समिधा – 3



     समिधा –3



       आमी चिनी गो चिनी तोमारे
               ओगो बिदेशिनी
            तुमि थाको शिन्धु पारे
                ओगो बिदेशिनी….
        आमी चिनी गो चिनी तोमारे…..


    आंगन में रेडियो पर चलती रबिन्द्र संगीत की स्वरलहरी हवा में लहरा लहरा कर अलग ही मधुरता बिखेर रही थी, उसी के साथ सुर मिलाती पारो भी यूनिफार्म पहने अपनी चोटियों में रिबन बांधती स्कूल के लिये तैयार हो रही थी कि हाथ में सूखी मिर्चों से भरा सूप पकड़े पारो की माँ ऊपर चली आयी।
    उनके कमरे के बाहर आती तेज़ धूप में सामने पड़ी चारपाई पर उन्होंने उस सूपे से मिर्चे निकाल कर चादर पर फैलायीं और बरबस ही उनकी नज़र अपनी नकचढ़ी पर चली गयी।
    एक पल को उनकी आंखों में उसके लिए ढेर सारी ममता उमड़ पड़ी … ” आज पारो के पिता जीवित होते तो क्या ऐसी सोने सी लड़की को कहीं भी बहा सकती थी ? वो तो इसे खूब पढ़ाने का सपना अपनी आंखों में पाले ही चले गए, अब उनके पीछे से अकेले ये सब कर पाना उसके तो बस की बात नही थी।
   इतने खराब ज़माने में अकेले लड़की को पढ़ाना लिखाना उसकी अस्मिता से खिलवाड़ जैसा ही तो है।
  कैसी कैसी बातें सुनाई देती हैं आजकल। गांव गंवई में ये हाल है शहरों का तो फिर पूछो ही मत।

   ” काकी माँ कितनी मिर्चे फैलाओगी, चलो नीचे माँ आपको चाय पीने बुला रहीं हैं।”

   अपने में खोई दुर्गा को तारा ने आकर झकझोर दिया और अंदर कमरे में पारो के पास चली गयी

  ” ये क्या पारो आज भी स्कूल जा रही है? “

  “क्यों बऊ दी ? आज स्कूल क्यों नही जाना?”

  ” मेरी प्यारी नँद रानी कल आपको देखने जमाई बाबू आ रहें हैं, अब आज स्कूल जाओगी तो धूप लग के काली ना हो जाओगी।”

  ” तब तो होने दो काली। जो मुझसे नही मेरे रंग से शादी करेगा उससे मैं तो कभी शादी ना करूँ।”

   तारा ज़ोर ज़ोर से हँसती लोटपोट हो गयी…

  ” हाय मैं कहाँ जा मरूं? यहाँ कौन पूछ रहा आपसे की आप शादी करोगी या नही? बस उन लोगो की हाँ हुई और आप श्रीमती पारोमिता देबज्योति टैगोर हो जाओगी। ओ माँ कितनी भोली हो।”

   पारो की भवे तन गयीं , चेहरे से मुस्कान भी उड़ गई लेकिन दिमाग से उसकी भाभी की कही बातें नही उड़ी।
   वो अपनी किताबें समेटे धड़ाधड़ सीढियां उतरती चली गयी।

   नीचे ओसारे में बैठी ठाकुरमाँ भी उसे देख रोकने के लिए आवाज़ देती रह गयी लेकिन बिना किसी की ओर देखे वो स्कूल की ओर निकलती चली गयी।

   वैसे तो हिंदुस्तानी औरतों का सारा प्यार पेट से होकर ही पूरा होता है, त्योहार हो जन्मदिन हो कोई भी सुअवसर इनके लिए बिना कुछ खास पकाए पूरा नही होता और बात बंगाली औरतों की हो तब तो पूछना ही क्या।
     जमाई षष्टी में जमाई को साठ व्यंजन परोसने वाली सास जब पहली बार जमाई घर आने वाला हो तो क्या क्या न परोस देगी।
   अगले दिन कुछ वैसी ही तैयारी पारो के घर चल रही थी। लेकिन इन सब से अलग पारो अपनी तैयारियों में लगी थी।
   लड़के वाले आ चुके थे, नीचे हलचल मची थी। रसोई में काम में लगी दुर्गा ने छोटी बहू को एक बार जाकर पारो को देख आने कहा..
   तारा अपने आँचल में बंधी गांठ हवा में लहराती सीढियां चढ़ ऊपर पहुंच गई।
   कमरे का दरवाजा बंद किये पारो जाने किस काम में सुबह से मगन थी…

   ” अरी ओ नँद रानी, बस भी करो आज ही सारा रूप दिखा डालोगी क्या। ज़रा मैं भी तो देखूँ इतनी देर में कितना संवर गयीं मेरी लाड़ली नंद रानी?”

  ” आप जाओ न बऊ दी ! मैं खुद नीचे आ जाऊंगी।”

  “हाय अकेले नीचे आते लाज नही आएगी। नही नही ऐसे कैसे? मैं बाहर ही रुकी हूँ, आपको साथ लिए ही नीचे जाऊंगी।”

  ” ब्याह के बाद उन्हें ही तो मेरी लाज रखनी है फिर उनसे कैसी लाज ? ”   पारो के जवाब पर तारा फिर एक बार उसे बाहर निकलने के लिए मनाने लगी।

   ” नही नही आप जाओ ना, काम होगा आपको। मैं नीचे पहुंच के बुला लुंगी।”

     काम तो वाकई था तारा के पास, वो अपना आँचल माथे पर समेटती सीढियां उतर गयी…
   नीचे मेहमाननवाजी चल रही थी कि कन्या की पुकार हुई और ऊपर अपने कमरे से पारो नीचे चली आयी।
   उसे आता देख एक पल को घर के सभी लोग चकित रह गए, लाल ढाकाई जामदानी साड़ी में अपना चेहरा घूंघट से ढके पारो नीचे उपस्थित मेहमानों के सामने चली आयी…

  ” ओ माँ ! अरी पारो तूने घूंघट क्यों लिया माथे पर, तू तो घर की बेटी है ना।”

   ठाकुरमाँ के आश्चर्य का ठिकाना नही था, दिन भर इधर से उधर उड़ती फिरने वाली पारो का ये रूप उनके लिए आंठवा आश्चर्य था, यही हाल बाकियों का भी था लेकिन वर पक्ष को ये बात बड़ी रुचिकर लग रही थी, हालांकि पारो के ऐसा करने के पीछे का कारण बस वही जानती थी।

     उसके घूंघट को माथे तक समेटे उसकी बड़ी माँ ने उसे ठाकुर माँ के पास बैठा दिया, इतनी देर में बाकी लोगों का गया हो या न गया हो तारा बउ दी का ध्यान जरूर पारो के रंगरोगन पर चला गया…

   अच्छा तो महारानी जी पाउडर लाली की जगह काजल को हल्का कर चेहरे पर फैला रही थी। पारो ने पूरे चेहरे पर हल्के हाथों से काजल ऐसे लगा लिया था कि उसका रंग उसके वास्तविक रंग से दो तीन स्तर दबा हुआ ही लग रहा था। होशियारी ये की इतना ज़्यादा भी नही लगाया की  माँ और दादी वहीं उसका मुहँ धुलवा कर उसके असली चेहरे से सबका परिचय करवा दें। ।
     पारो के ठीक सामने वो बैठा था जिसे नकली रंग से उलझाने का जाल बिछाए बैठी पारो मन ही मन मुस्कुरा रही थी।

     घर के सभी लोगों को गोरा शर्मिला सा कम बोलने वाला देबज्योति बहुत भा गया था, पारो की माँ ने तो काली मां की मन्नत भी मान ली, “लड़की की शादी होते ही नँगे पैर मंदिर आकर हाथ में कपूर जलाऊंगी।”

    सभी की बातचीत पारो के भी कानों में पड़ रही थी , इसी बीच बाली दा की आवाज़ सुनाई दी…

  ” मैं कह रहा था  अगर देब बाबू पारो से कुछ बात करना चाहे तो पूछ लें।”

  ठाकुर माँ के साथ साथ बाली की माँ की भी भवें चढ़ गई, ब्याह के पहले लड़के को लड़की से क्या पूछना होगा भला, लेकिन बाली आज के ज़माने का लड़का था, घर भर में सभी से ज्यादा पढ़ा लिखा भी , इसी से घर की औरतें उससे ज़रा दबती थीं।
   वैसे इसकी कोई ज़रूरत तो नही है के भावों के साथ बाली दा और तारा के साथ पारो और देबज्योति को छत पर भेज दिया गया।
    टेबल पर चाय के कप रखने के बाद जब तारा भी पारो के पास ही बैठने लगी तो बाली उस पर झुंझला उठा..

  ” अब तुम्हें क्या अलग से समझाऊँ , उन दोनों को भी तो कुछ बात चीत कर लेने दो।”

  हँसती हुई तारा बाली के साथ वहाँ से दूर चली गयी।इतनी देर में पारो ने पहली बार ऑंखे उठा कर उसे देखा , वो मुस्कुराते हुए उसे ही देख रहा था…

  ” क्या हुआ?”

  पारो के बड़ी बड़ी आंखें तरेर कर पूछे सवाल पर उसे ज़ोर की हंसी आ गयी..

  “कुछ नही।!”  

  ” तो ऐसे घूर क्यों रहे हो?”

  “काजल खत्म हो गया था क्या?”

  “क्यों ? “

   “नही वो तुमने बस चेहरे पर लगाया ना मुझे लगा खत्म हो गया इसलिए हाथों पर लगाना भूल गयीं।”

   पारो दांतो से जीभ काट कर रह गयी, वाकई उसका ध्यान ही नही गया था, तभी तो हाथ वैसे ही चिट्टे सामने रखे थे। उसने शरमा कर  आंखें नीचे कर ली

” क्या हो गया ? “

  ना में सर हिला कर वो चुप बैठी रही कि देव ने सामने रखा चाय का प्याला उसकी तरफ बढ़ा दिया…

  ” मैं चाय नही पीती। माँ कहती है बच्चों को चाय नही पीनी चाहिए।”

    देबज्योति की आंखों में करुणा से भरा एक रंग आया और चला गया..

  ” फिर माँ तुम्हारी इतनी जल्दी शादी क्यों कर रही? “

   ” बाबा नही हैं ना! मुझे यहाँ कौन पढ़ायेगा? माँ को लगता है अगर ठाकुर जी चाहेंगे तो कृष्णा मेरे पढ़ने का रास्ता ज़रूर निकाल देंगे।”

  ” तो तुम्हारी माँ को लगता है तुम ससुराल में पढ़ पाओगी? “

  देव का सरल सा प्रश्न पारो को गुदगुदा गया, वो अपनी बड़ी बड़ी आंखों से देव को देखती उससे सवाल कर ही गयी

  ” तो आप नही पढ़ने दोगे मुझे?”

   सवाल इतना मासूम था कि जो उसके बस में नही था उसके लिए भी वो हाँ कर गया..

  ” ज़रूर पढ़ाऊंगा पारोमिता, जितना चाहोगी उतना पढ़ाऊंगा और जब तक चाहोगी तब तक पढ़ाऊंगा , बस एक शर्त है।”

  “हां आप बोलो ना! अब तो मुझे आपकी हर शर्त मंज़ूर है।”

  “शादी के बाद काजल आंखों में आंजना चेहरे पर नही। वैसे मैं तो पहली बार देख कर ही समझ गया था कि चेहरे पर काजल पुता है वरना इतने गोरे हाथों वाली लड़की का चेहरा ऐसा सांवला कैसे?

  “क्यों मैं सांवली होती तो पसन्द नही आती?”

  ” क्यों नही पसंद आती। मुझे तो तब भी पसन्द आती, तुम्हारे गोरे या सांवले होने से या तुम्हारे रंग से मुझे शादी थोड़े ही करनी है। मुझे तो तुमसे शादी करनी है , है ना।”

           पारो को उसका वांछित जवाब मिल चुका था, मुस्कुरा कर पारो ने चाय का प्याला देव की ओर बढ़ा दिया…

****!****

    जे डब्ल्यू मैरियट में बैठे वरुण और उसके परिवार को विधायक जी और उनके परिवार का इंतेज़ार करते आधे घंटे से ज्यादा होने चला था कि एक भीड़ का रेला अंदर रेस्टोरेंट में धंसता चला आया।
    भीड़ को पीछे करते विधायक पांडेय जी अपनी बेटी कादम्बरी के साथ चले आये।
   उनके आते ही वरुण के पिता अपनी जगह पर उनके स्वागत के लिए खड़े हो गए , धीरे से खुद को सम्भालती वरुण की माँ भी अपनी ननन्द का हाथ थामे खड़ी हो गयी। वरुण उठने को था कि पांडेय जी ने उसे रोक दिया…

  ” बैठिए बैठिए, आपको उठने की ज़रूरत नही। पंडित जी देरी से आने के लिए माफी चाहूंगा लेकिन आज कुछ बहुत ही आवश्यक काम में फंस गया था बस इसलिए ज़रा देर हो गयी।”
     हाथों में दो तीन मोबाइल एक सातः संभाले पान गुटके से रंगे दांतो की बत्तीसी चमकाते विधायक महोदय के बैठते ही उनके बाशिंदे इधर उधर छिटक गए।
  अपनी कैफियत देने के बाद पांडेय जी का पूरा ध्यान वरुण पर केंद्रित हो गया। वरुण उन्हें बिल्कुल किसी भूखे के सामने सजा मिठाई का थाल लग रहा था। ऐसा नही था कि विधायक जी सिर्फ वरुण के रूप पर ही रीझे जा रहे थे। उस रात वरुण को एक झलक देखने के बाद उनके गुर्गों ने वरुण की सारी जन्मकुंडली उनके सामने छाप दी थी। हर दुर्व्यसन से दूर यह लड़का आज तक अपनी किताबों से अधिक ना किसी वामा के आंखों के इशारे पढ़ पाया था न किसी के हृदय में अपनी लेखनी ही चला पाया था ।
    अपनी इकलौती कन्या रत्न के लिए इससे सुयोग्य जीवनसाथी मिलना कठिन था।
   पांडेय जी का एक और भी लालच था वो ये की ब्याह के बाद अगर बेटी इसी शहर में रहेगी तो उनका पार्टी कार्यालय भी संभाल लेगी फिर कभी भविष्य में अगर चाहे तो दामाद अपनी पाक साफ छवि से राजनीति में भी उनकी विरासत संभाल लेगा।

    दोनो पक्षों में औपचारिक बातचीत वरुण के फूफा जी ने ही शुरू करवाई … खाने पीने बातचीत में समय का पता ही नही चला…
    वरुण ने इस सब के बीच आंखे उठाकर एक बार कादम्बरी की ओर देखा, कादम्बरी ने उसे खुद को देखता पाकर नज़रे झुका ली।

    बड़े बूढ़ों की बातचीत के बीच वरुण और कादम्बरी को एक दूसरी टेबल पर एक दूसरे के विचार जानने समझने के लिए भेज दिया गया…

     कादम्बरी के  सामने बैठे वरुण को  समझ नही आ रहा था कि बात कैसे शुरू की जाए…

  ” आई बी एम में हैं ना आप? ” बात कादम्बरी ने ही शुरू की, वरुण जैसे नींद से जागा

  ” नही !!! कॉग्निजेंट में हूँ।”

   ” सीटीसी ? आई मीन एनुअल पैकेज? देखिए प्लीज़ माइंड मत कीजियेगा । मैं सच कहूं तो आपकी सैलरी से मुझे कुछ खास फर्क नही पड़ेगा। क्योंकि मैं अपने पापा का काम सम्भालना नही छोडूंगी । शादी के बाद भी नही। “

  “बिल्कुल! मुझे कोई ऑब्जेक्शन भी नही।”

  कादम्बरी मुस्कुरा उठी..

  ” थैंक यू ! लेकिन मैंने आपसे पूछा ही नही की आपको ऑब्जेक्शन है या नही।”

  वो खिलखिला कर हँस पड़ी और वरुण झेंप कर राह गया, सच तो कह रही है शादी के बाद वो काम करेगी या नही ये उसका निर्णय होना चाहिए इसमें मैं कौन होता हूँ रज़ामन्दी देने वाला।

  ” आपसे एक बात पूछूं?”

  ” जी पूछिये !” वरुण के हाँ कहते ही एक पल को कादम्बरी सोच में डूब गई…

  ” डोंट यू ड्रिंक , स्मोक भी नही?”

  वरुण ने ना में सर हिला दिया

  ” विश्वास नही होता। एक इंजीनियरिंग पढ़ा बंदा इस सब से अछूता कैसे रह गया।”

  ” ऐसा नही है कि टेस्ट ही नही की। कॉलेज रैगिंग का तो हिस्सा ही ये है लेकिन मुझे कभी ये सब पसन्द ही नही आया ”

  ” हम्म ” छोटा सा हम्म बोल वो वरुण को देखती बैठी रही…

  “कोई लड़की वडकी का चक्कर भी नही।”

  अबकी बार वरुण को ज़ोर से हंसी आ गयी..

  ” इतनी बड़ी फौज है तुम्हारे पास। मिलने आने से पहले ही पता करवा लेती ना।”

  ” तुम्हें क्या लगता है डैडी बिना पता करवाये ही चले आये, एनिवेज़ मैं कुछ बताना चाहती हूँ।”

  ” हाँ बोलो ना! ”

  ” मैं कभी कभी थोड़ा बहुत ले लेती हूँ। असल में डैड के काम का मुझे बहुत स्ट्रेस हो जाता है इसलिए कभी कभार फ्रेंड्स के साथ, लेकिन अगर तुम्हें पसन्द नही होगा तो …

” तो छोड़ दोगी क्या ?
    वरुण ने बात आधे में ही छोड़ कर कादम्बरी को देखा और वापस बोलने लगा

  ” कादम्बरी जी मुझसे मिलने से पहले तक आपका जो लाइफस्टाइल था मुझसे शादी के बाद आपको उसमें कोई बदलाव लाने की ज़रूरत नही है। मेरी जितनी शक्ति होगी सामर्थ्य होगी उतना आपके लिए करने की कोशिश जरूर करूँगा। लेकिन आज तक अपने किंग साइज़ लाइफ जी है मैं पता नही इतना कर पाऊंगा या नही लेकिन मेरी वजह से कभी आपकी आंखों में कोई ऑंसू नही आने पायेगा । ”

  ” मतलब मैं पसन्द हूँ तुम्हें? “

  कादम्बरी की बात पर वरुण शरमा कर खिड़की से बाहर देखने लगा

   ” अपना फ़ोन दिखाना ज़रा। ” कादम्बरी के मांगते ही वरुण ने उसकी तरफ अपना फ़ोन बढ़ा दिया

   ” हम्म यही उम्मीद थी मुझे , जिस लड़के की लाइफ में कुछ छिपाने को ना हो वो फोन क्यों भला लॉक रखेगा? ”

   कादम्बरी ने उसके फ़ोन से अपना नम्बर डायल किया और फ़ोन वरुण को वापस कर दिया

  ” मेरा नम्बर सेव कर लेना, मैंने भी कर लिया। कल ऑफिस के बाद क्या कर रहे हो? “

  ” कुछ खास नही!”

  “कहीं मिल सकतें हैं? “

  कादम्बरी के सवाल पर वरुण एकाएक कोई जवाब नही दे पाया

  ” कैफे 9 शार्प सेवन पर ।”

  ” ओके !” वरुण के हां कहते ही वो मुस्कुरा कर उठ गई

  ” अब चलतें है वापस वरना सबको लगेगा हमने हनीमून की प्लानिंग भी शुरू कर दी।
   कादम्बरी के पीछे पीछे वरुण भी सबके पास चला आया।
   वहाँ पहुंचने से लेकर पांडेय परिवार से मेल मुलाकात होते तक में ही जाने क्यों वरुण की माँ को अंदर से एक घबराहट सी होने लगी थी।
      उनके इकलौते लड़के का रिश्ता होने जा रहा था, बहुत बड़े परिवार से रिश्ता जुड़ रहा था, लड़की सुंदर नही बहुत सुंदर थी गुण वान थी, लड़की के पिता पैसेवाले थे, उन्हें और उनके परिवार को इस संबंध के स्थिर होते ही भविष्य में कोई कष्ट ना होना था बावजूद अंदर से उन्हें वो खुशी नही हो रही थी जैसी होनी चाहिए थी।
    माँ ने बेटे को एक भर नज़र देखा पहली नज़र में बेटा खुश नजर आया और माँ की घबराहट कुछ हद तक कम हो गयी।
   दोनो ही परिवारों को रिश्ता जम गया , पंडित जी से पूछ कर सबसे निकट की तिथि में सगाई का एलान भी पांडेय जी द्वारा वहीं कर दिया गया…

क्रमशः

aparna…

 
  कुछ दिल से ……

      सबसे पहली बात जो दिल से निकल रही है वो इसी कहानी से जुड़ी है।
    कहानी समिधा का खयाल दिमाग में बहुत समय से उमड़ घुमड़ रहा था लेकिन लिखने के लिए शब्द नही जुड़ पा रहे थे।
    मैंने कही पढ़ा था एक लेखक के शब्द थे” मैं रचनाएं नही रचता रचनाएं मुझे रचती हैं। ”
   अक्षरशः यह बात लेखकों पर सत्य उतरती है। छै महीने से दिमाग में खलबली मचाने के बाद वरुण और पारो ने अब जाकर पन्नों पर आने का मन बनाया है।
   मैं जानती हूँ अभी के दो तीन भागों से कहानी का कोई साफ साफ चित्र आप लोगों को नज़र नही आ रहा। एक तरफ मॉडर्न सोसाइटी का पढ़ा लिखा समंदर सा गंभीर नायक है तो वही दूसरी तरफ गांव की भोली लेकिन दिमाग से तेज़ अल्हड़ चुलबुली नदी सी नायिका है।
     कभी ना कभी ये नदी जाकर तो समंदर में ही मिलेगी…

   आठ सालों के उम्र के अंतर को पार कर आखिर दोनों कब और कैसे मिलेंगे जबकि दोनो के ही बंधन कहीं और बंधने जा रहें हैं।
   क्या लिखा है इनके भाग्यविधाता ने इनकी कुंडलियों में?
   धीरे धीरे सारी बातें खुलती जाएंगी।

 

  aparna…

 

    

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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