समिधा -22

समिधा-22



           हरिद्वार से बस आगे निकल चुकी थी। पिछली
रात से होती बारिश अब भी नही रुकी थी ।
   ऋषिकेश से जैसे जैसे बस आगे बढ़ती जा रही थी पहाड़ी रास्ता शुरू होता जा रहा था, एक तरफ बारिश से धुलते पहाड़ थे तो दूसरी तरफ गरजती गंगा बह रही थी। धूल भरा रास्ता बारिश के पानी से कीचड़ भरा हो गया था। छोटे छोटे गांव पीछे छूटते जा रहे थे और आगे बढ़ते हुए शर्मा जी का उत्साह भी बढ़ता जा रहा था…

” ये देख रहें हैं आप लोग, ये शिवपुरी कहलाता है। यहाँ ये गंगा जी के किनारे पर की रेत पर लोग टेंट लगा कर रुकतें हैं। अभी लगातार होती बारिश के कारण ही कम नज़र आ रहें हैं। फिर भी इक्का दुक्का आप लोग देख ही सकतें हैं।
  गर्मियों में व्यास और कौड़ियावलिया में जबरजस्त रिवर राफ्टिंग होती है जी।”

  शर्मा जी की बातों में वरुण को कोई रस नही मिल रहा था वो तो पूरी तरह से प्रकृति की सुंदरता में खोया खिड़की से बाहर देख रहा था वहीं देव शर्मा जी से खोद खोद कर वहाँ के बारे में पूछ रहा था।

” ये तो हम शायद देवप्रयाग पहुंच गए हैं ना शर्मा जी!”

” बिल्कुल सही पहचान गए हो बेटे। ये देवप्रयाग ही है,  यहीं भागीरथी और अलकनंदा का संगम होता है। यहीं के बाद गंगा गंगा कहलाती है यहाँ तक वो भागीरथी होती है।मुख्य रूप से अलकनंदा के पाँच प्रमुख प्रयाग है. पाँच प्रयागो मे यह पाँचवा प्रयाग है. पहला प्रयाग विष्णु प्रयाग है जहाँ अलकनंदा से धौली गंगा मिलती है. दूसरा प्रयाग  नन्दप्रयाग है यहाँ नन्दकिनी नदी अलकनंदा मे मिलती है. तीसरा प्रयाग कर्ण प्रयाग है यहाँ पिंडर नदी अलकनंदा मे मिलती है.  चौथा प्रयाग रुद्रप्रयाग है. रुद्रप्रयाग मे मंदाकिनी अलकनंदा से मिलती हैं और पाँचवा देव प्रयाग.”

“बहुत जानकारी है आपको शर्मा जी।”

” अरे बेटा काम ही यही है हमारा। अभी देवप्रयाग के बाद श्रीनगर पड़ेगा उत्तराखंड वाला, उसके बाद जगह पड़ती है कालिया सौर जहाँ धरा देवी का सुप्रसिद्ध मंदिर पड़ता है। आप लोग चाहें तो दर्शन कर सकतें हैं वहाँ।”

  शर्मा जी और देव की बातों को सुनते गाते बजाते लोग आगे बढ़ते चले गए। एक नया नवेला जोड़ा तोता मैना बना एक दूसरे के सर में सर घुसाये बस के बाकी लोगों से बेखबर  खिड़की से बाहर देखने में लगा था।
     तिलवारा से आगे अगस्त्यमुनि में बस कुछ देर को रुक गयी…  ऊंची नीची चट्टानों पर अस्तांचलगामी सूर्य की किरणें पड़ रहीं थी, लेकिन सुबह से होती बारिश अब भी नही रुकी थी।
   वहाँ गुफाओं में बने आश्रम में घूमते वरुण को वहाँ कुछ और देर रुकने का मन कर रहा था लेकिन बाकियों को आगे बढ़ने की जल्दी थी। ड्राइवर का कहना था कि रात में पहाड़ी में जितना कम गाड़ी चलाया जाए उतना सुरक्षित रहेगा। उसे आज की रात सोनप्रयाग तक पहुंचना ही था। सोनप्रयाग में डेरा डाल दिया गया।

   अगली सुबह सब वहाँ से गौरीकुंड के लिए निकल गए।

   गौरीकुंड से थोड़ा आगे बढ़ा कर बस वाले ने बस रोक दी। वहाँ ढेर सारे खच्चर वाले और डोले वाले खड़े थे।
  ठाकुर माँ को डोले में बैठा कर देव वरुण के साथ घोड़े वाले के पास चला आया। अधिकतर लोग अपनी सुविधा से घोड़ा या डोला चुनतें जा रहे थे।
  शर्मा जी घोड़े वालों से बातचीत कर उनसे पैसे कम करने की चिकचिक कर रहे थे,घोड़े वाले अपनी ही परेशानी में थे… ” ये बारिश बंद नही हुई तो बड़ी मुसीबत हो जाएगी। “

  ” हाँ मैंने भी सुना है मंदाकिनी जो पच्छिम को बहती है उफान पर आ रही है। दद्दा कह रहे थे ऐसे ही पानी बरसात रहा तो पूरब को मुड़ जाएगी , और पूरब को अगर मुड़ी तो ये जो सब गेस्ट हाउस ,होटल बासा सब खोल दिया है ना सब बह जाएगा कसम से! “

” महादेव रक्षा करें!
     हाँ भाई बोलो कित्ते आदमी हो आप लोग । रुपया तो कम नही हो पायेगा। रास्ता देखो न आप उस पर ये बारिश,हम तो सब भीगते भीगते ही चलेंगे न दादा।”

” इतने लोगों को एक साथ लेकर जाने का भी कुछ कम नही करोगे।?”

” चलो ठीक है सौ पचास कम दे देना, बैठते जाओ एक एक पर। हमारे और आदमी भी है यहाँ ।

  सबके बैठते ही घोड़े वाले घोड़े लिए आगे बढ़ने लगे। पहाड़ पर के संकरे रास्ते पर भी घोड़ा खाई की तरफ बढ़ कर ठुमकता हुआ आगे बढ़ रहा था, कुछ को इस यात्रा में आनन्द आ रहा था तो कुछ को डर भी लग रहा था…

” अरे भैया जरा किनारे चलाओ न अपने घोड़े को। ये तो खाई से नीचे गिर पड़ेगा लग रहा है।”

” आराम से बैठिये बहन जी। ये घोड़े यहीं पहाड़ियों पर पैदा हुए हैं , दिन भर में तीन चार चक्कर लगा ही लेते हैं। इन्हें इन रास्तों की आदत है। अच्छा आप सभी लोग अपना अपना घोड़ा पहचान लीजियेगा। मंदिर दर्शन कर निकलेंगे तो पहचान कर बैठ जाइयेगा उतरने के लिए। “

   गौरीकुंड से आगे बढ़ते चलते खच्चर वाले अपनी अपनी सवारियों को केदारनाथ के किस्से भी सुनाए जा रहे थे।
   रास्ते में पड़ने वाले मंदिर दिखाते उसका प्राचीन किस्सा सुनते वो आगे बढ़ रहे थे।
भीम मंदिर पार करने के बाद और आगे बढ़ने पर रामबाड़ा आ चुका था।
   वहाँ घोड़ो को एक किनारे बांध घोड़े वाले आराम करने लगे थे।
   एक छोटी सी दुकान पर वरुण और देव साथ ही बैठे थे। दादी को चाय का गिलास देकर देव वरुण के पास अपनी चाय लिए आ रहा था कि बारिश के कारण वो फिसलने को हुआ लेकिन पास पड़ी टेबल का सहारा लिए वो गिरने से बच गया। लेकिन उसे देखते बैठा वरुण ज़ोर से उसका नाम ले चिल्ला उठा  ” देव बचो!”

  देव आश्चर्य से उसे देखता उस तक चला आया” मैं ठीक हूँ वरुण ! अचानक क्या हुआ? “

” पता नही मुझे ऐसा लगा जैसे इन पथरीली संकरी गलियों में तेज़ी से पानी बहता चला आ रहा है और तुम उसी में गिरने जा रहे हो।।”

” लगातार होती बारिश से डर गए हो लगता है।”

” हाँ दोस्त शायद तुम सही कह रहे। आजकल समझ नही आता, मेरे साथ क्या हो रहा है। अचानक कुछ सेकंड्स को आंखों के सामने एक तस्वीर सी बन जाती है और पलक झपकते में ही गायब हो जाती है।”

” पूर्वाभास तो नही होने लगा है कहीं तुम्हें?”

” क्या पता! “दोनों बातें करते हुए चाय भी पी गए कि उनके घोड़े वाले उन्हें बुलाते चले आये। एक बार फिर वो मनोहारी सफर शुरू हो गया।
     रामबाड़ा  से थोड़ा आगे बढ़ते ही सामने विशाल केदार पर्वत हल्की सी निकली धूप में पल भर को चांदी सा चमक उठा। आसपास उड़ते बादलों के बीच ऊंची चमकती गौर धवल पर्वत श्रृंखला देखने वालों को अभिभूत कर रही थी।
   यूँ लग रहा था प्रकृति अपना सारा सौंदर्य यही उड़ेल चुकी है , एक तरफ बहती दूधिया मंदाकिनी और दूसरी तरफ ऊंचा खड़ा केदार ऐसा अपरूप सौंदर्य था कि किसी की आंखें नही झपक रही थी…

” बस गरुड़ चट्टी से थोड़ा आगे से आप लोगों को पैदल जाना होगा बाबू लोग।
  बारिश की वजह से यहाँ गरुड़ नही दिख रहे वरना तो ऐसा लगता है जैसे छोटे छोटे यान उड़ रहे हों। “

  घोड़े वाले कि बात पर हामी भर सब इधर उधर देखते आगे बढ़ते रहे। घोड़े वाले लड़के चलते हुए आपस में कुछ खुसर पुसुर भी करते चल रहे थे।
   शायद लगातार होती बारिश उन लोगों को अब डराने लगी थी…

  मंदिर से कुछ पहले ही उन्हें उतार वो लोग एक तरफ चले गए। मंदिर के सामने पथरीली सी गली के दोनों ओर छोटे छोटे दुकान वाले बैठे थे, कुछ छोटे होटल भी थे।

   ठाकुर माँ को साथ लिए देव ने उनके लिए पूजा की थाली खरीदी और अंदर बढ़ गया….

  मंदिर के प्रथम भाग में पांचों पांडवों की मूर्ति स्थापित थी। श्रद्धालुओं की पंक्ति दर्शनों के लिए खड़ी थी, उसी पंक्ति में देव और वरुण भी खड़े हो गए। साथ आया पंडा उन सब को मंदिर धाम की कहानी सुनाने लगा..

“कहा जाता है , पांडव यहीं अपना पश्चाताप करने शिव जी के दर्शनार्थ आये थे परंतु शिव जी उन्हें अपने दर्शन देना नही चाहते थे इसलिए वो वृषभ रूप में जानवरों के बीच चले गए…
      तब भीम दो पहाड़ों के बीच अपने पैर फैलाये खड़े हो गए और नकुल को सभी जानवरों को उनके पैरों के मध्य से निकलने को कहा, उन्हें मालूम था भगवान शिव कभी ऐसा नही करेंगे।
  जब शिव ने यह देखा तो वहीं भूमि पर अपना सिर गड़ा कर  धरती मे  समाहित होने लगे. भीम ने जब यह देखा तो दौड़ कर उन्हें पकड़ना चाहा पर तब तक व्रष रूपी शिव की केवल पीठ ही पृथ्वी के उपर बची थी. और वही व्रष के प्रष्ठ भाग को केदारनाथ के नाम से जाना जाता है और उसी रूप मे यहाँ भगवान शिव की पूजा की जाती है….”

   पीछे खड़े एक नवविवाहित जोड़े ने तुरंत अपना मोबाइल निकाला और गर्भ गृह के बाहर से ही विग्रह की तस्वीर लेनी शुरू कर दी..

” अरे आप मोबाइल अंदर लिए कैसे चले आये। बाहर जमा करना था। यहाँ गर्भगृह की फ़ोटो लेना मना है। “

” अरे भाई एक तस्वीर ले लेने से तेरा क्या बिगड़ जाएगा,ये सौ रुपये रख ले, दो चार तस्वीरें ले लेने दे। हमारी शादी को बस पंद्रह दिन हुए हैं , सोचा केदारनाथ दर्शनों के साथ ही अपना वैवाहिक जीवन शुरू करेंगे। “

देव ने पलट कर देखा वो सुंदर शर्मिला सा जोड़ा एक दूसरे का हाथ थामे खड़ा था,बीच बीच में लड़की अपने पंजो पर उचक कर गर्भगृह से अंदर झांकने की कोशिश कर रही थी।

“ओ भाई मेरे हम भी दर्शनों के लिए ही आये हैं। दस साल हो गए थे हमारी शादी को लेकिन संतान नही थी, अब जाकर हुई। इसके पैदा होने के पहले ही मन्नत की थी कि इसके जन्म के साल भर में दर्शनों को जाएंगे। “

  वरुण ने देखा बोलने वाले के पास ही उसकी पत्नी मुस्कुराती हाथ जोड़े खड़ी थी और उसकी गोद में दस ग्यारह महीने का बच्चा शांति से सो रहा था।

  उनके पीछे तीन चार महिलाएं खड़ी थीं …

” बहुत बहुत बधाई हो आपको ,बच्चे के लिए। हम चारों किस मन्नत से आयीं हैं यहाँ वो सुनेंगे तो और खुश हो जाएंगे आप लोग”

लंबी पंक्ति में अपनी पारी का इंतज़ार करते सब आपस में बातें कर रहे थे

” हाँ बताइये न दीदी। “उस आदमी की बात पर वो महिला मुस्कुरा उठी…

” दीदी नही तुम मुझे आंटी भी बुला सकते हो बेटा। तुम्हारी उम्र का बेटा है मेरा। हम चारों सखियां स्कूल के समय की दोस्त हैं। स्कूल के बाद किसी की शादी हो गयी तो कोई आगे पढ़ने चली गयी ऐसे हम चारों बिछड़ गयीं। फिर ये आजकल का डाकिया है ना इसने हमें मिला दिया । अरे वही तुम लोगों का फ्रेंडबुक!
मेरी पोती ने मेरा फ्रेंडबुक पर अकाउंट बनाने के बाद मेरी सहेलियों के नाम पूछ पूछ कर ढूंढना शुरू किया तो एक एक कर  सभी मिल गयीं।
  सभी अपने अपने जीवन में आगे बढ़ गईं थीं। अधिकतर के बच्चों की भी शादी हो चुकी है। किसी के नाती पोते हो चुके तो किसी के होने वाले हैं। ऐसे ही एक दिन बातों बातों में कहीं मिलने का सोचा। पर चारों अलग अलग शहर के थे तो कहाँ मिलते। तब मैंने ही कहा कि चलो एक साथ कहीं घूम कर आतें हैं। सब राजी हो गए। और सबसे सुखद आश्चर्य ये था कि हमारे पतियों ने भी पहली बार हमें घर से अकेले निकलने की सहमति दे दी।
   सब कलकत्ता के आसपास ही थे सो वहीं से एक साथ केदारनाथ निकल आये।”

” वही मैं नोटिस कर रहा था आंटी जी , आप चारों पल भर को चुप नही बैठती थी। लग रहा था जैसे जीवन भर की बातें किये जा रहीं हैं।

  देव की बात पर चारों हँसने लगी। उनके ठीक पीछे दो तीन जोड़े और भी खड़े थे…

” बस हमारा भी कुछ ऐसा ही किस्सा है । हम सब अपने रिटायरमेंट का इंतेज़ार कर रहे थे।हम तीनों दोस्त कम कुलीग साथ ही रिटायर हुए और पत्नीयों को साथ लिए चले आये दर्शनों को।
  घर की ज़िम्मेदारी बच्चों ने उठा ही ली है।”

  सभी को अपनी अपनी बात रखते देख ठाकुर माँ भी अपनी कथा कहने लगीं।

” मुझे तो ये मेरा पोता लेकर आया है दर्शनों के लिए। इस बुढ़ापे में वरना यहाँ तक आना बहुत मुश्किल था। लेकिन ये मेरा पोता हीरा है हीरा। इसके जैसा बेटा पुण्य से मिलता है। ये जिस घर में रहे वहाँ उजाला ही उजाला है…

  ” बस बस ठाकुर माँ। ” देव ने उनकी बात बीच में ही काट दी

”  एबे की होलो!”

” अरे बाकी लोग बोर हो जाएंगे आपके इस पोता पुराण से। “

  सभी हँसने लगे । पंक्ति धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी…

आखिर एक एक कर सभी को गर्भगृह से अंदर प्रवेश करने का मौका मिल ही गया…
      9 फीट लंबा और लगभग 3 फीट चौड़ा विग्रह दर्शन मात्र से ही चमत्कृत कर उठा।
    वरुण पहली बार ऐसे किसी मंदिर में मूर्ति पूजने बैठा था।
  
       शिवलिंग के बाईं ओर बैठा कर पूजा आरंभ की गयी, वहीं मंदिर की दीवार  पर दिव्य ज्योति जल रही थी. पूजा के मध्य उसके दर्शन के लिए कहा  तत्पश्चात  घी को शिवलिंग पर मल कर जल से स्नान करवाया गया और अंत मे पंडित जी ने सबसे कहा, अपना मस्तक शिवलिंग मे लगा लीजिये, आप सभी का कल्याण होगा….

   उसी वक्त बाहर इतने ज़ोर की बिजली कड़की की कुछ क्षणों को मंदिर का गर्भगृह भी बिजली की रोशनी से उजाले से भर गया।
  बाहर तेज़ बादलों की गड़गड़ाहट बढ़ती चली जा रही थी।

  रुक रुक कर तेज़ बिजली चमक रही थी।ऐसा लग रहा था बादलों और बिजलियों में होड़ सी मची थी कि कौन ज्यादा तेजी से लोगों को डरा सकता है।

वहाँ बैठे पंडितो में भी आपस में मौसम को लेकर चर्चा शुरू हो गयी थी।

  “ऐसा लग रहा है महादेव तांडव कर रहें हैं।”

   घी हाथों में लिए शिवलिंग पर चढ़ाते हुए वरुण को सिहरन सी हुई, ऐसा लगा जैसे साक्षात महादेव सामने खड़े हों।
   लेकिन जाने क्यों उसे महादेव कुपित से लगे। ऐसा लग भगवान किसी बात पर रूष्ट हैं। उसने डर कर आंखे खोल दीं।

” माथा टेक लीजिये शिवलिंग पर!”

  वरुण ने जल्दी से अपना माथा टेका और बाहर निकल गया।

  उसके साथ कृष्णमंदिर आश्रम के तीन लड़के और भी थे। बीच बीच में उन सब से भी बातें होती रहती थी।सभी मंदिर ट्रस्ट की किताबें हाथ में लिए अक्सर पढ़ते मिलते लेकिन इस पूरी यात्रा में वरुण ने अब तक एक भी किताब नही पढ़ी थी।

” भैया मंदिर के पीछे शंकराचार्य जी का समाधि स्थल भी है।देखने चलेंगे क्या? “

देव को ठाकुर माँ के साथ बातों में लगा देख वरुण उन लोगों के साथ आगे बढ़ गया…
  
   बारिश इतनी तेज हो चुकी थी कि अब सामने गली के दोनो पार की दुकाने भी नज़र नही आ रही थी। चटपट की तेज ध्वनि ऐसी थी कि साथ खड़ा आदमी क्या बोल रहा सुनाई नही पड़ रहा था।

    वरुण को कृष्णमंदिर ट्रस्ट द्वारा यहाँ तक भेजने का मुख्य
उद्देश्य ही यही था, शंकराचार्य समाधि के दर्शन
  
   शंकराचार्य जी की समाधि मंदिर के पीछे बाईं ओर स्थित थी, यह एक बड़ा सा हाल था, यहाँ शंकराचार्य जी की मूर्ति, उनकी माता की मूर्ति एवं अन्य मूर्तियाँ स्थापित थी।
    सनातन हिन्दू धर्म के संस्थापक श्री श्री आदिगुरु शंकराचार्य के दर्शन पाकर वरुण का मन कुछ पलों को शांत सा हो गया था।
  उसके मन में चलती उथलपुथल को जैसे एक राह मिल गयी थी।
    अब तक यही सोच सोच कर वो परेशान था कि उसे सन्यास लेना चाहिए या नही लेकिन अब यहाँ इस समाधि पर आकर उसे समझ आने लगा था कि उसके जीवन का ध्येय क्या होना चाहिए।
  उसके जीवन का अर्थ क्या है?

  उसने मान लिया था समझ लिया था कि उसका जीवन अब पूरी तरह उसे कृष्ण समर्पित करना था।
वहाँ प्रणाम कर बाहर निकल रहा था कि एक आदमी मंदिर के एक तरफ भीगता सा बैठा था। अपने आप में सिमटा गठरी सा बना वो मैले कुचैले कपड़ों में एक फटा सा झोला रखे बैठा था। उसे देख वरुण को दया आ गयी उसने झुक कर उससे पूछा…” यहाँ भीगते हुए क्यों बैठे हो भाई। ये लो कुछ रुपये रख लो कुछ खा लेना। “

  उसने डबडबायी आंखों से वरुण को देखा और रुपये उससे ले लिए।
   फिर जाने क्या सोच कर उसने वो रुपये वापस कर दिए…

” अब नही चाहिए भाई ये रुपया। मैं सारी उम्र इसी रुपये के पीछे भागता रहा। खूब कमाया और खूब उड़ाया भी। पैसा कमाने में इतना मगन था कि कब पत्नी एक गंभीर रोग से ग्रस्त हो गयी पता भी नही चला। उसे लेकर हर बड़े अस्पताल के चक्कर काटा लेकिन मेरा रुपया किसी काम नही आया।
   पानी की तरह पैसों को बहा कर भी उसे नही बचा पाया।
  उसके मरते ही बेटों ने जायदाद के लिए शोर मचाना शुरू कर दिया। और सगे भाइयों को रुपयों के पीछे लड़ते देख मन वितृष्णा से ऐसा भर गया कि सब कुछ उन चारों के नाम लिख कर घर छोड़ केदारनाथ के लिए निकल गया।
  मन में विश्वास था कि भले एक कौड़ी न हो मेरे पास लेकिन मैं धाम पहुंच कर रहूंगा। और देखो किसी न किसी सहायता से यहाँ तक पहुंच गया। अब यहाँ से मुझे बद्रीनाथ जाना था , उसी के लिए बैठा था कि तुमने रुपये दे दिए। जानता हूँ तुम जैसे और भी आएंगे और मुझे बद्रीनाथ के लिए रुपये दे जाएंगे लेकिन अब लग रहा इससे आगे नही जा पाऊंगा।
  यूँ लग रहा है वो आसमान से हाथ बढ़ा कर मुझे बुला रही है कि बस अब बहुत हुआ संसार का मोह अब आ जाओ।
  वो देखो उस ऊंची पहाड़ी पर शिव नृत्य कर रहे हैं। साक्षात नटराज खड़े हैं वहाँ।
    उनकी एक एक भाव भंगिमा उनकी पदचाप उनके ताल ही तो ये गर्जन पैदा कर रहें हैं।
   इसी गर्जन तर्जन में रम जाने का दिल करता है अब। इस प्रलय में बह जाने का दिल करता है अब।
  अब कहीं नही जाना है मुझे। अब सीधे शिव के धाम ही जाऊंगा ।
   हर हर महादेव!!

  वरुण उसे देखता आगे बढ़ गया..
  वरुण शंकराचार्य मंदिर के लिए धीमे से आगे बढ़ रहा था कि एक बालक भागता हुआ उसके पास चला आया। हाथ से एक ओर बैठे पंडित की ओर इशारा कर उसने वरुण को अपनी बात बता दी…

” भैया वहाँ वो जो पंडित जी बैठे हैं ना उनके पास अपना नाम पता नम्बर दर्ज करवा दीजिये।

” क्यों ?” वरुण के इस सवाल पर वो मुस्कुरा कर जवाब देता उस तेज़ बारिश में सिर्फ अपने दोनो हाथो से खुद को बचाता मंदिर के सामने की गली में उतर कर भाग गया…

” ये ज़रूरी होता है। इससे ये पता चलता है कि आज की तारीख में मंदिर दर्शन के लिए कितने दर्शनार्थी आये और कितने वापस लौट पाए ज़िंदा।”
  वहीं खड़े एक दूसरे पंडा ने जवाब दिया और वरुण उन बही खाता भरते पंडित की तरफ कदम बढ़ाता आगे बढ़ गया…
   अब तक देव भी उसके पास चला आया था..

” देव आज तारीख क्या है? पूरी बताना। “

” आज  16 जून 2013 की तारीख है मेरे भाई। लिखवा दो। अपने साथ ही मेरा नाम भी जुड़वा देना…


क्रमशः

  दिल से ….


    अब तक आपमें से बहुत से पाठक समझ ही चुके हैं कि कहानी किस मोड़ पर मुड़ने वाली है। कहानी के अगले कुछ भाग दिल को दहलाने वाले भी हो सकते हैं। केदारनाथ त्रासदी ने स्तब्ध कर दिया था सभी को। प्रकृति अपना रौद्र रूप ऐसे भी दिखा सकती है किसी ने सोचा नही था।

16 जून 2013 की रात केदारनाथ में भयंकर जल प्रलय आया था और  इस भयानक जल प्रलय ने केदार घाटी की शक्ल ही बदल कर रख दी थी। इस रौद्र प्रलय ने केदारनाथ को मौत की चादर से ढंक दिया और हजारों लाशें नदी में बह गई। इतना ही नहीं कई लोगों का पता भी नहीं चला। … पूरे उत्तराखंड की नदियां किनारे तोड़कर बहने लगी थीं।
   उस दौरान चौराबाड़ी का ग्लेशियर पिघल गया था, चमोली में बादल फटने के साथ ही होती धुंआधार बारिश ने 16 जून की रात भयानक तबाही मचाई थी। मंदाकिनी का जलस्तर इतना ऊंचा बहने लगा था कि पानी मंदिर में भी घुस आया था।
   पूर्वी प्रवाहिका में बहने वाली मंदाकिनी पश्चिमी में भी बहने लगी थी। अपने साथ गांव के गांव बहा ले जाने वाली मंदाकिनी भी केदारनाथ मंदिर का कुछ नही बिगाड़ पायी थी।

  हज़ारों लोग उस पानी में बह गए,लापता लोगों का आज भी कोई पता नही है। तबाही से त्रस्त उत्तराखंड का वो हिस्सा आज भी अपने में भयानक दर्द समेटे है। लेकिन वहाँ फैली तबाही से मंदिर पर लेश मात्र भी असर नही हुआ।

इस आपदा में फंसे लोगों को बचाने के लिए भारतीय सेना को केदारनाथ घाटी के लिए तुरंत भेजा गया था। हमारी सेना के जवानों ने लाखों लोगों को रेस्क्यू किया । लगभग 110000 लोगों को सेना ने जीवित बचा लिया।
    इस दौरान मार्ग में आने वाले काफी सारे घर, होटल और रेस्‍तरा पानी में बह गए।
      लेकिन आठवीं सदी में बने केदारनाथ मंदिर को ज्‍यादा नुकसान नहीं पहुंचा। कई शोध संस्थानों ने ये समझने की कोशिश की कि आखिर इतनी विकराल आपदा में मंदिर कैसे सुरक्षित रहा? इसके पीछे कई कारण दिए गए, जिसमें मंदिर की भौगोलिक स्थिति को सबसे महत्‍वपूर्ण बताया गया।

   लेकिन क्या ये चमत्कार नही था? या थी  उस भोले भंडारी की महिमा जिसके आगे सब नतमस्तक हैं।

*****

  मुझे पढ़ने सराहने के लिए आप सभी का हार्दिक आभार शुक्रिया नवाज़िश!!!

  aparna….

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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