समिधा- 24




   समिधा -24


     वो औरत इतनी देर से लॉज में ऊपर नीचे हर जगह जाकर शायद अपने पति और बच्चे को ही ढूंढ रही थी। लेकिन इतनी भीड़ में कहीं भी उन दोनों का पता नही चला, परेशान हाल नीचे आकर सबसे पूछती आखिर वो अपना संयम खो बैठी….

“शादी के इतने सालों में बच्चा हुआ और उसे लेकर दोनो मियां बीवी दर्शनों के लिए आये थे, हे भगवान क्या हो गया ये।
   रक्षा करना महादेव !!”

   पानी का स्तर लगातार बढ़ता चला जा रहा था जिस हॉल में अब तक लोग खड़े और बैठे थे, वहां पानी भरने लग गया था । धीरे-धीरे हॉल से ऊपर जाने वाली सीढ़ियों में भी पानी आने लग गया था। लोग डर के मारे इधर-उधर हो रहे थे उस हॉल के सामने रोड से जो सीढ़ियां हॉल तक जाती थी वह पहले ही बह चुकी थी। वरुण को देव ने दीवार से लगाकर एक किनारे एक छोटी सी मछिया पर बिठा रखा था, लेकिन जल का बढ़ता स्तर देख वरुण को खड़ा होना पड़ गया था।
     उस धर्मशाला में कुछ देर पहले तक रसोई का काम चल रहा था, इसलिए जैसे तैसे देव ने भागदौड़ कर वहाँ रसोइए की मदद से चाय बनवा ली थी।
   चाय पीने के बाद वरुण थोड़ा ठीक महसूस कर पा रहा था…..

   ” कोई मेरे पति को ढूंढ़ के ले आओ। मैं क्या करूँगी उन दोनों के बिना।”  रो रो कर उसका बुरा हाल था, हिचकियाँ बंध गयीं थीं लेकिन उसके आँसू बहे चले जा रहे थे।
   उसी के क्या वहाँ मौजूद हर एक इंसान की सांसे अटकी पड़ी थी… इस महाप्रलय से कौन ज़िंदा बच पायेगा कौन नही?
  सब घबराए से भगवान का नाम जप रहे थे…

” आप इस तरह घबराएँगी तो उन्हें कैसे ढूंढ पाएंगे। आप सभी धीरज रखिये। पानी जैसे चढ़ रहा है, उतरेगा भी। पानी उतरने के साथ ही हम सभी खोए लोगों को ढूंढना भी शुरू कर लेंगे।”

  देव के समझाने पर कुछ औरतें उस औरत को सहारा देकर एक ओर ले चलीं।
  उसी वक्त एक बड़े से पाटे की सहायता से तैरते हुए उसी औरत का खोया हुआ पति वहाँ तक पहुंच गया…
    सीढियां बह चुकी थीं लेकिन दोनो तरफ लोहे का जंगला लगा था, उसे पकड़ वो बड़ी मुश्किल से ज़मीन पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था कि धर्मशाला के स्टाफ के एक दो लड़कों ने आगे बढ़ उसे पानी से ऊपर खींच लिया….
   उसे देखते ही लगभग बेहोश सी हो चुकी उस महिला में नए प्राण फुंक गए। वो भाग कर अपने पति के सीने से लिपट गयी…
    दोनो रोते ही जा रहे थे कि उस औरत को अपने बच्चे का ख्याल चला आया….
  उसका सवाल समझ कर उसके पति ने अपनी पीठ पर एक दुपट्टे से बांध रखा बच्चा खोल कर सामने गोद में ले लिया। बच्चे को गोद में लेते ही माँ की आंखों से वापस एक बार गंगा जमुना बहने लगी। और आसपास बैठे लोगों में हर्ष की लहर दौड़ गयी…

   कितना अजीब होता है मानव स्वभाव ! अभी कुछ देर पहले जिनसे दूर दूर का भी नाता नही था , अचानक ही कुछ देर पहले उसके दुख से दुखी होने वाले लोग अब उसके सुख से सुखी हो कुछ देर को उस प्रचंड प्रलय को भी भूल बैठे थे…
   हर हर महादेव के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठा था….

  पानी बढ़ते हुए अब लोगों के सीने तक पहुंचने को था। किसी किसी के पैर उखड़ने को हो रहे थे कि देव ने एक आध लोगो की सहायता से बुजुर्गों औरतों और बच्चों को सीढ़ियों से ऊपरी मंजिल पर भेजना शुरू कर दिया।
   ऊपरी मंजिल पर पहले ही बहुत से लोग थे। ये सभी लोग भी घबराए हुए थे अपनी घबराहट को कम करने यह सभी लोग ऊपरी मंजिल के कमरों पर जमीन पर बैठे महादेव का जाप करने में लगे थे। सीढ़ियों पर भी कुछ लोग किनारे किनारे पर खड़े और बैठे थे। देव फटाफट ऊपर चला आया , उसने सभी लोगों से हाथ जोड़ कर विनती शुरू कर दी… कहा कि

“आप लोग अगर जगह बना दें तो नीचे की मंजिल पर जो लोग हैं वह भी ऊपर चले आएंगे!”

इस पर कई लोग देव से वाद-विवाद में लग गए। सभी को इस वक्त सिर्फ अपनी जान की पड़ी थी। बाकियों से किसी को क्या लेना? देव ने सबके सामने हाथ जोड़ दिये…

” आप लोग समझने की कोशिश कीजिए।  आप भगवान के द्वार पर आए हैं। भगवान के दर्शन करने पर भी क्या इतनी इंसानियत भी नहीं जागी कि दूसरों को बचाने के लिए आप लोग थोड़ी सी जगह दे दे। आप सभी जिस ढंग से बैठे हैं उसकी जगह अगर आप सब पंक्तिबद्ध होकर खड़े हो जाए , तो हम ज्यादा से ज्यादा ज्यादा लोग इस मंजिल पर खड़े हो सकेंगे।

देव की बात सुनकर किसी ने जोर से उसकी बात काट दी…

” अगर इसी मंजिल पर सारे लोग आ गए तो यह माला तो इतना बोझ सहन ना कर ढह जाएगा।”

देव ने उसकी तरफ मुस्कुरा कर देखा …

” भैया ढहना हुआ तो लोग नीचे रहें चाहे ऊपर, वैसे ही ढह जाएगा। क्योंकि पानी का बहाव बहुत तेज है… लेकिन अगर सारे लोग ऊपरी मंजिल पर आ गए तो कम से कम कुछ उम्मीद तो बचेगी…”

बहुत देर बहस के बाद आखिर लोग देव की बात मान गए और जो लोग अब तक इधर-उधर फैल कर बैठे थे एक ओर सिमटने लगे। औरतों और बुजुर्गों बच्चों को छोड़कर ज्यादातर आदमी खड़े हो गए, और एक दीवार से सटकर पंक्ति बनाते हुए एक के पीछे एक खड़े होते गए…. देव ने फटाफट जाकर नीचे से बुजुर्गों और बच्चों को ऊपर लाना शुरू कर दिया और सभी को एक एक कर ऊपर ले आया। एक-एक कर उसने पंक्ति में लोगों को खड़ा करना शुरू कर दिया । उसके इस तरह  ढंग से खड़ा करने से जितने भी लोग नीचे मौजूद थे वह सभी ऊपरी मंजिल पर आ गए अब नीचे की मंजिल पर सिर्फ कुछ एक पुरुष ही बचे थे। नीचे का हॉल पानी से पूरी तरह भरने लग गया था । देव ने वरुण को पहले ही सीढ़ियों पर खड़ा कर दिया था।
   उस धर्मशाला का स्टाफ और मैनेजर देव की पूरी तरह से सहायता कर रहा था। हॉल और मैनेजर के ऑफिस केबिन में पूरी तरह पानी भर चुका था। केबिन के सामने रखी लकड़ी की अलमारी की दराज़ इतने सब तूफान में खुल चुकी थी। और उसमें रखे सारे पैसे पानी में बह चुके थे। पानी में इधर से उधर बहते रुपयों की भी उस वक्त किसी को कोई कदर नहीं थी। कहा जाता है  ना, “वक्त सब कुछ दिखा देता है” वही पैसा जिसके लिए इंसान जिंदगी भर मारा मारा फिरता है, उस समय सिर्फ एक कागज का टुकड़ा रह जाता है। जब इंसान को अपने जीवन और उस पैसे में से किसी एक को चुनना हो। आज सभी के लिए अपना जीवन अनमोल था और उन पैसों की कोई कदर नहीं थी। पैसे पानी में बहते हुए आगे चले जा रहे थे और इंसान अपनी अपनी जगह पर स्थिर खड़े उस पैसे को बहते हुए देख रहे थे पानी का स्तर सीढ़ियों पर भी पहुंचने लग गया था।

   धर्मशाला का  स्टाफ और मैनेजर भी अब सीढ़ियों से ऊपर पहुंच गए थे। कई लोगों को देव ने छत पर चले जाने के लिए भी मना लिया था। बारिश जरूर हो रही थी लेकिन नदी में डूब जाने से बेहतर बारिश में भीग जाना ही इस वक्त लोगों को ज्यादा सुरक्षित लग रहा था। बहुत से आदमी छतों पर जाकर खड़े हो गए थे लेकिन इतनी तेज बादल और बिजली में छत पर खड़े होना भी बहुत सुरक्षित नहीं था हॉल का पानी भरते भरते सीढ़ियों तक पहुंच चुका था।
  रात आ अंतिम पहर बीत रहा था….
    जो लोग छत पर खड़े थे उन्होंने अपने सामने ही कई छोटी-बड़ी इमारतों को भी पानी में तिनके के समान बह जाते देखा और डर के मारे उनकी सांस अटक कर रह गई थी। सभी प्रार्थना कर रहे थे कि किसी तरह यह महाप्रलयंकारी बारिश रुक जाए। और उन लोगों का जीवन सुरक्षित बच जाए। छत पर खड़े लोगों ने जीवन की आस बिल्कुल ही छोड़ दी थी। कोई भगवान का नाम जप रहा था तो कोई अपने बुरे कर्मों को याद करके रो रहा था। कोई ऐसा भी था जिसने आज तक अपना कोई सपना पूरा नहीं किया था । वह अपने उन सपनों को याद करके रो रहा था कि आज तक जब समय था तो उसने अपना जीवन सिर्फ कमाई में लगा दिया और अब जब अपने सपनों को पूरा करने की पहली सीढ़ी केदारनाथ दर्शन से शुरू की तो जीवन ही तिनके के समान हो चला था। सभी के आंसू बह रहे थे किसी के पश्चाताप के आंसू थे तो किसी के दुख के, लेकिन इन सबके बीच कोई ऐसा भी था जो पूरी तरह से सुखी और संतोषी दिख रहा था। उसकी भी आंखों से आंसू की बूंदे गिर रही थी लेकिन वो आंसू करुणा के थे प्रेम के थे। उसके होंठ लगातार हर हर महादेव का जाप कर रहे थे। कुछ देर तक छत पर भीगते हुए उसने बाकियों को देखा और अपने दोनों हाथ ऊपर आकाश की तरफ जोड़ दिए..
…. उसी समय वरुण को संभाले हुए देव छत पर पहुंच गया छत पर एक तरफ टिन का छोटा सा शेड बना हुआ था देव ने वरुण को वहीं खड़ा कर दिया।
    और उनकी तरफ बढ़ गया….

” पंडित जी आप बुज़ुर्ग हैं,वहाँ ज़रा सी जगह है जहाँ आप बारिश से बच सकतें हैं। वहाँ आ जाइये। “

  मुस्कुरातें हुए उन्होंने देव को देखा और ऊपर आसमान को देखने लगे…..

” हम तो महादेव के आशीर्वाद में भीग रहें हैं, हमारे जीवन भर की तपस्या के सार्थक होने का समय आ गया है बेटा , पर जाते जाते तुम्हें आशीर्वाद देने का मन कर रहा है। “

  देव उनकी ऐसी अजूबी बातें सुन कर उन्हें देखने लगा…

” ये कैसा महादेव का आशीर्वाद है पंडित जी? ये तो तबाही है, आपके महादेव सबको मारने पर आमादा क्यों हैं? “

  उन्होंने देव को गहरी आंखों से देखा और स्वत: बड़बड़ाते हुए शुरू हो गए….

” जब अंधाधुंध पेड़ों को काटते हो तब तुम लोगों को प्रलय का डर नही लगता। जब सूखी पड़ी नदियों को पानी से भरने का तरीका सोचने की जगह उस पर दस दस मंजिला बिल्डिंग खड़ी कर देते हो तब डर नहीं लगता। जब धर्म के नाम पर एक दूसरे का खून बहा जाते हो तब भी तो डर नही लगता…..
   जब अपने घर की बहू बेटियों को सुरक्षित कर दूसरे के घर की बहू बेटियों की इज्जत तार तार कर जाते हो तब कौन सा डर जाते हो। कहीं दहेज के नाम पर जला देते हो, कहीं छोटी उम्र में माँ बना कर प्राण लील लेते हो।
  इन्हीं सब की आह लगी है…..
उन वृक्षों का करुण क्रंदन, उन नदियों का, उन बच्चियों का, उन मरते लोगों का करुण क्रंदन है ये देव!
   जब पाप का घड़ा छलकता है तब रूद्र ऐसे ही अपना रौद्र रूप दिखाते हैं। उनसे क्षमा मांग लो सभी। अभी भी समय है……

   वो अचानक देव को देख कर शांत हो गए…

“पर इनमें से तूने कोई पाप नही किया, लेकिन सुना तो होगा न गेहूं के साथ घुन भी पिसता है। वही तेरे जैसे कइयों के साथ हो गया है।
   तुझे तो मैं शुरू से मानवता की सेवा ही करते देख रहा हूँ। हे प्रभु ! इसके जैसे लड़कों की तो ज़रूरत हैं संसार में…. फिर क्यों ?
 
“आपके पैर पड़ता हूँ गुरुदेव! भीतर चलिए, यहाँ पानी की तेज धार आपका स्वास्थ्य बिगाड़ सकती है।”

  देव तेज़ बादल बिजली से घबराता उन्हें अंदर ले जाने की ज़िद पर अड़ा था…

” बोलने से नही होगा। पैर पड़ने भी पड़ेंगे।”

  देव को लगा अपनी आंखों के सामने महाप्रलय देख कर उनका दिमाग चल गया है, पर उन्हें उस कोडे बरसाती बारिश से बचाने का कोई और उपाय न देख देव उनके पैरों में झुक गया।
     वो संत वो पंडित उसके सर पर हाथ रखे होंठो ही होंठो में कुछ बुदबुदाते हुए आंखें बंद किये जैसे कुछ क्षणों को किसी दूसरी ही दुनिया में चले गए।
     उसी वक्त देव को अपने साथ शेड में लेकर जाने वरुण चला आया।
  देव ने हाथ पकड़ कर उसे भी नीचे अपने साथ खींच लिया…
     रह रह कर बिजली चमक रही थी। शेड पर खड़े लोग भयभीत थे, वो अपनी आंखों के सामने ये सब कुछ देख रहे थे….

    बंद आंखों से होंठों में कुछ बुदबुदाते हुए उस संत ने एक बार अपने दोनो हाथ ऊपर किये और जोड़ लिए , उसके बाद अपने चेहरे के सामने लाकर दोनो हाथों को आपस में घिसने के साथ ही अपना दांया हाथ नीचे झुके देव के सर पर रख दिया…..

” दीर्घायुष्य भव! चिरंजीवी भव! “

  ऐसा लग रहा था जैसे सिर्फ ये दो छोटे छोटे वाक्य बोलने में भी उन्हें अपनी पूरी ताकत लगानी पड़ी हो। अपने अंदर से उन्होंने अपने प्राण खींच कर ही ये आशीर्वाद दिया हो….
    उन्होंने धीरे से अपनी आंखे खोलीं , उनके सामने देव और वरुण दोनो झुके थे और उनका हाथ वरुण के सर पर था….
   क्षण भर को उनके चेहरे पर विषाद की एक धूमिल सी रेखा आयी और तुरंत ही चली गयी। उन्हें वो दोनो ही लड़के समान रूप से प्रिय थे पर देव के माथे की रेखाओं में जाने क्या देख कर वो उसे अपनी सम्पूर्ण शक्ति को एकत्र कर आशिर्वाद देना चाहते थे। जो पूरी तरह से फल नही पाया था।
     ये सब कुछ पलक झपकते बीत गया। वरुण और देव अपनी जगह पर खड़े हो गए, वो वापस उन्हें अंदर चलने कहते इसके पहले ही लंबे लंबे डग भरते वो छत की मुंडेर पर चले गए और ” हर हर महादेव “का जयकारा लगाते मंदाकिनी में छलांग लगा दी। ..

   उन्हें विस्मय से देखते वरुण और देव भागतें हुए वापस शेड में चले आए……..

  एक के बाद एक ऐसा सब देख वहाँ खड़े सभी स्तब्ध थे।
   नीचे से आने वाला कोलाहल और बढ़ गया था….
नीचे के हॉल में पूरी तरह पानी भर चुका था। ऊपर को जाने वाली सीढियां भी पानी से पटने लगी थीं।
ऊपर के कमरों में बैठे लोगों में हाहाकार मचा था।
  छत पर खड़े लोगों ने आसपास की कई इमारतों को ताश के पत्तों सा ढहते अपनी आंखों से देखा था….
   अब तो आसपास से पानी में बहतें चले जा रहे लोग, पेड़ पौधे, गद्दे चादरें, बैग्स नज़र आ रहे थे।
     वही जगह जो कल तक जीवन का पर्याय नज़र आ रही थी आज मृत्यु का संसार लग रही थी….
सभी ने खुद के जीवन को,स्वयं को महादेव को सौंप दिया था, अब तो जो होगा, जैसा होगा महादेव ही रक्षा करेंगे।

    समय का किसी को होश नही था,सबके मोबाइल या तो पानी में भीग कर और चार्ज न होने से बंद हो चुके थे या फिर बह चुके थे।

   किसी समय ” जान से ज्यादा मोबाइल संभाल कर रखता हूँ “के जुमले फेंकने वाले आज वक्त आने पर जान को ही संभालने में लगे थे, लाख रुपये के मोबाइल कहाँ कैसे स्वाहा हो रहे थे किसी को होश नही था….
   धीरे धीरे सुबह होने लगी थी…..
  कि तभी आकाश में एक उम्मीद की किरण चमकी…

  एक एक कर दो हैलीकॉप्टर उनकी बिल्डिंग के ऊपर से गुज़र कर निकल गए….
  सेना के जवानों की रेस्क्यू टीम आ चुकी थी।
नीचे खड़े लोगों में भी उम्मीद जाग गयी थी… छत पर एक बार फिर पहली मंजिल से भाग कर आते लोगों की भीड़ जमा होने लगी थी.. कि हेलीकॉप्टर से माइक पर एक आवाज़ गूंज उठी…

” आप लोग हड़बड़ी न करें। हम लोग एक एक कर आप सभी को सुरक्षित स्थानों में पहुंचा देंगे। हम रस्सी फेंक रहें हैं एक एक कर आप लोग रस्सी पकड़ कर ऊपर आते जाइये। आप सभी से अनुरोध है पहले बच्चों बुजुर्गों और महिलाओं को भेजिएगा…”

  सेना के जवान की कड़क रौबदार आवाज़ ने कुछ ही देर में वहाँ भी शांति का वतावरण बना दिया। एक एक कर लोग रस्सी की सीढ़ियों की सहायता से चढ़ने लगे…
   ठाकुर माँ को हैलीकॉप्टर में बैठा कर देव ने सुकून की गहरी सान्स ली, लेकिन ठाकुर माँ लगातार उसका नाम पुकारे जा रहीं थीं।
    कई लोग सवार हो चुके थे, और बहुत से अब भी बाकी थे कि वो मज़बूत इमारत जो अब तक अपनी पूरी क्षमता से खड़ी थी भरभराकर गिर गयी। बचे हुए सारे लोग मंदाकिनी में गोता लगा बैठे….
   पानी की तेज धार में बहतें चले जाते लोगो के साथ ही देव और वरुण भी बह गए….

क्रमशः

दिल से ….

   आज कोई खुरापात नही लिख पाऊँगी क्योंकि अंतिम पंक्तियां लिखते हुए मेरी खुद की आंखे भीग गयीं।
   चाहती तो मैं भी हूँ कि सब अच्छा ही हो, और शायद होगा भी।

  इसलिए विश्वास बनाएं रखें।

  देव और वरुण की तकदीर दोनो को कहाँ बहा कर लिए जा रही है? आखिर देव के माथे की लकीरों में उस संत ने क्या देख लिया ?
    वरुण को ये सारा सब पहले ही दिख रहा था तो क्या उसे पूर्वाभास हो रहा था?

माथे की रेखाएं पढना, पूर्वाभास होना! क्या ये सब सच होता है?
  हम अपने अधकचरे ज्ञान के कारण इन सब बातों को मिथ बता जातें हैं और इन्हें चमत्कार का नाम दे जातें हैं पर क्या वास्तविकता यही है।

  असल में तो विज्ञान की अपनी लिमिट्स हैं और हमारे गर्न्थो की या आसपास की जो बातें विज्ञान के दायरे में नही बंध पाती उन्हें हम चमत्कार का दर्जा दे देते हैं।
     लेकिन बहुत बार ये सारी बातें चमत्कार से परे कुछ और हैं।
   जैसे आत्मा का अस्तित्व ….

  अब आप सोचते रहिये की मैंने इतना फ़िज़ूल ज्ञान क्यों दिया? इन बातों का कोई लिंक अगले भाग से है या नही?

   जल्दी ही मिलेंगे अगले भाग में…

 

aparna …..






लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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