समिधा – 6




   समिधा 6


 


      पारो के घर की रौनक देखते ही बन रही थी। कल पारो का ब्याह था , आज पारो के घर बूड़ो भात की रस्म के लिए तरह तरह के व्यंजन बन रहे थे।
   आखिर कुंवारी कन्या का अपने घर का आखिरी भात ( भोजन)  था, इस रस्म के लिए ठाकुर माँ विशेष तौर पर हर वो चीज़ बनवा रही थी जो पारो बड़े चाव से खाया करती थी, हालांकि ये और बात थी कि आज पारो से एक गस्सा भी निगला नही जा रहा था।
    इधर से उधर भागती काम में लगी अपनी माँ को देख उसकी आंखें बार बार भरी जा रहीं थीं।
  अपनी माँ को उसने हमेशा से ऐसे ही काम में डूबे ही देखा था, अब तक तो वो थी उनके पास तो उनकी कुछ मदद हो जाया करती थी लेकिन अब  उसके ससुराल जाने के बाद तो माँ बिल्कुल अकेली रह जाने वाली थी। यही विचार बार बार पारो की पलकें भिगोए जा रहा था…..

   ” क्या हुआ नँद रानी , आज तो बूड़ो भात है जम कर खाओ, तुम तो खाना छोड़ रोने बैठ गईं?”

   तारा का स्नेहिल स्पर्श पाते ही पारो बिलख उठी…

  ” बऊ दी ( भाभी) मेरे पीछे माँ का खयाल रखना , उनका ध्यान रखने वाला यहाँ कोई नही है।”

   एक बेटी के करुण हृदय की पुकार दूसरी बेटी के दिल ने सुन ली। अपने माँ बाबा की याद तारा के मन में भी कसक जगा गयी, पारो को बाहों में थामे वो भी सिसक उठी।

  अपने ब्याह के बाद लड़कियां ऐसी ही भावुक हो जाती हैं कि किसी का भी ब्याह और बिदाई हो उनकी खुद की आंखे अपनी बिदाई याद कर छलक उठती हैं।

    उधर देबज्योति के घर पर भी तैयारियां जोरों पर थीं। दोनो परिवारों के बीच पूर्व अनुष्ठान में आशीर्वाद और आदान प्रदान की रस्में हो चुकी थी। पारो और देबज्योति के कपड़े और गहनों का परस्पर आदान प्रदान हो चुका था।
   देव के घर उसकी भाभियां बहने इधर से उधर भागती फिरती जितना काम नही निपटा रहीं थी उससे कहीं ज्यादा नए नवेले दूल्हे को छेड़ रहीं थी। दूल्हा बाबू बस जिन रस्मों में उनकी उपस्थिति वांछित थी वहीं बैठ रहे थे वरना लजा कर वो किसी न किसी तरह अपनी दीदियों और भाभियों से बचते फिर रहे थे।

     अगले दिन विवाह था , शहर का कोई रंगीन जोड़ा होता तो फ़ोन पर अब तक अपने घर चल रही सारी रस्मों का आंखों देखा वर्णन एक दूजे को सुना चुका होता लेकिन एक तो ये पिछड़ा गांव ऊपर से लजीला दूल्हा चाह कर भी अपनी होने वाली दुल्हन से बात नही कर पा रहा था।
   देव को पारो पहली नज़र में ही बहुत भा गयी थी। उस दिन के बाद उसने कई बार सोचा भी की एक बार पारो के घर जाकर उससे मिल लिया जाए लेकिन संकोच वश नही जा पाया।
   उसकी दुकान में जब तब आकर बैठने वाली उसकी मित्र मंडली के समझाने पर की एक नया फोन खरीद कर अपनी होने वाली दुल्हन को दे दो फिर देखो मज़े। रात दिन बस प्यार भरी बातों में डूबे रहना, वीडियो कॉलिंग पर तो एक दूजे को देखते हुए भी  बात की जा सकती है।
   उपाय बढ़िया तो लगा लेकिन देबज्योति का हद से ज्यादा संकोची स्वभाव यहाँ भी चूक ही गया। फ़ोन तो उसने बड़ा बढ़िया महंगा सा खरीद लिया लेकिन पारो को शादी के दिन तक देने की हिम्मत नही कर पाया।
      आखिर एक करीबी दोस्त के कहने पर की पहली रात में भी तो कोई तोहफ़ा देना ही होता है यही मोबाइल दे देना पर अमल करते हुए देव उस फोन को कलेजे से लगाये ही रह गया।


********

    सगाई से एक दिन पहले विधायक जी का फ़ोन आने से वरुण के घर मे भगदड़ सी मच गई। फ़ोन रोली ने उठाया और अपने पिता को ले जाकर दे दिया।
  पानी का घूंट भर गले को यथासंभव सुकोमल कर वरुण के पिता ने विधायक जी को नमस्कार किया।
विधायक जी भी जितनी विनम्रता घोल सकते थे उतना विनम्र होकर बात करते रहे।
       उनके अनुसार सगाई के कपड़ों और गहनों की खरीदी वो लड़के की पसन्द से करना चाहतें हैं इसलिए फला दुकान पर फला समय पर आपकी उपस्थित प्रार्थनीय है कह कर विधायक जी ने उसी विनम्रता से फोन रख दिया।
      आपको आने में असुविधा तो नही होगी? क्या आप इस समय पर वहाँ आ पाएंगे? जैसी बिना मतलब की कर्टसी दिखाने का विधायक जी के पास समय  भी कहाँ था?
   अपने मतलब की बातें कहना यानी एक तरह से अपना आदेश थोप कर उसके पालन के लिए सामने वाले को कटिबद्ध रहना है ये अपनी बातों से जताकर विधायक जी ने फ़ोन रख दिया था।
    वरुण की माँ ने वरुण को बुलाने रोली को ऊपर भेज दिया, और खुद पानी लाकर वरुण के पिता के हाथ में पकड़ा दिया..

   ” क्या हुआ माँ ? आपने बुलाया?”

  ” हाँ बेटा विधायक जी के घर से फोन था।  शाम चार बजे के आसपास तुम्हें लेने उनकी गाड़ी आएगी। वो कल सगाई में पहनने वाले कपड़े तुम्हें दिलवाना चाहतें हैं।”

  ” अरे लेकिन कल के लिए कपड़े तो आप पहले ही रोली के साथ जाकर खरीद लाईं हैं ना?”

  ” हाँ बेटा लेकिन अब अगर उनका मन है तो मना कैसे करें?”

  ” अरे ये क्या बात हुई भला? उन्हें जो भी देना है अपनी पसंद का खरीद कर कल वहीं दे दे। हमारी तो सारी शॉपिंग हो चुकी है । रोली का कितना मन था कि हम चारों एक से रंग के कपड़े पहने वो बेचारी पिछले एक हफ्ते से इन्हीं तैयारियों में लगी है और अब आज सगाई के एक दिन पहले वो चाहतें हैं मैं कल पहनने वाले कपड़े आज खरीद लाऊं। हद है!”

“नही बेटा वो शायद ये भी चाहते होंगे कि उनकी बेटी को भी हम उसी की चॉइस के कपडे ज़ेवर दिलवा दें इसलिए बात मान तू चार बजे उनके साथ चले जाना। अब देख आज तो तेरी छुट्टी भी है ना , दिन भर घर पड़े पड़े भी क्या करेगा फ्रीफ़ायर खेलता बैठेगा और क्या?”

  ” माँ तुम भी ना! अभी से उन लोगों को इतना सर पर मत चढ़ाओ”

  “ऐसा नही बोलते बंटी! तेरा रिश्ता जुड़ रहा है आखिर , चल जा जल्दी से तैयार हो जा।”

   मन मार कर वरुण तैयार होने चला गया, कुछ देर बाद एक बड़ी सी गाड़ी उनके घर के पोर्च पर आ रुकी।
    वरुण को बुलाने आये ड्राइवर के साथ वरुण बाहर निकल गया।
   गाड़ी में पीछे का दरवाजा खोलते ही उसे कादम्बरी बैठी दिख गयी…

” अरे तुम? तुम अंदर क्यों नही आई?”

  “अभी थोड़ा जल्दबाजी भी है वरुण इसलिए अंदर नही आई, वरना सारी फॉरमैलिटी में ही पांच बजे जाएंगे। अभी ढेर सारी शॉपिंग करनी है और फिर शॉपिंग के बाद अल्ट्रेशन पार्लर का काम बहुत कुछ बाकी है ना। चलो बैठो तो सही, लौटते में मैं मिल लुंगी सबसे।”

  हम्म कह वरुण उसके पास ही बैठ गया, उसका हाथ अपने हाथों में ले कादम्बरी उसे दुनिया जहान की बातें सुनाती रही।
    शहर के सबसे बड़े मॉल की बड़ी सी कपड़ों की दुकान से अगले दिन पहनने के लिए दोनों के लिए एक सा जोड़ा खरीदने के बाद बारी बारी गहनों जूतों चप्पलों पर्स और एसेसरीज की दुकानों को निपटाने में ही घंटों निकल गए।
    सारा कुछ निपटाने के बाद बाहर ही खा पीकर उसने वरुण को उसके घर पर उतारा और बहुत रात हो गयी है कल मिलतें हैं हमारी सगाई, में बोल कर उसके माथे को चूम वापस निकल गयी।

********

     अगले दिन सुबह से ही पारो और देव की हल्दी रस्म के बाद उन्हें एक दिन पहले लाये गंगा के पानी से स्नान करा कर विधिवत तैयार करना शुरू कर दिया गया।

    बंगाली परंपरागत नववधू के लिए लाल बनारसी साड़ी के साथ ही टोपोर( मुकुट) और बाकी सोने के आभूषण तैयार रखे थे।
        चंदन और कुमकुम से पारो के माथे पर बिंदिया सजाती उसकी भाभियां उसकी तारीफ भी करती जा रहीं थी।
    नथ, कान पाशा,मोयूर मुख बाला, पशर बल, मीनार बाला जैसे सारे आभूषण पारो को पहनाने के बाद उसके हाथ में लोहा देकर तारा उसकी माँ की राह देख रही थी कि वो आएं और उसके हाथ में शंख और पोला पहना जाएं।
     पारो की माँ ने अपने पास बस एक हल्की सी सोने की मणिमाला रख कर  अपने सारे गहने अपनी लाडली को पहना दिए थे।
   अपने आँचल में बंधा शंख लिए वो आयीं और सब तारा और बड़ी बहू के हाथों में रख दिया…

  ” ए की काकी माँ! तुम पहनाओ ना तुम्हारी बेटी का ब्याह है!”

  ” शुभ बोलो तारा मैं कैसे पहनाऊँ? तुम सुहागनें उसके हाथ में शंख और पोला डालोगी तो उसका भी सुहाग अमर रहेगा ना! ”

  ” क्या काकी माँ आपसे ज्यादा सच्चे दिल से उसे आशीर्वाद और कौन देगा भला?” तारा की बात को वहीं बैठी तारा की सास ने तुरंत काट दिया..

  ” चुप करो तुम सब, ये शुभ शगुन का काम है , माँ है तो क्या हुआ इस सब शुभ काम में उसकी परछाई भी ठीक नही है। तुम आजकल की लड़कियों को कुछ समझ ही नही है। ” तारा के हाथ से शंख ( कंगन) ले पारो की बड़ी माँ ने उसके हाथ में पहना दिया…” खूब सुखी रहो स्वस्थ रहो सदा सुहागन रहो! ए दुग्गा मेरी बात का बुरा मत मानना लेकिन आज के दिन पारो के आस पास ज़रा कम रहना । देखो बहन शुभ काम होने जा रहा है , तुम्हारी बेटी के जीवन में सब शुभ ही शुभ हो।”

  “हाँ दीदी आप सही कहती हैं।” आंखों की कोर में छलक आये ऑंसू आँचल से पोंछती दुर्गा कमरे से बाहर निकल गयी। अपनी बड़ी बड़ी आंखों में भर आये ऑंसू सम्भालती पारो तारा को देखती बैठी रही, उसके मन के भाव समझ उसे आंखों ही आंखों में सांत्वना दे तारा उसके हाथ और पैरों में आलता सजाती रही।

   शादी मंदिर में होनी थी। सारी साज सज्जा के बाद घर के मंदिर में देवी माँ को प्रणाम कर पारो को लिये घर वाले मंदिर की ओर निकल गए।
   उनके पहुंचने के बाद ही वर पक्ष के लोग भी बारात लिए पहुंच गए… वर को तिलक आरती उतार मंडप में प्रवेश दिला दिया गया।
   वधु के प्रवेश में अभी समय था। शुभमुहूर्त गोधूलि बेला का था।
  
    मंदिर से कुछ ही कदमो की दूरी पर सेवन स्टार होटल के शानदार लाउंज में  कादम्बरी और वरुण की सगाई का कार्यक्रम चल रहा था।
    दोनो पक्षों की तरफ से एक दूसरे को तोहफों के आदान प्रदान के बाद वधु की ओली भरी गयी और वर वधु ने पंडित जी के आशीर्वचनों के बीच एक दूसरे को अंगूठी पहना दी…
       हर कोण त्रिकोण से तरह तरह की तस्वीरें खींचता फोटोग्राफर कभी दोनो की सिर्फ उंगलियों की अंगूठियों को अपने कैमेरा में कैप्चर करता कभी दोनो के मुस्कुराते चेहरों को ।
     हर्षोल्लास के साथ ही अंगूठी बदलने के बाद खाना पीना भी शुरू हो गया। विधायक जी की पार्टी होने से खाने में जहाँ आमिष निरामिष सभी शामिल था वहीं पीने में भी विदेशी सुरा आसव प्रचुरता से बह रही थी।
     जनेऊ धारी मिश्रा जी से कुछ कहते नही बन रहा था , एक कोने की कुर्सी में बैठे इस आमोद उत्सव को देखते वो विचारमग्न थे कि उनकी धर्मपत्नी उनके लिए थाली परोस लाईं। उन्होंने थाली देखते ही इशारे से खाने को मना कर दिया…

  “अपने ही लड़के की सगाई में मुहँ तक मीठा न करेंगे? ये भी कोई बात हुई?”

  मन मार कर थाली पकड़ते ही उनके चेहरे पर मुस्कान चली आयी, आखिर उनकी पत्नी पिछले पच्चीस सालों से जीवन पथ पर उनके साथ कदम से कदम मिलाती चलती आ रहीं थीं। थाली में सिर्फ मिठाई के अलावा उन्होंने और कुछ भी नही परोसा था।
   सामिष निरामिष के झंझट से दूर दोनों पति पत्नी ने एक ही प्लेट से जरा सा जो खाना था खाया और थाली एक ओर सरका दी।

   स्टेज पर खड़ा वरूण विधायक जी के माननीय मेहमानों से मिलने में ही व्यस्त था…
   सगाई के बाद पंडित जी ने भावी दूल्हा दुल्हन को पास के मंदिर में जाकर माँ का आशीर्वाद लेने भी कह रखा था।
   सुबह से चल रहा सगाई का कार्यक्रम शाम होते होते अपने अवसान की ओर पहुंच ही गया। एक एक कर मेहमानों के जाने के साथ ही वरुण की माँ के याद दिलाने पर वरुण कादम्बरी का हाथ थामे मंदिर की ओर पैदल ही निकल गया।
    मुस्कुराती कादम्बरी वरुण के कंधे से लगी उसका हाथ थामे चलती रही…..

    मंदिर में वर पूजा संपन्न होते ही वधु की पुकार मची….
   पारो के सभी भाई उसे लेने चल पड़े। सुंदर सी सजी टोकनी में पारो को बैठाए औरतों की उलू के बीच उसके भाई उसे शुभो दृष्टि के लिए मंडप की ओर ले चले।
   अपनी आंखों पर पान के पत्ते रखे मुस्कुराती पारो टोकनी में ऑंखें बंद किये बैठी रही…
    सभी बड़े बुजुर्गों की उपस्थिति में वर के चारों ओर से पारो को परिक्रमा दिलवाते उसके भाई उसे देव के ठीक सामने लेकर खड़े हो गए।
   पंडित जी के कहे अनुसार पारो को आंखों के सामने रखे पान के पत्ते को हटा कर शुभ दृष्टि में अपने पति को पहली बार देखना था…
      औरतों की मंगल हुलु आवाज़ों के बीच शरमाते हुए पारो ने आंखों पर रखा पान का पत्ता हटाया और आंखें खोली , ठीक उसी वक्त देव के साथ सहबाला बन कर आये बच्चे का भीड़ भाड़ में अपने साथ खड़े बालक से किसी बात पर कहा सुनी होने पर देव की तरफ गिरना हुआ , और शुभ दृष्टि के समय ही देव खुद को  संभाल ना पाने से सामने की ओर झुक गया और उसी वक्त मंदिर दर्शन को वहाँ पहुंचे वरुण पर पारो की दृष्टि पड़ गयी।
     पारो ने वरुण को देखा, वरुण ने पारो को और बस सेकंड के बीसवें हिस्से में ये एक छोटी सी घटना घट गई।
   हंसी ठिठोली में दूल्हे को संभालते दूल्हे के दोस्त उसे छेड़ने में लगे थे ,दूल्हा मुस्कुरा कर अपने सर का टोपोर संभाले वापस अपनी जगह खड़ा था, वधु की नीचे झुक चुकी दृष्टि को अपनी ओर मोड़ने के लिए लेकिन इतनी भीड़ भाड़ में लाज से गुलाबी होती पारो की दृष्टि फिर ऊपर नही उठी……..

     सिंदूर दान के साथ ही सप्तपदी सम्पन्न होते ही वर वधु को साथ लिये परिवार के लोग वधु के घर की ओर प्रस्थान कर चले….
    कालरात्रि के बाद ही पारो की विदाई थी। अब उसका परिवार ब्याह से निपटने के बाद उसकी बिदाई की तैयारियों में लग गया…

   क्रमशः

  aparna….



   



     

  

  

लेखक: Aparna Mishra

दिल से लेखक हूँ... मेरे किस्सों में आप खुद को ढूंढ सकते हैं... 80aparna.mishra@gmail.com

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s