह डर बैठा है कि अगर मैं कादम्बरी से शादी के बाद मर गया तो उसका क्या होगा?
   अगर मेरी तबियत मेरे माता पिता के सामने बिगड़ने लगी तो वो अपने बेटे को पल पल अपनी आंखों के सामने मरते कैसे देख पाएंगे।
   सच कहूं दोस्त तो अपने आप को अपने मन को ही नही समझ पा रहा हूँ। और बस इसीलिए स्वयं के अंदर के सत्य की तलाश में निकला हूँ।
   अगर कृष्ण मुझे जीवित रखतें हैं तो फिर ये जीवन उन्हें समर्पित हो जाएगा….

” पर ये कैसी शर्त हुई भला? आपने तो इस डर से शादी तोड़ी की कहीं आपको कुछ हो गया तो आपके बाद आपकी पत्नी का क्या होगा?
   अब मान लीजिए श्रीकृष्ण ने आपको बचा लिया तब भी अगर आप विवाह नही करते तो फिर आपके इतने बड़े निर्णय का क्या मतलब? बल्कि तब तो आपको श्रीकृष्ण की भक्ति में अपने पूरे परिवार के साथ लग जाना चाहिये।”

” शायद तुम ठीक कह रहे हो। पर अभी तो फिलहाल मेरा पूरी तरह से खुद को समर्पित कर देने का मन करने लगा है। ऐसा लगता है जितना भी जीवन बाकी है सब कृष्ण के चरणों में चढ़ा दूं। “

” उनके श्री चरणों में अर्पित करने के बाद हर चीज़ उत्कृष्ट हो उठती है। खुद को सर्वश्रेष्ठ बनाने का तरीका अच्छा है। पर अगर आप श्रीचरणों में जा रहे तब तो सब कुछ भूल कर आपको खुश रहना चाहिए, फिर क्यों ऐसे मुरझाए से हैं? “

” क्योंकि अपने माता पिता से बगावत कर के आ रहा हूँ। वो नही चाहते थे मैं सन्यास लूँ। “

” किस संसार के माँ बाप चाहेंगे उनका बेटा सन्यास ले? “

” जानता हूँ देव ! इसी बात पर तो ढेर सारी बहस हुई और कल रात उनके लिए एक चिट्ठी छोड़ मैं निकल आया।”

” मतलब उनसे मिले भी नही ? “

” नही ! अब तक तो माँ ने चिट्ठी पढ़ भी ली होगी। जाने क्या हाल हो रहा होगा उनका? और जाने पापा कैसे होंगे? “

” जब इतने चिंतित हो तो बात कर लो!”

  वरुण ने देव की तरफ देखा, देव ने वरुण का मोबाइल टेबल से उठा कर उसकी ओर बढ़ा दिया…

” सत्य की खोज में निकले हो तो घर वालों को भी सत्य बोल कर ही जाओ न। बातें न करने से शायद ही कभी समस्या का समाधान हो पर बातें साफ साफ कर लेने से हमेशा एक समाधान निकल ही आता है।”

   वरुण ने देव की ओर देखा और अपना फ़ोन हाथ में ले लिया ….

   कांपते हाथों से उसने माँ का मोबाइल नम्बर डायल किया …. घर से कोई फ़ोन न आ जाये इस डर से अब तक उसने अपना फ़ोन बंद कर रखा था।

  पहली ही रिंग में फोन उठ गया….
       फिर वरुण की क्या बात हुई क्या हुआ ये जाने बिना ही देव ने पारो को फ़ोन लगाया और दूसरी दिशा में आगे बढ़ गया….

  पारो के पास अपना मोबाईल था नही। घर भर की सभी औरतों के लिए मोबाइल की सुविधा घर की बड़ी बहू आनन्दी के पास थी….
   आनंदी पारो की जेठानी थी और देव की ताई की बहू थीं।
   आंनदी के मोबाइल पर जैसे ही देव का नम्बर दिखा वो भाग कर पारो के कमरे में पहुंच गईं।
  पारो और लाली मिल कर छत पर कटे हुए आमों में हल्दी नमक लगा कर उन्हें  सूती कपड़े पर धूप में फैला रहीं थीं।

” अरी पारो वो छोड़, ये ले देवर बाबू का फोन है!”

  पारो ने जल्दी से हाथ बढ़ा कर फोन ले लिया….

” कहाँ तक पहुंचे ? और कितना वक्त लगेगा? वापस कब आओगे? “

” अरे बाबा धीरे धीरे एक एक कर पूछो सवाल। पहले का जवाब ये है कि अभी हाइवे के किसी ढाबे पर रुकें हैं।  यहाँ से अभी हम तीस घंटे का सफर करके पहले हरिद्वार पहुंचेंगे उसके बाद वहाँ से सोनप्रयाग होते हुए गौरीकुंड में उतरेंगे।
   वहाँ से आगे शायद पैदल ही जाना पड़ेगा।
अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना है पारो। जितना जल्दी पहुंचेंगे उतना ही समय वापसी में लगेगा। तुम ठीक हो ना? क्या कर रहीं थीं अभी? “

” आम का अचार बना रही थी। आपके लौटते तक में खाने लायक हो जाये शायद। अच्छा सुनो आपको बताया था  मेरी सहेली है ना ज़ोइता उसकी शादी है अगले महीने। “

” हाँ तो ? जाना चाहती हो? “

” हम्म ! “

“चली जाना, मैंने रोका है कभी? “

” मैं चाहती हूँ आप भी साथ चलें।  चलेंगे ना? “

” बिल्कुल चलेंगे। चलो अब फोन रखता हूँ। तुम अपना और बाकी सबका ध्यान रखना । अच्छे से खाना पीना। और रात में ज्यादा पढ़ाई मत करना, वक्त पर सो जाना। “

” आप भी अपना ख्याल रखना और रोज़ फ़ोन करते रहना। ”

” हम्म ! ठीक है। ”

  मुस्कुराता देव फ़ोन रख जैसे ही पीछे पलटा उसके सामने वरुण खड़ा था।
  मुस्कुरा कर वरुण ने देव को गले से लगा लिया..

” तुमने सही कहा था देव ,अपनों से भाग कर किस सत्य की तलाश कर पाता मैं। माँ पापा नाराज़ तो थे और दुखी भी लेकिन उनसे बात करने के बाद अब थोड़ा सम्भल गए हैं। उन्हें भी अपने भगवान पर विश्वास है , की वो उनके बच्चे के साथ कुछ गलत नही होने देंगे। “

   दोनों साथ साथ आगे बढ़ रहे थे कि बस के दरवाज़े पर एक बुजुर्ग से टकरा गए, वो भी बस में चढ़ने जा रहे थे।
  उन्होंने रुक कर वरुण और देव को अंदर जाने की जगह बना दी, उनके ऐसा करने पर वो दोनो भी हंसते हुए एक तरफ खड़े हो गए और उन्हें पहले आगे जाने का रास्ता दे दिया। वो धीरे से बस में चढ़ सबसे सामने की सीट पर बैठ गए।
   देव दादी को पहले ही बस में बैठा चुका था। उन बुज़ुर्ग के चढ़ने के बाद देव और उसके पीछे वरुण भी चढ़ गया।
    उन्होंने देव के पीछे आते वरुण को देखा और चौन्क कर वापस देव को देखने लगे…

  देव और वरुण दोनो उनके इस कृत्य से भौचक्के रह गए। उन्होंने एक दूसरे को देखा और उन्हीं के सामने की सीट पर बैठ गए…

” क्या हम यहाँ बैठ सकतें हैं?”

  पारी पारी से दोनो को देखते उनके चेहरे का रंग बदलता जा रहा था।। उन्होंने हाँ का इशारा किया और खिड़की से बाहर देखने लगे..

     उनके माथे पर सजा त्रिपुंड , गले में पड़ी चंदन और रुद्राक्ष की कंठी उनके पंडित पुजारी होने की ओर इशारा कर रही थी।

” क्या हुआ पंडित जी आप कुछ परेशान लग रहे?”

” नही नही ऐसी कोई बात नही। जाओ अपनी जगह में बैठ जाओ..!

” पंडित जी कुछ तो बताइए। अभी इतनी लंबी यात्रा साथ में करनी है और आप ऐसा करेंगे तो कैसे बनेगा। कोई बात तो है जो आप हम दोनों को देख परेशान हो उठे। ”

  देव की बात पर उन्होंने गौर से देव को देखा फिर वरुण को देखने लगे….

“मैं कुंडलियां बनाता हूँ। हाथ की रेखाएं,माथे की रेखाएं पढ़ता हूँ।
   तुम दोनों की माथे की रेखाएं कुछ कह रहीं हैं…”

” क्या कह रहीं हैं पंडित जी? ” देव के सवाल पर वरुण ने हाथ पकड़ कर उसे उठा लिया

” जाने दो मैं ये सब नही मानता? कोई कुछ भी कह जाता है और तुम मान भी लेते हो। क्या बकवास है ये? “

” तुम्हारे मानने न मानने से बातें या तथ्य बदल नही जाएंगे।
   तुम दोनों का भविष्य एक दूसरे में हैं। एक के माथे की रेखा जहाँ तक जाकर मुड़ती है वहीं से दूसरे की शुरू हो रही है।
  ये रेखाएं तुम दोनो के जीवन में कुछ ना कुछ कर के रहेंगी….
  तुम दोनों का ही माथा अलग अलग पढ़ने पर पढ़ने वाला कुछ नही समझ पायेगा लेकिन जब वो तुम दोनो के माथे को साथ में पढ़ेगा तभी तुम दोनो का भविष्य पढ़ पायेगा।
   इसका मतलब समझे तुम? “

  पंडित जी को वरुण की अवहेलना खल गयी थी। और गुस्से में वो वह सब कह गए जो उन्हें नही कहना चाहिए था…

” इसका मतलब ये है कि तुम दोनों का भाग्य तुम दोनो की किस्मत तुम दोनो का जीवन एक है।
   अलग अलग तुम आधे ही हो,इसलिए आज तक तुम्हारे दोनो के जीवन में कुछ न कुछ कमियां थी। तुम दोनो एक साथ रहने पर एक ही व्यक्ति हो।

  पंडित जी की बातें अब देव को भी बे सर पैर की लगने लगीं। वरुण तो पहले ही उनकी बात बिना सुने अपनी सीट पर जा चुका था, देव भी धीरे से वहाँ से उठ खड़ा हुआ।
   उसने उन पंडित जी के पैर छुए और धीमे से अपनी सीट की ओर बढ़ गया…

” मैं झूठ नही कह रहा हूँ। अरे और किसी से क्या कहूँ अब तो मैं खुद निर्वाण हेतु बाबा के चरणों में जो जा रहा हूँ।
   वहीं मेरी मुक्ति है!!!
    वही मेरा मोक्ष है!!!
     वही मेरा निर्वाण है!!!

क्रमशः

aparna ….


  दिल से….

    दिल से कहूँ तो कहानी लिखते समय मैं तथ्यों का विशेष ध्यान रखती हूं कि पढ़ते समय आप लोगों को सब कुछ एकदम हवा हवाई न लगे। लेकिन बहुत बार होता है कि कुछ कहानियों में कहानी को आगे बढ़ाने के लिए या कोई मोड़ देने के लिए कहानी की कुछ मांग हो जाती है और तब कहानी को उस ढंग से मोड़ना पड़ता है।

   जैसा की कोलकाता से केदारनाथ की बस यात्रा। बस मार्ग से ये दूरी बहुत ज्यादा है और बहुत कम लोग ऐसी यात्रा करना पसंद करतें हैं । लेकिन फिर भी कुछ लोग आज भी तीर्थयात्रा बस का उपयोग करना पसंद करतें हैं।

  *******

   एक आधा बार मुझसे किसी ने पूछा इनबॉक्स में कि आप के पाठक आपको इतने शौक से पढ़तें हैं, आप बताइए आप किसे पढ़ती हैं?
    सवाल बहुत सरल सा था, पर जवाब पेचीदा है। मैं बहुत से लेखकों को पढ़ती हूँ। बस लेखन ऐसा हो कि शुरू की दो पंक्तियों के बाद ही कहानी छोड़ने का मन न करे।
   अभी फिलहाल कभी कभी सुधा मूर्ति जी की कहानियां पढ़ लेती हूँ। ये मूलतः कन्नड़, मराठी और अंग्रेजी में लिखतीं हैं। मेरे पास इनकी इंग्लिश स्टोरी बुक ही है फिलहाल, बाकी खरीदनी हैं।
    
    जिन पाठिकाओं के छोटे बच्चे हैं जो कहानी सुनना चाहतें हैं उनके लिए सुधा जी की कहानियाँ बहुत शानदार ऑप्शन है। कहानियां मोटिवेशनल हैं सकारात्मक हैं और जीवन को एक नया आयाम देती हुई सी हैं।
   वैसे आप में से बहुत से लोग सुधा जी को जानते भी  होंगे, जी हाँ इन्हीं के पति श्री एन आर नारायणमूर्ति इंफोसिस के फाउंडर और चेयर पर्सन हैं…. सुधा जी के कुछ वीडियो व्हाट्सप्प फेसबुक पर भी हैं।
   प्रतिलिपी पर इनकी कहानियां नही मिलेंगी!!

  तो इस बार के दिल से में छाई रहीं सुधा मूर्ति जी। आप भी कभी पढ़ कर देखिएगा , बहुत अच्छा लगेगा…..

   और सबसे आख़िरी में मुझे पढ़ने और सराहने के लिए आप सभी का दिल से आभार धन्यवाद शुक्रिया नवाज़िश….

aparna ……
   


 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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