समिधा -4



               समिधा –4


    
    देबज्योति के घर पर सभी को लड़की की तस्वीर बहुत पसंद आ गयी थी। देबज्योति के रिश्ते की भाभियां उसे छेड़े जा रहीं थीं।
    आज उनके घर पंडित बुलाया गया था शादी की तारीख तय करने के लिए।

   नियत समय पर पहुंचे पंडित जी अपनी आंखों पर चश्मा चढ़ाये झोली से अपना पोथी पतरा निकाले भावी वर वधु की राशि ग्रहों के आधार पर तिथि निकालने में लगे थे कि देव की माँ ने आगे बढ़ कर कन्या की कुंडली भी सामने खोल कर रख दी….

  “पंडित जी! ये कन्या की कुंडली है उसकी माँ ने उनके घर से चलते वक्त दी थी, ज़रा आप एक नज़र इसे भी …

   पंडित जी के सामने खुली पारो की कुंडली अपना गुणगान स्वयं कर गयी

  ” लड़की अपरूप तेजस्विनी है। सौंदर्य और बुद्धि का अद्भुत संगम है…. कुंडली में सभी भाव सही दिख रहे हैं…. लेकिन…

  पंडित जी कुछ देर को सोच में पड़ गए, माथे पर चली आयी सलवटें उनकी तरफ ताकते लोगों को परेशानी में डाल गयी

  ” क्या हुआ पंडित जी, कोई अशुभ योग दिख रहा क्या?”

  “अशुभ नही कह सकता लेकिन  लड़की का मंगल प्रबल है वो भी सूर्य के साथ , ऐसे जातकों के हाथ में छुरी हमेशा पायी जाती है।”

  देव की दादी उनकी बात सुन हँसने लगी…

  ” एई जो पंडित जी!! बंगाली घर की बहु के हाथ में छुरी ना होगी तो क्या होगा भला”

   पंडित जी मुस्कुरा उठे

   ” सही कहा माता जी! इतने सशक्त मंगल के साथ चौथे घर में विराज मान सूर्य की द्युति जातक को हार्ट सर्जन बनाती है। अब वो तो  यहाँ संभव है नही….. इसका मतलब लड़की अच्छी रसोई बनाएगी। ठाकुर माँ खूब खुश रहेंगी नई बउ माँ से।”

   देव की माँ ने खुश होकर देव की कुंडली भी सामने खोल दी। लेकिन हड़बड़ी में खोलते समय कुंडली उल्टी खुल गयी और पंडित जी शिव शिव करते उसे वापस मोड़ गए…..

   ” आज के लिए क्षमा करो माँ कुंडली एक बार खोल के लपेट दी तो मैं वापस नही खोलता। दोनो की जन्मतिथि और ग्रह गोचर से विवाह मुहूर्त बता दे रहा हूँ।
    तुम्हारे देव की कुंडली फिर बांच लूंगा।

   काश उन्होंने वो कुंडली भी एक बार ही सही बांच ली होती….
 
  उंगलियों पर कुछ जोड़ घटाव कर पंडित जी ने ठीक इक्कीस दिन के बाद का मुहूर्त स्थिर कर दिया।

   ” कन्या की कुंडली तो बांच ही ली है, उसकी राशि पर यह तिथि विवाह या किसी भी शुभ कार्य के लिए अच्छी है।
   कन्या का जीवन विवाह के बाद बिल्कुल बदल जायेगा। ”

  ” कुछ हमारे बेटे के लिए भी तो बताएं आप तो सब कन्या की ही बता रहे।”

  अबकी बार देव की माँ ज़रा झुंझला उठी

  ” अब तो दोनों की गांठ जुड़ने जा रही अब क्या इसका और क्या उसका। लड़की के लिए शुभ है तो लड़के के लिए अशुभ कैसे होगा।
   अब चलता हूँ एक जजमान और हैं जिन्होंने बुलाया है , शहर जाना होगा। उनके भी लड़के की विवाह तिथि ही स्थिर करनी है।
   जल्दी ही आऊंगा तब तुम्हारे देव की कुंडली भी बांच जाऊंगा।”

   पंडित जी कोरी चाय बस पीकर ही अपना ताम झाम समेटे शहर के लिए निकल गए।

  उधर मिश्रा जी के घर उनकी धर्मपत्नी जल्दी जल्दी पूरियां उतारती बार बार बाहर आकर घड़ी पर नज़र मार जाती थीं।
    वरुण की सगाई का मुहूर्त निकलना था , पंडित जी को बुला रखा था इसी से उनके भोजन की तैयारियों में लगी थी कि दरवाज़े की घंटी बजी, और मिश्रा जी पंडित जी को ससम्मान भीतर ले आये।

  चाय पानी के बाद पंडित जी ने ग्रह गणना तिथि मुहूर्त देखे और ठीक इक्कीस दिन बाद कि तिथी वरुण और कादम्बरी की सगाई के लिए उपयुक्त ठहरा दी।
   ये वही तिथि थी जिस पर अभी कुछ देर पहले वो पारोमिता और देबज्योति का विवाह मुहूर्त स्थिर कर आये थे।

   वरुण की माँ का ह्रदय जाने क्यों वैसी प्रसन्नता अनुभव नही कर पा रहा था जैसा की वर की माँ को करना चाहिये।
    अपने हृदय का संशय किससे कहूँ और क्या कहूँ यही विचारती वो पंडित जी के सामने नीचे देखती बैठी थी कि पंडित जी ने पूछ लिया ….

  ” क्या हुआ महाराजिन ? कुछ विचारमग्न हैं?”

   ” पंडित जी बहुत बड़े घर रिश्ता जुड़ रहा है बंटी का, अब ऐसे में ज़रा घबराहट सी लगती ही है! है ना। इतने बड़े महल की लड़की हमारी इस कुटिया में कैसे समाएगी भला।”

   ” जब यही बात मैं कह रहा था तब तो तुम्हें समझ नही आ रही थी। अब लड़की पक्ष से मिलने के बाद सारी बातचीत के बाद ये विचार आने का क्या मतलब।”

  “अरे जी वो सब तो हम भी समझती हैं। हम ये नही कह रही कि शादी तोड़ दो लेकिन ज़रा समय मिल जाता तो कम से कम घर द्वार लड़की के लायक कर लेते।”

  “इस घर में क्या कमी है तुम्हें! गिन के चार जनों का परिवार है उनके लिए तीन तीन बैडरूम हॉल किचन तुम्हे  छोटे लगते हैं तो फिर तो मैं कुछ नही कर सकता। अब अगर उनकी बराबरी करने की सोचोगी तब तो ये जन्म निकल जायेगा।”

  “हम ऐसा कुछ भी नही सोच रही। आप अपना अखबार देखिए ना, क्यों हमारे पीछे पड़े हैं सुबह से । हम तो वैसे भी पंडित जी से बात कर रहें हैं।

   मिश्रा जी को इतना बड़ा रिश्ता शुरू से खटक रहा था, लेकिन उस समय उनकी धर्मपत्नी ने उनकी बातों पर ध्यान नही दिया । लेकिन अब विधायक परिवार से मिलने के बाद और एक औपचारिक मुलाकात में उनके घर हो आने के बाद से उनकी धड़कने बढ़ी हुई थीं।

   पति को एक झिड़की देते ही वो वापस अपने अखबार में डूब गए, उन्हें सुबह की चौथी चाय पकड़ा कर खुद पंडित जी के सामने प्याला रखती वो धीमें से गुनगुना उठी…

  “पंडित जी क्या एक बार कन्या की कुंडली हमारे लाने बांच देंगे आप? बस एक धुकधुकी है कि बंटी से निभा लेगी ना। हमारा बंटी तो साक्षात भोले भंडारी है, भगवान को नही मानता लेकिन हमारी खुशी के लिए हर पूजा पाठ में बैठता है।
    अपने पापा की कितनी सुनता है, आज तक उनसे पूछे बिना कोई काम ना किया छोरे ने। अब आज भी जहाँ लड़के अपनी मर्ज़ी की परकट्टी ढूंढते मर रहे वहीं हमारा ….

  ” अरे बस करोगी! तुम्हें तो बस अपने बच्चों की बड़ाई करने मिल जाये।”

  ” काय तुम्हाये अखबार में कोई काम की खबर ना है क्या? जबसे यहीं कान घुसाए बैठे हो। जब सुनना ही है तो यहीं आ बैठो।”

  ” तुम्हारी फुसफुसाहट भी तो गज़ब तेज़ है, ऐसे बोलोगी की आदमी ना सुनना चाहे तब भी सुन ले।”

   पंडित जी दोनों के झगड़े पर मुस्कुरा उठे

  ” लाइये कन्या की कुंडली दीजिये .”

   वरुण की माँ ने तुरंत कादम्बरी की कुंडली सामने रख दी।
  कुंडली पढ़ते हुए पंडित जी के चेहरे पर कई रंग आये और चले गए

  ” क्या हुआ पंडित जी? कुछ बताइयेगा?”

  “कुंडली तो किसी राजकुमारी की लग रही है महाराजिन! धन ऐश्वर्य नाम क्या नही है इस कुंडली में । लड़की बहुत उन्नति करेगी, विवाहित जीवन भी ठीक दिखा रहा है, शुरुवाती कुछ साल हो सकता है कुछ उलझने आये लेकिन आगे सब मंगल ही मंगल है। संतान योग भी शुभ है।
   इस कुंडली की स्वामिनी राजयोग लेकर पैदा हुई है, इन्हें अपने चौबीसवें और पच्चीसवें साल में कुछ मानसिक कष्ट हो सकता है लेकिन लड़की का छब्बीसवाँ साल उसके लिए बहुत सी खुशियां ले आएगा। और भी कुछ जानना है महारिजन?”

  ” नही नही पंडित जी ! इतना बहुत है। लड़की भी वरुण की ही हमउम्र है । अब शादी ब्याह के बाद दो एक साल तो एक दूजे को जानने समझने में लग जातें हैं।  हो सकता है उसी सब का कलेश पाल बैठेगी पर ये राहत की बात है कि आगे सब मंगल है। ”

  राहत की सांस ले सुशीला पंडित जी की थाली परोसने चली गयी।
   खाना खा कर निवृत्त हुए पंडित जी ज़रा सी सौंफ फांक कर निकलने को हुए की अचानक जैसे कुछ याद आया और सुशीला की ओर घूम गए…

  “महाराजिन अगर अब भी मन में कोई चिंता विचार चल रहा हो तो शनिवार को लड़के के हाथ से छुआ कर सुहाग का सामान मंदिर के बाहर दान कर दो। एक बार मंदिर दर्शन कर लोगी तो राहत लगेगी।”

  “जी पंडित जी ” कहती सुशीला ने पंडित जी को प्रणाम किया और वो निकल गए।

  ******

          सुबह सवेरे अपने सारे काम जल्दी जल्दी निपटाती दुर्गा ने आज बाली से मंदिर जाने के लिए गाड़ी बोल रखी थी।
   आज शनिवार होने से बाली घर पर ही होता था बाकी के पुरुष तो अपने अपने काम पर निकल जाया करते थे लेकिन बाली के ऑफिस की आज छुट्टी हुआ करती थी।
   उसे भी अपने किसी दोस्त से मिलने शहर जाना ही था इसी से वो ही दुर्गा काकी को मंदिर ले जाने वाला था।
     दुर्गा ने एक दिन पहले ही पारो को सुबह तैयार रहने की ताकीद कर दी थी।
  नहा कर आई पारो अपने भीगे बालों को धूप में खड़े होकर झटक झटक कर सूखा रही थी कि तारा कपडों की बाल्टी उठाये ऊपर चली आयी।
   तार पर कपड़े फैलाते हुए वो पारो तंक चली आयी…

  ” हाय हाय इत्ती अच्छी खुशबू आ रही है। कौन सा इत्र फुलेल लगाई बैठी हैं मेरी नँद रानी?”

  पारो मुस्कुराती बाल झटकती खड़ी रही

  ” अरे बोलो ना ?”

  ” कहाँ तारा तुम भी इस पागल लड़की के चक्कर में पड़ रही हो। इत्र फुलेल इसे कहाँ मिलेगा भला? ये रोज़ बगीचे से कभी बकुल कभी चंपा के फूल बिन लाती है और फिर अपने नहाने के पानी में मिला लेती है। ”

  ” ओ माँ जभी मैं कहूँ ये चंपा की महक कहाँ से आ रही? “
   दुर्गा द्वारा खोले राज़ पर तारा की आंखें चमक उठी।
पारो को जल्दी तैयार होने बोल दुर्गा फटाफट साड़ी बदल बाल बांध नीचे चली गयी।

    और तारा वापस पारो के पास खिसक आयी। घर में बाकी जेठानियों की उम्र उससे अधिक होने और सभी के बाल बच्चे होने से सभी अपने में व्यस्त रहती थी , इसी से तारा की सबसे ज्यादा पारो से ही बना करती।

  ” नँद रानी पता है चंपा के फूल की सबसे खराब बात क्या होती है?”

  ना में सर हिला कर पारो बाल काढ़ने लगी

  ” चंपा का फूल इत्ता सुंदर होता है इत्ती मीठी खुशबू होती है फिर भी भंवरे नही आते फूल पर।”

  ” तो ? तो क्या हुआ?”

   ” तो कुछ नही । बस तुम चंपा सी महक रही हो इसीलिए बता दिया कि भंवरों को चंपा की महक पसंद नही आती।”
  

  ” मतलब ?”

  ” मतलब कुछ नही लाड़ो रानी ” कहती तारा पारो के गले से झूल गयी।
   दुर्गा की आवाज़ पर दोनो नंद भौजाई सीढियीं उतरती भागती चली आयीं,लेकिन तभी तारा की सास के पैरों में उनके पुराने वात ने कलाबाजी दिखाई और वो दर्द से कराहती तारा को मालिश करने रोक कर ही मानी।
    तारा के ना जाने से दुखी पारो फीकी सी मुस्कान उसे दे जीप की पिछली सीट पर अपनी माँ के साथ जा बैठी…

  ” पीले रंग में मेरी खुकू बिल्कुल तपे सोने सी दमकती है। ” दुर्गा ने पारो के सर पर हाथ रखा और बाली ने गाड़ी आगे बढ़ा दी…..

   *******

       रोली चाय लिए वरुण के कमरे में आई तो देखा वो कानों में इयरफोन लगाए कुछ सुनता आंखे
बंद किया बैठा था। उसने पास पहुंच कर उसे हिलाया और चाय थमा दी

  ” तूने माँ से पूछा है ना चाय पी सकता हूँ या नही?”

  रोली ने ना में सर हिलाया और कमरे से बाहर चली गयी…

  ” अरे रुक तो !! रोली!!”

  उसके पीछे तेज़ कदमो से वो भी बाहर चला आया। ऊपर सीढ़ियों की रेलिंग से नीचे हॉल में झांकता वो अपनी माँ से चाय पीने के लिए पूछ बैठा…

  “मंदिर जा रहे ना इसलिए मुझे लगा कहीं तुम चाय पीने मना ना करो।”

  ” नही बंटी ! तू चाय पी ले और फिर चल गाड़ी निकाल ले। मैं तैयार हूँ, ये रोली और इसके पापा तो जाएंगे नही। इनका नाश्ता  बना कर रख दिया है। हम वापस आ कर खा लेंगे।”

” ठीक है माँ तो चाय भी आकर ही पी लूंगा।”

कार की चाबी उंगली में घुमाता वो सीढियां उतर गया।

” पीला रंग कितना फबता है ना बंटी पर ?” अपनी आंख की कोर से काजल निकाल सुशीला ने अपने लाडले के कान के पीछे लगा दिया , जिसे हंसी में उड़ाता वरुण बाहर निकल गया।

  ********


   मंदिर में पारो और दुर्गा को उतार कर बाली आधे घंटे में आने की कह कर निकल गया।
   पारो जब तक पैर धोकर इधर उधर के पेड़ों को देखती मंदिर के प्रांगण में इधर उधर घूम बाग कर भीतर पहुंची , दुर्गा अपनी हथेली पर कपूर जलाए माँ की आरती करने में मगन थी।

    पारो ने देखा और तुरंत वहाँ पहुंच माँ की हथेली से जलता कपूर का टुकड़ा नीचे गिरा दिया….

   ” ये क्या कर दिया खुकू? बड़ा अपशकुन कर दिया  तूने। मैंने मानता मानी थी तेरी शादी लगते ही मंदिर में माँ की आरती हाथ मे कपूर जला कर करूँगी। सब बिगाड़ दिया तूने। अब माँ नाराज़ ना हो जाएं?”

  “जिन माँ को प्रसन्न करने अपना हाथ जला रही हो उनकी मूरत तो तुम्हें देख तुम्हारी पीड़ा को महसूस भी नही कर सकती माँ।
    और ये माँ इस बात पर कभी एक बेटी पर नाराज़ नही होंगी की उसने अपनी माँ का हाथ जलने से बचाया, और आगे से ऐसी कोई उल्टी सीधी मन्नत नही मानोगी माँ वचन दो।”

  माँ बेटी दोनो की आंखें भीग गयीं थीं। दुर्गा के मन में संशय था तो पारो के मन मे  पीड़ा

  ” जा मैं नही देतीं कोई वचन ! तेरे से बड़ी पागल मैंने आज तक नही देखी।”

  ” कहाँ से देखोगी? जब कोई मेरी जैसी पागल है ही नही।”
    आरती के थाल पर रखे कलश के पानी से अपनी माँ की हथेली ठंडी करती बेटी और उस पर झींकती माँ की इस अनूठी जोड़ी को कोई बहुत देर से देखता मुस्कुरा रहा था।
      वो आस्तिक तो नही था लेकिन उसे अपनी माँ के विश्वास पर विश्वास था, इसी लिए उनके एक बार कहने पर ही उनके साथ मंदिर चला आया था।
   माँ जहाँ पंडित से उसके नाम की पूजा करवाने में लगी थी ,वो एक किनारे स्टील की रेलिंग से टिक कर खड़ा माँ बेटी की इस अजूबा जोड़ी को देख रहा था कि तभी उसकी माँ उस तक चली आयी , हाथ आगे बढ़ा कर प्रसाद लेता वरुण आरती बिना लिए ही प्रसाद खा बैठा

  ” एक बार आरती तो ले लेता!” 

   ” कोई बात नही माँ तुमने ले ली ना। अब चलो वापस। मुझे और भी काम है।”

   हाथ झाड़ता वो अपनी माँ को लिए बाहर निकल गया।

   इधर पारो की बात सुन पंडित जी ने उसे अपने पास बुला लिया…

  ” ऐसा नही है बेटी की भगवान को अपने भक्तों की पीड़ा देख कष्ट नही होता , वो जब भी किसी भक्त को कष्ट में देखतें है किसी न किसी रूप में आकर उसकी मदद ज़रूर करतें हैं।”

   पारो के माथे पर अगरू चंदन का तिलक कर पंडित जी उसे समझाने लगे

  ” अगर ऐसी बात थी तो माँ का हाथ जलते आपके भगवान कैसे देखते रहे भला? क्यों किसी को नही भेजा?”

  ” भेजा ना ! तुम्हें भेजा। तुम्हारे अंदर माँ के हाथ से कपूर हटाने की इच्छा उसी मुरलीधर ने तो जगाई है।”

   पारो सोच में पड़ गयी और पंडित जी आगे बोलने लगे….

  ” हम पत्थर की मूर्ति इसलिए बना कर पूजते हैं कि इनका एक स्थान सुरक्षित कर सकें जहाँ हम उसकी उपस्थिति महसूस कर आत्मिक शांति पा सकें बाकी तो भगवान हर जगह मौजूद है। तुम मन ही मन चाहे जहाँ स्मरण कर लो।
   भगवान पत्थरो में प्रकट होकर चमत्कार नही करते बेटी वो तो मदद करने किसी भी रूप में चले आते हैं। कभी मनुष्य रूप में तो कभी जानवर कभी आंधी तो कभी हवा के रूप में।
    जब कभी वो अपने प्रिय जनों को दुख में पातें है कोई ना कोई रूप धर उन्हें प्रसन्न करने चले ही आते हैं। बुझली!!!

  हाँ में सर हिलाती पारो ने प्रसाद मुहँ में डाला और पंडित जी की बात सोचती बाहर निकल गयी। दुर्गा वहीं बैठी पंडित जी की बात सुनती रही।

    सीढियां उतरती पारो अब तक उन्हीं विचारों में मगन थी कि मंदिर के बाहर भीख मांगते बच्चों की टोली की हँसने खिलखिलाने की आवाज़ उस तक पहुंच गई….
      ये वही बच्चे थे जिन्हें उसने सुबह मंदिर में प्रवेश के समय तेज़ धूप में इधर से उधर भागती गाडियों के साथ भागते भीख मांगते देखा था। पसीने और धूल मिट्टी से बेहाल उन बच्चों के चेहरे अभी लेकिन प्रसन्नता की फुहार से धुल गए थे।
   उन बच्चों को खिलखिलाते देखती वो भी मुस्कुराती धीमे धीमे उतर रही थी कि उसकी नज़र उन बच्चों को आइसक्रीम पकड़ाते लड़के पर चली गयी।
      लड़के की पीठ उसकी तरफ थी लेकिन पारो को उस पीताम्बर धारी को देखते ही पंडित जी बात ठक से याद आ गयी। रोतो को हंसाने वो मुरलीधर किसी ना किसी रूप में चला ही आता है…..
       कोई उसमें भगवान को भी देख सकती है इस बात से बेखबर  वरुण बच्चों को चॉकलेट और आइसक्रीम दिलवाने में मगन था…..

   क्रमशः

  aparna…..


 

 

  
  
    





    

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

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