समिधा-25

समिधा -25


  ठाकुर माँ को हैलीकॉप्टर में बैठा कर देव ने सुकून की गहरी सान्स ली, लेकिन ठाकुर माँ लगातार उसका नाम पुकारे जा रहीं थीं।
    कई लोग सवार हो चुके थे, और बहुत से अब भी बाकी थे कि वो मज़बूत इमारत जो अब तक अपनी पूरी क्षमता से खड़ी थी भरभराकर गिर गयी। बचे हुए सारे लोग मंदाकिनी में गोता लगा बैठे….
   पानी की तेज धार में बहतें चले जाते लोगो के साथ ही देव और वरुण भी बह गए….

     पानी की तेज धार में डूबते उतराते दोनों कई लोगों के साथ बहे चले जा रहे थे।
  ऐसा नही था कि उन्हें तैरना नही आता था, लेकिन मंदाकिनी ऐसे उफान पर थी कि लग रहा था समस्त संसार को खुद के अंदर आत्मसात कर लेने के बाद ही उसे चैन मिलेगा।
 
   साथ बहे चले जाते लोगों में से कुछ देर पहले ही जो हाथ बढ़ा कर सहायता मांग रहा था , अचानक पानी के मुहँ कान में भर जाने से कब और कहाँ जलसमाधिस्थ हो गया किसी को पता ही नही चल रहा था।
   साथ बहते पेड़ पौधों में अपने जीवनरक्षक ढूंढते वो दोनो बहे चले जा रहे थे कि किनारे पर लगे एक ऊंचे पत्थर का सहारा लिए वरुण वहीं अटक गया… देव का हाथ उसने थाम रखा था इसी से देव को भी खींच कर उसने अपनी तरफ कर लिया।
   उस ऊंचे पत्थर की ओट में वो कुछ देर रुके अपनी सांसों को संयत करने की कोशिश में लगे रहे।

    कुछ तेज़ हवा का प्रभाव था या महादेव खुद उनकी रक्षा करना चाहते थे एक मोटी सी डाली वरुण तक झुकती चली आयी…
   एक हाथ से उस डाली को थामे और दूसरे हाथ में देव को लिए वरुण कैसे उस प्रस्तर शिलाखंड पर चढ़ पाया उसकी भी समझ से परे था।
   उस शिलाखंड के परे थोड़ा ऊपर चट्टाने खड़ी थी…
  उस बड़े पत्थर पर कुछ देर रुक कर उसने अपने जैकेट को खोल देव और खुद को उससे लपेट कर देव को खुद से कस कर बांन्ध लिया।
  
अब तक सबकी मदद को दौड़ता देव अब पस्त हो चुका था।

  उसे अपनी पीठ पर बांन्ध जाने कहाँ की हिम्मत जुटाए वरुण उन सीधी खड़ी चट्टानों पर मजबूती से अपने कदम जमाता ऊपर चढ़ता चला गया…
     तेज बारिश के कारण ऊपर से कुछ पत्थरों चट्टानों के टुकड़े भी नीचे गिर पड़ रहे थे। कुछ वरुण से टकराते तो कुछ देव से टकराते नीचे नदी में गिरते चले जा रहे थे।

    आखिर चढ़ते हुए वरुण एक सुरक्षित जगह पर पहुंच गया। ऊपर पहुंच कर वो देव को भी ऊपर खींच ही रहा था कि, ऊपर से लुढ़कता बड़ा सा चट्टान का टुकड़ा उन दोनों को साथ लिए नीचे लुढ़काता नीचे चला गया…..

   हवा में पत्थरों के साथ बरसते हुए वो दोनों एक आड़ी टेढ़ी सी पथरीली ज़मीन पर गिर पड़े।
   
     दोनों की ही हिम्मत चुकने लगी थी…. पहले तेज़धार का बहता पानी फिर पत्थरों की चोटें…. जगह जगह से खून रिस रहा था।
   वरुण की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। जैसे तैसे खुद को संभालते हुए वो उठा और खुद से कुछ दूर पड़े
  देव की तरफ बढ़ने की कोशिश करने लगा…
      वरुण का शरीर जगह जगह से कटा फटा था। हर तरफ से खून बह रहा था….  उसने इधर-उधर सर घुमा कर देव को देखने की कोशिश की उससे कुछ दूरी पर देव बेहोश सा पड़ा था। देव की तरफ जाने के लिए वरुण जैसे ही उठने को हुआ उसका ध्यान गया, उसके दोनों पैर एक बड़ी सी चट्टान के नीचे कुचले पड़े थे । बहुत मुश्किल से अपने पैरों को खींचकर उसने बाहर निकाला और धीमे से खड़े होने की कोशिश की।
  
    पैरों में चोट इतनी ज्यादा लगी थी कि वह अपनी सारी ताकत लगाने पर भी खड़ा नहीं हो पा रहा था। उसके माथे से गले से जगह-जगह से खून रिस रहा था …
   बहुत मुश्किल से घिसटते हुए वह देव तक पहुंचा कि उसकी नजर वहीं एक तरफ बेहोश पड़े पंडित जी पर पड़ गयी।
   पंडित जी भी उधर एक तरफ हल्की बेहोशी में पड़े थे इसका मतलब नदी में कूदने के बाद भी नदी की धाराओं ने उन्हें किनारे लाकर छोड़ दिया था ….
     बहुत मुश्किल से अपनी शक्ति को संजोए उसने कराहते हुए देव को आवाज दी, लेकिन देव टस से मस नहीं हुआ। लेकिन उसकी आवाज सुनकर पंडित जी को धीरे से होश आने लगा और उन्होंने आंखें खोल दी।

   वरुण और पंडित जी एक दूसरे को देख तो पा रहे थे, लेकिन किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि एक दूसरे तक पहुंच कर एक दूसरे का सहारा बन सके। वहीं देव पेट के बल जमीन पर बेहोश पड़ा हुआ था। बहुत मुश्किल से वरुण खुद को खींचते हुए देव तक पहुंचा उसने देव को जैसे ही सीधा किया उसकी हालत देख वह घबरा गया ।
     देव के पेट में एक बहुत पैनी सी चट्टान बहुत भीतर तक घुसी हुई थी। इसका मतलब साफ था कि देव को काफी अंदरूनी चोटें आई हुई थी। उसके नाक मुहँ  से खून बह रहा था। ज़ाहिर था उसके अंदरूनी अंगों में भी बहुत ज्यादा रक्तस्त्राव हो रहा था, वरुण ने बहुत कष्ट से देव को देखने के बाद पंडित जी की ओर देखा और उसकी आँखों से ऑंसू बहने लगे।

  *****

   
     केदारनाथ में हुई त्रासदी की खबर टीवी और मीडिया चैनलों के कारण घर घर तक पहुंच चुकी थी। जिन- जिन के भी घरों से रिश्तेदार केदारनाथ दर्शन के लिए गए थे, उन सभी की हालत बहुत खराब थी । अधिकतर लोग अपने रिश्तेदारों के नंबरों पर बार बार फोन करके परेशान हो रहे थे । कोई पुलिस में जाकर अपनी रपट दर्ज करवा रहा था, तो कोई उत्तराखंड पर्यटन विभाग से संपर्क कर रहा था। सभी अपनी अपनी तरफ से कोशिशों में लगे हुए थे । आपदा इतनी भयानक थी, और इतनी अचानक घटित हुई थी कि किसी को संभलने का कोई मौका ही नहीं मिला था। जो लोग केदारनाथ दर्शन करके नीचे उतर चुके थे उन्हें भी आगे अपने घरों को जाने से रोक दिया गया था। तबाही का मंजर इतना भयानक हो गया था कि हरिद्वार तक गंगा में बहती हुई लाशें पेड़ पौधे नजर आ रहे थे। भयानक हाहाकार मचा हुआ था ऐसा लग रहा था कलयुग अपने अंत की तैयारी में लग गया है……

     जो कुछ एक लोग केदारनाथ दर्शन करके नीचे गौरीकुंड तक उतर चुके थे, उन्हें हरिद्वार तक आने का मौका मिल चुका था । वह उस सारी आपदा को देखकर इतना घबराए हुए थे कि उनके मुंह से बोल नहीं फूट रहे थे। उन्होंने अपने सामने कई बड़े पेड़ों को जड़ों से उखड़ कर नदियों के साथ बहते देखा था। बड़ी-बड़ी इमारतों को एक क्षण में पानी के साथ जल समाधि लेते देखा था। जाने कितने लोगों को उन्होंने अपने सामने नदी में गिर कर डूबते देखा था। यह ऐसे भयावह दृश्य थे, जो मानस पटल पर सदियों तक अंकित रहने वाले थे । यह इस सदी की ऐसी भयानक त्रासदी थी जो युगों युगों तक याद की जाने वाली थी। जो बच कर आ चुके थे वह बार-बार महादेव का नाम रटते उनके चमत्कार को प्रणाम कर रहे थे। मौत के मुंह से वापस आने वाले लोगों के मुंह पर सिर्फ और सिर्फ महादेव का नाम था कि सिर्फ उन्हीं की कृपा से इन लोगों की जान बच सकी थी। लेकिन जो लोग उस भयानक जल प्रलय में अब भी फंसे हुए थे उनके बारे में सोचकर लोगों की रूहें कांप रही थी।

    *******

    ठाकुर मां के साथ देव के जाने के बाद लगभग रोज ही किसी न किसी वक्त देव की पारो से दो घड़ी ही सही बातें हो जाया  करती थी। लेकिन पंद्रह  तारीख के बाद से पारो और देव की कोई भी बातचीत नहीं हुई थी । आज पूरे दो दिन बीत चुके थे। टीवी पर उस भयानक खबर को देख देखकर पारो का दिल बैठा जा रहा था। उसके आंसू थे कि रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

    उनके घर से बाहर मोहल्ले की कालीबाड़ी में रात दिन पारो घी का दीपक जलाएं बैठी अपने देव की प्रतीक्षा कर रही थी।दो दिन बीत चुके थे, उसके मुंह में अन्न का एक दाना नहीं गया था। भूखी प्यासी मंदिर में बैठे पारो जैसे अपने प्राण त्यागने को तैयार बैठी थी।

      पारो के लिए देव सिर्फ उसका पति नहीं था। देव ने पारो के जीवन की सबसे बड़ी कमी को पूरा किया था। पारो ने बचपन में ही अपने पिता को खो दिया था, उसके बाद वह पुरुष संरक्षण जिस की छत्रछाया में एक लड़की अपने आप को सबसे सुरक्षित पाती है , वह छांव देव के रूप में ही उसे मिली थी ।
   
              पारो के मन में देव के लिए भले ही विपरीत लिंगी आकर्षण अब तक ना जाग पाया हो लेकिन फिर भी उसे देव में अपना सबसे बड़ा संरक्षक नजर आता था । पारो को पूरा विश्वास हो चुका था कि देव की संगत में उसका कुछ भी बुरा नहीं हो सकता। पारो को पूरी तरह से विश्वास था कि देव के साथ ही उसकी जिंदगी सफल थी।
     देव के इस तरह से केदारनाथ घाटी में लापता हो जाने से पारो का शांत जीवन उथल-पुथल भरा हो गया था। उसे अपनी शादी के पूरे साल भर के एक-एक दिन अपनी आंखों के सामने से गुजरते हुए नजर आने लगे थे। उसे बार-बार वह बातें याद आ रही थी जब उसने देव की बातों को अनसुना कर दिया था वह भी अपनी सासू मां के फ़िज़ूल आदेशों के कारण ।

    उसे याद आ रही थी वह शाम जब देव उसके साथ छत पर बैठकर चाय पीना चाहता था, लेकिन सासू मां के बुलाए जाने के कारण वह अपनी चाय वहीं छोड़ सासू मां की सेवा में प्रस्तुत हो गई थी ।
     उसे रह रह के याद आ रही थी वह शाम जब भीगी हुई पारो देव के सामने खड़ी थी और देव उसकी आंखों में पूरी तरह से खो चुका था। उसकी उलझी सी लट को चेहरे से हटाने ही जा रहा था कि दर्शन देव को बुलाने ऊपर चलाया था।
      कितनी सुंदर सी याद थी वो। कितनी कोमलता से वो उसे छूता था जैसे वो खुद कोई गुलाब का फूल हो।
  देव ने उसे उसका खुद का महत्व सीखा दिया था। उसकी हर पसन्द का कितना ख्याल था देव को।
  उसके लिए हर शनिवार वो दुकान से वापसी में मिष्टी दोई लेकर ही आता था।
    देव की हर बात टूट कर याद आ रही थी उसे और हर बात को याद कर और भी ज्यादा टूटती जा रही थी पारो, बिलखती जा रही थी, सिसकती जा रही थी।

    ससुराल में होने के कारण वह किसी से अपने मन की बात भी नहीं कह पा रही थी। उसका एकमात्र अवलंबन उसका पति ही उसके पास नहीं था। उन सब के अलावा लाली ही थी जिससे वह अपने मन की बात कह सकती थी, वह भी इस वक्त अपने ससुराल में थी। हालांकि केदारनाथ की घटना के बारे में जानकारी मिलते ही लाली ने फोन पर बात कर पारो को तसल्ली जरूर दी थी , लेकिन बातों की तसल्ली से मिलने वाला मन अब सच्ची तसल्ली चाहता था। उसके कान घर के दरवाजे पर सारा वक्त लगे हुए थे कि कहीं से भी खबर चली आये कि देव और ठाकुर माँ सकुशल वापस लौट रहे हैं। वह मंदिर में बैठे अपने ख्यालों में गुम सोचती बैठी थी कि दर्शन दौड़ता हुआ वहीं चला आया….

“ओ बउ दी उत्तराखंड पुलिस का फोन आया है अभी अभी।”

दर्शन की बात सुन पारो के कान खड़े हो गए….” क्या हुआ दर्शन क्या फोन आया है?”

ठाकुर मां को और उनके साथ के कई लोगों को मिलिट्री वालों ने बचाकर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचा दिया है। ठाकुर मां की ही तरह जितने लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है, उनके घरों पर फोन करके सूचना भेजी जा रही है कि हम यहां से किसी भी तरह उन्हें लेने दिल्ली तक पहुंच जाए। मैं कल ही  बाबा के साथ निकल रहा हूं।

‘ठाकुर मां को लेने दिल्ली जा रहे हो और तुम्हारे दादा उनके बारे में कोई सूचना?”

“बऊ मां जब ठाकुर मां की सूचना मिल गई तो दादा की भी सूचना मिल ही जाएगी। वैसे भी वो लोग साथ ही तो थे, अब भी साथ होंगे,अब तुम घबराओ मत। चलो घर चलो और घर चल कर कर पानी पी लो।”

पारो के चेहरे पर तसल्ली के भाव चले आए थे उसे लगा जब काली मां ने ठाकुर मां को बचा लिया तो उसके देव को तो जरूर ही बचा लेंगी। वह दर्शन का हाथ थामे घर चली आई।
घर पहुंचते ही दर्शन ने अपनी मां से पानी का गिलास लिया और पारो के मुंह से लगा दिया।
    ठाकुर मां के बारे में जानकारी मिलते ही घर भर के चेहरों पर राहत के भाव नजर आने लग गए थे। सबको यही महसूस हो रहा था कि अगर ठाकुर मां बच गई हैं, तो देव भी सकुशल सुरक्षित वापस लौट ही आएगा।
     सभी के चेहरों पर दो दिन बाद हल्की सी मुस्कान नजर आ रही थी।  लेकिन तब भी दर्शन की मां को दर्शन का इस तरह पारो की फिक्र करना बिल्कुल भी नहीं सुहाया था। अपने आंचल में गांठ सी लगाती वह अगले दिन निकलने वाले दर्शन और उसके पिता की तैयारियां करने भीतर चली गई थी।

पानी पीकर पारो ने हाथ मुंह धोया और जाकर भगवान के सामने एक बार फिर दिया जला दिया

   “भगवान उनकी रक्षा करना। मेरी आत्मा उनकी आत्मा से जुड़ी है हमारे इस आत्मिक प्रेम को डूबने मत देना उन्हें बचा कर वापस ले आना। “

होठों ही होठों में अपनी प्रार्थना बुदबुदाती पारो लगभग बेहोश सी  होकर लुढ़क गई थी, कि तभी उसकी जेठानी वहां चली आई..

”  अरे पारो दो दिन  से कुछ खाया पिया नहीं अब तो कुछ खा ले। ऐसे तो देव बाबू के आते तक तू ही बीमार पड़ जाएगी।”

बड़े लाड से पारो को उठाकर वह अपने साथ अपने कमरे में ले गई और उसके लिए थोड़ा सा खाना एक थाली में निकाल कर ले आयीं।  बार-बार देव की कसम खिलाकर उन्होंने उसे थोड़ा बहुत ही सही खाना खिला ही दिया।

  ******

   टीवी पर आने वाली केदारनाथ त्रासदी की भयानक खबरें देखते सुनते वरुण के माता पिता सन्न रह गए थे । रोली को जैसे ही खबर मिली थी वह भाग कर अपने पति के साथ अपने मां पापा के पास चली आई थी। 2 दिन से उनके घर पर भी चूल्हा नहीं जला था। रोली ही किसी तरह कुछ बना चुना कर अपने माता-पिता को जोर जबरदस्ती कर कुछ  खिला देती थी। 
      अबीर यहां वहां फोन कर बार-बार वरुण के बारे में पता करने की कोशिश में लगा हुआ था। दो से तीन बार उसने पुलिस के चक्कर भी लगा लिए थे लेकिन उसके हाथ कोई सफलता नहीं लगी थी। अबीर और रोली वरुण के माता-पिता को पूरी तरह से संभाले हुए थे । अगर वह दोनों नहीं होते तो जाने उनके माता-पिता का क्या होता ?
     वरुण का फोन 15 तारीख से ही लगातार बंद आ रहा था। उसका फोन बंद आने के पहले भी उसने कोई मैसेज नहीं किया था। आखिर अबीर के दिमाग की घंटी बजी और वह उसी कृष्ण मंदिर की तरफ चल पड़ा जहां से वरुण केदारनाथ के लिए निकला था वहां पर पता करने पर भी उसे कोई खास जानकारी नहीं मिल पाई थी। बस इतना ही पता चला कि जो पांच लड़के आने वाले समय में दीक्षा लेना चाहते हैं, उन्हें पहले केदारनाथ धाम दर्शन के लिए भेजा गया है । उन पांच लड़कों में ही वरुण भी शामिल था ।

     अबीर को यहां आने के बाद यह बहुत बड़ा झटका लगा था कि वरुण संयास लेने वाला था। अब तक रोली के माता-पिता ने अबीर से यह बात छुपाए रखी थी। अबीर ने वापस लौट कर अपनी सारी हिम्मत जुटा कर अपने सास-ससुर को वरुण की दीक्षा वाली बात भी बता दी । वरुण के माता-पिता ने यह सुनकर वरुण की चिट्ठी अबीर की तरफ बढ़ा दी। अबीर आश्चर्य से उस चिट्ठी को हाथ में थामें रह गया उसे समझ नहीं आ रहा था कि वरुण जैसा मोस्ट एलिजिबल बैचलर क्यों अपनी पॉश और लक्सयूरियस जिंदगी को एक किनारे छोड़ कर सन्यास की तरफ आकर्षित हो रहा था?
    परन्तु ये वक्त यह सब सोचकर परेशान होने का नहीं था। अभी उसे सबसे ज्यादा चिंता वरुण की जिंदगी की थी। वह भी रोली और उसके माता-पिता को समझा जरूर रहा था लेकिन अंदर ही अंदर वह भी टीवी पर उस महाप्रलय को देखकर बहुत डरा हुआ था। मन ही मन भगवान से वह भी यही प्रार्थना कर रहा था कि कुछ भी करके वरुण जिंदा वापस लौट आए। वरुण की मां ने उसके गुम होने वाले दिन से ही अपने कान्हा जी के सामने एक दीपक जला रखा था। जिसे वह बुझने नहीं दे रही थी। रात दिन उस मंदिर के सामने बैठे हुए ही उनका वक्त बीत रहा था। 
   जाने कैसी अजीब सी धुन पकड़ रखी थी उन्होंने की उस दीपक को बुझने ही नही दे रही थी। घी कम होते ही और बढ़ा देती, जलते हुए बाती खत्म होने की कगार पर होती तो उसी से जोड़ नई बाती गूंथ देती लेकिन किसी भी हाल में उन्हें उस दीपक को बुझने नही देना था।
    उनकी सनक को देख रोली छिप कर अपने आंसू पोंछ लेती लेकिन माँ को कुछ कहने की उसकी हिम्मत नही होती।

   एक तरफ एक मां का विश्वास लौ के रूप में जल रहा था तो, दूसरी तरफ एक पत्नी की सांसे समय से टक्कर लेती दिख रही थी।

    दोनों ही अपने भगवानों के सामने जुटी हुई थी कि किसी भी तरह उनकी आंखों का तारा उनकी जिंदगी का नूर वापस लौट आए एक तरफ वरुण था एक तरफ देव।
   
    दोनों के ही घरों पर उनकी घर वापसी के लिए तपस्या की जा रही थी और उधर वह दोनों जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे…..

******

   

     वरुण को अपने सामने साक्षात मौत नजर आने लग गई थी अंदर से उसकी तकलीफ इतनी बढ़ती जा रही थी कि अब उसे ठीक से सांस भी नहीं आ रही थी उसने बड़े कष्ट से पंडित जी की ओर देखा और उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम कर दिया ।
   
    देव का सर वरुण की गोद में रखा था, और देव पूरी तरह से बेहोश पड़ा हुआ था उसके पेट से खून की नदी सी बह रही थी । उसे देखता हुआ वरुण भी धीरे से वहीं गिर पड़ा वरुण और देव दोनों के शरीर अगल-बगल पड़े हुए थे।
        पंडित जी उनसे कुछ दूरी पर जमीन पर ही गिरे हुए थे। बड़ी मुश्किल से पंडित जी ने अपनी सारी शक्ति संजोई और एक बार फिर उठ कर बैठ गये। धीरे से बैठे-बैठे ही घसीटते हुए वह देव और वरुण के पास पहुंच गए उन्होंने ऊपर आसमान की तरफ देखा…
     उसी समय तेज बिजली चमकी और ऐसा लगा बिजली की वह चमक उन दोनों के शरीर से प्रवाहित होती कहीं निकल गई लेकिन यह बिजली उनके ऊपर गिरी नहीं थी।

    सिर्फ उस बिजली का प्रवाह था रोशनी की लहर सी थी  जो पंडित जी ने स्वयं देखी थी।  उन्होंने नीचे पलट कर उन दोनों को  देखा।
  
   देव ने धीरे से अपनी आंखें खोल दी उसी वक्त वरुण ने भी आंखें खोली पंडित जी की आंखों से आंसू बह रहे थे ….

  एक दिन पहले तक यही दोनों लड़के पूरी बस को हंसाते खिलखिलाते गुलजार रखे हुए थे , और आज यही युवा लड़के उनके सामने अपने प्राणों को त्यागने जा रहे थे।
     दोनों के शरीर में ऐसा कुछ नहीं बचा था जहां उनके प्राण आसरा पा सके।
गीता में भी कहा गया है …

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानी ग्रहणाती नरोपराणि।

यानी जिस प्रकार वस्त्र जीर्ण शीर्ण होने से हम उन्हें बदलकर नए वस्त्र धारण करते हैं उसी प्रकार हमारी आत्मा भी जीर्ण शीर्ण  शरीर को त्याग कर नया शरीर धारण करती है।

पंडित जी ने वरुण की तरफ देखा वरुण देव से कुछ कहना चाहता था लेकिन बिना कहे ही अचानक उसने आंखें मूंद ली।
पंडित जी ने हड़बड़ा कर उसके सीने पर हाथ रखा वरुण की धड़कन सुनाई देनी बंद हो चुकी थी,    उसके गर्दन पर उंगलियां रखने पर उन्हें रक्त का प्रवाह महसूस नहीं हो रहा था।
   
    बहुत कष्ट से उन्होंने अपनी आंखें मूंद ली उनकी आंखों से दो बूंद आंसू वरुण के ऊपर ढुलक गए।
   उन्हें समझ आ गया था कि वरुण के प्राण उसका शरीर छोड़कर निकल चुके थे…
   उन्होंने धीरे से बड़ी कठिनाई से देव की तरफ देखा देव की भी आंखें बंद थी लेकिन देव की सांसे चल रही थी। पेट में से उसके खून बहता चला जा रहा था नाक मुहँ कोई ऐसी जगह नहीं थी जहां से उसे रक्तस्त्राव नहीं हो रहा था। उसके चेहरे को देख कर ही समझ आ रहा था कि देव इस वक्त बहुत कष्ट में है।
    
  उन्होंने आसमान की तरफ अपने हाथ बढ़ा दिए

” हे प्रभु किसी तरह इसकी आत्मा को बचा लो। इन लड़कों का जीवित रहना बहुत जरूरी है।
मैं बूढ़ा हो चुका हूं। जीवन पूरा हो चुका है मेरा, मेरे प्राण हर लो प्रभु, लेकिन इन दोनों को जीवित रखना।
        हर हर महादेव।”

     एक बार फिर बिजली जोर से कडकी। ऐसा लग रहा था आसमान में रह रह कर पटाखे फूट रहे हैं। बहुत तेज बिजली एक बार फिर उसी तरह से नीचे की तरफ प्रवाहित हुई।
पंडित जी की आंखों के सामने ऐसा लगा वह बिजली आई और देव के शरीर से प्रवाहित होते हुए वरुण की तरफ बह चली…
      एक पल को पंडित जी की आंखें इतनी तेजी से चुँधिया गयीं की झटके से उन्होंने आंखें मूंद ली, लेकिन उस सेकंड के सौंवे हिस्से में आंखें बंद होने से ठीक पहले उन्होंने जो देखा वो आज तक के जीवन में उन्होंने कभी नहीं देखा था।

  उनके रोंगटे खड़े हो गए और वह दृश्य उनकी आंखों में चक्कर लगाता हुआ उनके मस्तिष्क में कोलाहल मचाने लगा।

उन्होंने देखा देव के शरीर से एक ज्योतिपुंज बाहर निकला और अगले ही पल वरुण में  समाहित हो गया।

पंडित जी ने आंखें खोली तब तक वहां सब कुछ शांत हो चुका था सब कुछ थम चुका था। मौत बरसाने वाली बारिश आसमान से कहर बरसाती बिजलियां सब कुछ समय के लिए एकदम शांत हो चुकी थी।
     उनके सामने दो युवा लड़कों की के शरीर पड़े हुए थे बड़ी मुश्किल से उन्होंने देव के शरीर को हाथ लगा कर देखा।  देव का शरीर ठंडा पड़ चुका था उसके नाक पर उंगलियां रखने से उन्हें समझ आ गया कि देव की सांसे बंद हो चुकी थी।
   
    उनके दिमाग में इस वक्त जो चल रहा था वह बहुत कठिन बात थी। अपने आप को समझाते हुए उन्होंने वरुण की तरफ एक बार फिर देखा।
     वरुण की नाक के पास उंगलियां ले जाने पर उन्हें कुछ भी महसूस नहीं हुआ तो इसका मतलब उन्होंने कुछ पलों के पहले जो देखा था वह चमत्कार नहीं उनकी आंखों का धोखा था।
    लेकिन तभी उनकी उंगली में ठहरी पानी की बूंद अचानक से फिसल गई उन्होंने देखा वरुण की सांस चलने लगी थी……..

   लेकिन ऐसा कैसे संभव था उन्होंने स्वयं भली प्रकार जांचा परखा था कि वरुण मर चुका था। तो इसका मतलब कुछ पलों के पहले उन्होंने जो देखा वह सच हो गया था ?
    उनका मन बार-बार जिस बात को मानने की जिद कर रहा था और दिमाग जिस बात को झूठलाने को कह रहा था क्या वह बात सच हो गई थी?

   क्या देव की आत्मा अपने टूटे-फूटे शरीर को छोड़कर वरुण के शरीर में प्रश्रय पा चुकी थी….

   उन्होंने अपनी मुंदी जाति आंखों से एक बार फिर वरुण के चेहरे की तरफ देखा अचानक उनकी आंखें उसके माथे पर केंद्रित हो गई। उसके माथे की रेखाओं को उन्होंने अपने सामने बदलते देखा.. कल तक दोनों लड़कों के माथे की रेखाएं जो आधी आधी किस्मत बयान कर रही थी आज वह रेखाएं एक हो चुकी थी।

   तो इसका मतलब अब शरीर तो वरुण का था लेकिन उसमें आत्मा देव की आ चुकी थी तो यह लड़का आखिर था कौन देव या वरुण?
     या वरुणदेव !

   जय भोलेनाथ तुम्हारी महिमा अपरंपार है यह क्या किया प्रभु तुम आज भी अपने चमत्कार करते हो। तुम्हें दोनों को ही बचाना था लेकिन आत्मा शायद एक की गिरवी पड़ी थी। इसलिए एक की आत्मा छोड़ दी और दूसरे का शरीर छोड़ दिया तुम्हारी लीला तुम ही जानो प्रभु अब मुझे भी बुला लो अपने पास।

   कुछ ही पलों में पंडित जी ने अपनी देह त्याग दी । उस भयानक पथरीली घाटी में जिसकी तीनो तरफ से मंदाकिनी और अलकनंदा का पानी बह रहा था वह तीन शरीर पड़े हुए थे । जाने कब तक वह वैसे ही पड़े रहते हैं लेकिन तभी ऊपर से गुजरते एक हेलीकॉप्टर की नजर उन तीनों शरीरों पर पड़ गई। सेना के जवानों ने सीढ़ी नीचे फेंक कर तुरंत उनकी मदद के लिए तत्परता दिखाई चार जवान फटाफट सीढ़ियां उतर कर उस पथरीली घाटी में उतर गए।
   अपनी तरफ से वो लोग कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते थे उन्होंने अपने देश के प्रति निष्ठा की शपथ जो ली थी। उन्होंने उन लाशों को भी वहां नहीं छोड़ा उन तीनों में से सिर्फ वरुण जीवित था उसे अपने कंधे पर डाल एक जवान सीढ़ियां चढ़ गया उसके पीछे उन बची हुई लाशों को भी कंधों पर उठाए वह जवानों  चढ़ने लगे लेकिन हेलीकॉप्टर का संतुलन बिगड़ता जा रहा था। हवाये फिर तेजी से बहने लगी थी और बारिश एक बार फिर शुरू हो गई थी।
हेलीकॉप्टर को इस तरह हवा में रोके रखना सभी की जान के लिए खतरा था फिर भी वह जवान उन लाशों को लिए ऊपर चढ़ रहे थे हवा में बिगड़ते संतुलन के कारण आखिर वह लोग अपने काम को पूरा नहीं कर पाए और उन लोगों ने उन लाशों को वहीं छोड़ दिया और वापस सीढ़ियां चढ़ हेलीकॉप्टर तक पहुंच गये। वरुण के शरीर को साथ लिए वह हेलीकॉप्टर एक सुरक्षित स्थान की तरफ मुड़ गया…..

   उनके हेलीकॉप्टर में सेना का डॉक्टर भी मौजूद था उसने वरुण की जांच शुरू कर दी। जहां जहां से खून बह रहा था वहां मरहम पट्टी शुरू कर दी गई और सबसे पहले वरुण को ऑक्सीजन का मास्क लगा दिया गया हेलीकॉप्टर उड़ते हुए एक सुरक्षित स्थान पर उतरने की तैयारी करने लगा……

  क्रमश:…

aparna……

  

    
     



    

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

21 विचार “समिधा-25” पर

  1. Aankhon ke same ek ek drishay aate chale ja rahe they jaise go bhayanak manzar raha hoga ki log apno ko apni aankho ke samne matte dekh pa rage hinge unke upper kya beet rahi hogi ..Varun ka young nishpran hona or dev ki aatma ka usme samahit hona be had aashcharyachakit Keane Wala drishye dekhkar panditji bhi ye Sharif cchod bye udhar dono parivaron ka aastha ka diya jisme se ek bujh gya hai..sage na Jane paaro ki kismat mein kya likha hai

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  2. आज तो रोंगटे ही खड़े हो गए पढ़ कर… वहा का त्रासदी वाला माहौल हो या देव और वरुण का वरुणदेव बन जाना ऐसा लगा की कही किसी और जगह पर पहुंच गए है जहा ये सब आंखों के समक्ष ही घटित हो रहा है बहुत ही रोमांचकारी और चमत्कार पूर्ण रहा आज का ये अंश 👌🏻👌🏻

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