समिधा -21

 वहीं मेरी मुक्ति है!!!
      वही मेरा मोक्ष है!!!
       वही मेरा निर्वाण……

    उन पंडित की बातों को सुनते शर्मा जी ने उन्हें प्रणाम किया और गाड़ी को आगे बढ़ाने का इशारा कर दिया…..

    कहीं उबड़ खाबड़ रास्ते तो कहीं लंबी चिकनी सड़क, कहीं ताल तलैय्या तो कहीं ऊसर पार करती बस आगे बढ़ती चली गयी।
  पहले दिन कहीं और सीट न मिलने से इत्तेफाक से साथ बैठे देव और वरुण में अब गाढ़ी दोस्ती हो गयी थी।

   दिन रात के इस साथ ने दोनो को ही मैत्री की एक भीनी सी डोर में बांन्ध दिया था। देव के हर वक्त खुश रहने की छूत वरुण को भी लगने लगी थी।
   कभी जब देव खाना बनाने वाले महाराज को एक ओर कर सबके लिए नाश्ता बनाने लगता तब अपनी डायरी एक ओर रख वरुण भी उसका हाथ बंटाने चला आता।
   हंसते बोलते सफर कटता जा रहा था। देव जहान भर की बातें वरुण को बता चुका था। और देव से बातें करते अब वरुण को ऐसा लगने लगा था कि वो देव के घर में हर किसी को भली प्रकार जानने लगा है चाहे वो बाबा हो माँ हो काकी हों लाली हो या हो पारोमिता!

  पारो की शैतानियां उसके पढ़ने की ललक उसकी लजीली मुस्कान सब कुछ बताते हुए देव जैसे खुद पारो हो जाता था….

” इतना प्यार करते हो तो उसे घर पर छोड़ कर कैसे निकल आये ? “

” मेरा घर और घरवाले अभी भी ज़रा पुराने विचारों वाले हैं ना। इसलिए ठाकुर माँ को तीर्थ के लिए लाते समय पारो को भी साथ ले लूँ ये पूछने की हिम्मत ही नही हुई!”

” हम्म ! यहाँ तुम्हारे लिए जितना मुश्किल है उसके लिए भी उतना ही मुश्किल हो रहा होगा, तुम्हारे बिन रहना। “

” उसका तो नही पता लेकिन अब मेरी बेसब्री बहुत बढ़ती जा रही है। “

” अभी से बेसब्री, अभी तो धाम पहुंचें भी नही। वहाँ पहुंचना है फिर वहां से लौटना है तब जाकर तुम्हारा दस दिन का ब्रम्हचर्य व्रत टूटेगा बेटा। तब तक तो सब्र करना ही पड़ेगा। “

” सही कह रहे हो दोस्त। जब साल भर निकाल लिया तो दस दिन क्या हैं? निकल ही जायेंगे… पर आज तक उसके सामने जितना ही संयमी बना हुआ था उससे दूर जाते ही जाने क्यों इतनी याद आ रही उसकी। ऐसा लग रहा नही मिली तो पागल हो जाऊंगा। “

” कितनी अच्छी बात है देव। प्यार ऐसा ही तो होना चाहिए, शायद मेरे और कादम्बरी के बीच इसी आकर्षण की कमी थी। पता नही मुझे कभी उसे छूने का मन ही नही किया”

” करेगा वरुण जिस दिन किसी से टूट कर प्यार हुआ न तो छूना बस क्या सब कुछ करने का मन करने लगेगा। और ये कोई पाप नही है। भैया आत्मा की गहराई से किसी को प्यार करने के लिए उसके शरीर का रास्ता चुनना ही पड़ता है। आखिर इसी देह की आड़ी टेढ़ी गलियों से गुज़र कर ही तो इंसान उस चरम को पाता है जिससे उसकी आत्मा तृप्त होती है और यही तृप्ति आत्मा से आत्मा के लगाव को जोड़ती है तभी तो हमारे समाज में ” विवाह आश्रम की व्यवस्था की गई है आखिर। “

  ” पता नही अब किसी से प्यार होगा भी या नही। मेरा तो रास्ता ही बदल गया है देव। अब जिस रास्ते पर आगे बढ़ना है वहाँ प्यार मुहब्बत जैसी बातें बचकानी और बेवकूफानी लगने लगीं हैं।”

” यू नेवर नो की तुम्हारे भविष्य में क्या लिख रखा है मुरली वाले ने। हो सकता है यहाँ से वापसी में ऐसा कुछ चमत्कार हो जाये कि कादम्बरी से ही तुम्हें प्यार हो जाये। और इस बार वो नही तुम आगे बढ़ कर उसका हाथ थाम लो!” 

  देव की बात सुन वरुण सोच में पड़ गया..

” मेरा भविष्य कुछ है भी या नही मालूम नही। मुझे तो अपने अगले दिन का भी भरोसा नही। कभी लगता है रात में सोऊंगा तो सुबह पता नही आंखें खुलेंगी भी या नही।

” एक तरफ तो कृष्ण साधना में निकले हो दूसरी तरफ ये भरोसा भी नही की भगवान अपनी साधना तुमसे करवाएंगे भी या नही। अगर भक्ति मार्ग पर हो तो सब कुछ भूल कर उस लीलाधर पर विश्वास धरो और डूब जाओ उसमें।”

” तुम इतने सुलझे हुए कैसे हो देव! जबकि उम्र अनुभव सभी में मुझसे छोटे हो फिर भी लगता है जैसे मेरी हर समस्या का समाधान तुम्हारे पास ही है। अब तो लगता है तुम पहले क्यों नही मिले, शायद मेरा मार्ग भी इतना कठिन नही होता, जितना मैंने बना लिया…”

” ये जीवन एक लंबा सफर ही तो है, मुसाफिर मिलते हैं दो कदम साथ चल लेते है और फिर अलग हो जातें हैं। ना सफर का भरोसा है और न सहयात्रियों का। बस हमें इस ज़िन्दगी के सफर को भी ऐसे ही मनोरंजक बनाना है जैसे केदारनाथ की यात्रा को बनाते जा रहें हैं।”

” ये देखो मेरे हर सवाल का कोई न कोई दार्शनिक जवाब होता है तुम्हारे पास। ” मुस्कुराते हुए वरुण आगे कुछ बोलने ही जा रहा था कि उसका फोन बजने लगा…
   फ़ोन उसकी मासी का था..

” बंटी कहाँ निकल गया है तू? घर पर कबसे बात नही की है तूने ?

” मासी क्या हुआ? अभी दो दिन पहले ही माँ से बात हुई थी। हुआ क्या है बताओ न? घर पर सब ठीक हैं ना? “

” कुछ ठीक नही है। तू क्या कर के गया है यहाँ से? तूने सोचा भी है उसके बाद क्या होगा?

” मासी साफ साफ बता दो प्लीज़ की हुआ क्या है? ऐसी पहेलियां बुझाओगी तो मेरा दिल धड़कना बंद कर देगा। “

” तेरे ससुराल वाले आये थे। पार्टी कार्यालय के चमचों ने आकर जो तोड़ फोड़ मचाई है घर पर की तेरे पापा तो अपने सीने पे हाथ धरे एक ओर चुपचाप बैठे रह गए। तेरी माँ ही उन लोगों के हाथ से छीन छीन कर सामान पहले रखती रही बाद में थक कर एक ओर बैठ गयी। और करती भी क्या?

” कादम्बरी को पता है ये सब ? “

” जी हाँ राजकुमारी जी भी आयीं थीं अपने पिता जी के साथ। शुरू में उसके बाप ने ही तेरे पापा से लड़ना झगड़ना शुरू किया। जब तेरे पापा ने तेरा पक्ष लेना शुरू किया तो दोनो बाप बेटी गुस्से में पैर पटकते बाहर निकल गए और उनके पीछे से सिर्फ पांच मिनट में उसके गुर्गों ने जो तबाही मचाई है कि क्या कहें।
   उस पर कादम्बरी वापस आ कर तेरी माँ से ये भी कह गयी कि अगर अपने बेटे की करतूत पर आप दोनो माफी मांग लेते तो फिर भी मेरे पापा शायद आप लोगों को माफ भी कर देते पर आप लोगों के अकड़ू स्वभाव ने पापा को गुस्सा दिला दिया। अब तो अगर वरुण नाक भी रगड़े मैं कभी उससे शादी के लिए वापस तैयार नही होने वाली हूँ।

  और इतना कह कर पैर पटकती बाहर चली गयी। तुझे भी अभी केदारनाथ जाने की क्या सूझी बेटा।

” मैं वापस आ रहा हूँ मासी। मैं दिल्ली से फ्लाइट ले लेता हूँ।”

” नही नही। अब तू अभी वापस मत आना बेटा। तेरे पापा मम्मी ने तुझे कुछ भी बताने मना किया था पर मेरा मन नही माना इसलिए गुस्से में बता दिया मैंने। अब तू वापस आ गया तो जिज्जी मुझ पर नाराज़ हो जाएंगी।
  वैसे भी वो लोग कुछ दिनों के लिए गांव चले गए हैं। मैं बस तुझे जानकारी देना चाहती थी कि अब अगर तू ये सोच भी रहा होगा कि वापस आ कर शादी के लिए हाँ बोल दूंगा तो सुन ले उस चुड़ैल से अब मैं तेरी शादी नही होने दूँगी । समझा!”

  इतने मुश्किल पलों में भी वरुण के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गईं।

“चिंता मत करो मासी ! आप बस माँ पापा का ध्यान रखना, मैं जल्दी ही लौट आऊंगा। “

” अपना ध्यान रखना बंटी।मौसम खराब हो रहा है । “

“” हाँ मासी। आप घबराओ मत।

   वरुण बातें कर वापस आया तब तक में देव दूर एक पेड़ की छांव में बैठा किसी से बहुत मुस्कुरा कर बात कर रहा था, उसे देखते ही वरुण को समझ आ गया कि वो किससे बातें कर रहा है। वो फ़ोन निकाल कर माँ के नम्बर पर फोन मिलाने लगा…

  माँ पापा से बात कर अब उसकी चिंता काफी हद तक कम हो गयी थी। वो दोनो गांव में थे चाचा जी लोगों के साथ अपने लोगों के बीच अपने परिवेश में उनका दुख काफी कुछ कम हो गया था।

  फ़ोन रख वो खाना बनाने वाले महाराज की तरफ बढ़ गया, देव अब भी बातों में लगा था।

  खाना खा कर सभी बस में सवार हो गए। अगला पड़ाव उनका दिल्ली था, जहाँ से वो लोग आगे भी इसी बस में बढ़ने वाले थे।

  अगली सुबह उनका नाश्ता दिल्ली में हुआ । वहाँ से हरिद्वार के लिए बस आगे बढ़ गयी….

” कुछ लिखते हो डायरी में ? केदारनाथ यात्रा संस्मरण ? क्यों हैं ना? “

देव की बात पर वरुण मुस्कुरा कर राह गया…

” हाँ ! सिर्फ यात्रा संस्मरण नही और भी बहुत कुछ। हमेशा से डायरी लिखता आया हूँ। बचपन में थोड़ा कम बोला करता था न तब माँ ने डायरी लाकर दी और कहा जो बातें कहीं बोल नही पाते वो इस डायरी में लिख लिया करो।
  बस तभी से लिख रहा हूँ……

“अब तक कितनी डायरी भर चुके हो ? “

” शायद चार या पांच! हमेशा लिखने का वक्त नही मिलता लेकिन जब कुछ खास हो तब लिख लेता हूँ

  हरिद्वार पहुंचते में दोपहर हो चुकी थी , खाना पीना निपटा कर कुछ लोग हरिद्वार ही रुकना चाह रहे थे, इसलिए बस वाले ने वहीं बस रोक दी।
    शाम गहराने से पहले ही अधिकतर यात्री गंगा आरती के लिए हर की पौड़ी पहुंच गए थे। ठाकुर माँ को एक तरफ बाकी बुजुर्गों के साथ घाट पर बैठा कर देव ने गंगा मैया में डुबकी लगा दी।

   सामने घाट पर बैठे वरुण को भी वो बुलाता रहा लेकिन वरुण अपनी डायरी में ही खोया रहा…

    ” गंगा आरती – ये हमारे यहाँ ही हो सकता है। हम अपनी नदियों को भी ऐसे पूजतें हैं जैसे सामने जीवित खड़ी हो। शाम होते ही लोगों की भीड़ पूरा रेला ही गंगा आरती के लिए धँसा चला आ रहा है। गंगा आरती के लिए हजारों लोग हर की पौड़ी के दोनों तरफ इकट्ठे होने लगे हैं…. हर हर गंगे , जय माँ गंगे के स्वर गूँजने लगें हैं , अंधेरा होने लगा है।
   अद्भुत है यह दृश्य। जब एक लय में पंडितों के हाथ उठते गिरतें हैं।
  होने वाली आरती की तस्वीर जब गंगा की लहरों में उतरती है तो उन लहरों का कंपन शरीर में भी एक सिहरन पैदा कर देता है। हमारी भाषा में लिखूं तो गूज़ बम्प्स! “

   ” उठो यार, बस यहाँ किनारे बैठे लिखते रहे तो गंगा जी की आरती का पूरा आनन्द नही ले पाओगे। आओ चलो मेरे साथ। “

  देव वरुण को साथ लिए थोड़ा आगे बढ़ गया। श्रद्धा से लोगों के हाथ जुड़े थे , हर हर गंगे का जाप चल ही रह था और आंखों के सामने चल रही थी अद्भुत और अविस्मरणीय गंगा आरती !!

  आरती समाप्त होते ही प्रसाद बटने लगा था, देव और वरुण भी प्रसाद लिए आगे बाकी लोगों के पास पहुंच गए।

” यहाँ से हम आप सबको चोटी वाला के वहाँ ले चलेंगे। “

  शर्मा जी की बात पर एक सहयात्रीणि चहक उठी..

” ये कौन सा मंदिर है शर्मा जी। “

” आप चलिए न खुद ही जान जाएंगी। “

  पंडित जी दिन ढलने के बाद नही खाते थे , इसलिए वो नही गए। उन्हें छोड़ कर सभी आगे निकलने लगे तो उन्होंने इशारे से देव और वरुण को बुला लिया। वरुण जाने क्यों ऐसे पंडित पुजारियों से चिढ़ा रहता था।

  ” तुम तो बहुत अच्छे तैराक हो !” देव की ओर देख पंडित जी ने कहा..

  ” बंगाल के गांव मे रहते हुए तैरना कैसे नही आएगा पंडित जी। ” देव उन्हें प्रणाम करता अपनी बात बोल गया..

” अच्छा है। शुभमस्तु !”  उन्होंने वरुण की ओर देखा, अपनी आंखें बंद की और होंठों में ही कुछ बुदबुदाते हुए उन्होंने आंखें खोल दी…

” इतना अविश्वास क्यों है तेरे मन में! हर बात को लेकर , हर घटना को लेकर।
  एक बात समझ ले ये जो भी हो रहा है उसी की मर्ज़ी है। ये मौसमों का बदलना, ये आंधी तूफान ये सब उसी का खेल है। प्रकृति का नियम है पुराना नष्ट होगा तभी तो नूतन जीवन जन्म लेगा।
   लेकिन कभी कभी प्रकृति भी ऐसे खेल रच जाती है, जो तेरे मेरे जैसे साधारण इंसानों की समझ से बाहर होता है। लेकिन ऐसे खेल जो प्रकृति स्वयं के आनन्द के लिए रचती है उनका भी कोई न कोई औचित्य अवश्य है……

” पंडित जी मुझे आपकी कोई बात समझ में नही आ रही है।”

” मैं जानता हूं तुझे अभी मेरी कोई बात समझ नही आएगी लेकिन मैं बस यही कहूंगा कि मेरी बात समझने की जगह मेरी बात सुनो और मान जाओ। तुम दोनों इसके आगे की यात्रा स्थगित कर दो। “

” ये क्या कह रहे हैं आप पंडित जी!”

  अबकी बार देव चौन्क कर आगे कूद पड़ा…

” मैं क्या कह रहा हूँ क्यों कह रहा हूँ इस सब चिंतन में पड़ने की जगह मेरी बात मान लोगे तो अच्छा होगा। “

” आपकी बात काटने का तो बिल्कुल मन नही है पंडित जी लेकिन मैं मेरी दादी को दर्शन के लिए ही तो लेकर आया हूँ। अब इतनी दूर आकर उन्हें कैसे कह दूं कि हम आगे नही जाएंगे। “

” मैंने कब बोला कि उन्हें मत जाने दो। वो हमारे साथ भी आगे बढ़ सकतीं हैं। मैंने बस तुम दोनो को मना किया है।”

” नही पंडित जी अपनी दादी को ऐसे अकेले नही छोड़ सकता मैं। उन्हीं की देखभाल के लिए तो आया हूँ। उन्हें कैसे छोड़ दूं?  मुझे तो आगे जाना ही है।वरुण चाहे तो यहाँ रुक सकता है या वापस लौट सकता है।

” नही मैं कहीं वापस नही जा रहा। मैं अब मंदिर दर्शन करने के बाद ही वापस लौटूंगा। “

   गंगा जी की लहरों पर ही नज़र जमाये वरुण ने भी अपनी बात रख दी….

   बारिश की एक मोटी सी बूंद उसके गाल पर पड़ी और उसने ऊपर आसमान की ओर अपनी नज़रे उठा दी। बड़ी बड़ी चार पांच बूंदे उसके चेहरे को भिगोती जाने लगी..

” महादेव रक्षा करें सब की। हर हर महादेव! हर हर गंगे जय माँ गंगे। “
   पंडित जी अपना जाप करते आगे बढ़ गए।

   देव वरुण का हाथ पकड़े वहीं घाट पर बैठने लगा तो वरुण मुड़ कर जाने को हुआ…

” पागल है क्या? भीग जाएंगे यहाँ बैठे तो… बारिश शुरू होने वाली है।”

” अरे बैठो तो सहीं दोस्त! बारिश में भीग कर घुल नही जाएंगे । मानता हूँ मिट्टी से बने हैं हम इंसान पर बिल्कुल ही चाक पेंसिल थोड़े ही हैं कि थोड़े से पानी से घुल जाएं। “

देव ने अब तक पास की टपरी से दो चाय मंगवा ली थी। शर्मा जी बाकियो को लेकर चोटी वाला जा चुके थे।
   देव ने वरुण को भी अपने साथ घाट पर बैठाया और दोनों चाय पीते गंगा जी की उठती गिरती लहरों को देखते रहे….

   वरुण को एकाएक दिखा जैसे गंगा की उत्ताल लहरें उठ उठ कर गिरने की जगह ऊंची उठती ही जा रही हैं। और लगातार ऊंची उठती लहरें तेज़ी से ऊपर से नीचे गिरीं और वरुण चौन्क कर अपने हाथों से चेहरे को बचाते हुए ज़रा पीछे खिसक गया। घबराहट में आंखें बंद हो गयी। धीरे से उसने आंखें खोली  पर सामने गंगा अपने उसी पुराने रूप में कलकल करती बहती चली जा रही थी। लेकिन अभी कुछ सेकेंड पहले ही उसने इसी गंगा का विकराल रौद्र रूप देख लिया था जैसे, और उसी से खुद को बचाने अपने चेहरे को ढंकता वो पीछे सरक गया था लेकिन आश्चर्य की बात थी कि न उसके चेहरे और न उसके हाथों पर पानी की एक बूंद भी थी।
   तो वो गंगा की उद्दात्त लहरों का प्रकोप क्या था जो उसे अचानक एक पल को दिखा और चला गया।

” क्या सोचने लगे दोस्त? “

  वरुण ने देव की तरफ देखा और सवाल के बदले उसी से सवाल कर लिया…

” इन गंगा की लहरों में तुम्हें क्या दिख रहा है देव ? “

  इस सवाल पर देव की आंखें चमक उठीं

” मुझे गंगा की इन पावन उठती गिरती लहरों में मेरी पारो की हंसी दिखाई देती है, कलकल की ये आवाज़ जैसे उसके पायलों की छमछम हो और अनवरत बहती ये धार जैसे वो खुद है, भागती सी चली आ रही हो मुझसे मिलने। मुझमें समाने!

” बस बस मेरे देवदास ! इतिहास में पहली बार हुआ होगा जब कोई लड़का अपनी ही पत्नी का प्रेमी बन गया है। तुम्हारी दीवानगी हद पार करती जा रही है , ऐसा नही लग रहा तुम्हें।”

” हाँ शादी के बाद पहली बार उसे छोड़ कर अकेला निकला हूँ ना। शायद इसीलिए। अच्छा तुम बताओ तुम्हें गंगा में क्या नज़र आ रहा है। “

” मुझे तो जाने क्यों दोस्त लेकिन गंगा की इन लहरों में प्रलय नज़र आ रहा है।
   भयानक प्रलय……

क्रमशः

aparna……

   दिल से ……

     अभी पिछले कुछ समय से ऐसा लग रहा है जैसे कोई त्योहार मनाया जा रहा है। लोग खुश हैं,बेहद खुश हैं। और अपनी खुशी मनाने वो रोड पर उतर आए हैं।
   मॉल क्या खुले ,सभी को याद आ गया कि सामान मॉल से बाहर तो कहीं मिलता ही नही। रेस्टोरेंट्स में भी बहारें सजने लगीं हैं।
   गृह प्रवेश बर्थडे पार्टी, शादियां सभी कुछ मनने लगा है और तो और लोग मनाली कुल्लू मसूरी की यात्राओं पर भी निकलने लगे हैं जैसे जाने कब से कैद थे और अब जाकर आज़ादी मिली है।

   कैसे हम इतने बेपरवाह हो जातें हैं,अभी ज्यादा वक्त नही बीता उस बात को जब हर तरफ से कोविड से जुड़ी बुरी खबरें ही आ रहीं थीं। जाने कितने लोगों ने अपने अपनों को खोया है।
   वो भी एक दौर चल रहा था जब सुबह उठ कर व्हाट्सप्प खोलने का मन नही होता था कि जाने क्या खबर सुनने मिल जाये।
   ॐ शान्ति से डर लगने लगा था। अजीब अवसाद सी स्थिति पैदा हो गयी थी।
   बस ईश्वर से यही प्रार्थना है अब ऐसी कोई स्थिति न आये।
   हम सब एक साथ मिलकर ये  प्रयास कर सकतें हैं कि तीसरी लहर को आने का मौका ही न मिले।
   अगर 60 % लोग भी वैक्सिनेट हो जातें हैं तो कोरोना को हमारा देश छोड़ कर भागना ही पड़ेगा।

बाकी सारे सुरक्षा साधन आपको मालूम ही हैं। बार बार बताऊंगी तो आप भी बोर हो जाएंगे।

तो बस ध्यान रखना है थोड़ा सा अपना और थोड़ा सा अपने अपनों का!!!

    कोशिश में हूँ आज ही मायानगरी का अगला भाग पोस्ट कर पाऊं।
जीवनसाथी भी जल्दी यानी कल या परसों तक आ जायेगी।

  आप सभी का हार्दिक आभार कि आप अपना कीमती वक्त निकाल कर मुझे पढ़तें हैं ,सराहतें हैं और स्टिकर्स की बरसात करते हैं।
    दिल से thank u

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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