समिधा -23




  समिधा -23



वरुण शंकराचार्य मंदिर के लिए धीमे से आगे बढ़ रहा था कि एक बालक भागता हुआ उसके पास चला आया। हाथ से एक ओर बैठे पंडित की ओर इशारा कर उसने वरुण को अपनी बात बता दी…

” भैया वहाँ वो जो पंडित जी बैठे हैं ना उनके पास अपना नाम पता नम्बर दर्ज करवा दीजिये।

” क्यों ?” वरुण के इस सवाल पर वो मुस्कुरा कर जवाब देता उस तेज़ बारिश में सिर्फ अपने दोनो हाथो से खुद को बचाता मंदिर के सामने की गली में उतर कर भाग गया…

” ये ज़रूरी होता है। इससे ये पता चलता है कि आज की तारीख में मंदिर दर्शन के लिए कितने दर्शनार्थी आये और कितने वापस लौट पाए ज़िंदा।”
  वहीं खड़े एक दूसरे पंडा ने जवाब दिया और वरुण उन बही खाता भरते पंडित की तरफ कदम बढ़ा दिए…
   अब तक देव भी उसके पास चला आया था..

” देव आज तारीख क्या है? पूरी बताना। “

” आज है 16 जून 2013 की तारीख है मेरे भाई। लिखवा दो। अपने साथ ही मेरा नाम भी जुड़वा देना…

    पंडित जी दोनों का नाम लिख रहे थे कि एकाएक मंदिर में भगदड़ मच गई…. लोग अचानक इधर से उधर भागने लगे।
  मंदिर के पट बंद करने का समय नही हुआ था, लेकिन बाहर से भागते हुए आकर किसी ने अंदर गर्भगृह में पूजा करते पंडित जी को आवाज़ दी…

” मंदिर बंद कर निकलिए पंडित जी। जल्दी कीजिये!”

“क्यों हुआ क्या है केशव , बताओ तो सहीं।।”

“मंदाकिनी में बाढ़ आ गयी है। जल्दी से घर पहुंचिए वरना आज रात मंदिर  ही में रुकना पड़ जाएगा….”

  पंडित जी कुछ सोच कर खड़े हो गए, लेकिन फिर उन्होंने एक नज़र शिवलिंग पर डाली और प्रणाम की मुद्रा में हाथ ऊपर उठा दिये…

” प्रभु अभी पट बंद करने का समय हुआ नही है। तो कैसे आपको अकेला छोड़ जाऊँ। आपके शयन के समय ही बस आपको अकेला छोड़ता हूँ। तो मैं अभी आपको छोड़ कर नही जाने वाला।”

  पंडित जी वापस अपनी आसनी पर बैठ गए, और फूलों पत्तियों को जो फर्श पर इधर उधर बिखरी पड़ी थी को समेटने लगे…

  मंदिर परिसर में भागमभाग देख वरुण और देव भी घबरा गए…
  इधर से इधर सबको भागतें देख देव तुरंत बाहर की ओर भागा, बाहर उसकी ठाकुर माँ एक किनारे परेशान बैठी शायद उसी का रास्ता देख रही थीं।
   कई घोड़े खच्चर वाले लोगों को बैठा बैठा कर उतरने लगे थे… लेकिन बारिश ऐसी तेज़ हो चली थी कि बूंदे पीठ पर कोड़ों सी बरस रहीं थीं।
    देव इधर-उधर भागता हुआ ठाकुर मां के डोले वाले को ढूंढने लगा पर वह शायद तेज बारिश देख डोला वहीं छोड़कर नीचे उतर गया था।

   ” यार वरुण डोले वाला तो दिख नही रहा? क्या करूँ? ”

देव और वरुण दोनों परेशान हाल इधर उधर देखते हुए डोले वाले को ढूंढ रहे थे कि शर्मा जी भागतें हुए  चले आए

“जल्दी-जल्दी सभी अपने अपने घोड़ों पर बैठिये और नीचे उतर जाइए । पानी का बहाव इतना तेज है कि कुछ ही देर में मंदिर परिसर पहुंच जाएगा नीचे उतरने के बाद हमें सुरक्षित स्थानों पर भी पहुंचना है..
जल्दी कीजिये सब….

दोपहर बीत रही थी, और बारिश कम होने का नाम नही ले रही थी….

     डोला वाला जब कहीं नही दिखा तब देव ने खुद ही ठाकुर माँ को अपने कंधों पर उठाने की सोची और वापस मंदिर परिसर को दौड़ पड़ा…
  वरुण का दिल देव को छोड़ कर आगे बढ़ने का नही कर रहा था।
   वो शर्मा जी की सहायता करवाता, एक एक कर सभी सहयात्रियों को घोड़ों पर बैठाता जा रहा था।कुछ एक आध खच्चर वाले अपना खच्चर यात्रियों को सौंप कर नीचे भाग चुके थे। पर कई उनमें से बिना यात्रियों का भरोसा तोड़े पूरी तरह से अपने कर्तव्य पालन में जुटे थे।
    एक के पीछे एक यात्रियों का जत्था उतरता जा रहा था।

  जहाँ कुछ देर पहले बारिश से भीगने लोग इधर उधर छिप रहे थे अब उसी बारिश में भीगते सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचने की होड़ में लगे थे।

   मंदिर तक पहुंचने की गली के दोनों ओर बनी दुकानों के शटर पट पट गिरने लगे थे। लोग शटर में ताले घुमाते आजू बाजू वालों से मौसम का हाल समाचार भी लेते जा रहें थे….
  
   ” हुआ क्या है भाई, बारिश तो धुंआ धार होती ही है।”

” अरे भाई जी चमोली में बादल फट गया सुनने में आ रहा है… “

” अरे बाप रे। महादेव रक्षा करना। “

   पत्थरों की बनी सीढ़ियों से सम्भल संभल कर उतरते लोग भागतें चले जा रहे थे।
   मंदिर ज़रा ऊंचाई पर था, और रास्ता नीचे गौरीकुंड उतरने का था। एक दूसरे पर गिरते पड़ते लोग जान बचा कर भागतें चले जा रहे थे…

   देव मंदिर परिसर में ठाकुर माँ को लेने पहुंचा तो देखा वो दीवार से टेक लगाए आंखें बंद किये बैठी मन ही मन जाप कर रही थी। देव ने धीरे से उनके कंधे पर हाथ रखा और उन्होंने आंखें खोल दीं…

” तू आ गया बाबून!”

” तो तुम्हें क्या लगा? तुम्हें अकेला छोड़ जाऊंगा यहाँ।”

” नही ऐसा तो बिल्कुल नही लगा। मैंने सोचा बाकियों की मदद में लग गया होगा तू।

   देव ने हंसते हुए ठाकुर माँ को डोले पर सहारा देकर बैठाया और डोला उठाने ही जा रहा था कि बाहर से एक लड़का घबराया सा भीतर चला आया…

” पंडित जी बंद कर दीजिए मंदिर, बाहर सुरक्षाकर्मी भी अनाउंस करते फिर रहे है कि जल्दी से जल्द ये परिसर खाली कर दीजिए। “

” मैं समय से पहले मंदिर नही बंद करूँगा। “

“यह कैसा हठ है पंडित जी? आप भी जानते हैं ऐसी ज़िद का कोई परिणाम नहीं! इस वक्त अपनी जान की रक्षा करना सबसे महत्वपूर्ण है , मंदाकिनी में जबरदस्त बाढ़ आ चुकी है।  कुछ ही देर में मंदिर तक पानी पहुंच जाएगा जल्दी निकलिये यहां से…”

घबराता हुआ सा आदमी हाथ जोड़े मंदिर के गर्भ गृह के सामने खड़ा पंडित जी को पुकारने लगा पर पंडित जी पहले के समान अपनी जगह पर बैठे हुए मंदिर की सार संभाल में लगे रहे।

” मैं तो साक्षात प्रभु के चरणों में बैठा हूं। अब यहां बैठकर जीवन और मरण का सवाल ही कहां उठता है? अगर प्रभु चाहेंगे तो मुझे अपने बैकुंठ धाम में स्थान दे देंगे, लेकिन अपने जीते जी बिना समय के मंदिर बंद करके अपने प्रभु को छोड़ कर तो नहीं जाऊंगा! अपने प्रभु को अपने जीवन का हिस्सा माना है मैंने अपना पिता माना है मैंने। फिर कैसे इस विपत्ति में उन्हें छोड़कर चला जाऊं? ना मैं उन्हें छोड़ कर जाऊंगा और ना मेरे प्रभु मुझे छोड़कर जाएंगे!  तुम निश्चिंत रहो तुम निकलो!”

  घबराए हुए से उस व्यक्ति ने मंदिर को एक बार प्रणाम किया पंडित जी को और समझाने की कोशिश की लेकिन बारिश बढ़ती देख आखिर वह अपने सिर पर दोनों हाथ रखे पानी से खुद को बचाता गली में उतर गया देव ने भी एक बार मुड़कर मंदिर को प्रणाम किया पंडित जी को प्रणाम किया और ठाकुर माँ के डोले को अपने दोनों कंधों पर लादकर निकल गया।

मंदिर परिसर से नीचे पथरीली गली में देव उतरा ही था कि वरुण भी उसके साथ हो लिया ।

“अरे तुम अब तक यहीं थे तुम गए नहीं?”

“ऐसे कैसे तुम्हें अकेला छोड़ कर चला जाता? अब तो साथ साथ ही दोनों भाई जाएंगे आगे। “

   खच्चर पर बैठे लोगों को लिए खच्चर वाले लगभग उस पहाड़ी ढलान पर दौड़ते चले जा रहे थे ….बारिश के कारण रास्ता चिकना हो गया था. एक तरफ खाई थी दूसरी तरफ पहाड़…
     इंद्र देवता लग रहा था जैसे कुछ ज्यादा ही कुपित हो गए हैं… बरसात होती जा रही थी। रास्ते पर खच्चरों की लीद के कारण रास्ता और भी फिसलन भरा हो गया था। घोड़े पर बैठे लोग बार-बार सामने की तरफ झुकते गिरते जा रहे थे।
   खच्चर पर होती असुविधा से बचने कुछ लोग उतर कर पैदल ही चलने लगे थे।

   नया नवेला जोड़ा भी अपने अपने घोड़ों पर बैठा सवारी कर रहा था , लेकिन लड़की को बहुत असुविधा हो रही थी। बारिश से डरकर और इतनी अफरा-तफरी देखकर वह खुद को संभाल नहीं पा रही थी, उसके आंसू बहते जा रहे थे उसे संभालता समझाता उनका पति आखिर नीचे उतर कर उसके साथ चलने लगा….

” भैया यह सब ड्रामा नहीं चलेगा या तो खच्चर पर बैठकर चलो या फिर पैदल ही जाओ जिससे हम अपना खच्चर लेकर भागते हुए निकले यहां से। आप लोग जितना देरी करेंगे हमारे लिए परेशानी उतनी ही बढ़ जाएगी”

” भाई देख नही रहे कितना घबरा गई है वो। साथ चलूंगा तो उसे ढाँढस बंधा रहेगा। “

  खच्चर वाले ने मुहँ बनाया और तेज़ी से खच्चरों को खींचता आगे बढ़ गया….
   उसके तेज़ी से चलने से वो लड़कीं फिर अपना संतुलन  खोती कभी सामने तो कभी इधर उधर झूला सा झूल जाती। जितना ही उसका संतुलन बिगड़ता वो उतना ही घबरा कर चिल्लाने लगती।

“सुनिए आप भी इसी में मेरे पीछे या सामने बैठ जाइए न, तब मेरा भी संतुलन नही बिगड़ेगा। प्लीज़।

लड़के ने घोड़े वाले कि तरफ देखा…

” सोचना भी मत । ये घोड़ा नही खच्चर है, कहीं नही संभाल पाया और गिर गया तो अभी बारिश में लेने के देने पड़ जाएंगे। “

  उसकी बात सुन खच्चर पर बैठी लड़कीं ने अपने दूसरी ओर बहती नदी को देखा… नदी बिल्कुल अपने उफान पर थी। पहले जहाँ यहीं मंदाकिनी दूध की श्वेत धारा सी लग रही थी, अब पानी मटमैला सा दिखने लगा था।
   समझ नही आ रहा था कि कलकल बहती नदी की आवाज़ ज्यादा तेज थी या आसमान से गिरती बूंदों की।
       नदी इतने उफान पर थी कि अब ऐसा लग रहा था हाथ बढ़ा कर पानी को आसानी से छुआ जा सकता है।

  सब तेज़ी से उतरते जा रहे थे…. की अचानक सामने चल रहा एक खच्चर अपना सन्तुलन खोकर फिसल गया और गिर पड़ा।
   उसमें उन चारों बुज़ुर्ग महिलाओं में से एक बैठी थी। उनके गिरते ही आगे पीछे चल रहे लोगों में भी हाहाकार मच गया। उस महिला को उठाने की कोशिश करते घोड़े वाले को पीछे वाले जल्दी आगे बढ़ने चिल्लाने लगे वहीं उस महिला की सहेलियाँ उसके साथ रुकने अपने घोड़े वाले को कहने लगीं। लेकिन ऐसी अफरातफरी में कौन किसकी सुन पा रहा था। सभी को भागने की जल्दी थी।
   शाम ढलती जा रही थी, पहाड़ों पर सूर्यास्त देर से होने के कारण अभी भी हल्का उजाला था।
    कि उसी वक्त पीछे चल रहा एक घोड़ा बिदक गया और अपने मालिक के हाथ से अपनी लगाम छुड़ाकर सरपट भागता निकला , उसके बिदकने से बाकी के घोड़े भी इधर-उधर होने लग गए। वह गिरी हुई महिला उठ पाती कि उसके पहले ही उसे रौंदकर वह घोड़ा आगे बढ़ गया। कराहती हुई वह जैसे तैसे किनारे हुई थी घोड़े वाला भी अपने घोड़े के पीछे भागता हुआ निकल गया।
     उस घोड़े वाले के जाते ही नए नवेले जोड़े में से जो लड़की घोड़े पर बैठी थी उसने अपने पति को एक बार फिर अपने साथ बैठने के लिए कहना शुरू कर दिया। असल में उसके पति का ही घोड़ा बिदक कर आगे भागा था जिसे पकड़ने के लिए घोड़ा वाला भी चला गया था। अब चूंकि उन दोनों के साथ घोड़ा वाला नहीं था इसलिए वह अपने मन की कर सकते थे अपनी पत्नी की पानी भरी आंखों की गुजारिश देख आखिर उसका पति उसकी बात मान गया ,….
    और जिस खच्चर में उसकी पत्नी बैठी थी उसी खच्चर में खुद भी पीछे सवार हो गया उन दोनों के बैठते ही उस खच्चर का संतुलन एकाएक बिगड़ा लेकिन उसने खुद को संभाल लिया और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।
    बीच बीच में घबरा कर  नदी की तरफ देखती उस औरत की अचानक चीख निकल गयी….
    उसके चीखते ही सब की नज़र उसी ओर उठ गई और सभी के मुहँ से एक हल्की चीख निकल ही गयी। पानी में पेड़ों ठूंठों के साथ ही दो लड़के भी बहते चले जा रहे थे।
     उन्हें बहतें देख सभी ने घबरा कर अपनी चाल तेज़ कर दी….
    घबराहट में घबराती पत्नी को समझाता पति खुद भी अंदर ही अंदर परेशान था लेकिन उससे कहा नही जा रहा था….
    लेकिन उसकी पत्नी का रोना बंद ही नही हो रहा था..

” कोमल घबराओ मत। मैं हूँ न साथ में, फिर क्यों इतना डर। अरे साथ जियें हैं और साथ मरेंगे।।”

” ऐसा मत बोलो धीरज! अब बहुत डर लगने लगा है, हम ज़िंदा वापस लौटेंगे भी या नही।”

“क्यों नही लौटेंगे। मुझ  से प्यार करती हो ना!”

” बहुत ज्यादा।”

” और भरोसा करती हो? “

” खुद से ज्यादा। “

” तो बस आंखें बंद कर लो। मुस्कुराओ और अपना शहर अपना घर अपने लोगों के चेहरे , हमारी शादी की तस्वीरें, हमारे फेरे सोचती रहो।सब अच्छा होगा।

आखिर कोमल के चेहरे पर मुस्कान चली आयी। अपने रिश्तेदारों के चेहरे याद करती अपने फेरे याद करती कोमल मुस्कुरा उठी, उसे पीछे से धीरज ने अपनी बाहों में जकड़ रखा था। उसकी बाहों को खुद में और कस लिया कोमल ने और अचानक उनके खच्चर का पैर फिसला और कोमल और धीरज के साथ वो मंदाकिनी में गिर पड़ा।

  आसपास चलते लोगों के मुहँ से चीखें निकलने लगीं। पानी की धार इतनी तेज थी कि पलक झपकते ही कोमल और धीरज आंखों से ओझल हो गए।
   शर्मा जी के साथ आये सारे लोग घबराए हुए से थे। पर सभी आगे बढ़ते जा रहे थे।

  भागतें हुए जत्थे के जत्थे बीच बीच में हर हर महादेव का जयकारा भी लगाते जा रहे थे। लेकिन अब लोगों का सब्र टूटने लगा था।

  देव कंधो पर ठाकुर माँ को लिए था इसलिए उसकी चाल धीमी हो जा रही थी। पर वरुण उसके कदम से कदम मिलाता चल रहा था। कुछ दूर चलने के बाद वरुण ने देव को मना कर ठाकुर माँ की पालकी अपने कंधों पर उठा ली। वरुण की तबियत के बारे में पता होने से देव उसे ये काम नही करने देना चाहता था लेकिन अपनी दोस्ती की कसम दे वरुण ने दादी माँ को उठा ही लिया।

  काफी सारा उतार दोनो उतर चुके थे कि सामने से पालकी वाला लड़का भागता चला आया…

” माफ कीजियेगा भैया। आप लोगो को मंदिर उतार कर कुछ काम से नीचे चला गया था कि ये आपदा चली आयी। बड़ी मुश्किल से भागता आया हूँ। लाइये माँ जी को मेरे कंधो पर दे दीजिए।”

  उस दुबले से लड़के को देख देव आश्चर्य से भर गया..

” जब तुम एक बार यहाँ से सुरक्षित जगह में पहुंच चुके थे तब फिर वापस आने की क्या ज़रूरत थी? तुम्हारा डोला तो था ही ,हम लोग ले आते दादी को।”

अपने कानों में हाथ लगता वो लड़का एक बार मंदिर की दिशा में हाथ जोड़ वापस उनकी ओर मुड़ गया…

“” ऐसे कैसे अपनी रोजी से दगा कर जाता भैया जी। वैसा करूँगा तो महादेव कभी माफ नही करेंगे। लाइये दीजिये दादी को हमारे कंधे पर। आप लोगो की आदत जो नही है पहाड़ी रास्तों में चलने की ..आप लोगो को वक्त लगेगा, मैं तो पैदा ही पहाड़ों पर हुआ हूँ। अभी दौड़ते भागतें दादी अम्मा को नीचे पहुंचा दूंगा। “

  हंसते हुए वरुण ने दादी को उतार कर उसके हवाले कर दिया..

“भैया आप लोग भागतें हुए निकलिए , मैं इन्हें लेकर आ जाऊंगा…और सुनिए हो सके तो पंजो के बल चलिएगा गिरेंगे नही। ये देखिए ऐसे। “

  उसने अपने पैरों की ओर इशारा किया और दादी को लिए फटाफट आगे बढ़ गया।

     शर्मा जी की टोली के समान ही और भी टोलियां आयी हुई थी। सभी उतरने की हड़बड़ी में थे…. रास्ते में गलियों से कुछ ऊपर को सीढियां चढ़ कर धर्मशालाएं भी बनी थी,जिनमें पहले ही क्षमता से अधिक लोग पनाह ले चुके थे।
  फिर भी होटल बासा और धर्मशाला के मालिक दरवाजों पर खड़े लोगो को अंदर बुलाते जा रहे थे।

   रामगढ़ी के पास पहुंचते हुए लोग अब थक कर चूर होने लगे थे…. वहाँ शर्मा जी ने सभी को एक साथ लेकर एक धर्मशाला में प्रवेश किया तो लेकिन अंदर भीड़ देख सहम कर एक तरफ खड़े रह गए। ऐसा लग रहा था केदारनाथ घूमने आए आधे लोग वहीं चले आये थे।
   किसी तरह जगह बनाते शर्मा जी अपने जत्थे के लोगो को गिनने में लगे थे। पांच लोग कम हो रहे थे ,ये कहते ही सभी की आंखों में सुंदर सा नया नवेला जोड़ा झूल गया। दोनों कहाँ गिरे? कहाँ बहे? पता ही नही चला। डूब गए या कहीं आगे जाकर किनारे लग गए किसी को समझ नही आ रहा था पर हर कोई यही मना रहा था कि वो लोग  जीवित बच जाएं पर ये भी सत्य था कि मंदाकिनी का रौद्र रूप देख चुके वो लोग मन ही मन समझ चुके थे कि उसमें गिर कर बचना मुश्किल ही नही नामुमकिन था।

  पर बार बार सभी को गिनने पर उन लोगो को समझ आया कि देव और वरुण भी वहाँ नही पहुंच पाए थे।

सब के सब घबराए से इधर उधर देख रहे थे, कुछ बुज़ुर्ग महिलाएं एक तरफ दीवार से टिक कर अपने लिए जगह बनाती बैठ गईं थीं….
    बाकी लोग इधर उधर जगह देख रहे थे कि सीढ़ियों पर डोला वाला चला आया, उसने धीमे से दादी माँ को नीचे उतारा और अपने गमछे से अपना चेहरा पोंछने लगा।

    भीड़भाड़ का ये फायदा था कि लोगों को ठंड नही लग रही थी ।
   सुरक्षित स्थान पर पहुंच जाने के कारण लोगों के चेहरों पर राहत नज़र आने लगी थी।
   सब कोई न कोई किनारा पकड़े बैठे या खड़े थे की उनके साथ आयी रिटायरमेंट के बाद वाली टुकड़ी में से दो जोड़े जिन्होंने बाहर अपने जूते उतार रखे थे…
   अपने जूते लेने हॉल से बाहर की तरफ निकल गए, उसी वक्त वरुण और देव भागते हुए से आये और फटाफट सीढियां चढ़ भीतर की ओर हो गए, ठीक वहीं उन लोगों का आमना सामना हो गया..

” अंकल जी इतनी बारिश में बाहर कहाँ निकल रहे।”

” देव बेटा ये हमारी चप्पलें बाहर रह गईं थीं, वही लेने हम चारों बाहर चले आये,बस चप्पल पहन कर…

   उनका आगे का वाक्य पूरा होने से पहले ही पथरीली सीढ़ियां भरभरा के पानी में गिर पड़ीं, और उसी के साथ वो चारों पानी में बहतें डूबते उतराते आंखों से ओझल हो गए।

  देव अचानक से ऐसा होते देख उन्हें बचाने अपना हाथ उन्हें देने झुक ही रह था कि पीछे से वरुण ने उसे खींच लिया।
   देव और वरुण के पीछे हटते ही सीढ़ियों के बाद का वो हिस्सा जिसमें अब तक वो दोनो खड़े थे भी बाढ़ के साथ गिर कर बह चला।

  मौत को इतने करीब से देख कर सब की सांसे थम गयीं थी।
   वही साथी जो कल तक साथ गाते बजाते एक दूसरे का हाथ बटाते जा रहे थे आज एक एक कार साथ छोड़ते जा रहे थे।
   इस यात्रा से पहले किसी ने भी सोचा रहा होगा कि ये उनकी अंतिम यात्रा भी हो सकती है।
  अंदर बैठी औरतें ही क्या आदमी भी रोने लगे थे।

  वरुण की धड़कन बहुत तेज़ चलने लगी थी, ऐसा सब आंखों के सामने देख उसकी सांस उखड़ने लगी थी।
  देव ने उसकी हालत देख उसे एक तरफ जगह बना कर बैठाया और लॉज के मालिक के पास से खोज बीन कर एक टॉवेल लाकर उसे अच्छी तरह से लपेट दिया….

   वरुण खुद को संभालने की कोशिश कर रहा था कि किसी के ज़ोर ज़ोर से रोने चिल्लाने की आवाज़ आने लगी…
  
  “शर्मा जी प्लीज़ देखिए , ये कहाँ रह गए। फ़ोन भी नही लग रहा। गुड़िया भी इन्ही के पास है। मुझे अब घबराहट हो रही।”

  वो औरत इतनी देर से लॉज में ऊपर नीचे हर जगह जाकर शायद अपने पति और बच्चे को ही ढूंढ रही थी। लेकिन इतनी भीड़ में कहीं भी उन दोनों का पता नही चला, परेशान हाल नीचे आकर सबसे पूछती आखिर वो अपना संयम खो बैठी….

“शादी के इतने सालों में बच्चा हुआ और उसे लेकर दोनो मियां बीवी दर्शनों के लिए आये थे, हे भगवान क्या हो गया ये।
   रक्षा करना महादेव !!”

क्रमशः


aparna …..
 

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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